लिखूं, या न लिखूं किताब उर्फ़ पुनर्ब्लागरो भव:


मेरे साथ के ब्लॉगर लोग किताब या किताबें लिख चुके। कुछ की किताबें तो बहुत अच्छी भी हैं। कुछ ने अपने ब्लॉग से बीन बटोर कर किताब बनाई। मुझसे भी लोगों ने आग्रह किया लिखने के लिये। अनूप शुक्ल ने मुझे ब्लॉग से बीन-बटोर के लिये कहा (यह जानते हुये कि किताब लिखने के बारे में मेरा आलस्य किस कोटि का है)।

बीन बटोर का मन नहीं हुआ और नये सिरे से लिखने का आलस्य बना रहा। कालान्तर में आग्रह करने वाले भी (शायद थक कर) चुप हो गये। इधर मेरा ब्लॉग/फ़ेसबुक पर आनाजाना कम हो गया। गांव में रहने का लाभ तो था, अनुभव खूब हुये, पर बड़ा घाटा इण्टरनेट की खराब दशा का था।

इण्टरनेट की समस्या हल करने के लिये मेरी बिटिया वाणी पाण्डेय ने सुझाव दिया कि उसके यहां आ कर पुस्तक लिखने का समय वहीं गुजारूं। उसके यहां – बोकारो में – 80एमबीपीएस का ऑप्टीकल फ़ाइबर कनेक्शन है। जो यद्यपि कही हुई स्पीड पर तो नहीं चलता, पर मुझ जैसे के लिये बड़ी तेज स्पीड वाला है। उसके यहां जाता हूं तो घर में प्रवेश करते ही सबसे पहले वह वाई-फाई का वर्तमान पासवर्ड मुझे बताती है। Smile

वाणी पाण्डेय का ऑफ़र तो आकर्षक था, पर भला कोई बिटिया के यहां जम कर महीनों बैठा रह सकता है? भारतीय समाज में वह बड़ा अटपटा माना जाता है। सो अभी तक वह अवाइड करता रहा हूं। उसका परिणाम है कि लिखना भी अवाइड हो रहा है।

मैने सोचा कि किताब लेखन के लिये पहले अपने को लेखन मोड में तो लाया जाये। उसके लिये जरूरी समझा कि अपने ब्लॉग पर लिखना ही नियमित कर लिया जाये। चूंकि इण्टरनेट की दशा/स्पीड केवल रात में कुछ बेहतर होती है; मैने तय किया कि ऑफलाइन लिखा जाये दो तीन घण्टा रोज और देर रात एक घण्टे जाग कर वह अपलोड कर दिया जाये। AAAAAA

फिर ब्लॉग पोस्ट लिखने के लिये लाइवराइटर (आजकल यह विण्डोज लाइवराइटर नहीं, ओपन सोर्स “ओपन लाइवराइटर” है) इन्स्टाल किया और उसमें अपना ब्लॉग एड्रेस halchal.blog लॉग इन किया। एक छोटी ब्लॉग की टेस्ट पोस्ट भी अपलोड कर लाइवराइटर प्रोग्राम को चेक भी कर लिया। उसके बाद करीब 1000 शब्दों तथा 6  चित्रों वाली पोस्ट लिखी। पर वह अपलोड करने के लिये रात में जगने पर भी बहुत मशक्कत करनी पड़ी। पांच-सात बार कोशिश करने पर भी अपलोड नहीं कर पाया। इण्टरनेट का लिंक अपलोड करने के दौरान टूट जाता था। मैने वाई फाई में जियो, एयरटेल और वोडाफ़ोन के 4जी के नेट ट्राई कर देख लिये। ये सभी अपने को हिरण बताते हैं पर सभी गांव में कछुआ हो जाते हैं।

ब्लॉग पोस्ट मैने फिर सुधारी। चित्रों के साइज घटा कर 110केबी की बजाय 40-50केबी का किया। तब जा कर दो तीन ट्राई करने में पोस्ट अपलोड हो पाई।

