अगियाबीर के रघुनाथ पांड़े जी


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रघुनाथ पांड़े जी और उनकी नातिन। नब्बे से ज्यादा की उम्र है पर दांत-आंख-शरीर सब चैतन्य है पांड़े जी का।

रघुनाथ पांड़े जी नब्बे से ऊपर के हैं। पर सभी इन्द्रियां, सभी फ़ेकल्टीज़ चाक चौबन्द। थोड़ा ऊंचा सुनते हैं पर फ़िर भी उनसे सम्प्रेषण में तकलीफ़ नहीं है। ऐसा प्रतीत नहीं होता कि उन्हे अतीत या वर्तमान की मेमोरी में कोई लटपटाहट हो। जैसा उनका स्वास्थ है उन्हे सरलता से सौ पार करना चाहिये।सरल जीवन। अपनी जवानी में व्यायाम और वजन उठाने का शौक रहा है उन्हे। बताते हैं कि गांव में अहिरों की बारात आती थी तो मनोविनोद के लिये वेट लिफ़्टिंग का कार्यक्रम होता था। वे ही बुलाये जाते थे गांव का प्रतिनिधित्व करने को। तीन मन (40 सेर वाला मन) वजन उठा लेते थे वे। अपने जमाने में साइकिल भी खूब चलाये हैं। शौकिया नहीं – काम से। एक बार बनारस भी गये हैं साइकिल से।

उनका गांव है अगियाबीर। उनके घर से अगियाबीर का टीला सामने दीखता है। वह टीला जहां खुदाई में 3300 साल पुरानी सभ्यता पाई गयी है। मध्य गंगा घाटी सभ्यता का एक महत्वपूर्ण शहर रहा है अगियाबीर। वे प्राचीन इतिहास-प्रागैतिहास की बात करते हैं, अगियाबीर के। “यह जो टीले के पास से रास्ता है, यही हुआ करता था प्राचीन काल में। तब, जब जीटी रोड नहीं था। गंगा किनारे किनारे रास्ता गया था। नार-खोह को डांकता।”

खड़ी बोली में नहीं, भोजपुरी/अवधी में बात करते हैं रघुनाथ जी। उनकी वाणी इतनी स्पष्ट है कि मुझे समझने में कोई दिक्कत नहीं हुई।

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गुन्नीलाल पांण्डेय

उनके लड़के – गुन्नीलाल पांड़े ने अपने घर आमन्त्रित किया था मुझे और राजन भाई को। राजन भाई उनके स्कूल के सहपाठी रहे हैं। बड़े ही आत्मीय और मेहमाननवाजी करने वाले हैं गुन्नी पांड़े। वहीं गुन्नीलाल जी के पुत्र संजय भी मिले। गुन्नीलाल पास के मिडिल स्कूल के अध्यापक पद से रिटायर हुये और संजय डेहरी में नवोदय विद्यालय में पढ़ाते हैं। आर्थिक रूप से (ग्रामीण परिवेश में) ठोस है यह परिवार। रघुनाथ-गुन्नी-संजय और संजय का पुत्र/पुत्री। चार पीढ़ियां रह रही हैं वहां। गांव के एक आदर्श घर की अगर कल्पना आप करें तो वह रघुनाथ पांड़े जी के घर सरीखा होगा।

मैं गुन्नीलाल जी से पूछता हूं – यह सड़क जो अगियाबीर-कमहरिया-केवटाबीर आदि गांवों को जोड़ती है, पहले भी थी? उन्होने बताया कि पहले तो मात्र पगड़ण्डी भर थी। बैलगाड़ी भी नहीं आ-जा सकती थी। पैदल या साइकल से आया जाया जा सकता था। लोग अपनी लड़कियों की शादी यहां करने में झिझकते थे। पर सन 1986 की चकबन्दी के बाद सड़क के लिये जमीन निकली। सड़क बनने पर बहुत अन्तर आया लोगों के जीवन स्तर में। अभी भी हाट-बाजार के लिये 4-5 किलोमीटर जाना पड़ता है पर अब उतना जाना आना अखरता नहीं। रघुनाथ पांड़े कहते हैं कि मिर्जापुर और भदोही जिले की रस्साकस्सी में अगियाबीर और द्वारिकापुर के बीच नाले पर पुल नहीं बन पाया है। देर सबेर बन जायेगा तो सहूलियत और बढ़ जायेगी। गुन्नीलाल जी इस इलाके की लचर नेतागिरी का भी हाथ मानते हैं विकास न होने में। “फूलन देवी जैसे को सांसद बनायेंगे तो क्या होगा?”

