डेण्टिस्ट से एक अप्वॉइण्टमेण्ट


Ghost-train-to-the-Easter-001मैं पॉल थरू की दूसरी यात्रा पुस्तक – द घोस्ट ट्रेन टू द ईस्टर्न स्टार पढ़ रहा था। पॉल थरू अंकारा में अपने दांत की एक लूज फिलिंग के इलाज के लिये डेण्टिस्ट के पास गये थे। सामान्यत: डेण्टिस्ट के पास जाने की बात किसी ट्रेवलॉग में बहुत बारीकी से नहीं लिखी जायेगी। पर पॉल थरू एक अद्वितीय ट्रेवलॉग लेखक हैं। उन्होने डाक्टर इसिल इव्सिमिक के साथ इलाज के समय का भी अच्छा वर्णन किया है। डाक्टर इव्सिमिक अपना काम करते समय अपने मरीज के साथ अनवरत हल्की आवाज में कमेण्ट्री देते बात भी करती जाती थीं। और एक अच्छे ट्रेवलॉग लेखक के रूप में थरू वह सब बाद में पुस्तक में री-प्रोड्यूज भी करते गये।

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मुझे भी डेण्टिस्ट के पास जाना था। मुझे अपने सामने के दांतों में कहीं कहीं कालापन और क्षरण महसूस हो रहा था पिछले साल भर से। जब तक उसके कारण कोई दर्द नहीं था, मैने वह अनदेखा कर दिया – थोड़ा टूथब्रश ज्यादा चला लेता था, यह मान कर कि उससे कालापन मिट जायेगा और दांत चमक जायेंगे। पर अब लगभग 15-20 दिन से लगने लगा कि ठण्डे-गरम के सम्पर्क में आने पर दांत में दर्द होने लगा है तो मैने समझ लिया कि दांतों के डाक्टर के पास गये बिना चारा नहीं है।

एक मरीज काअपने चेम्बर में दांतों का इलाज करती डाक्टर हाण्डू
एक मरीज का अपने चेम्बर में दांतों का इलाज करती डाक्टर हाण्डू

मुझे बताया गया कि रेलवे अस्पताल, इलाहाबाद में डाक्टर मंजुलता हाण्डू डेण्टिस्ट हैं। और एक अत्यंत कुशल डेण्टिस्ट हैं। मैने जब अपने सहकर्मी श्री राजेश पाण्डेय को उनके पास अप्वाइण्टमेण्ट लेने के लिये भेजा तो बड़ी सहजता से मिल भी गया। न मिलता तो शायद मैं विशेष यत्न न करता और टालता रहता दांत की समस्या। पर अब, वृहस्पतिवार को अपना दफ्तर का सवेरे का काम खत्म कर डाक्टर हाण्डू के पास मैं चला ही गया।

अस्पताल में घुसते ही उनका चेम्बर है। दो केबिन का चेम्बर। एक में एक अन्य डाक्टर मरीरों को बतौर ऑउटपेशेण्ट निपटा रहे थे। एक व्यक्ति ने उठ कर मुझे अपनी कुर्सी दे दी बैठने को। जैसे बस में अपंगों और महिलाओं को सीट दे देने का शिष्टाचार है; रेलवे में अफसर को अपनी सीट खाली कर देने का शिष्टाचार है। मुझे वह लाभ मिला। पर जल्दी ही मुझे दूसरे चेम्बर, जहां डेण्टिस्ट के काम करने के लिये बड़ी रिक्लाइनिंग सीट-कम-बिस्तर लगे थे, में बैठने के लिये जगह मिल गयी। उस चेम्बर में उपकरण नये थे। बिस्तर पर अभी नया पॉलीथीन कवर भी नहीं उतरा था। कुल मिला कर काफ़ी आधुनिक डेण्टल क्लीनिक का एम्बियेन्स दे रहा था वह चेम्बर। डाक्टर हाण्डू एक रिक्लाइनिंग सीट पर लेटे एक मरीज के दांतों की मरम्मत करने में व्यस्त थीं। उनके मुंह पर डाक्टरी मास्क लगा था। वे यदा कदा मरीज को या अपने सहायक को निर्देश में कुछ कह रही थीं। मुझे कुछ मायूसी हुई कि पॉल थरू के पुस्तक की डाक्टर इसिल इव्सिमिक की तरह रनिंग कमेण्ट्री नहीं दे रही थीं। 😦