यह तो स्पष्ट हो गया कि यह “दिन में लेखन, रात में अपलोडन” का प्रयोग बहुत सफ़ल नहीं रहेगा। पर इस जद्दोजहद से एक लाभ होगा कि लैपटाप पर लिखने का छूटा अभ्यास री-कैप्चर हो सकेगा। दूसरे, मुझे अपने लिखने के स्टाइल (जिसमें लेखन और कैमरे का समांग मिश्रण है) बदलना होगा और चित्रों पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी। पुस्तक लेखन के हिसाब से वह सही भी है। उस लेखन शैली में शब्दों के द्वारा चित्र बनाने की क्षमता विकसित होनी चाहिये बनिस्पत चित्रों के सीधे प्रयोग के।

DSC_0972पुस्तक किस विषय पर हो – इसके बारे में भी मैं सोचता रहा हूं। एक तो गंगा किनारे के मेरे भ्रमण की अनेक ब्लॉग पोस्टें हैं। उनको एक बार फ़िर से पढ़ कर उनको नये सिरे से लिख कर पुस्तकबद्ध किया जा सकता है। तब के ज्ञानदत्त से आजका ज्ञानदत्त बेहतर ही लिखेगा – यह मान कर चला जा सकता है। दूसरे, मेरे पास गांव में रीवर्स माइग्रेशन का (लगभग) अलग प्रकार का अनुभव है। उसके बारे में कतरों-कतरों में मैने बहुत सोचा है। गांव का अनुभव खट्टा-मीठा है। कभी कभी लगता है कि बहुत बड़ी बेवकूफ़ी हुई है अपनी सारी जमा पूंजी गांव में फंसाने में। और कभी लगता है इससे बेहतर कुछ हो नहीं सकता था। गांव का परिवेश और गांव का अनुभव बहुत अच्छे और बहुत खराब के आकलन के बीच झूलता है। उसके साथ मेरा मूड भी स्विंग करता है। कभी अपने को बहुत आशावादी पाता हूं और कभी घोर मिसएन्त्रॉफ (misanthrope) समझता हूं। … लगता है यह बहुत आकर्षक विषय रहेगा, लिखने में भी और पाठक के लिये भी।

पर लिखूं या न लिखूं किताब का द्वन्द्व अभी भी कायम है। इस द्वन्द्व में पोस्ट रिटायरमेण्ट जीवन के तीन साल निकल गये हैं। रिटायरमेण्ट के पहले गांव में घूमने के लिये खरीदी साइकिल भी अब पुरानी सी हो गयी है।

इतना जरूर हुआ है कि ब्लॉग पर नियमित लिखने का मन बनाया है। पाठकों के लिये नहीं (वैसे भी फ़ेसबुक/ट्विटर के इस जमाने में बड़ी पोस्टें पढ़ने पाठक कम ही आते हैं); अपने खुद के लिये। ब्लॉग एक डायरी का काम देगा। और उससे लिखने की आदत सुधरेगी।

बाकी; “लिखूं या न लिखूं किताब” का सवाल जस का तस बना रहेगा। पुनर्ब्लागरो भव:; जीडी। Open-mouthed smile


Advertisements

श्री बालकृष्णदास “व्यास” से एक और मुलाकात


आज योगेश्वरानन्द आश्रम के बाहर मैं और राजन भाई थे। बालकृष्णदास व्यास जी अपने कक्ष से बाहर निकल आये। शायद आहट से। उनसे बातचीत होने लगी। इधर उधर की बातचीत से प्रारम्भ हुई और मेरी पिछली पोस्ट के माध्यम से बालकृष्णदास व्यास जी के परिचय पर आ गयी। उन्होने अपने विषय में जो कुछ बताया, उसको ले कर कोई बायोग्रफ़र या कोई उपन्यासकार एक दमदार कृति लिख सकता है। पर असल बात यह है कि मैं न लेखक हूं, न बायोग्राफ़र और न उपन्यासकार। मैं एक ब्लॉगर हूं, जो अपने परिवेश से कुछ चिन्दियां चुनता है; साथ में एक दो फोटो सटाता है और प्रस्तुत कर देता है।


मैं योगेश्वरानन्द आश्रम जाता क्यों हूं? एक – वहां गंगा तट है। दो – सवेरे की सैर/साइकलिंग के लिये वह सही दूरी पर है। भगवानपुर-करहर-गड़ौली होते हुये वहां जाने-आने में आठ-नौ किलोमीटर की साइकलिंग होती है। तीन – यह स्वीकर करना शायद कठिन हो; बालकृष्णदास व्यास (आश्रम में रहने वाले एकान्तवासी साधक/कवि) को लेकर एक कौतूहल है।


