डीहबड़गांव में छोटी आईस्क्रीम फैक्ट्री

लगभग 15 लोगों को रोजगार मिलता है इस दो कमरे की फैक्ट्री में.


सड़क के किनारे दो कमरे वाली आइस्क्रीम फैक्ट्री में सवेरे सवेरे बहुत गहमागहमी थी. आइस्क्रीम के ठेले – साइकिल ठेले ले कर फेरी वाले निकल रहे थे. फैक्ट्री के कर्मचारी आईस्क्रीम की बार पैक करने में लगे थे.

आईस्क्रीम रखने का फ्रीजर

मोटे तौर पर देखने पर लगता था कि इस दो कमरे के उद्यम से 10फेरी वालों और चार पांच फैक्ट्री कर्मियों को रोजगार मिला हुआ है. लगभग 14-15 लोग 10-12 हजार महीना कमाई कर ले रहे हैं इससे.

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रघुबीर बिन्द का वर्मीकल्चर उद्यम

रघुबीर बिन्द जैसे लोग, जो गांव देहात में भी रोजगार के उभरते प्रकार को खोज-तलाश रहे हैं, भविष्य की आशा हैं।


रघुबीर बिन्द मुझे गिर्दबड़गांव की सड़क के किनारे दिखे। वे कच्चे गोबर की सतह पर पानी का छिड़काव कर रहे थे। साथ में एक और व्यक्ति था। आसपास के गेंहूं,सरसों के खेतों और ईंट भट्ठा की गतिविधि से अलग तरह का काम दिखा मुझे। मैने साइकिल रोक ली।

उन सज्जन (बाद में परिचय दिया कि रघुबीर बिन्द हैं) ने बताया कि महीना भर पहले उन्होने वर्मीकल्चर की तीन महीने के ट्रेनिंग पूरी की है। उसके बाद इस प्लाण्ट को लगाने में जुट गये। करीब एक लाख का खर्च किया है। गोबर कुछ अपना उनका है और कुछ 2200रुपये प्रति ट्रेक्टर-ट्रॉली दाम पर खरीदा है। अभी केचुये के लिये 25-30 हजार का खर्चा और होगा। ढाई महीने का केचुये की खाद बनने का साइकल है। तीन महीने बाद जो खाद तैयार होगी वह मार्किट में 600रुपया बोरी के भाव से जा रही है। एक बोरी में चालीस किलो खाद होगी।

रघुबीर ने मुझे पूरी प्रक्रिया बतायी जैविक खाद की। अभी गोबर के बेड को वे नम कर ठण्डा कर रहे हैं। नमी में लगभग 7-10 दिन गोबर पड़ा रहेगा। उसके बाद उसे ईंटों की बनी 16 पिट्स में केचुये के बीज मिला कर छोड़ देंगे। लगभग पचास दिन में केचुओं की गतिविधि से जैविक खाद तैयार होगी।

रघुबीर बिंद के वर्मीकल्चर के पिट

जैविक खाद की मांग के प्रति वे आश्वस्त दिखे। पास के बाजारों – कछवां, गोपीगंज आदि में खपत हो जायेगी। उनका अन्दाज है कि साल भर में 5-6 साइकल (पारी) खाद वे बना लेंगे। एक पिट में प्रति साइकल करीब 20-25 बोरी खाद बनेगी।

मैं मोटा अनुमान लगाता हूं तो साल में लगभग 10-12 लाख का टर्नओवर होगा उनके उद्यम से। लगभग तीस पैंतीस हजार रुपया महीना की अमदनी तो हो जानी चाहिये (संकोचपूर्ण – conservative अनुमान के आधार पर)। इस पूरे उद्यम में अनेक इफ़ एण्ड बट्स हैं। पर इफ़-एण्ड-बट्स के आधार पर सपने नहीं बोये जाते और कोई उद्यम नहीं खड़ा किया जाता।

रघुबीर बिन्द आशा और उत्साह से लबालब दिखे। उन्होने अपना मोबाइल नम्बर भी (उनके अपने इनिशियेटिव पर) मुझे दिया कि अगर भविष्य में कुछ और पूछना चाहूं तो पूछ सकूं।

लोग रोजगार की विषम दशा की बात करते हैं। इस बार का पूरा चुनाव उसी “काल्पनिक” मुद्दे पर ठेला जाने का जोर है। रघुबीर बिन्द जैसे लोग, जो गांव देहात में भी रोजगार के उभरते प्रकार को खोज-तलाश रहे हैं, भविष्य की आशा हैं।

सवेरे का साइकिल भ्रमण मुझे अनायास प्रसन्न कर गया। जय हो गांव-देहात की नई पीढ़ी की उद्यमिता!


पुस्तक कब पढ़ी मानी जाये?


