रेस्तराँ किसको आमन्त्रित करता है?!

नया खुला रेस्तरॉं है श्री विजया फैमिली ढाबा और रेस्तरॉं। … फैमिली के साथ सुकून से बैठ कर जलपान करने के स्थान यहां नहीं हैं। उस जरूरत को पूरा करना चाहते हैं तिवारी पिता-पुत्र।


कस्बे के बाजार मेँ एक रेस्तराँ खुलना कुछ उतना ही बड़ा है जैसे बम्बई, लंदन या पेरिस में कोई नया म्यूजियम या थियेटर खुलना। तिवारी जी को उसका विज्ञापन करना चाहिये। शायद सोच भी रहे हों। मैं तो आस-पास की रिपोर्ट देने वाले एक ब्लॉगर की नजर से ही देखता हूं। मैं चाहूंगा कि यह रेस्तराँ सफल हो। मुझे एक परमानेण्ट कॉफी पीने का अड्डा मिल सके! 😆


नितिन तिवारी ने अपने रेस्तराँ के कुछ चित्र ह्वाट्सेप्प पर भेजे हैं। दो सज्जन पैदल चल रहे हैं कलकत्ता (हावड़ा) से और जायेंगे राजस्थान। शायद सीकर में खाटू श्याम जी के स्थान पर। रास्ते में नितिन के रेस्तरॉं में विश्राम करते हैं। जगह का चयन करने और उनकी सुविधाओं का ध्यान देने के लिये कुछ लोग पहले से आ कर व्यवस्था देखते हैं। चलते समय एक एसयूवी वाहन उनके पीछे चलता है।

Continue reading “रेस्तराँ किसको आमन्त्रित करता है?!”
Advertisements

विजया रेस्तरॉं की री-विजिट

[…] तिवारी जी उगापुर के रहने वाले हैं। उनका कुटुम्ब कार्पेट के व्यवसाय में अग्रणी है भदोही जिले में। उगापुर के कार्पेट फैक्टरी में उनकी भी हिस्सेदारी है। पच्चीस बीघा की बटाई पर दी गयी खेती है। वाराणसी में लंका में मकान है। पर कारपेट और खेती से इतर कुछ करने का मन बना तो यह रेस्तरॉं खोला है उन्होने। […]


सवेरे दस बजे निकलना होता है बटोही (साइकिल) के साथ। एक डेढ़ घण्टे भ्रमण के लिये। साथ में घर से सहेजे फुटकर काम निपटाने होते हैं। आज महराजगंज से अपनी जरूरी दवायें खरीदीं और लौटते समय विजय तिवारी जी के रेस्तरॉं के पास रुका। तिवारी जी वहीं थे। सामान्यत: वे वाराणसी या अपने गांव पर होते हैं। पर आज मिल ही गये।

तिवारी जी उगापुर (दस किमी दूर) के रहने वाले हैं। उनका कुटुम्ब कार्पेट के व्यवसाय में अग्रणी है भदोही जिले में। उगापुर के कार्पेट फैक्टरी में उनकी भी हिस्सेदारी है। पच्चीस बीघा की बटाई पर दी गयी खेती है। वाराणसी में लंका में मकान है। पर कारपेट और खेती से इतर कुछ करने का मन बना तो यह रेस्तरॉं खोला उन्होने। उनके लड़के (नितिन तिवारी) ने मुझे बताया था कि वे यह एक सोची समझी व्यवसायी तकनीक के अनुसार चलाना चाहते हैं जिससे पूंजी पर वांछित रिटर्न्स भी मिलें और वर्किंग केपिटल की कभी किल्लत भी न महसूस हो।

Continue reading “विजया रेस्तरॉं की री-विजिट”

किताबों की दुनियां में पांच पीढ़ियां


इस ब्लॉग में लोकभारती के दिनेश ग्रोवर जी पर कुछ पोस्टें हैं। प्रयागराज में “लोकभारती” में उनसे कई मुलाकातें हुईं। जब वे मित्रवत हो गये तो चाय भी मंगाया करते थे मेरे आने पर। उनसे मुलाकात पर अन्तिम पोस्ट 2013 की है। फिर उनसे मिलने का सिलसिला टूट गया, जब मैं 2014 के प्रारम्भ में प्रयागराज से गोरखपुर चला गया। बाद में पता चला कि उनका देहावसान हो गया था।