जल्दी ही मेरा नम्बर आ गया। मुझे उस चेम्बर में उपलब्ध दूसरी सीट पर रिक्लाइन करने को कहा गया। डाक्टर हाण्डू ने मेरे दांतों का मुआयना किया और मेरी समस्या पूछी।

कुछ महीनों से आगे के नीचे और ऊपर के दांतों में ठण्डा या गरम के कॉण्टेक्ट में आने पर तेज अहसास होता है। अदरवाइज़ दर्द नहीं होता।

डाक्टर ने दांतो को ठक ठक ठोंकते हुये पूछा – दर्द होता है?

नहीं, केवल ठण्डा-गर्म से तकलीफ है।  

दांतों में कीड़ा लग गया है।

दांत के कीड़े की परिकल्पना
दांत के कीड़े की परिकल्पना

मुझे मन ही मन यह लगा कि कोई कीड़ा है जो दांतों में घुसा खाये जा रहा है दांतों को। मैने मेण्टल नोट किया कि बाद में इस कीड़े को इण्टरनेट पर तलाश करूंगा। बाद में तलाश करने पर पता चला कि ऐसा कोई कीड़ा नहीं है। चीनी या अन्य खाद्य पदार्थों से पैदा होने वाले अम्ल में पनपने वाले बेक्टीरिया दांतों का कैविटी या केरीज (cavity, caries) के रूप में क्षरण करते हैं। उसे ही सामान्य भाषा में कीड़ा लगना कहा जाता है। दांत या चमड़ी के डाक्टरों को मैने जन सामान्य को समझाने के लिये मैडिकल जार्गन रहित भाषा का प्रयोग करते पाया है – जैसे डाक्टर हाण्डू ने कीड़ा का प्रयोग किया या जैसे बहुत पहले एक चर्म रोग विशेषज्ञ मुझे डर्मेटाइटिस के सुधार के बारे में कहते थे कि “चार आना भर” सुधार हो गया है।


दांतों में समस्या भारतीय लोगों में पान-तम्बाकू खाने के कारण अधिक होती है। लोगों में मीठा खाने की प्रवृत्ति कम है। पर मेरे साथ पान खाने का कोण नहीं है। अलबत्ता मीठा बाभन नहीं खायेगा तो कौन खायेगा! 🙂
मुझे बताया गया कि दवाओं के लम्बे समय तक सेवन से भी हड्डियों (जिनमें दांत भी शामिल हैं) में क्षरण होता है। वह भी एक कारण हो सकता है मेरे साथ।


दांतों में दर्द न होने के कारण डाक्टर ने सफाई कर दांत की फिलिंग का निर्णय किया। उन्होने मुझे बाद में बताया कि अगर फिर भी ठण्डा-गर्म की सेन्सिटीविटी (आम भाषा में “पानी लगना”) होती है तो वे आर.सी.टी. (root canal treatment) करेंगी। दांतों की सफ़ाई और फिलिंग की प्रक्रिया में मुझे कई बार थूकना पड़ा। पानी या दवाओं की फुहार, खुरचने की क्रिया, फिलिंग की तकनीक – सभी मेरे मुंह पर अजमायी जा रही थीं और मेरे मन में यह था कि अगर इस सब की एक फिल्म बनती जो मैं बाद में देख पाता तो वह मुझे काफ़ी इनसाइट देती डेण्टिस्ट्री के बारे में। अन्यथा मैं तो लेटा लेटा यदा कदा दीवार पर टंगी उस सफ़ेद स्वस्थ दांत वाली सुन्दर लड़की का फोटो ही देख पा रहा था, या फिर डाक्टर के उस असिस्टेण्ट को; जिसके सिर के पृष्ठ भाग में उसको सवर्ण घोषित करती उसकी छोटी चोटी थी, जो छोटे खिचड़ी रंगत के बालों का अधेड़ था, जो काम दक्षता से कर रहा था पर शक्ल सूरत से देहाती लग रहा था – मेरी तरह!

