गांव में अजिज्ञासु (?) प्रवृत्ति

Gallery

This gallery contains 2 photos.


गांव में बहुत से लोग बहुत प्रकार की नेम ड्रॉपिंग करते हैं। अमूमन सुनने में आता है – “तीन देई तेरह गोहरावई, तब कलजुग में लेखा पावई” (तीन का तेरह न बताये तो कलयुग में उस व्यक्ति की अहमियत ही … Continue reading

निरक्षरता का मूल क्या है?

Gallery

This gallery contains 2 photos.


रामपुर (छद्म नाम) के सैंतालीस प्रतिशत लोग काम के हिसाब से अनपढ़ हैं। प्रौढ़ शिक्षा एवम बेसिक कर्मठता योजना अधिकारी की एक रिपोर्ट में रामपुर के बारे में चौंकाने वाली रिपोर्ट बनाई है। इसके अनुसार लगभग आधे नागरिक अखबार नहीं … Continue reading

बाल पण्डितों का श्रम

Gallery

This gallery contains 8 photos.


शिवकुटी में गंगा तीर पर सिसोदिया की एक पुरानी कोठी है। उसमें चलता है एक संस्कृत विद्यालय। छोटे-बड़े सब तरह के बालक सिर घुटा कर लम्बी और मोटी शिखा रखे दीखते हैं वहां। यहां के सेमी-अर्बन/कस्बाई माहौल से कुछ अलग … Continue reading

मेरा व्यवसाय – जी. विश्वनाथ का अपडेट



यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की अतिथि पोस्ट है:

बहुत दिनों के बाद हिन्दी ब्लॉग जगत में फिर प्रवेश कर रहा हूँ। करीब दो साल पहले आपने (अर्थात ज्ञानदत्त पाण्डेय ने) मेरी अतिथि पोस्ट छापी थीं। विषय था – “जी विश्वनाथ: मंदी का मेरे व्यवसाय पर प्रभाव“।

अब पेश है उस सन्दर्भ में एक “अपडेट”।

श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ - यह उनकी अतिथि पोस्ट है।

दो साल पहले अपनी कंपनी का स्वामित्व किसी और को सौंपने के बाद हम अपनी ही कम्पनी में सलाहकार बन कर काम कर रहे थे। नये स्वामी आशावादी थे और जोखिम उठाने के लिए तैयार थे। उनकी आर्थिक स्थिति भी मुझसे अच्छी थी।

पर हालत सुधरी नहीं। और बिगडने लगी। दो साल से कंपनी चलाने का खर्च ज्यादा था और कंपनी की आमदनी कम थी। हमने अमरीकी प्रोजेक्ट और ग्राहकों पर भरोसा करना बन्द कर दिया। ७ साल के बाद हम देशीय ग्राहकों की सेवा नहीं कर रहे थे। कारण साफ़ था। वही काम के लिए हमें देशी ग्राहकों से आमदनी एक तिहाई या कभी कभी एक चौथाई ही मिलता था। Continue reading

आत्मोन्नति और अपमान


एक जवान आदमी आत्मोन्नति के पथ पर चलना चाहता था। उसे एबॉट (abbot – मठाधीश) ने कहा – जाओ, साल भर तक प्रत्येक उस आदमी को, जो तुम्हारा अपमान करे, एक सिक्का दो।

अगले बारह महीने तक उस जवान ने प्रत्येक अपमान करने वाले को एक सिक्का दिया। साल पूरा होने पर वह मठाधीश के पास गया, यह पता करने कि अगला चरण क्या होगा आत्मोन्नति के लिये। एबॉट ने कहा – जाओ, शहर से मेरे खाने के लिये भोजन ले कर आओ।

FotoSketcher - Gyan Musing1 जैसे ही जवान आदमी खाना लाने के लिये गया, मठाधीश ने फटाफट अपने कपड़े बदले। एक भिखारी का वेश धर दूसरे रास्ते से जवान के पास पंहुचा और उसका अपमान करने लगा।

“बढ़िया!” जवान ने कहा – साल भर तक मुझे अपमान करने वाले को एक सिक्का देना पड़ा था; अब तो मैं मुफ्त में अपमानित हो सकता हूं, बिना पैसा दिये।

यह सुन कर एबॉट ने अपना बहुरूपिया वेश हटा कर कहा, “वह जो अपने अपमान को गम्भीरता से नहीं लेता, आत्मोन्नति के राह में चल रहा है”।


मुझे बताया गया कि मेरे पास कहने को कुछ भी नहीं होता। लिहाजा यह प्रस्तुत कर रहा हूं, जो पॉल कोह्येलो के ब्लॉग पर है।

अपमान को गम्भीरता से न लेना ठीक, पर एबॉट आगे भी कुछ कहता होगा। वह पॉल कोह्येलो ने बताया/न बताया हो, अपनी सोच में तो आयेगा ही। आगे देखते हैं! 


