सोलर लालटेल झल्लर के पास रही नहीं


छ दिन पहले मैने सोलर लालटेन झल्लर को उपहार में दी थी। अकेले मड़ई में रहने वाले वृद्ध को। पर मुझे अन्देशा था कि उनके यहां से कहीं कोई चुरा न ले। या फिर इलाके के लिये फ़ैंसी वस्तु मान कर परिवार वाले ही न ले जायें।

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छ दिन पहले मैने सोलर लालटेन झल्लर को उपहार में दी थी।

वही पता करने के लिये सवेरे साइकिल भ्रमण के दौरान झल्लर की मड़ई की ओर चला गया। झल्लर थे और कुछ लकड़ियां तरतीबवार रख रहे थे – उन्हें जला कर चाय बनाने के लिये। मैने पूछा – किससे बनाते हैं चाय?

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झल्लर थे और कुछ लकड़ियां तरतीबवार रख रहे थे – उन्हें जला कर चाय बनाने के लिये।

झल्लर ने बताया कि दूध तो होता नहीं उनके पास; सो चाय की पत्ती के साथ नीम, लसोड़ा और हरापत्ता (जो जब मुझे दिखाया तो लेमन ग्रास निकला) डाल कर काली चाय बना कर पीते हैं। ये सभी झल्लर के महुआरी/अमराई परिसर में उपलब्ध हैं। लेमन ग्रास तो मुझे पता था कि चाय में फ़्लेवर के लिये मिलाया जाता है। लसोड़ा और नीम का पत्ता भी गुणकारी है, यह आज ही पता चला।

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झल्लर की मड़ई के पास पानी के स्रोत के पास लगी लेमान-ग्रास

झल्लर टपकते महुआ को भी इकठ्ठा कर रहे हैं। तीन अलग अलग समूहों में रखे थे महुआ के फ़ूल। उन्होने बताया कि ये तीनों ढेर फूलों के सूखने की अलग अलग अवस्था में हैं। परसों, कल और आज के इकठ्ठा किये फूल हैं ये। उनकी महुआरी में इस साल महुआ बहुत कम हुआ है। झल्लर ने बताया कि महुआ का हलुआ, ठेकुआ, रस, रोटी – अनेक तरह से उपयोग करता है उनका परिवार। एक बार कुछ पंजाबी आये थे उनके पास। वे कह रहे थे कि महुआ तो किशमिश से ज्यादा स्वादिष्ट है।

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अपनी मड़ई के सामने इकठ्ठे किये महुआ के फूलों के साथ झल्लर

पुराने जमाने की बताने लगे झल्लर। ये जो सामने जीटी रोड है, तब इसपर डामर बिछाया जा रहा था। इकहरी सड़क थी तब। बड़े बड़े गढ्ढे हुआ करते थे। कछवां के सेठ बंधू लाल का इक्का चला करता था कच्चा तम्बाकू ले कर गोपीगंज के लिये। गढ्ढों में जब इक्का फंस जाता था तो गांव वाले पहिये को हाथ से धकेलते थे। गढ्ढे से निकालने के धन्यवाद स्वरूप अंजुरी अंजुरी भर कर तम्बाकू इक्केवान लोगों को दे दिया करता था।

पुराना बताते समय क्रॉनालाजिकल सीक्वेंस का कोई ध्यान नहीं रखते झल्लर। अपने मस्तिष्क में शायद सूचनायें भी सिलसिलेवार नहीं रखी हैं उन्होने। बोलने लगे कि बंगाल में दंगे हो गये थे हिन्दू मुसलमानों के। बहुत मार काट मची थी। उनके पिता कलकत्ता में नौकरी करते थे। तब वापस लौट आये। उनके सेठ ने अपनी गाय बचाने के लिये उनको गाय के साथ ही रवाना कर दिया था। कोई ट्रक तो होते नहीं थे, पैदल ही गाय के साथ आये थे दो और जनों के साथ उनके पिताजी।

मेरे पास नोट करने के लिये कागज कलम नहीं थी झल्लर के कहे को सहेजने के लिये। सो मैने कहा कि कल-परसों आ कर उनके पास बैठूंगा यह सब सुनने और कागज पर करने के लिये।

झल्लर ने कहा – जरूर आइयेगा। आप जैसे सुनने और ग्रहण करने वाले कम ही होते हैं। आम तौर पर तो लोगों के पास समय ही नहीं है।

चलते चलते मैने झल्लर से सोलर लालटेन के बारे में पूछा। उन्होने बताया कि ठीक चल रही है। पर उन्हें बटन ठीक से दबाना नहीं आता था, सो गांव में लड़कों को दे दी है। बकौल उनके “वो पुरानी वाली टार्च ही ठीक है उनके लिये!”