अपने इण्ट्रोवर्ट नेचर के विपरीत मैं वहां अधिकधिक सम्प्रेषण की अपेक्षा कर रहा था – जो मिला नहीं। यह मेरी डाक्टर के साथ पहली सिटिंग थी। इसमें मेरे नीचे के दांत की फिलिंग हुई। शनीवार को दूसरी सिटिंग है, जिसमें ऊपर के दांत की फिलिंग होनी है। शायद उस दिन मैं डाक्टर हाण्डू से कुछ प्रश्न कर पाऊं।

दूसरी सिटिंग

शनिवार को नियत समय पर पंहुच गया। इन्तजार करते समय मेरे बगल में मैले कुचैले कपड़े पहने, चारखाने का स्कार्फ़ जैसा गमछा सिर पर बांधे एक वृद्ध बैठा था। हाथ में एक पतली सी बांस की लकड़ी थी जो ठीक से न संभालने के कारण यदाकदा गिर जाती थी। हाथ में अपने कागज लिये, लम्बी प्रतीक्षा के लिये तैयार बैठा था वह।

दीवार पर दांतों को दिखाते हुये विज्ञापनी महिला का चित्र था – किसी Glizer कम्पनी का। देखने वाले को निहारती हंसती महिला अपने स्वस्थ दांत दिखा रही थी। पर देखने वाला मेरे जैसा इनफ़ीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स वाला हो तो उसे लग सकता है कि अपने अच्छे दांतों से वह चिढ़ा रही है। वहां बैठे मैं बहुत जल्दी उकताने लगा।

डाक्टर हाण्डू एक महिला के दांतों की डेण्टिस्ट्री में व्यस्त थीं। ॒अपने महीन स्वर में यदा कदा अपने सहायक या उस महिला को निर्देशात्मक कुछ कहती थीं। आज सहायक कोई दूसरा व्यक्ति था – परसों वाले से ज्यादा स्मार्ट।

मुझे ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ा और सिटिंग में भी ज्यादा समय नहीं लगा। मैने बताया कि पिछली सिटिंग के बाद नीचे के दांतों में मुझे पानी लगने की समस्या नहीं हुयी। एक आध बार लगा कि हल्का सेनसेशन है, पर वह शायद ऊपर वाले दांतों का सेनसेशन नीचे वाले दांतों का होने का समझने की मेरी गलती भी हो सकती है। डाक्टर को शायद मेरा यह तर्क सही न लगा। पर उन्होने बिना समय गंवाये मेरे ऊपर के दो दांतों की सफ़ाई-घिसाई और फिलिंग का काम लगभग बीस मिनट में पूरा कर लिया।

डाक्टर मंजुलता हाण्डू
डाक्टर मंजुलता हाण्डू

डाक्टर हाण्डू ने काम पूरा कर अपना मास्क उतारा तो पहली बार मैने उनका चेहरा देखा। उनकी अनुमति मांगी कि उनका एक फोटो अपने ब्लॉग के लिये ले लूं? और जैसा एक घुटा हुआ ब्लॉगर करता है – इससे पहले कि सामने वाला व्यक्ति अपनी सहमति या विरोध दर्ज करे, मैं उनका चित्र ले चुका था। उन्हे मैने बताया कि इस सिटिंग्स के बारे में मैं एक पोस्ट लिखूंगा और उन्होने कहा कि भविष्य में कभी भी आवश्यकता हो तो मैं उनके डेण्टल क्लीनिक पर आ सकता हूं।

मेरे मन में पहले यह धारणा थी कि डेण्टल डाक्टर के पास जाने का मतलब ही होता है लगभग 80% सम्भावना कि दांत उखाडा जायेगा और कुछ दिन तक भीषण दर्द रहेगा या फिर चेतावनी मिल जायेगी कि आपके सही तरीके से दांतों की देखभाल न करने से उनकी की आयु लगभग समाप्त है… पर वैसा नहीं हुआ। डाक्टर की दांतों की दक्ष फ़िलिंग के बाद अब काफी समय तक मुझे परेशान नहीं होना होगा। उनके कहे अनुसार सॉफ्ट ब्रश और हल्के से मंजन की शुरुआत मुझे करनी है।