चर्चायन – आपने यह पोस्ट पढ़ी/सुनी हिमांशु की? अर्चना जी ने गाया है हिमांशु के बाबूजी का गीत। सखि, आओ उड़ चलीं उस वन में जहां मोहन की मुरली की तान है। सास अगोर रही है दरवाजा। क्या बहाना चलेगा!

बहुत नीक लगी पोस्ट!


बच्चों की परीक्षायें बनाम घर घर की कहानी


मार्च का महीना सबके लिये ही व्यस्तता की पराकाष्ठा है। वर्ष भर के सारे कार्य इन स्वधन्य 31 दिनों में अपनी निष्पत्ति पा जाते हैं। रेलवे के वाणिज्यिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिये अपने सहयोगी अधिकारियों और कर्मचारियों का पूर्ण सहयोग मिल रहा है पर एक ऐसा कार्य है जिसमें मैं नितान्त अकेला खड़ा हूँ, वह है बच्चों की वार्षिक परीक्षायें। पढ़ाने का उत्तरदायित्व मेरा था अतः यह परीक्षायें भी मुझे ही पास करनी थीं।

परीक्षाओं का अपना अलग मनोविज्ञान है पर जो भी हो, बच्चों का न इसमें मन लगता है और न ही उनके लिये यह ज्ञानार्जन की वैज्ञानिक अभिव्यक्ति है। झेल इसलिये लेते हैं कि उसके बाद ग्रीष्मावकाश होगा और पुनः उस कक्षा में नहीं रगड़ना पड़ेगा|

यह प्रवीण पाण्डेय की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। मुझे उनसे पूरी सहानुभूति है – उनकी जैसी इस दशा से मैं गुजर चुका हूं। प्रवीण ने अपने बच्चों के चित्र भेजे है, जिसे मैं नीचे सटा रहा हूं। आप बच्चों की शक्ल देख अन्दाज लगायें कि प्रवीण की शिक्षण चुनौतियां कितनी गम्भीर हैं! smile_regular
image1
image1(2)

रणभेरियाँ बज उठीं। आने वाले 18 दिन महाभारत से अधिक ऊष्ण और उन्मादयुक्त होने वाले थे।

द्वन्द था। मेरे लिये वर्ष भर को एक दिन में समेटने का और बच्चों का अपनी गति न बढ़ाने का। शीघ्र ही बच्चों की ओर से अघोषित असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ हो गया। बच्चों से पढ़ाई करने को लेकर लुका छिपी चलने लगी।

उन्हें कभी असमय भूख लगती, कभी घंटे भर में 6 बार प्यास, कभी बाथरूम की याद, कभी पेंसिल छीलनी है, कभी रबड़ गिर/गिरा दी गयी, कभी पुस्तक नहीं मिल रही है,  बाहर कोलाहल कैसा है आदि आदि।

उन सब पर विजय पायी तो पेट दर्द, पैर दर्द, सर दर्द, नींद आ रही है, 10 मिनट लेट लेते हैं। पता नहीं ज्ञान कान से घुसकर किन किन अंगों से होता हुआ मस्तिष्क में पहुँचता है।

उन उद्वेगों को काबू किया तो घंटे भर की संशयात्मक शान्ति बनी रही। तत्पश्चात। हाँ, अब सब पढ़ लिया, अब खेलने जायें। जब शीघ्रार्जित ज्ञान के बारे पूछना प्रारम्भ किया तो मुखमण्डल पर कोई विकार नहीं। मैम ने कहा है, शायद आयेगा नहीं, पाठ्यक्रम में नहीं है। पुनः पढ़ने के लिये कहा तो पूछते हैं कि क्या आपके पिताजी भी आपको इतना पढ़ाते थे या ऐसे पढ़ाते थे? हाँ बेटा। नहीं मैं नहीं मानता, मोबाइल से बात कराइये। फिर क्या, फोन पर करुणा रस का अविरल प्रवाह, सारे नेटवर्क गीले होने लगे। फोन के दूसरी ओर से बाबा-दादी का नातीबिगाड़ू संवेदन। जब बच्चों को बहुमत उनकी ओर आता दिखा तो सरकार को गिराने की तैयारी चालू हो गयी।