रिटायरमेण्ट के बाद जब मित्र भी नहीं बचते (शहर के मित्र शहर में छूट गये, गांव के अभी उतने प्रगाढ़ बने नहीं) तो पठन ही मित्र हैं। दिन भर लिखा पढ़ने में बहुत समय जाता है। पर बहुत व्यवस्थित नहीं है पठन।

गांव में अखबार वाला समाचारपत्र बड़ी मुश्किल से देता है। पत्रिकायें नहीं मिलतीं। उसका विकल्प टैब पर Magzter पर पत्रिकायें पढ़ने से मिलता है। पुस्तकों की संक्षिप्तता का एप्प – Blinkist बड़े काम का है। पुस्तक परिचय का बहुत महत्वपूर्ण काम उनसे हो जाता है। अमेजन से किण्डल पर पुस्तकें खरीद कर पढ़ी जा सकती/जाती हैं। अमेजन प्राइम कई पुस्तकें मुफ्त में पढ़ने को दे देता है। उसके अलावा नेट पर उपलब्ध क्लासिक्स या पायरेटेड अच्छी पुस्तकों का भण्डार है। पेपर पर छपी पुस्तकें खरीदना लगभग खतम हो गया है पर पहले खरीदी पुस्तकों का भी बडा बैकलॉग है।

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डेढी और लेवल क्रासिंग की जरूरत


डेढ़ी – डेढ़ किलोमीटर लम्बी सड़क जो उत्तर में रेलवे लाइन और दक्षिण में गंगा किनारे के गांव द्वारिकापुर के बीच है और जिसके पूर्व में मिर्जापुर, पश्चिम में भदोही जिले के गांव हैं; के बारे में कल मैने बताना शुरू किया था। मेरा विचार है कि इस सड़क के माध्यम से गांव के जीवन की बहुत सी बातें मैं देख/समझ/बता पाऊंगा। इस सड़क पर रोज सवेरे मैं 8-9 किलोमीटर साइकिल चलाता हूं। डेढ़ी के लगभग तीन चक्कर। घर से सात बजे निकलता हूं – उदर में दो कप चाय डाल कर। बटोही (अपनी साइकिल) को एक बोतल पानी थमाता हूं। जस्ट इन केस प्यास लग जाये!

उत्तर छोर पर डेढ़ी रेलवे लाइन के पहले ठिठक कर खत्म हो जाती है। उसके आगे और दांये, बांये रेलवे की जमीन है। डेढ़ी के भगीरथ – परधान लोग अपनी सीमा में ही डेढ़ी के बहाव को तय कर सकते हैं। रेलवे पर जोर नहीं उनका।

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एक महिला थैले में अपना सामान ले कर मुझसे आगे चल रही थी डेढ़ी पर।

एक महिला थैले में अपना सामान ले कर मुझसे आगे चल रही थी डेढ़ी पर। उसे रेल लाइन के उस पार जाना था। मेरे सामने पटरी पार की उसने।DSCN0412

उसी समय दूसरी ओर से एक ग्रामीण को इस पार आने के लिये अपनी साइकिल पटरी पर कुदाते देखा।

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उसी समय दूसरी ओर से एक ग्रामीण को इस पार आने के लिये अपनी साइकिल पटरी पर कुदाते देखा।

डेढ़ी के सामने कटका रेलवे स्टेशन का शण्टिंग नेक का छोर दिखता है। अगर स्टेशन की लूप लाइन को चीरता लेवल क्रासिंग इस जगह पर शिफ़्ट कर दिया जाये तो स्टेशन सेक्शन के लेवल क्रासिंग को ब्लॉक सेक्शन में किया जा सकता है। रेलवे यातायात के लिये ज्यादा सुरक्षित विकल्प होगा वह। वर्तमान के लेवल क्रासिंग नम्बर 23 से इस जगह के बीच अपनी जमीन पर लगभग 400 मीटर पतली सड़क जरूर बना कर देनी होगी रेलवे को। और डेढ़ी के ग्रेडियेण्ट (समतल से ऊंचाई) को भी अगर टटोला जाये तो शायद नई जगह पर लेवल क्रासिंग की बजाय रोड-अन्डर-ब्रिज (पुलिया) बनाई जा सके शायद। वह रेलवे की लेवल क्रासिंग खत्म करने की पॉलिसी के अनुरूप होगा। अभी रेलवे लाइन का दोहरीकरण का काम चल रहा है। उस दशा में यह और भी ज्यादा सुरक्षित रेल यातायात का निमित्त होगा। गांव और रेल – दोनो के लिये विन-विन सिचयुयेशन।

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रेलवे फाटक की स्थिति और प्रस्ताव

मैं अगर रेल सेवा में होता तो यह करा पाना मेरे लिये बहुत सरल होता। अब मैं सुझाव भर दे सकता हूं। आसपास के चार-पांच प्रधान लोग, लोकल एमएलए/सांसद यह काम करा सकते हैं। शायद मण्डल रेल प्रबन्धक इसपर ध्यान दे सकें। पर इन सब प्रकार के जीवों के लिये फैज़ की वह नज्म है न! “और भी गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा।“ मुहब्बत की जगह रेलवे क्रासिंग और डेढ़ी पढ़ें! 😊