बालकृष्णदास व्यास जी जो कुछ लिख या रच रहे हैं, उसके परिचय के लिये विस्तृत लेख की जरूरत है। वह लेखन समय मांगता है। इसके अलावा बालकृष्ण जी के महाकाव्य को डिजिटल फार्म में लाने के लिये गहन रूप से कई मैन-डेज़ का इनपुट चाहिये। मैं उनसे इस विषय में कहता हूं तो वे लैपटॉप की अनुपलब्धता की बात करते हैं। उनका कहना है कि वे ऐसे लोगों के सम्पर्क में हैं जो काव्य की-इन कर सकें।

मैं सोचता हूं कि अपना एक लैपटॉप उन्हे उपलब्ध करा दूं। पर उसमें मेरा इतना डाटा, इतना अटाला पड़ा है कि पहले उसे साफ़ करना होगा। … बालकृष्णदास व्यास जी से मिलना मेरी रिटायर्ड जिन्दगी के आराम में खलल न डाल दे! 😆

GyanApr175543M
आश्रम के बाहर प्रारम्भ हुयी बालकृष्णदास व्यास जी से बातचीत।

बहुत कुछ बताया अपने विषय में बालकृष्णदास व्यास जी ने। उन्होने कहा कि उनकी अवस्था लगभग 35 वर्ष की है। इस 35 वर्ष की अवस्था में क्या जबरदस्त उतार-चढ़ाव हैं उनके जीवन में! उनके माता-पिता बबीना के पास के हैं। बबीना ऑर्डीनेन्स डीपो के द्वारा उनके पिता की लगभग 150बीघा जमीन अधिगृहीत की गयी। उसके मुआवजे से परिवार बहुत सम्पन्न हो गया। उनकी मां के पास 5 किलो सोना था स्त्री-धन के रूप में। पर बुन्देलखण्ड में सम्पन्नता सहेज कर रखना सरल नहीं है। डाका पड़ा और परिवार अति सम्पन्न से अति विपन्न की दशा में आ गया।

जीवन के प्रारम्भ में उन्होने विपन्नता देखी। घोर विपन्नता। फिर परिवार का पालन-प्रबन्धन का समय आया। उसके बाद बालकृष्णदास व्यास जी ने घर छोड़ कर अनेक स्थानों पर, अनेक गुरु-साधुओं के साथ समय व्यतीत किया। हरिद्वार से ले कर अहमदाबाद तक। अहमदाबाद में आशाराम बापू के साथ भी रहे। मैने कहा – क्या इस विषय में अपने ब्लॉग पर लिख दूं? 

बात वही समाप्त! विवाद क्या बढ़ाया जाए। 

आशाराम या अन्य संतों के साथ जो समय बालकृष्णदास व्यास जी ने गुजारा उसपर विधिवत सामग्री अपने आप में एक रोचक (और महत्वपूर्ण) दस्तावेज होगी। कभी शायद कोई व्यक्ति, या स्वयम वे लिखें। पर जो भी वे बता रहे थे आश्रम के बरगद की छाया में या फिर अपने कक्ष में, वह मोहक था। मेरे साथ गये राजन भाई शायद वापस लौटने की उकताहट दिखा रहे थे, पर मैं उन्हे सुनता जा रहा था।

व्यास जी ने अपने कृतित्व के बारे में बताया। शंकर-पार्वती संवाद से (उसी प्रकार जिस प्रकार रामचरित मानस) गुंथी है यह कथा। उसकी भाषा तुलसी के मानस का बेस तो लेती है, पर उसमें कालान्तर में आये शब्द और प्रयोग निसंकोच हैं। इस बारे में बालकृष्णदास जी की मौलिकता है। ग्रन्थ के कथ्य पर ज्यादा नहीं कहूंगा, सिवाय इसके कि वह रोचक लगता है। मेरे पास वहां बैठने का ज्यादा समय होता तो निश्चय ही और भी सुनना अच्छा लगता। उससे भी ज्यादा समय हो तो उस ग्रन्थ को उलटने/पलटने/पढ़ने और उसपर लिखने का प्रयास करता; बावजूद इसके कि मेरा पठन का बैकलॉग पहले ही बहुत ज्यादा है। कथ्य में वर्तमान सामाजिक/रजनैतिक दशा पर पर्याप्त सोच है और मेधा के प्रत्येक स्तर के व्यक्ति को उसमें कुछ न कुछ मिलेगा जो उसे रुचेगा या प्रेरणा देगा। … आखिर किसी ग्रन्थ की उपयोगिता का यही तो सबसे महत्वपूर्ण पैमाना होता है! नहीं?


