जोगी बाबा – सिद्धिनाथ मन्दिर का साधू और अनाथ गौवंश को पालनेवाला

पिछले दो साल से इस इलाके में साइकिल से घूम रहा हूं मैं, पर राजकुमारनाथ (जोगी बाबा) जैसा विलक्षण व्यक्ति नहीं पाया मैने।


नाम है राजकुमारनाथ योगी। लोग जोगी बाबा कहते हैं। कुछ वैसा ही जैसे मुख्य मन्त्री जी हैं आदित्यनाथ योगी।

आदित्यनाथ की तरह राजकुमार नाथ भी नाथपन्थी साधू है। सारंगी बजा कर भिक्षा मांगने वाला।

आदित्यनाथ की तरह यह साधू भी लगभग 45-46 साल का है।

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बनवासी (मुसहरों) का भोजन रखाव

बनवासी (मुसहरों) का भोजन
[…]उनके पास कोई अलमारी-मेज जैसी चीज तो थी नहीं। आसपास के जीव जन्तुओं और कुत्तों से बचाने के लिये लकड़ी के डण्डे जमीन में गाड़ कर उसके दूसरे सिरे पर भोजन की बटुली-बरतन लटका रखे थे उन्होने।[…]


उनके पास आवास नहीं हैं। प्रधानमन्त्री आवास योजना में उनका नम्बर नहीं लगा है। गांव में जिस जमीन के टुकड़े पर वे रहते हैं वह ग्रामसभा की है। बन्जर जमीन के रूप में दर्ज। आठ परिवार हैं। गांव उन्हें लम्बे अर्से से रहने दे रहा है, उससे स्पष्ट है कि वे जरायम पेशा वाले नहीं हैं। गांव की अर्थव्यवस्था में उनका योगदान है। सस्ता श्रम उपलब्ध कराते होंगे वे।

मुसहर (बनवासी)
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पुस्तक कब पढ़ी मानी जाये?


रिटायरमेण्ट के बाद जब मित्र भी नहीं बचते (शहर के मित्र शहर में छूट गये, गांव के अभी उतने प्रगाढ़ बने नहीं) तो पठन ही मित्र हैं। दिन भर लिखा पढ़ने में बहुत समय जाता है। पर बहुत व्यवस्थित नहीं है पठन।

गांव में अखबार वाला समाचारपत्र बड़ी मुश्किल से देता है। पत्रिकायें नहीं मिलतीं। उसका विकल्प टैब पर Magzter पर पत्रिकायें पढ़ने से मिलता है। पुस्तकों की संक्षिप्तता का एप्प – Blinkist बड़े काम का है। पुस्तक परिचय का बहुत महत्वपूर्ण काम उनसे हो जाता है। अमेजन से किण्डल पर पुस्तकें खरीद कर पढ़ी जा सकती/जाती हैं। अमेजन प्राइम कई पुस्तकें मुफ्त में पढ़ने को दे देता है। उसके अलावा नेट पर उपलब्ध क्लासिक्स या पायरेटेड अच्छी पुस्तकों का भण्डार है। पेपर पर छपी पुस्तकें खरीदना लगभग खतम हो गया है पर पहले खरीदी पुस्तकों का भी बडा बैकलॉग है।

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महराजगंज के कस्बाई बाजार पर फुटकर सोच


यह पास का कस्बा – महराजगंज कैसे पनपा? कैसे इसका बाजार इस आकार में आया? यहां रहने वाले पहले के लोग कहां गये? बाजार ने कौन से लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया। यातायात के साधन बाजार को किस तरह विकसित करते गये? … ये सवाल मेरे मन में आजकल उठ रहे हैं।

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दुखहरन लकड़हारा


वह लकड़हारा है। उसे बुलाया था घर में पड़ी लकड़ी चीर कर छोटे छोटे टुकड़े करने को। सर्दी बढ़ गयी है। सोचा गया कि शाम के समय एक दो घण्टे अलाव जलाया जाये। उसके लिये उपले जमा कर लिये थे। एक बोरसी भी बनवा ली थी। कमी थी तो लकड़ी के छोटे टुकड़ों की। लकड़ी घर में थी, पर काफी मोटे बोटे के रूप में। कई दिनों से एक लकड़हारे की जरूरत महसूस हो रही थी। तीन दिन पहले वह मिला।