माताजी आपसे अच्छा पढ़ाती हैं, अब उनसे पढ़ेंगे। अब देखिये, यह तर्क उस समय आया जिस समय श्रीमती जी भोजन तैयार कर रही थी। श्रीमती जी पढ़ाने लगें तो कहीं भोजन बनाना भी न सीखना पड़ जाये, इस भय मात्र से मेरा सारा धैर्य ढह गया। थोड़ा डाँट दिये तो आँसू। बच्चों के आँसू कोई भी बदलाव ला सकते हैं। मन के एमएनसी प्रशासक का असमय अन्त हुआ और तब अन्दर का सरकारी पिता जाग उठा। चलो ठीक है, आधा घंटा खेल आओ। घंटे भर तक कोई आहट नहीं । बुला कर पूँछा गया तो बताते हैं कि ग्राउण्ड पर कोई घड़ी नहीं लगी थी।

ऐसी स्पिन, गुगली, बांउसर, बीमर के सामने तो सचिन तेण्डुलकर दहाई का अंक न पहुँच पायें। थक हार कर मोटीवेशनल तीर चलाये, मनुहार की, गुल्लक का भार बढ़ाया, मैगी बनवायी तब कहीं जाकर बच्चों के अन्दर स्वउत्प्रेरण जागा। बिना व्यवधान के मात्र घंटे भर में वह कर डाला जो मैं पिछले 6 घंटे से करने का असफल प्रयास कर रहा था।

कैसे भी हुयी, अन्ततः धर्म की विजय हुयी।


मैम भक्त मेमने और मैं


teacher_clipart_3 प्रवीण पाण्डेय को अपने बैंगळुरु स्थानान्तरण पर कुछ नये कार्य संभालने पड़े। बच्चों को पढ़ाना एक कार्य था। देखें, उन्होने कैसे किया। यह उनकी अतिथि पोस्ट है। 

मुझे अपना भी याद है – जब अपने बच्चे को मैने विज्ञान पढ़ाया तो बच्चे का कमेण्ट था – यह समझ में तो बेहतर आया; पर इसे ऐसे पढ़ाया नहीं जाता। मुझे भी लगा कि मैं पूर्णकालिक पढ़ा नहीं सकता था और जैसे पढ़ा रहा था, वैसे शायद कोर्स पूरा भी न होता समय पर! 😦

नयी जगह में स्थानान्तरण होने से स्थानपरक कुछ कार्य छूट जाते हैं और कुछ नये कार्य न चाहते हुये भी आपकी झोली में आ गिरते हैं। बालक और बिटिया का बीच सत्र में नये स्कूल में प्रवेश दिलाने से उन पर पढ़ाई का विशेष बोझ आ पड़ा है । इसका दोषी मुझे माना गया क्योंकि स्थानान्तरण मेरा हुआ था (यद्यपि मैनें विवाह के पले बता दिया था कि स्थानान्तरण मेरी नौकरी का अंग है, दोष नहीं)। पर वैवाहिक जीवन में बहस की विचित्र सीमायें हैं, हारने पर कम और जीतने पर हानि की अधिक संभावनायें हैं। अतः अपना ही दोष मानते हुये और सबको हुयी असुविधाओं की अतिरिक्त नैतिक जिम्मेदारी लेते हुये मैनें बालक को सारे विषय पढ़ाने का निर्णय स्वीकार कर लिया।

दोष जितना था, दण्ड उससे अधिक मिला। प्रारब्ध भी स्तब्ध। तर्क यह कि नया घर सजाने में गृहिणी को अतिरिक्त समय देना पड़ता है, अतः अधिक दण्ड भी स्वीकार कर लिया। अच्छा था कि उन्हे देश और समाज की अन्य समस्यायें याद नहीं आयीं, नहीं तो उनका भी उद्गम मेरे स्थानान्तरण से जोड़ दिया जाता। खेत रहने से अच्छा था कि खेत जोता जाये तो मैं भी बैल बन गया।

Kids
यह चित्र प्रवीण की पोस्ट से कॉण्ट्रेरियन है। गांव में अरहर के खेत के पास से गुजरते स्कूल से आते बच्चे। चलते वाहन से मोबाइल से खींचा गया चित्र। उनकी पढ़ाई कैसे होती होगी?