बाकी, दांतों की फिलिंग लगभग कितना चलेगी, यह डाक्टर हाण्डू से पूछना भूल गया…

लिमिटेड हाइट सब वे (Limited Height Sub Way)


चौखट को अंतिम टच।

रेल की पटरियों को काटते हुये सड़क यातायात निकलता है और जिस स्थान पर यह गतिविधि होती है, उसे लेवल क्रॉसिंग गेट (समपार फाटक) कहा जाता है। समपार फाटक रेल (और सड़क) यातायात में असुरक्षा का एक घटक जोड़ देते हैं।

जैसे जैसे रेल और सड़क यातायात बढ़ रहा है, उनके गुणे के अनुपात में समपार फाटक की घटनाओं/दुर्घटनाओं की संख्या बढ़ रही है। अगर दुर्घटनायें नहीं भी होती, तो भी सड़क वाहन द्वारा समपार फाटक क्षतिग्रस्त करने की दशा में सुरक्षा नियमों के अंतर्गत ट्रेनों की गति कम करनी पड़ती है और रेल यातायात प्रभावित होता है।

रेलवे का बस चले तो सभी समपार बन्द कर या तो ओवरब्रिज बना दिये जायें, या अण्डरब्रिज। पर ओवरब्रिज बनाना बहुत खर्चीला है और परियोजना पूरा होने में बहुत समय लेती है। यह तभी फायदेमन्द है जब समपार पर रेलxरोड का यातायात बहुत ज्यादा हो। इन परियोजनाओं में रेलवे और राज्य प्रशासन की बराबर की भागीदारी होती है। बहुधा दोनों के बीच तालमेल के मुद्दे बहुत समय ले लेते हैं।

इनकी बजाय कम ऊंचाई की पुलिया (लिमिटेड हाइट सब-वे) बनाना ज्यादा आसान उपाय है। तकनीकी विकास से यह कार्य त्वरित गति से किया जा सकता है।

लिमिटेड हाइट सब वे (एलएचएस) बनाने की एक तकनीक कट एण्ड कवर की है। इसके लिये पांच छ घण्टे के लिये रेल यातायात रोक दिया जाता है। इस समय में चौकोर गढ्ढा खोद कर उसमें पुलिया के आकार की प्री-फेब्रीकेटेड कॉंक्रीट की चौखट फिट कर दी जाती है। इन्ही पांच छ घण्टे में चौखट के आस पास मिट्टी भर कर उसके ऊपर रेल पटरी पूर्ववत बैठा दी जाती है। छ घण्टे बाद रेल यातायात निबाध गति से प्रारम्भ हो जाता है।

इस चौखट में सड़क बिछाने का काम रेल यातायात को बिना प्रभावित किये पूरा कर लिया जाता है। कुछ ही दिनों में बिना समपार फाटक के सड़क यातायात निर्बाध चलने लगता है।

रेलवे ने इस तरह के कट एण्ड कवर तकनीक से बहुत से समपार फाटकों को एलएचएस बना कर समाप्त करने की योजना बनाई है। इस योजना के अंतर्गत हमारे झांसी मण्डल में ग्वालियर और झांसी के बीच आंत्री और सन्दलपुर के बीच अप लाइन (ग्वालियर से झांसी जाने वाली) पर एक समपार को इस तकनीक से इसी महीने बदला गया। इस तकनीक से उत्तर मध्य रेलवे पर यह पहला कार्य था। छ अप्रेल के दिन सवेरे सात बजे से सवा बारह बजे के बीच यह कार्य किया गया। इस दौरान कुछ सवारी गाड़ियां डाउन लाइन (झांसी से ग्वालियर जाने वाली) की रेल पटरी से निकाली गयीं।

