बाबूलाल विश्वकर्मा का समोसा भजिए का ठेला

दस दिन हुए भजिया और समोसा की दुकान खोली है मौके पर बाबूलाल ने.


एक ठेला और उसपर पड़ा छप्पर. चौबे पुर के पास तिराहे पर. तीन गांव हैं आस पास – चौबेपुर, नारायण पुर और खेघी पूर.

पास में एक ईंट भट्ठा भी है.

कुल मिलाकर बाबूलाल विश्वकर्मा ने समोसा, लौंगलता, भजिया की दुकान का स्टार्टिंग एक ठेला बहुत सही जगह लगाया है. तीनों गांव सम्पन्न हैं. चौबेपुर में बीस तीस रिटायर्ड अध्यापक हैं. खेघीपुर में सम्पन्न सब्जी बोने वाले. सौ मीटर दूर शराब की दुकान भी है – जिसके पियाक भी इस्तेमाल कर सकते हैं इस फेसीलिटी का.

Continue reading “बाबूलाल विश्वकर्मा का समोसा भजिए का ठेला”

Advertisements

डीहबड़गांव में छोटी आईस्क्रीम फैक्ट्री

लगभग 15 लोगों को रोजगार मिलता है इस दो कमरे की फैक्ट्री में.


सड़क के किनारे दो कमरे वाली आइस्क्रीम फैक्ट्री में सवेरे सवेरे बहुत गहमागहमी थी. आइस्क्रीम के ठेले – साइकिल ठेले ले कर फेरी वाले निकल रहे थे. फैक्ट्री के कर्मचारी आईस्क्रीम की बार पैक करने में लगे थे.

आईस्क्रीम रखने का फ्रीजर

मोटे तौर पर देखने पर लगता था कि इस दो कमरे के उद्यम से 10फेरी वालों और चार पांच फैक्ट्री कर्मियों को रोजगार मिला हुआ है. लगभग 14-15 लोग 10-12 हजार महीना कमाई कर ले रहे हैं इससे.

Continue reading “डीहबड़गांव में छोटी आईस्क्रीम फैक्ट्री”

रघुबीर बिन्द का वर्मीकल्चर उद्यम

रघुबीर बिन्द जैसे लोग, जो गांव देहात में भी रोजगार के उभरते प्रकार को खोज-तलाश रहे हैं, भविष्य की आशा हैं।


रघुबीर बिन्द मुझे गिर्दबड़गांव की सड़क के किनारे दिखे। वे कच्चे गोबर की सतह पर पानी का छिड़काव कर रहे थे। साथ में एक और व्यक्ति था। आसपास के गेंहूं,सरसों के खेतों और ईंट भट्ठा की गतिविधि से अलग तरह का काम दिखा मुझे। मैने साइकिल रोक ली।

उन सज्जन (बाद में परिचय दिया कि रघुबीर बिन्द हैं) ने बताया कि महीना भर पहले उन्होने वर्मीकल्चर की तीन महीने के ट्रेनिंग पूरी की है। उसके बाद इस प्लाण्ट को लगाने में जुट गये। करीब एक लाख का खर्च किया है। गोबर कुछ अपना उनका है और कुछ 2200रुपये प्रति ट्रेक्टर-ट्रॉली दाम पर खरीदा है। अभी केचुये के लिये 25-30 हजार का खर्चा और होगा। ढाई महीने का केचुये की खाद बनने का साइकल है। तीन महीने बाद जो खाद तैयार होगी वह मार्किट में 600रुपया बोरी के भाव से जा रही है। एक बोरी में चालीस किलो खाद होगी।

रघुबीर ने मुझे पूरी प्रक्रिया बतायी जैविक खाद की। अभी गोबर के बेड को वे नम कर ठण्डा कर रहे हैं। नमी में लगभग 7-10 दिन गोबर पड़ा रहेगा। उसके बाद उसे ईंटों की बनी 16 पिट्स में केचुये के बीज मिला कर छोड़ देंगे। लगभग पचास दिन में केचुओं की गतिविधि से जैविक खाद तैयार होगी।

रघुबीर बिंद के वर्मीकल्चर के पिट

जैविक खाद की मांग के प्रति वे आश्वस्त दिखे। पास के बाजारों – कछवां, गोपीगंज आदि में खपत हो जायेगी। उनका अन्दाज है कि साल भर में 5-6 साइकल (पारी) खाद वे बना लेंगे। एक पिट में प्रति साइकल करीब 20-25 बोरी खाद बनेगी।

