केदारनाथ चौबे का नित्य गंगा स्नान


इस इलाके में कई लोग हैं जो बरसों से, बिला-नागा, गंगा स्नान करते रहे हैं। आज एक सज्जन मिले -श्री केदारनाथ चौबे। पास के गांव चौबेपुर के हैं। वृद्ध, दुबला शरीर, ऊर्जावान। द्वारिकापुर में एक टेकरी पर बनाये अस्थाई मन्दिर में भागवत कथा कहते हैं। कुछ सुनने वाले जुट जाते हैं। कभी कोई मेला – पर्व का दिन हो तो ज्यादा भी जुटते हैं।

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द्वारिकापुर में गंगा किनारे एक टेकरी समतल कर मूर्तियां रखी हैं। वहीं केदारनाथ चौबे भागवत कथा कहते हैं।

आज एक महिला उनका स्थान साफ़ कर लीप रही थी। वही एक मात्र श्रोता होगी शायद आज कथा की।

चौबे जी ने बताया कि तेरह साल हो गये उन्हे नित्य गंगा स्नान करते। भगवान करा रहे हैं और वे कर रहे हैं। अपने गांव से रोज साइकल से आते हैं। पहले साइकल ऊपर रखते थे। एक दिन एक व्यक्ति (उन्होने नाम भी लिया) ने साइकिल उड़ा ली। तब से अपने पास ही रखने लगे हैं।

तेरह साल हो गये इस नित्य कर्म को; आगे उन्होने सन 2020 तक का समय मांगा है भगवान से।

उसके बाद? सन 2020 के बाद?

उसके बाद जहां ले जायें भगवान! उन्होने अपना हाथ ऊपर उठा कर संकेत किया कि शरीर सन बीस तक मांगा है उन्होने। ज्यादा जीना होगा तो भगवान की इच्छा।

मैने उनकी उम्र पूछी। बोले छिहत्तर साल। अर्थात अपने लिये अस्सी साल की अवस्था की कामना की है उन्होने भगवान से।

वे देखने में 76 से कम के लगते है।  “भगवान ने शरीर सन 2020 तक ले लिये नहीं, बीस साल और चलने के लिये बनाया है” मैने अपना मत व्यक्त किया।

केदारनाथ जी बीस साल जीने की बहुत इच्छा वाले नहीं लगे। बोले जो इश्वर चाहेंगे, वही होगा।

अपना कर्म, अपनी चाह, अपना जीवन; सब ईश्वर के अधीन कर केदारनाथ जी कितने सहज भाव से जी रहे हैं! हम वैसे क्यों नहीं हो पाते जी?!

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गंगा किनारे अपने आसन पर बैठे केदारनाथ चौबे जी।

 

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एक भाग्यशाली (?!) नौजवान से मुलाकात


अमित पाण्डेय। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव। मुझे रथयात्रा, वाराणसी में सोनू उपाध्याय के दफ़्तर में मिले।
अमित पाण्डेय। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव। मुझे रथयात्रा, वाराणसी में सोनू उपाध्याय के दफ़्तर में मिले।

(यह मैने बतौर फेसबुक नोट पोस्ट किया हुआ है। ब्लॉग पर इसका परिवर्धित रूप रख रहा हूं। दस्तावेज के लिये।)

वाराणसी में मैं सोनू (प्रमेन्द्र) उपाध्याय के रथयात्रा स्थित मेडिकल स्टाक-दफ़्तर में बैठा था। सोनू मेरे बड़े साले साहब (देवेन्द्र नाथ दुबे जी) के दामाद हैं। अत्यन्त विनम्र और सहायता को तत्पर सज्जन। वे मेरे लिये एक आवश्यक औषधि मंगवा रहे थे थोक विक्रेता के यहां से। उनका जो कर्मचारी औषधि लेने गया था, वह जाम में फंस गया था। उसके आने में देरी हो रही थी। सोनू आवाभगत में हमें (मेरी पत्नीजी और मुझको) एक-एक कुल्हड़ (उम्दा) चाय पिला चुके थे। हम आपस में इधर उधर की बातचीत भी निपटा चुके थे। अब विशुद्ध इन्तजार करना था औषधि लाने वाले व्यक्ति का।

वहीं बैठे थे दो सज्जन – नौजवान। वे आपस में मैडीकल कम्पनियां ज्वाइन करने/छोड़ने और विभिन्न दवाओं के स्टाक आदि के बारे में बात कर रहे थे – आपस में और सोनू से भी।

समय गुजारने की गर्ज से ही मैने उनमें से एक, जो एक गमछे के साथ खेल भी रहा था, से पूछा – कम्पनियां ज्वाइन करने और छोड़ने की बातें कर रहे हैं आप। इसमें अनिश्चितता नहीं रहती? तनाव नहीं होता?