मुझे जो अन्देशा था, वही हुआ। चमकदार लालटेन झल्लर जैसे वृद्ध के पास रुकना कठिन था। सो परिवार वालों ने उनसे ले ही ली!

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घुरहू मुसहर से बातचीत


IMG_20180330_072020-02.jpgकरहर में महुआ के पेड़ के नीचे बैठा मिला घुरहू। पास में एक करीब 10 फुट की लग्गी (पेड़ से पत्ते तोड़ने की पतले बांस की चोंच जुड़ी डण्डी) पड़ी थी। साथ में उसकी पत्नी और एक कम्बल। पत्नी पास के किसी नल से अपने बरतनों में पानी भरकर लाई थी। बरतन में था एक अल्यूमिनियम की बटुली, एल लोटा, एक तसली और एक कडछुल। घुरहू के पास चप्पल थी, पत्नी बिना चप्पल के दिख रही थी।

उसने बताया कि कल से कटका स्टेशन पर डेरा डाल रखा है। रहने वाला कपसेटी के पास किसी गांव का है। कपसेटी यहां से करीब 25 किलोमीटर दूर है। वहां गांव में कोई बाबू साहब बड़े जम्मींदार हैं। पचास बीघे के काश्तकार। उन्होने रहने को जगह दी है। भारत सरकार ने मकान भी दिया है बनवा कर। मां बाप वहां रहते हैं। घुरहू की पत्नी ने बताया कि एक आठ-दस साल की बच्ची भी है उनकी। गांव में मा-बाप के पास रख छोड़ी है। पत्तियां बीनने के लिये दर दर घूमने में उस बच्ची को साथ ले कर चलना कठिन काम था।

आजकल महुआ की ताजा पत्तियां नहीं हैं। तोडने में ज्यादा नहीं मिलतीं तो सूखी पत्तियां बीन कर पानी में गीला कर तह लगाते हैं वे मुसहर लोग। शाम तक जितनी इकठ्ठा हो जाती हैं, वह ले कर ट्रेन में बैठ जाते हैं और अगले दिन सवेरे बनारस में बेच कर वापस लौटते हैं। घुरहू ने जब यह बताया तो मझे स्पष्ट हुआ कि रेलवे स्टेशन पर डेरा क्यों जमाते हैं ये मुसहर। रेलवे की बिना टिकट बनारस आने जाने की सुविधा उनके जीवन यापन का महत्वपूर्ण अंग है।

जैसा घुरहू ने बताया – रोज करीब 150-200 रुपया कमा लेते हैं वे दोनो मिल कर।

मैने पूछा – आधार कार्ड है तुम्हारा?

घुरहू ने बताया कि है पर बाबू साहब के यहां रखा है। बैंक अकाउण्ट नहीं है। थोड़ा मायूस सी हंसी हंस कर वह बोला – पैसा है ही कितना कि बैंक अकाउण्ट की जरूरत पड़े!

पत्तियां बीनते हुये इलाहाबाद के आसपास तक भी चले जाते हैं ये घुमन्तू मुसहर। घुरहू ने बताया कि पान के लिये महुआ की पत्तियां बीनने के अलावा और जो भी काम मिल जाता है, वह कर लेते हैं। लोग गेंहूं-धान की कटाई के लिये हजार – डेढ हजार रुपये बीघा के हिसाब से ठेका भी लेते हैं। उस काम में कटाई के साथ साथ गट्ठर बनाना शामिल होता है। बकौल घुरहू, वे मेहनत से ही कमाते हैं, पर मेहनत से मिलता बहुत कम है।