लेवल क्रासिंग तो एक मुद्दा है। इसी तरह के अनेक मुद्दे हैं जिनपर मैं चर्चा योग्य सोच रखने लगा हूं।  पर उस सब के क्रियान्वयन को ले कर मन में एक गहन उदासीनता है। यह रिटायर्ड जीवन का सच है। व्यक्ति कर्मक्षेत्र में छलांग नहीं लगाना चाहता। कर्मक्षेत्र जो कमिटमेण्ट मांगता है उसमें आशा/निराशा/हर्ष/खिन्नता/थकान सब कुछ है। उसमें रक्तचाप और व्यग्रता की मात्रा में बढ़ना भी निहित है। वह शायद मैं पुन: नहीं चाहता। बहुत हुआ।

हां, पर डेढ़ी यूंही डेड-एण्ड में खत्म नहीं होनी चाहिये। उसकी तार्किक परिणिति नेशनल हाईवे तक पंहुचने की है। और वहां तक पंहुचने के लिये जरूरी है लेवल क्रॉसिंग या रोड-अण्डर-ब्रिज।

देखें, कौन भगीरथ उसे वहां पंहुचाता है।

गांव में बिजली समस्या का निदान – सोलर ऊर्जा की शरण से


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छत पर लगे 250वाट के आठ सोलर पैनल। पहले चार दो साल पहले लगवाये थे। बाकी अब के हैं।

गांव में शिफ़्ट होते ही मैने 2016 के प्रारम्भ में घर में 1 केवीए का सोलर पैनल लगवा लिया था। पर उसको लगाने के समय यह आकलन किया था कि उस सिस्टम से एक किलोवाट पावर आउटपुट बैटरी को मिलेगा और बैटरी लगभग उतना ही मुझे मेरे काम चलाने के लिये देगी। ऐसा हुआ नहीं। बाद में पता चला कि 250वाट के चार पैनल करीब 600वाट की शक्ति बैटरी को देते हैं। बैटरी लगभग 80% स्टोर की हुई ऊर्जा इनवर्टर के माध्यम से घरेलू उपकरणों को देती है। सो, पैनल लगाने के बाद भी हमारी ग्रामीण विद्युत सप्लाई पर निर्भरता बनी रही।

जब लगभग 10-12 घण्टे बिजली की सप्लाई आती थी, तब पैनल और सप्लाई दोनों को मिला कर सतत बिजली उपलब्धता की जरूरत पूरी कर देते थे। पर गांव में जर्जर सप्लाई नेटवर्क के कारण साल में 10-12 मौके आये जब कई दिनों तक बिजली नहीं आती थी।

एक बार तो बिना बिजली के पूरा हफ़्ता गुजर गया था।

कई दिनों बिजली न आने दशा में सोलर पैनल जरूरी पंखे और लाइट लगभग 18-20 घण्टे ही चला पाते थे। फ्रिज चालू करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। मुझे याद है कि एक बार हमें एण्टी-रेबीज इन्जेक्शन फ़्रीजर में रखने थे और फ़्रिज चालू न होने के कारण आईस बॉक्स का इन्तजाम करना पड़ा था। उसके लिये बर्फ़ का इन्तजाम करना भी एक कठिन काम था। सब्जियां और भोजन अधिक बन जाने और उसके स्टोर न कर पाने को ले कर परिवार में कई बार चिक चिक हुई।

हमारा यह गांव सांसद महोदय ने गोद लिया हुआ है। तथाकथित आदर्श गांव होने के बावजूद भी बिजली की सप्लाई अनियमित है। इसमें बिजली कर्मी भी बहुत कुछ नहीं कर पाते। उनके पास लाइनमैन स्तर के कर्मियों की बहुत किल्लत है और दशकों की रूरल नेटवर्क के प्रति उपेक्षा के कारण हल्के आंधी और बयार से भी सप्लाई अवरोधित हो जाती है। एक बार अवरोधित हुई तो ठीक होने में दिनों लग जाते हैं। प्रान्त में नई सरकार आने के बाद स्थिति कुछ बेहतर हुई, पर अब लगता है कर्मचारी शुरुआती दौर की कर्मठता से उबर चुके हैं। अब वे समझ गये हैं कि नई सरकार में भी कमोबेश उसी “आनन्दमय” दशा में स्थितप्रज्ञ रहा जा सकता है, जिसमें वे पहले जी रहे थे। आखिर कब तक वे कमर कस कर जियें?

