पिताजी और आजकल


पिछले अप्रेल महीने में मेरी पोती  पद्मजा को गोद ले कर खड़े पिताजी।
पिछले अप्रेल महीने में मेरी पोती पद्मजा को गोद ले कर खड़े पिताजी।

मेरे पिताजी (श्री चिन्तामणि पाण्डेय) 81 के हुये 4 जुलाई को। चार जुलाई उनका असली जन्म दिन है भी या नहीं – कहा नहीं जा सकता। मेरी आजी उनके जन्म और उम्र के बारे में कहती थीं – अषाढ़ में भ रहें। (दिन और साल का याद नहीं उन्हें)। अब अषाढ़ई अषाढ़ होई गयेन्। ( अषाढ़ में जन्मे थे। अब अषाढ जाने कितने बीत गये)।

खैर, उनका सार्टीफ़िकेट के अनुसार जन्म दिन है 4 जुलाई 1934। उनके अनुसार उनका जन्म तो 1934 में हुआ था। चार जुलाई शायद दाखिले के समय लिखा दिया गया हो।

पिछले कई वर्षों से वे गिरती याददाश्त के शिकार हैं। याददाश्त के अलावा कई साल पहले उनकी सामान्य सेहत भी तेजी से गिरने लगी थी। एलोपैथिक दवाओं से जब लाभ नहीं हुआ था तो किसी के सुझाने पर रामदेव के आउटलेट पर बैठने वाले आयुर्वेदिक आचार्य जी को दिखाया था। उनकी दवाओं – घृतकुमारी रस और अश्वगन्धा के कैप्स्यूल जिनमें थे – से बहुत लाभ हुआ। उनके हाथों में कम्पन होने लगा था। वह रुक गया। उनकी तेजी से गिरती याददाश्त की गिरावट की दर बहुत कम हो गयी थी। उनका चलना-फिरना भी पहले की अपेक्षा बेहतर हो गया।

अम्मा जी के सतत देखभाल से वे तो ठीक हो गये पर सन् 2013 मे उत्तरार्ध में घर में ही फिसलने के कारण अम्मा जी की कूल्हे की हड्ड़ी टूट गयी। उनके ऑपरेशन के लिये, उनको दी जाने वाली ब्लड-थिनर दवायें सप्ताह भर के लिये रोक दी गयी थीं। वही घातक साबित हुआ। उनका ऑपरेशन तो ठीक से हो गया और वे स्वास्थ लाभ भी कर रही थीं; पर मस्तिष्क में कहीं थक्का जम गया और दो बार उन्हे पक्षाघात हुआ। पहले आघात से उबर रही थीं। पर दूसरा घातक साबित हुआ। पिताजी ने उन्हे मुखाग्नि तो दी, पर उनके फेरे लगा कर शरीर को अग्नि को अर्पित करने और कपाल-क्रिया का कृत्य मैने पूरा किया। मेरे लड़के ने दस दिन के कर्मकाण्ड निबाहे और अन्त में पिण्ड-दान, महाब्राह्मण की बिदाई का कृत्य मैने सम्पन्न किया। परिवार की तीन पीढ़ियों के सामुहिक योग से कर्मकाण्ड सम्पन्न हुये उनके। मुझे याद नहीं कि किसी और घर में इस प्रकार हुआ होगा।

अम्मा जी के जाने के बाद मैं पिताजी को अपने साथ गोरखपुर ले आया। पिताजी के एकाकीपन के झटके और उसमें कैद हो जाने की आशंका हम सब को थी; पर गोरखपुर में एक-डेढ़ बीघे में फैला खुला बंगला, और आउट हाउस के कई चरित्र उन्हे बोलने बतियाने को मिल गये। वे अगर अम्मा के चले जाने के बाद इलाहाबाद में ही रहते तो शायद एकाकीपन और अम्मा की याद से भरा वातावरण उन्हे तोड़ता। गोरखपुर में आउट हाउस के चन्द्रिका और ध्रुव, रोज नमस्ते करने वाली महिला, बगीचे में काम करने वाला माली नारद, सफ़ाई के लिये यदा कदा आने वाला सफ़ाई जमादार, मेरे वाहन के डाइवर… ये सब उनके चौपाल के मित्र बन गये। वे कभी थक जाने पर कमरे में आ कर बिस्तर पर लेटते हैं तो कुछ सुस्ता लेने के बाद फिर उठ कर बाहर निकल लेते हैं। वहां चौपाल जमती है या फिर किसी के न रहने पर वे परिसर में चक्कर लगा कर फूल-पत्तियां-सब्जियां निहारते हैं। काम भर की सब्जियां – नेनुआ, लौकी, भिण्डी तोड कर लाते हैं। चन्द्रिका को कष्ट होता है कि समय से पहले ही तोड़ लेते हैं नेनुआ और लौकी।

