सोलर लालटेल झल्लर के पास रही नहीं


छ दिन पहले मैने सोलर लालटेन झल्लर को उपहार में दी थी। अकेले मड़ई में रहने वाले वृद्ध को। पर मुझे अन्देशा था कि उनके यहां से कहीं कोई चुरा न ले। या फिर इलाके के लिये फ़ैंसी वस्तु मान कर परिवार वाले ही न ले जायें।

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छ दिन पहले मैने सोलर लालटेन झल्लर को उपहार में दी थी।

वही पता करने के लिये सवेरे साइकिल भ्रमण के दौरान झल्लर की मड़ई की ओर चला गया। झल्लर थे और कुछ लकड़ियां तरतीबवार रख रहे थे – उन्हें जला कर चाय बनाने के लिये। मैने पूछा – किससे बनाते हैं चाय?

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झल्लर थे और कुछ लकड़ियां तरतीबवार रख रहे थे – उन्हें जला कर चाय बनाने के लिये।

झल्लर ने बताया कि दूध तो होता नहीं उनके पास; सो चाय की पत्ती के साथ नीम, लसोड़ा और हरापत्ता (जो जब मुझे दिखाया तो लेमन ग्रास निकला) डाल कर काली चाय बना कर पीते हैं। ये सभी झल्लर के महुआरी/अमराई परिसर में उपलब्ध हैं। लेमन ग्रास तो मुझे पता था कि चाय में फ़्लेवर के लिये मिलाया जाता है। लसोड़ा और नीम का पत्ता भी गुणकारी है, यह आज ही पता चला।

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झल्लर की मड़ई के पास पानी के स्रोत के पास लगी लेमान-ग्रास

झल्लर टपकते महुआ को भी इकठ्ठा कर रहे हैं। तीन अलग अलग समूहों में रखे थे महुआ के फ़ूल। उन्होने बताया कि ये तीनों ढेर फूलों के सूखने की अलग अलग अवस्था में हैं। परसों, कल और आज के इकठ्ठा किये फूल हैं ये। उनकी महुआरी में इस साल महुआ बहुत कम हुआ है। झल्लर ने बताया कि महुआ का हलुआ, ठेकुआ, रस, रोटी – अनेक तरह से उपयोग करता है उनका परिवार। एक बार कुछ पंजाबी आये थे उनके पास। वे कह रहे थे कि महुआ तो किशमिश से ज्यादा स्वादिष्ट है।

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अपनी मड़ई के सामने इकठ्ठे किये महुआ के फूलों के साथ झल्लर

पुराने जमाने की बताने लगे झल्लर। ये जो सामने जीटी रोड है, तब इसपर डामर बिछाया जा रहा था। इकहरी सड़क थी तब। बड़े बड़े गढ्ढे हुआ करते थे। कछवां के सेठ बंधू लाल का इक्का चला करता था कच्चा तम्बाकू ले कर गोपीगंज के लिये। गढ्ढों में जब इक्का फंस जाता था तो गांव वाले पहिये को हाथ से धकेलते थे। गढ्ढे से निकालने के धन्यवाद स्वरूप अंजुरी अंजुरी भर कर तम्बाकू इक्केवान लोगों को दे दिया करता था।

पुराना बताते समय क्रॉनालाजिकल सीक्वेंस का कोई ध्यान नहीं रखते झल्लर। अपने मस्तिष्क में शायद सूचनायें भी सिलसिलेवार नहीं रखी हैं उन्होने। बोलने लगे कि बंगाल में दंगे हो गये थे हिन्दू मुसलमानों के। बहुत मार काट मची थी। उनके पिता कलकत्ता में नौकरी करते थे। तब वापस लौट आये। उनके सेठ ने अपनी गाय बचाने के लिये उनको गाय के साथ ही रवाना कर दिया था। कोई ट्रक तो होते नहीं थे, पैदल ही गाय के साथ आये थे दो और जनों के साथ उनके पिताजी।