GyanApr175545-01-01
आश्रम में मेटी ले कर आया कुम्हार।

वहां आश्रम में एक कुम्हार एक मेटी (छोटा घड़ा) ले कर आया है बालकृष्णदास जी के लिये। उसी कुम्हार को मैं पचास रुपये देता हूं कि मेरे लिये वह घड़ा ला कर दे।

घड़ा लेने जाने को एक चक्कर वहां अवश्य लगेगा। एक और मुलाकात व्यास जी से होना नियत है ही।

शायद उन्हे घर पर भी बुलायें मेरी पत्नीजी। जितना मैने अपनी पत्नीजी को बताया है, या ब्लॉग पर उन्होने पढ़ा है; उनके मन में भी कौतूहल तो है ही।

अत: भविष्य में भी ब्लॉग पर व्यास जी के संदर्भ में कुछ न कुछ रहेगा!


 

कमहरिया और बालकृष्णदास व्यास जी


GDAPR175500-01
गंगा किनारे योगेश्वरानन्द धाम, कमहरिया। श्री बालकृष्णदास व्यास जी यहीं रह रहे हैं।

उस शाम हम (राजन भाई और मैं) फिर कमहरिया के लिये साइकल पर निकले। शाम का समय था। यह सोचा कि आधा घण्टा जाने, आधा घण्टा आने में लगेगा। वहां आधे घण्टे रहेंगे व्यास जी के आश्रम में। शाम छ बजे से पहले लौट आयेंगे।

जो रास्ता हमने चुना वह लगभग 80% पगडण्डी वाला था। पगडण्डी में भी करीब 1 किलोमीटर काफ़ी ऊबड़-खाबड़। घर से कमहरिया तक चार पांच गांव पड़ते हैं – मेदिनीपुर, द्वारिकापुर, अगियाबीर, गड़ौली, करहर और भगवानपुर। गडौली और करहर बड़े गांव हैं। गड़ौली में तो बड़ी पानी की टंकी और गांव भर में पाइप से पानी की सप्लाई भी देखी मैने। इन गांवों से गुजरते समय अलग अलग प्रकार के अनुभव होते हैं।

द्वारिकापुर में मेरा दूधवाला, बाढ़ू रहता है। बाढ़ू यादव के पास अपनी भैसें हैं। खेती भी है। बाढ़ू से मैत्री उनके द्वारा मेरे घर दही ले कर आने से शुरू हुई। उन्ही से पता चला कि वे रिटायर्ड वन रक्षक हैं। मैं पेड लगाने में रुचि रखता हूं और भविष्य में बाढ़ू से मैत्री काम की रहेगी। साइकल चला कर उनके गांव से गुजरते समय बाढ़ू किसी कोने से ऊंची आवाज में नमस्कार करते हैं। मैं उन्हे देख नहीं पाता, पर जवाब देते हुते गुजर जाता हूं उनकी बस्ती के सामने से।

द्वारिकापुर और अगियाबीर के बीच घाटी सी है। गंगा जब बढ़ती है तो यहां जल आ जाता है और यह रास्ता बन्द हो जाता है। अभी वहां लड़के खेलते मिलते हैं। ठाकुरों की बस्ती है। एक लड़का कहता है – “दद्दा, काहे साइकल चला रहे हो। आपकी उमर नहीं इसके लिये। साइकल मुझे दे दो!” मुझे उसकी यह प्रगल्भता पसन्द नहीं आती। वहां से चलता चला जाता हूं। मैने अपने बालों पर खिजाब लगाना छोड़ दिया है। भौहें भी सफ़ेद होने लगी हैं। उम्र बढ़ने और अपने मेक-अप के प्रति उदासीन भाव के कारण उद्दण्ड बालकों के लिये मैं करुणा और हास्य का निमित्त बनने लगा हूं। यह अहसास अच्छा नहीं लगता। किसे अच्छा लगेगा?!

