निरक्षरता का मूल क्या है?



रामपुर (छद्म नाम) के सैंतालीस प्रतिशत लोग काम के हिसाब से अनपढ़ हैं। प्रौढ़ शिक्षा एवम बेसिक कर्मठता योजना अधिकारी की एक रिपोर्ट में रामपुर के बारे में चौंकाने वाली रिपोर्ट बनाई है। इसके अनुसार लगभग आधे नागरिक अखबार नहीं पढ़ सकते, नौकरी आदि के फार्म नहीं भर सकते अथवा दवा की बोतलों पर लिखे निर्देश नहीं समझ सकते।

इस अध्ययन में अधिकारी महोदय ने बताया है कि लगभग 20,000 काम के हिसाब से अनपढ़ प्रौढ़ लोगों में किये सर्वेक्षण के अनुसार आधे से ज्यादा के पास हाई स्कूल पास होने का प्रमाण पत्र है …

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बाल पण्डितों का श्रम



शिवकुटी में गंगा तीर पर सिसोदिया की एक पुरानी कोठी है। उसमें चलता है एक संस्कृत विद्यालय। छोटे-बड़े सब तरह के बालक सिर घुटा कर लम्बी और मोटी शिखा रखे दीखते हैं वहां। यहां के सेमी-अर्बन/कस्बाई माहौल से कुछ अलग विशिष्टता लिये।

उनके विद्यालय से लगभग 100 मीटर दूर हनूमान जी के मन्दिर के पास ट्रैक्टर/ट्रक वाला बालू गिरा गया है। यह बालू तसले से उठा उठाकर अपने कम्पाउण्ड में ले जा रहे थे वे बालक। बहुत अच्छा लगा उन्हे यह काम करते देखना। उनके तसले स्टील के थे। शायद उनकी रसोई के बर्तनों का हिस्सा रहे हों।

मुझे लगा कि उन्हे अपनी उत्पादकता बढ़ाने के लिये सिर पर तसला उठाने की बजाय यातायात के साधन उपयोग में लाने चाहियें। और वही किया उन्होने। जल्दी ही  दो साइकलें ले कर आये वे। पर पहले दिन तो वे बहुत ज्यादा ट्रांसफर नहीं कर सके बालू।

उसके बाद अगले दिन तो एक साइकल-ठेला कबाड़ लाये वे। लाते समय पांच छ बच्चे उसमें खड़े थे और एक चला कर ला रहा था – उनकी प्रसन्नता संक्रामक थी!  फावड़े से वे रेत डालने लगे ठेले में।

एक बड़ा विद्यार्थी, जो फावड़े से बालू ठेले मेँ डाल रहा था, से मेरी पत्नी जी ने पूछना प्रारम्भ किया। पता चला कि गुरुकुल में रसोई घर बन रहा है। यह रेत उसके लिये ले जा रहे हैं वे। बड़े विद्यार्थी परीक्षा देने गये हैं, लिहाजा  छोटे बच्चों के जिम्मे आया है यह काम।

बालक पूर्वांचल-बिहार के हैं। असम से भी हैं। वह स्वयं नेपाल का है।

पत्नीजी ने कहा कि वे उनका विद्यालय देखने आना चाहती हैं। उस नेपाली विद्यार्थी ने कहा – आइयेगा, जरूर!

आपने सही अन्दाज लगाया – आगे एक आधी पोस्ट अब संस्कृत विद्यालय पर होगी, जरूर! यह बालू का स्थानांतरण उनके टीम-वर्क की एक महत्वपूर्ण एक्सरसाइज है। यह उनमें सामाजिक नेतृत्व के गुण भर सके तो क्या मजा हो!

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मेरा व्यवसाय – जी. विश्वनाथ का अपडेट



यह श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ की अतिथि पोस्ट है:

बहुत दिनों के बाद हिन्दी ब्लॉग जगत में फिर प्रवेश कर रहा हूँ। करीब दो साल पहले आपने (अर्थात ज्ञानदत्त पाण्डेय ने) मेरी अतिथि पोस्ट छापी थीं। विषय था – “जी विश्वनाथ: मंदी का मेरे व्यवसाय पर प्रभाव“।

अब पेश है उस सन्दर्भ में एक “अपडेट”।

श्री गोपालकृष्ण विश्वनाथ - यह उनकी अतिथि पोस्ट है।

दो साल पहले अपनी कंपनी का स्वामित्व किसी और को सौंपने के बाद हम अपनी ही कम्पनी में सलाहकार बन कर काम कर रहे थे। नये स्वामी आशावादी थे और जोखिम उठाने के लिए तैयार थे। उनकी आर्थिक स्थिति भी मुझसे अच्छी थी।

