प्रयागराज, लाइव सर्टीफिकेट और बैंक अधिकारी श्रीमती दिव्या गौड़ से मुलाकात


लाइव सर्टीफिकेट हेतु प्रयागराज की यात्रा

रिटायर्ड सरकारी पेंशनर्स के लिये बैंक नवम्बर के महीने में तीर्थ स्थान सा होता है। वहां जा कर अपने जीवित होने का प्रमाण देना अनिवार्य वार्षिक कर्मकाण्ड है। मेरे घर में मेरे पिताजी और मैं – दो व्यक्ति सरकारी पेंशनर हैं। मेरा पेंशन खाता वाराणसी में है और पिताजी का तेलियरगंज, प्रयागराज में। अत: दोनों को इस तीर्थ यात्रा पर जाना होता है। चूंकि मेरे पिताजी इस यात्रा के लिये बहुत सक्षम नहीं हैं; उनको ले जाने का दायित्व भी मेरे ऊपर है।

पिताजी के शतायु होने की मैं कामना रखता हूं – सो उसके आधार पर अगले 15 साल उनके लाइव सर्टीफिकेट अरेंज करने के दायित्व मुझे निर्वहन करने के लिये तैयार रहना है।

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भदोही की आर्कियॉलॉजी के तत्वशोधक रविशंकर


प्रोफेसर (डा.) अशोक सिंह ने अगियाबीर टीले के खुदाई स्थल मुझे रविशंकर से परिचय कराते बताया कि अगर आपको भदोही के पुरातत्व पर जानकारी चाहिये तो इन (रविशंकर) से बेहतर सोर्स कोई नहीं। तभी मुझे लग गया कि मुझे रविशंकर जी को कस कर पकड़ना है अपने आस-पास की जानकारी में गहराई और सांद्रता लाने के लिये।

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रविशंकर

यहां जिससे भी बात करो – तथाकथित जागरूक स्थानीय से भी – तो वे भदोही को मात्र भरों से जोड़ते हैं। पर आसपास जो भी दिखता है, उसे मेरे जैसा सतही जानकारी वाला जीव भी भांप सकता है कि वह सब 1200ईस्वी के बहुत पहले की सभ्यता की बदौलत है। दूसरे; भर या भारशिव केवल भदोही में नहीं हैं। विकीपेडिया पर एक काल में उत्तर भारत के बड़े हिस्से में उनका प्रभाव दिखता है। तब भर या भर-द्रोह को भदोही मात्र से जोड़ना और भदोही की पहचान वही बना देना क्या चीज है?

मैने अपने आप से कहा – “जीडी, अगर इस इलाके में तुम्हें अपने जीवन का तीसरा और चौथा भाग काटना है तो रविशंकर जैसे से मिलना और जानकारी समेटने-सहेजना तुम्हारी बंजर बौद्धिक जमीन को जबरदस्त नैसर्गिक उर्वरक इनपुट देगा। मत चूको उससे।“

और मैने रविशंकर जी से फोन कर समय मांगा। अगियाबीर टीले पर आर्कियॉलॉजिकल खुदाई सवेरे छ बजे प्रारम्भ हो जाती है। अपने साथ कर्मी ले कर रविशंकर छ बजे वहां पंहुंच जाते हैं। वहीं उनके किशोर महराज (बीएचयू के रसोइये) नाश्ता-चाय ले कर 8-9 बजे के बीच पंहुचते हैं। इग्यारह बजे तक खुदाई चलती है।

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अगियाबीर की खुदाई निर्देशित करते रविशंकर

दोपहर के भोजन/विश्राम के बाद तीन से शाम छ बजे दूसरी शिफ्ट में खुदाई चलती है। पूरे खुदाई के समय वहीं मौजूद रह कर निर्देशित करने और प्राप्त सामग्री को तरतीबवार जमवाने का काम करते हैं रविशंकर जी। खुदाई करने वाले कर्मी यद्यपि लम्बे अनुभव के कारण पुरातत्व की आवश्यकताओं के प्रति पर्याप्त संवेदित किये जा चुके है; पर खुदाई उनके भरोसे छोड़ कर ये पुरातत्ववेत्ता वहां से हट नहीं सकते। मेरे फोन करने पर रविशंकर जी ने कहा कि शाम 6 बजे खाली हो कर वे नहाने के बाद सात बजे चाय पीते हैं। उस समय मैं उनसे मिलने आ सकता हूं।

शाम सात बजे, सूर्यास्त बाद के धुंधलके में, द्वारिकापुर के प्राइमरी स्कूल, जहां पुरातत्व विभाग की टीम रुकी है, पंहुचा मैं। बहुत आत्मीयता से मिले रविशंकर जी। साथ में दो अन्य व्यक्ति – आशीष और पटेल जी भी थे। लगभग एक घण्टा समय दिया रविशंकर जी मुझे और बताया अपने भदोही पर किये शोध के बारे में।