अगियाबीर में गंगा किनारे एक बड़ा टीला है। एक पहाड़ी जैसा। उसपर एक दो झोंपड़ियां, कुछ वनस्पति और पेड़ बड़ा मनोरम दृष्य प्रस्तुत करते हैं। उस टीले पर आर्कियालॉजिकल खोज करने वाले काम करते हैं। भरों के समय की मूर्तियां और सिक्के मिले हैं वहां। भरों के कारण ही यह क्षेत्र भरदोही (कालान्तर में भदोही) कहलाया। शायद उससे पहले का भी इतिहास हो इस कोट में गड़ा हुआ।  वहां तक जाने को जो पगड़ण्डी है, उसपर शायद ही साइकल चल पाये। पैदल जाना होगा और उस टीले (कोट)  की ऊंचाई पर पैदल चढ़ना होगा। जाने का मन है; पर उसके लिये अपना स्वास्थ्य और बेहतर बनाना होगा। अगियाबीर कोट को देखते हुये यह संकल्प मन ही मन दोहराता हूं।

GDMAR165449
कमहरिया के रास्ते में।

अगियाबीर के आगे कमहरिया है। वहां पक्की, डामर वाली सड़क मिलती है। बटोही (मेरी साइकल) की रफ़्तार बढ़ जाती है। एक नौजवान अपरिचय के बावजूद अभिवादन करता है। औरतें दोनो ओर के खेतों में निराई कर अपने सिर पर बरसीम, अंकरी और अन्य घास के गठ्ठर लिये घर को लौटनी दिखती हैं शाम हो गयी है। सवा घण्टे बाद सूर्यास्त हो जायेगा। पशु भी घर लौटने के उपक्रम में हैं। भेड़ों के साथ एक अधेड़ गड़रिया उन्हे वापसी के लिये हांक रहा है। मन होता है कि रुक कर दो चार चित्र लूं। संझ के सूरज में चित्र भी अच्छे आयेंगे; पर आश्रम तक पंहुचने की जल्दी भी है और वहां से घर वापस धुंधलके तक लौट भी आना है। बटोही चलता चला जाता है।

DSC_0177-01
गंगा किनारे अघोरी आश्रम। जितनी द्वजायें और निर्माण दीखता है, उतना यह आश्रम जमीन हथिया कर फैलेगा निकट भविष्य में।

आगे दूर से ही दिखती है गंगा नदी की धारा और उसके किनारे आश्रम। पहले अघोरियों के आश्रम के ढेरों झण्डे हैं। उसके आगे वट वृक्ष से आच्छादित आश्रम की पक्की इमारत। राजन भाई फिर भी, आश्वस्त होने के लिये लोगों से पूछ लेते हैं कि वह आश्रम ही तो है न।

डामर की सड़क से हट कर पुन: पगड़ण्डी पकड़नी पड़ती है कुछ दूर के लिये और हम आश्रम पंहुच जाते हैं।

 एक और व्यक्ति आश्रम में आया है हम से पहले। मोटर साइकल पर। हम अपनी साइकल खड़ी कर अन्दर जाते हैं। व्यास जी के कक्ष से उनकी आवाज आ रही है। बीच बीच में एक अन्य व्यक्ति की भी। वे आहट पा कर हमें बुलाते हैं कमरे में प्रवेश कर मैं उन्हे नमस्कार करता हूं।

GDAPR175501-01
अपने आश्रम के कक्ष में अपनी चौकी पर बालकृष्णदास व्यास जी।

एक लगभग 15X12 फुट का कमरा। एक ओर व्यास जी का तख्त है। वे उसपर बैठे हैं। बीच में एक दीवार के पास पूजन की चौकी है। व्यास जी के तख्त के दूसरी तरफ़ दीवार से सट कर एक दरी बिछी है जिस पर आठ दस लोग बैठ सकते हैं। यह स्पष्ट हो गया कि व्यास जी इस कमरे में रहते हैं, पूजन भी करते है और लोगों के साथ मिलते भी हैं। लोगों को प्रवचन भी दिया जा सकता है। मैने देखा कि तख्त के नीचे एक हारमोनियम भी रखा था। व्यास जी कीर्तन भी करते होंगे संगीत के साथ।