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माताप्रसाद – कड़ेप्रसाद और शीतला माता का मंदिर


नवरात्रि पर्व के पहले दिन मैं तुलापुर गांव में शीतला माता के मन्दिर गया था। यह मन्दिर जीर्णोद्धार कर बनाया गया है। मूर्तियों से लगता है कि सैकड़ों या हजार साल का रहा होगा वह मंदिर। खण्डित मूर्तियां भी रखी हैं वहां।

वैसे यह पूरा इलाका शुंग और कुषाण कालीन अवशेषों से भरा पड़ा है। मेरे पुरातत्ववेत्ता मित्र डा. रविशंकर ने बताया कि यहां पास में गंगा के प्रवाह से एक बैकवाटर की झील थी और उसके किनारे 600बीसीई की बस्ती थी।

DSC_1069<[शीतलामाता के पुराने मन्दिर पर के दीवार पर जड़ी मूर्तियां ऐसी हैं]

पर इसी पुराने मन्दिर के पास लगभग तीस साल पहले का बना शीतला माता का एक नया मन्दिर है – महराजगंज-चौरी की दो लेन की सड़क पर। वहां मिले थे कड़े प्रसाद। उनकी मिठाई की दुकान है। बगल की उन्ही की जमीन पर यह मन्दिर बनाया गया है। उन्ही की जमीन पर मन्दिर और चाय-मिठाई की दुकान – यह बिजनेस का बहुत शानदार मॉडल है। बहुत कुछ वैसा ही जैसे महानगरों में गाय और चारा ले कर बैठा व्यक्ति जिससे चारा खरीद कर उसी की गाय को लोग खिलाते हैं। लोगों की श्रद्धा का व्यवसाय।

आज कड़े प्रसाद और उनके बड़े भाई माता प्रसाद मिले दुकान पर। माता प्रसाद ने ही अधिकांश बात की। कड़े प्रसाद मात्र संपुट दे रहे थे।

DSC_1083[शीतलामाता का माताप्रसाद-कड़ेप्रसाद की जमीन पर बना नया मन्दिर]

माता प्रसाद ने बताया कि मन्दिर यद्यपि उनकी जमीन पर बना है, पर बनाने में आस पास के लोगों का भी पर्याप्त सहयोग मिला है। हर साल वे गुरुपूर्णिमा पर भण्डारा भी करते हैं। उसमें भी बहुत से लोगों का सहयोग होता है। कड़े प्रसाद ने जोड़ा – भण्डारे में करीब 8-9 क्विण्टल बुन्दिया बनती है। दस हजार लोग खाते होंगे भण्डारे में।

माताप्रसाद की अम्माजी (बकौल उनके) 108 साल की हैं। सत्तर के दशक में जब मन्दिर बना था तो उसमें आग्रह अम्माजी का ही था। शीतला माता ने उन्हें ही सपने में आदेश दिया था मन्दिर बनाने के लिये। वे शीतलामाता की बड़ी भक्त हैं। (बकौल माताप्रसाद) उनके सिर पर माता आती भी थीं और तब अम्माजी ट्रान्स में चली जाया करती थीं। अब तो वे बहुत वृद्ध हो गयी हैं। चला फिरा भी नहीं जाता। अब मन्दिर की पूजा का सारा भार माताप्रसाद के तीसरे भाई जिलाजीत के जिम्मे है।DSC_1142[माताप्रसाद (दांयें) और कड़ेप्रसाद। अपनी दुकान के बाहर]

परिवार का मुख्य उद्यम यह मिठाई/चाय की दुकान है। दुकान माताप्रसाद देखते हैं। कड़े प्रसाद को दुकान पर बैठना नहीं रुचता। वे मिठाई और नमकीन बनाते हैं और गाड़ी से घूम घूम कर बेचते हैं।

दुकान से एक किलो नमकीन मैने खरीदा भी। सस्ता है। 120रु किलो। कड़े प्रसाद ने बताया कि रोफ़ाइण्ड तेल में बना है (पामोलीन में नहीं)। कड़े प्रसाद हमारे गांव में भी आते हैं मिठाई नमकीन बेचते। “लोटन गुरू (गांव के प्रसिद्ध ओझा) के यहां भी आता हूं मैं।”