अन्य मुसहरों की बजाय घुरहू और उसकी पत्नी ज्यादा जागरूक नजर आये। उनमें अपनी दशा से ऊपर उठने की एक चिनगारी मुझे दिखी। पर में पक्का नहीं कह सकता कि वह चिनगारी वास्तव में थी, या मात्र मेरी सोच में।

चलते चलते मैने उन दोनों को चाय पीने के पैसे दिये और उन्होने प्रसन्न हो कर अपना धन्यवाद व्यक्त किया।IMG_20180330_072259

 

झल्लर और सोलर लालटेन


झल्लर को एक सोलर लालटेन देने का मन बनाया था मैने। उसके लिये अपने ड्राइवर से पूछा कि यहां मार्केट में कहीं मिलती होगी। उसने अनभिज्ञता जताई। मैने भी गांव वालों के पास एलईडी की बैटरी वाली टार्चें तो देखी थीं, या फिर रीचार्जएबुल बैटरी वाली जुगाड़ टार्चें। किसी के पास सोलर चार्ज होने वाली नहीं थीं।

अमेजन और फ्लिपकार्ट पर देखा तो 200 से 500 रुपये के बीच थीं। पर उनसे मंगाने में समय लगता।

मैं पास के बाजार महराजगंज गया। वहां (जिस दुकान पर मिल पाने की सबसे अधिक सम्भावना थी, उसमें) पूछा तो मिल गयी। वह भी चाइना मेड नहीं, भारत में बनी। क्वालिटी बहुत अच्छी नहीं थी पर चाइना वालों जैसी खड़खड़िया भी नहीं थी। दाम उसपर 300 रुपये लिखा था, पर दुकान वाले माणिक सेठ ने ढाई सौ में दे दी।

ढाई सौ में अच्छा प्रॉडक्ट मिला। उस सोलर टॉर्च की रोशनी भी चमकदार थी। रोशनी का आउटपुट कम ज्यादा किया जा सकता था। कम से कम 5 घण्टा रोशनी देने का वायदा था दो घण्टा सूर्य की रोशनी में री-चार्ज करने पर। हल्की सूरज की रोशनी में भी चार्ज होने लगती थी वह टार्च।

अगले दिन (कल) सवेरे की साइकिल सैर में सोलर टार्च साथ ले गया झल्लर को देने के लिये। पर अपनी मड़ई पर झल्लर थे नहीं। अपने एक पड़ोसी को वहां बिठा कर गांव की तरफ़ गये थे। दो चक्कर साइकिल के लगा कर जब मैं घर वापस लौटने वाला था, तब उस पड़ोसी ने आवाज दी – आई ग हयेन् झल्लर दद्दा (आ गये हैं झल्लर दद्दा)।

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झल्लर अपनी खाट बाहर निकाल कर बैठे थे। गांव से दो पड़ोसी आये हुये थे। मैने उन्हे टार्च दी।

झल्लर अपनी खाट बाहर निकाल कर बैठे थे। गांव से दो पड़ोसी आये हुये थे। मैने उन्हे टार्च दी। उसकी कार्य विधि बताई। जितनी उत्सुकता से झल्लर ने समझा, उतनी रुचि से उन दो पड़ोसियों ने भी। नयी चीज थी उन सब के लिये। मैने यह भी दिखाया कि सूर्य की रोशनी की दिशा में पैनल कैसे घुमाया जाता है और चार्ज होते समय कैसे लाल लाइट जलना प्रारम्भ कर देती है जिससे पता चले कि टार्च चार्ज हो रही है। झल्लर को समझाने के बाद जब टार्च दी तो उन्होने उसे माथे से लगाया। फिर सकुचा कर पूछा – कितने की होगी?