उसने बताया – है क्यों नहीं। तनाव भी रहता है। पर यह नौकरी – मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव की – महीने में बीस हजार दे रही है। सो ठीक लगता है।

प्रमेन्द्र (सोनू) उपाध्याय। यह चित्र तब का है, जब वे मेरे गांव स्थित घर में मिलने आये थे।
प्रमेन्द्र (सोनू) उपाध्याय। यह चित्र तब का है, जब वे मेरे गांव स्थित घर में मिलने आये थे।

सोनू ने कहा कि ये नौजवान करीब दो लाख महीने का टर्नओवर कर रहे हैं। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव के अलावा किसी न किसी कम्पनी की फ्रेंचाइज़ी हासिल कर लेते हैं। जितना काम, जितनी मेहनत, उतनी कमाई।

उस नौजवान से पूछा – कितना समय हुआ यह करते? इसके पहले क्या करते थे?

नौजवान ने नाम बताया अमित। अमित पाण्डेय। करीब डेढ साल से यह काम कर रहे हैं। फार्मेसी की पढ़ाई नहीं की। बी.ए. किया है। उसके बाद इसी काम में लग गये।

हंसमुख नौजवान। तनाव को काम का अनिवार्य अंग मान कर चल रहा है। अपने काम में सजग। जीवन में बड़ी जल्दी नेटवर्किंग का महत्व समझ गया है। … व्यक्ति सजग हो, उसका व्यक्तित्व हंसमुख हो, वह मिलनसारता का महत्व जानता हो और अपनी दशा से कुढ़ता न हो; तो वह भाग्यशाली होगा। अपॉर्च्युनिटीज उसके पास सामान्य से अधिक आयेंगी और (अपनी मानसिकता के अनुकूल) वह अवसर पहचानेगा और तरक्की करेगा। पता नहीं, अमित यह जानता है या नहीं, पर अगर नहीं भी जानता, तो अपनी प्रवृत्ति के अनुसार, अनजाने ही सफ़लता की गोल्डमाइन पर हाथ तो रख ही लिया है उसने।

अमित का प्रोफाइल चित्र - ह्वाट्सएप्प पर।
अमित का प्रोफाइल चित्र – ह्वाट्सएप्प पर।

मैने अमित का एक चित्र लेना चाहा तो अमित ने सही पोज बनाया – गमछा अलग रख कर। मैने कहा – ऐसे नहीं वैसे बैठो जैसे गमछा लपेट कर बैठे थे।

अमित ने गमछा पुन: लपेट कर मुझे ओबलाइज़ किया। सोनू ने उससे कहा – लो, अब तुम सोशल मीडिया पर आ जाओगे।

सोनू जी का सहकर्मी मेरी दवाई ले कर आ चुका था। दवाई का डिब्बा ले कर लौटते समय अमित के बारे में मैं और सोच रहा था। दशकों पहले किसी बिजनेस पत्रिका में आदि गोदरेज का पढ़ा एक इण्टरव्यू याद आ रहा था, जिसमें उन्होने कहा था – इस देश में ऐसा कोई भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं है, जो रोजगार पाने का हुनर रखता है। (No one is unemployed who is employable)

अमित को देख वह धारणा पुष्ट हो रही थी। अमित आज रोजगार पाने का हुनर रखता है। कल शायद रोजगार देने का भी हुनर हासिल कर ले!

अविनाश सिरपुरकर : एक दण्ड-अधिवक्ता के पीछे का व्यक्तित्व


श्री अविनाश सिरपुरकर (उनके फेसबुक प्रोफाइल का चित्र)
श्री अविनाश सिरपुरकर (उनके फेसबुक प्रोफाइल का चित्र)

समाचारों में मैं क्रिमिनल लॉयर्स के बारे में बहुत पढ़ता-सुनता रहा हूं। पर पहले किसी क्रिमिनल लॉयर से सम्पर्क नहीं हुआ था। अत: एक कौतूहल तो था मन में कि ये व्यक्ति अपराध, छद्म, और मामलों को सदा एक्यूट एंगल से देखते देखते अपने सामान्य व्यक्तित्व, आदर्श और नैतिकता को किस स्तर का बनाये रखते हैं। यह इच्छा मन में थी कि अगर ऐसे किसी व्यक्ति से कभी मिला तो इस बारे में पूछूंगा जरूर।

मुझे अवसर मिल गया जब मैं उस दिन अपने काम से श्री अविनाश सिरपुरकर से उनके इन्दौर के दफ्तर में मिला। उनसे इस विषय में टेनटेटिव प्रश्न किया। पर अविनाश जी ने सम्भवत: इसे मूल विषय से इतर मान कर यही समझा कि मैं उनसे नेटवर्किंग बनाने के लिये इस प्रकार का प्रश्न कर रहा हूं। वह बात वहीं रह गयी।

