श्रीराम बिंद की मटर

हमने उन्हें चाय पिलाई। साथ में दो बिस्कुट। वह व्यक्ति जो हमारे लिये सवेरे सवेरे मटर ले कर आ रहा है, उसको चाय पिलाना तो बनता ही है।


वह पास के गांव में रहता है अपनी “बुढ़िया” के साथ। दो लड़के हैं, दोनो बनारस में खाते-कमाते हैं। एक ऑटो चलाता है और दूसरा मिस्त्री का काम करता है किसी भवन निर्माण की फर्म में। उसके पास दो बिस्सा खेत है और गाय। गाय आजकल ठीक ठाक दूध दे रही है। मुझे दूध सप्लाई करने की पेशकश की थी, पर हमें जरूरत न होने पर वह अपने लड़कों और उनके परिवार के लिये बनारस ले कर जायेगा। “इही बहाने उन्हनेऊं दूध इस्तेमाल कई लेंईं (इसी बहाने उन्हें भी मिल जाये दूध)।

दो बिस्सा जमीन में मटर बोई थी। चार दिन पहले वह लाया था बेचने। 14रुपये किलो दी थी। बहुत अच्छी और मीठी मटर। लम्बी छीमी और हर छीमी में 6-9 दाने। स्वाद लाजवाब था – इस मौसम की सबसे बेहतरीन मटर थी वह। दो बिस्वा (1 बिस्वा बराबर 125 वर्ग मीटर) खेत में बहुत ज्यादा तो होती नहीं। आज दूसरी बार तोड़ी तो आसपड़ोस वाले ही ले गये। किसी तरह से 3 किलो बचा कर लाया हमारे लिये।

Continue reading “श्रीराम बिंद की मटर”
Advertisements

कुनबीपुर में मचान और खीरे का मोल भाव


DSC_0124
कुनबीपुर में मचान, राजन भाई और खेत में काम करने वाली महिला – अमरावती।

एक मचान देख कर मैं ठहर गया। सवेरे के सूरज की रोशनी में देखने की इच्छा के कारण मेड़ पर पैर साधते हुये मचान के दूसरी ओर पंहुचा। साथ में राजन भाई थे। सवेरे की साइकलिंग में मेरे सहयात्री।

महिला मचान के पास थी। नाम पूछा – अमरावती। मचान उसका नहीं था। वह सवेरे सवेरे खीरे का खेत निराने आई थी। उसी ने गांव का नाम बताया – कुनबीपुर। गांव कुनबी जाति वालों का है। कुनबी सब्जियां उगाने वाली जाति है। पूरा परिवार सब्जियों के खेत में मेहनत करता है। बकौल राजन भाई एक बीघा खेत में दो-ढाई लाख की आमदनी कर लेते हैं ये। आस-पास खीरा, नेनुआ, कोंहड़ा, ककड़ी और गेंदे के फूल की खेती थी। कई खेतों में कुनबी लोग खीरा तोड़ते पाये हमने।

DSC_0154
खीरे के खेत में काम करती महिला और लड़के से दस रुपये का खीरा लेने के लिये मोलभाव किया राजन भाई ने।

एक खेत में महिला और उसका लड़का तोड़ रहे थे। राजन भाई ने मोल भाव किया – दस रुपये का खीरा लेने के लिये। लड़का बहुत सा खीरा तोड़ लाया। जितना दिया था, मुझे लगा कि दस रुपये कम लगाया है दाम। मैने बीस रुपये दिये तो उसने और खीरे दे दिये।

राजन भाई मोल भाव करने में दक्ष हैं। उन्होने कहा – तोहरे दुआरे आई हई, तनी और द (तुम्हारे दरवाजे आये हैं, थोड़ा और दो)। लड़के ने दो-तीन और खीरे दिये, यह कहते हुये कि उसे घाटा हो जायेगा। लेने के बाद राजन भाई ने मोलभाव का अन्तिम पंच मारा  – तनी धेलुआ धरु (थोड़ा घेलुआ भी दो)।

कुल मिला कर अच्छी मात्रा में खीरे ले कर हम आगे बढे। राजन भाई के अनुसार वे बाजार में कम से कम चालीस रुपये के होंगे।

सवेरे का समय। अप्रेल का प्रथम दिन। आनन्द बहुत आया कुनबीपुर भ्रमण में। पर पहले दिन कौन फूल बना? पता नहीं।

व्यास जी और महाकाव्य सृजन


मार्च’5, 2017:

gdmar165403_edited_wm
पगडण्डी में साइकल चलाते बढ़े जा रहे थे हम। दोनो ओर गेंहूं के खेत थे।