मेरे पास नोट करने के लिये कागज कलम नहीं थी झल्लर के कहे को सहेजने के लिये। सो मैने कहा कि कल-परसों आ कर उनके पास बैठूंगा यह सब सुनने और कागज पर करने के लिये।

झल्लर ने कहा – जरूर आइयेगा। आप जैसे सुनने और ग्रहण करने वाले कम ही होते हैं। आम तौर पर तो लोगों के पास समय ही नहीं है।

चलते चलते मैने झल्लर से सोलर लालटेन के बारे में पूछा। उन्होने बताया कि ठीक चल रही है। पर उन्हें बटन ठीक से दबाना नहीं आता था, सो गांव में लड़कों को दे दी है। बकौल उनके “वो पुरानी वाली टार्च ही ठीक है उनके लिये!”

मुझे जो अन्देशा था, वही हुआ। चमकदार लालटेन झल्लर जैसे वृद्ध के पास रुकना कठिन था। सो परिवार वालों ने उनसे ले ही ली!

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घुरहू मुसहर से बातचीत


IMG_20180330_072020-02.jpgकरहर में महुआ के पेड़ के नीचे बैठा मिला घुरहू। पास में एक करीब 10 फुट की लग्गी (पेड़ से पत्ते तोड़ने की पतले बांस की चोंच जुड़ी डण्डी) पड़ी थी। साथ में उसकी पत्नी और एक कम्बल। पत्नी पास के किसी नल से अपने बरतनों में पानी भरकर लाई थी। बरतन में था एक अल्यूमिनियम की बटुली, एल लोटा, एक तसली और एक कडछुल। घुरहू के पास चप्पल थी, पत्नी बिना चप्पल के दिख रही थी।

उसने बताया कि कल से कटका स्टेशन पर डेरा डाल रखा है। रहने वाला कपसेटी के पास किसी गांव का है। कपसेटी यहां से करीब 25 किलोमीटर दूर है। वहां गांव में कोई बाबू साहब बड़े जम्मींदार हैं। पचास बीघे के काश्तकार। उन्होने रहने को जगह दी है। भारत सरकार ने मकान भी दिया है बनवा कर। मां बाप वहां रहते हैं। घुरहू की पत्नी ने बताया कि एक आठ-दस साल की बच्ची भी है उनकी। गांव में मा-बाप के पास रख छोड़ी है। पत्तियां बीनने के लिये दर दर घूमने में उस बच्ची को साथ ले कर चलना कठिन काम था।

आजकल महुआ की ताजा पत्तियां नहीं हैं। तोडने में ज्यादा नहीं मिलतीं तो सूखी पत्तियां बीन कर पानी में गीला कर तह लगाते हैं वे मुसहर लोग। शाम तक जितनी इकठ्ठा हो जाती हैं, वह ले कर ट्रेन में बैठ जाते हैं और अगले दिन सवेरे बनारस में बेच कर वापस लौटते हैं। घुरहू ने जब यह बताया तो मझे स्पष्ट हुआ कि रेलवे स्टेशन पर डेरा क्यों जमाते हैं ये मुसहर। रेलवे की बिना टिकट बनारस आने जाने की सुविधा उनके जीवन यापन का महत्वपूर्ण अंग है।

जैसा घुरहू ने बताया – रोज करीब 150-200 रुपया कमा लेते हैं वे दोनो मिल कर।

मैने पूछा – आधार कार्ड है तुम्हारा?

घुरहू ने बताया कि है पर बाबू साहब के यहां रखा है। बैंक अकाउण्ट नहीं है। थोड़ा मायूस सी हंसी हंस कर वह बोला – पैसा है ही कितना कि बैंक अकाउण्ट की जरूरत पड़े!

