श्री बालकृष्णदास “व्यास” से एक और मुलाकात


आज योगेश्वरानन्द आश्रम के बाहर मैं और राजन भाई थे। बालकृष्णदास व्यास जी अपने कक्ष से बाहर निकल आये। शायद आहट से। उनसे बातचीत होने लगी। इधर उधर की बातचीत से प्रारम्भ हुई और मेरी पिछली पोस्ट के माध्यम से बालकृष्णदास व्यास जी के परिचय पर आ गयी। उन्होने अपने विषय में जो कुछ बताया, उसको ले कर कोई बायोग्रफ़र या कोई उपन्यासकार एक दमदार कृति लिख सकता है। पर असल बात यह है कि मैं न लेखक हूं, न बायोग्राफ़र और न उपन्यासकार। मैं एक ब्लॉगर हूं, जो अपने परिवेश से कुछ चिन्दियां चुनता है; साथ में एक दो फोटो सटाता है और प्रस्तुत कर देता है।


मैं योगेश्वरानन्द आश्रम जाता क्यों हूं? एक – वहां गंगा तट है। दो – सवेरे की सैर/साइकलिंग के लिये वह सही दूरी पर है। भगवानपुर-करहर-गड़ौली होते हुये वहां जाने-आने में आठ-नौ किलोमीटर की साइकलिंग होती है। तीन – यह स्वीकर करना शायद कठिन हो; बालकृष्णदास व्यास (आश्रम में रहने वाले एकान्तवासी साधक/कवि) को लेकर एक कौतूहल है।


बालकृष्णदास व्यास जी जो कुछ लिख या रच रहे हैं, उसके परिचय के लिये विस्तृत लेख की जरूरत है। वह लेखन समय मांगता है। इसके अलावा बालकृष्ण जी के महाकाव्य को डिजिटल फार्म में लाने के लिये गहन रूप से कई मैन-डेज़ का इनपुट चाहिये। मैं उनसे इस विषय में कहता हूं तो वे लैपटॉप की अनुपलब्धता की बात करते हैं। उनका कहना है कि वे ऐसे लोगों के सम्पर्क में हैं जो काव्य की-इन कर सकें।

मैं सोचता हूं कि अपना एक लैपटॉप उन्हे उपलब्ध करा दूं। पर उसमें मेरा इतना डाटा, इतना अटाला पड़ा है कि पहले उसे साफ़ करना होगा। … बालकृष्णदास व्यास जी से मिलना मेरी रिटायर्ड जिन्दगी के आराम में खलल न डाल दे! 😆

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आश्रम के बाहर प्रारम्भ हुयी बालकृष्णदास व्यास जी से बातचीत।

बहुत कुछ बताया अपने विषय में बालकृष्णदास व्यास जी ने। उन्होने कहा कि उनकी अवस्था लगभग 35 वर्ष की है। इस 35 वर्ष की अवस्था में क्या जबरदस्त उतार-चढ़ाव हैं उनके जीवन में! उनके माता-पिता बबीना के पास के हैं। बबीना ऑर्डीनेन्स डीपो के द्वारा उनके पिता की लगभग 150बीघा जमीन अधिगृहीत की गयी। उसके मुआवजे से परिवार बहुत सम्पन्न हो गया। उनकी मां के पास 5 किलो सोना था स्त्री-धन के रूप में। पर बुन्देलखण्ड में सम्पन्नता सहेज कर रखना सरल नहीं है। डाका पड़ा और परिवार अति सम्पन्न से अति विपन्न की दशा में आ गया।

जीवन के प्रारम्भ में उन्होने विपन्नता देखी। घोर विपन्नता। फिर परिवार का पालन-प्रबन्धन का समय आया। उसके बाद बालकृष्णदास व्यास जी ने घर छोड़ कर अनेक स्थानों पर, अनेक गुरु-साधुओं के साथ समय व्यतीत किया। हरिद्वार से ले कर अहमदाबाद तक। अहमदाबाद में आशाराम बापू के साथ भी रहे। मैने कहा – क्या इस विषय में अपने ब्लॉग पर लिख दूं? 