GDMAR165451
आश्रम के अपने कक्ष में बालकृष्णदास व्यास जी। नीचे उनका संदूक और हारमोनियम दिखाई पड़ता है।

व्यास जी का छरहरा और लम्बा गौर शरीर। सफ़ेद धोती (लुंगी की तरह बांधी) और एक इनर (पूरे बांह की बनियान) पहने थे वे। सिर पर बड़े बाल और घनी दाढ़ी – पूरी तरह काली। बाद में ध्यान से देखा तो पाया कि खिजाब का प्रयोग किया गया है। उसी से अन्दाज लगाया कि उम्र 40 के आसपास होगी।

वे पूछते हैं कि कितना समय है हमारे पास। हम बताते है आधा घण्टा। समय सीमा के अनुसार वे अपने ग्रंथ का परिचय देने लगते हैं। महाकाव्य लिखा है (उसमें शायद अन्तिम परिवर्तन कर रहे हैं) श्री बालकृष्णदास व्यास जी ने। तुलसी कृत मानस की तरह उसमें सात अध्याय हैं। अवधी जैसी भाषा है। उसे तुलसी वाली अवधी नहीं कह सकते। आजकल की बोलचाल की स्थानीय भाषाओं के शब्द भी हैं। वे कई अंश बताते हैं ग्रन्थ के। सुन कर लगता है कि ग्रन्थ हल्का-फुल्का-छिछला नहीं है। मैं काव्य पारखी नहीं हूं, अत: ग्रन्थ की गुणवत्ता के विषय में कोई सशक्त टिप्पणी नहीं कर सकता। पर ग्रन्थ मुझे गहराई लिये लगता है। यह भी महसूस होता है कि बालकृष्ण व्यास जी के साथ भक्ति के स्तर पर न सही, इण्टेलेक्ट के आयाम में दोस्ती की जा सकती है।

व्यास जी के पास ग्रामीण सम्भवत: उन्हे महात्मा मानते हुये भक्ति भाव से आते हैं। मैं यह देख रहा हूं कि एक व्यक्ति एकान्त में रह कर, सभी असुविधाओं के साथ लगभग वही परिस्थितियां रीक्रियेट कर रहा है जो तुलसीदास के साथ थीं। वह उस प्रकार की मेधा का भी परिचय दे रहा है जो तुलसी में थी। पता नहीं , भविष्य बालकृष्णदास को महाकवि का दर्जा देगा या नहीं। पर मुझे उनमें विलक्षणता के दर्शन होते हैं।

व्यास जी कभी मुझे मध्य उत्तर प्रदेश के प्रतीत होते हैं, कभी बुन्देलखण्ड के। उनके बालों में खिज़ाब का भी प्रयोग है। वे अपने दिखने वाले स्वरूप के प्रति कान्शस हैं। वे सम्भवत: राजनैतिक समीकरण बिठाने के प्रति भी उदासीन नहीं हैं। मुझे गालिब की आटो-बायोग्राफी “दस्तम्बू” की याद हो आती है, जिसमें वे रानी विक्टोरिया तक अपना सम्पर्क बनाने को तत्पर दीखते हैं। उसी प्रकार बालकृष्णदास जी मोदी/योगी से सम्पर्क करने की अपेक्षा भी व्यक्त करते हैं।

मेरे पास अधिक समय नहीं है। अत: इस मनोभाव के साथ मैं वापस लौटता हूं कि आगे उनसे मिलता रहूंगा।

IMG_20170316_175442-01
गंगा तट पर राजन भाई के साथ व्यास जी।

ताक्लामाकन का रेगिस्तान,अमेजन और पुस्तक


मैने करीब दो दशक पहले रीडर्स डाइजेस्ट में पुस्तक संक्षेप के रूप में ताक्लामाकन रेगिस्तान की पश्चिम से पूर्व का सबसे दुरुह यात्रा वृतान्त पढा था। मुझे यह भी याद नहीं रहा कि यात्री कौन था – कोई अंगरेज, और पुस्तक किसने लिखी थी। पुस्तक फर्स्ट-पर्सन में लिखी गयी थी; सो बहुत सम्भव है कि यात्री ने ही लिखी हो।