किताब खोली तो समझ में आया कि जिस कार्य को हम केवल अतिरिक्त समय के रूप में ले रहे थे, उसमें ज्ञान समझना और समझाना भी शामिल है। लगा कि यदि परिश्रम से कार्य को नहीं किया तो किसी भी समय आईआईटी जनित आत्मविश्वास के परखच्चे उड़ जायेंगे। यत्न से कार्यालय की मोटी मोटी फाइलों में गोता लगाने के बाद जितना मस्तिष्क शेष रहा उसे कक्षा ४ की किताबों के हवाले कर दिया। निश्चय हुआ कि पहले गृहकार्य होगा और उसके बाद पुराने पाठ्यक्रम पर दृष्टि फेरी जायेगी पर गृहकार्य होते होते दृष्टि बोझिल होने लगी।

बालक को कुछ युक्तियाँ सिखाने का प्रयास किया तो ’मैम ने तो दूसरे तरीके से बताया है और वही सिखाइये’, यह सुनकर मैमभक्त शिष्य के गर्व पर हर्ष हुआ और इस गुण के सम्मुख अपना ज्ञान तुच्छ लगने लगा। ऐसे चालीस पचास बच्चों को जो मैम आठ घंटे सम्हाल कर रखती हैं उनको और उनकी क्षमताओं को नमन। मैने किसी तरह जल्दी जल्दी प्रश्नों के उत्तर बताकर कार्य की इतिश्री कर ली।

दिन भर पूर्ण रूप से खंगाले जाने के बाद सोने चला तो पुनः मन भारी हो गया (पता नही सोने के पहले ही यह भारी क्यों होता है)। इसलिये नहीं कि दिमाग का फिचकुर निकल गया था। वरन इसलिये कि इतना प्रयास करने के बाद भी बालक के सारे प्रश्नों को विस्तार से उत्तर नहीं दे पाया। बीच बीच में उसकी उत्सुकता व उत्साह को टहला दिया या भ्रमित कर दिया। हम बच्चों को डाँट डाँट कर कितना सीमित कर देते हैं। उड़ान भरने के पहले ही अपनी सुविधा के लिये उसके कल्पनाओं के पंख कतर देते हैं। हम क्यों उनके जीवन का आकार बनाने बैठे हैं।


“थ्री इडियट्स” या “वी इडियट्स”


कल यह फिल्म देखी और ज्ञान चक्षु एक बार पुनः खुले। यह बात अलग है कि उत्साह अधिक दिनों तक टिक नहीं पाता है और संभावनायें दैनिक दुविधाओं के पीछे पीछे मुँह छिपाये फिरती हैं। पर यही क्या कम है कि ज्ञान चक्षु अभी भी खुलने को तैयार रहते हैं।

पर मेरा मन इस बात पर भारी होता है कि कक्षा 12 का छात्र यह क्यों नहीं निर्धारित कर पाता है कि उसे अपने जीवन में क्या बनना है और क्यों बनना है? … भारत का बालक अमेरिका के बालक से दुगनी तेजी से गणित का सवाल हल कर ले पर आत्मविश्वास उसकी तुलना में एक चौथाई भी नहीं होता।

चेतन भगत की पुस्तक “फाइव प्वाइन्ट समवन” पढ़ी थी और तीनों चरित्रों में स्वयं को उपस्थित पाया था। कभी लगा कि कुछ पढ़ लें, कभी लगा कुछ जी लें, कभी लगा कुछ बन जायें, कभी लगा कुछ दिख जायें। महाकन्फ्यूज़न की स्थिति सदैव बनी रही। हैंग ओवर अभी तक है। कन्फ्यूज़न अभी भी चौड़ा है यद्यपि संभावनायें सिकुड़ गयी हैं। जो फैन्टसीज़ पूरी नहीं कर पाये उनकी संभावनायें बच्चों में देखने लगे।

praveen यह पोस्ट श्री प्रवीण पाण्डेय की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। प्रवीण बेंगळुरू रेल मण्डल के वरिष्ठ मण्डल वाणिज्य प्रबन्धक हैं।