अकेले मोदी (या योगी) कितनी तलवार भांजेंगे?! उन्हें कई शॉक ट्रीटमेण्ट करने चाहियें गांव के स्तर पर। बिजली की वायदे अनुसार उपलब्धता एक प्रमुख बिन्दु है।

सभी घटकों पर विचार कर, कुल मिला कर, मुझे बहुत आशा नजर नहीं आई कि अगली गरमी में पर्याप्त बिजली सप्लाई मिलेगी। अंत: मैने घर में एक ऐसा बिजली उपलब्धता का तन्त्र बनाने की सोची जिसमें अनवरत बिजली सप्लाई बाधित होने के दशा में घर के एलईडी के बल्ब, पंखे, वाईफाई, आरओ मशीन, मोबाइल चार्जिंग, लैपटॉप और फ़्रिज सुविधाजनक रूप से चल सकें। केवल गीजर, वाशिंग मशीन और पानी छत की टंकी पर चढ़ाने के लिये बिजली सप्लाई/जेनरेटर की जरूरत हो।

अन्य बड़े खर्चों पर वरीयता देकर हमने दो हफ्ते पहले 250 वाट के चार सोलर पैनल, सोलर पावर चेंजओवर यूनिट और दो बैटरियों का एक सेट और लगवा लिया। इसके लगवाने में दो साल पहले की बजाय कम खर्च हुआ। पैनल की कीमत करीब 25-30% घट गयी है।

इस प्रकार मेरे पास 1-1 किलोवाट के दो सिस्टम हो गये – एक दिन की जरूरतों के लिये और दूसरा रात के लिये। इस सिस्टम की हॉट लाइन चेकिंग भी हो गयी। कल लगभग 30-32 घण्टे तक बिजली की सप्लाई नहीं थी। उस दौरान सभी पंखे और अन्य उपकरण सुचारु रूप से चल गये सोलर सिस्टम पर।

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पहले (दायें) और अब के (बांये) बैटरी/इनवर्टर/पी.सी.यू. सेट। नये सिस्टम में 1कि.वाट के सोलर पैनल और जोड़ने की गुंजाईश है। 

अब लगता है इस साल गर्मी और बरसात के महीनों में बिजली सप्लाई को ले कर हाय हाय नहीं रहेगी। हां, गांव वाले अपने मोबाईल चार्ज करवाने आते रहेंगे। (वैसे गांव में इतनी सोलर लाइट बंट गई हैं कि उसमें जुगाड लगा कर लोग अपने मोबाइल चार्ज करने में दक्ष होते जा रहे हैं।)

देर सबेर सौर ऊर्जा ही शरण देगी गांव देहात को।


 

जंगल की वनस्पतियों पर शोध ग्रंथ


"विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान' पुस्तक में चित्रों की एक प्लेट।
“विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान’ पुस्तक में चित्रों की एक प्लेट।

मैने श्री प्रवीण चन्द्र दुबे से उनके शोध कार्यों पर लिखी उनकी पुस्तकों पर जिज्ञासा जताई थी।

कुछ दिनों बाद मुझे एक अनजान नम्बर से फोन आया। बोटानिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के सेण्ट्रल रीजनल सेण्टर, इलाहाबाद से श्री अर्जुन तिवारी फोन पर थे। उन्होने बताया कि कुछ समय बाद वे अपने विन्ध्य की वनस्पतियों पर अध्ययन वाली पुस्तक मुझे भिजवा देंगे।

लगभग 15 दिन बाद वह पुस्तक मेरे हाथ में थी।

मेरा सोचना था कि यह लगभग 50-100 पेज की कोई पुस्तिका होगी। ऐसी पुस्तिका, जो लोग कम से कम मेहनत में लिखते-छपवाते हैं कि लेखक होने का नाम भर हो जाये और कहने को हो कि वे शोध कर सामग्री पब्लिश कर चुके हैं। ऐसी पुस्तकें लोगों पर रुआब डालने भर का काम करती हैं।

पर यह पुस्तक – विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान – एक पुस्तिका नहीं, ए-4 साइज बड़े आकार के 400 से अधिक पेजों का भारी भरकम शोध ग्रन्थ निकला। छ व्यक्तियों के कई वर्षों की जंगल छानने, पारम्परिक चिकित्सकों के मिलने, नोट्स बनाने और वनस्पतियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करने का नतीजा था। यह पुस्तक तो आगे आने वाले चिकित्सकीय शोध के कई अध्यायों को ट्रिगर कर सकती है।


महुआ बड़ा मिठहुआ भाई
लाटा, ड़ोभरी खा बनाई
भुरकुन्ना खुरमा डोभराऊरा
खा रसखीर मौहारी भउरा
येखे फर का तेल निकारी
यामा न घाले कोउ कुल्हारी।
महुआ कितना मीठा पदार्थ है कि इससे लाटा, डोभरी भुरकुन्ना, सुरमा रसखीर, गौहारी आदि तरह तरह के व्यंजनों को बना कर खाया जाता है। इसके फल से तेल भी निकलता है। इस लिये ऐसे उपकारी पेड़ को कोई कुल्हाड़ी न चलाये।