सवेरे की साइकलिंग में हम चले जा रहे थे। राजन भाई और मैं। राजन भाई से मैने कह दिया था कि सड़क-सड़क चलेंगे। पगडण्डी पर साइकल चलाने में शरीर का विशिष्ट भाग चरमरा उठता है। पर राजन जी ने बीच में अचानक पगडण्डी पकड़ ली थी और मैं पीछे चले जा रहा था। मुझे लगने लगा कि आज अच्छा फंस गये हैं। शायद बहुत ज्यादा साइकल चलानी पड़े। पता नहीं, अंगद जैसी दशा न हो जाये! वापसी के लिये अपने ड्राइवर को फोन कर वाहन मंगवाना पड़े घर से।

वैसे पगडण्डी समतल थी। जमीन ठोस। डामर की सड़क अगर उधड़ गयी हो, तो उसमें जितना डिस-कम्फर्ट होता है, उसके मुकाबले कहीं कम था इस रास्ते में। दोनों ओर गेंहूं के शानदार खेत थे। हरे, विशाल गलीचों जैसे। लगता है इस साल फसल बम्पर होगी। जीडीपी ग्रोथ में कृषि का योगदान बढिया रहेगा चौथे क्वार्टर में भी।

अचानक मानव निर्मित खेत खत्म हो गये और गंगा माई की खेती प्रारम्भ हो गयी। गंगा माई के इस ओर के खेत करारी मिट्टी के हैं। ऊबड़-खाबड़। उनमें सरपत लगे हैं। बहुत ऊंचे-ऊंचे नहीं थे सरपत। पर वह स्थान था मानव रहित। पगड़ण्डी भी अपनी ढलान से बताने लगी थी कि आगे नदी है।

gdmar165405_edited_wm
फ्लैक्सी बोर्ड पर यह लिखा था कि यह जगह रात्रि में माताओं, बहनों के ठहरने की नहीं है।

नदी दिखने लगी। तब एक दो झोपड़ियां दिखीं – उनपर झंडे लगे थे। एक फ्लैक्सी बोर्ड भी टंगा था। उस पर यह लिखा था कि यह जगह रात्रि में माताओं, बहनों के ठहरने की नहीं है। उसमें ऊपर “जय बाबा कीनाराम” लिखा था। जैसा मुझे मालुम है बाबा कीनाराम (सिद्ध) तान्त्रिक थे। अघोरी।

img_20170305_072827-01_wm
काली जी की प्रतिमा और खोपड़ियां

टीन के शेड के नीचे काली माँ की काली/भयावह प्रतिमा थी। उनके पास चार मानवी खोपड़ियां रखी थीं। सामने एक थाले में श्मशान की लकड़ियों के दो बोटे सुलग रहे थे।

कोई तान्त्रिक या कोई भी व्यक्ति आसपास नहीं दिखा। मैने झोपड़ियों में ताक झांक की। वहां भी कोई न था। हम दोनो अपनी साइकलें रख गंगा तट की ओर बढ़ लिये।

तट का ढलवां रास्ता साफ़ था। पगडण्डी। सरपत और बबूल की बाड़ लगे बड़े बड़े सब्जियों के खेत थे नदी के किनारे। बस पगडण्डी की जगह छोड़ दी थी खेती करने वालों नें। खेत की रखवाली करने वालों  के लिए  सरपत की मड़ईयां भी थी। एक खेत, जिसमें कोई नहीं था, बड़ी सुन्दर मड़ई थी। मैं उसका चित्र लेने के लिये बाड़ हटा कर चला गया। यह सावधानी रखी कि किसी पौधे या बेल को न कुचल दूं।

img_20170305_071745-01_wm
नदी किनारे मड़ई

img_20170305_071213_edited_wm
कमहरिया के पाठक जी। ऊंचा सुनते थे।

नदी में कुछ लोग नहाने के लिये पंहुचे थे। केवल दो-चार लोग। एक सज्जन वापस आ रहे थे तो उनको मैने नमस्कार किया। उत्तर न मिलने पर फिर से बात करने पर पता लगा कि वे ऊंचा सुनते हैं। उन्होने बताया कि कोई पाठक (ब्राह्मण वर्ण का सरनेम) हैं। पास के गांव कमहरिया के। रोज नहाने आते हैं।

अचानक एक छरहरा, गौर वर्ण, बड़े बाल और दाढ़ी वाला, सफ़ेद कपड़े पहने नौजवान तपस्वी नहाने के ध्येय से वहां पंहुचा। उससे पूछने पर पता चला कि पास के आश्रम में रहते हैं वे सज्जन। आश्रम अघोरी आश्रम के बगल में है। पहले ये तपस्वी केवटाबीर (पास के गंगा तटीय गांव) के जगतानन्द आश्रम में रहते थे। दो-चार दिन पहले यहां चले आये। यह आश्रम खाली पड़ा था। यहीं डेरा जमा लिया है उन्होने।

अकेला, नौजवान तपस्वी। बहुत आकर्षक व्यक्तित्व। काहे जवानी बरबाद (?) कर रहा है इस निर्जन स्थान पर। अघोरी आश्रम के बगल में। अटपटा लगा हमें।

img_20170305_072218_edited_wm
नदी में स्नान के लिये पंहुचा तपस्वी।

मैने पूछा – क्या करते हैं आप यहां रह कर?