अभी महीना भर पहले आधी रात मे उनकी आवाज आयी। वे मेरी पत्नीजी को बुला रहे थे। हम गहरी नींद से जगे और देखा कि उनके माथे पर चोट लगी है। खून बह रहा है। एकबारगी तो मुझे समझ नहीं आया कि क्या करूं। भाव के अतिरेक में उन्हे मैने बांहों में भर लिया – मानो वे छोटे शिशु हों। हमने उनका घाव धोया, घर में उपलब्ध दवाई लगा कर पट्टी की और उपलब्ध पेनकिलर दिया। उनके बिस्तर को ऐसे किया कि गिरने की सम्भावना न रहे।

उनसे पूछा कि चोट कैसे लगी तो वे कुछ बता न सके। बाद में भी याद नहीं आया।

अगले दिन सवेरे उन्हे हम ड्रेसिंग कराने अस्पताल ले गये। डाक्टर साहब ने बताया कि रात भर में घाव भरा है और ड्रेसिंग-दवाई से ठीक हो जायेगा। अन्यथा अगर रात में लाये होते उन्हें तो कम से कम चार-पांच टांके लगते। डाक्टर साहब ने एहतियादन सीटी-स्कैन और खून की जांच कराने के लिये कहा। वह सामान्य निकला।

बाद में अनुमान लगा कि उन्हें पोश्चरल हाइपो-टेंशन की समस्या हुई। गर्मी के मौसम में पसीने से नमक की कमी हुई शरीर में और रात में  बाथरूम की ओर जाने के लिये वे झटके से उठे होंगे तो कम रक्तचाप के कारण चक्कर आ गया होगा। जमीन पर गिरते हुये कोई कोना टकराया होगा जिससे माथे पर चोट लगी।

कई दिन तक उन्हे कमजोरी की शिकायत रही। अब वे ठीक हैं। तख्ते पर लगा उनका बिस्तर हटा कर उनचन वाली मूंज की खाट पर कर दिया गया है जिससे रात में बिस्तर से उठते समय गिरने की आशंका कम से कम हो जाये।

कटका में बनते घर को देखते पिताजी। साथ में मनीष औरदूर नीली कमीज में धर्मेन्द्र।
कटका में बनते घर को देखते पिताजी। साथ में मनीष औरदूर नीली कमीज में धर्मेन्द्र।

पिछले शुक्रवार को उन्हे हम कटका साथ ले कर गये। मैं रिटायरमेण्ट के बाद वहां सेटल होने के लिये एक छोटा घर बनवा रहा हूं। वह उन्हे दिखाना चाहता था। उसे देख कर वे सन्तुष्ट तो थे, पर उन्होने मुआयाना अपने सिविल इन्जीनियर की निगाह से ही किया। उन्हे हम खेतों में लगाये यूकलिप्टिस के प्लाण्टेशन दिखाने भी ले गये। काफी रुचि ली उनमें भी पिताजी ने।

उनकी वर्तमान की याददाश्त गड्ड-मड्ड हो जाती है। वाणी भी कई बार लटपटा जाती है। पुराना अच्छे से याद है। अपने बचपन की घटनायें और व्यक्ति वे बता ले जाते हैं। पर उन घटनाओं के क्रम में कभी कभी घालमेल हो जाता है।

कुल मिला कर वे ठीक हैं और हमें अपेक्षा है कि अगले दशक और उससे आगे भी उनकी उपस्थिति का आशीर्वाद हमें प्राप्त रहेगा।

पिताजी के साथ मेरा बेटा, पद्मजा और मैं।
पिताजी के साथ मेरा बेटा, पद्मजा और मैं।

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कउड़ा


कउड़ा
कउड़ा

आज तीसरा दिन था, घाम नहीं निकला। शुक्रवार को पूरे दिन कोहरा छाया रहा। शीत। शनीचर के दिन कोहरा तो नहीं था, पर हवा चल रही थी और पल पल में दिशा बदल रही थी। स्नान मुल्तवी कर दिया एक दिन और फ़ेसबुक पर लिखा – और भी गम हैं जमाने में नहाने के सिवा।

