हेमेन्द्र सक्सेना जी के संस्मरण – पुराने इलाहाबाद की यादें (भाग 4)

भारत के उज्वल भविष्य की हमारी आशायें किसी अनिश्चय या भय से कुन्द नहीं हुई थीं। हम यकीन करते थे कि आम आदमी की जिन्दगी आने वाले समय में बेहतर होने वाली है।


यह हेमेंद्र सक्सेना जी की इलाहाबाद के संस्मरण विषयक अतिथि ब्लॉग पोस्टों का चौथा और अंतिम भाग हैैै।

भाग 3 से आगे –

कॉफी हाउस नियमित जाने वाले लोग वेटरों को उनके नाम से जानते और सम्बोधित करते थे। वेटर बड़ी स्मार्ट वर्दी – झक साफ सफ़ेद पतलून, लम्बे कोट और माड़ी लगी पगड़ी – में रहते थे। हेड वेटर के कमर में लाल और सुनहरी पट्टी हुआ करती थी जबकि अन्य वेटर हरी पट्टी वाले होते थे।

वे अधिकतर केरळ और तमिलनाडु के होते थे और इसके कारण इलाहाबाद का कॉस्मोपॉलिटन चरित्र और पुख्ता होता था। अधिकांश व्यवसायी पारसी या गुजराती थे -जैसे पटेल, गुज्डर (Guzder) या गांधी।

दो चाइनीज स्टोर और एक बंगाली मिठाई की दुकान भी हुआ करती थी। देश विभाजन के बाद कुछ पंजाबी भी आये। मुझे अच्छी तरह याद है मिस्टर खन्ना की लॉ की पुस्तकों की दुकान। खन्ना जी अपने छात्र दिनों के गवर्नमेण्ट कॉलेज लाहौर की यादों की बातें किया करते थे।

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हेमेन्द्र सक्सेना जी के संस्मरण – पुराने इलाहाबाद की यादें (भाग 3)

सन 1948 का समय… राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं और लालच ने कुटिलता का वातावरण बना दिया था और औसत दर्जे की सोच ने उत्कृष्टता को कोहनिया कर अपना स्थान बनाना प्रारम्भ कर दिया था।


यह हेमेंद्र सक्सेना जी की इलाहाबाद के संस्मरण विषयक अतिथि ब्लॉग पोस्टों का तीसरा भाग है।

भाग 2 से आगे –

सन 1948 में एक अत्यंत मेधावी विद्यार्थी और वाद-विवाद का वक्ता छात्र संघ का चुनाव हार गया। यह कहा जा रहा था कि विरोधी उम्मीदवार और उसके समर्थक यह फैला रहे थे कि एक “किताबी कीड़ा” विश्वविद्यालय प्रशासन का “चमचा” ही बन कर रहेगा और बहुसंख्यक विद्यार्थियों के हितों के लिये पर्याप्त आंदोलन नहीं करेगा। राजनैतिक महत्वाकांक्षाओं और लालच ने कुटिलता का वातावरण बना दिया था और औसत दर्जे की सोच ने उत्कृष्टता को कोहनिया कर अपना स्थान बनाना प्रारम्भ कर दिया था। नैतिकता का वलयाकार रास्ता नीचे की ओर फिसलने लगा था और “नेतागिरी” धीरे धीरे “गांधीगिरी” का स्थान लेती जा रही थी।

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हेमेन्द्र सक्सेना जी के संस्मरण – पुराने इलाहाबाद की यादें (भाग 1)

सन 1944 में इलाहाबाद “पूर्व के ऑक्सफोर्ड” के नाम से जाना जाता था। दो किलोमीटर के दायरे में विश्वविद्यालय सीनेट हॉल, म्योर सेण्ट्रल कॉलेज, आनन्द भवन और पब्लिक लाइब्रेरी स्थित थे। कहा जाता था कि अगर एक ढेला यहां फेंका जाये तो किसी न किसी महान हस्ती पर गिरेगा।


हेमेन्द्र सक्सेना जी अब 91 वर्ष के हैं और उनकी सम्प्रेषण की क्षमता और काबलियत किसी भी मेधावी नौजवान से अधिक ही है। वे इलाहाबाद के उस समय के गवाह रहे हैं जब वहां हर गली नुक्कड़ पर महान विभूतियां चलती फिरती दिखाई पड़ती थीं। उन्होने “Remembering Old Allahabad” शृखला में नॉर्दन इण्डिया पत्रिका में लेख लिखे हैं। मेरे मित्र श्री रमेश कुमार जी – जो उनके पारिवारिक मित्र भी हैं, ने 14 पृष्ठों की हेमेन्द्र जी की एक हस्तलिखित पाण्डुलिपि की फोटोकॉपी दी है। मुझे नहीं मालुम कि यह एन.आई.पी. में छप चुकी है या नहीं। गौरी सक्सेना (उनकी पुत्री और मेरी रेलवे की सहकर्मी) ने बताया कि और भी बहुत सा उनका लिखा घर पर मौजूद है पर वे उसे प्रकाशित करने के बारे में बहुत मॉडेस्ट हैं।

