चिन्ना पांड़े, लॉयन और मटर पनीर

बेचारा वेजीटेरियन लॉयन। अब बाभन के घर की कहानी का पात्र है तो वेजीटेरियन ही तो होगा!


चिन्ना पांड़े (पद्मजा पाण्डेय) को स्कूल जाने के लिये तैयार करना एक प्रॉजेक्ट है। बिस्तर से उठाते समय उसकी मां को बताना पड़ता है कि आज स्कूल खुला है। उसके टिफिन में क्या बना कर दिया जायेगा। आज कौन सी ड्रेस पहन कर जाना है; आदि।

कई बार बोलना होता है – उठो चिन्ना, “टाइम का शुरू” हो गया है।

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जोगी बाबा – सिद्धिनाथ मन्दिर का साधू और अनाथ गौवंश को पालनेवाला

पिछले दो साल से इस इलाके में साइकिल से घूम रहा हूं मैं, पर राजकुमारनाथ (जोगी बाबा) जैसा विलक्षण व्यक्ति नहीं पाया मैने।


नाम है राजकुमारनाथ योगी। लोग जोगी बाबा कहते हैं। कुछ वैसा ही जैसे मुख्य मन्त्री जी हैं आदित्यनाथ योगी।

आदित्यनाथ की तरह राजकुमार नाथ भी नाथपन्थी साधू है। सारंगी बजा कर भिक्षा मांगने वाला।

आदित्यनाथ की तरह यह साधू भी लगभग 45-46 साल का है।

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उमाशंकर, डबल रोटी वाले

भाजपा के प्रति अपनी प्रतिबद्धता को बार बार दर्शाया उमाशंकर ने। लेकिन साथ में यह भी कहा कि पार्टी कार्यकर्ता को अहमियत नहीं देती।


यदाकदा डबलरोटी वाले की दुकान पर जाता हूं। पहले यह दुकान – गुमटी – नेशनल हाईवे पर थी। फिर हाईवे के छ लेन का बनने का काम होने लगा तो गुमटी उसे हटानी पड़ी। बाजार के अंदर, दूर नेवड़िया की ओर जाते रास्ते पर उसने शिफ्ट कर लिया अपना व्यवसाय।

उमाशंकर की डबल रोटी-बेकरी की दुकान। बगल में उनकी पुत्रवधू हैं।

उनका नाम पूछा तो उनकी पुत्र वधू ने बताया – उमाशंकर।

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बसन्त कनौजिया

बसन्त न हों तो भाजपा और कांग्रेस के इन नेताओं की नेतागिरी के जलवे की चमक निकल जाये।


मेरे दो साले साहब उत्तर प्रदेश के सबसे लोकप्रिय व्यवसाय में हैं। नेतागिरी में। बड़े – देवेन्द्र भाई (देवेन्द्रनाथ दुबे) कांग्रेस में हैं। इन्दिरा और राजीव गांधी के जमाने में विधायकी का चुनाव लड़ चुके हैं कांग्रेस की ओर से। आजकल जिला कांग्रेस के महासचिव हैं (यह अलग बात है कि कांग्रेस पूरे पूर्वांचल में वेण्टीलेटर पर है)।

दूसरे – शैलेन्द्र दुबे – भाजपा में हैं। दो बार गांव प्रधान रह चुके हैं। एक बार भाजपा का विधायकी का टिकट पाये थे, पर समाजवादी के उम्मीदवार से हार गये। अगली बार टिकट पाने से चूक गये। फिलहाल सांसद प्रतिनिधि हैं। मैं चाहूंगा कि भाजपा इन्हे भी सांसद बनने के योग्य मानना प्रारम्भ कर दे।