मैं मोटा अनुमान लगाता हूं तो साल में लगभग 10-12 लाख का टर्नओवर होगा उनके उद्यम से। लगभग तीस पैंतीस हजार रुपया महीना की अमदनी तो हो जानी चाहिये (संकोचपूर्ण – conservative अनुमान के आधार पर)। इस पूरे उद्यम में अनेक इफ़ एण्ड बट्स हैं। पर इफ़-एण्ड-बट्स के आधार पर सपने नहीं बोये जाते और कोई उद्यम नहीं खड़ा किया जाता।

रघुबीर बिन्द आशा और उत्साह से लबालब दिखे। उन्होने अपना मोबाइल नम्बर भी (उनके अपने इनिशियेटिव पर) मुझे दिया कि अगर भविष्य में कुछ और पूछना चाहूं तो पूछ सकूं।

लोग रोजगार की विषम दशा की बात करते हैं। इस बार का पूरा चुनाव उसी “काल्पनिक” मुद्दे पर ठेला जाने का जोर है। रघुबीर बिन्द जैसे लोग, जो गांव देहात में भी रोजगार के उभरते प्रकार को खोज-तलाश रहे हैं, भविष्य की आशा हैं।

सवेरे का साइकिल भ्रमण मुझे अनायास प्रसन्न कर गया। जय हो गांव-देहात की नई पीढ़ी की उद्यमिता!


रामप्रसाद तीर्थयात्री का निमन्त्रण

चार-पांच लोग आपस में राम मन्दिर की बात कर रहे थे। एक महिला ने मुझे सम्बोधित कर कहा – आप तो मन्दिर बणवाओ सा। हम सब आयेंगे कार सेवा करने।


शाम का समय। सूर्यास्त से कुछ पहले। एक बस मेरे गांव के पास रुकी थी। अच्छी टूरिस्ट बस। उसके यात्री नेशनल हाईवे 19 की मुंड़ेर पर बैठे थे। एक बड़े पतीले में गैस स्टोव पर कुछ गर्म हो रहा था। एक व्यक्ति आटा गूंथ रहा था। सब्जियां भी कट रही थीं। शाम का भोजन बनने की तैयारी हो रही थी। बस बनारस से प्रयागराज की ओर जा रही थी।

पूर्णिमा के एक दिन पहले की शाम थी। चांद उग गया था। लगभग गोल। अगले दिन प्रयागराज में माघी पूर्णिमा का शाही स्नान था। सवेरे लोग संगम पर स्नान करेंगे शायद।

Continue reading “रामप्रसाद तीर्थयात्री का निमन्त्रण”

बसन्त कनौजिया

बसन्त न हों तो भाजपा और कांग्रेस के इन नेताओं की नेतागिरी के जलवे की चमक निकल जाये।


मेरे दो साले साहब उत्तर प्रदेश के सबसे लोकप्रिय व्यवसाय में हैं। नेतागिरी में। बड़े – देवेन्द्र भाई (देवेन्द्रनाथ दुबे) कांग्रेस में हैं। इन्दिरा और राजीव गांधी के जमाने में विधायकी का चुनाव लड़ चुके हैं कांग्रेस की ओर से। आजकल जिला कांग्रेस के महासचिव हैं (यह अलग बात है कि कांग्रेस पूरे पूर्वांचल में वेण्टीलेटर पर है)।

दूसरे – शैलेन्द्र दुबे – भाजपा में हैं। दो बार गांव प्रधान रह चुके हैं। एक बार भाजपा का विधायकी का टिकट पाये थे, पर समाजवादी के उम्मीदवार से हार गये। अगली बार टिकट पाने से चूक गये। फिलहाल सांसद प्रतिनिधि हैं। मैं चाहूंगा कि भाजपा इन्हे भी सांसद बनने के योग्य मानना प्रारम्भ कर दे।

इन दोनों को यह ज्ञात है कि जनता नेता को झकाझक ड्रेस में देखना पसन्द करती है। साफ झक कुरता-धोती या कुरता-पायजामा। कलफ (स्टार्च) से कड़क क्रीज। इतना ग्रेसफुल पहनावा रहे कि कोई भी उनकी ओर देखे और उनपर अटेण्टिव रहे। दोनो अपनी पर्सनालिटी-कान्शस हैं। दोनो जानते हैं कि उनका पचास-साठ फीसदी आभा मण्डल उनके वेश से बनता है।

Continue reading “बसन्त कनौजिया”

धोख


मैं उसे बिजूका (scarecrow) के नाम से जानता था, यहां उसे गांव में धोख कहते हैं। शायद धोखा से बना है यह। खेत में किसान की फसल को नुक्सान पंहुचाने वाले हैं जंगली जानवर (नीलगाय या घणरोज़) और अनेक प्रकार की चिड़ियां। उनको बरगलाने या डराने के लिये है यह धोख।