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संझा समय द्वारिकापुर प्राइमरी स्कूल पर अपने कैम्प में मिले रविशंकर। चाय पीते हुये हुई चर्चा।

बीएचयू के एक कुशल अध्यापक की तरह हिन्दी में धाराप्रवाह बोलने और अपनी बात दृढता से कहने की वाक्पटुता है रविशंकर में। वैसी कुशलता मैं अपने आप में डेवलप करने के स्वप्न देखता हूं। और कहीं न कंहीं यह भी जानता हूं कि अब वैसी पटुता सम्भव नहीं है पाना! अंत: मन्त्र मुग्ध सा सुनता हूं रविशंकर जी को।

भदोही की बात करते रविशंकर बताते हैं कि भर-द्रोह भर में भदोही का इतिहास समेटना एक व्यापक षडयन्त्र का हिस्सा है – उस प्रकार के लोग जो 1200-1400इस्वी के मध्य भरों के किलों के होने और उसके बाद मुहम्मद गोरी की सेना द्वारा पददलित/ध्वस्त किये जाने को ही भदोही के इतिहास का खूंटा मानते हैं; उन लोगों का षडयन्त्र। और इस षडयन्त्र में स्यूडो-सेक्युलर लोग महती भूमिका निभाते हैं।

भदोही के प्राचीन इतिहास के बारे में रविशंकर जो भी कह रहे थे, उसकी भाषा मेरी स्मृति में जस की तस नहीं है, नोट्स भी बहुत अच्छे लिये नहीं हैं; पर उनके कहने से यह जरूर समझ गया कि आज से 50 हजार से 5 हजार साल पहले तक गंगा की धारा बहुत उथली थी और वे अपना कोर्स व्यापक रूप से बदलती थीं। बहुत कुछ कोसी नदी की तरह। भदोही जिले में सभी पुरातत्व स्थल (100 के आसपास तो रविशंकर जी ने ही आइडेण्टीफ़ाई किये हैं अपने सर्व में) कमोबेश गंगा के किनारे ही थे नव पाषाण युग में। कालान्तर में गंगा की धारा संयत हुई और वर्तमान दशा में (लगभग) स्थिर हुई।

रविशंकर मेरे समक्ष इतिहास-प्रागैतिहास का तिलस्म खोल रहे थे – यह द्वारिकापुर जहां हम बैठे थे; वह तब भी यहीं था और इसी नाम से! उन्होने बताया कि भदन्त आनन्द कौशल्यायन का पाली से अनुदित कुलाल जातक का उन्होने अध्ययन किया। उसमें वाराणसी के राजा ब्रह्मदत्त के समय भगवान बुद्ध के पूर्व जन्म की चर्चा है – वाराणसी नगर के द्वारग्राम में कुम्भकार कुल में उत्पन्न पूर्व जन्मना तथागत। यह संदर्भ 600 बीसी के आसपास द्वारग्राम (द्वारिकापुर) में एक बड़ी कुम्हार बस्ती का होना बताता है।

रविशंकर बताते हैं कि भूमि खनन का माफिया (या निरीह किसान भी) खेत-जमीन से मिट्टी निकालने की प्रक्रिया में आर्कियॉलॉजिकल साइट्स को खत्म किये दे रहा है। इलाके की 100 में से तीस-चालीस प्रतिशत साइट्स उनके देखते देखते गायब या इनसिग्नीफिकेण्ट हो गयी हैं।

भदोही का इतिहास भू ठेकेदार माफिया; मनरेगा और खनन विभाग की तिकड़ी द्वारा नष्ट कर दिया जा रहा है और आर्कियालॉजिकल सर्वे वाले भिखारी के मानिन्द वह सब होते देख रहे हैं!

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खनन माफिया के आराध्यदेव हनुमान जी।

रविशंकर भदोही को भद्रा नदी (कूर्म/वाराह पुराण में वर्णित गंगा का एक नाम भद्रा) या जिले में प्राप्त भैदपुर (भद्रपुर) जो मौर्यकालीन पुरातत्व प्रमाण युक्त स्थान है अथवा भदरांव (भद्रांव) से जोडने का प्रयास करते हैं। उनके अनुसार ये जगहें वहां हैं, जहां गंगा (भद्रा) कभी बहती रही होंगी। रविशंकर स्वयम् अपनी इस सोच से संतुष्ट नहीं हैं; पर वे इस दृढ मत के हैं कि भदोही के नाम और इलाके का अस्तित्व 1200 इस्वी से तो कहीं ज्यादा पुराना है। नव पाषाण युग तक तो वह जाता ही है।