गुन्नीलाल जी के यहां चाय बहुत बढ़िया बनती है। तीन-चार बार गया हूं उनके यहां और हर बार एक विशिष्ट स्वाद मिला है। उनकी पतोहू या पत्नी – जो बनाती हों, अच्छा बनाती हैं। गांव के माहौल में अमूमन चाय टरकाऊ मिलती है। ऐसा गुन्नीलाल जी के यहां नहीं है। उनके घर में पेड़-पौधों, घर की बनावट, साफ़-सफ़ाई और समग्र व्यवस्था में एक सुरुचि दीखती है। वैसा सामान्यत: गंवई घरों में दिखता नहीं।

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रघुनाथ पाण्डेय जी के घर का फ्रंटेज। बिना सपोर्ट के इतना बढ़िया छज्जा गांव में मैने देखा नहीं। 

पहले बार जब मिला तो हमारे बीच औपचारिकता थी। मैं रेलवे का (रिटायर्ड) अफसर था। दूसरी बार उनके पिताजी से और परिचय हुआ। उनको पैलगी भी करने लगा मैं। गुन्नीलाल जी के साथ आत्मीयता से गले भी मिला। अब लगता है राजन भाई के साथ न होने पर भी उनके घर जाने पर अटपटा नहीं लगेगा।

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मदन मोहन पाण्डेय, उम्र 93 वर्ष


पिछली बार मदन मोहन जी से मिला था एक महीना पहले। आज फिर मिलना हुआ। वे और उनकी पत्नीजी खटिया पर बैठे थे। दोनो ही नब्बे के पार होंगे (या पत्नीजी नब्बे के आस पास होंगी)। वे स्वयम तो 93+ हैं। नब्बे के पार की उम्र और चैतन्य! कुछ कृशकाय हो गये हैं पर कद काठी से फिदेल कास्त्रो से लगते हैं!

मदन मोहान जी कुछ साल पहले तक साइकिल चला लेते थे। उन्होने बताया कि साइकिल का प्रयोग यातायात के लिये किया उन्होने। व्यायाम के लिये नहीं। व्यायाम तो वे मुगदर, नाल आदि से करते थे। लाठी/गोजी चलाने की भी निपुणता थी उनमें। मुसलमानों से सीखी थी यह विद्या। एक बार तो अनेक लोगों को अपने हाथ और लाठी के बल पर पछाडा। उनपर गोली भी चला दी थी एक व्यक्ति ने पर वह मात्र उनके हाथ में लगी। दांई हथेली में वह गोली आज भी शरीर में है। … एक बार वे एक झगड़े के गवाह थे। उनकी गवाही पर पांच लोगों को उम्र कैद की सजा भी हुई।

अपने बचपन को याद करते हुये बताते हैं कि उनके जमाने में महराजगंज में प्राइमरी स्कूल था। एक स्कूल बाबूसराय में था। अब तो हर जगह स्कूल खुल गये हैं। वे केवल दूसरी कक्षा तक पढे। पढने में मन नहीं लगता था। घर से चना ले कर स्कूल के लिये रवाना होते थे। स्कूल जाने की बजाय भुंजवा के यहां चना भुनवाते, बगीचे में बैठ कर चबाते और स्कूल का समय खत्म होने पर घर आ जाते थे। मार भी खाये पर पढ़े नहीं।