बात वही समाप्त! विवाद क्या बढ़ाया जाए। 

आशाराम या अन्य संतों के साथ जो समय बालकृष्णदास व्यास जी ने गुजारा उसपर विधिवत सामग्री अपने आप में एक रोचक (और महत्वपूर्ण) दस्तावेज होगी। कभी शायद कोई व्यक्ति, या स्वयम वे लिखें। पर जो भी वे बता रहे थे आश्रम के बरगद की छाया में या फिर अपने कक्ष में, वह मोहक था। मेरे साथ गये राजन भाई शायद वापस लौटने की उकताहट दिखा रहे थे, पर मैं उन्हे सुनता जा रहा था।

व्यास जी ने अपने कृतित्व के बारे में बताया। शंकर-पार्वती संवाद से (उसी प्रकार जिस प्रकार रामचरित मानस) गुंथी है यह कथा। उसकी भाषा तुलसी के मानस का बेस तो लेती है, पर उसमें कालान्तर में आये शब्द और प्रयोग निसंकोच हैं। इस बारे में बालकृष्णदास जी की मौलिकता है। ग्रन्थ के कथ्य पर ज्यादा नहीं कहूंगा, सिवाय इसके कि वह रोचक लगता है। मेरे पास वहां बैठने का ज्यादा समय होता तो निश्चय ही और भी सुनना अच्छा लगता। उससे भी ज्यादा समय हो तो उस ग्रन्थ को उलटने/पलटने/पढ़ने और उसपर लिखने का प्रयास करता; बावजूद इसके कि मेरा पठन का बैकलॉग पहले ही बहुत ज्यादा है। कथ्य में वर्तमान सामाजिक/रजनैतिक दशा पर पर्याप्त सोच है और मेधा के प्रत्येक स्तर के व्यक्ति को उसमें कुछ न कुछ मिलेगा जो उसे रुचेगा या प्रेरणा देगा। … आखिर किसी ग्रन्थ की उपयोगिता का यही तो सबसे महत्वपूर्ण पैमाना होता है! नहीं?


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आश्रम में मेटी ले कर आया कुम्हार।

वहां आश्रम में एक कुम्हार एक मेटी (छोटा घड़ा) ले कर आया है बालकृष्णदास जी के लिये। उसी कुम्हार को मैं पचास रुपये देता हूं कि मेरे लिये वह घड़ा ला कर दे।

घड़ा लेने जाने को एक चक्कर वहां अवश्य लगेगा। एक और मुलाकात व्यास जी से होना नियत है ही।

शायद उन्हे घर पर भी बुलायें मेरी पत्नीजी। जितना मैने अपनी पत्नीजी को बताया है, या ब्लॉग पर उन्होने पढ़ा है; उनके मन में भी कौतूहल तो है ही।

अत: भविष्य में भी ब्लॉग पर व्यास जी के संदर्भ में कुछ न कुछ रहेगा!


 

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भूसा और खबर


सवेरे साइकिल-सैर में जाते हुये पाया था कि उस खेत में थ्रेशिंग के बाद गेंहूं वहां से हटाया जा चुका था। भूसा भी एक ट्रेक्टर-ट्रॉली में ट्रॉली की ऊंचाई तक लादा जा चुका था। बाकी बचा अधिकांश भूसा झाल (पुरानी धोती-साड़ी के बोरों) में इकठ्ठा कर दिया गया था। चहल पहल थी वहां। लग रहा था कि कुछ ही देर में ये बोरे भी लद जायेंगे ट्रेक्टर ट्रॉली पर और खेत खाली हो जायेगा।

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सवेरे साइकिल सैर जाते समय देखा। … लग रहा था कि कुछ ही देर में ये बोरे भी लद जायेंगे ट्रेक्टर ट्रॉली पर और खेत खाली हो जायेगा।

वापस लौटने में लगभग पौना घण्टा लगा। मुझे अपेक्षा नहीं थी कि खेत में होंगे वे सब लोग। पर वे वहीं मिले। झाल लद गये थे। उनके ऊपर ट्रॉली पर एक व्यक्ति लेटा था। दो स्त्रियां जमीन पर बिखरा भूसा बटोर रही थीं। शायद वह भी ट्रॉली पर लादा जाने वाला हो। कुछ लोग और भी आस-पास थे। मैं चित्र लेने लगा। राजन भाई ने पूछा – भूसा क्या भाव बेंचोगे? 

