गोधना का शिव मंदिर – सारनाथ

देखने में 10-11वीं सदी का छोटा और अत्यन्त सुन्दर मन्दिर नजर आता है। आक्रान्ताओं के भंजन का शिकार।


यह, गोधना गांव, जिला मिर्जापुर, उत्तरप्रदेश में आर्कियॉलॉजिकल सर्वे का प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेण्ट है। देखने में 10-11वीं सदी का मंदिर नजर आता है। कभी किसी आक्रांता (?) ने इसकी सभी मूर्तियां खण्डित कर दीं। आधुनिक काल में इसका पुनर्स्थापन हुअ। कगूरा नया बना है – तो माना जा सकता है कि कगूरा तोड़ दिया गया था। मंदिर की बाहरी दीवारों पर जो नक्काशी है, वह बहुत सीमा तक बरकरार है – उसमें मूर्तियां लगभग नहीं उकेरी गयी थीं। सो आक्रांताओं ने उसको तोड़ने में अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं की।

मंदिर के समक्ष नंदी की खण्डित प्रतिमा।

छोटा और बहुत सुंदर मंदिर है यह। इसका ढांचा कायम है – यही गनीमत। अब एएसआई के सौजन्य से परिसर का सौंदर्येकरण कर दिया गया है। साफ सफाई उपयुक्त है और पण्डा लोगों का अतिक्रमण नहीं है।

यह सारनाथ मंदिर कहाता है – पर यह शिव मंदिर है; बौद्ध तीर्थस्थल सारनाथ नहीं। यह मिर्जापुर जिले में है। वाराणसी में नहीं।

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जोगी बाबा – सिद्धिनाथ मन्दिर का साधू और अनाथ गौवंश को पालनेवाला

पिछले दो साल से इस इलाके में साइकिल से घूम रहा हूं मैं, पर राजकुमारनाथ (जोगी बाबा) जैसा विलक्षण व्यक्ति नहीं पाया मैने।


नाम है राजकुमारनाथ योगी। लोग जोगी बाबा कहते हैं। कुछ वैसा ही जैसे मुख्य मन्त्री जी हैं आदित्यनाथ योगी।

आदित्यनाथ की तरह राजकुमार नाथ भी नाथपन्थी साधू है। सारंगी बजा कर भिक्षा मांगने वाला।

आदित्यनाथ की तरह यह साधू भी लगभग 45-46 साल का है।

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माताप्रसाद – कड़ेप्रसाद और शीतला माता का मंदिर


नवरात्रि पर्व के पहले दिन मैं तुलापुर गांव में शीतला माता के मन्दिर गया था। यह मन्दिर जीर्णोद्धार कर बनाया गया है। मूर्तियों से लगता है कि सैकड़ों या हजार साल का रहा होगा वह मंदिर। खण्डित मूर्तियां भी रखी हैं वहां।

वैसे यह पूरा इलाका शुंग और कुषाण कालीन अवशेषों से भरा पड़ा है। मेरे पुरातत्ववेत्ता मित्र डा. रविशंकर ने बताया कि यहां पास में गंगा के प्रवाह से एक बैकवाटर की झील थी और उसके किनारे 600बीसीई की बस्ती थी।

DSC_1069<[शीतलामाता के पुराने मन्दिर पर के दीवार पर जड़ी मूर्तियां ऐसी हैं]

पर इसी पुराने मन्दिर के पास लगभग तीस साल पहले का बना शीतला माता का एक नया मन्दिर है – महराजगंज-चौरी की दो लेन की सड़क पर। वहां मिले थे कड़े प्रसाद। उनकी मिठाई की दुकान है। बगल की उन्ही की जमीन पर यह मन्दिर बनाया गया है। उन्ही की जमीन पर मन्दिर और चाय-मिठाई की दुकान – यह बिजनेस का बहुत शानदार मॉडल है। बहुत कुछ वैसा ही जैसे महानगरों में गाय और चारा ले कर बैठा व्यक्ति जिससे चारा खरीद कर उसी की गाय को लोग खिलाते हैं। लोगों की श्रद्धा का व्यवसाय।