अविनाश जी से अगले दिन पुन: मुलाकात हुई। रतलाम में। तब उन्होने स्वयम अपने विषय में (लगभग) विस्तार से बताया।

अविनाश मध्य प्रदेश हाई-कोर्ट के वरिष्ठ दण्ड-अधिवक्ता (क्रिमिनल लॉयर) हैं। वरिष्ठ और व्यस्त। “मेरी सात पीढ़ियां अधिवक्ताओं/कोर्ट-कचहरी वालों की हैं।” उनकी मानी जाये तो कानून-कोर्ट-कचहरी-अदालत केन्द्रित है उनका जीवन। “उसके अलावा कुछ नहीं”

मैं असहमति जताता हूं। एक व्यक्ति जो सफलता के सोपान तय कर के (लगभग) शीर्ष पर पंहुचता है, एकांगी नहीं हो सकता। किसी न किसी अन्य प्रकार से समाज के प्रति अपना दायित्व समझता होगा – अगर वह मात्र आत्मकेन्द्रित/स्वार्थपरायणी न हो। और एक इण्ट्रोवर्ट व्यक्ति के भी उत्कृष्टता के एक से अधिक पहलू होते हैं।

स्टीफन आर कोवी की पुस्तक – द एड्थ हैबिट ( THE 8TH HABIT: FROM EFFECTIVENESS TO GREATNESS) पढ़ते समय मुझे यह गहरे से महसूस हुआ था कि सफल व्यक्ति केवल सफलता पर ही ठहरता नहीं है। उसमें समाज और जीवन को प्रतिदान (contribution) करने,  मूल्य (values) देने, और लीगेसी स्थापित करने की अंतर्निहित इच्छा होती है। यह मानव का मूल स्वभाव है।

अविनाश जी का फेसबुक कवर
अविनाश जी का फेसबुक कवर

इस बारे में अविनाश जी काफी झिझकते हुये खुले। मुझ जैसे लगभग अपरिचित से खुलने में होने वाली झिझक स्वाभाविक है। शुरुआत उन्होने अपने घर के पास एक मन्दिर बनाने की बात से की। मैं धार्मिकता का पहलू समझ सकता हूं। उनके फेसबुक प्रोफाइल के कवर पर गजानन महाराज का चित्र है। उन्होने बातचीत में शेगांव (वह स्थान जहां गजानन महाराज प्रकट हुये) की चर्चा भी की।

इसके बाद उन्होने जिस बात की चर्चा की, वह प्रसन्न कर देने वाली थी। अपने किसी मित्र ‘व्यास जी’ के कहे अनुसार वे सन 2003 से प्रतिवर्ष इंजीनियरिंग/डाक्टरी के कुछ विद्यार्थियों की शिक्षा का खर्च वहन करते हैं। उसमें विद्यार्थी के साथ तय यही होता है कि पढ़ाई के बाद समर्थवान हो कर वह भी इसी प्रकार दूसरों की पढ़ाई में सहयोग करेगा।

“क्या वे बाद में ऐसा करते हैं?”

“जी हां।”

मुझे अच्छा लगा यह जानकर कि इस तरह अविनाश जी विद्यादान की चेन कायम कर रहे हैं।

आगे स्वत: बताया उन्होने – “वकालत में सफलता के कारण मुझे पैसे की समस्या नहीं है। मेरा विचार है कि पचपन की अवस्था तक वकालत करूंगा। उसके बाद आदिवासियों के बीच काम करने का मन है।”

“अच्छा! क्या तय कर लिया है कि कहां और किस प्रकार कार्य करेंगे?”

अविनाश जी ने झाबुआ क्षेत्र की बात की। रतलाम रेल मण्डल में लम्बे अर्से तक कर्य करते हुये मुझे झाबुआ के आदिवासियों की विपन्नता के बारे में अनुभूति है। अनेक आदिवासी लोगों के चेहरे मेरी स्मृति में हैं। वनवासी कल्याण की जरूरतों के बारे में बहुत लोगों से सुना है। अत: यह जान कर बहुत अच्छा लगा।

मैने अविनाश जी से अपनी भी कही – आने वाले समय में गांव और गंगा नदी के सामीप्य में रहने की बात। उन्होने कहा – अच्छा है। आपके पास गंगा हैं और मेरे समीप हैं नर्मदा!

बातचीत के प्रारम्भ में मैं एक क्रिमिनल लॉयर के समक्ष था। एक ऐसा व्यक्ति जो सामने वाले को अपने तर्क, सूचना और वाकपटुता से हतप्रभ और निष्प्रभावी करने में दक्ष होता है। जिस क्रिमिनल लॉयर का यह ‘आवरण’ जितना कठोर और इम्प्रेगनेबल होता है, वह (मेरे अनुमान से) अपने पेशे में उतना कुशल होता है। पर बातचीत समाप्त कर हाथ मिलाते हुये मैं उस आवरण के पीछे के एक संवेदनशील और समाज के प्रति जिम्मेदार व्यक्ति से परिचय पा चुका था। एक सज्जन और एक उत्कृष्ट व्यक्ति से परिचय पाना किसे अच्छा नहीं लगता?