“बेचने के लिये नहीं है। घर के इस्तेमाल के लिये हैं।” – ट्रॉली पर लेटा व्यक्ति बोला।

मेरे चित्र लेने पर उसने कहा – फोटो काहे ले रहे हैं?

बस अच्छा लग रहा है यह सब। इस लिये ले रहा हूं।

“हम सोचे न्यूज वाले होंगे आप।”

न्यूज वाला तो नहीं हूं, पर न्यूज के नाम पर आपके पास कुछ है?

वह लेटी मुद्रा से बैठी मुद्रा में आ गया, जिससे कि उसका चित्र बेहतर आ सके। बोला, न्यूज तो यही है कि गेंहू बम्पर हुआ है। बड़ी अच्छी फसल।

अच्छा, कितनी हुई होगी एक बीघा में?

आप समझो कि अमूमन 8 क्विण्टल गेहूं होता था एक बीघा में। इस बार 12-13 क्विण्टल हुआ है। और दाने भी बढ़िया हैं। 

मुझे लगा कि सही में उसने न्यूज दिया है मुझे। यद्यपि मुझे उसका न्यूज़ वालों के प्रति “भक्ति-भाव” जमा नहीं। अभी गांव-देहात में अखबार और टीवी की लार्जर-देन-लाइफ़ इज्जत बरकरार है। इन लोगों को नहीं मालुम कि तथाकथित चौथे खम्भे का इण्टरनेट और सोशल मीडिया ने बधियाकरण कर दिया है। अलाने-फलाने अखबार के स्क्राइब से एक खुर्राट ब्लॉगर कहीं ज्यादा दमदार है। पत्रकार ब्लॉगर बन रहे हैं। फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से अपनी साख बचाये रखने की जद्दोजहद में लगे हैं। अखबार वाले अपनी बिक्री की चिन्ता में मरे-घुले जा रहे हैं। ये चौथे खम्भे वाले अपने रसूख के बल पर जो भ्रष्टाचार कर पा रहे थे, वह तेजी से अतीत होता जा रहा है। …. पर इस भूसा की ट्रॉली पर अधलेटे जमींदार को पता ही नहीं यह सब।

क्या करूं? मीडिया और चौथे खम्भे की दशा-दुर्दशा पर उससे चर्चा करूं? मुझे लगा कि वह बेकार होगा। अगले 5-7 साल में यह जवान समझ जायेगा कि इस देश में ओपीनियन मोल्ड करने की ताकत अखबार और टीवी में नहीं रहेगी। ये दोनो माध्यम रोज यही तलाशेंगे कि कौन हैशटैग, कौन वीडियो, कौन ट्वीट वाइरल हो रहा है सोशल मीडिया पर। ये सब सोशल मीडिया पर रियेक्ट भर करेंगे। सोशल मीडिया को ड्राइव करना इनके बूते से बाहर हो जायेगा, और जा रहा भी है।

खैर, मैं जानता हूं कि गांव में अभी यह सब कहना अटपटा होगा। बहुत कुछ वैसा ही अटपटा कि कोई गांव प्रधान, थानेदार, तहसीलदार और जिला मजिस्ट्रेट को प्रजातंत्र और प्रशासन का सबसे छोटा मोहरा बताये।

समय बदलेगा।

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समय बदलेगा!

कमहरिया और बालकृष्णदास व्यास जी


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गंगा किनारे योगेश्वरानन्द धाम, कमहरिया। श्री बालकृष्णदास व्यास जी यहीं रह रहे हैं।

उस शाम हम (राजन भाई और मैं) फिर कमहरिया के लिये साइकल पर निकले। शाम का समय था। यह सोचा कि आधा घण्टा जाने, आधा घण्टा आने में लगेगा। वहां आधे घण्टे रहेंगे व्यास जी के आश्रम में। शाम छ बजे से पहले लौट आयेंगे।