आज कड़े प्रसाद और उनके बड़े भाई माता प्रसाद मिले दुकान पर। माता प्रसाद ने ही अधिकांश बात की। कड़े प्रसाद मात्र संपुट दे रहे थे।

DSC_1083[शीतलामाता का माताप्रसाद-कड़ेप्रसाद की जमीन पर बना नया मन्दिर]

माता प्रसाद ने बताया कि मन्दिर यद्यपि उनकी जमीन पर बना है, पर बनाने में आस पास के लोगों का भी पर्याप्त सहयोग मिला है। हर साल वे गुरुपूर्णिमा पर भण्डारा भी करते हैं। उसमें भी बहुत से लोगों का सहयोग होता है। कड़े प्रसाद ने जोड़ा – भण्डारे में करीब 8-9 क्विण्टल बुन्दिया बनती है। दस हजार लोग खाते होंगे भण्डारे में।

माताप्रसाद की अम्माजी (बकौल उनके) 108 साल की हैं। सत्तर के दशक में जब मन्दिर बना था तो उसमें आग्रह अम्माजी का ही था। शीतला माता ने उन्हें ही सपने में आदेश दिया था मन्दिर बनाने के लिये। वे शीतलामाता की बड़ी भक्त हैं। (बकौल माताप्रसाद) उनके सिर पर माता आती भी थीं और तब अम्माजी ट्रान्स में चली जाया करती थीं। अब तो वे बहुत वृद्ध हो गयी हैं। चला फिरा भी नहीं जाता। अब मन्दिर की पूजा का सारा भार माताप्रसाद के तीसरे भाई जिलाजीत के जिम्मे है।DSC_1142[माताप्रसाद (दांयें) और कड़ेप्रसाद। अपनी दुकान के बाहर]

परिवार का मुख्य उद्यम यह मिठाई/चाय की दुकान है। दुकान माताप्रसाद देखते हैं। कड़े प्रसाद को दुकान पर बैठना नहीं रुचता। वे मिठाई और नमकीन बनाते हैं और गाड़ी से घूम घूम कर बेचते हैं।

दुकान से एक किलो नमकीन मैने खरीदा भी। सस्ता है। 120रु किलो। कड़े प्रसाद ने बताया कि रोफ़ाइण्ड तेल में बना है (पामोलीन में नहीं)। कड़े प्रसाद हमारे गांव में भी आते हैं मिठाई नमकीन बेचते। “लोटन गुरू (गांव के प्रसिद्ध ओझा) के यहां भी आता हूं मैं।”

नवरात्रि व्रत के कारण मैने तो नहीं खाया नमकीन पर घर पर लोगों ने चखकर बताया कि स्वाद अच्छा है।

परिवार के दो लडके अंकलेश्वर (गुजरात) में मिठाई की दुकान खोले हैं। कड़े प्रसाद से मिठाई बनाना सीखा है उन्होने। लोग गुजरात में मेहनत मजदूरी के लिये जाते हैं, पर माताप्रसाद-कड़ेप्रसाद के बच्चे गुजरात गये हैं बिजनेस करने।

बिल्कुल देसी दिखने वाले भाई हैं। देसी परिवेश। पर उनके बिजनेस सेंस पर तो किसी मैनेजमेण्ट संस्थान में भाषण दिया जा सकता है। मैं तो प्रभावित हो गया उनसे। जहां इस पूर्वांचल में हर व्यक्ति सरकारी नौकरी तलाश रहा है, वहां इस विश्वकर्मा परिवार का मिठाई-नमकीन व्यवसाय बहुत आकर्षक लगा।