रविशंकर से मिल कर मैं अपने घर के लिये जब चला तो वे और उनके दोनो मित्र मुझे मेरे वाहन तक छोड़ने आये। पूरा आदर-सम्मान दिया मुझे और भविष्य में अनेकानेक उठने वाले मेरे सवालों का उत्तर देने का प्रयास करने का आश्वासन भी दिया।

चलते समय मुझे लगा कि डा. अशोक कुमार सिंह, रविशंकर (और कुछ सीमा तक मैं भी) गंगा नदी के इर्दगिर्द अपने लिये वर्तमान और भविष्य का स्थान खोज रहे हैं। हम लोग अपने लिये लीगेसी (legacy – भविष्य की पीढियों के लिये छोड़ी जाने वाली अपनी विरासत) के मेगालिथ खोज रहे हैं। डा. अशोक को वह अगियाबीर में नजर आता है। रविशंकर (भले ही भदोही पर रिसर्च करने को रिलक्टेण्टली तैयार हुये) भदोही इलाके के प्रागैतिहास/इतिहास में वह लीगेसी तलाश रहे हैं। मुझे अपने ब्लॉग से उम्मीद है कि कालान्तर में वह मुझे लीगेसी प्रदान करेगा। ब्लॉग जो आस-पास (मुख्यत: गंगा नदी के इर्दगिर्द) घूमता है। गंगा नदी अमृतवाहिनी हैं और हम लोगों को – डा. अशोक, रविशंकर और मुझे – लीगेसी का अमृतत्व प्रदान करेंगी। बस, अपनी अपनी जद्दोजहद; अपनी अपनी कशमकश में हम लगे रहें।… अमृतस्य गंगा!

अपनी धुन में रमे हैं और अपनी धुन के पक्के हैं डा. अशोक और रविशंकर। और यह सुदृढ लीगेसी के अमृत की चाह, एक जुनून से ही मिलती है! मुझे पक्का यकीन है उस विषय में!

हां, पूरा और पक्का!

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रविशंकर जी ने खींचा अगियाबीर पुरातत्व खनन स्थल पर मेरा (बायें), शिवकुमार (विभागीय ड्राफ़्ट्समैन) और किशोर महराज (रसोईया) का चित्र।

घुरहू मुसहर से बातचीत


IMG_20180330_072020-02.jpgकरहर में महुआ के पेड़ के नीचे बैठा मिला घुरहू। पास में एक करीब 10 फुट की लग्गी (पेड़ से पत्ते तोड़ने की पतले बांस की चोंच जुड़ी डण्डी) पड़ी थी। साथ में उसकी पत्नी और एक कम्बल। पत्नी पास के किसी नल से अपने बरतनों में पानी भरकर लाई थी। बरतन में था एक अल्यूमिनियम की बटुली, एल लोटा, एक तसली और एक कडछुल। घुरहू के पास चप्पल थी, पत्नी बिना चप्पल के दिख रही थी।

उसने बताया कि कल से कटका स्टेशन पर डेरा डाल रखा है। रहने वाला कपसेटी के पास किसी गांव का है। कपसेटी यहां से करीब 25 किलोमीटर दूर है। वहां गांव में कोई बाबू साहब बड़े जम्मींदार हैं। पचास बीघे के काश्तकार। उन्होने रहने को जगह दी है। भारत सरकार ने मकान भी दिया है बनवा कर। मां बाप वहां रहते हैं। घुरहू की पत्नी ने बताया कि एक आठ-दस साल की बच्ची भी है उनकी। गांव में मा-बाप के पास रख छोड़ी है। पत्तियां बीनने के लिये दर दर घूमने में उस बच्ची को साथ ले कर चलना कठिन काम था।

आजकल महुआ की ताजा पत्तियां नहीं हैं। तोडने में ज्यादा नहीं मिलतीं तो सूखी पत्तियां बीन कर पानी में गीला कर तह लगाते हैं वे मुसहर लोग। शाम तक जितनी इकठ्ठा हो जाती हैं, वह ले कर ट्रेन में बैठ जाते हैं और अगले दिन सवेरे बनारस में बेच कर वापस लौटते हैं। घुरहू ने जब यह बताया तो मझे स्पष्ट हुआ कि रेलवे स्टेशन पर डेरा क्यों जमाते हैं ये मुसहर। रेलवे की बिना टिकट बनारस आने जाने की सुविधा उनके जीवन यापन का महत्वपूर्ण अंग है।

जैसा घुरहू ने बताया – रोज करीब 150-200 रुपया कमा लेते हैं वे दोनो मिल कर।

मैने पूछा – आधार कार्ड है तुम्हारा?