गौरी सक्सेना ने अपने पिताजी की सहमति उनके लिखे के अनुवाद को ब्लॉग पर प्रस्तुत करने के लिये दी है। मैं उनका आभारी हूं। यह करीब 5 भागों में प्रस्तुत होगा।

इस परिचयात्मक नोट के अन्त में कहा जा सकता है कि यह हेमेन्द्र सक्सेना जी की अतिथि ब्लॉग पोस्ट है।


हेमेन्द्र सक्सेना जी की हस्तलिखित पांडुलिपि का स्क्रीनशॉट
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हेमेन्द्र सक्सेना, रिटायर्ड अंग्रेजी प्रोफेसर, उम्र 91, फेसबुक पर सक्रिय माइक्रोब्लॉगर : मुलाकात

हेमेन्द्र जी ने अपने संस्मरण टुकड़ा टुकड़ा लिखे हैं. उनके लगभग 14 पन्ने के हस्त लिखित दस्तावेज की फोटो कॉपी मेरे पास भी है. कभी बैठ कर उसका हिन्दी अनुवाद कर ब्लॉग पर प्रस्तुत करूंगा.


वे इलाहाबाद (प्रयागराज) विश्विद्यालय के अंग्रेजी के प्रोफेसर रह चुके हैं. फेसबुक में उनकी प्रोफाइल पर उनका जन्मदिन दर्ज है – 29 मार्च 1928. मैं गौरवान्वित होता हूँ कि वे मेरे फेसबुक मित्र हैं. पिछले दिनों में उनसे मिलने गया था मैं.

हेमेन्द्र सक्सेना जी, रमेश कुमार और गौरी सक्सेना. हेमेन्द्र जी के बैठक कक्ष में

हेमेन्द्र सक्सेना जी 91 वर्ष के होने के बावजूद भी शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत चुस्त दुरुस्त हैं. उनके घर हम लगभग दो घंटे रहे और बातचीत का सिलसिला हमने नहीं, उन्होने ही तय किया. पूरे दौरान वे ही वक्ता थे. हम श्रोता और वह भी मंत्र मुग्ध श्रोता.

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रमेश कुमार जी के रिटायरमेण्ट अनुभव


श्री रमेश कुमार, मेरे अभिन्न मित्र। जिन्होने अपना चित्र भेजने के लिये पहली बार अपना सेल्फी लिया!
श्री रमेश कुमार, मेरे अभिन्न मित्र। जिन्होने अपना चित्र भेजने के लिये पहली बार अपना सेल्फी लिया!

रमेश कुमार जी मेरे अभिन्न मित्रों में से हैं। हम दोनों ने लगभग एक साथ नौकरी ज्वाइन की थी। दोनो केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण में असिस्टेण्ट डायरेक्टर थे। कुंवारे। दिल्ली के दूर दराज में एक एक कमरा ले कर रहते थे। घर में नूतन स्टोव पर कुछ बना लिया करते थे। दफ़्तर आने के लिये लम्बी डीटीसी की यात्रा करनी पड़ती थी – जो अधिकांशत: खड़े खड़े होती थी।

क्लास वन गजटेड नौकरी लगने पर जो अभिजात्य भाव होता, वह नौकरी लगने के पहले सप्ताह में ही खत्म हो चुका था। याद है कि जब एक मित्र ने बताया था कि वह अपने लिये मकान खोजने निकला तो मकान मालिक ने गजटेड नौकरी की सुन कर कहा था – “नो, यू पेटी गवर्नमेण्ट सरवेण्ट काण्ट अफ़ोर्ड दिस अकॉमोडेशन” ( नहीं, तुम छुद्र सरकारी कर्मचारी इस मकान का किराया भर नहीं पाओगे)।

खैर हम दोनों में कोई बहुत एयर्स नहीं थी सरकारी अफसरी की – न उस समय और न आज।
कालान्तर में मैं रेलवे की यातायात सेवा ज्वाइन कर दिल्ली से चला आया पश्चिम रेलवे में, पर रमेश जी केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण में ही रहे। उसी सेवा में उन्होने कुछ वर्ष पावर ग्रिड कार्पोरेशन की डेप्यूटेशन पर इलाहाबाद में काटे। उस समय मैं भी वहां पदस्थ था उत्तर-मध्य रेलवे में। एक जगह पर होने के कारण पुरानी मैत्री पुन: प्रगाढ़ हो गयी। वह प्रगाढ़ता आज भी बनी है।

