पेण्ट माई सिटी प्रॉजेक्ट, प्रयागराज


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प्रयागराज गया था मैं पिछले मंगलवार। ढाई दिन रहा। शिवकुटी का कोटेश्वर महादेव का इलाका बहुत सुन्दर चित्रों वाली दीवालों से उकेरा हुआ था। पहले यह बदरंग पोस्टरों से लदा होता था। बड़ा सुन्दर था यह काम।

(अर्ध) कुम्भ मेला तीन महीने में होगा प्रयागराज में। कई शताब्दियों बाद शहर का नाम पुन: प्रयागराज हुआ है। शिवकुटी में जो भी लोग मिले, सबने कहा कि मैं मेले के समय प्रयाग में ही रहूं। ये चित्र देख कर जोश मुझे भी आ रहा था कि प्रयागराज में अगले कुम्भ मेले के दौरान रहना अच्छा अनुभव होगा। Continue reading “पेण्ट माई सिटी प्रॉजेक्ट, प्रयागराज”

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घुरहू मुसहर से बातचीत


IMG_20180330_072020-02.jpgकरहर में महुआ के पेड़ के नीचे बैठा मिला घुरहू। पास में एक करीब 10 फुट की लग्गी (पेड़ से पत्ते तोड़ने की पतले बांस की चोंच जुड़ी डण्डी) पड़ी थी। साथ में उसकी पत्नी और एक कम्बल। पत्नी पास के किसी नल से अपने बरतनों में पानी भरकर लाई थी। बरतन में था एक अल्यूमिनियम की बटुली, एल लोटा, एक तसली और एक कडछुल। घुरहू के पास चप्पल थी, पत्नी बिना चप्पल के दिख रही थी।

उसने बताया कि कल से कटका स्टेशन पर डेरा डाल रखा है। रहने वाला कपसेटी के पास किसी गांव का है। कपसेटी यहां से करीब 25 किलोमीटर दूर है। वहां गांव में कोई बाबू साहब बड़े जम्मींदार हैं। पचास बीघे के काश्तकार। उन्होने रहने को जगह दी है। भारत सरकार ने मकान भी दिया है बनवा कर। मां बाप वहां रहते हैं। घुरहू की पत्नी ने बताया कि एक आठ-दस साल की बच्ची भी है उनकी। गांव में मा-बाप के पास रख छोड़ी है। पत्तियां बीनने के लिये दर दर घूमने में उस बच्ची को साथ ले कर चलना कठिन काम था।

आजकल महुआ की ताजा पत्तियां नहीं हैं। तोडने में ज्यादा नहीं मिलतीं तो सूखी पत्तियां बीन कर पानी में गीला कर तह लगाते हैं वे मुसहर लोग। शाम तक जितनी इकठ्ठा हो जाती हैं, वह ले कर ट्रेन में बैठ जाते हैं और अगले दिन सवेरे बनारस में बेच कर वापस लौटते हैं। घुरहू ने जब यह बताया तो मझे स्पष्ट हुआ कि रेलवे स्टेशन पर डेरा क्यों जमाते हैं ये मुसहर। रेलवे की बिना टिकट बनारस आने जाने की सुविधा उनके जीवन यापन का महत्वपूर्ण अंग है।

जैसा घुरहू ने बताया – रोज करीब 150-200 रुपया कमा लेते हैं वे दोनो मिल कर।

मैने पूछा – आधार कार्ड है तुम्हारा?

घुरहू ने बताया कि है पर बाबू साहब के यहां रखा है। बैंक अकाउण्ट नहीं है। थोड़ा मायूस सी हंसी हंस कर वह बोला – पैसा है ही कितना कि बैंक अकाउण्ट की जरूरत पड़े!