लोकभारती को मैं ग्रोवर जी से पहचानता था। उनके न रहने पर वहां जाना खत्म हो गया। कालान्तर में एक बार प्रयागराज में पुस्तकें खरीदी भी तो किसी अन्य दुकान से। एक अच्छा/स्तरीय पुस्तक अड्डा मैं मिस करता रहा हूं, लोकभारती के बाद। गांव में रहने पर उसे अमेजन और किण्डल से रिप्लेस करने का यत्न किया मैने; पर उसमें वह बात नहीं! या यूं कहें कि दोनो के अलहदा तरीके के अनुभव हैं।

अब, वाराणसी में पिछले दिनों हम पुस्तक की दुकान खोज रहे थे। मेरी पोती चिन्ना के लिये कुछ कहानी की पुस्तकें खरीदनी थी, जिसे हम पढ़ कर सुना सकें – चिन्ना पांड़े में पढ़ने के प्रति रुचि जगाने के लिये। रथयात्रा, वाराणसी में एक दुकान में घुसे। पहले तो लगा कि दुकान में कोई है नहीं, पर तभी पुस्तकों के पीछे एक सज्जन नजर आये।

FSDec095

उनका नाम है सुमित भार्गव। वे दुकान के पांचवी पीढ़ी के कर्ताधर्ता हैं। उनके परिवार के लोग अकादमिक्स में भी रहे और पुस्तक के व्यवसाय में भी। सुमित एक दुकानदार जैसे नहीं, प्रशासनिक ग्रेड के अधिकारी सरीखे नजर आये। उनकी भाषा भी वैसी ही स्पष्ट और सुसंस्कृत शब्दों वाली थी और मैनेरिज्म में जो अभिजात्य था, वह वाराणसी के मूल चरित्र से इतर था। बावजूद इसके कि उनकी और मेरी उम्र में पीढ़ी का अन्तर था, मैं उन्हें मित्र बनाने की इच्छा करने लगा।

सुमित की दुकान में पुस्तकों के स्तर से भी मैं बहुत प्रभावित हुआ। सरसरी निगाह से जो पुस्तकें दिखीं – उनमें से कुछ मेरे पास थीं और अधिकांश ऐसी थीं, जिन्हे लेने की मैं इच्छा रखता था। वैसे पिछले चार साल में ज्यादातर पुस्तक खरीद मैने किण्डल पर की है। पर कई पुस्तकें हैं, जो किण्डल पर उपलब्ध नहीं हैं, उन्हे पेपर पर पढ़ने की हसरत है!

सुमित जी ने पांच साल की चिन्ना को भी एक प्रबुद्ध ग्राहक जैसी तवज्जो दी। पुस्तकें निकालने और उनके बारे में बताने का उनका तरीका एक स्तरीय बुक-लवर जैसा था। हमने कुछ पुस्तकें खरीदीं। अपनी सास जी के लिये भी एक पुस्तक ली।

सुमित जी ने अपने व्यवसाय के बारे में बताया। उनकी दुकान पहले बांसफाटक पर थी। मुझे बाद में पत्नीजी से पता चला कि बांसफाटक पर पुस्तकों के सेलर, डिस्ट्रीब्यूटर और पब्लिशर्स के बहुत संस्थान हैं। सुमित जी का संस्थान भी उनमें से था। अब यह कुछ सालों से रथयात्रा पर शिफ्ट कर लिया है।