पर हालत सुधरी नहीं। और बिगडने लगी। दो साल से कंपनी चलाने का खर्च ज्यादा था और कंपनी की आमदनी कम थी। हमने अमरीकी प्रोजेक्ट और ग्राहकों पर भरोसा करना बन्द कर दिया। ७ साल के बाद हम देशीय ग्राहकों की सेवा नहीं कर रहे थे। कारण साफ़ था। वही काम के लिए हमें देशी ग्राहकों से आमदनी एक तिहाई या कभी कभी एक चौथाई ही मिलता था। Continue reading “मेरा व्यवसाय – जी. विश्वनाथ का अपडेट”

आत्मोन्नति और अपमान


एक जवान आदमी आत्मोन्नति के पथ पर चलना चाहता था। उसे एबॉट (abbot – मठाधीश) ने कहा – जाओ, साल भर तक प्रत्येक उस आदमी को, जो तुम्हारा अपमान करे, एक सिक्का दो।

अगले बारह महीने तक उस जवान ने प्रत्येक अपमान करने वाले को एक सिक्का दिया। साल पूरा होने पर वह मठाधीश के पास गया, यह पता करने कि अगला चरण क्या होगा आत्मोन्नति के लिये। एबॉट ने कहा – जाओ, शहर से मेरे खाने के लिये भोजन ले कर आओ।

FotoSketcher - Gyan Musing1 जैसे ही जवान आदमी खाना लाने के लिये गया, मठाधीश ने फटाफट अपने कपड़े बदले। एक भिखारी का वेश धर दूसरे रास्ते से जवान के पास पंहुचा और उसका अपमान करने लगा।

“बढ़िया!” जवान ने कहा – साल भर तक मुझे अपमान करने वाले को एक सिक्का देना पड़ा था; अब तो मैं मुफ्त में अपमानित हो सकता हूं, बिना पैसा दिये।

यह सुन कर एबॉट ने अपना बहुरूपिया वेश हटा कर कहा, “वह जो अपने अपमान को गम्भीरता से नहीं लेता, आत्मोन्नति के राह में चल रहा है”।


मुझे बताया गया कि मेरे पास कहने को कुछ भी नहीं होता। लिहाजा यह प्रस्तुत कर रहा हूं, जो पॉल कोह्येलो के ब्लॉग पर है।

अपमान को गम्भीरता से न लेना ठीक, पर एबॉट आगे भी कुछ कहता होगा। वह पॉल कोह्येलो ने बताया/न बताया हो, अपनी सोच में तो आयेगा ही। आगे देखते हैं! 


चर्चायन – आपने यह पोस्ट पढ़ी/सुनी हिमांशु की? अर्चना जी ने गाया है हिमांशु के बाबूजी का गीत। सखि, आओ उड़ चलीं उस वन में जहां मोहन की मुरली की तान है। सास अगोर रही है दरवाजा। क्या बहाना चलेगा!

बहुत नीक लगी पोस्ट!


बच्चों की परीक्षायें बनाम घर घर की कहानी


मार्च का महीना सबके लिये ही व्यस्तता की पराकाष्ठा है। वर्ष भर के सारे कार्य इन स्वधन्य 31 दिनों में अपनी निष्पत्ति पा जाते हैं। रेलवे के वाणिज्यिक लक्ष्यों की पूर्ति के लिये अपने सहयोगी अधिकारियों और कर्मचारियों का पूर्ण सहयोग मिल रहा है पर एक ऐसा कार्य है जिसमें मैं नितान्त अकेला खड़ा हूँ, वह है बच्चों की वार्षिक परीक्षायें। पढ़ाने का उत्तरदायित्व मेरा था अतः यह परीक्षायें भी मुझे ही पास करनी थीं।

परीक्षाओं का अपना अलग मनोविज्ञान है पर जो भी हो, बच्चों का न इसमें मन लगता है और न ही उनके लिये यह ज्ञानार्जन की वैज्ञानिक अभिव्यक्ति है। झेल इसलिये लेते हैं कि उसके बाद ग्रीष्मावकाश होगा और पुनः उस कक्षा में नहीं रगड़ना पड़ेगा|