यात्रा की दुरुहता और यह जानकारी कि वह एवरेस्ट विजय या अकेले अटलाण्तिक पार करने जैसे बड़े (और भीषण) अभियान  का वर्णन था; पुस्तक मेरे मन में बनी रही। पिछले पांच-सात साल से मैं उसे पुन: पढ़ने का प्रयास करता रहा। पर मेरे घर में रीडर्स डाइजेस्ट का वह अंक मिला नहीं। शायद कबाड़ी के पास चला गया था (यद्यपि रीडर्स डाइजेस्ट कबाड़ी को दिये जाने पर मनाही थी घर में)।

मैने पुस्तक को GoodReads  या गूगल पर छानने का प्रयास किया।

charles-blackmoreयह पुस्तक निकली चार्ल्स ब्लैकमोर की – The Worst Desert on Earth – Crossing Taklamakan. पुस्तक आउट ऑफ प्रिण्ट थी। अमेजन पर तलाशा इसे। वहां यह हार्ड-बाउण्ड में रु 4000.- में थी। इतनी मंहगी किताब कैसे खरीदी जाये।

अचानक अमेजन पर नीचे एक लिंक मिला। यह पुस्तक पुरानी (पर अच्छी दशा में) 305 रुपये पर उपलब्ध थी। जैसा वे लिखते हैं,उसकी एक ही प्रति उपलब्ध थी। अमेजन प्राइम पर उसका डाक-खर्च फी था।

मैने समय नहीं गंवाया (पुरानी) प्रति ऑर्डर करने में।

जब पुस्तक मेरे पास आयी तो ताजा और कोरी किताब थी। सन 1995 का संस्करण। उस समय कीमत थी 16.99 पाउण्ड। किताब सम्भवत: अनबिकी थी। ताजा पन्नों की गन्ध। शायद बाद के किसी संस्करण की कीमत 4000रु के आसपास रही हो। बहरहाल मुझे तो 305 में मिल गयी। किताबी कीड़े के लिये इससे बड़ा सौभाग्य (लक) क्या हो सकता है भला?

13-luckमुझे अश्विन सांघी की पुस्तक 13 Steps to Bloody Good Luck की याद हो आयी। सजग रहना। अवसर पहचानना और उनमें वृद्धि करना ही तरीका है अपना लक बढ़ाने का।

वही किया था मैने। किताब याद रखना। उसको सर्च करना। अमेजन पर फाइन प्रिण्ट पढना और मौके पर ऑर्डर करना – यह सब उसी लक का हिस्सा है।

पर समझ नहीं आता कि अमेजन अपनी पुस्तकों की कीमत कैसे तय करता है। उसकी साइट पर पुस्तकों (और अन्य वस्तुओं की भी) कीमतें बड़ी डायनमिक होती हैं। कभी कभी एक दिन में कई बार बदलती हैं।  कुल मिला कर अमेजनिये बड़ा दमदार कंटिया फंसाते हैं ग्राहक के लिये। ग्राहक फंस कर भी खुश रहता है।

कुल मिला कर ऑनलाइन खरीद का तिलस्म बहुत धीरे धीरे समझ में आ रहा है। पर बड़ा थ्रिलिंग है यह!


मिश्री पाल की भेड़ें


GDFeb164606-01गड़रिया हैं मिश्री पाल। यहीं पास के गांव पटखौली के हैं। करीब डेढ़ सौ भेड़ें हैं उनके पास। परिवार के तीन लोग दिन भर चराते हैं उनको आसपास।

मुझे मिले कटका रेलवे स्टेशन की पटरियों के पास अपने रेवड़ के साथ। भेड़ें अभी ताजा ऊन निकाली लग रही थीं। हर एक बेतरतीब बुचेड़ी हुई। उन्होने बताया कि साल में तीन बार उतरता है उनका ऊन। इस बार करीब चालीस किलो निकला।

मिश्री पाल ने बताया – बहुत कम दाम मिलते हैं ऊन के। खरीदने वाला 8रुपये किलो खरीद ले जाता है।