घुरहू ने बताया कि है पर बाबू साहब के यहां रखा है। बैंक अकाउण्ट नहीं है। थोड़ा मायूस सी हंसी हंस कर वह बोला – पैसा है ही कितना कि बैंक अकाउण्ट की जरूरत पड़े!

पत्तियां बीनते हुये इलाहाबाद के आसपास तक भी चले जाते हैं ये घुमन्तू मुसहर। घुरहू ने बताया कि पान के लिये महुआ की पत्तियां बीनने के अलावा और जो भी काम मिल जाता है, वह कर लेते हैं। लोग गेंहूं-धान की कटाई के लिये हजार – डेढ हजार रुपये बीघा के हिसाब से ठेका भी लेते हैं। उस काम में कटाई के साथ साथ गट्ठर बनाना शामिल होता है। बकौल घुरहू, वे मेहनत से ही कमाते हैं, पर मेहनत से मिलता बहुत कम है।

अन्य मुसहरों की बजाय घुरहू और उसकी पत्नी ज्यादा जागरूक नजर आये। उनमें अपनी दशा से ऊपर उठने की एक चिनगारी मुझे दिखी। पर में पक्का नहीं कह सकता कि वह चिनगारी वास्तव में थी, या मात्र मेरी सोच में।

चलते चलते मैने उन दोनों को चाय पीने के पैसे दिये और उन्होने प्रसन्न हो कर अपना धन्यवाद व्यक्त किया।IMG_20180330_072259

 

बरसी का भोज और तिरानबे के पांड़े जी से मुलाकात


मैं बरसी  का कार्यक्रम अटेण्ड करने गया था। अनुराग पाण्डेय बुलाने आये थे। अनुराग से मैं पहले नहीं मिला था। उनके ताऊ जी का देहावसान हुआ था साल भर पहले। आज बरसी  थी। भोज का निमन्त्रण था।

मैं सामान्यत: असामाजिक व्यक्ति हूं। मेरी पत्नीजी (गांव में बसने के बाद) काफी समय से कह रही हैं कि अपना नजरिया बदलूं मैं। आज भी लगी रहीं कि अनुराग के यहां चला जाऊं। शाम होते होते दो तीन बार कहा। संयोग से अशोक (मेरा वाहन चालक) भी आ गया था। अत: मेरे पास कोई बहाना नहीं बचा, न जाने का।

अच्छा किया जो वहां गया। वे पाण्डेय लोग मूलत: इस गांव के नहीं हैं। पिछली शती के प्रारम्भ में वे नवासे में (विवाह में बेटी-दामाद को गांव में बसाने का उपक्रम) यहां आये। आये हुये एक परिवार से अब तीन-चार घर हो गये हैं। अधिकतर लोग कलकत्ता,बंगलोर, बम्बई, दिल्ली आदि जगह पर रहते हैं। संतोष पांडेय (जिनके पिताजी की बरसी थी) भी बाहर ही रहते हैं। बरसी के लिये गांव आये थे। दिलीप मिले। वे मुझसे पहले वाराणसी में मिल चुके हैं, जब मैं वाराणसी रेल मण्डल में अपर मण्डल रेल प्रबन्धक था। दैनिक जागरण में कार्य करते हैं। गांव से ही आते जाते हैं। अपने घर में निर्माण कार्य करा रहे हैं। वे इस बात से प्रसन्न हैं कि पास में वारणसी-हंड़िया हाईवे छ लेन का होने जा रहा है। रेल लाइन का भी दोहरीकरण और विद्युतीकरण हो रहा है। सन 2019 तक यह सब हो जायेगा। तब यातायात के इतने साधन हो जायेंगे कि बनारस शहर की बसावट यहां जगह खोजने लगेगी।

अभी भी दिलीप को अपनी मोटर साइकलसे बनारस रोज आना-जाना खलता नहीं। “जो भी यातायात की रुकावट है, मोहन सराय और बनारस कैण्ट के बीच ही है; गांव से मोहन सराय तो आधा घण्टा भर लगता है।”

रमाशंकर पाण्डेय जी मिले। वे कलकत्ता में प्लाई का व्यवसाय करते हैं। साल में दो-तीन बार गांव आते जाते हैं। यहां अपने रहने की पुख्ता व्यवस्था बना रखी है। एक कमरे में किचनेट भी है। गैस चूल्हा, बर्तन और भोजन सामग्री; सब। वे बहुत प्रसन्न थे मेरे विषय में – “गांव में एक और पांड़े बढ़े!” कलकत्ता में रहते हुये मेरा फ़ेसबुक पर लिखा बहुत चाव से पढ़ते हैं।

वैसे इस गांव से सम्बद्ध लगभग 50-60 लोग, जो अलग अलग स्थानों पर हैं; मेरे लेखन से जुड़ाव पाते हैं। इस माध्यम से गांव से उनकी कनेक्टिविटी बनी रहती है।

