दस दिवसीय दाह संस्कार क्वारेण्टाइन – शोक, परंपरा और रूढ़ियां

पिताजी की याद में कई बार मन खिन्न होता है. पर उनकी बीमारी में भी जो मेरा परिवार और मैं लगे रहे, उसका सार्थक पक्ष यह है कि मन पर कोई अपराध बोध नहीं हावी हो रहा.



पिताजी का देहांत 11 अक्टूबर को हुआ था. अगले दिन रसूलाबाद, प्रयाग में दाह संस्कार. उसी दिन से यहां शिव कुटी में घण्ट स्थापना की. सुबह शाम वहां जल देने और दीपक जलाने का कर्म कर रहा हूं मैं.

शिव कुटी में गंगा किनारे इस पीपल पर बंधे घण्ट में जल देने और दीपक जलाने का नित्य कर्म कर रहा हूं मैं.

शोक है. रीति पालन की भावना भी है; पर कर्म कांड का रूढ़ निर्वहन नहीं हो रहा.

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नंदू नाऊ का मोनोलॉग

नंदू के पास देश काल समाज की बहुत जानकारी है जो वह मुझ जैसे “उपयुक्त” श्रोता को सुनाने की इच्छा का दमन नहीं करता.



नंदू नाऊ मुझे तरह तरह की सूचना और जानकारी देता है सवेरे और शाम की घण्ट यात्रा के दौरान. बताता है कि ज्ञान बालू वाले के पास उसका घर है. पंद्रह साल से घाट और घण्ट के दाह/श्राद्ध का नाऊ का काम कर रहा है. इतने समय में करीब 1500 दाह और घण्ट के अनुष्ठान करवा चुका है. अभी तो मरने का सीजन नहीं है. बरसात और उसके आसपास के मौसम में मौतें कम ही होती हैं. तेज सर्दी और गर्मी में उम्रदराज लोग ज्यादा जाते हैं. उस समय नंदू को कभी कभी दम मारने को फुर्सत नहीं होती.

रसूलाबाद श्मशान घाट. नंदू यहां दाह कर्म में सहायता करता है.

जब उम्र गुजार कर कोई जाता है तो परिवार को भले ही कष्ट होता है, पर वह इतना अखरता नहीं. पर जब बच्चा या जवान खत्म होता है तो मन छटपटाता है. कभी कभी एक सप्ताह शादी को हुआ और नौजवान चला गया. और कभी तो छोटे बच्चे जिसका जनेऊ हो जाने के कारण श्राद्ध कर्म करना होता है, का क्रिया कर्म भी कराया नंदू ने. वह तकलीफ देह था.

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श्री कृष्ण अवतार पाण्डेय

मेरे लिए तो कृष्ण अवतार जी रोल मॉडल हैं. धारा प्रवाह सुसंस्कृत अवधी.. बुढ़ापे को सम्मानजनक रुप से काटने के लिए सजग और देश काल पर सूक्ष्म अवलोकन वाली दृष्टि.


कल मेरे पट्टीदार श्री कृष्ण अवतार पाण्डेय जी आए. पिताजी से पांच साल छोटे. पिताजी के देहावसान पर मुझे सांत्वना देना मुख्य ध्येय था उनके आने का.

अस्सी पार हैं वे. शिक्षा विभाग में राजपत्रित अधिकारी रह चुके थे और बहुत प्रखर आदर्शवादी थे/हैं.

पिताजी के लिए उन्होंने कहा कि वे उनके रोल मॉडल थे. उस समय प्रथम श्रेणी के इंटर पास किए थे. बताया कि उनके (मेरे पिताजी के) बारे में उस समय गांव देस के माँ बाप कहते थे – उनके जैसा बनो.