कलकत्ता में मदन मोहन जी 15 साल रहे। पहले ट्रक चलाया। अपना ट्रक। असम/गुवाहाटी तक हो आये। कलकत्ता से शाम को चलते थे और सवेरे तक इलाहाबाद/बनारस पंहुचते थे। ट्रक के बाद कलकत्ता में और भी काम किया उन्होने।

साइकिल खूब चलाई है उन्होने। सौ किलोमीटर रोज तक भी चलाई है। गांव से राबर्ट्सगन्ज तक साइकिल से हो आये हैं। तब सड़कें खाली होती थीं। वाहन कम। सड़कों पर पैदल चलने वाले ज्यादा होते थे।

बदलते समय के बारे में उनके समय में एक प्रचलित कहावत सुनाई मदन मोहन जी ने। इन्दारा से पानी निकालने के लिये गगरी का प्रयोग होता था। बाद में बड़ा गगरा (पीतल या ताम्बे का घड़ा) प्रयोग में आने लगा। उसके बाद बाल्टी से भी पानी निकालने का समय आया।

गगरी रही, त पटरी रही (जब तक गगरी थी, तब तक पटरी – आपस में सौहार्द – रही)

गगरा भवा त रगरा भवा (जब गगरा प्रयोग में आया तो आपस में झगड़ा होने लगा। गगरी की बजाय गगरा कुंये की दीवार से ज्यादा टकराता था।)

बाल्टी आइ त पाल्टी आइ (बाल्टी का प्रयोग होने लगा तो राजनीति घुसी गांव में। पार्टियां बनने/दखल देने लगीं)

चलते समय पाण्डेय जी को प्रणाम किया तो उन्होने पुन: आने को कहा। उनके पास जाना और बैठना अच्छा लगता है। सो जाऊंगा जरूर। कामना है कि उनका स्वास्थ्य अच्छा रहे और सरलता से सौ पार करें वे। उनके पास बैठ कर समाज-गांव में हुये बदलाव पर उनका कथन सुनना है। बार बार।


श्री बालकृष्णदास “व्यास” से एक और मुलाकात


आज योगेश्वरानन्द आश्रम के बाहर मैं और राजन भाई थे। बालकृष्णदास व्यास जी अपने कक्ष से बाहर निकल आये। शायद आहट से। उनसे बातचीत होने लगी। इधर उधर की बातचीत से प्रारम्भ हुई और मेरी पिछली पोस्ट के माध्यम से बालकृष्णदास व्यास जी के परिचय पर आ गयी। उन्होने अपने विषय में जो कुछ बताया, उसको ले कर कोई बायोग्रफ़र या कोई उपन्यासकार एक दमदार कृति लिख सकता है। पर असल बात यह है कि मैं न लेखक हूं, न बायोग्राफ़र और न उपन्यासकार। मैं एक ब्लॉगर हूं, जो अपने परिवेश से कुछ चिन्दियां चुनता है; साथ में एक दो फोटो सटाता है और प्रस्तुत कर देता है।


मैं योगेश्वरानन्द आश्रम जाता क्यों हूं? एक – वहां गंगा तट है। दो – सवेरे की सैर/साइकलिंग के लिये वह सही दूरी पर है। भगवानपुर-करहर-गड़ौली होते हुये वहां जाने-आने में आठ-नौ किलोमीटर की साइकलिंग होती है। तीन – यह स्वीकर करना शायद कठिन हो; बालकृष्णदास व्यास (आश्रम में रहने वाले एकान्तवासी साधक/कवि) को लेकर एक कौतूहल है।


बालकृष्णदास व्यास जी जो कुछ लिख या रच रहे हैं, उसके परिचय के लिये विस्तृत लेख की जरूरत है। वह लेखन समय मांगता है। इसके अलावा बालकृष्ण जी के महाकाव्य को डिजिटल फार्म में लाने के लिये गहन रूप से कई मैन-डेज़ का इनपुट चाहिये। मैं उनसे इस विषय में कहता हूं तो वे लैपटॉप की अनुपलब्धता की बात करते हैं। उनका कहना है कि वे ऐसे लोगों के सम्पर्क में हैं जो काव्य की-इन कर सकें।