यह प्रवीण पाण्डेय की बुधवासरीय अतिथि पोस्ट है। मुझे उनसे पूरी सहानुभूति है – उनकी जैसी इस दशा से मैं गुजर चुका हूं। प्रवीण ने अपने बच्चों के चित्र भेजे है, जिसे मैं नीचे सटा रहा हूं। आप बच्चों की शक्ल देख अन्दाज लगायें कि प्रवीण की शिक्षण चुनौतियां कितनी गम्भीर हैं! smile_regular
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रणभेरियाँ बज उठीं। आने वाले 18 दिन महाभारत से अधिक ऊष्ण और उन्मादयुक्त होने वाले थे।

द्वन्द था। मेरे लिये वर्ष भर को एक दिन में समेटने का और बच्चों का अपनी गति न बढ़ाने का। शीघ्र ही बच्चों की ओर से अघोषित असहयोग आन्दोलन प्रारम्भ हो गया। बच्चों से पढ़ाई करने को लेकर लुका छिपी चलने लगी।

उन्हें कभी असमय भूख लगती, कभी घंटे भर में 6 बार प्यास, कभी बाथरूम की याद, कभी पेंसिल छीलनी है, कभी रबड़ गिर/गिरा दी गयी, कभी पुस्तक नहीं मिल रही है,  बाहर कोलाहल कैसा है आदि आदि।

उन सब पर विजय पायी तो पेट दर्द, पैर दर्द, सर दर्द, नींद आ रही है, 10 मिनट लेट लेते हैं। पता नहीं ज्ञान कान से घुसकर किन किन अंगों से होता हुआ मस्तिष्क में पहुँचता है।

उन उद्वेगों को काबू किया तो घंटे भर की संशयात्मक शान्ति बनी रही। तत्पश्चात। हाँ, अब सब पढ़ लिया, अब खेलने जायें। जब शीघ्रार्जित ज्ञान के बारे पूछना प्रारम्भ किया तो मुखमण्डल पर कोई विकार नहीं। मैम ने कहा है, शायद आयेगा नहीं, पाठ्यक्रम में नहीं है। पुनः पढ़ने के लिये कहा तो पूछते हैं कि क्या आपके पिताजी भी आपको इतना पढ़ाते थे या ऐसे पढ़ाते थे? हाँ बेटा। नहीं मैं नहीं मानता, मोबाइल से बात कराइये। फिर क्या, फोन पर करुणा रस का अविरल प्रवाह, सारे नेटवर्क गीले होने लगे। फोन के दूसरी ओर से बाबा-दादी का नातीबिगाड़ू संवेदन। जब बच्चों को बहुमत उनकी ओर आता दिखा तो सरकार को गिराने की तैयारी चालू हो गयी।

माताजी आपसे अच्छा पढ़ाती हैं, अब उनसे पढ़ेंगे। अब देखिये, यह तर्क उस समय आया जिस समय श्रीमती जी भोजन तैयार कर रही थी। श्रीमती जी पढ़ाने लगें तो कहीं भोजन बनाना भी न सीखना पड़ जाये, इस भय मात्र से मेरा सारा धैर्य ढह गया। थोड़ा डाँट दिये तो आँसू। बच्चों के आँसू कोई भी बदलाव ला सकते हैं। मन के एमएनसी प्रशासक का असमय अन्त हुआ और तब अन्दर का सरकारी पिता जाग उठा। चलो ठीक है, आधा घंटा खेल आओ। घंटे भर तक कोई आहट नहीं । बुला कर पूँछा गया तो बताते हैं कि ग्राउण्ड पर कोई घड़ी नहीं लगी थी।

ऐसी स्पिन, गुगली, बांउसर, बीमर के सामने तो सचिन तेण्डुलकर दहाई का अंक न पहुँच पायें। थक हार कर मोटीवेशनल तीर चलाये, मनुहार की, गुल्लक का भार बढ़ाया, मैगी बनवायी तब कहीं जाकर बच्चों के अन्दर स्वउत्प्रेरण जागा। बिना व्यवधान के मात्र घंटे भर में वह कर डाला जो मैं पिछले 6 घंटे से करने का असफल प्रयास कर रहा था।

कैसे भी हुयी, अन्ततः धर्म की विजय हुयी।


मैम भक्त मेमने और मैं


teacher_clipart_3 प्रवीण पाण्डेय को अपने बैंगळुरु स्थानान्तरण पर कुछ नये कार्य संभालने पड़े। बच्चों को पढ़ाना एक कार्य था। देखें, उन्होने कैसे किया। यह उनकी अतिथि पोस्ट है। 