पत्तियां बीनते हुये इलाहाबाद के आसपास तक भी चले जाते हैं ये घुमन्तू मुसहर। घुरहू ने बताया कि पान के लिये महुआ की पत्तियां बीनने के अलावा और जो भी काम मिल जाता है, वह कर लेते हैं। लोग गेंहूं-धान की कटाई के लिये हजार – डेढ हजार रुपये बीघा के हिसाब से ठेका भी लेते हैं। उस काम में कटाई के साथ साथ गट्ठर बनाना शामिल होता है। बकौल घुरहू, वे मेहनत से ही कमाते हैं, पर मेहनत से मिलता बहुत कम है।

अन्य मुसहरों की बजाय घुरहू और उसकी पत्नी ज्यादा जागरूक नजर आये। उनमें अपनी दशा से ऊपर उठने की एक चिनगारी मुझे दिखी। पर में पक्का नहीं कह सकता कि वह चिनगारी वास्तव में थी, या मात्र मेरी सोच में।

चलते चलते मैने उन दोनों को चाय पीने के पैसे दिये और उन्होने प्रसन्न हो कर अपना धन्यवाद व्यक्त किया।IMG_20180330_072259

 

डेढी और लेवल क्रासिंग की जरूरत


डेढ़ी – डेढ़ किलोमीटर लम्बी सड़क जो उत्तर में रेलवे लाइन और दक्षिण में गंगा किनारे के गांव द्वारिकापुर के बीच है और जिसके पूर्व में मिर्जापुर, पश्चिम में भदोही जिले के गांव हैं; के बारे में कल मैने बताना शुरू किया था। मेरा विचार है कि इस सड़क के माध्यम से गांव के जीवन की बहुत सी बातें मैं देख/समझ/बता पाऊंगा। इस सड़क पर रोज सवेरे मैं 8-9 किलोमीटर साइकिल चलाता हूं। डेढ़ी के लगभग तीन चक्कर। घर से सात बजे निकलता हूं – उदर में दो कप चाय डाल कर। बटोही (अपनी साइकिल) को एक बोतल पानी थमाता हूं। जस्ट इन केस प्यास लग जाये!

उत्तर छोर पर डेढ़ी रेलवे लाइन के पहले ठिठक कर खत्म हो जाती है। उसके आगे और दांये, बांये रेलवे की जमीन है। डेढ़ी के भगीरथ – परधान लोग अपनी सीमा में ही डेढ़ी के बहाव को तय कर सकते हैं। रेलवे पर जोर नहीं उनका।

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एक महिला थैले में अपना सामान ले कर मुझसे आगे चल रही थी डेढ़ी पर।

एक महिला थैले में अपना सामान ले कर मुझसे आगे चल रही थी डेढ़ी पर। उसे रेल लाइन के उस पार जाना था। मेरे सामने पटरी पार की उसने।DSCN0412

उसी समय दूसरी ओर से एक ग्रामीण को इस पार आने के लिये अपनी साइकिल पटरी पर कुदाते देखा।

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उसी समय दूसरी ओर से एक ग्रामीण को इस पार आने के लिये अपनी साइकिल पटरी पर कुदाते देखा।

डेढ़ी के सामने कटका रेलवे स्टेशन का शण्टिंग नेक का छोर दिखता है। अगर स्टेशन की लूप लाइन को चीरता लेवल क्रासिंग इस जगह पर शिफ़्ट कर दिया जाये तो स्टेशन सेक्शन के लेवल क्रासिंग को ब्लॉक सेक्शन में किया जा सकता है। रेलवे यातायात के लिये ज्यादा सुरक्षित विकल्प होगा वह। वर्तमान के लेवल क्रासिंग नम्बर 23 से इस जगह के बीच अपनी जमीन पर लगभग 400 मीटर पतली सड़क जरूर बना कर देनी होगी रेलवे को। और डेढ़ी के ग्रेडियेण्ट (समतल से ऊंचाई) को भी अगर टटोला जाये तो शायद नई जगह पर लेवल क्रासिंग की बजाय रोड-अन्डर-ब्रिज (पुलिया) बनाई जा सके शायद। वह रेलवे की लेवल क्रासिंग खत्म करने की पॉलिसी के अनुरूप होगा। अभी रेलवे लाइन का दोहरीकरण का काम चल रहा है। उस दशा में यह और भी ज्यादा सुरक्षित रेल यातायात का निमित्त होगा। गांव और रेल – दोनो के लिये विन-विन सिचयुयेशन।