जो रास्ता हमने चुना वह लगभग 80% पगडण्डी वाला था। पगडण्डी में भी करीब 1 किलोमीटर काफ़ी ऊबड़-खाबड़। घर से कमहरिया तक चार पांच गांव पड़ते हैं – मेदिनीपुर, द्वारिकापुर, अगियाबीर, गड़ौली, करहर और भगवानपुर। गडौली और करहर बड़े गांव हैं। गड़ौली में तो बड़ी पानी की टंकी और गांव भर में पाइप से पानी की सप्लाई भी देखी मैने। इन गांवों से गुजरते समय अलग अलग प्रकार के अनुभव होते हैं।

द्वारिकापुर में मेरा दूधवाला, बाढ़ू रहता है। बाढ़ू यादव के पास अपनी भैसें हैं। खेती भी है। बाढ़ू से मैत्री उनके द्वारा मेरे घर दही ले कर आने से शुरू हुई। उन्ही से पता चला कि वे रिटायर्ड वन रक्षक हैं। मैं पेड लगाने में रुचि रखता हूं और भविष्य में बाढ़ू से मैत्री काम की रहेगी। साइकल चला कर उनके गांव से गुजरते समय बाढ़ू किसी कोने से ऊंची आवाज में नमस्कार करते हैं। मैं उन्हे देख नहीं पाता, पर जवाब देते हुते गुजर जाता हूं उनकी बस्ती के सामने से।

द्वारिकापुर और अगियाबीर के बीच घाटी सी है। गंगा जब बढ़ती है तो यहां जल आ जाता है और यह रास्ता बन्द हो जाता है। अभी वहां लड़के खेलते मिलते हैं। ठाकुरों की बस्ती है। एक लड़का कहता है – “दद्दा, काहे साइकल चला रहे हो। आपकी उमर नहीं इसके लिये। साइकल मुझे दे दो!” मुझे उसकी यह प्रगल्भता पसन्द नहीं आती। वहां से चलता चला जाता हूं। मैने अपने बालों पर खिजाब लगाना छोड़ दिया है। भौहें भी सफ़ेद होने लगी हैं। उम्र बढ़ने और अपने मेक-अप के प्रति उदासीन भाव के कारण उद्दण्ड बालकों के लिये मैं करुणा और हास्य का निमित्त बनने लगा हूं। यह अहसास अच्छा नहीं लगता। किसे अच्छा लगेगा?!

अगियाबीर में गंगा किनारे एक बड़ा टीला है। एक पहाड़ी जैसा। उसपर एक दो झोंपड़ियां, कुछ वनस्पति और पेड़ बड़ा मनोरम दृष्य प्रस्तुत करते हैं। उस टीले पर आर्कियालॉजिकल खोज करने वाले काम करते हैं। भरों के समय की मूर्तियां और सिक्के मिले हैं वहां। भरों के कारण ही यह क्षेत्र भरदोही (कालान्तर में भदोही) कहलाया। शायद उससे पहले का भी इतिहास हो इस कोट में गड़ा हुआ।  वहां तक जाने को जो पगड़ण्डी है, उसपर शायद ही साइकल चल पाये। पैदल जाना होगा और उस टीले (कोट)  की ऊंचाई पर पैदल चढ़ना होगा। जाने का मन है; पर उसके लिये अपना स्वास्थ्य और बेहतर बनाना होगा। अगियाबीर कोट को देखते हुये यह संकल्प मन ही मन दोहराता हूं।

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कमहरिया के रास्ते में।

अगियाबीर के आगे कमहरिया है। वहां पक्की, डामर वाली सड़क मिलती है। बटोही (मेरी साइकल) की रफ़्तार बढ़ जाती है। एक नौजवान अपरिचय के बावजूद अभिवादन करता है। औरतें दोनो ओर के खेतों में निराई कर अपने सिर पर बरसीम, अंकरी और अन्य घास के गठ्ठर लिये घर को लौटनी दिखती हैं शाम हो गयी है। सवा घण्टे बाद सूर्यास्त हो जायेगा। पशु भी घर लौटने के उपक्रम में हैं। भेड़ों के साथ एक अधेड़ गड़रिया उन्हे वापसी के लिये हांक रहा है। मन होता है कि रुक कर दो चार चित्र लूं। संझ के सूरज में चित्र भी अच्छे आयेंगे; पर आश्रम तक पंहुचने की जल्दी भी है और वहां से घर वापस धुंधलके तक लौट भी आना है। बटोही चलता चला जाता है।