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श्री मदन मोहन पांडेय, उम्र 93 साल।

खैर, असल प्रसन्नता मुझे तिरानबे साल के मदन मोहन पाण्डेय जी से मिल कर हुई। वे अभी भी अच्छी सेहत में हैं। बिना चश्मे के पढ़ लेते हैं। उनकी आवाज में कोई शिथिलता नहीं। अलबत्ता; अब चलने में कुछ दिक्कत होने लगी है। ज्यादा चलने पर कमर दोहरी होने लगती है।

अपनी जवानी में वे मुगदर भांजते थे। नाल उठाते थे। एक कोने में पड़ी नाल भी देखी मैने। उस पर उनका नाम भी खुदा है। मैने उनका चरण स्पर्श किया और कहा कि उनके पास आया करूंगा। गांव का पुराना इतिहास उनसे बेहतर कौन बता सकेगा?

चलते समय उन्होने पुरानी बात बताई – “गांव में उस समय मोटा अनाज ही होता था। जवा, बैर्रा। कोई मेहमान आता था तो सब खुश होते थे कि गेंहू खाने को मिलेगा। … भोज आदि में हर घर में एक एक धरा (4 सेर) अनाज पिसता था जांत पर। उसको जुटा कर भोज की पूड़ी बनती थी”। 

मदन मोहन जी को चरण स्पर्श कर लौटा तो मन में यह संकल्प था कि कागज कलम ले कर उन्के पास गांव के अतीत के नोट्स अवश्य लूंगा। क्या पता, वह नोट्स ही मुझे जानदार रचनाकार बना दें। न भी बनायें, तो भी, ब्लॉगरधर्मिता का तो निर्वहन होगा! 

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नाल, जो मदन मोहन जी उठाते थे। हाथ सिर के ऊपर ले जा कर बताया कि इसे उठा कर ऊपर तक ले जाते थे वे। इस पर उनका नाम भी खुदा है।


गांव का पता और ऑनलाइन जरूरतें


amazon-7591ऑनलाइन युग गांव के मेरे पते को उपयुक्त नहीं पाता। शायद इण्डिया, भारत को न पहचानने की जिद सी करता है।

शुरुआत “आधार” से हुई। गांव में शिफ़्ट होने पर मैने अपना पता आधार की साइट पर जा कर बदलने का यत्न किया। अपना पिन कोड भरने पर उसने पते में गांव, पोस्ट, और तहसील लेने के साथ साथ अपनी तरफ़ से कुछ और स्थान चिपका दिये, जिन्हे मैं उस समय जानता ही नहीं था। उनको हटाने पर वह मेरा पता स्वीकार ही नहीं कर रहा था। अत: मेरे अनुसार मेरे आधार(भूत) पते में कुछ अतिरिक्त स्थानों का जिक्र भी है। मसलन, डैइनिया (भूतों के बगीचे) का जिक्र है। जो न भी होता तो काम बखूबी चलता। गूगल मैप ने आधार को शायद बता दिया है कि मेरे पते की पहचान डैइनिया के बगीचे से होती है।

खैर, डाकिया आधार का नया कार्ड उसमें लिखे मेरे पते पर ले आया – अत: वह पता स्वीकार्य मान लिया मैने।

ऑन लाइन खरीद करने पर अलग प्रकार से झंझट आया। कुछ कोरियर कम्पनियां पैकेट बनारस भेज देती थीं, कुछ मिर्जापुर और कुछ इलाहाबाद। अलग अलग स्थानों से कुरियर मुझे फोन कर पूछते थे कि मैं कहां रहता हूं। एक दो को तो मैने कहा कि पैकेट कटका रेलवे स्टेशन पर दे जायें और मैं स्टेशन मास्टर साहब से बाद में उनके पास जा कर ले आऊंगा। इसपर वे राजी नहीं थे। फलत: औसत 4-5 फोन कॉण्टेक्ट के बाद ही वे मेरे घर तक आ पाये। दो-तीन पैकेट तो आ ही न सके। थक कर अमेजन या स्नैपडील ने ऑर्डर केंसिल कर दिया और पैसा रिफ़ण्ड किया। इस में हफ़्तों-महीनों का समय लगा। उस दौरान मुझे धुकधुकी लगती रही कि कहीं पैसे डूब तो नहीं गये (गांव के पते पर कैश-ऑन-डिलिवरी का विकल्प नहीं है)। पैसे फंसे रहे, सो अलग।

हां, स्पीडपोस्ट से भेजा सभी सामान समय से और बिना विश्व-भ्रमण किये मुझे मिलता रहा है। सबसे ज्यादा दुर्गति तो “गति” नामक कोरियर कम्पनी से हुई।

अभी एक ऑनलाइन पुस्तक बेचक ने पैकेट न मिलने के तकाजे पर ई-मेल भेजा है –

Dear Sir, We regret the inconvenience caused. Your copy was sent by DTDC courier and they returned it due to no service. We will be sending it back by speed post.