नवरात्रि व्रत के कारण मैने तो नहीं खाया नमकीन पर घर पर लोगों ने चखकर बताया कि स्वाद अच्छा है।

परिवार के दो लडके अंकलेश्वर (गुजरात) में मिठाई की दुकान खोले हैं। कड़े प्रसाद से मिठाई बनाना सीखा है उन्होने। लोग गुजरात में मेहनत मजदूरी के लिये जाते हैं, पर माताप्रसाद-कड़ेप्रसाद के बच्चे गुजरात गये हैं बिजनेस करने।

बिल्कुल देसी दिखने वाले भाई हैं। देसी परिवेश। पर उनके बिजनेस सेंस पर तो किसी मैनेजमेण्ट संस्थान में भाषण दिया जा सकता है। मैं तो प्रभावित हो गया उनसे। जहां इस पूर्वांचल में हर व्यक्ति सरकारी नौकरी तलाश रहा है, वहां इस विश्वकर्मा परिवार का मिठाई-नमकीन व्यवसाय बहुत आकर्षक लगा।


अगियाबीर की पुरातात्विक खुदाई का कार्य अन्तिम चरण में


मार्च के उत्तरार्ध में आये थे बीएचयू के प्राचीन भारतीय इतिहास और पुरातत्व विभाग के लोग अगियाबीर टीले के दक्षिणी-पूर्वी भाग में उत्खनन करने। करीब तीन सप्ताह बाद प्रोफेसर अशोक सिंह जी ने मुझे इस बारे में बताया। मैने पुरातत्व टीले पर चढ़ने में अपने घुटनों की तकलीफ की बात की तो डा. अशोक सिंह जी ने मेरा हौसला बंधाया – “मेरे भी घुटनों में अर्थराइटिस की समस्या है। पर जब मैं खुदाई स्थल पर होता हूं तो यह तकलीफ गायब हो जाती है।“

कुछ वैसा ही मेरे साथ हुआ। मैं साइकिल से द्वारिकापुरके प्राइमरी स्कूल में लगे उनके कैम्प तक जाता हूं और वहां साइकिल खड़ी कर एक छड़ी का सहारा ले नाले को पार करते हुये करीब 500 कदम नीचे-ऊंचे चलते हुये टीले पर पंहुचता हूं। लगभग रोज। मेरे घुटनों और कूल्हों का दर्द उसके आड़े नहीं आया। मैने सीखा – बढ़ती उम्र के साथ शारीरिक अक्षमता उतना भौतिक नहीं है। उसकी जड़ें मन में हैं। मन को पर्याप्त तैयार कर लें तो असामान्य/घटती शारीरिक क्षमता के साथ भी सामान्य जीवन जिया जा सकता है।

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एक छड़ी का सहारा ले नाले को पार करते हुये करीब 500 कदम नीचे-ऊंचे चलते हुये टीले पर पंहुचता हूं।

अगियाबीर की खुदाई को निकट से देखते; और बकौल एक ट्विटर मित्र, सोशल मीडिया पर उसके “चारण (bard)” का कार्य करते, महीना होने को आया। अब यह खुदाई अपने अन्तिम चरण में है। टीम ने साफ़ सफाई कर एक लम्बी सीढ़ी का सहारा ले सवेरे सवेरे की सूर्य की रोशनी में साइट का जनरल व्यू (विहंगम दृष्य) कैमरे में कैद करने का काम सम्पन्न कर लिया है। एक वलय कूप को और नीचे जा कर खोदना था। वह कार्य भी कल सम्पन्न कर लिया।

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पूरे आकार के वलयकूप के साथ मैं। चित्र रविशंकर जी ने खींचा।

कल एक कैल्कोलिथिक (ताम्रपाषाण युग) भट्टी (1500-900BCE काल) का पूरा आकार समझने के लिये पास में एक नयी ट्रेंच खोद कर अध्ययन करने का काम भी कल पूरा हो गया। आज टीम के सदस्य गण खुदाई मजदूरों को छुट्टी दे कर अपने पॉटरी-यार्ड में स्थान और काल के क्रम में जमाये मृद्भाण्डों का अध्ययन सम्पन्न करेंगे। चूंकि इसमे मजदूरों का प्रयोग नहीं है – टीम के सदस्य अपनी सुविधानुसार ज्यादा समय तक भी काम कर सकते हैं।