मुझे अपना भी याद है – जब अपने बच्चे को मैने विज्ञान पढ़ाया तो बच्चे का कमेण्ट था – यह समझ में तो बेहतर आया; पर इसे ऐसे पढ़ाया नहीं जाता। मुझे भी लगा कि मैं पूर्णकालिक पढ़ा नहीं सकता था और जैसे पढ़ा रहा था, वैसे शायद कोर्स पूरा भी न होता समय पर! 😦

नयी जगह में स्थानान्तरण होने से स्थानपरक कुछ कार्य छूट जाते हैं और कुछ नये कार्य न चाहते हुये भी आपकी झोली में आ गिरते हैं। बालक और बिटिया का बीच सत्र में नये स्कूल में प्रवेश दिलाने से उन पर पढ़ाई का विशेष बोझ आ पड़ा है । इसका दोषी मुझे माना गया क्योंकि स्थानान्तरण मेरा हुआ था (यद्यपि मैनें विवाह के पले बता दिया था कि स्थानान्तरण मेरी नौकरी का अंग है, दोष नहीं)। पर वैवाहिक जीवन में बहस की विचित्र सीमायें हैं, हारने पर कम और जीतने पर हानि की अधिक संभावनायें हैं। अतः अपना ही दोष मानते हुये और सबको हुयी असुविधाओं की अतिरिक्त नैतिक जिम्मेदारी लेते हुये मैनें बालक को सारे विषय पढ़ाने का निर्णय स्वीकार कर लिया।

दोष जितना था, दण्ड उससे अधिक मिला। प्रारब्ध भी स्तब्ध। तर्क यह कि नया घर सजाने में गृहिणी को अतिरिक्त समय देना पड़ता है, अतः अधिक दण्ड भी स्वीकार कर लिया। अच्छा था कि उन्हे देश और समाज की अन्य समस्यायें याद नहीं आयीं, नहीं तो उनका भी उद्गम मेरे स्थानान्तरण से जोड़ दिया जाता। खेत रहने से अच्छा था कि खेत जोता जाये तो मैं भी बैल बन गया।

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यह चित्र प्रवीण की पोस्ट से कॉण्ट्रेरियन है। गांव में अरहर के खेत के पास से गुजरते स्कूल से आते बच्चे। चलते वाहन से मोबाइल से खींचा गया चित्र। उनकी पढ़ाई कैसे होती होगी?

किताब खोली तो समझ में आया कि जिस कार्य को हम केवल अतिरिक्त समय के रूप में ले रहे थे, उसमें ज्ञान समझना और समझाना भी शामिल है। लगा कि यदि परिश्रम से कार्य को नहीं किया तो किसी भी समय आईआईटी जनित आत्मविश्वास के परखच्चे उड़ जायेंगे। यत्न से कार्यालय की मोटी मोटी फाइलों में गोता लगाने के बाद जितना मस्तिष्क शेष रहा उसे कक्षा ४ की किताबों के हवाले कर दिया। निश्चय हुआ कि पहले गृहकार्य होगा और उसके बाद पुराने पाठ्यक्रम पर दृष्टि फेरी जायेगी पर गृहकार्य होते होते दृष्टि बोझिल होने लगी।

बालक को कुछ युक्तियाँ सिखाने का प्रयास किया तो ’मैम ने तो दूसरे तरीके से बताया है और वही सिखाइये’, यह सुनकर मैमभक्त शिष्य के गर्व पर हर्ष हुआ और इस गुण के सम्मुख अपना ज्ञान तुच्छ लगने लगा। ऐसे चालीस पचास बच्चों को जो मैम आठ घंटे सम्हाल कर रखती हैं उनको और उनकी क्षमताओं को नमन। मैने किसी तरह जल्दी जल्दी प्रश्नों के उत्तर बताकर कार्य की इतिश्री कर ली।

दिन भर पूर्ण रूप से खंगाले जाने के बाद सोने चला तो पुनः मन भारी हो गया (पता नही सोने के पहले ही यह भारी क्यों होता है)। इसलिये नहीं कि दिमाग का फिचकुर निकल गया था। वरन इसलिये कि इतना प्रयास करने के बाद भी बालक के सारे प्रश्नों को विस्तार से उत्तर नहीं दे पाया। बीच बीच में उसकी उत्सुकता व उत्साह को टहला दिया या भ्रमित कर दिया। हम बच्चों को डाँट डाँट कर कितना सीमित कर देते हैं। उड़ान भरने के पहले ही अपनी सुविधा के लिये उसके कल्पनाओं के पंख कतर देते हैं। हम क्यों उनके जीवन का आकार बनाने बैठे हैं।