“महाकाव्य की रचना कर रहा हूं। बहुत कुछ लिखा जा चुका है। पहले जगतानन्द धाम में लिख रहा था। एकान्त के लिये यहां चला आया।”

उन्होने बताया – “पांच शती पहले भारत वर्ष की दशा खराब थी। उस समय उत्थान के लिये तुलसी ने रामकथा को ले कर काव्य लिखा – रामचरितमानस। आज भी समाज की वैसी ही दशा हो रही है। क्षरण और पतन की दशा है। इसलिये मैं कृष्ण कथा को आधार बना कर यह काव्य लिख रहा हूं। सात अध्यायों का यह काव्य है।”

अपेक्षा नहीं थी मुझे कि इस जगह पर इस प्रकार का कोई व्यक्ति मिल जायेगा। मैने लेखन देखने की जिज्ञासा व्यक्त की। यह भी कहा कि अगर इस प्रकार का कुछ लिखा जा रहा है तो लोगों को पता तो चलना चाहिये। तपस्वी भी (सम्भवत:) यह चाहते थे कि लोगों को पता चले। उन्होने कहा कि हम लोग आश्रम में इन्तजार करें, दस मिनट में नहा कर वे आते हैं।

img_20170305_074131_edited_wm
बरगद के तले आश्रम।

आश्रम की ओर जाते समय राजन भाई ने अपनी व्यग्रता जताई – “ये बाबाजी के साथ तो बहुत समय लग जायेगा। मुझे आठ बजे घर पंहुचना है। काम है।”

हमने तय किया कि तपस्वी से मिल कर हम लोग किसी और दिन आने की बात कहेंगे। रुकेंगे नहीं। तपस्वी की प्रतीक्षा में मैने आश्रम का मुआयना किया। साफ़-सुथरा था वह स्थान। एक विशालकाय बरगद से आच्छादित। एक ओर शंकर जी का मन्दिर था। दो-तीन कमरे। बाहर एक कुंआ। छत पर जाने के लिये सीढ़ी। कुल मिला कर रमणीय स्थान था। मैने  सोचा कि तपस्वी के साथ यहां रुका/रहा जा सकता है।

दस मिनट में ही आ गये तपस्वी। एक गमछा पहने। मैने कहा – हमें जल्दी है। आप अपने लेखन के एक दो पन्ने दिखा दें। विस्तार से बाद में आकर चर्चा करेंगे।

img_20170305_074501_edited_wm
अपनी पाण्डुलिपि लिये कमरे से निकलते तपस्वी। 

उन्होने सहज उत्साह से अपना लेखन दिखाया। एक मोटा, गत्ते पर लाल कपड़े की जिल्द वाला अच्छा रजिस्टर। मैने एक दो पन्नों के चित्र लिये। वे उत्साह से पाण्डुपि का एक अन्य रजिस्टर भी ले आये जिसमें ग्रन्थ का प्रारम्भ था। सरसरी निगाह से मैने पढ़ा – चौपाईयां और दोहे तुलसीबाबा की भाषा जैसे गठे हुये लगे। अच्छा प्रवाह था उनमें।

तपस्वी की लगन और धुन ने बहुत प्रभावित किया मुझे। आज भ्रमण का अनुभव विलक्षण था। शुरुआत में जैस लग रहा था, उससे बिल्कुल उलट।

मैने तपस्वीजी का मोबाइल नम्बर लिया। नाम पूछा तो बताया कि “व्यास जी” कहते हैं। आश्रम से बाहर निकलने पर दो ग्रामीण मिले। उन्होने बताया कि यह आश्रम योगेश्वरानन्द जी का था। उन्हे देह त्याग किये छ साल हो गये। उसके बाद दो-तीन बाबा लोग आये पर टिके नहीं। अब ये आये हैं। बड़े अच्छे हैं बाबा जी।

कुछ अजीब लगा कि बाबा लोग यहां टिके क्यों नहीं। पास के अघोरियों के आश्रम के कारण तो नहीं? मैं शंका लिये हुये राजन भाई के साथ वापस लौट चला।