DSC_1290

खेत के दूसरे किनारे के निकट था धोख। मैने अपनी साइकिल सडक के किनारे खड़ी की। जोन्हरी (ज्वार) का खेत था। बालें फूट गयी थीं। दो सप्ताह में फसल तैयार हो जायेगी। दिवाली तक कट जायेगी। खेत में और मेड़ पर नमी थी। पानी भी था कहीं कहीं। चलना कठिन काम था। एक बार तो सोचा कि धोख जी से मिले बगैर लौट लिया जाये। पर अन्तत: उन तक पंहुच ही गया।

धोख जी अटेंशन अपनी एक टांग पर खड़े थे। किसी सजग प्रहरी की तरह। उनकी एक टांग तो बांस था जिसपर उन्हे बनाया गया था। पजामे की दूसरी टांग यूं ही फहरा रही थी। मानो किसी दुर्घटना में एक पैर कट गया हो। एक कुरता पहना हुआ था धोख जी ने। ठीक ठाक और साफ़ था। हांथ पीटी करते व्यक्ति की मुद्रा में साइड में फैले थे। सिर किसी घरिया पर काला कपड़ा लपेट कर बनाया गया था। बहुत कलात्मक तो नहीं थे धोख जी, पर जीवन्त थे। उन्हे देख कर आभास होता था कि कोई व्यक्ति खड़ा है।

DSC_1292

कौव्वे, मुनियां, गौरय्या, मैना आदि जोन्हरी खाने आती हैं। जोन्हरी और बाजरे का तना मोटा होता है, इसलिये कौव्वे और तोते जैसे कुछ बड़े पक्षी भी दाना चुग लेते हैं।

चिड़ियां आपस में कहती होंगी – “अरे राम, कौनो मनई खड़ बा। हम न जाब (हे भगवान, कोई आदमी खड़ा है, मैं नहीं जाऊंगी)।”

DSC_1293जो जानकार होती होगी वह साहस बंधाती होती – मत डेराऊ गोंईयां, ई त मनई नाहीं, धोख हौ ( डरो मत सखी, यह आदमी नहीं धोख है)।

इसी तरह मादा नीलगाय भी ठिठकती होगी खेत के आसपास। कतरा कर निकलता चाहती होगी। पर अगर उसका झुण्ड का सरदार अनुभवी और लम्बी दाढी वाला कद्दावर घणरोज हुआ तो वह कहता होगा – “अरे डियर, फिकर नॉट। देखती नहीं हो, यह बिजूका है। धोख। इससे अगर हमारा झुण्ड डरता रहा तो भूखे मर जायेगा। चलो, घुसो और चर डालो खेत। बच्चे भी निष्कण्टक खेत में चलें।”

चित्र लेते समय मैं सोच रहा था – अगर मैं लिक्खाड़ लेखक होता तो “एक धोख की आत्मकथा” जैसा कुछ लिखता।

घर लौटने को देर हो गयी थी। सेण्डल खेत में पानी और कीचड़ से सन गयी थी। धोख का चित्र लेने का मिशन पूरा कर मैं सडक पर लौटा और साइकिल उठा, घर की ओर चला।


भदोही की आर्कियॉलॉजी के तत्वशोधक रविशंकर


प्रोफेसर (डा.) अशोक सिंह ने अगियाबीर टीले के खुदाई स्थल मुझे रविशंकर से परिचय कराते बताया कि अगर आपको भदोही के पुरातत्व पर जानकारी चाहिये तो इन (रविशंकर) से बेहतर सोर्स कोई नहीं। तभी मुझे लग गया कि मुझे रविशंकर जी को कस कर पकड़ना है अपने आस-पास की जानकारी में गहराई और सांद्रता लाने के लिये।

GDApr187510
रविशंकर

यहां जिससे भी बात करो – तथाकथित जागरूक स्थानीय से भी – तो वे भदोही को मात्र भरों से जोड़ते हैं। पर आसपास जो भी दिखता है, उसे मेरे जैसा सतही जानकारी वाला जीव भी भांप सकता है कि वह सब 1200ईस्वी के बहुत पहले की सभ्यता की बदौलत है। दूसरे; भर या भारशिव केवल भदोही में नहीं हैं। विकीपेडिया पर एक काल में उत्तर भारत के बड़े हिस्से में उनका प्रभाव दिखता है। तब भर या भर-द्रोह को भदोही मात्र से जोड़ना और भदोही की पहचान वही बना देना क्या चीज है?