दण्डीस्वामी डा. विद्यानन्द सरस्वती – गुन्नीलाल पाण्डेय के गुरु जी – से मुलाकात


कल अगियाबीर का गंगातट देखने के बाद हम (राजन भाई और मैं) गुन्नीलाल पाण्डेय जी के घर पंहुचे। गुन्नी रिटायर्ड स्कूल अध्यापक हैं। सम्भवत: प्राइमरी स्कूल से। मेरी ही उम्र के होंगे। एक आध साल बड़े। गांव के हिसाब से उनकी रुचियाँ परिष्कृत हैं। बड़ा साफ सुथरा घर। तरतीब से लगाई गयी वनस्पति। चुन कर लाये गये गमले। एक गाय। पास ही में उनके खेत। पिता के अकेले लड़के और गुन्नीलाल का भी एक ही लड़का (संजय)। गुन्नी की तरह गुणी। नवोदय विद्यालय में अंग्रेजी का अध्यापक। संजय के भी एक लड़का और एक लड़की है। छोटा और सम्पन्न परिवार। एक ही घर में चार पीढ़ियाँ – गुन्नी के नब्बे वर्षीय पिताजी, गुन्नी दम्पति, संजय दम्पति और संजय के बच्चे – बहुत समरसता के साथ रहते हैं।

गुन्नीलाल जी से मिलने के बाद स्वभावत: उनसे मैत्री हो गयी है। अत: जब भी राजन भाई मुझसे उनके यहां चलने के लिये कहते हैं, मन में अटकाव महसूस नहीं होता। अन्यथा, सवेरे सैर के समय मैं मात्र प्रकृति/परिवेश दर्शन करना चाहता हूं; किसी के घर नहीं जाना चाहता।

गुन्नीलाल जी के द्वार पर स्वामीजी के प्रवचन के लिये बना मंच

गुन्नी के घर कल दृष्य बदला हुआ था। पता चला कि उनके गुरु जी आये हुये हैं पिछले चार दिन से। उनके लिये उनके दरवाजे पर एक मंच बना कर व्यासपीठ बनाया गया है। उसपर बैठ वे प्रवचन करते हैं। प्रवचन पिछले दिन लगभग सम्पन्न हो गया है। उस दिन समापन होना है कथा-कार्यक्रम का – दोपहर में।

गुन्नीलाल जी ने बताया कि गुरु जी गृहस्थ नहीं हैं। साधू भी सामान्य नहीं दण्डी स्वामी। दण्डीस्वामी अर्थात आदिशंकर की परम्परा वाले अद्वैतवादी साधू। दण्ड ग्रहण करने का अभिप्राय यह है कि वे ब्राह्मण रहे होंगे दीक्षा लेने के पहले।

मुमुक्षु आश्रम (वाराणसी) गये थे गुन्नीलाल। शायद एक गुरु की खोज में। “अब इतनी उम्र हो गयी है कि धर्म का जो पक्ष उपेक्षित रहा जीवन में, उसको केन्द्र में लाने के लिये कुछ करना था, इसलिये मैं वहां गया” – गुन्नीलाल बताते हैं। मुमुक्षु आश्रम में ही डा. विद्यानन्द सरस्वती जी से मुलाकात हुई उनकी। बातचीत कर सरस्वती जी को गुन्नीलाल जी ने कहा कि मन से उन्होने उन्हे अपना गुरु मान लिया है, अत: अपनी सुविधानुसार दीक्षा देने का कष्ट करे।

साल भर हुआ है गुन्नीलाल का दीक्षा ग्रहण किये हुये।

गुन्नी अपने को धन्य मानते हैं – उनके गुरु ब्राह्मण हैं, उसमें भी गृहस्थ नहीं, साधू और साधू में भी दण्डीस्वामी। अपने गुरु जी से उन्होने हमें मिलवाया भी। उनका बिस्तर एक तख्त पर था। उसी पर बैठे थे वे। पीछे उनका दण्ड दीवार के साथ खड़ा किया गया था।

मैने स्वामीजी से पूछा – यह दण्ड का क्या विधान है। क्या औपचारिकता?