पत्तियां बीनते हुये इलाहाबाद के आसपास तक भी चले जाते हैं ये घुमन्तू मुसहर। घुरहू ने बताया कि पान के लिये महुआ की पत्तियां बीनने के अलावा और जो भी काम मिल जाता है, वह कर लेते हैं। लोग गेंहूं-धान की कटाई के लिये हजार – डेढ हजार रुपये बीघा के हिसाब से ठेका भी लेते हैं। उस काम में कटाई के साथ साथ गट्ठर बनाना शामिल होता है। बकौल घुरहू, वे मेहनत से ही कमाते हैं, पर मेहनत से मिलता बहुत कम है।

अन्य मुसहरों की बजाय घुरहू और उसकी पत्नी ज्यादा जागरूक नजर आये। उनमें अपनी दशा से ऊपर उठने की एक चिनगारी मुझे दिखी। पर में पक्का नहीं कह सकता कि वह चिनगारी वास्तव में थी, या मात्र मेरी सोच में।

चलते चलते मैने उन दोनों को चाय पीने के पैसे दिये और उन्होने प्रसन्न हो कर अपना धन्यवाद व्यक्त किया।IMG_20180330_072259

 

डेढ़ी – डेढ़ किलोमीटर लम्बी गांव की सड़क


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डेढ़ी पर आती (शायद गंगा किनारे से) दो महिलायें। 

वह व्यक्ति नहीं है, गाय गोरू भी नहीं है। वह गांव की सड़क है। उसके एक ओर रेलवे लाइन है। अगर लाइन का अवरोध न होता तो वह नेशनल हाईवे-19 तक जाती। दूसरी ओर द्वारिकापुर गांव है जो गंगा नदी के तीर पर है। कुल मिला कर यह सड़क, डेढ़ी, रेलवे लाइन और गंगा नदी को जोड़ती है। कहा जाये तो रेलवे लाइन और गंगा नदी देश की धमनियां हैं। दो धमनियों को जोड़ने वाला मानव निर्मित शण्ट या बाईपास है डेढ़ी। इसके अलावा यह सड़क पूर्वांचल के दो जिलों – मिर्जापुर और भदोही की सीमा पर है। इसके पूर्वी ओर करहर है – जो मिर्जापुर जिले में है और पश्चिमी तरफ़ भगवानपुर है, भदोही जिले में।

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डेढ़ी पर गंगा-स्नान कर लौटते साइकिल सवार।

डेढ़ी कुल डेढ़ किलोमीटर लम्बी है। लम्बाई नापने के लिये मैने गूगल मैप का सहारा नहीं लिया। यह और इसके जैसी अन्य कई गंवई सड़कें जो प्रधानी के फ़ण्ड में बनती हैं, उनका गूगल मैप पर अस्तित्व नहीं है। इन्हे कैसे जोड़ा जा सकता है – मुझे नहीं मालूम। अन्यथा करीब एक दर्जन सड़कों को डिजिटल सभ्यता में खींच लाता मैं। इसकी लम्बाई मैने साइकिल के पैडल गिन कर की। गांव देहात में दूरी नापने के लिये मैं वही गिनता हूं। एक किलोमीटर में 204 पैडल के हिसाब से गिनती को दूरी में परिवर्तित करता हूं। यह बहुत खुरदरा तरीका है। मुझे साइकिल में एक स्पीडोमीटर लगवा लेना चाहिये, पर वह टलता जा रहा है।

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यह महिला सिर पर क्या लिये चली जा रही है परात में? यह आपके लिये भी कौतूहल है और मेरे लिये भी!

डेढ किलोमीटर की पतली सड़क – जिसके किनारे बहुत कम लोग रहते हैं; ज्यादा तक गंगा के डूब में आने वाला सिवान है; का भी अपना एक व्यक्तित्व हो सकता है? मुझे यह बेकार सी सड़क लगती थी। पर कुछ दिन इसपर साइकिल चलाई तो इससे मोह हो गया है। इनफ़ैचुयेशन। बुढापे का प्रेम।

अब यह मेरे लिये चुनौती है कि इस पर मैं एक दो दर्जन ब्लॉग पोस्टें लिख सकूं! ध्यान से देखता हूं तो लगता है डेढ़ किलोमीटर की इस सड़क के दोनो ओर बहुत कुछ है जो मुझे (और पढ़ने वालों को भी) रोचक लग सकता है। इसके किनारे के खेत, पेड़, घास-फूस, बस्ती और उसके बाशिन्दे, सड़क पर चलते लोग और वाहन … सब मिला कर एक रोचक केनवास है।