आज रविवार को पिछले दो दिन से बेहतर था। फिर भी धूप नहीं निकली और घर के अन्दर पिताजी की चारपायी के बगल में सिगड़ी जलती रही। मौसम की अनप्रेडिक्टेबिलिटी देख कर पिताजी पहले ही कह चुके हैं – भगवान पगलाई ग हयेन् (भगवान पगला गये हैं)।

शिवचन्द – हमारा घरेलू भृत्य – पिताजी की चारपाई के बगल में रखी सिगड़ी में कोयला डालने का काम मुस्तैदी से करता है। कितना कोयला बचा है – इसका भी हिसाब उसके पास है। इस सर्दी में करीब बीस सेर लकड़ी का कोयला लग चुका है कमरा गरम रखने में।

पिताजी की चारपाई के बगल में रखी सिगड़ी
पिताजी की चारपाई के बगल में रखी सिगड़ी

आज शिव चन्द ने बताया – पिछवां कउड़ा बारे हई। (पीछे अलाव जलाया है)। बंगले की एक बीघा जमीन में कई पेड़ हैं और कई सूखे हुये भी। आम-अमरूद-सेमल की गिरी डालियां और ठूंठ पीछे आउट हाउस वाले ले जा कर जला रहे हैं सर्दी से बचाव के लिये। वह लकड़ी घर के अन्दर अलाव के रूप में नहीं जलाई जा सकती। उससे धुआं बहुत होता है। पर खुले में अलाव जला कर उसे तापा जा सकता है।

मैने जा कर देखा। हवा और गलन कम होने के कारण घर के पिछवाड़े बाहर बैठा जा सकता था। कुर्सियां निकलवा कर मैं भी वहां बैठा। मेरे बाद मेरी पत्नीजी भी आयीं और उसके बाद पिता जी भी। धुआं हवा के साथ साथ अपनी दिशा बदल रहा था और कुर्सी बार बार खिसकानी पड़ रही थी मुझे। लकड़ियां अच्छी जल रही थीं और उनकी आंज जब बढ़ जाती थी तब अलाब से पीछे भी खींचनी पड़ती थी कुर्सी। लकड़ियों के आग में चटकने की आवाज के अलावा गर्मी से उनके पास हवा भांति भांति की आवाज निकालती थी। कउड़ा की राख छोटे छोटे टुकड़ों में मेरे कपड़ों और हाथ में ली गयी किताब पर गिरती थी।

कउड़ा का अनुभव बचपन का है। गांव में सूखी लकड़ी और पत्तियों का प्रयोग कर जलाया जाने वाला अलाव और उसके इर्दगिर्द जमा लोगों की बत कही। आज कउड़ा था पर बतकही नहीं। मेरे हाथ में किताब थी – जिसमें लेखक ग्वाटेमाला और अल सल्वाड़ोर की रेल यात्रा का विवरण दे रहा था। ग्वाटेमाला का सत्तर के दशक का दृष्य। भूकम्प पीड़ित निहायत उदास, विपन्न, गरीब और अपने आप में अजनबी देश। जिसमें लोग बाहरी से तो क्या, अपने लोगों को भी निहायत शक की नजर से देखते थे। गन्दगी थी और मक्खियां। एक औरत ट्रेन में एक ही कप में पूरे कम्पार्टमेण्ट भर को कॉफी पिला रही थी और लोगों को कोई आपत्ति न थी। मुझे एक बारगी लगा कि लेखक नाहक उस जगह रेलगाड़ी से सफ़र कर रहा था। पर असल में ट्रेवलॉग का मतलब टूरिस्ट की तरह यात्रा कर उसका विवरण लिखना नहीं होता। अगर वह ग्वाटेमाला में इस तरह यात्रा नहीं करता, नहीं लिखता तो मुझे या मुझ जैसे पाठक को भूकम्पों से पीड़ित उस देश की विपन्न दशा का क्या अन्दाज होता।

कउड़ा, रामबचन (बायें) और शिवचन्द
कउड़ा, रामबचन (बायें) और शिवचन्द

मैं सोचने लगा कि मैं भी धीमे चलने वाली पैसेन्जर ट्रेनों में पूर्वान्चल की यात्रा कर जनता की नब्ज देखूं – गोरखपुर से नरकटिया, समस्तीपुर, रक्सौल, मुजफ़्फ़रपुर, सोनपुर, छपरा, सिवान, पडरौना… फिर मुझे लगा कि न मेरे पास पॉल थरू जैसे लेखनी है न उस तरह यात्रा करने की सन्कल्प शक्ति। रेलवे की नौकरी के दौरान बिना लम्बी छुट्टी लिये उसतरह की यात्रा वैसे भी सम्भव नहीं।