DTDC जरूर कोई शहराती कुरियर कम्पनी होगी। उन्हे गांव की पगडण्डियों का अन्दाज नहीं है शायद।


आप कह सकते हैं कि अपने पते को लेकर, या ऑनलाइन खरीद को ले कर मैं इतना फसी क्यूं हूं। पास के रमेश तेली या बलवन्त सेठ की दुकान से सामान खरीद कर संतुष्ट क्यों नहीं हो जाता। क्यों इण्टरनेट कनेक्शन और उनकी वेब साइटों के चक्कर में रहता हूं। क्यों अंगरेजी के आधा दर्जन अखबार पढ़ना चाहता हूं। क्यों गांव में आने वाले अमर उजाला या जागरण के प्रिण्ट एडीशन से काम चला लेता।

मैं शायद स्प्लिट पर्सनालिटी हूं। बिना एयर कण्डीशनर के रहने के प्रयोग तो करना चाहता हूं। पर किण्डल पर दन्न से खरीद कर डाउनलोड हुई ताजा पुस्तक मुझे बहुत लुभाती है। वह मेरे लिये लग्जरी नहीं, आवश्यकता बन गयी है।


ICICI Bank Form Address Change

मेरा खाता आई.सी.आई.सी.आई. बैंक में है। साहब लोगों का बैंक। उसके रिलेशनशिप मैनेजर तो बड़े अच्छे हैं। सहायता करने के लिये मेरे घर तक आये कई बार। जी हां; बनारस से 45 किमी दूर गांव में। पर उनके बैंक की साइट पर अपना पता सही करने में जो मशक्कत अभी तक कर रहा हूं, वह मैं ही जानता हूं। पता भरने के लिये उसकी साइट मकान/फ्लैट नम्बर, माला और बिल्डिण्ग नम्बर/नाम और गली नम्बर, मुहल्ला, शहर आदि मांगती है। वह सब गांव में होता ही नहीं। उत्तर प्रदेश के भदोही जैसे भुच्च जिले को तो अपने ऑप्शन में दिखाती ही नहीं वह साइट। “लालता पण्डित की बखरी के पूरब का मकान” जैसा इनपुट वह लेती ही नहीं।

ले दे कर जो पता बैंक की साइट पर आ सका है, उसे मैने अपने डाकिये – रमापति – को ध्यान से नोट करा दिया है कि इस तरह के ऊट-पटांग लिखे पते वाली कोई भी चिठ्ठी हो, मुझे दे जाये। इस सब के लिये रमापति से बड़े आत्मीय संबन्ध बनाने पड़े मुझे। उनके बारे मे जितनी जानकारी ली मैने कि उसके आधार पर एक-दो बड़े आकार की ब्लॉग पोस्टें लिखी जा सकती हैं। यह भी सुनिश्चित हो गया कि इस इलाके के डाकिया, रिटायर होने तक, रमापति ही रहेंगे।

मिलने आने वाले शहरी लोगों के लिये मैने अपना फोन नम्बर देने के साथ साथ ह्वाट्स-एप्प पर एक नक्शे सहित रास्ते का विस्तृत विवरण भेजना प्रारम्भ किया। पर कई बार लोग फिर भी फड़फड़ी खाते जब मेरे घर पंहुचे तो पता चला कि ह्वाट्सएप्प खोल कर उन्होने मेरा संदेश पढ़ा ही न था।

खैर; साल भर से ऊपर हो गया। यहां रहते बहुत से लोग जानने लगे हैं। एक दो कुरियर वाले भी पहचान गये हैं। डाकिया जी तो घरेलू से हो गये हैं। गांव के पते को ऑनलाइन जगत हिकारत से भले देखता हो, मेरा काम चल जा रहा है।

आशा है, भविष्य में बेहतर ही होगा, उत्तरोत्तर। गंवई बनने की जिद जो है मेरी। अपनी शर्तों पर रहता रिटायर्ड आदमी। … काश कभी यह हो कि मेरे नाम और जिले के नाम/पिनकोड भर से चिठ्ठी/पैकेट मुझे मिलने लगें। इलाके में उतना फ़ेमस बनने का ख्वाब पालना कोई बुरा ख्वाब नहीं है!