कार्य विधिवत और समय से सम्पन्न हुआ। मेरे झांसी रेल मण्डल के वरिष्ठ मण्डल परिचालन प्रबन्धक श्री एखलाक अहमद ने मुझे इस कार्य के चित्र भेजे हैं, जिन्हे आप नीचे स्लाइड-शो में देख कर अनुमान लगा सकते हैं कि किस प्रकार यह कार्य सम्पन्न हुआ होगा।    

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हिन्दी वाले और क्लाउट


क्लाउट (Klout.com) सोशल मीडिया पर सक्रियता का एक सशक्त इण्डेक्स है। यह 2008 से इण्टरनेट पर लोगों की सक्रियता माप रहा है। इसकी वेब साइट के अनुसार यह आपकी एक्शन करा पाने की क्षमता का आकलन करता है। जब आप इण्टरनेट पर कुछ सृजित करते हैं तो सोशल नेटवर्क से उसके बारे में जानकारी एकत्र कर आपका प्रभाव जांचता है। यह यह जांचता है कि आप कितने लोगों को प्रभावित करते हैं (True Reach); आपका उनपर कितना प्रभाव पड़ता है (Amplification) और आपका सोशल मीडिया पर जो तंत्र बना है, वह कितना प्रभावी है (Network Impact)|

klout

इण्टरनेट पर आपका प्रभाव जांचने के कुछ और भी इण्डेक्स हैं, पर क्लाउट उन सब में ज्यादा इस्तेमाल किया जाने वाला लगता है।

इसका प्रयोग करने के लिये आपको क्लाउट पर अपने फेसबुक या ट्विटर आई.डी. से लॉग-इन करना होता है और नेट पर अपनी उपस्थिति के सूत्र – मसलन ब्लॉगर, वर्डप्रेस, यू-ट्यूब, फ्लिकर, गूगल+ आदि की आईडेण्टिटी बतानी होती है। उसके बाद यह नेट पर आपकी सामग्री सर्च कर आपकी सक्रियता का इण्डेक्स बताता है।

मुझे लगता था कि इण्टरनेट पर हिन्दी ब्लॉगर्स और कालांतर में फेसबुक पर हिन्दी वालों का अपना समूह तो है, पर दिग्गज प्रभुत्व तो अंगरेजी वालों का है। ट्विटर पर हिन्दी वाले मात्र अपना तम्बू बनाये हैं जिसपर मौलिक ट्वीट्स की बजाय अपनी ब्लॉग पोस्टों की सूचना भर देते हैं।

पर जब मैने क्लाउट पर अपने आप को रजिस्टर किया तो पाया कि एक सीमित नेटवर्क होने के बावजूद मेरा क्लाउट स्कोर कई दिग्गजों के समकक्ष या अधिक ही है। मसलन सुब्रह्मण्य़ स्वामी (क्लाउट स्कोर 71), बिबेक देबरॉय (56), न्यूयॉर्क टाइम्स के पॉल क्रूगमैन (65) और थॉमस फ्रीडमैन (68) की तुलना में मेरा वर्तमान क्लाउट स्कोर (65-68) अच्छा ही माना जायेगा।

अभी मैने पाया कि संजीत त्रिपाठी, गिरिजेश राव, प्राइमरी के मास्टर प्रवीण त्रिवेदी और विवेक रस्तोगी क्रमश 58, 66, 60 और 65 के स्कोर के साथ क्लॉउट पर सशक्त उपलब्धि रखते हैं। इन लोगों की फेसबुक पर उपस्थिति जब से क्लॉउट पर दर्ज हुई है, इनका क्लॉउट स्कोर 15-20 से दन्न से बढ़ कर 60 को छूने लगा।

कुल मिला कर हिन्दी वालों का नेटवर्क भले ही छोटा हो, उसकी प्रभावोत्पादकता का इण्डेक्स बहुत अच्छा है। यह मैने पाया है कि दिन भर ट्विटर-फेसबुक पर चफने रहने वाले अंगरेजी वाले मित्रों की तुलना में उनका क्लॉउट स्कोर कहीं ज्यादा है।

बेहतर होगा अगर हिन्दी वाले अपना तामझाम क्लॉउट पर दर्ज करायें और हिन्दी नेटवर्क को और पुष्ट करें!