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एक कैल्कोलिथिक (ताम्रपाषाण युग) भट्टी (1500-900BCE काल) का पूरा आकार समझने के लिये पास में एक नयी ट्रेंच खोद कर अध्ययन करने का काम भी पूरा हो गया। नयी ट्रेंच बायें है। भट्टी का चन्द्राकार स्पष्ट होता है नयी ट्रेंच खोदने से।

इस खुदाई की फण्डिंग आर्कियालॉजिकल सर्वे ऑफ इण्डिया ने की है। अत: ए.एस.आई. के पटना सर्किल के अधिकारी कल साइट पर खनन का मुआयना करेंगे। उससे साथ ही इस बार की खुदाई का कार्य लगभग पूरा हो जायेगा। शायद तीन-चार दिन ही टिके यहां पर खुदाई की टीम।

डा. रविशंकर ने बताया कि यहां से जाने के बाद लगभग 5-6 महीने लगेंगे बी.एच.यू. में इस खुदाई के व्यापक डाटा को एनलाइज करने में। प्राप्त मृद्भाण्ड सहेजे जायेंगे। मिले सिक्कों का उनके विशेषज्ञ अध्ययन करेंगे। बीरबाल साहनी पेलियोसाइंसेज संस्थान के वैज्ञानिक डा. अनिल पोखरिया अपनी रिपोर्ट देंगे। इस बार अगियाबीर के दक्षिणी-पश्चिमी भाग पर प्राप्त नवपाषाण युग के मानव के परिवेश के सैम्पल भी ले कर गये हैं वे। बहुत सम्भव है अगियाबीर टीले पर प्रागैतिहासिक मानव कबीले की बसावट के कार्बन फुटप्रिण्ट्स भी मिलें। अगर एक चौंकाने वाली प्रागैतिहासिक तिथि सामने आये तो आश्चर्य नहीं होगा।

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बीरबाल साहनी पेलियोसाइंसेज संस्थान के वैज्ञानिक डा. अनिल पोखरिया, गंगा किनारे राख और अधजले बीजों को वाटर फ़्लोटेशन तकनीक से छानते हुये।

यद्यपि मैने इस बार की टीले की खुदाई का दृष्टा-भाव से बहुत पास से अवलोकन किया है, पर मेरी निगाह से बहुत कुछ होगा, जो गुजरा ही नहीं। बहुत कुछ वैसा भी होगा जो समझ नहीं आया। डा. अशोक कुमार सिंह और उनके प्रवीण शिष्य डा. रविशंकर के पास बहुत कुछ साक्ष्य और विश्लेषण के रूप में जरूर होगा जो चौंकाने वाला होगा। पर जहां वे पुरातत्वविदों की जमात को एड्रेस करते हैं, मैं आम सोशल-मीडिया-यूजक को सम्बोधित करता हूं। और दोनों की अलग अलग उपयोगिता है।

खैर, अब इन पुरातत्वविदों के द्वारिकापुर/अगियाबीर से चले जाने के बाद क्या करोगे, जीडी? तुमने आधा दर्जन पुरातत्व विषयक पुस्तकें खरीद ली हैं, उनके अध्ययन में समय लगेगा। एक “पुरातत्वविद्” नामक उपन्यास की कल्पना तो कर सकते हो, जिसमें जवान रविशंकर जैसा हीरो हो और जिसके कथानक को अशोक सिंह जी के संस्मरण परिपुष्ट करते हों। प्यारे जीडी, इस विषय से जुड़े रहने का अपना अलग आनन्द है। अपने बचे ढाई-तीन दशक में दो साल तो इस विषय के अध्ययन को दे ही सकते हो।

और अगर आर्कियालॉजी जैसे रुक्ष/शुष्क/खुरदरे (?) विषय को व्यापक ऑडियेंस को परोस पाये तो उससे बढ़ कर और क्या होगा?

अगियाबीर की पुरातत्विक खुदाई का कार्य अन्तिम चरण में है, तो क्या? पिक्चर अभी बाकी है दोस्त!

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बांस की लम्बी सीढ़ी पर अपने को साधे साइट के जनरल व्यू लेने के लिये कैमरा सही करते रविशंकर। अगर कभी लिखा तो यह नौजवान मेरे “पुरातत्वविद्” उपन्यास का नायक होगा! 🙂