लेखक यात्रा करता सान् सल्वाड़ोर पंहुंच कर वहां एक (हिंसक) फुटबाल मैच का विवरण दे रहा था। कउड़ा धीमा हो गया था। राम बचन – मेरे आउट हाउस में रहने वाला जवान जो रेलवे मैकेनिकल वर्कशॉप में काम करता है और रविवार होने के कारण घर पर था – और लकड़ियां ला कर कउडा तेज करने लगा। आग और धुआं बढ़ गये। पुस्तक का भी एक अध्याय पूरा होने को आया। मैं वह अध्याय पूरा कर घर के अन्दर चला आया। संझा के समय जब लेखक आगे निकारागुआ की यात्रा में निकलेगा और यहां घर में अगर शीत न गिरने लगा तो एक बार फिर कउड़ा के पास बैठने की सोचूंगा। अन्यथा कल तो सोमवार है। फिर सप्ताह भर छुट्टी न मिलेगी कउड़ा के पास बैठने को।DSC_0059

 

कोहरा और भय


घने कोहरे में घर का पीछे का हिस्सा।
घने कोहरे में एक घर का सामने का हिस्सा।

सौन्दर्य और भय एक साथ हों तो दीर्घ काल तक याद रहते हैँ। सामने एक चीता आ जाये – आपकी आंखों में देखता, या एक चमकदार काली त्वचा वाला फन उठाये नाग; तो सौन्दर्य तथा मृत्यु को स्मरण कराने वाला भय; एक साथ आते हैं। वह क्षण आप जीवन पर्यन्त नहीं भूल सकते।

घने कोहरे के तिलस्म में दस प्रन्द्रह मिनट फंसना भी वैसी ही अनुभूति ला देता है। एक बार हम गंगा किनारे घने कोहरे में फंस गये थे। कोहरा अचानक आया और हमें जकड़ गया। आठ दस कदम के आगे दिखता नहीं था। एक दो बार गलत ओर बढ़ने के बाद दिशा भ्रम हो गया। कुछ दूर बाद गंगाजी का जल दिखा तो एक लैण्ड (या वाटर) मार्क मिला। यह लगा कि धारा के लम्बवत उससे दूर चलते रहे तो घाट पर पंहुच जायेंगे। अन्यथा कछार की रेत और कोहरा तो दबोचे ले रहे थे। उस दशा में भी सौन्दर्य था और भयानक भय भी। गजब का सौन्दर्य और भय। भटक कर जब वापस घाट की सीढ़ियों पर लौटे थे तो पण्डाजी ने बताया कि वे भी कोहरे में एक बार फंस चुके हैं। सवेरे साढ़े चार बजे गंगाजल लेने गये थे और कोहरे में भटकते रहे। सात बजे जब कछार से उबरे तो शिवकुटी से करीब एक-डेढ़ किलो मीटर दूर पाया था अपने को।

लगभग वैसी ही अनुभूति फिर हमें हुयी कल। एक दिसम्बर से पड़ रहा कोहरा कल दोपहर में कुछ हल्का हुआ था। धूप चटक निकली थी कुछ घण्टे। रात भोजन कर मैने सोचा कि ऑफ्टर डिनर टहल लिया जाये 20-25 मिनट। मन में विचार था कि आज कोहरा छंटा होगा। पर दरवाजे के बाहर पैर रखते ही भूल का गहरा आभास हो गया। दिन की खुली धूप, खुला आसमान (बादलों से रहित) और हवा का अभाव – डेडली कॉबिनेशन हैं संझा/रात में कोहरा घना आने के। वही हुआ था। बस गनीमत यह थी कि हम घर के पास रेलवे गोल्फ-कालोनी के गोल्फार (कछार की तर्ज पर स्थान का नामकरण) में थे। जहां रेत के विस्तार जैसी भूलभुलैया नहीं थी। पर भय उत्पादन करने के लिये शाल के बड़े विशालकाय वृक्ष थे। एक दो नहीं, अनगिनित और घने। कोहरे और स्ट्रीट-लाइट में वे बड़े बड़े दैत्य सरीखे लग रहे थे। हर घर बन्द था और हर दरवाजा निस्पृह सा अनामन्त्रित करता। कुछ दूर चलने के बाद लगा कि पैर यन्त्रवत उठ रहे हैं। कब दांया उठा और कब बांया, यह अहसास ही नहीं हो रहा। एक मन कहता था कि वापस हो लिया जाये। पर कोहरे का सौन्दर्य आगे चलने को उकसा रहा था।