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रेलवे फाटक की स्थिति और प्रस्ताव

मैं अगर रेल सेवा में होता तो यह करा पाना मेरे लिये बहुत सरल होता। अब मैं सुझाव भर दे सकता हूं। आसपास के चार-पांच प्रधान लोग, लोकल एमएलए/सांसद यह काम करा सकते हैं। शायद मण्डल रेल प्रबन्धक इसपर ध्यान दे सकें। पर इन सब प्रकार के जीवों के लिये फैज़ की वह नज्म है न! “और भी गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा।“ मुहब्बत की जगह रेलवे क्रासिंग और डेढ़ी पढ़ें! 😊

लेवल क्रासिंग तो एक मुद्दा है। इसी तरह के अनेक मुद्दे हैं जिनपर मैं चर्चा योग्य सोच रखने लगा हूं।  पर उस सब के क्रियान्वयन को ले कर मन में एक गहन उदासीनता है। यह रिटायर्ड जीवन का सच है। व्यक्ति कर्मक्षेत्र में छलांग नहीं लगाना चाहता। कर्मक्षेत्र जो कमिटमेण्ट मांगता है उसमें आशा/निराशा/हर्ष/खिन्नता/थकान सब कुछ है। उसमें रक्तचाप और व्यग्रता की मात्रा में बढ़ना भी निहित है। वह शायद मैं पुन: नहीं चाहता। बहुत हुआ।

हां, पर डेढ़ी यूंही डेड-एण्ड में खत्म नहीं होनी चाहिये। उसकी तार्किक परिणिति नेशनल हाईवे तक पंहुचने की है। और वहां तक पंहुचने के लिये जरूरी है लेवल क्रॉसिंग या रोड-अण्डर-ब्रिज।

देखें, कौन भगीरथ उसे वहां पंहुचाता है।

डेढ़ी – डेढ़ किलोमीटर लम्बी गांव की सड़क


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डेढ़ी पर आती (शायद गंगा किनारे से) दो महिलायें। 

वह व्यक्ति नहीं है, गाय गोरू भी नहीं है। वह गांव की सड़क है। उसके एक ओर रेलवे लाइन है। अगर लाइन का अवरोध न होता तो वह नेशनल हाईवे-19 तक जाती। दूसरी ओर द्वारिकापुर गांव है जो गंगा नदी के तीर पर है। कुल मिला कर यह सड़क, डेढ़ी, रेलवे लाइन और गंगा नदी को जोड़ती है। कहा जाये तो रेलवे लाइन और गंगा नदी देश की धमनियां हैं। दो धमनियों को जोड़ने वाला मानव निर्मित शण्ट या बाईपास है डेढ़ी। इसके अलावा यह सड़क पूर्वांचल के दो जिलों – मिर्जापुर और भदोही की सीमा पर है। इसके पूर्वी ओर करहर है – जो मिर्जापुर जिले में है और पश्चिमी तरफ़ भगवानपुर है, भदोही जिले में।

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डेढ़ी पर गंगा-स्नान कर लौटते साइकिल सवार।

डेढ़ी कुल डेढ़ किलोमीटर लम्बी है। लम्बाई नापने के लिये मैने गूगल मैप का सहारा नहीं लिया। यह और इसके जैसी अन्य कई गंवई सड़कें जो प्रधानी के फ़ण्ड में बनती हैं, उनका गूगल मैप पर अस्तित्व नहीं है। इन्हे कैसे जोड़ा जा सकता है – मुझे नहीं मालूम। अन्यथा करीब एक दर्जन सड़कों को डिजिटल सभ्यता में खींच लाता मैं। इसकी लम्बाई मैने साइकिल के पैडल गिन कर की। गांव देहात में दूरी नापने के लिये मैं वही गिनता हूं। एक किलोमीटर में 204 पैडल के हिसाब से गिनती को दूरी में परिवर्तित करता हूं। यह बहुत खुरदरा तरीका है। मुझे साइकिल में एक स्पीडोमीटर लगवा लेना चाहिये, पर वह टलता जा रहा है।

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यह महिला सिर पर क्या लिये चली जा रही है परात में? यह आपके लिये भी कौतूहल है और मेरे लिये भी!