इंफ्रा-रेड कैमरा और कर्षण विद्युत उपकरण का रखरखाव



हम रेलवे उपकरणों की विफलता पर एक पावरप्वॉइण्ट बना रहे थे| उस समय कर्षण विद्युत उपकरण (over head transmittion equipment – OHE)  की विफलता कम करने के लिये इंफ्रा-रेड (थर्मोग्राफिक) कैमरे के प्रयोग की तकनीक का जिक्र हमारे मुख्य विद्युत अभियंता महोदय ने किया।

मेरे अनुरोध पर उन्होने अगले दिन इलाहाबाद रेल मण्डल के एक कर्मी को मेरे पास यह कैमरा दिखाने को भेजा। इसके पहले मैने इंफ्रा रेड कैमरे का नाम सुना था और यह सोचता था कि अन्धेरे में जासूसी इत्यादि गुह्य कर्म के लिये उनका उपयोग होता होगा। पर अब पाया कि दिन के समय, कर्षण विद्युत उपकरणों के विद्युत परिवहन से गर्म होते बिन्दुओं (hot spots) की जानकारी लेने के लिये भी इनका प्रयोग होता है!

कर्षण बिजली 25 किलो वोल्ट पर रेल ट्रैक के ऊपर से गुजरती है। बिजली के इंजन का पेण्टोग्राफ इसको छूता हुआ गुजरता है और इन तारों से ऊर्जा पा कर रेल गाड़ी खींचता है। इसकी पूरी प्रणाली में अनेक उपकरण आते हैं और उनमें गुजरने वाली बिजली उनको ऊष्मित करती रहती है। कोई हिस्सा ज्यादा गर्म हो कर टूट सकता है, या अन्य खराबी उत्पन्न कर सकता है। इंफ्रा-रेड कैमरे से इन भागों का तापक्रम जांच कर समय रहते रखरखाव की प्रक्रिया की जा सकती है।

इंफ्रा-रेड कैमरे में किसी भी चित्र के दो बिन्दु तय किये जा सकते हैं। एक रेफरेंस बिन्दु, जिसके सापेक्ष अन्य बिन्दुओं का तापक्रम लिया जा सके और दूसरा चल बिन्दु। कैमरा सेट कर कर्सर घुमाते हुये विभिन्न बिन्दुओं का तापक्रम विद्युत कर्मी नोट करता चलता है। इस तापक्रम के आंकड़ों से उपकरणों की रखरखाव की जरूरत तय होती है।

मैने श्री आर. के. मेहता, मुख्य विद्युत अभियंता, उत्तर-मध्य रेलवे से पूछा कि वे इस इंफ्रा-रेड कैमरे का कितना उपयोग कर रहे हैं? श्री मेहता का कहना था कि पिछले एक साल से उनका कर्षण विद्युत विभाग इसका प्रयोग कर रहा है। सब-स्टेशन और अन्य स्थाई लोकेशन पर इसका अच्छा फीडबैक मिला है और उससे प्रिवेण्टिव मेण्टीनेंस की गुणवत्ता बढ़ी है। पर इस कैमरे से चलती गाड़ी से ऊपर के तारों का अध्ययन नहीं हो पाता। उसके लिये एक मंहगा कैमरा रिसर्च एण्ड डेवलेपमेण्ट ऑर्गेनाइजेशन ने खरीदा है और वे प्रयासरत हैं कि उस कैमरे से तापक्रम रिकॉर्डिंग सर्वप्रथम उत्तर-मध्य रेलवे पर ही हो। यह मंहगा कैमरा ट्रेन के इंजन के ऊपर लगाया जा सकता है और ट्रेन की चलती दशा में तापक्रम रिकॉर्डिग करने में यह सक्षम है। आशा करें कि यह प्रयोग भी शीघ्र होगा।

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बायोडाइजेस्टर टॉयलेट – प्रयोग पर फीडबैक



