पाब्लो नरूदा (?)  की कविता का अनुवाद – रिटायर्ड व्यक्ति के लिए 


नोबेल पुरस्कार विजेता स्पेनिश कवि पाब्लो नेरुदा की कविता “You Start Dying Slowly” का हिन्दी अनुवाद…

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप :

  • करते नहीं कोई यात्रा,
  • पढ़ते नहीं कोई किताब,
  • सुनते नहीं जीवन की ध्वनियाँ,
  • करते नहीं किसी की तारीफ़।

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, जब आप :

  • मार डालते हैं अपना स्वाभिमान,
  • नहीं करने देते मदद अपनी और न ही करते हैं मदद दूसरों की।

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप :

  • बन जाते हैं गुलाम अपनी आदतों के,
  • चलते हैं रोज़ उन्हीं रोज़ वाले रास्तों पे,
  • नहीं बदलते हैं अपना दैनिक नियम व्यवहार,
  • नहीं पहनते हैं अलग-अलग रंग, या
  • आप नहीं बात करते उनसे जो हैं अजनबी अनजान।

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप :

  • नहीं महसूस करना चाहते आवेगों को, और उनसे जुड़ी अशांत भावनाओं को, वे जिनसे नम होती हों आपकी आँखें, और करती हों तेज़ आपकी धड़कनों को।

आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं, अगर आप :

  • नहीं बदल सकते हों अपनी ज़िन्दगी को, जब हों आप असंतुष्ट अपने काम और परिणाम से,
  • अग़र आप अनिश्चित के लिए नहीं छोड़ सकते हों निश्चित को,
  • अगर आप नहीं करते हों पीछा किसी स्वप्न का,
  • अगर आप नहीं देते हों इजाज़त खुद को, अपने जीवन में कम से कम एक बार, किसी समझदार सलाह से दूर भाग जाने की…।
    तब आप धीरे-धीरे मरने लगते हैं…!!!

कविता अच्छी है, पर शायद नेरुदा की नहीं। Latin American Herald Tribune लिखता है – 

“Muere Lentamente” is the work of Brazilian writer Martha Medeiros, author of numerous books and reporter for the Porto Alegre newspaper Zero Hora, the Neruda Foundation told Efe.
लिंक यह है – http://www.laht.com/article.asp?ArticleId=325275&CategoryId=14094

Powered by Journey Diary.

Advertisements

अगियाबीर के रघुनाथ पांड़े जी


GyanMay175950
रघुनाथ पांड़े जी और उनकी नातिन। नब्बे से ज्यादा की उम्र है पर दांत-आंख-शरीर सब चैतन्य है पांड़े जी का।

रघुनाथ पांड़े जी नब्बे से ऊपर के हैं। पर सभी इन्द्रियां, सभी फ़ेकल्टीज़ चाक चौबन्द। थोड़ा ऊंचा सुनते हैं पर फ़िर भी उनसे सम्प्रेषण में तकलीफ़ नहीं है। ऐसा प्रतीत नहीं होता कि उन्हे अतीत या वर्तमान की मेमोरी में कोई लटपटाहट हो। जैसा उनका स्वास्थ है उन्हे सरलता से सौ पार करना चाहिये।सरल जीवन। अपनी जवानी में व्यायाम और वजन उठाने का शौक रहा है उन्हे। बताते हैं कि गांव में अहिरों की बारात आती थी तो मनोविनोद के लिये वेट लिफ़्टिंग का कार्यक्रम होता था। वे ही बुलाये जाते थे गांव का प्रतिनिधित्व करने को। तीन मन (40 सेर वाला मन) वजन उठा लेते थे वे। अपने जमाने में साइकिल भी खूब चलाये हैं। शौकिया नहीं – काम से। एक बार बनारस भी गये हैं साइकिल से।