अपना जूम वाला ब्रिज पॉइण्ट-एण्ड-शूट कैमरे की धूल पोंछ लो और बैटरी री-चार्ज कर लो, जीडी। वह सब दर्ज करो चित्रों में जो डेढ़ी के साइकिल भ्रमण में आंखों से देखते और मन में सोचते हो। अपने विपन्न शब्द भण्डार को भी मांज लो। तुम अज्ञेय सा तो नहीं लिख सकते, पर जैसा तुम लिखते थे, वैसा तो लिख सको अपनी पोस्टों में!

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डेढ़ी के उत्तरी ओर सिवान खत्म होता है। कुछ वृक्ष हैं। यहां आधा दर्जन मोर दिखते हैं। चित्र में महिला अरहर की फसल काट कर गठ्ठर बनाती हुई।

  अगला महीना, दो महीना डेढ़ी के इर्दगिर्द रहेगा!

हनक-ए-योगी


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द्वारिकापुर का गंगा तट। बालू उत्खनन का यह दृष्य हुआ करता था। मेला-ठेला के भीड़ भरे समय में भी बालू का उस पार से लाना और ट्रेक्टर-ट्रॉली में लदान अबाध चलता था पिछली सरकार के समय में।

द्वारिकापुर गंगा किनारे गांव है। जब मैने  रिटायरमेण्ट के बाद यहां भदोही जिले के विक्रमपुर गांव में बसने का इरादा किया था, तो उसका एक आकर्षण गंगा किनारे का द्वारिकापुर भी था। यह मेरे प्रस्तावित घर से तीन किलोमीटर दूर था और इस गांव के करार पर बसा होने के बावजूद गंगा तट पर आसानी से आया जाया जा सकता था। पास में अगियाबीर का टीला है जिसमें पुरातत्व विभाग वाले खुदाई करते हैं। कुल मिला कर सवेरे भ्रमण करने के लिये अच्छा रोमांच हो सकता था यह स्थान।

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पहले का बालू ट्रांशिपमेंट का कार्य गंगा किनारे।

पर वैसा हुआ नहीं। विक्रमपुर में बसने के बाद जब -जब मैं द्वारिकापुर गया; अवैधावैध गंगा बालू उत्खनन करने वालों को सक्रिय पाया। लगभग ८-१० बड़ी डीजल मोटर-बोट हमेशा वहां सक्रिय पायीं। गंगा उस पार मिर्जापुर जिले में गंगा के कछार से बालू खन कर वे इस पार लाती थीं। और वह बालू नावों से ट्रैक्टर ट्रॉलियों में ट्रान्स-शिप हो कर निर्माण काम के लिये ले जाया जाता था। इस पूरे धन्धे का ९०-९५ प्रतिशत अवैध हुआ करता रहा होगा। खनन माफ़िया, पुलीस और प्रदेश प्रशासन के कई महकमे इसमें मौज करते थे – गंगा नदी का चीर हरण करते कौरव!

शुरू के कुछ महीनों में वहां गया, पर हर बार वही दृष्य मिलने के कारण मैने जाना छोड़ दिया।

आज सवेरे यूं ही चला गया वहां राजन भाई के साथ। हम दोनो साइकल पर निकले। सवेरे भ्रमण के हिसाब से कुछ देर हो गयी थी। अत: ज्यादा दूर कमहरिया न जा कर हम द्वारिकापुर पंहुच गये। सवेरे साढ़े सात बज चुके थे। खनन वालों के काम करने का समय हो चुका था, या यूं कहें कि बालू लदी नावों का एक फेरा लग चुका होना चाहिये था अब तक।

पर द्वारिकापुर के गंगा तट पर आश्चर्यजनक रूप से सन्नाटा दिखा। नावें किनारे बंधी थी। हर नाव पर करीब ६-८ श्रमिक हुआ करते थे, लेकिन कोई नहीं था आज।

कुछ समय लगा माजरा समझने में। यह आदित्यनाथ योगी के मुख्यमन्त्री बनने की हनक थी जिसने गंगा का चीर हरण रुकवा दिया था। माफिया दुबक गया था। पुलीस और सरकारी इन्स्पेक्टर-राज कुनमुना कर सीधा हो गया था। मोटरचलित नावें किनारे पर खड़ी जरूर थीं – यह भांपती कि योगी-प्रशासन अन्तत: कितनी सख्ती करेगा? ऊपरी कमाई पर पल्ल्ववित सरकारी महकमा कब तक बिना हफ़्ता-रिश्वत के रह पायेगा?