मैं वास्तव में प्रसन्न था। भविष्य में अगर अविनाश जी से सम्पर्क बना रहा तो उनके झाबुआ अदिवासियों के कल्याण कार्यों के बारे में जानने की इच्छा रहेगी!


शैलेश का उत्तराखण्ड के लिये प्रस्थान


अगर इस देश की आत्मा है; तो उसका स्पन्दन महसूस करने वाले लोग शैलेश पाण्डेय जैसे होंगे!

इलाहाबाद स्टेशन पर शैलेश पाण्डेय
इलाहाबाद स्टेशन पर शैलेश पाण्डेय

कल दोपहर में मैं इलाहाबाद रेलवे स्टेशन गया। शैलेश पाण्डेय ने कहा था कि वे उत्तराखण्ड जा रहे हैं, सो उनसे मिलने की इच्छा थी।

25 जून को शाम संगम एक्प्रेस पकड़ने का कार्यक्रम था उनका। मैने अपने दफ्तर का काम समेटा और इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पंहुच गया उनसे मिलने। फोन पर पता किया तो वे बाजार में उत्तराखण्ड के प्रवास के दौरान काम आने वाली रिलीफ सामग्री खरीद रहे थे। मुझे स्टेशन मैनेजर साहब के कमरे में इंतजार करना था लगभग आधा घण्टा। वहां बैठे मैं पाल थरू की पुस्तक “घोस्ट ट्रेन टू द ईस्टर्न स्टार” के पन्ने पलट रहा था, जिसमें ओरहान पामुक को ऐसा व्यक्ति बताया गया था, जो “इस्ताम्बूल” की आत्मा पहचानता है। उसी समय मुझे विचार आया था शैलेश के बारे में, जो मैने ऊपर लिखा है।

शैलेश घुमक्कड़ हैं – लगभग पूरा भारत घूम चुके हैं – अधिकांश अपनी मोटर साइकल पर। एक समाज सेवी संस्था चलाते हैं वाराणसी में। फौज से ऐक्षिक सेवानिवृति लिये हैं और जुनून रखते हैं सोच और काम में। आप उनके ट्विटर प्रोफाइल [ @shaileshkpandey ] से उनके बारे में ज्यादा जान सकते हैं। उनकी यात्राओं और उनके कार्य के बारे में जानकारी उनके ब्लॉग से भी मिल सकेगी।

लगभग आधे घण्टे बाद शैलेश मिले। उनके साथ एक अन्य सहयोगी सरजू थे। दोनो के पास पिठ्ठू थे और दो गत्ते के डिब्बों में रिलीफ सामग्री। शैलेश धाराप्रवाह बोल सकते हैं – बशर्ते आप अच्छे श्रोता हों। वह मैं था। उन्होने बताना प्रारम्भ किया – भईया, ये जो पतलून और टीशर्ट पहन रखी है, महीना भर उसी में काम चलाना है। वही धो कर सुखा कर पहना जायेगा। एक गमछा है बैग में। और ज्यादा की जरूरत नहीं।

दूर दराज में बिजली नहीं होगी, सो एक सोलर चार्जर रखा है जो मोबाइल आदि चार्ज कर दिया करेगा। मुझे इण्टीरियर गांव में जाना है वहां। असल में तीर्थयात्री/पर्यटक की फिक्र करने वाले बहुत होंगे उत्तराखण्ड में। दूर दराज के गावों में जहां बहुत तबाही हुई है, वहां कोई खास सहायता नहीं मिली होगी।  मैं वहां जाऊंगा। यहां से मैं हरिद्वार जा रहा हूं। वहां से ऋषिकेश और आगे रुद्रप्रयाग में एक जगह है फोता। वहां पहुंचकर स्थानीय भाजपा के लोगों से भी सम्पर्क करूंगा। … एक गांव में जा कर बच्चों को इकठ्ठा कर मेक-शिफ्ट स्कूल जैसा बनाने का विचार है। … आपदा के समय सब से उपेक्षित बच्चे ही होते हैं!