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सोलर टॉर्च के साथ झल्लर

मेरी बजाय उनके पड़ोसी ने उत्तर दिया – लईलअ दद्दा। देत हयेन् त लईलअ। झुट्ठै दाम काहे पूंछत हयअ (रख लो दद्दा। जब दे रहे हैं तो रख लो। झूठ-मूठ में दाम क्यों पूछने की औपचारिकता कर रहे हो)।

झल्लर गदगद दिखे। मुझे एक दोहा सुनाया –

देनी बड़ी अनूप है; जो केहू को देय।
जगत बड़ाई होतु है; फेरि आपन लई लेय।

मुझे लगा, वे मुझे कह रहे हैं कि देने में जगत की बड़ाई निश्चित है और वही प्रतिफल है देने का। झल्लर जैसा सन  1942 में तीसरी दर्जा पास होने पर स्कूल छोड़ चुका व्यक्ति इतना बढ़िया और इतना सामयिक दोहा कह सकता है – इसकी मुझे आशा नहीं थी। यही नहीं, इसके बाद तरंग में आ कर महाकवि केशव का एक कवित्त वे सुनाने लगे। मैने उन्हे रोका। कहा कि फिर से सुनायें जिससे रिकार्ड कर सकूं। उन्होने जो सुनाया उसका फ़ीचर फोन वाले मोबाइल पर की गयी रिकार्डिंग उपलब्ध है –

समय बहुत हो गया था। घर पर लोग मेरा नाश्ते के लिये इन्तजार कर रहे होंगे, यह सोच कर झल्लर को नमस्कार कर विदा ली। झल्लर मुझे अपनी रिहायश की सीमा तक छोड़ने आये।

एक सीनियर सिटिजन ने एक सुपर सीनियर सिटिजन को अपना मित्र, अपना सुहृद बना लिय था एक सोलर टार्च के माध्यम से।

झल्लर का एकांतवास


झल्लर

डेढ़ी के उत्तरी छोर पर एक अमराई/महुआरी है। कुछ और भी वृक्ष हैं। वहां एक झोंपड़ी है। कुछ लोग यदा कदा वहां दिखते हैं। झोंपड़ी की बगल से एक कच्ची सड़क डेढ़ी से निकल कर करहर गांव की ओर जाती है। मानो डेढ़ी की बांयी भुजा हो।

महुआ के पत्ते झर चुके हैं। बहुत से पत्ते जमीन पर दिखते हैं। एक छोटी गड़ही भी है जिसमे काफ़ी हद तक महुआ के पत्ते भरे हैं। पेड़ों पर नये पत्ते आ चुके हैं। एक दो महुआ के पेड़ों से महुआ के फूल टपकने भी लगे हैं। सड़क पर कुछ बच्चे महुआ के बीने फूलों की पन्नियां लिये जाते दिखे भी।

गड़ही के पास अचानक खरखराहट हुई तो साइकिल चलाते हुये मैने देखा – एक बूढ़ा आदमी रंहठा (अरहर के डण्ठल) की झाड़ू से पत्तियां समेट कर गड़ही में डाल रहा था। अकेला वृद्ध व्यक्ति। शरीर में ज्यादा दम नहीं होने से धीरे धीरे झाड़ू चला रहा था। उससे बातचीत करने के ध्येय से मैने सड़क के किनारे साइकिल खड़ी कर दी।

गड़ही के पास अचानक खरखराहट हुई तो साइकिल चलाते हुये मैने देखा – एक बूढ़ा आदमी रंहठा (अरहर के डण्ठल) की झाड़ू से पत्तियां समेट कर गड़ही में डाल रहा था।

उनका नाम है झल्लर। उम्र के बारे में बताया चार कम सौ। पर यह भी बताया कि सन बयालीस में वे दर्जा तीन में पढ़ते थे। बरतानवी सरकार के स्कूल में। अगर मैं उस समय उनकी उम्र दस साल की मान कर चलूं तो अब झल्लर की उम्र छियासी साल की होनी चाहिये। यानी चार कम नब्बे। मैं छियासी साल मान कर चलता हूं। उस उम्र के अनुसार भी झल्लर काफी स्वस्थ हैं। बस थोड़ा ऊंचा सुनते हैं। बातें समझने के लिये वे मेरे पास तक चले आये; पर इतना ऊंचा भी नहीं सुनते कि कान के पीछे हाथ लगा कर सुनने का प्रयास करना पड़ता हो।

जो झोंपड़ी है अमराई/महुआरी में। उसमें अकेले रहते हैं झल्लर। भरा पूरा परिवार है, पर वह सब गांव में रहता है। उनके पेड़ों के अलावा अन्य गांव वालों के पेड़ भी हैं। दूर एक और झोपड़ी दिखती है। पर और कोई दिखता नहीं रहता हुआ।