उनका गांव है अगियाबीर। उनके घर से अगियाबीर का टीला सामने दीखता है। वह टीला जहां खुदाई में 3300 साल पुरानी सभ्यता पाई गयी है। मध्य गंगा घाटी सभ्यता का एक महत्वपूर्ण शहर रहा है अगियाबीर। वे प्राचीन इतिहास-प्रागैतिहास की बात करते हैं, अगियाबीर के। “यह जो टीले के पास से रास्ता है, यही हुआ करता था प्राचीन काल में। तब, जब जीटी रोड नहीं था। गंगा किनारे किनारे रास्ता गया था। नार-खोह को डांकता।”

खड़ी बोली में नहीं, भोजपुरी/अवधी में बात करते हैं रघुनाथ जी। उनकी वाणी इतनी स्पष्ट है कि मुझे समझने में कोई दिक्कत नहीं हुई।

GyanMay175859
गुन्नीलाल पांण्डेय

उनके लड़के – गुन्नीलाल पांड़े ने अपने घर आमन्त्रित किया था मुझे और राजन भाई को। राजन भाई उनके स्कूल के सहपाठी रहे हैं। बड़े ही आत्मीय और मेहमाननवाजी करने वाले हैं गुन्नी पांड़े। वहीं गुन्नीलाल जी के पुत्र संजय भी मिले। गुन्नीलाल पास के मिडिल स्कूल के अध्यापक पद से रिटायर हुये और संजय डेहरी में नवोदय विद्यालय में पढ़ाते हैं। आर्थिक रूप से (ग्रामीण परिवेश में) ठोस है यह परिवार। रघुनाथ-गुन्नी-संजय और संजय का पुत्र/पुत्री। चार पीढ़ियां रह रही हैं वहां। गांव के एक आदर्श घर की अगर कल्पना आप करें तो वह रघुनाथ पांड़े जी के घर सरीखा होगा।

मैं गुन्नीलाल जी से पूछता हूं – यह सड़क जो अगियाबीर-कमहरिया-केवटाबीर आदि गांवों को जोड़ती है, पहले भी थी? उन्होने बताया कि पहले तो मात्र पगड़ण्डी भर थी। बैलगाड़ी भी नहीं आ-जा सकती थी। पैदल या साइकल से आया जाया जा सकता था। लोग अपनी लड़कियों की शादी यहां करने में झिझकते थे। पर सन 1986 की चकबन्दी के बाद सड़क के लिये जमीन निकली। सड़क बनने पर बहुत अन्तर आया लोगों के जीवन स्तर में। अभी भी हाट-बाजार के लिये 4-5 किलोमीटर जाना पड़ता है पर अब उतना जाना आना अखरता नहीं। रघुनाथ पांड़े कहते हैं कि मिर्जापुर और भदोही जिले की रस्साकस्सी में अगियाबीर और द्वारिकापुर के बीच नाले पर पुल नहीं बन पाया है। देर सबेर बन जायेगा तो सहूलियत और बढ़ जायेगी। गुन्नीलाल जी इस इलाके की लचर नेतागिरी का भी हाथ मानते हैं विकास न होने में। “फूलन देवी जैसे को सांसद बनायेंगे तो क्या होगा?”

गुन्नीलाल जी के यहां चाय बहुत बढ़िया बनती है। तीन-चार बार गया हूं उनके यहां और हर बार एक विशिष्ट स्वाद मिला है। उनकी पतोहू या पत्नी – जो बनाती हों, अच्छा बनाती हैं। गांव के माहौल में अमूमन चाय टरकाऊ मिलती है। ऐसा गुन्नीलाल जी के यहां नहीं है। उनके घर में पेड़-पौधों, घर की बनावट, साफ़-सफ़ाई और समग्र व्यवस्था में एक सुरुचि दीखती है। वैसा सामान्यत: गंवई घरों में दिखता नहीं।