स्वामी जी ने बताया कि आदि शंकर स्वयम शिव के अवतार थे, ऐसा कहा जाता है। समाज शैव-वैष्णव में विभक्त था। ऊपर से बौद्ध धर्म की बड़ी चुनौती थी। आदिशंकर को अवश्य लगा होगा सनातन समाज को एकीकृत करना आवश्यक है। दण्द नारायण का प्रतीक है। “दण्ड मात्रेण गृहीत्वा, नर नारायण भवति। (दण्ड धारण करने से नर नारायण हो जाता है)।” दण्ड धारण कर आदिशंकर ने शैव और वैष्णव समाज को एकीकृत कर दिया था।

अपने दण्ड के बारे मे‍ उन्होने बताया कि यह एक पहाड़ी बांस से बना है। उत्तम कोटि का होता है वह बांस। कोई छिद्र नहीं होते उसमें।

गुन्नीलाल पाण्डेय के गुरु डा. विद्यानन्द सरस्वती, दण्डीस्वामी जी। उनके बिस्तर के पीछे उनका दण्ड है दीवार के सहारे।

स्वामीजी ने आदिशंकर के शास्त्रार्थ – वाया कुमारिल्ल भट्ट, मण्डन मिश्र और उनकी पत्नी उभया भारती से शास्त्रार्थ – की कथा हमें विस्तार से सुनाई। यह भी बताया कि उभया भारती के साथ शास्त्रार्थ की तैयारी के लिये उन्होने एक राजा के शव/शरीर मे‍ं प्रवेश कर एक महीना गुजारा था और कामसूत्र-भाष्य की भी रचना की थी।

आदिशंकर ने कामसूत्र नामक ग्रन्थ की भी रचना की थी – यह मुझे पहले नहीं मालुम था। स्वामी जी ने  बताया कि वाराणसी की अमुक दुकान से मुझे आदिशंकर के आदिशंकर भाष्य, दिग्विजय सूत्र भाष्य और कामसूत्र भाष्य मिल सकते हैं। अनुवाद सहित।

विकीपेडिया पर ये भाष्य नही‍ लिखे है‍। सम्भवत विकिपेडिया को संशोधित करने की आवश्यकता हो। पर वह संशोधन मेरे जैसा शंकर के ग्रन्थों से अपरिचित व्यक्ति तो नहीं ही कर सकता। खैर, मेरी रुचि यह जानने में है कि शंकर जैसा अद्वैती आचार्य ने कामसूत्र में उस एक मास की राजा के शरीर में रह कर जान-परख कर क्या लिखा। पर मात्र 32 वर्ष की अवस्था मे‍ं इस संसार को इतना सब कुछ देने वाले आदिशंकर के लिये एक माह में काम की व्यापक अनुभूति कर लेना कठिन नहीं रहा होगा।

आपको ज्ञात है कि आदिशंकर ने कामसूत्र (या कामसूत्र भाष्य) नामक ग्रन्थ की भी रचना की थी?

रामप्रसाद दूबे, कांवरिया


अधिकांश कांवरिये समूह में थे। वह अकेला चला जा रहा था सवेरे सवा छ बजे। अपनी धुन में। उसके पास रंगबिरंगी कांवर भी नहीं थी। एक रस्सी से दो छोटे प्लास्टिक के जरीकेन लटकाये था कांधे पर। एक आगे और एक पीछे। कपड़े एक शंकरजी के छापे वाला टीशर्ट और नेकर, केसरिया रंग में, भी पुराने लग रहे थे। मुझे लगा कि वह अरुण की चाय की चट्टी पर रुकेगा; पर वह चलता चला गया। अभी यहां से बनारस 38 किलोमीटर दूर है। आज पूरा दिन तो लगेगा ही।

उससे मैने पूछा कब चले थे?

कल सवेरे दस बजे। प्रयागराज से। प्रयाग यानि संगम। दारागंज के पास से।

अब तक वह व्यक्ति नब्बे किलोमीटर चल चुका है एक दिन से भी कम हुआ। कैसे चला होगा?