पर मेरे लिए तो कृष्ण अवतार जी रोल मॉडल हैं. धारा प्रवाह सुसंस्कृत अवधी. अनेक विषयों पर कमांड और पुस्तकों का लेखन. बुढ़ापे को सम्मानजनक रुप से काटने के लिए सजग और देश काल पर सूक्ष्म अवलोकन वाली दृष्टि. मुझे लगता है कि इस अवस्था में भी वे घोर पढ़ने वाले होंगे. वे कह रहे थे कि पठन सामग्री का तो विस्फोट है आजकल. जितना पढ़ो उससे कई गुना इन्टरनेट और सोशल मीडिया थमा देता है.

कृष्ण अवतार पाण्डेय जी

उनका अंश मात्र भी बन पाया तो सौभाग्य होगा मेरा.

गांव के बारे में बताने लगे – उस जमाने में दो तीन लोग कलकत्ता गए थे और एक बम्बई. अब तो अनेक बाहर हैं. अनेक शहरों में. देस में और परदेश में भी. भांति भांति की नौकरी कर रहे हैं बाहर जा कर नौजवान. देहात में बूढ़े और पुरनियां भर बचे हैं. गांव में अब भूत चुड़ैल भी कम हो गई हैं. उनको देखने और गढ़ने वाले भी अब उतने नहीं रह गए.

करीब घंटा भर रहे वे मेरे यहां और उनके जाने के बाद मुझे लगा कि धारा प्रवाह अवधी में बोल बतियाने का संक्रमण दे गए मुझे.

प्रेरणास्पद व्यक्तित्व! 🙏


अपने ब्लॉग, मानसिक हलचल, पर सोच विचार

वैसे मैं ब्लॉग पर ट्रैफिक के आंकड़े देखता हूं तो पाता हूँ कि हिन्दी ब्लॉगिंग के स्वर्णिम (?) काल की बजाय आज उसपर आने वालों की संख्या दैनिक आधार पर तिगुनी है. लोग टिप्पणियाँ नहीं (या बहुत कम) कर रहे हैं, पर पढ़ने वाले पहले से ज्यादा हैं.



मेरा हिन्दी का ब्लॉग मानसिक हलचल (halchal.blog) मुख्यतः भारत, अमेरिका, सिंगापुर और कुछ यूरोपीय देशों में पढ़ा जाता है.
हिन्दी ब्लॉगिंग के स्वर्णिम दौर में मैं छोटे ब्लॉगिंग दायरे में प्रसन्न था. बाद में मेरे कुछ ब्लॉग मित्र पुस्तक ठेलने में लग गए. मुझे भी बहुत से मित्रों ने कहा कि वह करूँ. अनूप शुक्ल जी तो बहुत कहते रहे, अभी भी कहते हैं, पर वह मैं कर नहीं पाया.

मानसिक हलचल पर पाठक यातायात. आंकड़ा wordpress के App का स्क्रीनशॉट है. जितना गाढ़ा लाल रंग, उतने अधिक पाठक.

मैं भी सोचता था कि ब्लॉग की पुरानी पोस्टों में ही इतना कन्टेन्ट है कि एक दो पूरे आकार की पुस्तकें उसमें से मूर्त रूप ले सकती हैं. कई बार गंभीरता से सोचा भी. पर कुल मिला कर अपने को ब्लॉगर से पुस्तक लेखक के रुप में रूपांतरित नहीं कर पाया. शायद पुस्तक लिखने के बाद उसका प्रकाशक तलाशने और उसकी बिक्री की जद्दोजहद करने का मुझमें माद्दा नहीं था/है. या फिर यह शुद्ध आलस्य ही है.

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द मिलियनेयर नेक्स्ट डोर – पास के गांव वाले सूर्यमणि तिवारी जी

इकहत्तर साल से अधिक उम्र के व्यवसायी, तथाकथित वानप्रस्थ की उम्र में, जिस प्रकार स्टेट ऑफ टेक्नॉलजी और मार्केट पर अपने विचार रख रहे थे, वह सुन कर अपने रिटायरमेन्ट पर मुझे संकोच होने लगा.