IMG_20170513_065550
रघुनाथ पाण्डेय जी के घर का फ्रंटेज। बिना सपोर्ट के इतना बढ़िया छज्जा गांव में मैने देखा नहीं। 

पहले बार जब मिला तो हमारे बीच औपचारिकता थी। मैं रेलवे का (रिटायर्ड) अफसर था। दूसरी बार उनके पिताजी से और परिचय हुआ। उनको पैलगी भी करने लगा मैं। गुन्नीलाल जी के साथ आत्मीयता से गले भी मिला। अब लगता है राजन भाई के साथ न होने पर भी उनके घर जाने पर अटपटा नहीं लगेगा।

मदन मोहन पाण्डेय, उम्र 93 वर्ष


पिछली बार मदन मोहन जी से मिला था एक महीना पहले। आज फिर मिलना हुआ। वे और उनकी पत्नीजी खटिया पर बैठे थे। दोनो ही नब्बे के पार होंगे (या पत्नीजी नब्बे के आस पास होंगी)। वे स्वयम तो 93+ हैं। नब्बे के पार की उम्र और चैतन्य! कुछ कृशकाय हो गये हैं पर कद काठी से फिदेल कास्त्रो से लगते हैं!

मदन मोहान जी कुछ साल पहले तक साइकिल चला लेते थे। उन्होने बताया कि साइकिल का प्रयोग यातायात के लिये किया उन्होने। व्यायाम के लिये नहीं। व्यायाम तो वे मुगदर, नाल आदि से करते थे। लाठी/गोजी चलाने की भी निपुणता थी उनमें। मुसलमानों से सीखी थी यह विद्या। एक बार तो अनेक लोगों को अपने हाथ और लाठी के बल पर पछाडा। उनपर गोली भी चला दी थी एक व्यक्ति ने पर वह मात्र उनके हाथ में लगी। दांई हथेली में वह गोली आज भी शरीर में है। … एक बार वे एक झगड़े के गवाह थे। उनकी गवाही पर पांच लोगों को उम्र कैद की सजा भी हुई।

अपने बचपन को याद करते हुये बताते हैं कि उनके जमाने में महराजगंज में प्राइमरी स्कूल था। एक स्कूल बाबूसराय में था। अब तो हर जगह स्कूल खुल गये हैं। वे केवल दूसरी कक्षा तक पढे। पढने में मन नहीं लगता था। घर से चना ले कर स्कूल के लिये रवाना होते थे। स्कूल जाने की बजाय भुंजवा के यहां चना भुनवाते, बगीचे में बैठ कर चबाते और स्कूल का समय खत्म होने पर घर आ जाते थे। मार भी खाये पर पढ़े नहीं।

कलकत्ता में मदन मोहन जी 15 साल रहे। पहले ट्रक चलाया। अपना ट्रक। असम/गुवाहाटी तक हो आये। कलकत्ता से शाम को चलते थे और सवेरे तक इलाहाबाद/बनारस पंहुचते थे। ट्रक के बाद कलकत्ता में और भी काम किया उन्होने।

साइकिल खूब चलाई है उन्होने। सौ किलोमीटर रोज तक भी चलाई है। गांव से राबर्ट्सगन्ज तक साइकिल से हो आये हैं। तब सड़कें खाली होती थीं। वाहन कम। सड़कों पर पैदल चलने वाले ज्यादा होते थे।

बदलते समय के बारे में उनके समय में एक प्रचलित कहावत सुनाई मदन मोहन जी ने। इन्दारा से पानी निकालने के लिये गगरी का प्रयोग होता था। बाद में बड़ा गगरा (पीतल या ताम्बे का घड़ा) प्रयोग में आने लगा। उसके बाद बाल्टी से भी पानी निकालने का समय आया।

गगरी रही, त पटरी रही (जब तक गगरी थी, तब तक पटरी – आपस में सौहार्द – रही)