मैं सोचता हूं कि अपना एक लैपटॉप उन्हे उपलब्ध करा दूं। पर उसमें मेरा इतना डाटा, इतना अटाला पड़ा है कि पहले उसे साफ़ करना होगा। … बालकृष्णदास व्यास जी से मिलना मेरी रिटायर्ड जिन्दगी के आराम में खलल न डाल दे! 😆

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आश्रम के बाहर प्रारम्भ हुयी बालकृष्णदास व्यास जी से बातचीत।

बहुत कुछ बताया अपने विषय में बालकृष्णदास व्यास जी ने। उन्होने कहा कि उनकी अवस्था लगभग 35 वर्ष की है। इस 35 वर्ष की अवस्था में क्या जबरदस्त उतार-चढ़ाव हैं उनके जीवन में! उनके माता-पिता बबीना के पास के हैं। बबीना ऑर्डीनेन्स डीपो के द्वारा उनके पिता की लगभग 150बीघा जमीन अधिगृहीत की गयी। उसके मुआवजे से परिवार बहुत सम्पन्न हो गया। उनकी मां के पास 5 किलो सोना था स्त्री-धन के रूप में। पर बुन्देलखण्ड में सम्पन्नता सहेज कर रखना सरल नहीं है। डाका पड़ा और परिवार अति सम्पन्न से अति विपन्न की दशा में आ गया।

जीवन के प्रारम्भ में उन्होने विपन्नता देखी। घोर विपन्नता। फिर परिवार का पालन-प्रबन्धन का समय आया। उसके बाद बालकृष्णदास व्यास जी ने घर छोड़ कर अनेक स्थानों पर, अनेक गुरु-साधुओं के साथ समय व्यतीत किया। हरिद्वार से ले कर अहमदाबाद तक। अहमदाबाद में आशाराम बापू के साथ भी रहे। मैने कहा – क्या इस विषय में अपने ब्लॉग पर लिख दूं? 

बात वही समाप्त! विवाद क्या बढ़ाया जाए। 

आशाराम या अन्य संतों के साथ जो समय बालकृष्णदास व्यास जी ने गुजारा उसपर विधिवत सामग्री अपने आप में एक रोचक (और महत्वपूर्ण) दस्तावेज होगी। कभी शायद कोई व्यक्ति, या स्वयम वे लिखें। पर जो भी वे बता रहे थे आश्रम के बरगद की छाया में या फिर अपने कक्ष में, वह मोहक था। मेरे साथ गये राजन भाई शायद वापस लौटने की उकताहट दिखा रहे थे, पर मैं उन्हे सुनता जा रहा था।

व्यास जी ने अपने कृतित्व के बारे में बताया। शंकर-पार्वती संवाद से (उसी प्रकार जिस प्रकार रामचरित मानस) गुंथी है यह कथा। उसकी भाषा तुलसी के मानस का बेस तो लेती है, पर उसमें कालान्तर में आये शब्द और प्रयोग निसंकोच हैं। इस बारे में बालकृष्णदास जी की मौलिकता है। ग्रन्थ के कथ्य पर ज्यादा नहीं कहूंगा, सिवाय इसके कि वह रोचक लगता है। मेरे पास वहां बैठने का ज्यादा समय होता तो निश्चय ही और भी सुनना अच्छा लगता। उससे भी ज्यादा समय हो तो उस ग्रन्थ को उलटने/पलटने/पढ़ने और उसपर लिखने का प्रयास करता; बावजूद इसके कि मेरा पठन का बैकलॉग पहले ही बहुत ज्यादा है। कथ्य में वर्तमान सामाजिक/रजनैतिक दशा पर पर्याप्त सोच है और मेधा के प्रत्येक स्तर के व्यक्ति को उसमें कुछ न कुछ मिलेगा जो उसे रुचेगा या प्रेरणा देगा। … आखिर किसी ग्रन्थ की उपयोगिता का यही तो सबसे महत्वपूर्ण पैमाना होता है! नहीं?