थॉमस स्टेनली और विलियम देन्को की पुस्तक है – द मिलियनेयर नेक्स्ट डोर (The Millionaire Next Door). अमेरिका के करोड़पति लोगों के बारे में पुस्तक. अमेरिका सबसे ज्यादा मिलियनेयर बनाने वाला देश है. वहां ज्यादातर लोग चांदी के चम्मच के साथ पैदा होने की बदौलत नहीं, अपनी कर्मठता के बूते मिलियनेयर बनते हैं.

यह पढ़ने योग्य पुस्तक है. यद्यपि 1996 में लिखी/छपी है पर धनी लोगों का समाज-विज्ञान के दृष्टिकोण से अध्ययन करने के लिए आज भी प्रासंगिक है.

Blinkist में The Millionaire Next Door के पुस्तक संक्षेप का पहला पेज

भारत में ऐसे सेल्फ मेड “धनी” लोगों की संख्या कम है. बहुत कम. और जैसा सुनने में आता है, लोग मेहनत की बजाय तिकड़म पर ज्यादा यकीन करते हैं. नेतागिरी – नौकरशाही – अपराध के दांवपेंच (नेक्सस) से पैसा कमाने वाले लोग और उनकी धन-पशुता के किस्से बहुत हैं. पर वे उत्कृष्टता की चाह रखने वाले लोगों के लिए रोल मॉडल तो हो नहीं सकते.

अतः ऐसा अध्ययन – विशेष रूप से ग्रामीण या कस्बाई वातावरण से उठे और नैतिक आधार पर सफल हुए लोगों के बारे में अध्ययन; भारत में तो नहीं हुआ दिखता.

मेरे पास नैतिक मूल्यों पर खरे, एक “भारतीय मल्टी मिलियनेयर नेक्स्ट डोर” से मिलने का अवसर था. सूर्या ट्रॉमा सेंटर में मेरे पिताजी भर्ती थे और वहां से दो किलोमीटर दूर उगापुर नामक गांव में रहते हैं श्री सूर्यमणि तिवारी. वहीं उनका गलीचा उद्योग का कारखाना है. सवेरे नौ बजे तिवारी जी से मिलना तय हुआ. मेरी पत्नीजी और मैं वहां गए. प्रशांत, जिन्हें सूर्य मणि जी विश्वस्त और पुत्रवत मानते हैं, हमें अस्पताल से ले उनके पास पंहुचे.

मोटे तौर पर समझ आई हमें कालीन बनाने की प्रक्रिया, पर गहराई से सभी गतिविधियां जानने के लिए तो कई बार देखना समझना पड़ेगा. वेब सर्च में मुझे बहुत बढ़िया जानकारी नहीं मिली. इसलिए समझने के लिए उगापुर या उसी प्रकार के अन्य उपक्रमों के चक्कर लगाने होंगे. शायद कुछ पुस्तकें भी खंगालनी पडें.

शिव जी के मंदिर में यह बड़ा रोचक यंत्र था. एक DC मोटर से चलता घंटी और नगाड़े का युग्म. पंडित जी शिव स्तोत्र गा रहे थे और स्विच से चालू किए इस यंत्र से घंटी नगाड़ा बजने लगे!

पहले प्रशांत जी ने सूर्या उपक्रम के कारखाना परिसर में हनुमान जी और शिव जी के मंदिर के दर्शन कराए. पुजारी जी ने मेरे मस्तक पर तिलक त्रिपुण्ड लगाया. उसके बाद हमने कारखाने की विविध गतिविधियों का अवलोकन किया. प्रशांत जी ने हम; कार्पेट बनाने की प्रॉसेस से पर्याप्त अनभिज्ञ; दोनों को बड़े धैर्य से सब समझाया.