गगरा भवा त रगरा भवा (जब गगरा प्रयोग में आया तो आपस में झगड़ा होने लगा। गगरी की बजाय गगरा कुंये की दीवार से ज्यादा टकराता था।)

बाल्टी आइ त पाल्टी आइ (बाल्टी का प्रयोग होने लगा तो राजनीति घुसी गांव में। पार्टियां बनने/दखल देने लगीं)

चलते समय पाण्डेय जी को प्रणाम किया तो उन्होने पुन: आने को कहा। उनके पास जाना और बैठना अच्छा लगता है। सो जाऊंगा जरूर। कामना है कि उनका स्वास्थ्य अच्छा रहे और सरलता से सौ पार करें वे। उनके पास बैठ कर समाज-गांव में हुये बदलाव पर उनका कथन सुनना है। बार बार।


श्री बालकृष्णदास “व्यास” से एक और मुलाकात


आज योगेश्वरानन्द आश्रम के बाहर मैं और राजन भाई थे। बालकृष्णदास व्यास जी अपने कक्ष से बाहर निकल आये। शायद आहट से। उनसे बातचीत होने लगी। इधर उधर की बातचीत से प्रारम्भ हुई और मेरी पिछली पोस्ट के माध्यम से बालकृष्णदास व्यास जी के परिचय पर आ गयी। उन्होने अपने विषय में जो कुछ बताया, उसको ले कर कोई बायोग्रफ़र या कोई उपन्यासकार एक दमदार कृति लिख सकता है। पर असल बात यह है कि मैं न लेखक हूं, न बायोग्राफ़र और न उपन्यासकार। मैं एक ब्लॉगर हूं, जो अपने परिवेश से कुछ चिन्दियां चुनता है; साथ में एक दो फोटो सटाता है और प्रस्तुत कर देता है।


मैं योगेश्वरानन्द आश्रम जाता क्यों हूं? एक – वहां गंगा तट है। दो – सवेरे की सैर/साइकलिंग के लिये वह सही दूरी पर है। भगवानपुर-करहर-गड़ौली होते हुये वहां जाने-आने में आठ-नौ किलोमीटर की साइकलिंग होती है। तीन – यह स्वीकर करना शायद कठिन हो; बालकृष्णदास व्यास (आश्रम में रहने वाले एकान्तवासी साधक/कवि) को लेकर एक कौतूहल है।


बालकृष्णदास व्यास जी जो कुछ लिख या रच रहे हैं, उसके परिचय के लिये विस्तृत लेख की जरूरत है। वह लेखन समय मांगता है। इसके अलावा बालकृष्ण जी के महाकाव्य को डिजिटल फार्म में लाने के लिये गहन रूप से कई मैन-डेज़ का इनपुट चाहिये। मैं उनसे इस विषय में कहता हूं तो वे लैपटॉप की अनुपलब्धता की बात करते हैं। उनका कहना है कि वे ऐसे लोगों के सम्पर्क में हैं जो काव्य की-इन कर सकें।

मैं सोचता हूं कि अपना एक लैपटॉप उन्हे उपलब्ध करा दूं। पर उसमें मेरा इतना डाटा, इतना अटाला पड़ा है कि पहले उसे साफ़ करना होगा। … बालकृष्णदास व्यास जी से मिलना मेरी रिटायर्ड जिन्दगी के आराम में खलल न डाल दे! 😆

GyanApr175543M
आश्रम के बाहर प्रारम्भ हुयी बालकृष्णदास व्यास जी से बातचीत।

बहुत कुछ बताया अपने विषय में बालकृष्णदास व्यास जी ने। उन्होने कहा कि उनकी अवस्था लगभग 35 वर्ष की है। इस 35 वर्ष की अवस्था में क्या जबरदस्त उतार-चढ़ाव हैं उनके जीवन में! उनके माता-पिता बबीना के पास के हैं। बबीना ऑर्डीनेन्स डीपो के द्वारा उनके पिता की लगभग 150बीघा जमीन अधिगृहीत की गयी। उसके मुआवजे से परिवार बहुत सम्पन्न हो गया। उनकी मां के पास 5 किलो सोना था स्त्री-धन के रूप में। पर बुन्देलखण्ड में सम्पन्नता सहेज कर रखना सरल नहीं है। डाका पड़ा और परिवार अति सम्पन्न से अति विपन्न की दशा में आ गया।