FSDec096

सुमित जी से मैने किताबों के व्यवसाय की दशा के बारे में पूछा। मैं अपेक्षा कर रहा था कि वे आजकल लोगों की पढ़ने की घटती प्रवृत्ति और पुस्तकों के प्रति रुंझान में गिरावट की बात करेंगे। पर सुमित जी ने (बड़ी बहादुरी से) पुस्तक पाठकों को डिफेण्ड किया – जो लोग जानते हैं कि वास्तव में तत्व/ज्ञान के लिये इण्टरनेट या सोशल मीडिया नहीं, पुस्तकें ही स्रोत हैं, वे अब भी पुस्तकों के प्रति समर्पित हैं; और उनकी संख्या कम नहीं है। यह सुखद था कि वे उस पीढ़ी को जो ह्वाट्सैप की अधकचरी सूचनाओं और यू-ट्यूब पर देखे वीडियोज़ के माध्यम से अर्जित अपनी बौद्धिकता पर संतोष करती या इतराती है; को दोष देने की मोनोटोनी का सहारा नहीं ले रहे थे। वे अपने कथन के माध्यम से अपने व्यवसाय के प्रति प्रतिबद्धता को परिपुष्ट कर रहे थे। आम तौर पर पुस्तक व्यवसाय से जुड़े लोग उसके गौरवशाली अतीत और गर्त में जाते वर्तमान की बात अधिक करते हैं। … बेहतर है – जैसा सुमित कर रहे थे – पुस्तकों की दुनिया की अहमियत को उसी तरह अण्डरलाइन किया जाये।

अगर सुमित जी से वैसा सम्पर्क बना जैसा दिनेश जी के साथ था तो शायद किण्डल-धर्म में ली गयी दीक्षा का मन्त्र भूल कर मैं पेपरबैक पर वापस लौटूं। सुमित जी के यहां (गंगा शरण एण्ड ग्राण्ड-संस में) पुस्तकों की उपलब्धता बहुत लुभावनी है।

वाराणसी जाने पर एक चक्कर उनकी दुकान का लगाना तो अब बनता ही है। वैसे, सुमित जी को बहुत स्तरीय ग्राहक मिले होंगे, पर हमारे जैसा नहीं मिला होगा – चालीस किलोमीटर दूर गांव में रहने वाला; जो अपनी पोती को ले कर आया हो, उसकी रुचि विकसित करने के लिये पुस्तक खरीदने का ध्येय ले कर।

आशा है, सुमित भी मुझे रोचक व्यक्तित्व पायेंगे! 🙂


प्रयागराज, लाइव सर्टीफिकेट और बैंक अधिकारी श्रीमती दिव्या गौड़ से मुलाकात


लाइव सर्टीफिकेट हेतु प्रयागराज की यात्रा

रिटायर्ड सरकारी पेंशनर्स के लिये बैंक नवम्बर के महीने में तीर्थ स्थान सा होता है। वहां जा कर अपने जीवित होने का प्रमाण देना अनिवार्य वार्षिक कर्मकाण्ड है। मेरे घर में मेरे पिताजी और मैं – दो व्यक्ति सरकारी पेंशनर हैं। मेरा पेंशन खाता वाराणसी में है और पिताजी का तेलियरगंज, प्रयागराज में। अत: दोनों को इस तीर्थ यात्रा पर जाना होता है। चूंकि मेरे पिताजी इस यात्रा के लिये बहुत सक्षम नहीं हैं; उनको ले जाने का दायित्व भी मेरे ऊपर है।

पिताजी के शतायु होने की मैं कामना रखता हूं – सो उसके आधार पर अगले 15 साल उनके लाइव सर्टीफिकेट अरेंज करने के दायित्व मुझे निर्वहन करने के लिये तैयार रहना है।

Continue reading “प्रयागराज, लाइव सर्टीफिकेट और बैंक अधिकारी श्रीमती दिव्या गौड़ से मुलाकात”

लिखूं, या न लिखूं किताब उर्फ़ पुनर्ब्लागरो भव:


मेरे साथ के ब्लॉगर लोग किताब या किताबें लिख चुके। कुछ की किताबें तो बहुत अच्छी भी हैं। कुछ ने अपने ब्लॉग से बीन बटोर कर किताब बनाई। मुझसे भी लोगों ने आग्रह किया लिखने के लिये। अनूप शुक्ल ने मुझे ब्लॉग से बीन-बटोर के लिये कहा (यह जानते हुये कि किताब लिखने के बारे में मेरा आलस्य किस कोटि का है)।

बीन बटोर का मन नहीं हुआ और नये सिरे से लिखने का आलस्य बना रहा। कालान्तर में आग्रह करने वाले भी (शायद थक कर) चुप हो गये। इधर मेरा ब्लॉग/फ़ेसबुक पर आनाजाना कम हो गया। गांव में रहने का लाभ तो था, अनुभव खूब हुये, पर बड़ा घाटा इण्टरनेट की खराब दशा का था।