(पुस्तक से)


पुस्तक की एक् प्लेट
पुस्तक की एक् प्लेट

वनवासी वे हैं, जो अपनी समस्त आवश्यकताओं के लिये वन पर निर्भर हैं। निर्भर हैं तो वन के प्रति उनमें माता-पिता जैसा भाव है। वृक्षों के प्रति आदर। उनका रहन-सहन, भोजन, दवा-दारू, देवी-देवता सब का आधार वन है। जंगल का वे आवश्यकता से अधिक दोहन/शोषण नहीं करते।

पुस्तक में यह और वन से सम्बन्धित अनेकानेक जानकारियां; अनेकानेक आयाम स्पष्ट होते हैं। यह सर्राटे से पढ़ी जा सकने लायक पुस्तक नहीं है। सन्दर्भ-ग्रंथ है; जिसपर बार बार लौटा जाये।

यह पुस्तक रीवां सम्भाग के रींवा, सतना, शहडोल, अनूपपुर, सीधी और उमरिया जिलों के वनो के जैवविविधता बहुल 22 क्षेत्रों के दो वर्षों तक सघन भ्रमण, स्थानीय जानकारों और पारम्परिक चिकित्सकों से सम्पर्क से निकली संतृप्त जानकारी का संग्रह है। इसमें दो सौ से अधिक स्थानीय जानकारों, वैद्यों, वन कर्मियों आदि की सूची है जिनके साथ सम्पर्क से इस पुस्तक की सामग्री बनी है। बड़े ही वैज्ञानिक तरह से अध्ययन किया गया है, इस ग्रंथ के लिये।

इस पुस्तक पर छ लेखकों के नाम हैं। सर्वश्री प्रवीण चन्द्र दुबे, के के खन्ना, आरएलएस सिकरवार, आरएन सक्सेना, बीएल पाण्डेय और अर्जुन प्रसाद तिवारी। इनमें से मैं श्री प्रवीण चन्द्र दुबे से मिला हूं। और अर्जुन तिवारी से फोन पर चर्चा हुई है। अन्य सज्जनों से भी मुलाकात की इच्छा है।

इस ब्लॉग पोस्ट में पुस्तक की सामग्री परिचय के बारे में अगर मैं कहना शुरू करूं तो उसे 500-1000 शब्दों में समेट नहीं सकता। अत: उसका प्रयास नहीं करूंगा। प्रवीण जी और अर्जुन ने मुझे यह भरोसा दिया है कि इस पुस्तक की सॉफ्ट कॉपी उपलब्ध करा देंगे। तब, जब भी समय मिला, मैं इसके अंशों से आप पाठकगणों को जानकारी देता रहूंगा।

फिलहाल तो मैं इतना ही कह सकता हूं कि अत्यंत प्रभावित हूं इस अध्ययन-सन्दर्भ-ग्रंथ से।


अर्जुन प्रसाद तिवारी। चित्र फेसबुक से।
अर्जुन प्रसाद तिवारी। चित्र फेसबुक से।

मैने अर्जुन तिवारी से फोन पर बातचीत की। वे बोटानिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के इलाहाबाद केन्द्र में शोध कार्य कर रहे हैं। [ प्रवीण चन्द्र दुबे जी ने मुझे फोन पर कहा था – बड़ा ही अच्छा लड़का है। इसके लिये कोई अच्छी लड़की हो तो बताइयेगा! 😆 ]

अर्जुन से मैने पूछा कि जितना पारम्परिक ज्ञान उन्होने अनेक जनजातीय लोगों/वैद्यों/जानकारों से एकत्र किया है, उसमें से कितना, बकौल उनके, आयुर्वेद ने अपने में समाहित किया है?

अर्जुन का विचार था कि अभी बहुत कुछ वैज्ञानिक/आयुर्वेदीय अध्ययन बाकी है। लगभग 40 प्रतिशत ज्ञान किसी न किसी तरह से आयुर्वेदीय औषधियों-पद्धतियों में है। एलोपैथिक दवाओं में भी बहुत सी का मूल ये जड़ी-बूटियां ही हैं। पर बहुत से वनस्पतीय-पारम्परिक ज्ञान का वैलीडेशन होना शेष है। उस दिशा में बहुत प्रयास नहीं हुये हैं। पर अब आयुष मंत्रालय की स्थापना हुई है तो आशा की किरण नजर आती है।

उदाहरण के लिये अर्जुन ने बताया कि जनजातीय लोग भस्म-कन्द नामक जड़ी का प्रयोग केंसर के लिये करते आये हैं। उज्जैन में एक बीएमएस डाक्टर से उन्हे प्रवीण जी ने मिलवाया था। उन डाक्टर साहब ने  बताया था कि भस्म-कन्द का सफल प्रयोग उन्होने कई केंसर रोगियों पर किया था।