इन दोनों को यह ज्ञात है कि जनता नेता को झकाझक ड्रेस में देखना पसन्द करती है। साफ झक कुरता-धोती या कुरता-पायजामा। कलफ (स्टार्च) से कड़क क्रीज। इतना ग्रेसफुल पहनावा रहे कि कोई भी उनकी ओर देखे और उनपर अटेण्टिव रहे। दोनो अपनी पर्सनालिटी-कान्शस हैं। दोनो जानते हैं कि उनका पचास-साठ फीसदी आभा मण्डल उनके वेश से बनता है।

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बनवासी (मुसहरों) का भोजन रखाव

बनवासी (मुसहरों) का भोजन
[…]उनके पास कोई अलमारी-मेज जैसी चीज तो थी नहीं। आसपास के जीव जन्तुओं और कुत्तों से बचाने के लिये लकड़ी के डण्डे जमीन में गाड़ कर उसके दूसरे सिरे पर भोजन की बटुली-बरतन लटका रखे थे उन्होने।[…]


उनके पास आवास नहीं हैं। प्रधानमन्त्री आवास योजना में उनका नम्बर नहीं लगा है। गांव में जिस जमीन के टुकड़े पर वे रहते हैं वह ग्रामसभा की है। बन्जर जमीन के रूप में दर्ज। आठ परिवार हैं। गांव उन्हें लम्बे अर्से से रहने दे रहा है, उससे स्पष्ट है कि वे जरायम पेशा वाले नहीं हैं। गांव की अर्थव्यवस्था में उनका योगदान है। सस्ता श्रम उपलब्ध कराते होंगे वे।

मुसहर (बनवासी)
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महराजगंज कस्बे के रेस्तराँ में चिन्ना (पद्मजा) पांड़े

आप कहेंगे कि चाऊमीन पर इतना ज्यादा क्या कोई लिखने की बात है? पर आप पांच साल का गांव में रहने वाला बच्चा बनिये और तब सोच कर देखिये! … आपको यह सब पढ़ते समय अपने को शहरी-महानगरी कम्फर्ट जोन से बाहर निकाल कर देखना होगा।


विजय तिवारी जी के श्री विजया रेस्तराँ के बारे में मैं दो ब्लॉग पोस्टें लिख चुका हूं। पोस्ट 1 और पोस्ट 2 पर क्लिक कर वे देख सकते हैं। आजकल मैं अपनी साइकिल भ्रमण में बहुधा वहां जा कर कॉफी के लिये बैठने लगा हूं। गांव में रहते हुये मेरी कॉफी हाउस की चाह को यह रेस्तराँ लगभग 90 प्रतिशत पूरा कर दे रहा है।

दो-तीन बार मेरी पत्नीजी भी मेरे साथ गयी हैं – वह तब जब हम अपने वाहन से बाजार गये थे किसी सौदा-सामान के लिये। पत्नीजी को भी वह रेस्तराँ बहुत पसन्द आया है। चूंकि यह उनका अपने मायके का इलाका है – वे तिवारी जी और उनके कुटुम्ब से परिचित भी हैं। आसपास के बाभन रिश्तेदार भी होते हैं; उस तरह से भी विजय तिवारी जी रिश्ते में आते हैं – फलाने की बिटिया उनके गांव में या उस गांव की इस गांव/घर में आयी है ब्याह कर। मुझे उन सम्बन्धों में ज्यादा रुचि नहीं है। मैं तो यह देखता हूं कि विजय जी कितनी मेहनत-लगन से अपने रेस्तराँ को आकार दे रहे हैं। बतौर ब्लॉगर मेरा ध्येय यह ऑब्जर्व करना है कि यह उपक्रम कैसे विकसित होता है।

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महराजगंज के कस्बाई बाजार पर फुटकर सोच


यह पास का कस्बा – महराजगंज कैसे पनपा? कैसे इसका बाजार इस आकार में आया? यहां रहने वाले पहले के लोग कहां गये? बाजार ने कौन से लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया। यातायात के साधन बाजार को किस तरह विकसित करते गये? … ये सवाल मेरे मन में आजकल उठ रहे हैं।

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