इण्टरनेट की समस्या हल करने के लिये मेरी बिटिया वाणी पाण्डेय ने सुझाव दिया कि उसके यहां आ कर पुस्तक लिखने का समय वहीं गुजारूं। उसके यहां – बोकारो में – 80एमबीपीएस का ऑप्टीकल फ़ाइबर कनेक्शन है। जो यद्यपि कही हुई स्पीड पर तो नहीं चलता, पर मुझ जैसे के लिये बड़ी तेज स्पीड वाला है। उसके यहां जाता हूं तो घर में प्रवेश करते ही सबसे पहले वह वाई-फाई का वर्तमान पासवर्ड मुझे बताती है। Smile

वाणी पाण्डेय का ऑफ़र तो आकर्षक था, पर भला कोई बिटिया के यहां जम कर महीनों बैठा रह सकता है? भारतीय समाज में वह बड़ा अटपटा माना जाता है। सो अभी तक वह अवाइड करता रहा हूं। उसका परिणाम है कि लिखना भी अवाइड हो रहा है।

मैने सोचा कि किताब लेखन के लिये पहले अपने को लेखन मोड में तो लाया जाये। उसके लिये जरूरी समझा कि अपने ब्लॉग पर लिखना ही नियमित कर लिया जाये। चूंकि इण्टरनेट की दशा/स्पीड केवल रात में कुछ बेहतर होती है; मैने तय किया कि ऑफलाइन लिखा जाये दो तीन घण्टा रोज और देर रात एक घण्टे जाग कर वह अपलोड कर दिया जाये। AAAAAA

फिर ब्लॉग पोस्ट लिखने के लिये लाइवराइटर (आजकल यह विण्डोज लाइवराइटर नहीं, ओपन सोर्स “ओपन लाइवराइटर” है) इन्स्टाल किया और उसमें अपना ब्लॉग एड्रेस halchal.blog लॉग इन किया। एक छोटी ब्लॉग की टेस्ट पोस्ट भी अपलोड कर लाइवराइटर प्रोग्राम को चेक भी कर लिया। उसके बाद करीब 1000 शब्दों तथा 6  चित्रों वाली पोस्ट लिखी। पर वह अपलोड करने के लिये रात में जगने पर भी बहुत मशक्कत करनी पड़ी। पांच-सात बार कोशिश करने पर भी अपलोड नहीं कर पाया। इण्टरनेट का लिंक अपलोड करने के दौरान टूट जाता था। मैने वाई फाई में जियो, एयरटेल और वोडाफ़ोन के 4जी के नेट ट्राई कर देख लिये। ये सभी अपने को हिरण बताते हैं पर सभी गांव में कछुआ हो जाते हैं।

ब्लॉग पोस्ट मैने फिर सुधारी। चित्रों के साइज घटा कर 110केबी की बजाय 40-50केबी का किया। तब जा कर दो तीन ट्राई करने में पोस्ट अपलोड हो पाई।

यह तो स्पष्ट हो गया कि यह “दिन में लेखन, रात में अपलोडन” का प्रयोग बहुत सफ़ल नहीं रहेगा। पर इस जद्दोजहद से एक लाभ होगा कि लैपटाप पर लिखने का छूटा अभ्यास री-कैप्चर हो सकेगा। दूसरे, मुझे अपने लिखने के स्टाइल (जिसमें लेखन और कैमरे का समांग मिश्रण है) बदलना होगा और चित्रों पर अपनी निर्भरता कम करनी होगी। पुस्तक लेखन के हिसाब से वह सही भी है। उस लेखन शैली में शब्दों के द्वारा चित्र बनाने की क्षमता विकसित होनी चाहिये बनिस्पत चित्रों के सीधे प्रयोग के।