फिल्म देखकर मानसिक जख्म फिर से हरे हो गये। फिल्म सपरिवार देखी और ठहाका मारकर हँसे भी पर सोने के पहले मन भर आया। इसलिये नहीं कि चेतन भगत को उनकी मेहनत का नाम नहीं मिला और दो नये स्टोरी लेखक उनकी स्टोरी का क्रेडिट ले गये। कोई आई आई टी से पढ़े रगड़ रगड़ के, फिर आई आई एम में यौवन के दो वर्ष निकाल दे, फिर बैंक की नौकरी में पिछला पूरा पढ़ा भूलकर शेयर मार्केट के बारे में ग्राहकों को समझाये, फिर सब निरर्थक समझते हुये लेखक बन जाये और उसके बाद भी फिल्मी धनसत्ता उसे क्रेडिट न दे तो देखकर दुख भी होगा और दया भी आयेगी।

पर मेरा मन इस बात पर भारी होता है कि कक्षा 12 का छात्र यह क्यों नहीं निर्धारित कर पाता है कि उसे अपने जीवन में क्या बनना है और क्यों बनना है? क्या हमारी संरक्षणवादी नीतियाँ हमारे बच्चों के विकास में बाधक है या आर्थिक कारण हमें “सेफ ऑप्शन्स” के लिये प्रेरित करते हैं। भारत का बालक अमेरिका के बालक से दुगनी तेजी से गणित का सवाल हल कर ले पर आत्मविश्वास उसकी तुलना में एक चौथाई भी नहीं होता। किसकी गलती है हमारी, सिस्टम की या बालक की। या जैसा कि “पिंक फ्लायड” के “जस्ट एनादर ब्रिक इन द वॉल” द्वारा गायी स्थिति हमारी भी हो गयी है।

हमें ही सोचना है कि “थ्री इडियट्स” को प्रोत्साहन मिले या “वी इडियट्स” को।


पुन: विजिट; ज्ञानदत्त पाण्डेय की –

ओये पप्पू, इकल्ले पानी विच ना जाईं।
बड़ी अच्छी चर्चा चल रही है कि ग्रे-मैटर पर्याप्त या बहुत ज्यादा होने के बावजूद भारतीय बालक चेतक क्यूं नहीं बन पाता, टट्टू क्यों बन कर रह जाता है।

मुझे एक वाकया याद आया। मेरे मित्र जर्मनी हो कर आये थे। उन्होने बताया कि वहां एक स्वीमिंग पूल में बच्चों को तैरना सिखाया जा रहा था। सिखाने वाला नहीं आया था, या आ रहा था। सरदार जी का पुत्तर पानी में जाने को मचल रहा था, पर सरदार जी बार बार उसे कह रहे थे – ओये पप्पू, इकल्ले पानी विच ना जाईं।

एक जर्मन दम्पति भी था। उसके आदमी ने अपने झिझक रहे बच्चे को उठा कर पानी में झोंक दिया। वह आत्मविश्वास से भरा था कि बच्चा तैरना सीख लेगा, नहीं तो वह या आने वाला कोच उसे सम्भाल लेंगे।

क्या करेगा भारतीय पप्पू?!


एक साहबी आत्मा (?) के प्रलाप


DSC00291 मानसिक हलचल एक ब्राउन साहबी आत्मा का प्रलाप है। जिसे आधारभूत वास्तविकतायें ज्ञात नहीं। जिसकी इच्छायें बटन दबाते पूर्ण होती हैं। जिसे अगले दिन, महीने, साल, दशक या शेष जीवन की फिक्र करने की जरूरत नहीं।

इस आकलन पर मैं आहत होता हूं। क्या ऐसा है?

नोट – यह पोस्ट मेरी पिछली पोस्ट के संदर्भ में है। वहां मैने नीलगाय के पक्ष में अपना रुंझान दिखाया था। मैं किसान के खिलाफ भी नहीं हूं, पर मैं उस समाधान की चाह रखता हूं जिसमें दोनों जी सकें। उसपर मुनीश जी ने कहा है – very Brown Sahib like thinking! इस पोस्ट में ब्राउन साहब (?) अपने अंदर को बाहर रख रहा है।

Photobucket

और क्या दमदार टिप्पणियां हैं पिछली पोस्ट पर। ऐसी परस्पर विरोधी, विचारों को खड़बड़ाने वाली टिप्पणियां पा कर तो कोई भी ब्लॉगर गार्डन गार्डन हो जाये! निशाचर जी तो अन्ततक लगे रहे नीलगायवादियों को खदेड़ने में! सारी डिबेट क्या क्या मारोगे और क्या क्या खाना छोड़ोगे की है! असल में समधान उस स्तर पर निकलना नहीं, जिस स्तर ने समस्या पैदा की है!