यद्यपि, यह पक्का है कि शहर और गांव की कशमकश में गांव आगे और तेजी से हारने वाले हैं। यह हारना केवल डाक पते की पहचान से कहीं ज्यादा गहरा होगा। बिना किसी संशय के। अगर गांव को जीतना है (या प्रासंगिक रहना है) तो खुद को री-इन्वेण्ट करना होगा। शहर की अनेक्सी की तरह नहीं चल पायेंगे गांव।

एक भाग्यशाली (?!) नौजवान से मुलाकात


अमित पाण्डेय। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव। मुझे रथयात्रा, वाराणसी में सोनू उपाध्याय के दफ़्तर में मिले।
अमित पाण्डेय। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव। मुझे रथयात्रा, वाराणसी में सोनू उपाध्याय के दफ़्तर में मिले।

(यह मैने बतौर फेसबुक नोट पोस्ट किया हुआ है। ब्लॉग पर इसका परिवर्धित रूप रख रहा हूं। दस्तावेज के लिये।)

वाराणसी में मैं सोनू (प्रमेन्द्र) उपाध्याय के रथयात्रा स्थित मेडिकल स्टाक-दफ़्तर में बैठा था। सोनू मेरे बड़े साले साहब (देवेन्द्र नाथ दुबे जी) के दामाद हैं। अत्यन्त विनम्र और सहायता को तत्पर सज्जन। वे मेरे लिये एक आवश्यक औषधि मंगवा रहे थे थोक विक्रेता के यहां से। उनका जो कर्मचारी औषधि लेने गया था, वह जाम में फंस गया था। उसके आने में देरी हो रही थी। सोनू आवाभगत में हमें (मेरी पत्नीजी और मुझको) एक-एक कुल्हड़ (उम्दा) चाय पिला चुके थे। हम आपस में इधर उधर की बातचीत भी निपटा चुके थे। अब विशुद्ध इन्तजार करना था औषधि लाने वाले व्यक्ति का।

वहीं बैठे थे दो सज्जन – नौजवान। वे आपस में मैडीकल कम्पनियां ज्वाइन करने/छोड़ने और विभिन्न दवाओं के स्टाक आदि के बारे में बात कर रहे थे – आपस में और सोनू से भी।

समय गुजारने की गर्ज से ही मैने उनमें से एक, जो एक गमछे के साथ खेल भी रहा था, से पूछा – कम्पनियां ज्वाइन करने और छोड़ने की बातें कर रहे हैं आप। इसमें अनिश्चितता नहीं रहती? तनाव नहीं होता?

उसने बताया – है क्यों नहीं। तनाव भी रहता है। पर यह नौकरी – मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव की – महीने में बीस हजार दे रही है। सो ठीक लगता है।

प्रमेन्द्र (सोनू) उपाध्याय। यह चित्र तब का है, जब वे मेरे गांव स्थित घर में मिलने आये थे।
प्रमेन्द्र (सोनू) उपाध्याय। यह चित्र तब का है, जब वे मेरे गांव स्थित घर में मिलने आये थे।

सोनू ने कहा कि ये नौजवान करीब दो लाख महीने का टर्नओवर कर रहे हैं। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव के अलावा किसी न किसी कम्पनी की फ्रेंचाइज़ी हासिल कर लेते हैं। जितना काम, जितनी मेहनत, उतनी कमाई।

उस नौजवान से पूछा – कितना समय हुआ यह करते? इसके पहले क्या करते थे?

नौजवान ने नाम बताया अमित। अमित पाण्डेय। करीब डेढ साल से यह काम कर रहे हैं। फार्मेसी की पढ़ाई नहीं की। बी.ए. किया है। उसके बाद इसी काम में लग गये।

हंसमुख नौजवान। तनाव को काम का अनिवार्य अंग मान कर चल रहा है। अपने काम में सजग। जीवन में बड़ी जल्दी नेटवर्किंग का महत्व समझ गया है। … व्यक्ति सजग हो, उसका व्यक्तित्व हंसमुख हो, वह मिलनसारता का महत्व जानता हो और अपनी दशा से कुढ़ता न हो; तो वह भाग्यशाली होगा। अपॉर्च्युनिटीज उसके पास सामान्य से अधिक आयेंगी और (अपनी मानसिकता के अनुकूल) वह अवसर पहचानेगा और तरक्की करेगा। पता नहीं, अमित यह जानता है या नहीं, पर अगर नहीं भी जानता, तो अपनी प्रवृत्ति के अनुसार, अनजाने ही सफ़लता की गोल्डमाइन पर हाथ तो रख ही लिया है उसने।

अमित का प्रोफाइल चित्र - ह्वाट्सएप्प पर।
अमित का प्रोफाइल चित्र – ह्वाट्सएप्प पर।

मैने अमित का एक चित्र लेना चाहा तो अमित ने सही पोज बनाया – गमछा अलग रख कर। मैने कहा – ऐसे नहीं वैसे बैठो जैसे गमछा लपेट कर बैठे थे।