बायोडाइजेस्टर टॉयलेट पर पिछली पोस्ट का अंश

मैने एक पोस्ट तीन महीने पहले लिखी थी – बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस और बायोडाइजेस्टर टॉयलेट। इसमें रेलवे द्वारा बुंदेलखण्ड एक्सप्रेस में नये प्रकार के टॉयलेट्स प्रयोग में लाने के बारे में था। मैने लिखा था –

(यह बायोडाइजेस्टर) बैक्टीरिया सियाचिन ग्लेशियर पर सेना के टॉयलेट्स का ठोस अपशिष्ट पदार्थ क्षरित करने के लिये प्रयोग में लाया जाता है। इतनी सर्दी में अपशिष्ट पदार्थ क्षरित करने में अन्य कोई जीवाणु काम नहीं करता।

अब यह बेक्टीरिया रेलवे प्रयोग कर रहा है अपने ट्रेनों के टॉयलेट्स में। ट्रायल के तौर पर बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस के 23 कोच इसके प्रयोग के लिये तैयार हैं और 17 जनवरी से चल भी रहे हैं।

श्री अशोक मिश्र

मुझे इसके प्रयोग के बारे में मेरे मित्र श्री अशोक मिश्र ने बताया था जो उत्तर-मध्य रेलवे के कोच और वैगनों के मुख्य अभियंता (Chief Rolling Stock Engineer) हैं।

श्री मिश्र से मैने अब उनसे इस तकनीक के कार्य करने के बारे में फीडबैक देने का अनुरोध किया।

सामान्यत: कोई भी नया प्रयोग एक दो महीने में दम तोड़ने लगता है। पर श्री मिश्र ने बताया कि उन्होने स्वयं बुन्देलखण्ड एक्सप्रेस के रेक का निरीक्षण ग्वालियर में किया था। कुल तीन डिब्बों में एक एक टॉयलेट (कुल तीन) में मल डिस्पोजल रुका हुआ पाया गया। इनमें लोगों द्वारा फैंके गये पॉलीथीन के बैग और कपड़ा आदि पाये गये। एक एक लीटर की प्लास्टिक की बोतल भी फैंकी मिली।

निश्चय ही, इस प्रकार की चोकिंग होने पर  बायोडाइजेस्टर काम ही नहीं कर सकता। उल्टे यह भी सम्भव है कि बेक्टीरिया अपशिष्ट के अभाव में मर ही जाये!

[पर सन्तोषप्रद बात यह थी कि नब्बे प्रतिशत टॉयलेट्स में यह प्रणाली ठीक ठाक कार्य कर रही थी। और सम्भवत: रेलवे कई अन्य गाड़ियों में यह प्रणाली लगाने की सोच रही है। उत्तर-मध्य रेलवे भी इस प्रणाली के अन्य गाड़ियों में प्रयोग के पक्ष में है।]

मुझे विश्वास नहीं हुआ कि लोग प्लास्टिक या बोतल फैंक सकते हैं टॉयलेट्स में। अत: मैने मिश्र जी से अनुरोध किया कि वे मुझे चित्र उपलब्ध करायें इन टॉयलेट्स के। और वाकई, चित्र देख कर लोगों की सिविक सेंस पर खीझ होती है।

आप एक कमोड का चित्र देखें, जिसमे बोतल डाली हुई पाई गई (बाकी चित्र नहीं लगा रहा पोस्ट पर, चूंकि वे कहीं ज्यादा अरुचि उपजाते हैं मन में!)

[ई-स्वामी की  भावनाओं के अनुसार चित्र हटा दिया है।]


इलाहाबाद में सीवेज-लाइन बिछाने का काम



लोग जहां रहते हों, वहां मल विसर्जन की मुकम्मल व्यवस्था होनी चाहिये। पर यहां यूपोरियन शहर कस्बे से शहर और शहर से मेट्रो/मेगापोली में तब्दील होते जा रहे हैं और जल मल सीधा पास की नदी में सरका कर कर्तव्य की इतिश्री समझ ले रही हैं नगरपालिकायें। लोगों को भी इस में कुछ अनुचित नहीं लगता, बावजूद इसके कि वे नदियों को धर्म से जोड़ते हैं।