मुझे लगा कि गलत सुना मैने। अत: फिर पूछा कल चले थे कि परसों?

कल। पास में 100रुपये थे। जल उठाया प्रयाग में तो चलते चले गये। पुल पार कर इस पार आने पर हुआ कि अब चाय पी लूं। चाय पी कर जब टटोला तो पाया कि सौ रुपये का नोट कहीं गिर गया था। उसके बाद तो लगा कि कहीं रुका भी क्या जाये। पैसे थे नहीं तो चलता चला गया। रात भर चलता रहा हूं।

अवधी में बोल रहा था वह व्यक्ति। मैने परिचय पूछा। नाम बताया रामप्रसाद दूबे (दूबे पर जोर दिया – “बाभन हई“)। गांव पांहों जिला मिर्जापुर। कहने को चार भाई हैं, पर अपना कोई नहीं। मांबापपत्नीबच्चे कोई नहीं है।

उसने मेरी संवेदना की नब्ज बहुत कस कर दबा दी थी अपना हाल और परिचय बता कर। मैने कहा चलो, चाय पी लिया जाये।

कटका पड़ाव की नुक्कड़ की दुकान पर बैठे हम। बैठने के पहले रामप्रसाद ने अपने जरीकेन चाय की दुकान की मड़ई के बांस पर लटका दिये।

मैने एक कुल्हड़ चाय पी। उसे दो कुल्हड़ पिलाई। चाय पीते हुये रामप्रसाद ने बताया कि उनकी शादी हुई थी; पर साल भर में ही पत्नी चल बसी। टीबी थी उसे शायद। लोगों ने बात छुपा कर शादी कर दी थी। पत्नी के मरने के बाद दूसरी शादी नहीं की उन्होने।

करते क्या हो?

दो पंड़िया हैं। उन्ही को पालता हूं। अभी पड़ोस वाले को सहेज कर आया हूं। चाराकबार (भूसा) का इन्तजाम कर। खेतीजमीन नहीं है। थोड़ी जजमानी है। उसी से काम चलता है। जजमान भी जब बुलाते हैं तभी जाता हूं।

मैं जितना रामप्रसाद को सुन रहा था, उतना संवेदित हुये जा रहा था। … गांवदेहात में ऐसे आदमी की भी जिन्दगी चल रही है। इतनी विपन्नता का भाव अगर मुझे एकआध घण्टे के लिये भी हो जाये तो शायद अवसाद में पागलपन का दौरा सा पड़ जाये! यह आदमी सहजनिरपेक्ष भाव से बाबा विश्वनाथ को जल चढ़ाने जा रहा है। बीस घण्टे से चलता चला जा रहा है।

धन्य शंकर जी! क्या दुनियां है आपकी!

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कटका पड़ाव की चाय की दुकान पर रामप्रसाद दूबे। चाय पीने के बाद।

दुकान वाले को मैने कहा कि एक पाव पेड़ा भी दे दें इन्हे। रामप्रसाद ने कहा कि पेड़ा अभी नहीं खायेंगे वे। पेड़ा गंठिया कर रख लिया अपने गमछे में। मैने उन्हे 50रुपये भी दे दिये; यह कहते हुये कि बनारस तक का उनका काम तो चल जायेगा।

रामप्रसाद ने हाथ जोड़ कर मेरा अभिवादन किया। बोले हां, बनारस तक का इन्तजाम हो गया। आगे जैसा भोलेनाथ करेंगे, वैसा होगा।

गमछे में दो गांठे और थीं। मैने पूछा क्या है। रामप्रसाद ने बताया कि एक में सुर्ती/चुनौटी है। दूसरे में कुछ सिक्के। कुल मिला कर 11 रुपये। रामप्रसाद ने अगर पहले बताया होता कि एमरजेंसी फण्ड में उनके पास 11रु हैं तो शायद मेरी संवेदना की नब्ज उतने गहरे से नहीं दबती कि मैं पेड़ा और पचास रुपये उन्हे देता। पर भले हीं गंवई हो, जजमानी करने वाला बाभन इतनी साइकॉलॉजी जानता है कि किसी अपरिचित में करुणा कैसे उद्दीपित की जा सकती है।