एक महीना वहां व्यतीत करने का विचार है। उसकी तैयारी के साथ जा रहा हूं। कुछ लोगों ने सहायता देने और हरिद्वार में जुड़ने की बात कही है; पर मैं उसे बहुत पक्का मान कर नहीं चल रहा हूं। ये सरजू और मैं – हम दोनो की टीम है।

अपने साथ मैं इलेक्ट्रानिक रक्तचाप नापने वाला उपकरण ले जा रहा हूं। और साथ में कुछ दवायें हैं – मसलन डायरिया के उपचार के लिये, अस्थमा के लिये इनहेलर्स, वाटर प्यूरीफायर टेबलेट्स…

मेरे जैसे कुर्सी पर बैठे विचार ठेलने वाले को एक कर्म क्षेत्र के व्यक्ति से मिलना और सुनना बहुत अच्छा लग रहा था। शैलेश मुझसे 18-19 साल छोटे हैं। एक पीढ़ी छोटे। मेरी पीढ़ी ने तो देश लोढ़ दिया है। या तो बेच खाया है या अपने निकम्मे पन से पंगु कर दिया है। आशा है तो शैलेश जैसे लोगों से है।

मैने शैलेश को सहेजा है कि इस दौरान अपनी गतिविधियों से मुझे अवगत कराते रहें; जिसे मैं ब्लॉग पर प्रस्तुत कर सकूं। उन्होने इस विचार को अपनी स्वीकृति दे दी है। सो आगे आने वाले दिनों में इसकी सूचना मैं देता रहूंगा।

मैं शैलेश को स्टेशन पर छोड़ कर चला आया। उनकी ट्रेन लगभग एक घण्टा बाद चली। इस बीच सरजू को पता चला कि उत्तरप्रदेश सरकार से बंटने वाला लैपटॉप उसे 1 जुलाई को मिलेगा, तो उसकी यात्रा स्थगित हो गयी। अब सरजू शैलेश से 2 जुलाई को चल कर जुड़ेगा। शैलेश फिलहाल चल अकेला मोड में  चले इलाहाबाद से।

शैलेश और सरजू
शैलेश और सरजू

ब्लॉग की प्रासंगिकता बनाम अभिव्यक्ति की भंगुरता


ज्ञानदत्त पाण्डेय
ज्ञानदत्त पाण्डेय

पिछले कुछ अर्से से मैं फेसबुक और ट्विटर पर ज्यादा समय दे रहा हूं। सवेरे की सैर के बाद मेरे पास कुछ चित्र और कुछ अवलोकन होते हैं, जिन्हे स्मार्टफोन पर 140 करेक्टर की सीमा रखते हुये बफर एप्प में स्टोर कर देता हूं। इसके अलावा दफ्तर आते जाते कुछ अवलोकन होते हैं और जो कुछ देखता हूं, चलती कार से उनका चित्र लेने का प्रयास करता हूं। अब हाथ सध गया है तो चित्र 60-70% मामलों में ठीक ठाक आ जाते हैं चलती कार से। चालीस मिनट की कम्यूटिंग के दौरान उन्हे भी बफर में डाल देता हूं।

बफर उन्हे समय समय पर पब्लिश करता रहता है फेसबुक और ट्विटर पर। समय मिलने पर मैं प्रतिक्रियायें देख लेता हूं फेसबुक/ट्विटर पर और उत्तर देने की आवश्यकता होने पर वह करता हूं। इसी में औरों की ट्वीट्स और फेसबुक स्टेटस पढ़ना – टिपेरना भी हो जाता है।

इस सब में ब्लॉगजगत की बजाय कम समय लगता है। इण्टरनेट पर पेज भी कम क्लिक करने होते हैं।

चूंकि मैं पेशेवर लेखक/फोटोग्राफर या मीडिया/सोशल मीडिया पण्डित नहीं हूं, यह सिस्टम ठीक ठीक ही काम कर रहा है।

यदाकदा ब्लॉग पोस्ट भी लिख देता हूं। पर उसमें प्रतिबद्धता कम हो गयी है। उसमें कई व्यक्तिगत कारण हैं; पर सबसे महत्वपूर्ण कारण शायद यह है कि ब्लॉगिंग एक तरह का अनुशासन मांगती है। पढ़ने-लिखने और देखने सोचने का अनुशासन। उतना अनुशासित मैं आजकल स्वयम को कर नहीं पा रहा। छोटे 140 करेक्टर्स का पैकेट कम अनुशासन मांगता है; वह हो जा रहा है।

पर यह भी महसूस हो रहा है कि लेखन या पत्रकारिता या वैसा ही कुछ मेरा व्यवसाय होता जिसमें कुर्सी पर बैठ लम्बे समय तक मुझे लिखना-पढ़ना होता तो फुटकरिया अभिव्यक्ति के लिये फेसबुक या ट्विटर सही माध्यम होता। पर जब मेरा काम मालगाड़ी परिचालन है और जो अभिव्यक्ति का संतोष तो नहीं ही देता; तब फेसबुक/ट्विटर पर लम्बे समय तक अरुझे रहने से अभिव्यक्ति भंगुर होने लगती है।