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गंगा किनारे अघोरी आश्रम। जितनी द्वजायें और निर्माण दीखता है, उतना यह आश्रम जमीन हथिया कर फैलेगा निकट भविष्य में।

आगे दूर से ही दिखती है गंगा नदी की धारा और उसके किनारे आश्रम। पहले अघोरियों के आश्रम के ढेरों झण्डे हैं। उसके आगे वट वृक्ष से आच्छादित आश्रम की पक्की इमारत। राजन भाई फिर भी, आश्वस्त होने के लिये लोगों से पूछ लेते हैं कि वह आश्रम ही तो है न।

डामर की सड़क से हट कर पुन: पगड़ण्डी पकड़नी पड़ती है कुछ दूर के लिये और हम आश्रम पंहुच जाते हैं।

 एक और व्यक्ति आश्रम में आया है हम से पहले। मोटर साइकल पर। हम अपनी साइकल खड़ी कर अन्दर जाते हैं। व्यास जी के कक्ष से उनकी आवाज आ रही है। बीच बीच में एक अन्य व्यक्ति की भी। वे आहट पा कर हमें बुलाते हैं कमरे में प्रवेश कर मैं उन्हे नमस्कार करता हूं।

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अपने आश्रम के कक्ष में अपनी चौकी पर बालकृष्णदास व्यास जी।

एक लगभग 15X12 फुट का कमरा। एक ओर व्यास जी का तख्त है। वे उसपर बैठे हैं। बीच में एक दीवार के पास पूजन की चौकी है। व्यास जी के तख्त के दूसरी तरफ़ दीवार से सट कर एक दरी बिछी है जिस पर आठ दस लोग बैठ सकते हैं। यह स्पष्ट हो गया कि व्यास जी इस कमरे में रहते हैं, पूजन भी करते है और लोगों के साथ मिलते भी हैं। लोगों को प्रवचन भी दिया जा सकता है। मैने देखा कि तख्त के नीचे एक हारमोनियम भी रखा था। व्यास जी कीर्तन भी करते होंगे संगीत के साथ।

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आश्रम के अपने कक्ष में बालकृष्णदास व्यास जी। नीचे उनका संदूक और हारमोनियम दिखाई पड़ता है।

व्यास जी का छरहरा और लम्बा गौर शरीर। सफ़ेद धोती (लुंगी की तरह बांधी) और एक इनर (पूरे बांह की बनियान) पहने थे वे। सिर पर बड़े बाल और घनी दाढ़ी – पूरी तरह काली। बाद में ध्यान से देखा तो पाया कि खिजाब का प्रयोग किया गया है। उसी से अन्दाज लगाया कि उम्र 40 के आसपास होगी।

वे पूछते हैं कि कितना समय है हमारे पास। हम बताते है आधा घण्टा। समय सीमा के अनुसार वे अपने ग्रंथ का परिचय देने लगते हैं। महाकाव्य लिखा है (उसमें शायद अन्तिम परिवर्तन कर रहे हैं) श्री बालकृष्णदास व्यास जी ने। तुलसी कृत मानस की तरह उसमें सात अध्याय हैं। अवधी जैसी भाषा है। उसे तुलसी वाली अवधी नहीं कह सकते। आजकल की बोलचाल की स्थानीय भाषाओं के शब्द भी हैं। वे कई अंश बताते हैं ग्रन्थ के। सुन कर लगता है कि ग्रन्थ हल्का-फुल्का-छिछला नहीं है। मैं काव्य पारखी नहीं हूं, अत: ग्रन्थ की गुणवत्ता के विषय में कोई सशक्त टिप्पणी नहीं कर सकता। पर ग्रन्थ मुझे गहराई लिये लगता है। यह भी महसूस होता है कि बालकृष्ण व्यास जी के साथ भक्ति के स्तर पर न सही, इण्टेलेक्ट के आयाम में दोस्ती की जा सकती है।