गांव की बस्ती आधा किलोमीटर दूर होगी। झल्लर का खाना गांव से पंहुचा जाते हैं परिवार वाले। पानी के लिये करहर की पाइप्ड सप्लाई है जिसका एक पॉइण्ट उनकी झोंपड़ी के पास है। नल नहीं है। दिन में जब पानी आता है तब वे अपने लिये भर लेते हैं। शेष पानी एक कच्चे टैंक में भरता जाता है। बिजली बत्ती का इन्तजाम नहीं। लालटेन नहीं है उनके पास। बताया – “आजकल मिट्टी का तेल कहां मिलता है?!”

एक इलेक्ट्रॉनिक बत्ती है। उन्होने बताया कि सौर ऊर्जा से चार्ज होती है

एक इलेक्ट्रॉनिक बत्ती है। उन्होने बताया कि सौर ऊर्जा से चार्ज होती है। मैने दिखाने को कहा तो मुझे अपनी मड़ई के पास ले कर गये। बाहर के चबूतरे पर एक बोरी बिछा कर मुझे बैठने को कहा और मड़ई से बत्ती निकाल कर लाये। मैने देखा वह सोलर नहीं नोकिया के पतले पिन वाले चार्जर से चार्ज होने वाला एलईडी लैम्प था। जाने कैसे उनके सूर्य की रोशनी दिखाने से चार्ज होता था?! शायद घर वाले इसे चार्ज कर ला दिया करते होंगे। उसकी रोशनी भी कम थी।

झल्लर की मड़ई।

मुझे लगा कि एक सोलर लैम्प ला कर अकेले रहने वाले इस वृद्ध को दे देना उचित होगा।

झल्लर से पूछा – जब परिवार गांव में रहता है तो वे अकेले यहां झोंपड़ी में क्यूं रहते हैं? उन्होने जवाब दिया कि न रहें तो आम के फल, महुआ का एक भी फूल/कोईया आदि न बचे। लोग बीन ले जायें। यहां रह कर वे पेड़ों की देखभाल करते हैं।

घर से भोजन आने में देर हो तो यहां भी कुछ बनाने का इन्तजाम है झल्लर के पास। कपड़े उनके फटे तो नहीं हैं पर मैले हैं। नहाने और कपड़े धोने के साबुन का प्रयोग नहीं करते होंगे झल्लर।

इस इलाके के बारे में और बीते काल के बारे में जानना हो तो झल्लर बहुत सही व्यक्ति होंगे। पर्याप्त वृद्ध – जिनकी इन्द्रियां ठीकठाक काम कर रही हैं और जो डिमेंशिया से पीड़ित भी नजर नहीं आते। झल्लर से मैत्री करना मुझे अपने ब्लॉगिंग के लिये बहुत काम का और बहुत महत्वपूर्ण लगा। इनसे जरूर मिलता रहूंगा मैं!

झल्लर की मड़ई के सामने चबूतरा।

लालचन्द ने बताया – फसल इस साल अच्छी है


दो महिलायें गेंहू-सरसों के खेत में से सरसों की कटाई कर रही थीं। एक गट्ठर डेढ़ी सड़क के किनारे रख दिया था।

दो महिलायें गेंहू-सरसों के खेत में से सरसों की कटाई कर रही थीं। एक गट्ठर डेढ़ी सड़क के किनारे रख दिया था। इससे पहले मैं उनसे कुछ वार्तालाप कर पाता, वे खेत के दूर के छोर पर चली गयीं। सड़क पर खड़े हुये उतनी दूर उनसे बात करने में आवाज ऊंची करनी पड़ती। गांव के मानकों में वह सामान्य बात होती पर शहरी शिष्टाचार में वह अशिष्टता से कम नहीं होता। मैं आगे बढ़ गया।

साइकिल के अगले राउण्ड में वहां एक आदमी मिला। उनसे पूछा – इस बार फ़सल कैसी है?