ऊन से कार्पेट बुनने का धागा बनाने का संयंत्र. तकनीकी नाम मैंने नोट नहीं किया. 🙁

पूरे भ्रमण में जो हिस्सा मुझे ज्यादा रुचा वह था सूर्या कार्पेट्स का कॉफी टेबल बुक साईज के लगभग 1000 पेज का आकर्षक डिजाइन केटलॉग. इस फर्म (Surya Inc.) द्वारा बनाए और बेचे जाने वाले विविध होम और ऑफिस डेकोर के आइटम इसमें वर्णित हैं. प्रशांत जी ने बताया कि हर छ महीने पर इस केटलॉग का नया संस्करण आ जाता है. डिजाइन की एक भारतीय और एक अमेरिकी टीमें परस्पर तालमेल से काम करती हैं. यहाँ वह टीम ऊपर की मंजिल पर स्थित थी. उनके पास मैं अपने घुटने के दर्द के कारण सीढ़ी चढ़ कर नहीं जा सका. पर निकट भविष्य में उनसे मिलने जानने का विचार अवश्य है.

डिजाइन केटलॉग की पुस्तकें

अब, जब अधिकांश भदोही के कार्पेट व्यवसायी या तो असफलताओं से थक चुके हैं या “विगत” हो चुके हैं और सूर्या कार्पेट्स जीवंत और प्रगति कर रहा है; तो सशक्त डिजाइन टीम उसके पीछे जरूर होगी. आज के और आने वाले समय में वही बचेगा और प्रगति करेगा, जिसके पास नया सोचने और प्रस्तुत करने की ऊर्जा और माद्दा होगा!

मुझे यू ट्यूब पर सूर्या कार्पेट्स के डिजाइन केटलॉग का यह वीडियो मिला. आप देखने का कष्ट करें.

कारखाना देखने के बाद हम सूर्य मणि जी से मिले. उन्होंने अपने दफ्तर के बाहर हमारा स्वागत किया. उनके दफ्तर में कुछ समय हल्की-फुल्की बातचीत हुई. फिर तिवारी जी ने सवेरे के नाश्ते का आमंत्रण दिया. पराठा सब्जी और मीठा मट्ठा. वैसा जैसा एक मध्य वित्त परिवार पौष्टिक नाश्ता होता है. मुझे ऊपर उधृत पुस्तक की पंक्तियाँ याद हो आईं. मिलियनेयर व्यक्ति नाश्ता सामान्य ही करते हैं – रोज शैम्पेन (अमरीकी रहन सहन मुताबिक) नहीं पीते. 😀

नाश्ता तिवारी जी के दफ्तर के पीछे के एक कमरे में था. तिवारी जी की इस कमरे में ही रिहाइश है. एक औसत आकर का कमरा जिसमें एक बिस्तर, सेंटर टेबल और एक सोफा के अलावा ज्यादा जगह नहीं बचती. कमरे में कोई कीमती डेकोरेशन नहीं है. कुछ पुस्तकें, एक टेलीविजन, च्यवन प्राश जैसी कुछ बोतलें और देवताओं के कुछ चित्र भर हैं. हमारे आपके कमरे और तिवारी जी के कमरे में कोई गुणात्मक अन्तर नहीं होगा.

श्री सूर्य मणि तिवारी जी

उनका दफ्तर भी बहुत बड़ा नहीं. भारत सरकार के जूनियर प्रशानिक ग्रेड के अफसर उससे कहीं बड़े और चमक दमक वाले चेंबर में काम करते हैं. दफ्तर में एक लैंड लाइन (या इंटर कॉम) फोन, दो मोबाइल (शायद एप्पल, एंड्रॉयड नहीं) और लैपटॉप के स्थान पर एक टैब – यही यंत्र थे. यानि, धन और दफ्तर का चमकदार होना समानुपातिक नहीं हैं.

नाश्ते के बाद मैंने तिवारी जी का कुछ समय अपने काम की बातों को पूछने में लिया. उन्होंने बड़े स्पष्ट उत्तर दिये.

पहला पूछने का मुद्दा कार्पेट व्यवसाय की वर्तमान दशा और इस व्यवसाय में सफलता/असफलता को लेकर था.