मुझे सुनसान जगह का भय भी लगा। पत्नीजी साथ थीं और हमारी रक्षा के लिये बेटन भी न था, जो सामान्यत: मैं घूमते समय साथ ले कर निकलता था। यद्यपि हम रेलवे कालोनी में थे, पर गोरखपुर को निरापद नहीं कहा जाता। कोई खल इस घने कोहरे का लाभ ले कर अगर हम पर झपटता है तो आत्मरक्षा के लिए अपने हाथ पैर के अलावा कुछ नहीं है…. हम लोग हमेशा कनेक्टेड रहने के आदी हो चुके हैं और अचानक वह खत्म हो जाये – जैसा इस कोहरे में हुआ – तो ऐसा भय आता ही है।

दृष्यता लगभग 12-15 कदम भर थी। करीब 200 कदम चलने के बाद स्थान का भ्रम होने लगा। आगे वाला घर बेचू राय का है या कंचन का? यह नहीं चींन्हा जा रहा था। सड़क और कोहरे में मद्धिम पड़ी स्ट्रीट लाइट के सहारे ही चलना हो रहा था। हम लोग लगभग 1000-1500 कदम चल कर वापस हो लिये।

कोहरे में चीड़ के पेड़ का तना।
कोहरे में चीड़ के पेड़ का तना।

वापसी में एक व्यक्ति साइकल पर सामने से गुजरा। मैने कहा कि वह औरत थी। पत्नीजी ने कहा कि आदमी था। कोहरे में पहचानना कठिन था आदमी औरत को। उसके कुछ ही देर बाद एक औरत पैदल गुजरी। माहौल और मन – दोनो से प्रेरित मैने उस औरत के पैर की ओर भी देख लिया। … बचपन से बताया गया है कि बियाबान में घूमती हैं डाकिनी और चुडैल। और उनके पांव उल्टे होते हैं। …

एक जगह रुक कर मैने चित्र लेने चाहे तो पत्नीजी ने डपटा – इस समय फोटो लेने की सूझ रही है? चुपचाप घर चलो। वहीं ले लेना कोहरे की फोटो, जितनी लेनी हो!  

फिर भी दो तीन चित्र तो लिये ही। यह जरूर हुआ कि अगर रुक कर इत्मीनान से लेता तो मेरा मोबाइल का कैमरा भी कुछ वाकई अच्छे चित्र दर्ज कर लेता कोहरे के।

मेरे घर के पास अपनी बाइक खड़ी कर दो रेलवे टेलीफोन विभाग के कर्मी एक सीढ़ी लगा टेलीफोन के तार ठीक करते दिखे। अच्छा लगा कि घने कोहरे में भी लोग मुस्तैद हैं। रेल कर्मी काम कर रहे हैं।

मेरे अपने घर में भी मेन गेट पर ताला लगा कर आउट-हाउस वाले अपने अपने कमरों में बन्द हो चुके थे। हम पीछे के संकरे गेट से उछल कर अन्दर आये। कोहरे की नमी युक्त हवा को फेफड़ों मे पूरी तरह भर कर मैने घर के भीतर प्रवेश किया।

अथ कोहरा एडवेंचर कथा!

घर के पिछवाड़े की ओर से दाखिल हुये कोहरे में हम।
घर के पिछवाड़े की ओर से दाखिल हुये कोहरे में हम।

इन्दारा, सप्तगिरि में


मेरे घर “सप्तगिरि” में आज पीछे की तरफ देखा। सेमल का विशालकाय वृक्ष है। उसके पास गूलर और बेल के पेड़ भी हैं। सेमल की छाया में एक इन्दारा है – कुंआ। अब परित्यक्त है। कुंये की गोलाई में ईंट लगी हैं। उन्ही के साथ है एक पीपल का वृक्ष।

बहुत पुराने पन का अहसास। आसपास पेड़, जमीन पर छितरायी गिरी पत्तियां और इधर से उधर आती-जाती लतायें! यह सब देख रहा था तो कलेवा कर कुल्ला करता चन्द्रिका पास आ गया। बताने लगा कि कुंआ अब भठ गया है। कुछ साल पहले एक गेंहुअन गिर गया था इसमें। निकल नहीं पाया। कुछ दिन तो दूध गिराया गया उसे पीने के लिये। फिर खतम हो गया।