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द्वारिकापुर में गंगा किनारे। आज वह मोटर-बोट और वह उसका डॉक-प्लेटफ़ार्म शान्त थे। कोई मनुष्य नहीं, कोई ट्रेक्टर नहीं। बालू उत्खनन ठप। सही समय की प्रतीक्षा में।

जैसा मैने अपने आसपास एक डेढ़ साल में देखा है – सरकार ही नहीं, जनता का एक बड़ा हिस्सा इस लूट का परजीवी हो चुका है। किसी लम्बे समय तक चलने वाले परिवर्तन की मुझे बहुत आशा नहीं। पर मोदी-योगी जैसे डिस्रप्टिव राजनीति करने वालों से कुछ आशा बनती है जो व्यक्तिगत रूप से भ्रष्ट नहीं हैं और सिस्टम को सुधारने के लिये एक सीमा तक शॉक-ट्रीटमेण्ट दे सकते हैं। वे सरकारी अमले और माफ़िया को एक (बड़ी) सीमा तक जुतियाने की क्षमता रखते हैं। उन्ही से आशा है।

और उसी योगी के मुख्य मन्त्री बनने की हनक मुझे गंगा किनारे द्वारिकापुर में नजर आई।

हनक-ए-योगी! भगवान करे बरकरार रहे यह हनक!  

काला सिरिस (Albizia lebbeck)  का सूखा पेड़ 


नेशनल हाइवे से दिखता था। सफ़ेद विशालकाय वृक्ष। अगर छोटा होता तो मैं उसे कचनार समझता। इस मौसम में कचनार फूलता है। उसके फूल बैंजनी होते हैं पर कोई कोई पूरे सफ़ेद भी होते हैं। जब फूल लदते हैं तो पत्तियां नहीं दिखतीं। पूरा वृक्ष बैंजनी या सफ़ेद होता है। 

पर यह कचनार नहीं था। निश्चित। उस वृक्ष तक जाने के लिए पगडंडी पकडनी होती। सो जाना टाल दिया, हर बार, जब भी कौतूहल जगा। 

आज सवेरे चला ही गया। अकेले। पगडण्डी पर साईकिल साधते। 

देख कर निराशा हुई। गाँव की सामूहिक जमीन पर वह अमराई थी। उसमें था यह विशालकाय चिलबिल। कोई पत्ती नहीं उसमें। सफ़ेद सूखी फलियां लटकी थीं। उस से पेड़ सफ़ेद दिखता था। 

ध्यान से देखा तो पाया कि पेड़ लगभग सूख गया है। लगभग नहीं पूर्णतः। शायद यह अंतिम बार फला था वह। गांव वालों ने बताया – चिलबिल है यह।

विशालकाय चिलबिल का अंत। उदास मन मैंने अपनी साईकिल मोड़ी। क्या पता कहीँ जान बची हो। प्रकृति अनेकानेक चमत्कार करती है। शायद अब भी हो। 

शायद। 

संशोधन– टिपण्णी में मुझे बताया गया, यह चिलबिल नहीं, सिरिस है। मुझे अपनी जिज्ञासा मेरे सुहृद श्री प्रवीण चंद्र दुबे, चीफ कंजरवेटर ऑफ़ फोरेस्ट के पास रखनी पड़ी। उन्होंने बताया कि यह Albizia lebbeck है। हिन्दी में कहें तो काला सिरिस। 

उन्होंने यह भी बताया कि इस मौसम में इसकी पत्तियां झर जाती हैं। सिरिस फिर जी उट्ठेगा। 

