गांव को लौटते हतप्रभ और हारे श्रमिकों को भोजन

गरीब और विपन्न हैं। छ दिन पैदल चलने पर शरीर और मन टूट गया है। पर फिर भी अपने जेठ का आदर और किसी बाहरी के देखने पर मुंंह छिपा लेने का शिष्टाचार अभी उनमें बरकरार है।


मैं बार बार कह रहा था राह चलते श्रमिकों को भोजन कराने का उपक्रम पुन: प्रारम्भ करने के लिये। गांव के वे नौजवान भी चाहते थे। शायद इंतजाम करने में समय लगा। कल मुझे कैलाश बिंद जी ने फोन पर बताया कि लोग इकठ्ठा हैं शिवाला पर और भोजन भी बन गया है। “आप वहीं आ जाइये।”

सात-आठ लोग थे वहां। तहरी बन कर तैयार थी एक बड़े से भगौने में। टेण्ट लगा था और उसके नीचे हरी जाजिम बिछा दी गयी थी। थर्मोकोल की थालियां, मिर्च, नमक आदि उपलब्ध था। एक कण्डाल में पानी भरा रखा था।

बांये से – मोहित, नीरज, धीरज, सुशील और कैलाश। इन्होने निस्वार्थ भोजन दान का आयोजन किया। पहले दस दिन तक और अब पुन: प्रारम्भ किया है।

हाईवे (ग्राण्ड ट्रंक रोड) की बगल में शिवाला है। अभी हाल ही में हाईवे के छ लेन का करने के काम में शिवाला पीछे शिफ्ट किया गया है। पुराने मंदिर का मलबा अभी वहीं है। पर परिसर बड़ा है। आम और आंवला के पेड़ भी हैं वहां।

कोरोना लॉकडाउन में घर की ओर पलायन करते श्रमिक और उनके परिवार पश्चिम से पूर्व की ओर चलते हैं। पूर्व की ओर चलते व्यक्ति के लिये शिवाला उसी ओर पड़ता है। सड़क क्रॉस करने का झंझट नहीं। कुल मिला कर भण्डारा आयोजन करने के लिये सही जगह है।

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