व्यास जी के पास ग्रामीण सम्भवत: उन्हे महात्मा मानते हुये भक्ति भाव से आते हैं। मैं यह देख रहा हूं कि एक व्यक्ति एकान्त में रह कर, सभी असुविधाओं के साथ लगभग वही परिस्थितियां रीक्रियेट कर रहा है जो तुलसीदास के साथ थीं। वह उस प्रकार की मेधा का भी परिचय दे रहा है जो तुलसी में थी। पता नहीं , भविष्य बालकृष्णदास को महाकवि का दर्जा देगा या नहीं। पर मुझे उनमें विलक्षणता के दर्शन होते हैं।

व्यास जी कभी मुझे मध्य उत्तर प्रदेश के प्रतीत होते हैं, कभी बुन्देलखण्ड के। उनके बालों में खिज़ाब का भी प्रयोग है। वे अपने दिखने वाले स्वरूप के प्रति कान्शस हैं। वे सम्भवत: राजनैतिक समीकरण बिठाने के प्रति भी उदासीन नहीं हैं। मुझे गालिब की आटो-बायोग्राफी “दस्तम्बू” की याद हो आती है, जिसमें वे रानी विक्टोरिया तक अपना सम्पर्क बनाने को तत्पर दीखते हैं। उसी प्रकार बालकृष्णदास जी मोदी/योगी से सम्पर्क करने की अपेक्षा भी व्यक्त करते हैं।

मेरे पास अधिक समय नहीं है। अत: इस मनोभाव के साथ मैं वापस लौटता हूं कि आगे उनसे मिलता रहूंगा।

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गंगा तट पर राजन भाई के साथ व्यास जी।

केदारनाथ चौबे का नित्य गंगा स्नान


इस इलाके में कई लोग हैं जो बरसों से, बिला-नागा, गंगा स्नान करते रहे हैं। आज एक सज्जन मिले -श्री केदारनाथ चौबे। पास के गांव चौबेपुर के हैं। वृद्ध, दुबला शरीर, ऊर्जावान। द्वारिकापुर में एक टेकरी पर बनाये अस्थाई मन्दिर में भागवत कथा कहते हैं। कुछ सुनने वाले जुट जाते हैं। कभी कोई मेला – पर्व का दिन हो तो ज्यादा भी जुटते हैं।

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द्वारिकापुर में गंगा किनारे एक टेकरी समतल कर मूर्तियां रखी हैं। वहीं केदारनाथ चौबे भागवत कथा कहते हैं।

आज एक महिला उनका स्थान साफ़ कर लीप रही थी। वही एक मात्र श्रोता होगी शायद आज कथा की।

चौबे जी ने बताया कि तेरह साल हो गये उन्हे नित्य गंगा स्नान करते। भगवान करा रहे हैं और वे कर रहे हैं। अपने गांव से रोज साइकल से आते हैं। पहले साइकल ऊपर रखते थे। एक दिन एक व्यक्ति (उन्होने नाम भी लिया) ने साइकिल उड़ा ली। तब से अपने पास ही रखने लगे हैं।

तेरह साल हो गये इस नित्य कर्म को; आगे उन्होने सन 2020 तक का समय मांगा है भगवान से।

उसके बाद? सन 2020 के बाद?

उसके बाद जहां ले जायें भगवान! उन्होने अपना हाथ ऊपर उठा कर संकेत किया कि शरीर सन बीस तक मांगा है उन्होने। ज्यादा जीना होगा तो भगवान की इच्छा।

मैने उनकी उम्र पूछी। बोले छिहत्तर साल। अर्थात अपने लिये अस्सी साल की अवस्था की कामना की है उन्होने भगवान से।

वे देखने में 76 से कम के लगते है।  “भगवान ने शरीर सन 2020 तक ले लिये नहीं, बीस साल और चलने के लिये बनाया है” मैने अपना मत व्यक्त किया।

केदारनाथ जी बीस साल जीने की बहुत इच्छा वाले नहीं लगे। बोले जो इश्वर चाहेंगे, वही होगा।

अपना कर्म, अपनी चाह, अपना जीवन; सब ईश्वर के अधीन कर केदारनाथ जी कितने सहज भाव से जी रहे हैं! हम वैसे क्यों नहीं हो पाते जी?!

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गंगा किनारे अपने आसन पर बैठे केदारनाथ चौबे जी।