खुले में शौच


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गांव की सड़क। इसके किनारे खुले शौचलाय का काम देते हैं बरसात के मौसम में। 

सन 1987 में मैने अपने बाबा का दाह संस्कार किया था। गांव में लगभग दो सप्ताह रहा उनके क्रिया-कर्म सम्पादित करने के लिये। दस दिन तक अछूत था मैं। अपना भोजन नहीं बनाता था। घर में एक बुआ जी बना देती थीं और भोजन की पत्तल मेरी तरफ़ सरका देती थीं। अगर रोटी अतिरिक्त देनी होती थी तो पत्तल में रखने की बजाय ऊपर से टपका देती थी। मुझे खराब नहीं लगा था वह सब। कर्मकाण्ड निभाने का कौतूहल था। सर्दियों का मौसम था। सभी प्रयोग अच्छे लग रहे थे।

एक तख्ते पर पुआल बिछा कर मेरा बिस्तर बनाया गया था। आनन्द आता था उसपर सोना। आसपास और भी लोग रहते थे। पर काफी समय अकेले सोचने में व्यतीत होता था। विशेषकर रात में। भोर में ही मैं शौच के लिये तालाब के समीप जाता था। घर से लगभग एक किलोमीटर दूर। खुले में शौच का वह मेरा अन्तिम अनुभव था। मेरे पास लोटा नहीं होता था। एक दो बार मिट्टी की घरिया में पानी ले कर गया। पर वह असुविधाजनक था। फिर गड़ही/तालाब के पानी का प्रयोग करने लगा। मिट्टी से ही हाथ रगड़ कर धोता। यह सब कर्म सुबह की पहली किरण दिखने के पहले ही पूरा कर लेता था। मुझे यह याद नहीं आता कि मेरे पास कोई टार्च थी। अंजोरिया पाख था। चांद की रोशनी में काम चल जा रहा था।

खुले में शौच का वह अनुभव कुल मिला कर खराब नहीं था मेरे लिये। इसके पहले बचपन की स्मृतियों में केवल वह अच्छी तरह याद है, जब मटर के खेत में नेकर की डोरी बहुत यत्न करने पर भी नहीं खुली थी और किसी तरह सरका कर नेकर उतारा था। निपटान के बाद टिश्यू पेपर का काम किसी ढेले या खेत में सुविधाजनक रूप से मिलने वाली पत्तियों से लिया जाना तो रुटीन था। उसके बाद नेकर आधा पहने गड़ही तक जा कर धोना भी सामान्य प्रक्रिया थी। जब तक लोटा ले कर खेत में जाने की उम्र आती, मैं शहरी बन चुका था।

अब, रिटायरमेंट के बाद गांव की लगभग 95% आबादी को खुले में शौच करते पाता हूं। तीन दशक बाद भी गांव शौच के मामले में बदले नहीं। उल्टे, आबादी बढ़ने के कारण बदतर हो गये हैं।

बरसात के मौसम में लोग खेत में नहीं जा पाते तो सड़क के किनारे और रेल लाइन के आसपास की जगह विष्ठा से भर देते हैं। सड़क पर चलना या साइकल चलाना बहुत अप्रिय अनुभव हो जाता है।

गंगा किनारे गांव है कोलाहलपुर। पूरा गांव चमार जाति के लोगों का है। अम्बेडकर ग्राम घोषित कर उसमें सरकार ने हर घर में एक शौचालय बना दिया है। पर शायद ही कोई व्यक्ति उन शौचालयों का बतौर शैचालय प्रयोग करता हो। महिलायें भी शौच के लिये गंगा किनारे जाती हैं।

यहां पास के गांव – भगवानपुर में एक बाभन जवान ने मुझे बताया कि सूरत में फैक्टरी में काम करता था वह। गांव वापस चला आया – “उहां, हगई बरे भी संडास के बहरे लाइन लगाये पड़त रहा। इहां जब मन आवइ, चलि द लोटा लई क खेते (वहां शौच के लिये भी शौचालय के बाहर लाइन लगानी पड़ती थी। यहां जब मन आये चल दो लोटा ले कर खेत में।” मुझे अजीब लगा कि हगने की फ्रीडम के लिये भी रिवर्स-माइग्रेशन होता है; शहर से गांव में।