अमित ने गमछा पुन: लपेट कर मुझे ओबलाइज़ किया। सोनू ने उससे कहा – लो, अब तुम सोशल मीडिया पर आ जाओगे।

सोनू जी का सहकर्मी मेरी दवाई ले कर आ चुका था। दवाई का डिब्बा ले कर लौटते समय अमित के बारे में मैं और सोच रहा था। दशकों पहले किसी बिजनेस पत्रिका में आदि गोदरेज का पढ़ा एक इण्टरव्यू याद आ रहा था, जिसमें उन्होने कहा था – इस देश में ऐसा कोई भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं है, जो रोजगार पाने का हुनर रखता है। (No one is unemployed who is employable)

अमित को देख वह धारणा पुष्ट हो रही थी। अमित आज रोजगार पाने का हुनर रखता है। कल शायद रोजगार देने का भी हुनर हासिल कर ले!

उमादास


GDFeb164437गुरु द्वारा दिया नाम उमादास। गृहस्थ नाम ॐ प्रकाश शुक्ल। बांसगांव, देवरिया के रहने वाले। कृशकाय शरीर। पर्याप्त स्फूर्ति। साधू।

उमादास नाम गुरु का दिया है। गुरु का नाम भी बताया उन्होने। बनारस के हैं गुरूजी।

चाय की चट्टी पर अचानक दिखे। चट्टी वाले अरुण से मैने उनके बारे में पूछा – कौन हैं?

“होंगे कोई बाबा। आते जाते रहते हैं।” अरुण ने उनके बारे में अनभिज्ञता जताई।  अपने पिताजी के समय से चट्टी पर इस तरह के बाबा लोगों का सत्कार करते रहे हैं अरुण और अन्य भाई लोग। बिना पूछे कि कौन कहां के हैं। मैं अरुण से भी प्रभावित होता हूं और बाबाजी से भी। सरल से जीव लगते हैं बाबा जी। पास के हैण्डपम्प से पानी ले कर खड़े बाबा से बतियाने लगता हूं।

अपना मुकाम पहले गोरखपुर बताते हैं। ज्यादा पूछने पर देवरिया और उसके आगे तिखारने पर बांसगांव। बाईस जनवरी को चले हैं। मईहर तक जा कर लौटेंगे। कुल 125 दिन की यात्रा का अनुमान है। पैदल ही चलते हैं उमादास। रोज लगभग 5 कोस। जहां जगह मिली वहां विश्राम कर लेते हैं और जहां जो भोजन मिला, वही कर लेते हैं। पास में एक कपड़े में रोल किया कम्बल-चद्दर है। एक झोले में अन्य सामान। एक कमण्डल भी है – जो शायद साधू होने का प्रतीक है। अन्यथा उनके पास एक ग्लास भी दिखा, जिसमें पानी पी रहे थे वे।

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उम्र नहीं पूछी; पर मेरी उम्र के तो होंगे ही। शायद ज्यादा भी। स्वस्थ होने के कारण मुझसे जवान लगते थे।

अपनी अवस्था का अनुमान देते हुये बताते हैं उमादास – “शरीर का क्या भरोसा? अपना पता और तीन चार लोगों का मोबाइल नम्बर अपने झोले में रखा हूं।”

झोले से निकाल कर गीता की प्रति और उसमें लिखे मोबाइल नम्बर/पता आदि दिखाया उन्होने। बोला कि गीता और रामायण साथ में ले कर चलते हैं।

अपना खाना भी बना लेते हैं?

“नहीं, जो मिला वही कर लेता हूं। कभी अगर कुछ न मिला तो दो टिक्कड़् सेंक लेता हूं।”

पहले भी कभी यात्रा की है?

“पन्द्रह साल पहले चित्रकूट तक गया था इसी तरह। अकेले। एक बार मैरवा गया था। पैदल ही। अकेले। नेपाल नहीं गया। पहाड़ नहीं चढा हूं।”

अपनी दशा या देश-काल से कोई शिकायत नहीं लगी उमादास को। प्रसन्नमन ही दिखे। उन्हे मैने चलते समय एक जून के भोजन के पैसे दिये। बडी सहजता से स्वीकार किये उन्होने।

वापसी में अपने साथ चलते राजन भाई से मैने कहा – एक उमानाथ हैं। अगली जून के भोजन की फिक्र नहीं और मैं हूं; जो अगले साल भर के लिये अन्न संग्रह की जुगत में हूं। एक वाहन, एक वाहन ड्राइवर काइन्तजाम कर रहा हूं। मैं असन्तुष्ट हूं। उमानाथ संतुष्ट हैं और प्रसन्न भी।

अपना अपना भाग्य। अपनी अपनी दशा।

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