मैने अपने आप से कहा – “जीडी, अगर इस इलाके में तुम्हें अपने जीवन का तीसरा और चौथा भाग काटना है तो रविशंकर जैसे से मिलना और जानकारी समेटने-सहेजना तुम्हारी बंजर बौद्धिक जमीन को जबरदस्त नैसर्गिक उर्वरक इनपुट देगा। मत चूको उससे।“

और मैने रविशंकर जी से फोन कर समय मांगा। अगियाबीर टीले पर आर्कियॉलॉजिकल खुदाई सवेरे छ बजे प्रारम्भ हो जाती है। अपने साथ कर्मी ले कर रविशंकर छ बजे वहां पंहुंच जाते हैं। वहीं उनके किशोर महराज (बीएचयू के रसोइये) नाश्ता-चाय ले कर 8-9 बजे के बीच पंहुचते हैं। इग्यारह बजे तक खुदाई चलती है।

GDApr187532
अगियाबीर की खुदाई निर्देशित करते रविशंकर

दोपहर के भोजन/विश्राम के बाद तीन से शाम छ बजे दूसरी शिफ्ट में खुदाई चलती है। पूरे खुदाई के समय वहीं मौजूद रह कर निर्देशित करने और प्राप्त सामग्री को तरतीबवार जमवाने का काम करते हैं रविशंकर जी। खुदाई करने वाले कर्मी यद्यपि लम्बे अनुभव के कारण पुरातत्व की आवश्यकताओं के प्रति पर्याप्त संवेदित किये जा चुके है; पर खुदाई उनके भरोसे छोड़ कर ये पुरातत्ववेत्ता वहां से हट नहीं सकते। मेरे फोन करने पर रविशंकर जी ने कहा कि शाम 6 बजे खाली हो कर वे नहाने के बाद सात बजे चाय पीते हैं। उस समय मैं उनसे मिलने आ सकता हूं।

शाम सात बजे, सूर्यास्त बाद के धुंधलके में, द्वारिकापुर के प्राइमरी स्कूल, जहां पुरातत्व विभाग की टीम रुकी है, पंहुचा मैं। बहुत आत्मीयता से मिले रविशंकर जी। साथ में दो अन्य व्यक्ति – आशीष और पटेल जी भी थे। लगभग एक घण्टा समय दिया रविशंकर जी मुझे और बताया अपने भदोही पर किये शोध के बारे में।

IMG_20180406_195752
संझा समय द्वारिकापुर प्राइमरी स्कूल पर अपने कैम्प में मिले रविशंकर। चाय पीते हुये हुई चर्चा।

बीएचयू के एक कुशल अध्यापक की तरह हिन्दी में धाराप्रवाह बोलने और अपनी बात दृढता से कहने की वाक्पटुता है रविशंकर में। वैसी कुशलता मैं अपने आप में डेवलप करने के स्वप्न देखता हूं। और कहीं न कंहीं यह भी जानता हूं कि अब वैसी पटुता सम्भव नहीं है पाना! अंत: मन्त्र मुग्ध सा सुनता हूं रविशंकर जी को।

भदोही की बात करते रविशंकर बताते हैं कि भर-द्रोह भर में भदोही का इतिहास समेटना एक व्यापक षडयन्त्र का हिस्सा है – उस प्रकार के लोग जो 1200-1400इस्वी के मध्य भरों के किलों के होने और उसके बाद मुहम्मद गोरी की सेना द्वारा पददलित/ध्वस्त किये जाने को ही भदोही के इतिहास का खूंटा मानते हैं; उन लोगों का षडयन्त्र। और इस षडयन्त्र में स्यूडो-सेक्युलर लोग महती भूमिका निभाते हैं।

भदोही के प्राचीन इतिहास के बारे में रविशंकर जो भी कह रहे थे, उसकी भाषा मेरी स्मृति में जस की तस नहीं है, नोट्स भी बहुत अच्छे लिये नहीं हैं; पर उनके कहने से यह जरूर समझ गया कि आज से 50 हजार से 5 हजार साल पहले तक गंगा की धारा बहुत उथली थी और वे अपना कोर्स व्यापक रूप से बदलती थीं। बहुत कुछ कोसी नदी की तरह। भदोही जिले में सभी पुरातत्व स्थल (100 के आसपास तो रविशंकर जी ने ही आइडेण्टीफ़ाई किये हैं अपने सर्व में) कमोबेश गंगा के किनारे ही थे नव पाषाण युग में। कालान्तर में गंगा की धारा संयत हुई और वर्तमान दशा में (लगभग) स्थिर हुई।