“अच्छी है। गेंहू और सरसों दोनो अच्छी हुई है।“ उसने जवाब दिया। फिर कुछ सोच कर जोड़ा – “कुछ और अच्छी होती, अगर थोड़ा पानी और मिलता।“

आगे वार्तालाप में उस व्यक्ति ने बताया कि मेरे गांव के बगल में मेदिनीपुर में ही रहने वाले हैं वे। नाम बताया लालचन्द। पास में एक अन्य व्यक्ति आ कर खड़ा हो गया था। उसका भी परिचय दिया – “जवाहिर। मेरा छोटा भाई है।“

तीन चार बीघा जमीन है। उसमें खेती भर करते हैं। उसी से गुजर-बसर होती है। अपनी आर्थिक दशा से संतुष्ट नजर आये लालचन्द। बोले – “आदमी मेहनत करे तो खेती भी काम लायक दे देती है। बिना मेहनत के तो कुछ नहीं होता। सवेरा होते ही काम पर आ गये हैं हम। गेहूं की फसल में तो निराई नहीं करनी पड़ती, पर धान की फसल ज्यादा मेहनत मांगती है। मेहनत से मुंह मोड़ने से खेती नहीं होती।“

लालचन्द

“आप सब को अच्छी तरह जानते हैं हम। आपके ससुर जी (जब वे जिन्दा थे) ने कई बार कहा था कि उनकी खेती करूं या उनके साथ काम करूं पर मैने कहा कि देवी माता का पूजन कर लिया है मैने, अब कहीं नौकरी नहीं करूंगा।“

लालचन्द एक तरह से अनूठा लगे मुझे। गांव में छोटी जोत के किसान होने पर भी अपनी जमीन और अपनी मेहनत पर यकीन रखने वाले। पूरे आत्मविश्वास से कहने वाले कि फसल अच्छी हुई। अन्यथा जिससे पूछो, वह पहले नियति का रोना रोता है। अपने भाग्य को कोसता है, फिर आगे की बात कहता है।

उनके जैसे लोग अत्यन्त माईनॉरिटी में हैं। पर उन जैसे लोगों के बल पर ही बहुत कुछ कायम है धरती पर। उनके जैसे लोग, जो शॉर्टकट नहीं तलाशते। लोग जो यकीन करते हैं कि उनके पुरुषार्थ से स्थितियां अनुकूल बनती हैं। लोग जो मानते हैं कि प्रकृति जितना देती है, उससे अपनी जरूरतें पूरी की जा सकती हैं। पता नहीं, लालचन्द अपने को इन टर्म्स में सोचते हैं या नहीं, मुझे तो छोटी सी मुलाकात के दौरान वे वैसे ही लगे।

लालचन्द ने कहा कि पहले मैं उनके गांव में जाया करता था; अब वह बन्द हो गया है। मैने अपनी लाचारी बताई कि घुटने के दर्द के कारण मेरा पैदल चलना बहुत कम हो गया है। साइकिल से भ्रमण भर हो रहा है।

पर यह जरूर लगा मुझे कि लालचन्द जैसे लोगों से मुझे मिलते रहना चाहिये।

भट्ठा मजदूर महिला


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कल भी मिली थी वह महिला।

नीले रंग की साड़ी पहने जोगिया रंग के कपड़े से बंधी परात में कुछ सिर पर लिये वह कल भी वह जा रही थी और आज भी। आज उसके साथ एक और महिला भी थी। सवेरे साइकिल चला रहा था मैं डेढ़ी पर। अपनी साइकिल रोक कर पूछा – कहां जाती हैं आप? गंगा स्नान कर लौटती हैं?

उसने जवाब दिया – “नहीं, अपने घर पर ही नहा कर चली हूं। गंगा नहाने का समय कहां। भट्ठा पर काम पर जा रही हूं।“

साथ वाली महिला ने बताया कि आदमी, बच्चे सवेरे सवेरे चले गये हैं भट्ठे पर काम करने। वे खाना बना, नहा कर निकल रही हैं।

क्या काम करते हैं?