दो दिन पहले एक एन.जी.ओ. पास के प्राइमरी स्कूल में लोगों को बुला कर भाषण दे रहा था खुले में शौच के खिलाफ़। उसने खुले में शौच को स्त्रियों की इज्जत-आबरू से जोड़ा। उस पर औरतों में कसमसाहट शुरू हुई। फिर विरोध। और लोग उठ कर जाने लगे। जाने वाले आदमी नहीं, औरतें ही थीं। बड़ा ही जटिल है ग्रामीणों को किसी बात को, किसी विचार को समझाना। और थोड़ा बहुत समझ भी आये तो अपेक्षा यही रहती है कि सरकार शौचालय बना कर दे। जहां बना कर दिये भी हैं – कोलाहलपुर में – वहां उसकी साफ़सफ़ाई खुद नहीं करना चाहते लोग। फलत: गंगा (जिसे मां कहते हैं लोग) का किनारा शौच से पाटने को बुरा नहीं समझते वे।

खुले में शौच और स्वच्छता पर लोगों की आदतें बदलना आसान काम नहीं।

अरहर के पौधे


अरहर के पौधे। आठ-दस फुट के। फूलों से लदे।
अरहर के पौधे। आठ-दस फुट के। फूलों से लदे।

उन्हे पौधे कहना एक अण्डर स्टेटमेण्ट होगा। आठ दस फुट के हो गये हैं, पेड़ जैसे हैं। फूल लगे हैं। यूं कहें कि फूलों से लदे हैं। करीब दो दर्जन होंगे। गांव के मेरे घर में अनाधिकार आये और साधिकार रह रहे हैं।

पिछले सीजन में जो थोड़ी बहुत अरहर हुई थी खेत में; फसल कटने के बाद मेरे घर के एक कोने में रखी गयी थी। उसके कुछ बीज गिरे और आने वाली बारिश में अनुकूल अवसर पा कर पनप गये। जब थोड़े बड़े हुये तो खरपतवार निराने वाली महिलाओं को पत्नीजी ने साफ़ करने को कहा था। पर निराई करने वालों की लीडर ने कहा – “नाहीं फुआ, ई रहरि हओ। रहई दअ। (नहीं बुआ, यह अरहर है, रहने दें इसे)”

उन निराई करने वाली महिलाओं का अपना एथिक्स है। घास या खरपतवार के अलावा कोई भी पौधा जो काम का हो या पेड़ बनने वाला हो; उसे काटती नहीं हैं। उन्हे निर्देश भी दिये जायें तो कोई न कोई तर्क दे कर छोड़ देती हैं। सो, निराई करने वाली महिलाओं की दया माया से ये पौधे बच गये और आज खूब छंछड़ गये हैं।

मेरे पिताजी अनुमान लगाते हैं कि पांच सेर अरहर तो निकल ही आयेगी उनसे। इन्हे देख कर ही मैं आकलन करता हूं कि इस साल अरहर की फसल अच्छी होगी और दाम काबू में रहेंगे। उस विपक्ष के घोस्ट राइटर के लिखे भाषण को पढ़ने वाले नेता को “अरहर मोदी” का नारा देने का अवसर नहीं मिलेगा।

घर में – करीब आठ बिस्वा जमीन में अनेक वनस्पतियां, अनेक जन्तु साधिकार आ गये हैं। शहर में रहते तो एक फ्लैट में गमले में कुछ देसी/विलायती पौधे पनपाते। यहां वे ऐसे हैं मानो घर उन्ही का हो और हमें रहने दे कर कृतार्थ कर रहे हों हमें।

पर शायद “मानो” सही शब्द नहीं है। वे वास्तव में कृतार्थ कर रहे हैं हमें और सही मायने में यह गांव में रहने का आनन्द है।