जीवन के प्रारम्भ में उन्होने विपन्नता देखी। घोर विपन्नता। फिर परिवार का पालन-प्रबन्धन का समय आया। उसके बाद बालकृष्णदास व्यास जी ने घर छोड़ कर अनेक स्थानों पर, अनेक गुरु-साधुओं के साथ समय व्यतीत किया। हरिद्वार से ले कर अहमदाबाद तक। अहमदाबाद में आशाराम बापू के साथ भी रहे। मैने कहा – क्या इस विषय में अपने ब्लॉग पर लिख दूं? 

बात वही समाप्त! विवाद क्या बढ़ाया जाए। 

आशाराम या अन्य संतों के साथ जो समय बालकृष्णदास व्यास जी ने गुजारा उसपर विधिवत सामग्री अपने आप में एक रोचक (और महत्वपूर्ण) दस्तावेज होगी। कभी शायद कोई व्यक्ति, या स्वयम वे लिखें। पर जो भी वे बता रहे थे आश्रम के बरगद की छाया में या फिर अपने कक्ष में, वह मोहक था। मेरे साथ गये राजन भाई शायद वापस लौटने की उकताहट दिखा रहे थे, पर मैं उन्हे सुनता जा रहा था।

व्यास जी ने अपने कृतित्व के बारे में बताया। शंकर-पार्वती संवाद से (उसी प्रकार जिस प्रकार रामचरित मानस) गुंथी है यह कथा। उसकी भाषा तुलसी के मानस का बेस तो लेती है, पर उसमें कालान्तर में आये शब्द और प्रयोग निसंकोच हैं। इस बारे में बालकृष्णदास जी की मौलिकता है। ग्रन्थ के कथ्य पर ज्यादा नहीं कहूंगा, सिवाय इसके कि वह रोचक लगता है। मेरे पास वहां बैठने का ज्यादा समय होता तो निश्चय ही और भी सुनना अच्छा लगता। उससे भी ज्यादा समय हो तो उस ग्रन्थ को उलटने/पलटने/पढ़ने और उसपर लिखने का प्रयास करता; बावजूद इसके कि मेरा पठन का बैकलॉग पहले ही बहुत ज्यादा है। कथ्य में वर्तमान सामाजिक/रजनैतिक दशा पर पर्याप्त सोच है और मेधा के प्रत्येक स्तर के व्यक्ति को उसमें कुछ न कुछ मिलेगा जो उसे रुचेगा या प्रेरणा देगा। … आखिर किसी ग्रन्थ की उपयोगिता का यही तो सबसे महत्वपूर्ण पैमाना होता है! नहीं?


GyanApr175545-01-01
आश्रम में मेटी ले कर आया कुम्हार।

वहां आश्रम में एक कुम्हार एक मेटी (छोटा घड़ा) ले कर आया है बालकृष्णदास जी के लिये। उसी कुम्हार को मैं पचास रुपये देता हूं कि मेरे लिये वह घड़ा ला कर दे।

घड़ा लेने जाने को एक चक्कर वहां अवश्य लगेगा। एक और मुलाकात व्यास जी से होना नियत है ही।

शायद उन्हे घर पर भी बुलायें मेरी पत्नीजी। जितना मैने अपनी पत्नीजी को बताया है, या ब्लॉग पर उन्होने पढ़ा है; उनके मन में भी कौतूहल तो है ही।

अत: भविष्य में भी ब्लॉग पर व्यास जी के संदर्भ में कुछ न कुछ रहेगा!