DSC_0972पुस्तक किस विषय पर हो – इसके बारे में भी मैं सोचता रहा हूं। एक तो गंगा किनारे के मेरे भ्रमण की अनेक ब्लॉग पोस्टें हैं। उनको एक बार फ़िर से पढ़ कर उनको नये सिरे से लिख कर पुस्तकबद्ध किया जा सकता है। तब के ज्ञानदत्त से आजका ज्ञानदत्त बेहतर ही लिखेगा – यह मान कर चला जा सकता है। दूसरे, मेरे पास गांव में रीवर्स माइग्रेशन का (लगभग) अलग प्रकार का अनुभव है। उसके बारे में कतरों-कतरों में मैने बहुत सोचा है। गांव का अनुभव खट्टा-मीठा है। कभी कभी लगता है कि बहुत बड़ी बेवकूफ़ी हुई है अपनी सारी जमा पूंजी गांव में फंसाने में। और कभी लगता है इससे बेहतर कुछ हो नहीं सकता था। गांव का परिवेश और गांव का अनुभव बहुत अच्छे और बहुत खराब के आकलन के बीच झूलता है। उसके साथ मेरा मूड भी स्विंग करता है। कभी अपने को बहुत आशावादी पाता हूं और कभी घोर मिसएन्त्रॉफ (misanthrope) समझता हूं। … लगता है यह बहुत आकर्षक विषय रहेगा, लिखने में भी और पाठक के लिये भी।

पर लिखूं या न लिखूं किताब का द्वन्द्व अभी भी कायम है। इस द्वन्द्व में पोस्ट रिटायरमेण्ट जीवन के तीन साल निकल गये हैं। रिटायरमेण्ट के पहले गांव में घूमने के लिये खरीदी साइकिल भी अब पुरानी सी हो गयी है।

इतना जरूर हुआ है कि ब्लॉग पर नियमित लिखने का मन बनाया है। पाठकों के लिये नहीं (वैसे भी फ़ेसबुक/ट्विटर के इस जमाने में बड़ी पोस्टें पढ़ने पाठक कम ही आते हैं); अपने खुद के लिये। ब्लॉग एक डायरी का काम देगा। और उससे लिखने की आदत सुधरेगी।

बाकी; “लिखूं या न लिखूं किताब” का सवाल जस का तस बना रहेगा। पुनर्ब्लागरो भव:; जीडी। Open-mouthed smile


भदोही की आर्कियॉलॉजी के तत्वशोधक रविशंकर


प्रोफेसर (डा.) अशोक सिंह ने अगियाबीर टीले के खुदाई स्थल मुझे रविशंकर से परिचय कराते बताया कि अगर आपको भदोही के पुरातत्व पर जानकारी चाहिये तो इन (रविशंकर) से बेहतर सोर्स कोई नहीं। तभी मुझे लग गया कि मुझे रविशंकर जी को कस कर पकड़ना है अपने आस-पास की जानकारी में गहराई और सांद्रता लाने के लिये।

GDApr187510
रविशंकर

यहां जिससे भी बात करो – तथाकथित जागरूक स्थानीय से भी – तो वे भदोही को मात्र भरों से जोड़ते हैं। पर आसपास जो भी दिखता है, उसे मेरे जैसा सतही जानकारी वाला जीव भी भांप सकता है कि वह सब 1200ईस्वी के बहुत पहले की सभ्यता की बदौलत है। दूसरे; भर या भारशिव केवल भदोही में नहीं हैं। विकीपेडिया पर एक काल में उत्तर भारत के बड़े हिस्से में उनका प्रभाव दिखता है। तब भर या भर-द्रोह को भदोही मात्र से जोड़ना और भदोही की पहचान वही बना देना क्या चीज है?

मैने अपने आप से कहा – “जीडी, अगर इस इलाके में तुम्हें अपने जीवन का तीसरा और चौथा भाग काटना है तो रविशंकर जैसे से मिलना और जानकारी समेटने-सहेजना तुम्हारी बंजर बौद्धिक जमीन को जबरदस्त नैसर्गिक उर्वरक इनपुट देगा। मत चूको उससे।“

और मैने रविशंकर जी से फोन कर समय मांगा। अगियाबीर टीले पर आर्कियॉलॉजिकल खुदाई सवेरे छ बजे प्रारम्भ हो जाती है। अपने साथ कर्मी ले कर रविशंकर छ बजे वहां पंहुंच जाते हैं। वहीं उनके किशोर महराज (बीएचयू के रसोइये) नाश्ता-चाय ले कर 8-9 बजे के बीच पंहुचते हैं। इग्यारह बजे तक खुदाई चलती है।