सवेरे सवेरे बटोही के साथ चहलकदमी करते हुये आज विशुद्ध देशज भारत के दर्शन हुये। रामप्रसाद दुबे बाबा विश्वनाथ के दरबार में जा रहे थे। वहां जो पुण्य़ उन्हे मिलने जा रहा था; उसमें मैने जानेअनजाने अपने को भी टैग कर दिया, एक सौ दो रुपये का खर्च कर।

रामप्रसाद आगे बढ़े बनारस की ओर। मैं अपने घर की ओर लौट चला।DSC_0353

श्री बालकृष्णदास “व्यास” से एक और मुलाकात


आज योगेश्वरानन्द आश्रम के बाहर मैं और राजन भाई थे। बालकृष्णदास व्यास जी अपने कक्ष से बाहर निकल आये। शायद आहट से। उनसे बातचीत होने लगी। इधर उधर की बातचीत से प्रारम्भ हुई और मेरी पिछली पोस्ट के माध्यम से बालकृष्णदास व्यास जी के परिचय पर आ गयी। उन्होने अपने विषय में जो कुछ बताया, उसको ले कर कोई बायोग्रफ़र या कोई उपन्यासकार एक दमदार कृति लिख सकता है। पर असल बात यह है कि मैं न लेखक हूं, न बायोग्राफ़र और न उपन्यासकार। मैं एक ब्लॉगर हूं, जो अपने परिवेश से कुछ चिन्दियां चुनता है; साथ में एक दो फोटो सटाता है और प्रस्तुत कर देता है।


मैं योगेश्वरानन्द आश्रम जाता क्यों हूं? एक – वहां गंगा तट है। दो – सवेरे की सैर/साइकलिंग के लिये वह सही दूरी पर है। भगवानपुर-करहर-गड़ौली होते हुये वहां जाने-आने में आठ-नौ किलोमीटर की साइकलिंग होती है। तीन – यह स्वीकर करना शायद कठिन हो; बालकृष्णदास व्यास (आश्रम में रहने वाले एकान्तवासी साधक/कवि) को लेकर एक कौतूहल है।


बालकृष्णदास व्यास जी जो कुछ लिख या रच रहे हैं, उसके परिचय के लिये विस्तृत लेख की जरूरत है। वह लेखन समय मांगता है। इसके अलावा बालकृष्ण जी के महाकाव्य को डिजिटल फार्म में लाने के लिये गहन रूप से कई मैन-डेज़ का इनपुट चाहिये। मैं उनसे इस विषय में कहता हूं तो वे लैपटॉप की अनुपलब्धता की बात करते हैं। उनका कहना है कि वे ऐसे लोगों के सम्पर्क में हैं जो काव्य की-इन कर सकें।

मैं सोचता हूं कि अपना एक लैपटॉप उन्हे उपलब्ध करा दूं। पर उसमें मेरा इतना डाटा, इतना अटाला पड़ा है कि पहले उसे साफ़ करना होगा। … बालकृष्णदास व्यास जी से मिलना मेरी रिटायर्ड जिन्दगी के आराम में खलल न डाल दे! 😆

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आश्रम के बाहर प्रारम्भ हुयी बालकृष्णदास व्यास जी से बातचीत।