अभिव्यक्ति की भंगुरता महसूस हो रही है।

मैं सोचता हूं ब्लॉगिंग में कुछ प्रॉजेक्ट लिये जायें। मसलन इलाहाबाद के वृक्षों पर ब्लॉग-पोस्टें लिखी जा सकती हैं। पर उसके लिये एक प्रकार के अनुशासन की आवश्यकता है। उसके अलावा ब्लॉगजगत में सम्प्रेषण में ऊष्मा लाने के लिये भी यत्न चाहिये। …. ऐसे में मेरे व्यक्तित्व का एक अंश रुग्णता/अशक्तता को आगे करने लगता है! कुछ हद तक कामचोर मैं! 😆

शायद ऐसा ही चले। शायद बदलाव हो। शायद…

माधव सदाशिव गोलवलकर और वर्गीज़ कुरियन


‘I Too Had a Dream’ by Verghese Kurien

वर्गीज़ कुरियन की पुस्तक – ’आई टू हैड अ ड्रीम’ में एक प्रसंग माधव सदाशिवराव गोलवलकर ’गुरुजी” के बारे में है। ये दोनों उस समिति में थे जो सरकार ने गौ वध निषेध के बारे में सन् १९६७ में बनाई थी। इस समिति ने बारह साल व्यतीत किये। अन्त में मोरारजी देसाई के प्रधानमन्त्रित्व के दौरान यह बिना किसी रिपोर्ट बनाये/पेश किये भंग भी हो गयी।