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आश्रम में मेटी ले कर आया कुम्हार।

वहां आश्रम में एक कुम्हार एक मेटी (छोटा घड़ा) ले कर आया है बालकृष्णदास जी के लिये। उसी कुम्हार को मैं पचास रुपये देता हूं कि मेरे लिये वह घड़ा ला कर दे।

घड़ा लेने जाने को एक चक्कर वहां अवश्य लगेगा। एक और मुलाकात व्यास जी से होना नियत है ही।

शायद उन्हे घर पर भी बुलायें मेरी पत्नीजी। जितना मैने अपनी पत्नीजी को बताया है, या ब्लॉग पर उन्होने पढ़ा है; उनके मन में भी कौतूहल तो है ही।

अत: भविष्य में भी ब्लॉग पर व्यास जी के संदर्भ में कुछ न कुछ रहेगा!


 

कमहरिया और बालकृष्णदास व्यास जी


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गंगा किनारे योगेश्वरानन्द धाम, कमहरिया। श्री बालकृष्णदास व्यास जी यहीं रह रहे हैं।

उस शाम हम (राजन भाई और मैं) फिर कमहरिया के लिये साइकल पर निकले। शाम का समय था। यह सोचा कि आधा घण्टा जाने, आधा घण्टा आने में लगेगा। वहां आधे घण्टे रहेंगे व्यास जी के आश्रम में। शाम छ बजे से पहले लौट आयेंगे।

जो रास्ता हमने चुना वह लगभग 80% पगडण्डी वाला था। पगडण्डी में भी करीब 1 किलोमीटर काफ़ी ऊबड़-खाबड़। घर से कमहरिया तक चार पांच गांव पड़ते हैं – मेदिनीपुर, द्वारिकापुर, अगियाबीर, गड़ौली, करहर और भगवानपुर। गडौली और करहर बड़े गांव हैं। गड़ौली में तो बड़ी पानी की टंकी और गांव भर में पाइप से पानी की सप्लाई भी देखी मैने। इन गांवों से गुजरते समय अलग अलग प्रकार के अनुभव होते हैं।

द्वारिकापुर में मेरा दूधवाला, बाढ़ू रहता है। बाढ़ू यादव के पास अपनी भैसें हैं। खेती भी है। बाढ़ू से मैत्री उनके द्वारा मेरे घर दही ले कर आने से शुरू हुई। उन्ही से पता चला कि वे रिटायर्ड वन रक्षक हैं। मैं पेड लगाने में रुचि रखता हूं और भविष्य में बाढ़ू से मैत्री काम की रहेगी। साइकल चला कर उनके गांव से गुजरते समय बाढ़ू किसी कोने से ऊंची आवाज में नमस्कार करते हैं। मैं उन्हे देख नहीं पाता, पर जवाब देते हुते गुजर जाता हूं उनकी बस्ती के सामने से।

द्वारिकापुर और अगियाबीर के बीच घाटी सी है। गंगा जब बढ़ती है तो यहां जल आ जाता है और यह रास्ता बन्द हो जाता है। अभी वहां लड़के खेलते मिलते हैं। ठाकुरों की बस्ती है। एक लड़का कहता है – “दद्दा, काहे साइकल चला रहे हो। आपकी उमर नहीं इसके लिये। साइकल मुझे दे दो!” मुझे उसकी यह प्रगल्भता पसन्द नहीं आती। वहां से चलता चला जाता हूं। मैने अपने बालों पर खिजाब लगाना छोड़ दिया है। भौहें भी सफ़ेद होने लगी हैं। उम्र बढ़ने और अपने मेक-अप के प्रति उदासीन भाव के कारण उद्दण्ड बालकों के लिये मैं करुणा और हास्य का निमित्त बनने लगा हूं। यह अहसास अच्छा नहीं लगता। किसे अच्छा लगेगा?!