GDApr187532
अगियाबीर की खुदाई निर्देशित करते रविशंकर

दोपहर के भोजन/विश्राम के बाद तीन से शाम छ बजे दूसरी शिफ्ट में खुदाई चलती है। पूरे खुदाई के समय वहीं मौजूद रह कर निर्देशित करने और प्राप्त सामग्री को तरतीबवार जमवाने का काम करते हैं रविशंकर जी। खुदाई करने वाले कर्मी यद्यपि लम्बे अनुभव के कारण पुरातत्व की आवश्यकताओं के प्रति पर्याप्त संवेदित किये जा चुके है; पर खुदाई उनके भरोसे छोड़ कर ये पुरातत्ववेत्ता वहां से हट नहीं सकते। मेरे फोन करने पर रविशंकर जी ने कहा कि शाम 6 बजे खाली हो कर वे नहाने के बाद सात बजे चाय पीते हैं। उस समय मैं उनसे मिलने आ सकता हूं।

शाम सात बजे, सूर्यास्त बाद के धुंधलके में, द्वारिकापुर के प्राइमरी स्कूल, जहां पुरातत्व विभाग की टीम रुकी है, पंहुचा मैं। बहुत आत्मीयता से मिले रविशंकर जी। साथ में दो अन्य व्यक्ति – आशीष और पटेल जी भी थे। लगभग एक घण्टा समय दिया रविशंकर जी मुझे और बताया अपने भदोही पर किये शोध के बारे में।

IMG_20180406_195752
संझा समय द्वारिकापुर प्राइमरी स्कूल पर अपने कैम्प में मिले रविशंकर। चाय पीते हुये हुई चर्चा।

बीएचयू के एक कुशल अध्यापक की तरह हिन्दी में धाराप्रवाह बोलने और अपनी बात दृढता से कहने की वाक्पटुता है रविशंकर में। वैसी कुशलता मैं अपने आप में डेवलप करने के स्वप्न देखता हूं। और कहीं न कंहीं यह भी जानता हूं कि अब वैसी पटुता सम्भव नहीं है पाना! अंत: मन्त्र मुग्ध सा सुनता हूं रविशंकर जी को।

भदोही की बात करते रविशंकर बताते हैं कि भर-द्रोह भर में भदोही का इतिहास समेटना एक व्यापक षडयन्त्र का हिस्सा है – उस प्रकार के लोग जो 1200-1400इस्वी के मध्य भरों के किलों के होने और उसके बाद मुहम्मद गोरी की सेना द्वारा पददलित/ध्वस्त किये जाने को ही भदोही के इतिहास का खूंटा मानते हैं; उन लोगों का षडयन्त्र। और इस षडयन्त्र में स्यूडो-सेक्युलर लोग महती भूमिका निभाते हैं।

भदोही के प्राचीन इतिहास के बारे में रविशंकर जो भी कह रहे थे, उसकी भाषा मेरी स्मृति में जस की तस नहीं है, नोट्स भी बहुत अच्छे लिये नहीं हैं; पर उनके कहने से यह जरूर समझ गया कि आज से 50 हजार से 5 हजार साल पहले तक गंगा की धारा बहुत उथली थी और वे अपना कोर्स व्यापक रूप से बदलती थीं। बहुत कुछ कोसी नदी की तरह। भदोही जिले में सभी पुरातत्व स्थल (100 के आसपास तो रविशंकर जी ने ही आइडेण्टीफ़ाई किये हैं अपने सर्व में) कमोबेश गंगा के किनारे ही थे नव पाषाण युग में। कालान्तर में गंगा की धारा संयत हुई और वर्तमान दशा में (लगभग) स्थिर हुई।

रविशंकर मेरे समक्ष इतिहास-प्रागैतिहास का तिलस्म खोल रहे थे – यह द्वारिकापुर जहां हम बैठे थे; वह तब भी यहीं था और इसी नाम से! उन्होने बताया कि भदन्त आनन्द कौशल्यायन का पाली से अनुदित कुलाल जातक का उन्होने अध्ययन किया। उसमें वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय भगवान बुद्ध के पूर्व जन्म की चर्चा है – वाराणसी नगर के द्वारग्राम में कुम्भकार कुल में उत्पन्न पूर्व जन्मना तथागत। यह संदर्भ 600 बीसी के आसपास द्वारग्राम (द्वारिकापुर) में एक बड़ी कुम्हार बस्ती का होना बताता है।