मेरे समधीजी कहते हैं – भईया, गांव जाया करो। जमीन से जुड़ाव महसूस होगा और गांव वाला भी आपको अपना समझेगा। जाने की जरूरत न हो, तब भी जाया करो – यूंही। छ महीने के अन्तराल पर साल में दो बार तो समधीजी से मिलता ही हूं। और हर बार यह बात कहते हैं – “भईया, अपने क्षेत्र में और गांव में तो मैं लोगों के साथ जमीन पर बैठने में शर्म नहीं महसूस करता। जो जमीन पर बैठे वो जम्मींदार और जो चौकी पर (कुर्सी पर) बैठे वो चौकीदार”!  मैं हर बार उनसे कहता हूं कि गांव से जुड़ूंगा। पर हर बार वह एक खोखले संकल्प सा बन कर रह जाता है। मेरा दफ्तरी काम मुझे घसीटे रहता है।

और मैं जम्मींदार बनने की बजाय चौकीदार बने रहने को अभिशप्त हूं?! गांव जाने लगूं तो क्या नीलगाय मारक में तब्दील हो जाऊंगा? शायद नहीं। पर तब समस्या बेहतर समझ कर समाधान की सोच सकूंगा।

संघ लोक सेवा आयोग के साक्षात्कार में केण्डीडेट सीधे या ऑब्ट्यूस सन्दर्भ में देशभक्ति ठेलने का यत्न करता है – ईमानदारी और देश सेवा के आदर्श री-इटरेट करता है। पता नहीं, साक्षात्कार लेने वाले कितना मनोरंजन पाते होते होंगे – “यही पठ्ठा जो आदर्श बूंक रहा है, साहब बनने पर (हमारी तरह) सुविधायें तलाशने लगेगा”! चयनित होने पर लड़की के माई-बाप दहेज ले कर दौड़ते हैं और उसके खुद के माई बाप अपने को राजा दरभंगा समझने लगते हैं। पर तीस साल नौकरी में गुजारने के बाद (असलियत में) मुझे लगता है कि जीवन सतत समझौतों का नाम है। कोई पैसा पीट रहा है तो अपने जमीर से समझौते कर रहा है पर जो नहीं भी कर रहा वह भी तरह तरह के समझौते ही कर रहा है। और नहीं तो मुनीश जी जैसे लोग हैं जो लैम्पूनिंग करते, आदमी को उसकी बिरादरी के आधार पर टैग चिपकाने को आतुर रहते हैं।

नहीं, यह आस्था चैनल नहीं है। और यह कोई डिफेंसिव स्टेटमेण्ट भी नहीं है। मेरी संवेदनायें किसान के साथ भी हैं और निरीह पशु के साथ भी। और कोई साहबी प्रिटेंशन्स भी नहीं हैं। हां, यह प्रलाप अवश्य है – चूंकि मेरे पास कई मुद्दों के समाधान नहीं हैं। पर कितने लोगों के पास समाधान हैं? अधिकांश प्रलाप ही तो कर रहे हैं। और मेरा प्रलाप उनके प्रलाप से घटिया थोड़े ही है!     


शिक्षा व्यवस्था – ज्ञानदत्त पाण्डेय


एक बात जो सबके जेहन में बैठी है कि फॉर्मल शिक्षा व्यवस्था आदमी की सफलता की रीढ़ है। इस बात को प्रोब करने की जरूरत है।

मैं रिच डैड पूअर डैड पढ़ता हूं और वहां धनवान (पढ़ें सफल) बनने की शिक्षा बड़े अनौपचारिक तरीके से रिच डैड देते पाये जाते हैं। मैं मास्टर महाशय के रामकृष्ण परमहंस के संस्मरण पढ़ता हूं। रामकृष्ण निरक्षर हैं। वे जोड़ के बाद घटाना न सीख पाये – आमी विजोग कोरबे ना! और मास्टर महाशय यूनिवर्सिटी के प्राध्यापक होते हुये भी रामकृष्ण परमहंस के सामने नतमस्तक हैं।

सीमेण्ट लदान करने वाले व्यवसायियों की बैठक में मैं उस वर्टीकल चन्दन लगाये मारवाड़ी की बात सुनता हूं। उनकी अंग्रेजी कामचलाऊ है। बार बार अटक कर हिन्दी में टपकते हैं। लेकिन लाख-करोड़ रुपये की बात वे यूं कर रहे हैं जैसे हम चवन्नी अठन्नी की करें।