अगियाबीर में गंगा किनारे एक बड़ा टीला है। एक पहाड़ी जैसा। उसपर एक दो झोंपड़ियां, कुछ वनस्पति और पेड़ बड़ा मनोरम दृष्य प्रस्तुत करते हैं। उस टीले पर आर्कियालॉजिकल खोज करने वाले काम करते हैं। भरों के समय की मूर्तियां और सिक्के मिले हैं वहां। भरों के कारण ही यह क्षेत्र भरदोही (कालान्तर में भदोही) कहलाया। शायद उससे पहले का भी इतिहास हो इस कोट में गड़ा हुआ।  वहां तक जाने को जो पगड़ण्डी है, उसपर शायद ही साइकल चल पाये। पैदल जाना होगा और उस टीले (कोट)  की ऊंचाई पर पैदल चढ़ना होगा। जाने का मन है; पर उसके लिये अपना स्वास्थ्य और बेहतर बनाना होगा। अगियाबीर कोट को देखते हुये यह संकल्प मन ही मन दोहराता हूं।

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कमहरिया के रास्ते में।

अगियाबीर के आगे कमहरिया है। वहां पक्की, डामर वाली सड़क मिलती है। बटोही (मेरी साइकल) की रफ़्तार बढ़ जाती है। एक नौजवान अपरिचय के बावजूद अभिवादन करता है। औरतें दोनो ओर के खेतों में निराई कर अपने सिर पर बरसीम, अंकरी और अन्य घास के गठ्ठर लिये घर को लौटनी दिखती हैं शाम हो गयी है। सवा घण्टे बाद सूर्यास्त हो जायेगा। पशु भी घर लौटने के उपक्रम में हैं। भेड़ों के साथ एक अधेड़ गड़रिया उन्हे वापसी के लिये हांक रहा है। मन होता है कि रुक कर दो चार चित्र लूं। संझ के सूरज में चित्र भी अच्छे आयेंगे; पर आश्रम तक पंहुचने की जल्दी भी है और वहां से घर वापस धुंधलके तक लौट भी आना है। बटोही चलता चला जाता है।

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गंगा किनारे अघोरी आश्रम। जितनी द्वजायें और निर्माण दीखता है, उतना यह आश्रम जमीन हथिया कर फैलेगा निकट भविष्य में।

आगे दूर से ही दिखती है गंगा नदी की धारा और उसके किनारे आश्रम। पहले अघोरियों के आश्रम के ढेरों झण्डे हैं। उसके आगे वट वृक्ष से आच्छादित आश्रम की पक्की इमारत। राजन भाई फिर भी, आश्वस्त होने के लिये लोगों से पूछ लेते हैं कि वह आश्रम ही तो है न।

डामर की सड़क से हट कर पुन: पगड़ण्डी पकड़नी पड़ती है कुछ दूर के लिये और हम आश्रम पंहुच जाते हैं।

 एक और व्यक्ति आश्रम में आया है हम से पहले। मोटर साइकल पर। हम अपनी साइकल खड़ी कर अन्दर जाते हैं। व्यास जी के कक्ष से उनकी आवाज आ रही है। बीच बीच में एक अन्य व्यक्ति की भी। वे आहट पा कर हमें बुलाते हैं कमरे में प्रवेश कर मैं उन्हे नमस्कार करता हूं।

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अपने आश्रम के कक्ष में अपनी चौकी पर बालकृष्णदास व्यास जी।