रमेश जी रिटायर हुये इसी साल जून के महीने में। मैं सितम्बर में होने जा रहा हूं। वे इलाहाबाद और दिल्ली के बीच रहते हैं। अधिकांशत: इलाहाबाद। मैं इलाहाबाद और वाराणसी के बीच रहूंगा – अधिकांशत: कटका में। ज्यादा दूरी नहीं रहेगी। वैसे भी; मैं इलाहाबाद-वाराणसी के बीच एक मन्थली सीजन टिकट का पास बनवाने की सोच रहा हूं – जिससे इलाहाबाद आना जाना होता रहेगा। उनसे सम्पर्क भी बना रहेगा।

उस रोज रमेश जी से बात हो रही थी। अपने रिटायरमेंण्ट के बाद के लगभग ढाई महीने से वे काफ़ी प्रसन्न नजर आ रहे थे। मैने उनसे कहा कि ऐसे नहीं बन्धु, जरा अपना अनुभव ह्वाट्सएप्प पर लिख कर दे दो। उसे मैं भविष्य के लिये ब्लॉग पर टांग दूं और हां, एक चित्र – सेल्फी भी जरूर नत्थी कर देना।

इस तरह के काम में रमेश कुमार मुझसे उलट काफी सुस्त हैं। खैर, मैत्री का लिहाज रखते हुये एक दो मनुहार के बाद उनका लिखा मुझे मिल गया और थोड़ी और मनुहार के बाद सेल्फी भी।

अपनी कहता रहूं तो रमेश जी के साथ जो जीवन गुजारा है – उसपर एक अच्छी खासी पुस्तक बन सकती है। सुख और दुख – दोनों में बहुत अन्तरंग रहे हैं वे। पर यहां उनका ह्वाट्सएप्प पर लिखा प्रस्तुत कर दे रहा हूं।अन्ग्ररेजी से हिदी अनुवाद के साथ।

रमेश लिखते हैं –

आज आपसे बात कर बहुत प्रसन्नता हुई। मेरे ख्याल से आप 30 सितम्बर की काफ़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे होंगे। पिछले दो महीने से अधिक से मैं अपनी रिटायर्ड जिन्दगी पूरी तरह एन्ज्वॉय कर रहा हूं। मैं किसी अनुशासित दिनचर्या पर नहीं चल रहा (सिवाय नित्य सवेरे की सैर और यदा-कदा शाम की सैर के)। मैं पढ़ता हूं – करीब तीन-चार समाचारपत्र और जो हाथ लग जा रहा है (इस समय एक से अधिक पुस्तकें पढ़ रहा हूं) तथा बागवानी करता हूं। मुझे पक्का यकीन है कि आपके पास ढेरों अपठित पुस्तकें होंगी। अब समय आ रहा है कि उनके साथ न्याय किया जाये। और आपको तो लिखने में रुचि है – आपके पास तो अवसर ही अवसर हैं अब।

मैं संगीत सुनता हूं और अब सीखने का भी प्रयास करने लगा हूं। मैं किसी न किसी प्रकार से समाज सेवा भी करना चाहता हूं – यद्यपि उसके बारे में विचार पक्के नहीं किये हैं।

मेरा डाईबिटीज़ कण्ट्रोल में है। मेरी HbA1C रीडिंग 7.3 से घट कर 6.5 हो गयी है। मुझे पक्के तौर पर नहीं पता कि यह चमत्कार कैसे हुआ, पर निश्चय ही रिलेक्स जिन्दगी, समय की किसी डेडलाइन को मीट करने की अनिवार्यता न होना, आफिस का तनाव घर पर न लाने की बात ने सहायता की है। कुल मिला कर मुझे जो करने का मन है, वह कर रहा हूं। मेरे ख्याल से हर आदमी यही चाहता है।

अगर पैसा कमाने की कोई बाध्यता नहीं है ( सरकार सामान्य और सन्तुष्ट जीवन जीने के लिये पर्याप्त दे देती है) और अगर स्वास्थ्य के कोई बड़े मुद्दे नहीं हैं तो अनेकानेक सम्भावनायें है जीवन को आनन्द से व्यतीत करने की, रिटायरमेण्ट के बाद। आप अपनी सुनें और तय करें।

मुझे बहुत उत्सुकता है आपके नये ’आशियाने’ को देखने की कटका में। ज्यादा आनन्द के लिये हंस-योग का प्रयास करें।

सस्नेह,
रमेश कुमार।


रमेश कुमार जी ने हंस-योग का नाम लिया अन्त में। इसके विषय में उनसे पूछना रह गया। सम्भवत: वे स्वामी परमहंस योगानन्द या उनसे सम्बद्ध किसी योग (क्रिया योग?) की बात कर रहे हैं। शायद उनका आशय यह है कि मैं किसी योग-प्राणायाम आदि की ओर अपना झुकाव बनाऊं।

देखता हूं, आगे क्या होता है। अभी तो मन सूर्योदय को गंगा की बहती धारा में झिलमिलाते देखने को ही ललचा रहा है! बस!