सूर्य मणि जी ने बताया कि आवश्यकताओं के अनुसार knotted, tufted और kelim प्रकार के गलीचे और दरी बनाए गलीचा उद्योग ने. पर अधिकांश व्यवसायी उन्नत होती तकनीक के साथ तालमेल नहीं बना पाए. इलाके में तकनीशियनों की कमी एक बड़ा मुद्दा रही.

सूर्या ने अमेरिकन दफ्तर खोल कर अपने को निर्यातकों की कतार से अलग कर आयातक बनाया. इसका फायदा मिला. अन्य निर्यातक अपनी पूंजी के प्रबंधन को भी कुशलता से नहीं कर पाए. कुछ ने तो अपनी पूंजी अपने व्यसनों में गंवाई. व्यवसाय में चरित्र पर लगाम महत्वपूर्ण होता है…

प्रशांत तिवारी. वे हमें सूर्य मणि जी से मिलवाने ले कर गए थे और उन्होंने परिसर अच्छे से घुमा कर दिखाया.

पर अब स्थितियां तेजी से बदल रही हैं. अब तक जितनी तेजी से बदली उससे कहीं ज्यादा तेजी से. ई-कॉमर्स से तालमेल बिठाना और उससे प्रतिस्पर्धा करना सरल नहीं है. वालमार्ट जैसे उपक्रमों की आर्थिक क्षमता का मुकाबला करना है. यह चिंता का कारक है. इसके अलावा अपने प्रॉडक्ट्स का सतत इनोवेशन करते रहना बड़ा चैलेंज है.

इकहत्तर साल से अधिक उम्र के व्यवसायी, तथाकथित वानप्रस्थ की उम्र में, जिस प्रकार स्टेट ऑफ टेक्नॉलजी और मार्केट पर अपने विचार रख रहे थे, वह सुन कर अपने रिटायरमेन्ट पर मुझे संकोच होने लगा. सूर्यमणि जी की मानसिक ऊर्जा से इर्ष्या होने लगी.

मैंने विषय बदला.

उनके जीवन विवरण से लोग क्या सीख समझ सकते हैं?

तिवारी जी की बेझिझक सोच थी कि अगर वे अपने अतीत को व्यक्त करेंगे तो उसका ध्येय यही होगा – एक गरीब नौजवान यह समझे कि बढ़ोतरी के लिए सिल्वर स्पून की नहीं, कड़ी मेहनत की जरूरत है. कड़ी मेहनत, नम्र व्यवहार, ईमानदारी और ईश्वर कृपा से सफलता साधी जा सकती है. उसके लिए पूंजी का होना अनिवार्य शर्त नहीं है.

अगर वे अपने जीवन और पुरानी यादों को लोगों के सामने रखेंगे तो उसका ध्येय नौजवान पीढ़ी को यही प्रेरणा देना होगा. निश्चय ही वह कथन/लेखन नौजवान पीढ़ी को केंद्र में रख कर होगा.

समाज बदला है. आगे और तेजी से बदलेगा. पर जीवन के नैतिक मूल्य वही रहेंगे. शाश्वत. उस बदलाव को दर्ज करते हुए तिवारी जी अपने अतीत की बात करना चाहते हैं. शाश्वत मूल्यों की भी बात कहना चाहते हैं. पर यह अभिव्यक्त करने में उन्हें हड़बड़ी नहीं है. वे अभी भी कर्म क्षेत्र में हैं और समय की लगाम अपने हाथ में दृढ़ता से थामे हैं.

हमें विदा करते समय वे गेट तक आए और बोले – इस मुलाकात के बाद अब वे नित्य की कुकुर छिनौती में लग जाएंगे!

दिन भर की सघन कार्य की व्यस्तता का वे मजाकिया नाम देते हैं – कुकुर छिनौती. 😀

बड़ा रोचक और प्रेरणास्पद रहा सवेरे के समय सूर्य मणि जी से मिलना. आजकल बहुधा उनका फोन सवेरे साढ़े पांच बजे आता है. वे लोगों को पहचानने और जोड़ने में पारंगत हैं. यह सवेरे का फोन शायद उसी का हिस्सा है.