एक लगभग 15X12 फुट का कमरा। एक ओर व्यास जी का तख्त है। वे उसपर बैठे हैं। बीच में एक दीवार के पास पूजन की चौकी है। व्यास जी के तख्त के दूसरी तरफ़ दीवार से सट कर एक दरी बिछी है जिस पर आठ दस लोग बैठ सकते हैं। यह स्पष्ट हो गया कि व्यास जी इस कमरे में रहते हैं, पूजन भी करते है और लोगों के साथ मिलते भी हैं। लोगों को प्रवचन भी दिया जा सकता है। मैने देखा कि तख्त के नीचे एक हारमोनियम भी रखा था। व्यास जी कीर्तन भी करते होंगे संगीत के साथ।

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आश्रम के अपने कक्ष में बालकृष्णदास व्यास जी। नीचे उनका संदूक और हारमोनियम दिखाई पड़ता है।

व्यास जी का छरहरा और लम्बा गौर शरीर। सफ़ेद धोती (लुंगी की तरह बांधी) और एक इनर (पूरे बांह की बनियान) पहने थे वे। सिर पर बड़े बाल और घनी दाढ़ी – पूरी तरह काली। बाद में ध्यान से देखा तो पाया कि खिजाब का प्रयोग किया गया है। उसी से अन्दाज लगाया कि उम्र 40 के आसपास होगी।

वे पूछते हैं कि कितना समय है हमारे पास। हम बताते है आधा घण्टा। समय सीमा के अनुसार वे अपने ग्रंथ का परिचय देने लगते हैं। महाकाव्य लिखा है (उसमें शायद अन्तिम परिवर्तन कर रहे हैं) श्री बालकृष्णदास व्यास जी ने। तुलसी कृत मानस की तरह उसमें सात अध्याय हैं। अवधी जैसी भाषा है। उसे तुलसी वाली अवधी नहीं कह सकते। आजकल की बोलचाल की स्थानीय भाषाओं के शब्द भी हैं। वे कई अंश बताते हैं ग्रन्थ के। सुन कर लगता है कि ग्रन्थ हल्का-फुल्का-छिछला नहीं है। मैं काव्य पारखी नहीं हूं, अत: ग्रन्थ की गुणवत्ता के विषय में कोई सशक्त टिप्पणी नहीं कर सकता। पर ग्रन्थ मुझे गहराई लिये लगता है। यह भी महसूस होता है कि बालकृष्ण व्यास जी के साथ भक्ति के स्तर पर न सही, इण्टेलेक्ट के आयाम में दोस्ती की जा सकती है।

व्यास जी के पास ग्रामीण सम्भवत: उन्हे महात्मा मानते हुये भक्ति भाव से आते हैं। मैं यह देख रहा हूं कि एक व्यक्ति एकान्त में रह कर, सभी असुविधाओं के साथ लगभग वही परिस्थितियां रीक्रियेट कर रहा है जो तुलसीदास के साथ थीं। वह उस प्रकार की मेधा का भी परिचय दे रहा है जो तुलसी में थी। पता नहीं , भविष्य बालकृष्णदास को महाकवि का दर्जा देगा या नहीं। पर मुझे उनमें विलक्षणता के दर्शन होते हैं।

व्यास जी कभी मुझे मध्य उत्तर प्रदेश के प्रतीत होते हैं, कभी बुन्देलखण्ड के। उनके बालों में खिज़ाब का भी प्रयोग है। वे अपने दिखने वाले स्वरूप के प्रति कान्शस हैं। वे सम्भवत: राजनैतिक समीकरण बिठाने के प्रति भी उदासीन नहीं हैं। मुझे गालिब की आटो-बायोग्राफी “दस्तम्बू” की याद हो आती है, जिसमें वे रानी विक्टोरिया तक अपना सम्पर्क बनाने को तत्पर दीखते हैं। उसी प्रकार बालकृष्णदास जी मोदी/योगी से सम्पर्क करने की अपेक्षा भी व्यक्त करते हैं।

मेरे पास अधिक समय नहीं है। अत: इस मनोभाव के साथ मैं वापस लौटता हूं कि आगे उनसे मिलता रहूंगा।

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गंगा तट पर राजन भाई के साथ व्यास जी।