पर जन जातीय लोग भस्म-कन्द का सूरन के विकल्प के रूप में अपने भोजन में प्रयोग करते आये हैं। व्यापक दोहन हो चुका है इस वनस्पति का और यह एंडेंजर्ड प्रजाति में आ गयी है। इसको बनाये रखने के प्रयास की आवश्यकता है।

अर्जुन ने एलोपैथी और आयुर्वैदिक दवाओं में वनस्पति के प्रयोग पर अपने विचार व्यक्त किये। एलोपैथी में वनस्पति का संश्लेषित रूप प्रयोग होता है। आयुर्वेदिक औषधि में वनस्पति अपनी मूल दशा में रहती है। भारत में आयुर्वेदिक दवाओं की मूल समस्या उनमें कठोर क्वालिटी कण्ट्रोल का न होना है। उनकी फार्मास्युटिकल कम्पनियां जड़ी-बूटियों की गुणवत्ता से समझौता करती हैं। (उदाहरण के लिये अशोकारिष्ट में वे अशोक के उस प्रकार का प्रयोग कर रही हैं, जिसमें औषधीय गुण नगण्य़ हैं।) कई बार पुरानी जड़ी-बूटियों का प्रयोग कर लिया जाता है। वे कुशल प्लाण्ट टेक्सोनॉमिस्ट अपनी दवाओं के उत्पादन में नहीं रखतीं।

'विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान' पुस्तक का एक पेज-अंश
‘विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान’ पुस्तक का एक पेज-अंश


अर्जुन तिवारी से बातचीत कर मुझे लगा कि वनस्पतियों के पारम्परिक ज्ञान का अध्ययन और उसका आयुर्वेद/एलोपैथ के साथ सही संश्लेषण समय की मांग भी है और वर्तमान सरकार की सोच के अनुसार एक महत्वपूर्ण घटक भी – जनता के स्वास्थ्य के लिये।

अर्जुन निकट भविष्य में वैज्ञानिक पद के लिये चयन में जायेंगे। उन्हे शुभकामनायें!


डेण्टिस्ट से एक अप्वॉइण्टमेण्ट


Ghost-train-to-the-Easter-001मैं पॉल थरू की दूसरी यात्रा पुस्तक – द घोस्ट ट्रेन टू द ईस्टर्न स्टार पढ़ रहा था। पॉल थरू अंकारा में अपने दांत की एक लूज फिलिंग के इलाज के लिये डेण्टिस्ट के पास गये थे। सामान्यत: डेण्टिस्ट के पास जाने की बात किसी ट्रेवलॉग में बहुत बारीकी से नहीं लिखी जायेगी। पर पॉल थरू एक अद्वितीय ट्रेवलॉग लेखक हैं। उन्होने डाक्टर इसिल इव्सिमिक के साथ इलाज के समय का भी अच्छा वर्णन किया है। डाक्टर इव्सिमिक अपना काम करते समय अपने मरीज के साथ अनवरत हल्की आवाज में कमेण्ट्री देते बात भी करती जाती थीं। और एक अच्छे ट्रेवलॉग लेखक के रूप में थरू वह सब बाद में पुस्तक में री-प्रोड्यूज भी करते गये।

***

मुझे भी डेण्टिस्ट के पास जाना था। मुझे अपने सामने के दांतों में कहीं कहीं कालापन और क्षरण महसूस हो रहा था पिछले साल भर से। जब तक उसके कारण कोई दर्द नहीं था, मैने वह अनदेखा कर दिया – थोड़ा टूथब्रश ज्यादा चला लेता था, यह मान कर कि उससे कालापन मिट जायेगा और दांत चमक जायेंगे। पर अब लगभग 15-20 दिन से लगने लगा कि ठण्डे-गरम के सम्पर्क में आने पर दांत में दर्द होने लगा है तो मैने समझ लिया कि दांतों के डाक्टर के पास गये बिना चारा नहीं है।

एक मरीज काअपने चेम्बर में दांतों का इलाज करती डाक्टर हाण्डू
एक मरीज का अपने चेम्बर में दांतों का इलाज करती डाक्टर हाण्डू

मुझे बताया गया कि रेलवे अस्पताल, इलाहाबाद में डाक्टर मंजुलता हाण्डू डेण्टिस्ट हैं। और एक अत्यंत कुशल डेण्टिस्ट हैं। मैने जब अपने सहकर्मी श्री राजेश पाण्डेय को उनके पास अप्वाइण्टमेण्ट लेने के लिये भेजा तो बड़ी सहजता से मिल भी गया। न मिलता तो शायद मैं विशेष यत्न न करता और टालता रहता दांत की समस्या। पर अब, वृहस्पतिवार को अपना दफ्तर का सवेरे का काम खत्म कर डाक्टर हाण्डू के पास मैं चला ही गया।