यह श्री प्रवीण पाण्डेय की पोस्ट पर मेरा कथ्य है।

कितने कॉलेज ड्राप-आउट मल्टी मिलियोनेर के बारे में बहुधा पढ़ता हूं। स्टीव जॉब्स को तो आपको प्रवीण ने इसी ब्लॉग पर पढ़ाया है। आप स्टीव को पढ़ें – वे न केवल सफल धनी हैं, वरन व्यक्तित्व में भी हीरा नजर आते हैं। ये बन्दे मासेचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नॉलाजी ने नहीं दिये।

हमारे पास अभी भी इतने मारवाड़ी-गुजराती सेठ हैं, जिनकी सफलता फॉर्मल एज्युकेशन की दुकान से नहीं आई।  फॉर्मल एज्युकेशन पर जरूरत से ज्यादा जोर है।

14opedA190v अच्छी शिक्षा की तलाश एक विकसित होते व्यक्ति/राष्ट्र का नैसर्गिक गुण है। बहुत कुछ उसी प्रकार जैसे रमण महर्षि कहते हैं कि हर आदमी प्रसन्नता की तलाश में है। उसकी तलाश में गड़बड़ है -  वह चरस, गांजा, पोर्नोग्राफी, अपराध और हत्या में प्रसन्नता तलाश रहा है। और उत्तरोत्तर और अप्रसन्न होता जा रहा है। वही बात शिक्षा को ले कर है। आदमी डिग्री लेने में शिक्षा ढ़ूंढ़ रहा है। अंग्रेजी गिटपिटाने भर में शिक्षा ढूंढ़ रहा है। मिसगाइडेड सर्च है यह शिक्षा का तामझाम।

अभिषेक ओझा ने उस दिन ट्विटर पर न्यूयॉर्क टाइम्स का एक बढ़िया लिंक दिया, जिसे मैने रीट्वीट किया – डिग्रियां न चमकाओ! यह पढ़ो! बड़े रोचक अंदाज में लिखा है कि कैसे पढ़े लिखे स्मार्ट आ कर वाल स्ट्रीट को चौपट कर गये। उसके मूल में मन्दी में आराम से बैठे आदमी का यह कथन है – “One of the speakers at my 25th reunion said that, according to a survey he had done of those attending, income was now precisely in inverse proportion to academic standing in the class, and that was partly because everyone in the lower third of the class had become a Wall Street millionaire.”

एक वृद्ध सज्जन जो किसी जमाने में ओवरसियर थे, मेरे घर सपत्नीक आये। वापसी में सोचते थे कि मैं अपनी कार से उन्हें छोड आऊंगा। जब पता चला कि मेरे पास वाहन नहीं है तो आश्चर्य हुआ। बोले – “काका (बच्चे) मैं ये नहीं कह रहा कि तूने ऊपरी कमाई क्यों नहीं की। पर तूने ढंग से जमीन भी खरीदी/बेची होती तो भी तेरे पास पैसे होते।” दुखद यह है कि हमारी शिक्षा यह नहीं सिखाती।

अनन्त तक बड़बड़ा सकता हूं। पर मूल बात यही है कि फॉर्मल एज्युकेशन पर बहुत दाव लगा रखा है हम सब ने। और उसके फण्डामेण्टल्स बहुत स्ट्रॉग नहीं हैं। थे भी नहीं और हो भी नहीं सकते! लिहाजा उसे सारी निराशा टांगने की सुलभ खूंटी मानना अपने को भ्रम में रखना है!

हमारे देश की शिक्षा नीति रास्ते में पड़ी कुतिया है। जिसका मन करता है दो लात लगा देता है। — यह बहुत आशावादी कथन है, भले ही किसी ने व्यंग में लिखा हो। शिक्षा नीति निश्चय ही जिन्दा है। मरी कुतिया को कोई लात नहीं मारता! 


lahgar लहगर

मेरी पत्नीजी का कहना है कि मैं लहगर हो गया हूं, फोटो खींचने के बारे में। वे यह इस बात पर कह रही थीं कि भले ही लॉगशाट में फोटो लिया गया हो स्त्रियों का फोटो लेने में संयम बरतना चाहिये!

ब्लॉगिंग में सेल्फ इम्पोज्ड प्रतिबन्ध होगा यह। पर स्वीकार्य। लहगरी बन्द!