इन्दारा, पीपल और बांयी ओर सेमल के विशाल तने का अंश।
इन्दारा, पीपल और बांयी ओर सेमल के विशाल तने का अंश।

गूलर अभी लगना नहीं शुरू हुआ। बिल्वपत्र विवर्ण लगते हैं। कोई भी तीन पत्तियां मुझे कोमल, हरी और समूची नहीं दिखीं। “पड़ोस के विपुल सिंह सा’ब के घर में अच्छा बेल का पेड़ है। पत्तियां मंगानी हों तो वहां से ले आऊंगा”। चन्द्रिका ने कहा।

सेमल विशालकाय है। “साहेब पारसाल छंटवाये रहेन्; तब्बौं एतना बड़ा बा।”

सेमल, बेल, गूलर – सभी पवित्र वृक्ष हैं। पास में आंवला भी है। सप्तगिरि अपने आप में अनूठापन लिये है। पुराना, जर्जर, पवित्र और वर्णनीय!

बंगला, वनस्पति और और चन्द्रिका


चन्द्रिका इस घर में मुझे आते ही मिला था। सवेरे बंगले को बुहारता है और क्यारियों में काम करता है। उससे कह दिया था कि कुछ सब्जियां लगा दे। तो आज पाया कि लौकी, करेला, नेनुआं, खीरा आदि लगा दिये हैं। बेलें फैलने लगी हैं। चन्द्रिका के अनुसार लगभग दो सप्ताह में सब्जियां मिलने लगेंगी।

चन्द्रिका
चन्द्रिका

आज सवेरे चन्दिका फावड़ा चलाते दिख गया।

मैं उसे साथ ले कर बंगले में इधर उधर घूमने लगा। एक ओर लाल फूलों और काले मकोय जैसे बहुत से पौधे दीखे। मुझे लगा कि इनको क्यारी में कभी रोपा गया रहा होगा। पर चन्द्रिका ने बताया कि यह खरपतवार है। भटकुईंया कहते हैं इसे। कण्ट्रोल से कोई व्यक्ति आ कर इसके बारे में बताया था कि कोई दवाई बनती है इससे सूअर के लिये। सूअर के लिये भी दवाई होती है – यह मुझे नयी जानकारी थी।

भटकुईंया
भटकुईंया

भटकुईंया की बगल में बहुत झाड़ियां थीं। चन्द्रिका ने बताया कि वह भांग है। भांग में फूल भी आ रहे थे। मैने अनुमान लगाया कि यूंही पनप आये लगभग 30-40 पौधे होंगे। पता नहीं, भांग का यूं होना वैध है या अवैध। चन्द्रिका के अनुसार इनका कोई उपयोग नहीं है। यूंही उगते और खत्म हो जाते हैं।

भांग।
भांग।

एक विशालकाय पारिजात का वृक्ष था। काफी पुराना। उसके साथ पीपल भी गुंथा था। कुछ फूल झर रहे थे उससे। फल भी लगे थे। फल का भी पीस कर कोई औषधि के रूप में प्रयोग होता है। चन्द्रिका ने बताया कि जब झरते हैं तो नीचे की जमीन फूलों से पूरी बिछ जाती है।

पारिजात। पीपल भी गुंथा है इसमें।
पारिजात। पीपल भी गुंथा है इसमें।

“साहेब, पहले वाले साहेब मेंहदी लगाते थे बालों में” – चन्द्रिका ने बताया। मेंहदी की कई झाड़ियां दिखीं। फूल भी लगे थे मेंहदी में। फल भी आने वाले थे। उसकी पत्तियां, फूल, फल – सभी काम आते हैं रंग देने में।

मेंहदी। फूल-फल आ रहे हैं मेंहदी में।
मेंहदी। फूल-फल आ रहे हैं मेंहदी में।

रंग लाती है हिना, पत्थर पे पिस जाने के बाद!

और भी वनस्पतीय/जैव विविधता है मुझे मिले बंगले में। करीब एक एकड़ या डेढ़ बीघे में है यह बंगला। नाम सप्तगिरि। सप्तगिरि जैसा वैविध्य! आगे भी बताता रहेगा चन्द्रिका और आगे भी आता रहेगा ब्लॉग पर।

चन्द्रिका यादव।
चन्द्रिका यादव।

मिलते हैं एक ब्रेक के बाद! 😆