डेढ किलोमीटर की पतली सड़क – जिसके किनारे बहुत कम लोग रहते हैं; ज्यादा तक गंगा के डूब में आने वाला सिवान है; का भी अपना एक व्यक्तित्व हो सकता है? मुझे यह बेकार सी सड़क लगती थी। पर कुछ दिन इसपर साइकिल चलाई तो इससे मोह हो गया है। इनफ़ैचुयेशन। बुढापे का प्रेम।

अब यह मेरे लिये चुनौती है कि इस पर मैं एक दो दर्जन ब्लॉग पोस्टें लिख सकूं! ध्यान से देखता हूं तो लगता है डेढ़ किलोमीटर की इस सड़क के दोनो ओर बहुत कुछ है जो मुझे (और पढ़ने वालों को भी) रोचक लग सकता है। इसके किनारे के खेत, पेड़, घास-फूस, बस्ती और उसके बाशिन्दे, सड़क पर चलते लोग और वाहन … सब मिला कर एक रोचक केनवास है।

अपना जूम वाला ब्रिज पॉइण्ट-एण्ड-शूट कैमरे की धूल पोंछ लो और बैटरी री-चार्ज कर लो, जीडी। वह सब दर्ज करो चित्रों में जो डेढ़ी के साइकिल भ्रमण में आंखों से देखते और मन में सोचते हो। अपने विपन्न शब्द भण्डार को भी मांज लो। तुम अज्ञेय सा तो नहीं लिख सकते, पर जैसा तुम लिखते थे, वैसा तो लिख सको अपनी पोस्टों में!

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डेढ़ी के उत्तरी ओर सिवान खत्म होता है। कुछ वृक्ष हैं। यहां आधा दर्जन मोर दिखते हैं। चित्र में महिला अरहर की फसल काट कर गठ्ठर बनाती हुई।

  अगला महीना, दो महीना डेढ़ी के इर्दगिर्द रहेगा!

बरसी का भोज और तिरानबे के पांड़े जी से मुलाकात


मैं बरसी  का कार्यक्रम अटेण्ड करने गया था। अनुराग पाण्डेय बुलाने आये थे। अनुराग से मैं पहले नहीं मिला था। उनके ताऊ जी का देहावसान हुआ था साल भर पहले। आज बरसी  थी। भोज का निमन्त्रण था।

मैं सामान्यत: असामाजिक व्यक्ति हूं। मेरी पत्नीजी (गांव में बसने के बाद) काफी समय से कह रही हैं कि अपना नजरिया बदलूं मैं। आज भी लगी रहीं कि अनुराग के यहां चला जाऊं। शाम होते होते दो तीन बार कहा। संयोग से अशोक (मेरा वाहन चालक) भी आ गया था। अत: मेरे पास कोई बहाना नहीं बचा, न जाने का।

अच्छा किया जो वहां गया। वे पाण्डेय लोग मूलत: इस गांव के नहीं हैं। पिछली शती के प्रारम्भ में वे नवासे में (विवाह में बेटी-दामाद को गांव में बसाने का उपक्रम) यहां आये। आये हुये एक परिवार से अब तीन-चार घर हो गये हैं। अधिकतर लोग कलकत्ता,बंगलोर, बम्बई, दिल्ली आदि जगह पर रहते हैं। संतोष पांडेय (जिनके पिताजी की बरसी थी) भी बाहर ही रहते हैं। बरसी के लिये गांव आये थे। दिलीप मिले। वे मुझसे पहले वाराणसी में मिल चुके हैं, जब मैं वाराणसी रेल मण्डल में अपर मण्डल रेल प्रबन्धक था। दैनिक जागरण में कार्य करते हैं। गांव से ही आते जाते हैं। अपने घर में निर्माण कार्य करा रहे हैं। वे इस बात से प्रसन्न हैं कि पास में वारणसी-हंड़िया हाईवे छ लेन का होने जा रहा है। रेल लाइन का भी दोहरीकरण और विद्युतीकरण हो रहा है। सन 2019 तक यह सब हो जायेगा। तब यातायात के इतने साधन हो जायेंगे कि बनारस शहर की बसावट यहां जगह खोजने लगेगी।