अस्पताल में घुसते ही उनका चेम्बर है। दो केबिन का चेम्बर। एक में एक अन्य डाक्टर मरीरों को बतौर ऑउटपेशेण्ट निपटा रहे थे। एक व्यक्ति ने उठ कर मुझे अपनी कुर्सी दे दी बैठने को। जैसे बस में अपंगों और महिलाओं को सीट दे देने का शिष्टाचार है; रेलवे में अफसर को अपनी सीट खाली कर देने का शिष्टाचार है। मुझे वह लाभ मिला। पर जल्दी ही मुझे दूसरे चेम्बर, जहां डेण्टिस्ट के काम करने के लिये बड़ी रिक्लाइनिंग सीट-कम-बिस्तर लगे थे, में बैठने के लिये जगह मिल गयी। उस चेम्बर में उपकरण नये थे। बिस्तर पर अभी नया पॉलीथीन कवर भी नहीं उतरा था। कुल मिला कर काफ़ी आधुनिक डेण्टल क्लीनिक का एम्बियेन्स दे रहा था वह चेम्बर। डाक्टर हाण्डू एक रिक्लाइनिंग सीट पर लेटे एक मरीज के दांतों की मरम्मत करने में व्यस्त थीं। उनके मुंह पर डाक्टरी मास्क लगा था। वे यदा कदा मरीज को या अपने सहायक को निर्देश में कुछ कह रही थीं। मुझे कुछ मायूसी हुई कि पॉल थरू के पुस्तक की डाक्टर इसिल इव्सिमिक की तरह रनिंग कमेण्ट्री नहीं दे रही थीं। 😦

जल्दी ही मेरा नम्बर आ गया। मुझे उस चेम्बर में उपलब्ध दूसरी सीट पर रिक्लाइन करने को कहा गया। डाक्टर हाण्डू ने मेरे दांतों का मुआयना किया और मेरी समस्या पूछी।

कुछ महीनों से आगे के नीचे और ऊपर के दांतों में ठण्डा या गरम के कॉण्टेक्ट में आने पर तेज अहसास होता है। अदरवाइज़ दर्द नहीं होता।

डाक्टर ने दांतो को ठक ठक ठोंकते हुये पूछा – दर्द होता है?

नहीं, केवल ठण्डा-गर्म से तकलीफ है।  

दांतों में कीड़ा लग गया है।

दांत के कीड़े की परिकल्पना
दांत के कीड़े की परिकल्पना

मुझे मन ही मन यह लगा कि कोई कीड़ा है जो दांतों में घुसा खाये जा रहा है दांतों को। मैने मेण्टल नोट किया कि बाद में इस कीड़े को इण्टरनेट पर तलाश करूंगा। बाद में तलाश करने पर पता चला कि ऐसा कोई कीड़ा नहीं है। चीनी या अन्य खाद्य पदार्थों से पैदा होने वाले अम्ल में पनपने वाले बेक्टीरिया दांतों का कैविटी या केरीज (cavity, caries) के रूप में क्षरण करते हैं। उसे ही सामान्य भाषा में कीड़ा लगना कहा जाता है। दांत या चमड़ी के डाक्टरों को मैने जन सामान्य को समझाने के लिये मैडिकल जार्गन रहित भाषा का प्रयोग करते पाया है – जैसे डाक्टर हाण्डू ने कीड़ा का प्रयोग किया या जैसे बहुत पहले एक चर्म रोग विशेषज्ञ मुझे डर्मेटाइटिस के सुधार के बारे में कहते थे कि “चार आना भर” सुधार हो गया है।


दांतों में समस्या भारतीय लोगों में पान-तम्बाकू खाने के कारण अधिक होती है। लोगों में मीठा खाने की प्रवृत्ति कम है। पर मेरे साथ पान खाने का कोण नहीं है। अलबत्ता मीठा बाभन नहीं खायेगा तो कौन खायेगा! 🙂
मुझे बताया गया कि दवाओं के लम्बे समय तक सेवन से भी हड्डियों (जिनमें दांत भी शामिल हैं) में क्षरण होता है। वह भी एक कारण हो सकता है मेरे साथ।


दांतों में दर्द न होने के कारण डाक्टर ने सफाई कर दांत की फिलिंग का निर्णय किया। उन्होने मुझे बाद में बताया कि अगर फिर भी ठण्डा-गर्म की सेन्सिटीविटी (आम भाषा में “पानी लगना”) होती है तो वे आर.सी.टी. (root canal treatment) करेंगी। दांतों की सफ़ाई और फिलिंग की प्रक्रिया में मुझे कई बार थूकना पड़ा। पानी या दवाओं की फुहार, खुरचने की क्रिया, फिलिंग की तकनीक – सभी मेरे मुंह पर अजमायी जा रही थीं और मेरे मन में यह था कि अगर इस सब की एक फिल्म बनती जो मैं बाद में देख पाता तो वह मुझे काफ़ी इनसाइट देती डेण्टिस्ट्री के बारे में। अन्यथा मैं तो लेटा लेटा यदा कदा दीवार पर टंगी उस सफ़ेद स्वस्थ दांत वाली सुन्दर लड़की का फोटो ही देख पा रहा था, या फिर डाक्टर के उस असिस्टेण्ट को; जिसके सिर के पृष्ठ भाग में उसको सवर्ण घोषित करती उसकी छोटी चोटी थी, जो छोटे खिचड़ी रंगत के बालों का अधेड़ था, जो काम दक्षता से कर रहा था पर शक्ल सूरत से देहाती लग रहा था – मेरी तरह!