“सगड़ी पर ईंट ढोते हैं। ऊंचे-नीचे पर सगड़ी (ठेला) चलता नहीं तो हम औरतें भी खींचती हैं या धक्का लगाती हैं।“

महिलाओं की बात से लगा कि पूरा परिवार सामुहिक रूप से ईंट ढुलाई का काम करते हैं। सवेरे जाती हैं ये महिलायें और शाम को वापस लौटती हैं। परिवार भी दिन भर वहीं काम करता है।

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उन दोनों महिलाओं से मैने कहा – एक चित्र ले लूं? मैने सहमति का इन्तजार नहीं किया। एक औरत ने जल्दी से अपना पल्लू मुंह पर डाल लिया और दूसरी ने मुस्कुराहट दी। उन्होने पूछा – मैं कहां रहता हूं?

बताने पर कि पास के गांव विक्रमपुर से हूं, एक ने कहा – अच्छा बाभन? मन्ना दूबे हयेन उहां।

मैने कहा – हां, मन्ना मेरा साला है। उनसे परिचय का एक राउण्ड पूरा हुआ।

सामने दायें एक भट्ठा नजर आ रहा था। उसमें काम भी चल रहा था। सगड़ी (ठेले) और ट्रेक्टर ट्रॉली काम कर रहे थे। मजदूर भी दिख रहे थे। ये महिलायें इस भट्ठे पर नहीं, कटका पड़ाव के पास के भट्ठे पर काम करने जा रही थीं।  कटका पड़ाव के भट्ठे पर पूरे परिवार को मिल कर ठेला खींच सड़क पार कराते देखा था मैने कुछ दिनों पहले। वह दृष्य याद आ गया।

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पूरे इलाके में लगभग हर वर्ग किलोमीटर में एक भट्ठा है। सरकार ने मिट्टी के खनन पर प्रतिबन्ध हटा लिये लगते हैं – तभी हर भट्ठे पर अच्छा उत्पादन होता नजर आ रहा है। सभी की चिमनियां धुआं उगल रही हैं। कच्ची-पकी ईंटों के प्रचुर भण्डर नजर आते हैं। उसी अनुपात में रोजगार भी मिल रहा है। ट्रेक्टर ट्रालियां ईंटे ढोती नजर आती हैं।

मजदूर महिला। प्रसन्नमन।

ईंटें बन रही हैं तो ईंट की खपत भी हो रही होगी।  निर्माण गतिविधियों में भी आसपास ग्रामीणों को रोजगार मिल रहा होगा। निर्माण गतिविधि जो पहले 8-10 महीने सुस्त थी, अब तेजी पकड़ती नजर आ रही है। यहां नेशनल हाईवे और रेल – दोनों पर बहुत गहमागहमी हैं निर्माण की। उनमें ज्यादातर मजदूर बाहरी नजर आते हैं, पर आसपास बहुत निर्माण स्थानीय मजदूरों से भी हो रहा होगा!

ईंट भट्ठा अभी गंगा दशहरा तक काम करते रहेंगे बरसात के मौसम से पहले। मैं आशा करता हूं कि इन महिलाओं और उनके परिवार को भट्ठे पर और उसके बाद अन्य कामों में सतत रोजगार मिलता रहे।

घर आ कर अपनी पत्नीजी से मैं पूछता हूं – इस तरह बीच सड़क रोक कर मेरे द्वारा प्रश्न करने को किस तरह लेती होंगी वे महिलायें? कोई स्पष्ट का जवाब नहीं मिला।

आपका क्या सोचना है?


 

डेढी और लेवल क्रासिंग की जरूरत


डेढ़ी – डेढ़ किलोमीटर लम्बी सड़क जो उत्तर में रेलवे लाइन और दक्षिण में गंगा किनारे के गांव द्वारिकापुर के बीच है और जिसके पूर्व में मिर्जापुर, पश्चिम में भदोही जिले के गांव हैं; के बारे में कल मैने बताना शुरू किया था। मेरा विचार है कि इस सड़क के माध्यम से गांव के जीवन की बहुत सी बातें मैं देख/समझ/बता पाऊंगा। इस सड़क पर रोज सवेरे मैं 8-9 किलोमीटर साइकिल चलाता हूं। डेढ़ी के लगभग तीन चक्कर। घर से सात बजे निकलता हूं – उदर में दो कप चाय डाल कर। बटोही (अपनी साइकिल) को एक बोतल पानी थमाता हूं। जस्ट इन केस प्यास लग जाये!