मैं श्री कुरियन के शब्द उठाता हूं उनकी किताब से –

~~~~~~

पर एक आकस्मिक और विचित्र सी बात हुई हमारी नियमित बैठकों में। गोलवलकर और मैं बड़े गहरे मित्र बन गये। लोगों को यह देख कर घोर आश्चर्य होता था कि जब भी गोलवलकर कमरे में मुझे आते देखते थे, वे तेजी से उठ कर मुझे बाहों में भर लेते थे। …

गोलवलकर छोटे कद के थे। बमुश्किल पांच फीट। पर जब वे गुस्सा हो जाते थे तो उनकी आंखें आग बरसाती थीं। जिस बात ने मुझे बहुत प्रभावित किया वह थी उनका अत्यन्त देशभक्त भारतीय होना। आप यह कह सकते हैं कि वे अपनी ब्राण्ड का राष्ट्रवाद फैला रहे थे और वह  भी गलत तरीके से, पर आप उनकी निष्ठा पर कभी शक नहीं कर सकते थे। एक दिन जब उन्होने पूरे जोश और भावना के साथ बैठक में गौ वध का विरोध किया था, वे मेरे पास आये और बोले – कुरियन, मैं तुम्हें बताऊं कि मैं गौ वध को इतना बड़ा मुद्दा क्यों बना रहा हूं?

मैने कहा, हां आप कृपया बतायें। क्यों कि, अन्यथा आप बहुत बुद्धिमान व्यक्ति हैं। आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?

माधव सदाशिवराव गोलवलकर ’गुरुजी’

“मैने गौ वध निषेध पर अपना आवेदन असल में सरकार को परेशानी में डालने के लिये किया था।’ उन्होने मुझे अकेले में बताना शुरू किया। “मैने निश्चय किया कि मैं दस लाख लोगों के हस्ताक्षर एकत्रित कर राष्ट्रपति जी को ज्ञापन दूंगा। इस सन्दर्भ में मैने देश भर में यात्रायें की; यह जानने के लिये कि हस्ताक्षर इकठ्ठे करने का काम कैसे चल रहा है। इस काम में मैं उत्तर प्रदेश के एक गांव में गया। वहां मैने देखा कि एक महिला ने अपने पति को भोजन करा कर काम पर जाने के लिये विदा किया और अपने दो बच्चों को स्कूल के लिये भेज कर तपती दुपहरी में घर घर हस्ताक्षर इकठ्ठा करने चल दी। मुझे जिज्ञासा हुई कि यह महिला इस काम में इतना श्रम क्यों कर रही है? वह बहुत जुनूनी महिला नहीं थी। मैने सोचा तब भान हुआ कि यह वह अपनी गाय के लिये कर रही थी – जो उसकी रोजी-रोटी थी। तब मुझे समझ आया कि गाय में लोगों को संगठित करने की कितनी शक्ति है।”

“देखो, हमारे देश का क्या हाल हो गया है। जो विदेशी है, वह अच्छा है। जो देशी है वह बुरा। कौन अच्छा भारतीय है? वह जो कोट-पतलून पहनता है और हैट लगाता है। कौन बेकार भारतीय है? वह जो धोती पहनता है। वह देश जो अपने होने में गर्व नहीं महसूस करता और दूसरों की नकल करता है, वह कैसे कुछ बन सकता है? तब मुझे लगा कि गाय में देश को एक सूत्र में बांधने की ताकत है। वह भारत की संस्कृति का प्रतीक है। इस लिये कुरियन इस समिति में तुम मेरी गौ वध विरोध की बात का समर्थन करो तो भारत पांच साल में संगठित हो सकता है। … मैं जो कहना चाहता हूं, वह यह है कि गौ वध निषेध की बात कर मैं मूर्ख नहीं हूं, और न ही मैं धर्मोन्मादी हूं। मै  ठण्डे मन से यह कह रहा हूं – मैं गाय का उपयोग अपने लोगों की भारतीयता जगाने में करना चाहता हूं। इस लिये इस काम में मेरी सहायता करो।”

खैर, मैने गोलवलकर की इस बात से न तो सहमति जताई और न उस समिति में उनका समर्थन किया। पर मुझे यह पक्का यकीन हो गया कि वे अपने तरीके से लोगों में भारतीयता और भारत के प्रति गर्व जगाना चाह रहे थे। उनके व्यक्तित्व के इस पक्ष ने मुझे बहुत प्रभावित किया। ये वह गोलवलकर थे, जिन्हे मैने जाना। लोगों ने उन्हे महात्मा गांधी की हत्या का षडयंत्र रचने वाला कहा, पर मैं इस में कभी यकीन नहीं कर पाया। मुझे वे हमेशा एक ईमानदार और स्पष्टवक्ता लगे और मुझे यह हमेशा लगता रहा कि अगर वे एक कट्टरवादी हिन्दू धर्मोन्मादी होते तो वे कभी मेरे मित्र नहीं बन सकते थे।

अपनी जिन्दगी के अन्तिम दिनों में, जब वे बीमार थे और पूना में थे, तो उन्होने देश भर से राष्ट्रीय स्वयम् सेवक संघ के राज्य प्रमुखों को पूना बुलाया। वे जानते थे कि वे जाने वाले हैं। जब उनका देहावसान हो गया तब कुछ दिनों बाद मेरे दफ्तर में उनमें से एक सज्जन मुझसे मिलने आये। “श्रीमान् मैं गुजरात का आरएसएस प्रमुख हूं”, उन्होने अपना परिचय देते हुये कहा – “आप जानते होंगे कि गुरुजी अब नहीं रहे। उन्होने हम सब को पूना बुलाया था। जब मैने बताया कि मैं गुजरात से हूं तो उन्होने मुझसे कहा कि “वापस जा कर आणद जाना और मेरी ओर से कुरियन को विशेष रूप से मेरा आशीर्वाद कहना।” मैं आपको गुरुजी का संदेश देने आया हूं।”

मैं पूरी तरह अभिभूत हो गया। उन्हे धन्यवाद दिया और सोच रहा था कि वे सज्जन चले जायेंगे। पर वे रुके और कहने लगे – “सर, आप ईसाई हैं। पर गुजरात में सभी लोगों में से केवल आपको ही अपना आशीर्वाद क्यों भेजा होगा गुरुजी ने?”