अभी भी दिलीप को अपनी मोटर साइकलसे बनारस रोज आना-जाना खलता नहीं। “जो भी यातायात की रुकावट है, मोहन सराय और बनारस कैण्ट के बीच ही है; गांव से मोहन सराय तो आधा घण्टा भर लगता है।”

रमाशंकर पाण्डेय जी मिले। वे कलकत्ता में प्लाई का व्यवसाय करते हैं। साल में दो-तीन बार गांव आते जाते हैं। यहां अपने रहने की पुख्ता व्यवस्था बना रखी है। एक कमरे में किचनेट भी है। गैस चूल्हा, बर्तन और भोजन सामग्री; सब। वे बहुत प्रसन्न थे मेरे विषय में – “गांव में एक और पांड़े बढ़े!” कलकत्ता में रहते हुये मेरा फ़ेसबुक पर लिखा बहुत चाव से पढ़ते हैं।

वैसे इस गांव से सम्बद्ध लगभग 50-60 लोग, जो अलग अलग स्थानों पर हैं; मेरे लेखन से जुड़ाव पाते हैं। इस माध्यम से गांव से उनकी कनेक्टिविटी बनी रहती है।

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श्री मदन मोहन पांडेय, उम्र 93 साल।

खैर, असल प्रसन्नता मुझे तिरानबे साल के मदन मोहन पाण्डेय जी से मिल कर हुई। वे अभी भी अच्छी सेहत में हैं। बिना चश्मे के पढ़ लेते हैं। उनकी आवाज में कोई शिथिलता नहीं। अलबत्ता; अब चलने में कुछ दिक्कत होने लगी है। ज्यादा चलने पर कमर दोहरी होने लगती है।

अपनी जवानी में वे मुगदर भांजते थे। नाल उठाते थे। एक कोने में पड़ी नाल भी देखी मैने। उस पर उनका नाम भी खुदा है। मैने उनका चरण स्पर्श किया और कहा कि उनके पास आया करूंगा। गांव का पुराना इतिहास उनसे बेहतर कौन बता सकेगा?

चलते समय उन्होने पुरानी बात बताई – “गांव में उस समय मोटा अनाज ही होता था। जवा, बैर्रा। कोई मेहमान आता था तो सब खुश होते थे कि गेंहू खाने को मिलेगा। … भोज आदि में हर घर में एक एक धरा (4 सेर) अनाज पिसता था जांत पर। उसको जुटा कर भोज की पूड़ी बनती थी”। 

मदन मोहन जी को चरण स्पर्श कर लौटा तो मन में यह संकल्प था कि कागज कलम ले कर उन्के पास गांव के अतीत के नोट्स अवश्य लूंगा। क्या पता, वह नोट्स ही मुझे जानदार रचनाकार बना दें। न भी बनायें, तो भी, ब्लॉगरधर्मिता का तो निर्वहन होगा! 

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नाल, जो मदन मोहन जी उठाते थे। हाथ सिर के ऊपर ले जा कर बताया कि इसे उठा कर ऊपर तक ले जाते थे वे। इस पर उनका नाम भी खुदा है।

समय, वर्ग, वर्ण और मैं

गांव में आने पर; उत्तर प्रदेश के सामन्ती अतीत की बदौलत; आसपास जातिगत विभाजन जबरदस्त दिखता है।


समय के साथ साथ समाज भी बदलता गया है मेरे लिये। स्कूली शिक्षा, और उसके बाद विश्वविद्यालयीय शिक्षा में मेरे लिये न कोई वर्ण था, न वर्ग। स्त्री और पुरुष का भी भेद न था – कक्षा में स्त्रियां लगभग थी ही नहीं। मित्रों में हिन्दू, मुसलमान सब थे। पिलानी में गुजराती, मराठी, मदरासी सभी थे। पोस्ट आफिस के डाकिये – महेश जी की हम अपने ताऊजी की तरह इज्जत करते थे। उनके साथ चाय पीते थे। वह शायद सामाजिकता का गोल्डन पीरियड था।

