भय कोरोना का नहीं, ट्रक की उजड्ड ड्राइविंग का है – #गांवकाचिठ्ठा

दोनो अपने साइकिल से निकलने चलने को सही ठहरा रहे थे। लेकिन मुझे लगा कि सरकार ने अगर बसें इंतजाम कर दी होतीं, तो बहुत सही रहता। पर सरकारों ने कुछ किया ही नहीं।



मई 19, 2050, विक्रमपुर, भदोही।

आज की शुरुआत खराब खबर से हुई। गांव के तीन लोग रात में शराब की तलाश में अपना ऑटो ले कर गये थे। पास के किसी दुकान से शराब ली, घर आ कर खाया-पिया और शराब कम पड़ गयी तो ऑटो से फिर लेने गये। वापसी में स्टेशन के पास तेज चाल से ऑटो चलाते आये और एक खड़ी ट्रक में घुसते चले गये। तूफानी; जिसका ऑटो था, मर गया। उसका शरीर ट्रक में बुरी तरह फंस गया था। किसी तरह से उसे लोगोँ ने निकाला और अस्पताल ले गये। वह बचा नहीं। दो अन्य को बहुत चोटें आयी हैं। खबर सुग्गी ने दी। उसके बाद बसंत आये। बसंत हमारे कपड़े प्रेस करते हैं। उस समय हमारे लिये दूसरी बार चाय बनी थी तो उनको एक कप चाय ऑफर की गयी। बैठ कर बसंत ने भी यही बताया।

बसंत कनौजिया।

तूफानी से कष्ट था बसंत को। उनकी बहट (बहक) गयी गाय को तूफानी ने अपने यहां बांध लिया था। वापस नहीं किया। बसंत ने आसपास बहुत तलाशा, पर अंत में वह तूफानी के घर मिली; बारह दिन बाद। बसंत ने बारह दिन गाय के खिलाने का हर्जाना भी ऑफर किया, एक भूतपूर्व प्रधान और वर्तमान प्रधान को गुहार भी लगाई पर वापस नहीं दी तूफानी ने। बोला; जब बियाई जाये, तब देब (जब बच्चा जन देगी, तब वापस करेगा)। “अब ऊ @*&%# खुदई चला गवा ऊपर।”

बसंत बहुत सभ्य व्यक्ति है। उनपर एक पहले की ब्लॉग पोस्ट भी है। कभी गाली देते नहीं पाया बसंत को। आज उनके मुँह सेे सुनने में आयी। वह भी मृत व्यक्ति के बारे में। मरा भी वह शराब पी कर दुस्साहसी तरीके से ऑटो चलाते हुये।

सवेरे साइकिल सैर में आज भी प्रवासी जाते दिखे हाईवे पर। मेरे पास से दो-तीन ट्रक गुजरे जिनमें तिरपाल लगा था और प्रवासी मजदूर चलती ट्रक से झांक रहे थे – उसी प्रकार जैसे नेवले अपनी बिल से मुंह निकाल झांकते हैं। एक जगह दो व्यक्ति हाईवे की रेलिंग के साथ बैठे खीरा खा रहे थे। उनकी साइकिलें उनके पास थींं और साइकलों पर वे सामान भी लादे हुये थे। मुझे लगा कि ये भी घर लौटते प्रवासी होंगे। उनके पास से मैं चलता चला गया, पर कुछ सोच कर उनसे बातचीत करने वापस लौटा। वे वास्तव में प्रवासी निकले।

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