रविशंकर मेरे समक्ष इतिहास-प्रागैतिहास का तिलस्म खोल रहे थे – यह द्वारिकापुर जहां हम बैठे थे; वह तब भी यहीं था और इसी नाम से! उन्होने बताया कि भदन्त आनन्द कौशल्यायन का पाली से अनुदित कुलाल जातक का उन्होने अध्ययन किया। उसमें वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय भगवान बुद्ध के पूर्व जन्म की चर्चा है – वाराणसी नगर के द्वारग्राम में कुम्भकार कुल में उत्पन्न पूर्व जन्मना तथागत। यह संदर्भ 600 बीसी के आसपास द्वारग्राम (द्वारिकापुर) में एक बड़ी कुम्हार बस्ती का होना बताता है।

रविशंकर बताते हैं कि भूमि खनन का माफिया (या निरीह किसान भी) खेत-जमीन से मिट्टी निकालने की प्रक्रिया में आर्कियॉलॉजिकल साइट्स को खत्म किये दे रहा है। इलाके की 100 में से तीस-चालीस प्रतिशत साइट्स उनके देखते देखते गायब या इनसिग्नीफिकेण्ट हो गयी हैं।

भदोही का इतिहास भू ठेकेदार माफिया; मनरेगा और खनन विभाग की तिकड़ी द्वारा नष्ट कर दिया जा रहा है और आर्कियालॉजिकल सर्वे वाले भिखारी के मानिन्द वह सब होते देख रहे हैं!

IMG_20180407_083358
खनन माफिया के आराध्यदेव हनुमान जी।

रविशंकर भदोही को भद्रा नदी (कूर्म/वाराह पुराण में वर्णित गंगा का एक नाम भद्रा) या जिले में प्राप्त भैदपुर (भद्रपुर) जो मौर्यकालीन पुरातत्व प्रमाण युक्त स्थान है अथवा भदरांव (भद्रांव) से जोडने का प्रयास करते हैं। उनके अनुसार ये जगहें वहां हैं, जहां गंगा (भद्रा) कभी बहती रही होंगी। रविशंकर स्वयम् अपनी इस सोच से संतुष्ट नहीं हैं; पर वे इस दृढ मत के हैं कि भदोही के नाम और इलाके का अस्तित्व 1200 इस्वी से तो कहीं ज्यादा पुराना है। नव पाषाण युग तक तो वह जाता ही है।

रविशंकर से मिल कर मैं अपने घर के लिये जब चला तो वे और उनके दोनो मित्र मुझे मेरे वाहन तक छोड़ने आये। पूरा आदर-सम्मान दिया मुझे और भविष्य में अनेकानेक उठने वाले मेरे सवालों का उत्तर देने का प्रयास करने का आश्वासन भी दिया।

चलते समय मुझे लगा कि डा. अशोक कुमार सिंह, रविशंकर (और कुछ सीमा तक मैं भी) गंगा नदी के इर्दगिर्द अपने लिये वर्तमान और भविष्य का स्थान खोज रहे हैं। हम लोग अपने लिये लीगेसी (legacy – भविष्य की पीढियों के लिये छोड़ी जाने वाली अपनी विरासत) के मेगालिथ खोज रहे हैं। डा. अशोक को वह अगियाबीर में नजर आता है। रविशंकर (भले ही भदोही पर रिसर्च करने को रिलक्टेण्टली तैयार हुये) भदोही इलाके के प्रागैतिहास/इतिहास में वह लीगेसी तलाश रहे हैं। मुझे अपने ब्लॉग से उम्मीद है कि कालान्तर में वह मुझे लीगेसी प्रदान करेगा। ब्लॉग जो आस-पास (मुख्यत: गंगा नदी के इर्दगिर्द) घूमता है। गंगा नदी अमृतवाहिनी हैं और हम लोगों को – डा. अशोक, रविशंकर और मुझे – लीगेसी का अमृतत्व प्रदान करेंगी। बस, अपनी अपनी जद्दोजहद; अपनी अपनी कशमकश में हम लगे रहें।… अमृतस्य गंगा!

अपनी धुन में रमे हैं और अपनी धुन के पक्के हैं डा. अशोक और रविशंकर। और यह सुदृढ लीगेसी के अमृत की चाह, एक जुनून से ही मिलती है! मुझे पक्का यकीन है उस विषय में!

हां, पूरा और पक्का!

GDApr187537
रविशंकर जी ने खींचा अगियाबीर पुरातत्व खनन स्थल पर मेरा (बायें), शिवकुमार (विभागीय ड्राफ़्ट्समैन) और किशोर महराज (रसोईया) का चित्र।