लगता है हम दो बेमेल लोगों – कर्मक्षेत्र की लगाम कस कर थामे 71+ वर्षीय वे और अपनी रिटायर्ड जिन्दगी की विरक्त आसक्ति (?!) में डूबा मैं – का संपर्क आगे बना रहेगा.

फोन पर श्री तिवारी

सूर्य मणि तिवारी जी का सूर्या ट्रॉमा सेंटर और अस्पताल – एक अवलोकन

अस्पताल से कमाना तो सूर्य मणि जी का मोटिव हो ही नहीं सकता. पूर्वांचल के इस इलाके में लोगों की वैसी पे करने की केपेसिटी ही नहीं है.


मेरे पिताजी औराई के इस अस्पताल – सूर्या ट्रॉमा सेंटर और अस्पताल – में भर्ती हैं. उन्हे रक्त में संक्रमण था, जो सेप्टिसीमिया निकाला. संक्रमण की घोर वेरायटी. इसके अलावा उनकी बढ़ी उम्र के कारण डिमेंशिया की भी समस्या है. एक ओर का मस्तिष्क, वृद्धावस्था के कारण काफी क्षतिग्रस्त हो गया है.

सूर्य मणि त्रिपाठी (इन सेट में) और औराई में नया बना सूर्या ट्रामा सेंटर तथा अस्पताल

अस्पताल मेरे घर (गांव विक्रमपुर, भदोही जिला) के सबसे नजदीक (दस किलोमीटर दूर) नया खुला है. जब पिताजी को लेकर पंहुचा तो अस्पताल में किसी को जानता नहीं था. पर बिना किसी भटकाव के काउंटर पर संपर्क करते ही कर्मचारी पिताजी को ह्वील चेयर पर उतार कर आपात चेक अप के लिए ले आए और उपचार प्रारंभ हो गया.

पिताजी आई सी यू में

पूर्वांचल में जहां पहचान और सोर्स सिफारिश के बिना कुछ होता ही नहीं, हम सीधे पंहुचे और इलाज का काम शुरू हो गया. मुझे केवल उचित पेमेंट करने पड़े और दवा ला कर देनी पड़ी.

शाम तक मैं थक गया. हमने कुछ राशि एडवान्स जमा की जिससे रात में हमें आकस्मिक दवाओं के लिए न जगाया जाए. लेकिन फार्मेसी के एक कर्मी ने आधी रात जगा ही दिया – यह जानने के लिए कि दवा की दरकार है, वह दे दे तो सवेरे मैं पेमेंट कर दूँगा या नहीं.

रिटायर्मेंट के बाद किसी ने पिछले चार साल रात में फोन कर नहीं जगाया था. एक बार तो निद्रा में अपने को पुराने फ्रेम ऑफ माइंड में रख कर सोचने लगा कि शायद कोई ट्रेन एक्सिडेंट का मामला है. पर फोन की बात से समझ आ गया कि मामला अस्पताल की दुनियाँ का है, रेल की दुनियाँ का नहीं. रेल की दुनियाँ तो चार साल पहले छूट चुकी है. 😆

अगले दिन हर छोटे बड़े बिल का अलग अलग पेमेंट करते, वह भी कैश में, मैं उकता गया. मुझे समझ नहीं आया कि इतना बड़ा अस्पताल कैश की बजाय POS मशीन, UPI या Paytm से पेमेंट क्यों नहीं लेता; जब हर जगह स्टिकर लगे हैं कि “कृपया बिना रसीद के कोई पेमेंट न करें”?

श्री सूर्य मणि तिवारी

एक स्टिकर पर अस्पताल के मुखिया श्री सूर्य मणि तिवारी का फोन नंबर लिखा था. मैंने उन्हें फोन लगाया. पब्लिक को डिस्प्ले किए नंबर के बारे में सोचा कि वह कोई कर्मचारी मैनेज करता होगा. पर फोन तिवारी जी ने स्वयं उठाया और पूरी विनम्रता से बातचीत की.