अपने इण्ट्रोवर्ट नेचर के विपरीत मैं वहां अधिकधिक सम्प्रेषण की अपेक्षा कर रहा था – जो मिला नहीं। यह मेरी डाक्टर के साथ पहली सिटिंग थी। इसमें मेरे नीचे के दांत की फिलिंग हुई। शनीवार को दूसरी सिटिंग है, जिसमें ऊपर के दांत की फिलिंग होनी है। शायद उस दिन मैं डाक्टर हाण्डू से कुछ प्रश्न कर पाऊं।

दूसरी सिटिंग

शनिवार को नियत समय पर पंहुच गया। इन्तजार करते समय मेरे बगल में मैले कुचैले कपड़े पहने, चारखाने का स्कार्फ़ जैसा गमछा सिर पर बांधे एक वृद्ध बैठा था। हाथ में एक पतली सी बांस की लकड़ी थी जो ठीक से न संभालने के कारण यदाकदा गिर जाती थी। हाथ में अपने कागज लिये, लम्बी प्रतीक्षा के लिये तैयार बैठा था वह।

दीवार पर दांतों को दिखाते हुये विज्ञापनी महिला का चित्र था – किसी Glizer कम्पनी का। देखने वाले को निहारती हंसती महिला अपने स्वस्थ दांत दिखा रही थी। पर देखने वाला मेरे जैसा इनफ़ीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स वाला हो तो उसे लग सकता है कि अपने अच्छे दांतों से वह चिढ़ा रही है। वहां बैठे मैं बहुत जल्दी उकताने लगा।

डाक्टर हाण्डू एक महिला के दांतों की डेण्टिस्ट्री में व्यस्त थीं। ॒अपने महीन स्वर में यदा कदा अपने सहायक या उस महिला को निर्देशात्मक कुछ कहती थीं। आज सहायक कोई दूसरा व्यक्ति था – परसों वाले से ज्यादा स्मार्ट।

मुझे ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ा और सिटिंग में भी ज्यादा समय नहीं लगा। मैने बताया कि पिछली सिटिंग के बाद नीचे के दांतों में मुझे पानी लगने की समस्या नहीं हुयी। एक आध बार लगा कि हल्का सेनसेशन है, पर वह शायद ऊपर वाले दांतों का सेनसेशन नीचे वाले दांतों का होने का समझने की मेरी गलती भी हो सकती है। डाक्टर को शायद मेरा यह तर्क सही न लगा। पर उन्होने बिना समय गंवाये मेरे ऊपर के दो दांतों की सफ़ाई-घिसाई और फिलिंग का काम लगभग बीस मिनट में पूरा कर लिया।

डाक्टर मंजुलता हाण्डू
डाक्टर मंजुलता हाण्डू

डाक्टर हाण्डू ने काम पूरा कर अपना मास्क उतारा तो पहली बार मैने उनका चेहरा देखा। उनकी अनुमति मांगी कि उनका एक फोटो अपने ब्लॉग के लिये ले लूं? और जैसा एक घुटा हुआ ब्लॉगर करता है – इससे पहले कि सामने वाला व्यक्ति अपनी सहमति या विरोध दर्ज करे, मैं उनका चित्र ले चुका था। उन्हे मैने बताया कि इस सिटिंग्स के बारे में मैं एक पोस्ट लिखूंगा और उन्होने कहा कि भविष्य में कभी भी आवश्यकता हो तो मैं उनके डेण्टल क्लीनिक पर आ सकता हूं।

मेरे मन में पहले यह धारणा थी कि डेण्टल डाक्टर के पास जाने का मतलब ही होता है लगभग 80% सम्भावना कि दांत उखाडा जायेगा और कुछ दिन तक भीषण दर्द रहेगा या फिर चेतावनी मिल जायेगी कि आपके सही तरीके से दांतों की देखभाल न करने से उनकी की आयु लगभग समाप्त है… पर वैसा नहीं हुआ। डाक्टर की दांतों की दक्ष फ़िलिंग के बाद अब काफी समय तक मुझे परेशान नहीं होना होगा। उनके कहे अनुसार सॉफ्ट ब्रश और हल्के से मंजन की शुरुआत मुझे करनी है।

बाकी, दांतों की फिलिंग लगभग कितना चलेगी, यह डाक्टर हाण्डू से पूछना भूल गया…