बहुत कुछ बताया अपने विषय में बालकृष्णदास व्यास जी ने। उन्होने कहा कि उनकी अवस्था लगभग 35 वर्ष की है। इस 35 वर्ष की अवस्था में क्या जबरदस्त उतार-चढ़ाव हैं उनके जीवन में! उनके माता-पिता बबीना के पास के हैं। बबीना ऑर्डीनेन्स डीपो के द्वारा उनके पिता की लगभग 150बीघा जमीन अधिगृहीत की गयी। उसके मुआवजे से परिवार बहुत सम्पन्न हो गया। उनकी मां के पास 5 किलो सोना था स्त्री-धन के रूप में। पर बुन्देलखण्ड में सम्पन्नता सहेज कर रखना सरल नहीं है। डाका पड़ा और परिवार अति सम्पन्न से अति विपन्न की दशा में आ गया।

जीवन के प्रारम्भ में उन्होने विपन्नता देखी। घोर विपन्नता। फिर परिवार का पालन-प्रबन्धन का समय आया। उसके बाद बालकृष्णदास व्यास जी ने घर छोड़ कर अनेक स्थानों पर, अनेक गुरु-साधुओं के साथ समय व्यतीत किया। हरिद्वार से ले कर अहमदाबाद तक। अहमदाबाद में आशाराम बापू के साथ भी रहे। मैने कहा – क्या इस विषय में अपने ब्लॉग पर लिख दूं? 

बात वही समाप्त! विवाद क्या बढ़ाया जाए। 

आशाराम या अन्य संतों के साथ जो समय बालकृष्णदास व्यास जी ने गुजारा उसपर विधिवत सामग्री अपने आप में एक रोचक (और महत्वपूर्ण) दस्तावेज होगी। कभी शायद कोई व्यक्ति, या स्वयम वे लिखें। पर जो भी वे बता रहे थे आश्रम के बरगद की छाया में या फिर अपने कक्ष में, वह मोहक था। मेरे साथ गये राजन भाई शायद वापस लौटने की उकताहट दिखा रहे थे, पर मैं उन्हे सुनता जा रहा था।

व्यास जी ने अपने कृतित्व के बारे में बताया। शंकर-पार्वती संवाद से (उसी प्रकार जिस प्रकार रामचरित मानस) गुंथी है यह कथा। उसकी भाषा तुलसी के मानस का बेस तो लेती है, पर उसमें कालान्तर में आये शब्द और प्रयोग निसंकोच हैं। इस बारे में बालकृष्णदास जी की मौलिकता है। ग्रन्थ के कथ्य पर ज्यादा नहीं कहूंगा, सिवाय इसके कि वह रोचक लगता है। मेरे पास वहां बैठने का ज्यादा समय होता तो निश्चय ही और भी सुनना अच्छा लगता। उससे भी ज्यादा समय हो तो उस ग्रन्थ को उलटने/पलटने/पढ़ने और उसपर लिखने का प्रयास करता; बावजूद इसके कि मेरा पठन का बैकलॉग पहले ही बहुत ज्यादा है। कथ्य में वर्तमान सामाजिक/रजनैतिक दशा पर पर्याप्त सोच है और मेधा के प्रत्येक स्तर के व्यक्ति को उसमें कुछ न कुछ मिलेगा जो उसे रुचेगा या प्रेरणा देगा। … आखिर किसी ग्रन्थ की उपयोगिता का यही तो सबसे महत्वपूर्ण पैमाना होता है! नहीं?


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आश्रम में मेटी ले कर आया कुम्हार।

वहां आश्रम में एक कुम्हार एक मेटी (छोटा घड़ा) ले कर आया है बालकृष्णदास जी के लिये। उसी कुम्हार को मैं पचास रुपये देता हूं कि मेरे लिये वह घड़ा ला कर दे।

घड़ा लेने जाने को एक चक्कर वहां अवश्य लगेगा। एक और मुलाकात व्यास जी से होना नियत है ही।

शायद उन्हे घर पर भी बुलायें मेरी पत्नीजी। जितना मैने अपनी पत्नीजी को बताया है, या ब्लॉग पर उन्होने पढ़ा है; उनके मन में भी कौतूहल तो है ही।

अत: भविष्य में भी ब्लॉग पर व्यास जी के संदर्भ में कुछ न कुछ रहेगा!