मेरा पूरा नजरिया बदल गया उस बातचीत के बाद. तिवारी जी ने खेद व्यक्त किया कि अस्पताल नया होने के कारण POS मशीनें अभी नहीं आई हैं. कुछ ही दिन में आ जाएंगी. तब तक के लिए उन्होंने आस पास उपलब्ध एटीएम की जानकारी दी. उन्होने अपने चार्टर्ड एकाउंटेंट साहब, प्रशांत जी को भी मेरे पास भेजा. प्रशांत जी ने सूर्या ट्रामा सेंटर के बैंक खाते का विवरण दिया जिसमें मैं एडवान्स ट्रांसफर कर सकूं.

सूर्य मणि जी के पॉजिटिव एक्शन से मेरी समस्या का निदान हो गया. यह भी स्पष्ट हुआ कि यह अस्पताल खोलने का उनका ध्येय पैसा कमाना नहीं, अपने इलाके में परोपकार करने का है.

मैने तिवारी जी को हृदय से धन्यवाद दिया.

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इसके दो दिन बाद सूर्यमणि जी से फोन पर और आमने सामने एक लंबी परिचयात्मक बात हुई. उन्होने मेरे बारे में पूछा और अपना भी बताया. पता चला कि वे सेल्फ मेड व्यक्ति हैं. वे जब इंटर कॉलेज में थे, तभी उनके पिताजी का निधन हो गया था. पढ़ने मेें अच्छे थे तो पढ़ाई के बाद अध्यापक बन गये पास में जंगीगंज के एक स्कूल में. उन्हें जब यह समझ आया कि 3 भाई और दो बहनों का परिवार स्कूल मास्टरी की सेलरी में नहीं संभाला जा सकता तो घोसियां के अपने एक मित्र के पिताजी से कार्पेट व्यवसाय की बारीकियां समझी. 1971 में वह काम प्रारंभ किया और कालांतर में (1979 में) कार्पेट के बाजार, अमेरिका गए. वहां 1986 में अपने बेटे को ले जा कर पढ़ाया. इंजीनियर और एम बी ए बनाया.

सन 2004 में उनका अमरीका स्थित व्यवसाय 25 मिलियन (डालर) टर्नओवर का बना उनके अथक परिश्रम से.

उनकी वेब साइट surya.com से पता चलता है कि उनका लड़का सत्य उनकी कम्पनी का प्रेसीडेंट है. अब कंपनी टर्नओवर में 2004 की अपेक्षा छ गुना प्रगति कर चुकी है.

मुलाकात में मेरे पिताजी के ट्रीटमेंट के बारे में उन्होंने अपना जेनुईन कन्सर्न दिखाया. उन्होंने और यहां के प्रमुख प्रबंधक डा. रमण सिंह जी ने पिताजी के MRI जांच के बारे में व्यवस्था की.

मेरे जैसे रिटायर्ड व्यक्ति, जिसका विभागीय आभामंडल अब बिला चुका हो, के लिए इस तरह का कन्सर्न अगर सूर्य मणि जी और डा. रमण सिंह जैसे लोग दिखाएं – जिनके लिए मैं दो दिन पहले तक अजनबी था; तो निश्चय ही मेरे कुछ पूर्व संचित पुण्य होंगे. वर्ना कौन पूछता है?!

सूर्य मणि जी का कहना है कि फिलेन्थ्रॉपी के कोण से अगर मैं आनेररी आधार पर अस्पताल के लिए कुछ समय दे सकूं तो अच्छा होगा. मेरी पत्नी जी ने मुझे यह सुन कर कहा – “छुट्टा घूमने की तुम्हारी आदत हो गयी है. इसलिए मना करने की कोशिश करोगे ही. पर ऐसा करना मत. संपर्क बनाना और लोगों से जुड़ना कोई गलत बात नहीं. अंतर्मुखी बने रहे हो, पर वही सदा उचित नहीं होता.”