उत्तर छोर पर डेढ़ी रेलवे लाइन के पहले ठिठक कर खत्म हो जाती है। उसके आगे और दांये, बांये रेलवे की जमीन है। डेढ़ी के भगीरथ – परधान लोग अपनी सीमा में ही डेढ़ी के बहाव को तय कर सकते हैं। रेलवे पर जोर नहीं उनका।

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एक महिला थैले में अपना सामान ले कर मुझसे आगे चल रही थी डेढ़ी पर।

एक महिला थैले में अपना सामान ले कर मुझसे आगे चल रही थी डेढ़ी पर। उसे रेल लाइन के उस पार जाना था। मेरे सामने पटरी पार की उसने।DSCN0412

उसी समय दूसरी ओर से एक ग्रामीण को इस पार आने के लिये अपनी साइकिल पटरी पर कुदाते देखा।

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उसी समय दूसरी ओर से एक ग्रामीण को इस पार आने के लिये अपनी साइकिल पटरी पर कुदाते देखा।

डेढ़ी के सामने कटका रेलवे स्टेशन का शण्टिंग नेक का छोर दिखता है। अगर स्टेशन की लूप लाइन को चीरता लेवल क्रासिंग इस जगह पर शिफ़्ट कर दिया जाये तो स्टेशन सेक्शन के लेवल क्रासिंग को ब्लॉक सेक्शन में किया जा सकता है। रेलवे यातायात के लिये ज्यादा सुरक्षित विकल्प होगा वह। वर्तमान के लेवल क्रासिंग नम्बर 23 से इस जगह के बीच अपनी जमीन पर लगभग 400 मीटर पतली सड़क जरूर बना कर देनी होगी रेलवे को। और डेढ़ी के ग्रेडियेण्ट (समतल से ऊंचाई) को भी अगर टटोला जाये तो शायद नई जगह पर लेवल क्रासिंग की बजाय रोड-अन्डर-ब्रिज (पुलिया) बनाई जा सके शायद। वह रेलवे की लेवल क्रासिंग खत्म करने की पॉलिसी के अनुरूप होगा। अभी रेलवे लाइन का दोहरीकरण का काम चल रहा है। उस दशा में यह और भी ज्यादा सुरक्षित रेल यातायात का निमित्त होगा। गांव और रेल – दोनो के लिये विन-विन सिचयुयेशन।

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रेलवे फाटक की स्थिति और प्रस्ताव

मैं अगर रेल सेवा में होता तो यह करा पाना मेरे लिये बहुत सरल होता। अब मैं सुझाव भर दे सकता हूं। आसपास के चार-पांच प्रधान लोग, लोकल एमएलए/सांसद यह काम करा सकते हैं। शायद मण्डल रेल प्रबन्धक इसपर ध्यान दे सकें। पर इन सब प्रकार के जीवों के लिये फैज़ की वह नज्म है न! “और भी गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा।“ मुहब्बत की जगह रेलवे क्रासिंग और डेढ़ी पढ़ें! 😊

लेवल क्रासिंग तो एक मुद्दा है। इसी तरह के अनेक मुद्दे हैं जिनपर मैं चर्चा योग्य सोच रखने लगा हूं।  पर उस सब के क्रियान्वयन को ले कर मन में एक गहन उदासीनता है। यह रिटायर्ड जीवन का सच है। व्यक्ति कर्मक्षेत्र में छलांग नहीं लगाना चाहता। कर्मक्षेत्र जो कमिटमेण्ट मांगता है उसमें आशा/निराशा/हर्ष/खिन्नता/थकान सब कुछ है। उसमें रक्तचाप और व्यग्रता की मात्रा में बढ़ना भी निहित है। वह शायद मैं पुन: नहीं चाहता। बहुत हुआ।

हां, पर डेढ़ी यूंही डेड-एण्ड में खत्म नहीं होनी चाहिये। उसकी तार्किक परिणिति नेशनल हाईवे तक पंहुचने की है। और वहां तक पंहुचने के लिये जरूरी है लेवल क्रॉसिंग या रोड-अण्डर-ब्रिज।

देखें, कौन भगीरथ उसे वहां पंहुचाता है।