नौकरी, और सरकारी नौकरी में क्लास से बहुत तगड़ा परिचय हुआ। ग्रुप ए, बी, सी, डी में बंट गयी दुनियां। ग्रुप ए में होने के कारण हम अंगरेजों के उत्तराधिकारी थे। शेष सब के लिये डेमी-गॉड सरीखे। शुरु में यही सिखाया गया।

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गांव का पता और ऑनलाइन जरूरतें


amazon-7591ऑनलाइन युग गांव के मेरे पते को उपयुक्त नहीं पाता। शायद इण्डिया, भारत को न पहचानने की जिद सी करता है।

शुरुआत “आधार” से हुई। गांव में शिफ़्ट होने पर मैने अपना पता आधार की साइट पर जा कर बदलने का यत्न किया। अपना पिन कोड भरने पर उसने पते में गांव, पोस्ट, और तहसील लेने के साथ साथ अपनी तरफ़ से कुछ और स्थान चिपका दिये, जिन्हे मैं उस समय जानता ही नहीं था। उनको हटाने पर वह मेरा पता स्वीकार ही नहीं कर रहा था। अत: मेरे अनुसार मेरे आधार(भूत) पते में कुछ अतिरिक्त स्थानों का जिक्र भी है। मसलन, डैइनिया (भूतों के बगीचे) का जिक्र है। जो न भी होता तो काम बखूबी चलता। गूगल मैप ने आधार को शायद बता दिया है कि मेरे पते की पहचान डैइनिया के बगीचे से होती है।

खैर, डाकिया आधार का नया कार्ड उसमें लिखे मेरे पते पर ले आया – अत: वह पता स्वीकार्य मान लिया मैने।

ऑन लाइन खरीद करने पर अलग प्रकार से झंझट आया। कुछ कोरियर कम्पनियां पैकेट बनारस भेज देती थीं, कुछ मिर्जापुर और कुछ इलाहाबाद। अलग अलग स्थानों से कुरियर मुझे फोन कर पूछते थे कि मैं कहां रहता हूं। एक दो को तो मैने कहा कि पैकेट कटका रेलवे स्टेशन पर दे जायें और मैं स्टेशन मास्टर साहब से बाद में उनके पास जा कर ले आऊंगा। इसपर वे राजी नहीं थे। फलत: औसत 4-5 फोन कॉण्टेक्ट के बाद ही वे मेरे घर तक आ पाये। दो-तीन पैकेट तो आ ही न सके। थक कर अमेजन या स्नैपडील ने ऑर्डर केंसिल कर दिया और पैसा रिफ़ण्ड किया। इस में हफ़्तों-महीनों का समय लगा। उस दौरान मुझे धुकधुकी लगती रही कि कहीं पैसे डूब तो नहीं गये (गांव के पते पर कैश-ऑन-डिलिवरी का विकल्प नहीं है)। पैसे फंसे रहे, सो अलग।

हां, स्पीडपोस्ट से भेजा सभी सामान समय से और बिना विश्व-भ्रमण किये मुझे मिलता रहा है। सबसे ज्यादा दुर्गति तो “गति” नामक कोरियर कम्पनी से हुई।

अभी एक ऑनलाइन पुस्तक बेचक ने पैकेट न मिलने के तकाजे पर ई-मेल भेजा है –

Dear Sir, We regret the inconvenience caused. Your copy was sent by DTDC courier and they returned it due to no service. We will be sending it back by speed post.