रविशंकर बताते हैं कि भूमि खनन का माफिया (या निरीह किसान भी) खेत-जमीन से मिट्टी निकालने की प्रक्रिया में आर्कियॉलॉजिकल साइट्स को खत्म किये दे रहा है। इलाके की 100 में से तीस-चालीस प्रतिशत साइट्स उनके देखते देखते गायब या इनसिग्नीफिकेण्ट हो गयी हैं।

भदोही का इतिहास भू ठेकेदार माफिया; मनरेगा और खनन विभाग की तिकड़ी द्वारा नष्ट कर दिया जा रहा है और आर्कियालॉजिकल सर्वे वाले भिखारी के मानिन्द वह सब होते देख रहे हैं!

IMG_20180407_083358
खनन माफिया के आराध्यदेव हनुमान जी।

रविशंकर भदोही को भद्रा नदी (कूर्म/वाराह पुराण में वर्णित गंगा का एक नाम भद्रा) या जिले में प्राप्त भैदपुर (भद्रपुर) जो मौर्यकालीन पुरातत्व प्रमाण युक्त स्थान है अथवा भदरांव (भद्रांव) से जोडने का प्रयास करते हैं। उनके अनुसार ये जगहें वहां हैं, जहां गंगा (भद्रा) कभी बहती रही होंगी। रविशंकर स्वयम् अपनी इस सोच से संतुष्ट नहीं हैं; पर वे इस दृढ मत के हैं कि भदोही के नाम और इलाके का अस्तित्व 1200 इस्वी से तो कहीं ज्यादा पुराना है। नव पाषाण युग तक तो वह जाता ही है।

रविशंकर से मिल कर मैं अपने घर के लिये जब चला तो वे और उनके दोनो मित्र मुझे मेरे वाहन तक छोड़ने आये। पूरा आदर-सम्मान दिया मुझे और भविष्य में अनेकानेक उठने वाले मेरे सवालों का उत्तर देने का प्रयास करने का आश्वासन भी दिया।

चलते समय मुझे लगा कि डा. अशोक कुमार सिंह, रविशंकर (और कुछ सीमा तक मैं भी) गंगा नदी के इर्दगिर्द अपने लिये वर्तमान और भविष्य का स्थान खोज रहे हैं। हम लोग अपने लिये लीगेसी (legacy – भविष्य की पीढियों के लिये छोड़ी जाने वाली अपनी विरासत) के मेगालिथ खोज रहे हैं। डा. अशोक को वह अगियाबीर में नजर आता है। रविशंकर (भले ही भदोही पर रिसर्च करने को रिलक्टेण्टली तैयार हुये) भदोही इलाके के प्रागैतिहास/इतिहास में वह लीगेसी तलाश रहे हैं। मुझे अपने ब्लॉग से उम्मीद है कि कालान्तर में वह मुझे लीगेसी प्रदान करेगा। ब्लॉग जो आस-पास (मुख्यत: गंगा नदी के इर्दगिर्द) घूमता है। गंगा नदी अमृतवाहिनी हैं और हम लोगों को – डा. अशोक, रविशंकर और मुझे – लीगेसी का अमृतत्व प्रदान करेंगी। बस, अपनी अपनी जद्दोजहद; अपनी अपनी कशमकश में हम लगे रहें।… अमृतस्य गंगा!

अपनी धुन में रमे हैं और अपनी धुन के पक्के हैं डा. अशोक और रविशंकर। और यह सुदृढ लीगेसी के अमृत की चाह, एक जुनून से ही मिलती है! मुझे पक्का यकीन है उस विषय में!

हां, पूरा और पक्का!