पर लहगर कौन है? बकौल पत्नीजी जब नारद विष्णु को क्रोध में कहते हैं –

परम स्वतंत्र न सिर पर कोई । भावइ मनहि करहु तुम्ह सोई ॥
भलेहि मंद मंदेहि भल करहू । बिसमय हरष न हियँ कछु धरहू ॥
डहकि डहकि परिचेहु सब काहू । अति असंक मन सदा उछाहू ॥
करम सुभासुभ तुम्हहि न बाधा । अब लगि तुम्हहि न काहूँ साधा ॥

तब वे विष्णु जी को लहगर बता रहे होते हैँ!


गांगेय अपडेट:

आज धुन्ध थी। काफी। तुलना के लिये यह आज का सूर्योदय और उसके नीचे कल का:

Dhundh3

आजका सूर्योदय।

Dhundh

यह था कल का सूर्योदय।

Dhundh1

यह रहा घाट का चित्र गंगाजी दिख नहीं रहीं।

Dhundh2

और धुन्ध में निर्माण रत भावी हिन्दुस्तान के निर्माता।


शिक्षा व्यवस्था


iit-delhi कुछ वर्ष पहले नालन्दा के खण्डहर देखे थे, मन में पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता के भाव जगे। तक्षशिला आक्रमणकारियों के घात न सह पाया और मात्र स्मृतियों में है। गुरुकुल केवल “कांगड़ी चाय” के विज्ञापन से जीवित है। आईआईटी, आईआईएम और ऐम्स जैसे संस्थान आज भी हमें उत्कृष्टता व शीर्षत्व का अभिमान व आभास देते हैं। शेष सब शून्य है।

praveen यह पोस्ट श्री प्रवीण पाण्डेय की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है।

मैं स्वप्न से नहीं जगा, वास्तविकता में डूबा हूँ। ज्ञाता कहते हैं कि शिक्षा, स्वास्थ्य और आधारभूत संरचना सरकार के कार्य हैं। सरकार शिक्षा व्यवस्था पर पाठ्यक्रम उपलब्ध कराने के साथ साथ सरकारी विद्यालयों का रखरखाव भी कर रही है।
सरकारी विद्यालयों में 10 रुपये महीने की फीस में पढ़कर किसी उच्चस्थ पद पर बैठे अधिकारियों को जब अपने पुत्र पुत्रियों की शिक्षा के बारे में विचार आता है तो उन सरकारी विद्यालयों को कतार के अन्तिम विकल्प के रूप में माना जाता है। किसी पब्लिक या कान्वेन्ट स्कूल में दाखिले के लिये अभिभावक को एक लाख रुपये अनुग्रह राशि नगद देकर भी अपनी बौद्धिक योग्यता सिद्ध करनी पड़ती है।

IIT Mumbai किसी भी छोटे शहर के प्रथम दस विद्यालयों में आज जीआईसी जैसे विद्यालयों का नाम नहीं है। बचपन में प्राइमरी के बाद जीआईसी में पढ़ने की निश्चितता अच्छे भविष्य का परिचायक था। वहीं के मास्टर मुँह में पान मसाला दबाये अपने विद्यार्थियों को घर में ट्यूशन पढ़ने का दबाव डालते दिखें तो भारत के भविष्य के बारे में सोचकर मन में सिरहन सी हो जाती है।

गरीब विद्यार्थी कहाँ पढ़े? नहीं पढ़ पाये और कुछ कर गुजरने की चाह में अपराधिक हो जाये तो किसका दोष?

bits-pilani नदी के उस पार नौकरियों का सब्जबाग है, कुछ तो सहारा दो युवा को अपना स्वप्न सार्थक करने के लिये। आरक्षण के खेत भी नदी के उस पार ही हैं, उस पर खेती वही कर पायेगा जो उस पार पहुँच पायेगा।

विश्वविद्यालय भी डिग्री उत्पादन की मशीन बनकर रह गये हैं। पाठ्यक्रम की सार्थकता डिग्रीधारी बेरोजगारों की संख्या से मापी जा सकती है। हाँ, राजनीति में प्रवेश के लिये बड़ा सशक्त मंच प्रस्तुत करते हैं विश्वविद्यालय।

जरा सोचिये तो क्या कमी है हमारी शिक्षा व्यवस्था में कि लोग सरकारी नौकरी पाने के लिये 5 लाख रुपये रिश्वत में देने को तैयार हैं जबकि उन्ही रुपयों से 5 व्यक्तियों को कार्य देने वाला एक व्यवसाय प्रारम्भ किया जा सकता है।