मुझे अपनी पत्नीजी और सूर्य मणि जी के कहने में सार दिखता है. पर अभी तय नहीं कर पा रहा हूँ कि मैं कर क्या सकता हूँ. अस्पताल की दुनियाँ मेरी आसक्ति की पटरी की नहीं है…

पर पटरी क्या है? गंगा किनारे छुट्टा घूमना और दस पांच पंक्ति लिख कर, एक दो फोटो सटा कर दिन पर दिन गुजरते देखना – वही पटरी है? शायद नहीं. पर सही क्या है?

शायद सूर्य मणि तिवारी जी के प्रस्ताव पर अपने जीवन के जड़त्व में कुछ बहाव लाऊँ. शायद.

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क्यूं बनाया है सूर्य मणि जी ने यह अस्पताल?

सूर्य मणि जी ने अस्पताल के एक कर्मी, भरत लाल मिश्र जी को मुझे पूरा अस्पताल दिखाने के लिए कहा. विभिन्न प्रकार के परीक्षण कक्ष, CT Scan तक की रेडियोलॉजिकल परीक्षण सुविधा से संपन्न, अत्याधुनिक ऑपरेशन थियेटर, फिजियोथेरेपी का विस्तृत कमरा, अनेक प्रकार के वार्ड, सेमी और पूरे प्राइवेट कमरे, केण्टीन, चार मंजिला विस्तृत रैम्प, एम्बुलेंस… सब कुछ इतना प्रचुर और आधुनिक कि किसी मेट्रो शहर के लिए भी उसे ट्रेंडी मान सकते हैं…. ऐसा अस्पताल विकसित हो रहा है यह. बस यहां के लिए डाक्टरों और प्रोफेशनल स्टाफ की और बड़ी फौज चाहिए. उसके लिए, लगता है सूर्य मणि जी सघन हेड हंटिंग में जुटे हैं.

यह है आने वाले समय का ऑपरेशन थियेटर. औराई एक कस्बा या गांव भर है, जहां यह उपलब्ध होगा सूर्या ट्रॉमा सेंटर में.

इतनी पूंजी और श्रम लगे अस्पताल से कमाना तो मोटिव हो ही नहीं सकता. पूर्वांचल के इस इलाके में लोगों की वैसी पे करने की केपेसिटी ही नहीं है. और बड़े शहरों से कोई मैडिकल टूरिज्म के लिए यहां आने से रहा.

केवल कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉसिबिलिटी का निर्वहन भी ध्येय नहीं हो सकता. उस मुद्दे पर अधिकांश कंपनियों को लिप सर्विस करते और उस मद के खर्चे में डंडी मारते मैंने देखा है.

यहां तो सूर्य मणि जी मानो पूरी साध और तन्मयता से अस्पताल बनाए हैं और विकसित कर रहे हैं….हर आधुनिक सुविधा, सहूलियत से संतृप्त अस्पताल की साकार होती परिकल्पना!

मुझे लगता है अगर कोई मोटिव है तो वह अपने इलाके की सेवा और अपनी सात्विक साख की पुष्टि ही हो सकता है. अन्यथा सारे आउट पेशेंट्स को बिना फीस लिए सुविधा देना जब कि पूरे इलाके में झोला छाप डाक्टर भी 100 रूपया झाड़ लेते हैं फटे हाल मरीज से… कोई (आसपास दिखता व्यापक और लूट खसोट का मैडिकल) व्यवसाय करने की वृत्ति तो कदापि नहीं है.

Man, at some point of time in life, breaks from mundane and starts living for his LEGACY. That’s the most pious moment. That can not come, unless the man has some substantial inner stuff in the core. सूर्य मणि जी के साथ वही हो रहा है.

इसी लिए शायद सूर्य मणि जी के इस यज्ञ में अपना योगदान, अपनी आहुति अर्पण करनी चाहिए.

तुम क्या करोगे, जी डी?