GDApr187537
रविशंकर जी ने खींचा अगियाबीर पुरातत्व खनन स्थल पर मेरा (बायें), शिवकुमार (विभागीय ड्राफ़्ट्समैन) और किशोर महराज (रसोईया) का चित्र।

डेढ़ी – डेढ़ किलोमीटर लम्बी गांव की सड़क


GDMar187391
डेढ़ी पर आती (शायद गंगा किनारे से) दो महिलायें। 

वह व्यक्ति नहीं है, गाय गोरू भी नहीं है। वह गांव की सड़क है। उसके एक ओर रेलवे लाइन है। अगर लाइन का अवरोध न होता तो वह नेशनल हाईवे-19 तक जाती। दूसरी ओर द्वारिकापुर गांव है जो गंगा नदी के तीर पर है। कुल मिला कर यह सड़क, डेढ़ी, रेलवे लाइन और गंगा नदी को जोड़ती है। कहा जाये तो रेलवे लाइन और गंगा नदी देश की धमनियां हैं। दो धमनियों को जोड़ने वाला मानव निर्मित शण्ट या बाईपास है डेढ़ी। इसके अलावा यह सड़क पूर्वांचल के दो जिलों – मिर्जापुर और भदोही की सीमा पर है। इसके पूर्वी ओर करहर है – जो मिर्जापुर जिले में है और पश्चिमी तरफ़ भगवानपुर है, भदोही जिले में।

GDMar187392
डेढ़ी पर गंगा-स्नान कर लौटते साइकिल सवार।

डेढ़ी कुल डेढ़ किलोमीटर लम्बी है। लम्बाई नापने के लिये मैने गूगल मैप का सहारा नहीं लिया। यह और इसके जैसी अन्य कई गंवई सड़कें जो प्रधानी के फ़ण्ड में बनती हैं, उनका गूगल मैप पर अस्तित्व नहीं है। इन्हे कैसे जोड़ा जा सकता है – मुझे नहीं मालूम। अन्यथा करीब एक दर्जन सड़कों को डिजिटल सभ्यता में खींच लाता मैं। इसकी लम्बाई मैने साइकिल के पैडल गिन कर की। गांव देहात में दूरी नापने के लिये मैं वही गिनता हूं। एक किलोमीटर में 204 पैडल के हिसाब से गिनती को दूरी में परिवर्तित करता हूं। यह बहुत खुरदरा तरीका है। मुझे साइकिल में एक स्पीडोमीटर लगवा लेना चाहिये, पर वह टलता जा रहा है।

GDMar187393
यह महिला सिर पर क्या लिये चली जा रही है परात में? यह आपके लिये भी कौतूहल है और मेरे लिये भी!

डेढ किलोमीटर की पतली सड़क – जिसके किनारे बहुत कम लोग रहते हैं; ज्यादा तक गंगा के डूब में आने वाला सिवान है; का भी अपना एक व्यक्तित्व हो सकता है? मुझे यह बेकार सी सड़क लगती थी। पर कुछ दिन इसपर साइकिल चलाई तो इससे मोह हो गया है। इनफ़ैचुयेशन। बुढापे का प्रेम।

अब यह मेरे लिये चुनौती है कि इस पर मैं एक दो दर्जन ब्लॉग पोस्टें लिख सकूं! ध्यान से देखता हूं तो लगता है डेढ़ किलोमीटर की इस सड़क के दोनो ओर बहुत कुछ है जो मुझे (और पढ़ने वालों को भी) रोचक लग सकता है। इसके किनारे के खेत, पेड़, घास-फूस, बस्ती और उसके बाशिन्दे, सड़क पर चलते लोग और वाहन … सब मिला कर एक रोचक केनवास है।

अपना जूम वाला ब्रिज पॉइण्ट-एण्ड-शूट कैमरे की धूल पोंछ लो और बैटरी री-चार्ज कर लो, जीडी। वह सब दर्ज करो चित्रों में जो डेढ़ी के साइकिल भ्रमण में आंखों से देखते और मन में सोचते हो। अपने विपन्न शब्द भण्डार को भी मांज लो। तुम अज्ञेय सा तो नहीं लिख सकते, पर जैसा तुम लिखते थे, वैसा तो लिख सको अपनी पोस्टों में!

GDMar187394
डेढ़ी के उत्तरी ओर सिवान खत्म होता है। कुछ वृक्ष हैं। यहां आधा दर्जन मोर दिखते हैं। चित्र में महिला अरहर की फसल काट कर गठ्ठर बनाती हुई।

  अगला महीना, दो महीना डेढ़ी के इर्दगिर्द रहेगा!