गंगा भी इसी तरह से गन्दा नाला बनती जा रही हैं। दिल्ली के पास यमुना इसी तरह से गन्दा नाला बनी।

लगता है कि हाईकोर्ट की लताड़ पर कुछ चेत आई है शहरी प्रशासन को। केन्द्र और राज्य सरकार की बराबर की भागीदारी से सीवेज लाइन बिछाने का काम चल रहा है जोर शोर से। इलाहाबाद में चल रहा है। सुना है बनारस और लखनऊ में भी चल रहा है। शायद अन्य शहरों में भी चल रहा हो।

इस काम के चलते कई समस्यायें सामने आ रही हैं:-

  1. पूरे शहर में खुदाई के कारण धूल-गर्दा व्याप्त है। लोगों को श्वास लेने में कठिनाई हो रही है।
  2. सड़क यातायात अव्यवस्थित हो गया है। लोग वैसे भी ट्रैफिक कानून का पालन नहीं करते। अब जब अवरोध अधिक हो रहे हैं, ट्रैफिक जाम उसके अनुपात से ज्यादा ही बढ़ रहा है।
  3. जहां सीवेज लाइन बिछ गयी है, वहां कच्ची सड़क जस की तस है। सड़क बनाने की कार्रवाई हो ही नहीं रही। कुछ महीनों में वर्षा प्रारम्भ होगी तब कीचड़ का साम्राज्य हो जायेगा सड़क पर।
  4. कई अपेक्षाकृत कम रसूख वाले इलाके, जहां जल-मल की गन्दगी सामान्य से ज्यादा है, वे सीवेज लाइन क्रांति से अछूते ही रह रहे हैं। उदाहरण के लिये मेरा इलाका शिवकुटी जहां मात्र दस पन्द्रह प्रतिशत घरों में सेप्टिक टैंक होंगे और शेष अपना मल सीधे गंगा में ठेलते हैं – में कोई सीवेज लाइन नहीं बन रही।
  5. मेरे जैसे व्यक्ति, जिसे लगभग पौने दो घण्टे कम्यूटिंग में लगाने पड़ते हैं रोज; को लगभग आधा घण्टा और समय बढ़ाना पड़ रहा है इस काम में – ट्रैफिक जाम और लम्बा रास्ता चयन करने के कारण।

अच्छा लग रहा है कि अजगरी नगर पालिकायें कुछ सक्रिय तो हुई हैं। फिर भी, अगर ठीक से भी काम हुआ, तो भी चार-पांच साल लगेंगे इस प्रॉजेक्ट को पूरा होने में। तब तक शहर वाले झेलेंगे अव्यवस्था। पर उसके बाद की सफाई से शायद शहर की दशा कुछ सुधरे और गंगा की भी! या शायद न भी सुधरे। पांच साल की अवधि गुड़-गोबर करने के लिये पर्याप्त होती है।

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[सभी चित्र घर और दफ्तर की यात्रा में चलते वाहन से मोबाइल फोन द्वारा लिये गये हैं]

भयंकर शंका बड़ा भारी खर्च हो रहा है सीवेज लाइन बिछाने में। पर जिस गुणवत्ता की नगरपालिकायें हैं, उनसे लगता है कि अन-ट्रीटेड जल-मल इन सीवेज लाइनों से सीधे गंगा में जायेगा। अगर टीटमेण्ट प्लॉण्ट लगे भी तो कुछ सालों में काम करना बन्द कर देंगे। तब आज की अपेक्षा कहीं ज्यादा जहरीली गन्दगी पंहुचेगी गंगा नदी में।

इसकी बजाय हर घर में (या घरों के समूह में) अगर सेप्टिक टैंक हो तो यह समस्या सरलता से हल हो सकती है। तब मल डिस्पोजल भी नहीं करना पड़ेगा और कुछ सालों बाद खाद भी बन जाया करेगी।

मेरे घर में दो सेप्टिक टैंक थे। अभी हमने एक छोटे सेप्टिक टैंक की जगह बड़ा दो चेम्बर वाला सेप्टिक टैंक बनवाया है। हमें तो अपने घर के लिये सीवेज लाइन की दरकार है ही नहीं!