मैने उनसे कहा कि आपने यह गुरुजी से क्यों नहीं पूछा? मैं उन्हे कोई उत्तर न दे सका, क्यों कि मेरे पास कोई उत्तर था ही नहीं!


श्री कुरियन की पुस्तक का यह अंश मुझे बाध्य कर गया कि मैं अपनी (जैसी तैसी) हिन्दी में उसका अनुवाद प्रस्तुत करूं। यह अंश गोलवलकर जी के बारे में जो नेगेटिव नजरिया कथित सेकुलर लोग प्रचारित करते हैं, उसकी असलियत दिखलाता है।

उस पुस्तक में अनेक अंश हैं, जिनके बारे में मैंने पुस्तक पढ़ने के दौरान लिखना या अनुवाद करना चाहा। पर वह करने की ऊर्जा नहीं है मुझमें। शायद हिन्दी ब्लॉगिंग का प्रारम्भिक दौर होता और मैं पर्याप्त सक्रिय होता तो एक दो पोस्टें और लिखता। फिलहाल यही अनुंशंसा करूंगा कि आप यह पुस्तक पढें।

मेरा अपना मत है कि साठ-सत्तर के दशक में भारतीय समाज को गाय के मुद्दे पर एक सूत्र में बांधा जा सकता था। अब वह स्थिति नहीं है। अब गाय या गंगा लोगों को उद्वेलित नहीं करते।

[कुरियन गौ वध निषेध के पक्षधर नहीं थे। वे यह मानते थे कि अक्षम गायों को हटाना जरूरी है, जिससे (पहले से ही कम) संसाधनों का उपयोग स्वस्थ और उत्पादक पशुओं के लिये हो सके; जो डेयरी उद्योग की सफलता के लिये अनिवार्य है। हां, वे उत्पादक गायों के वध निषेध के पक्ष में स्टेण्ड लेने को तैयार थे।]

ज़कात कैल्क्युलेटर


मेरे सहकर्मी श्री मंसूर अहमद आजकल रोज़ा रख रहे हैँ। इस रमज़ान के महीने में उपवास का प्रावधान है इस्लाम में – उपवास यानी रोज़ा। सुबह से शाम तक भोजन, जल/पेय और मैथुन से किनारा करने का व्रत।

श्री मंसूर अहमद मेरे डिप्युटी चीफ ऑपरेशंस मैनेजर हैं जो माल यातायात का परिचालन देखते हैं। अगर मैं ब्लॉग/ट्विटर/फेसबुक पर अपनी उपस्थिति बना सकता हूं, तो उसका कारण है कि ट्रेन परिचालन का बड़ा हिस्सा वे संभाल लेते हैं।

श्री मंसूर अहमद, उप मुख्य परिचालन प्रबन्धक, उत्तर-मध्य रेलवे, इलाहाबाद।

कल श्री मंसूर ने सवेरे की मण्डलों से की जाने वाली कॉंफ्रेंस के बाद यह बताया कि इस्लाम में ज़कात का नियम है।

ज़कात अर्थात जरूरतमन्दों को दान देने का इस्लाम का तीसरा महत्वपूर्ण खम्भा [1]। इसमें आत्मशुद्धि और आत्म-उन्नति दोनो निहित हैं। जैसे एक पौधे को अगर छांटा जाये तो वह स्वस्थ रहता है और जल्दी वृद्धि करता है, उसी प्रकार ज़कात (दान) दे कर व्यक्ति अपनी आत्मिक उन्नति करता है।

ज़कात में नियम है कि व्यक्ति अपनी सम्पदा (आय नहीं, सम्पदा) का 2.5% जरूरतमन्द लोगों को देता है। यह गणना करने के लिये रमज़ान का एक दिन वह नियत कर लेता है – मसलन रमज़ान का पहला या दसवां या बीसवां दिन। उस दिन के आधार पर ज़कात के लिये नियत राशि की गणना करने के लिये वैसे ही स्प्रेड-शीड वाला कैल्क्युलेटर उपलब्ध है, जैसा आयकर की गणना करने के लिये इनकम-टेक्स विभाग उपलब्ध कराता है! मसलन आप निम्न लिंक को क्लिक कर यह केल्क्युलेटर डाउनलोड कर देख सकते हैं। वहां ज़कात में गणना के लिये आने वाले मुद्दे आपको स्पष्ट हो जायेंगे। लिंक है –

 ज़कात कैल्क्युलेटर की नेट पर उपलब्ध स्प्रेड-शीट

मैने आपकी सुविधा के लिये यह पन्ना नीचे प्रस्तुत भी कर दिया है। आप देख सकते हैं कि इसमें व्यक्ति के पास उपलब्ध सोना, चान्दी, जवाहरात, नकद, बैंक बैलेंस, शेयर, व्यवसायिक जमीन आदि के मद हैं। इसमें रिहायश के लिये मकान (या अव्यवसायिक जमीन) नहीं आता।

श्री मंसूर ने मुझे बताया कि व्यक्ति, जिसके पास साढ़े सात तोला सोना या 52 तोला चान्दी के बराबर या अधिक हैसियत है, उसे ज़कात देना चाहिये। लोग सामान्यत: अपने आकलन के अनुसार मोटे तौर पर ज़कात की रकम का आकलन कर दान देते हैं; पर यह सही सही भी आंका जा सकता है केल्क्युलेटर से।

ज़कात देने के बाद उसका दिखावा/आडम्बर की सख्त मनाही है – नेकी कर दरिया में डाल जैसी बात है। यह धारणा भी मुझे पसन्द आयी। [आपके पास अन्य प्रश्न हों तो मैं श्री मंसूर अहमद से पूछ कर जवाब देने का यत्न करूंगा।]

आप ज़कात कैल्क्युलेटर का पन्ना नीचे स्क्रॉल करें!


[1] इस्लाम के पांच महत्वपूर्ण स्तम्भ – 

  1. श्रद्धा और खुदा के एक होने और पैगम्बर मुहम्मद के उनके अन्तिम पैगम्बर होने में विश्वास।
  2. नित्य नमाज़ की प्रणाली।
  3. गरीब और जरूरतमन्द लोगों को ज़कात या दान देने का नियम तथा उनके प्रति सहानुभूति।
  4. उपवास के माध्यम से आत्मशुद्धि।
  5. जो शरीर से सक्षम हैं, का मक्का की तीर्थ यात्रा।

[उक्त शब्द/अनुवाद मेरा है, अत: सम्भव है कि कहीं कहीं इस्लाम के मूल आशय के साथ पूरा मेल न खाता हो।]