DTDC जरूर कोई शहराती कुरियर कम्पनी होगी। उन्हे गांव की पगडण्डियों का अन्दाज नहीं है शायद।


आप कह सकते हैं कि अपने पते को लेकर, या ऑनलाइन खरीद को ले कर मैं इतना फसी क्यूं हूं। पास के रमेश तेली या बलवन्त सेठ की दुकान से सामान खरीद कर संतुष्ट क्यों नहीं हो जाता। क्यों इण्टरनेट कनेक्शन और उनकी वेब साइटों के चक्कर में रहता हूं। क्यों अंगरेजी के आधा दर्जन अखबार पढ़ना चाहता हूं। क्यों गांव में आने वाले अमर उजाला या जागरण के प्रिण्ट एडीशन से काम चला लेता।

मैं शायद स्प्लिट पर्सनालिटी हूं। बिना एयर कण्डीशनर के रहने के प्रयोग तो करना चाहता हूं। पर किण्डल पर दन्न से खरीद कर डाउनलोड हुई ताजा पुस्तक मुझे बहुत लुभाती है। वह मेरे लिये लग्जरी नहीं, आवश्यकता बन गयी है।


ICICI Bank Form Address Change

मेरा खाता आई.सी.आई.सी.आई. बैंक में है। साहब लोगों का बैंक। उसके रिलेशनशिप मैनेजर तो बड़े अच्छे हैं। सहायता करने के लिये मेरे घर तक आये कई बार। जी हां; बनारस से 45 किमी दूर गांव में। पर उनके बैंक की साइट पर अपना पता सही करने में जो मशक्कत अभी तक कर रहा हूं, वह मैं ही जानता हूं। पता भरने के लिये उसकी साइट मकान/फ्लैट नम्बर, माला और बिल्डिण्ग नम्बर/नाम और गली नम्बर, मुहल्ला, शहर आदि मांगती है। वह सब गांव में होता ही नहीं। उत्तर प्रदेश के भदोही जैसे भुच्च जिले को तो अपने ऑप्शन में दिखाती ही नहीं वह साइट। “लालता पण्डित की बखरी के पूरब का मकान” जैसा इनपुट वह लेती ही नहीं।

ले दे कर जो पता बैंक की साइट पर आ सका है, उसे मैने अपने डाकिये – रमापति – को ध्यान से नोट करा दिया है कि इस तरह के ऊट-पटांग लिखे पते वाली कोई भी चिठ्ठी हो, मुझे दे जाये। इस सब के लिये रमापति से बड़े आत्मीय संबन्ध बनाने पड़े मुझे। उनके बारे मे जितनी जानकारी ली मैने कि उसके आधार पर एक-दो बड़े आकार की ब्लॉग पोस्टें लिखी जा सकती हैं। यह भी सुनिश्चित हो गया कि इस इलाके के डाकिया, रिटायर होने तक, रमापति ही रहेंगे।

मिलने आने वाले शहरी लोगों के लिये मैने अपना फोन नम्बर देने के साथ साथ ह्वाट्स-एप्प पर एक नक्शे सहित रास्ते का विस्तृत विवरण भेजना प्रारम्भ किया। पर कई बार लोग फिर भी फड़फड़ी खाते जब मेरे घर पंहुचे तो पता चला कि ह्वाट्सएप्प खोल कर उन्होने मेरा संदेश पढ़ा ही न था।

खैर; साल भर से ऊपर हो गया। यहां रहते बहुत से लोग जानने लगे हैं। एक दो कुरियर वाले भी पहचान गये हैं। डाकिया जी तो घरेलू से हो गये हैं। गांव के पते को ऑनलाइन जगत हिकारत से भले देखता हो, मेरा काम चल जा रहा है।

आशा है, भविष्य में बेहतर ही होगा, उत्तरोत्तर। गंवई बनने की जिद जो है मेरी। अपनी शर्तों पर रहता रिटायर्ड आदमी। … काश कभी यह हो कि मेरे नाम और जिले के नाम/पिनकोड भर से चिठ्ठी/पैकेट मुझे मिलने लगें। इलाके में उतना फ़ेमस बनने का ख्वाब पालना कोई बुरा ख्वाब नहीं है!

यद्यपि, यह पक्का है कि शहर और गांव की कशमकश में गांव आगे और तेजी से हारने वाले हैं। यह हारना केवल डाक पते की पहचान से कहीं ज्यादा गहरा होगा। बिना किसी संशय के। अगर गांव को जीतना है (या प्रासंगिक रहना है) तो खुद को री-इन्वेण्ट करना होगा। शहर की अनेक्सी की तरह नहीं चल पायेंगे गांव।