यह तो बहुत कम दाम हुये। आलू के भाव। – मैने अपना मत व्यक्त किया।

GDFeb164608-01

“हां, बहुत कम है। पर और कोई काम नहीं। दिन भर चराते हैं। देखभाल करनी पड़ती है।” मिश्री पाल ने कहा कि वे भेड़ें बेचने का धन्धा नहीं करते। पर मुझे लगा कि यह गड़रिये का काम अगर भेड़ें बेचने पर आर्धारित नहीं है तो मात्र ऊन के आधार पर किसी भी प्रकार से सस्टेन नहीं किया जा सकता। गड़रिया के काम में पैसा कहां और किस मद में आता है; मैं यह सोचने में लग गया। 

मिश्री पाल के पास बैल भी हैं। बैलों को वे हल चलाने के लिये किराये पर देते हैं। आजकल किसान बैल नहीं रखते। अगर जोत बहुत छोटी है, या जगह ऐसी, जहां ट्रेक्टर नहीं जा सकता, तो वहां हल का प्रयोग करते हैं। वहां मिश्री पाल के बैल काम आते हैं।

देहात में बहुत से लोग; जिनके पास जमीन नहीं है; भेड़, बकरी, सूअर, गाय, भैंस आदि पाल कर उनके दूध, ऊन, मांस आदि से अपना जीवन यापन करते हैं। उनके रहन सहन को देख कर लगता है कि उन्हें गरीब तो जरूर माना जायेगा; पर आर्थिक आधार पर कम जोत वाले किसानों की अपेक्षा बहुत विपन्न हों – वैसा भी नहीं है। मुझे लगा कि कभी पटखौली जा कर मिश्री पाल का जीवन देखना चाहिये।

कितनी ही अच्छी पुस्तके गड़रियों के घुमन्तू जीवन के आधार पर लिखी गयी हैं। कई देशों और महाद्वीपों में यात्रा करते गड़रिये। मिश्री पाल वैसे तो नहीं हैं; पर छोटे मोटे स्तर पर घुमन्तू तो हैं ही।

मैं मिश्री पाल का चित्र ले चलने लगा। सांझ हो गयी थी। मिश्री पाल भी अपने गांव लौट रहे होंगे अपने रेवड़ के साथ। वे और उनके साथी डण्डा फटकारते हुये, हट्ट-हट्ट की ध्वनि निकालते अपनी भेड़ें साधने में लग गये।

GDFeb164604-01


कोलाहलपुर और मुर्दहिया


image

कोलाहलपुर में लगभग 400 घर हैं। उसमें से 3 घर सवर्णों के हैं। मुझे बताया गया कि शेष चमार हैं। कुछ खेती में लगे हैं। कुछ बुनकर हैं – कालीन बनाने वाले सेंटर पर जा कर आठ घंटे कालीन बुनते हैं। कुछ मजदूरी करते हैं।
मैंने तुलसीराम की मुर्दहिया के कण तलाशने की सोची। पर लगा कि गाँव वैसा नहीं है।
यह विचार आया कि शायद अब हालात बदले हों। पहले सामाजिक और आर्थिक हालात भयावह रहे हों।

image

उस दिन मुझे गंगा किनारे शाम को मिल गए रामधनी। उनकी उम्र मेरे बराबर लगभग साठ साल की है। तुलसीराम भी लगभग इतनी उम्र के होते।
लगा कि कोलाहलपुर को मुर्दहिया का सीक्वेल लिखने के लिये रामधनी एक सही पात्र होंगे। वैसे भी रामधनी स्पष्टवक्ता लगे। अच्छी याददाश्त वाले भी। यह विचार मन में पुख्ता हो रहा है की रामधनी के विस्तृत इंटरव्यू ले कर उसके आधार पर एक श्रंखला लिखी जा सकती है।
रामधनी के दो लड़के हैं, दोनों बुनकर। वे अब मोतियाबिंद के आपरेशन के कारण बुनकर के काम से संन्यास ले चुके हैं। उनके कहे अनुसार उनका घर संपन्न नहीं हो तो विपन्न भी नहीं है।
भविष्य में मुर्दहिया का सीक्वेल लिखने की संभावनाएं बनती हैं – आखिर मुझे भी व्यस्त रहने को कुछ काम चाहिए! कि नहीं?