करीब 14 किलोमीटर, मुख्यत: पगडण्डी के रास्ते साइकल चलाई आज सबेरे। और ऐसा अनुभव रहा कि कभी भूलूंगा नहीं।

व्यास जी से मिलने और उनका ग्रन्थ ध्यान से देखने फिर जाऊंगा वहां। शायद गिनती के कुछ लोगों को ज्ञात है कि एक तपस्वी एक कोने में बैठा महाकाव्य लिख रहा है।

गंगाजी का तट अपने आप में जाने कितनी विलक्षणता से भरा है।

img_20170305_074553_edited_wm
पाण्डुलिपि का एक पन्ना। इसमें चौपाई/दोहे के साथ भावार्थ भी है। 

सब्जी भाजी का बगीचा


image
उस घर के बाहर बांस की खपच्चियों वाली बाड़ के बगीचे को साइकल से आते जाते रोज देखता था। आज वहां पैदल गया। वहां पंहुचने के लिए पगडंडी पर लगभग 100 मीटर चलना था। उसके बाद मिले शिवमूर्ति। शिवमूर्ति पड़ोसी हैं पर उनके पास भी अच्छा सब्जी भाजी का बगीचा है।

image

शकरकंद,  बैगन, मिर्च,  आलू, धनिया, लहसुन आदि अनेक सब्जियों की क्यारियां।

image

बांस की खपच्चियों की बाड़ राजेन्द्र प्रसाद जी ने लगाई थी। नीलगाय के आतंक से निपटने के लिए। उन्होंने बताया कि ये खपच्चियां भी कई बार नहीं रोक पातीं नीलगायों को। वे घुस आती हैं। पिछली बार आम्रपाली आम की फुनगी चर गयी थीं। बैगन के फल खा लिए थे। अच्छे और बड़े फल ही खाती हैं वे – राजेन्द्र प्रसाद ने बताया।
हमें देख वहां अच्छी खासी भीड़ जमा हो गयी थी। सभी नीलगाय को अपने जीवन का प्रतिद्वंद्वी मान रहे थे। कभी भी आ जाती हैं वे। ऊंचा उछल कर आ जाती हैं। बाड़ में नीचे से झुक कर भी प्रवेश कर जाती हैं। दुलत्ती बहुत तेज झाड़ती हैं। सांवले नर नीलगाय टी बहुत ही खूंखार हैं।
बच्चे भी नीलगायों के बारे में बात करते आवेश से भर जाते लगे।
राजेन्द्र प्रसाद ने बताया कि वे कलकत्ता में जल निगम में काम करते हैं। नौकरी में कुछ अड़चन आ गयी है, सो पिछले पांच छ साल से गाँव में ही हैं। कई आम और नींबू के गाछ वे कलकत्ता से ही ले कर आये हैं। उनके सहकर्मी यहाँ आते रहते हैं बंगाल से। यहाँ आ कर बनारस और प्रयाग घूम कर जाते हैं। उनके बगीचे से नींबू आदि ले जाते हैं।
राजेन्द्र प्रसाद ने हमें दो बड़े प्रकार के नींबू के फल दिए। उनमे से एक अण्डाकार था। राजेन्द्र ने बताया कि उसे गंधराज कहते हैं। हल्का खट्टा होता है वह। बड़ी अच्छी सुगंध थी फल में। शायद इसी कारण से उसका नाम है गंधराज।

image

राजेन्द्र के पास दो बिस्सा जमीन में बगिया है और उसके अलावा उनके पास दो गायें हैं। लगभग यही हम भी रखना चाहते हैं गाँव में। मैंने राजेन्द्र से कहा कि उनसे बगीचे और गाय पालने के बारे में सलाह लेने आते रहेंगे।
वे लोग मेरे पहले के काम के बारे में पूछते थे। मैंने बताया कि मैं ट्रेन हांकता था। ज्यादा समझ नहीं पाये वे मेरे काम के बारे में। रेलवे में उनका इंटरेक्शन फिटर खलासी या स्टेशन स्टाफ से हुआ है। उससे मेरे काम का अनुमान लगाना सम्भव नहीं अनुमान कराना भी शायद व्यर्थ है। हल्का सा भी अनुमान होने पर अपेक्षा होने लगती है कि मैं कोई नौकरी दिलवा दूंगा। वह मेरे बस में नहीं!
मैं उन लोगों से विदा मांग कर आया। भविष्य में उनसे मिलता रहूँगा।

image

पिताजी और आजकल


पिछले अप्रेल महीने में मेरी पोती  पद्मजा को गोद ले कर खड़े पिताजी।
पिछले अप्रेल महीने में मेरी पोती पद्मजा को गोद ले कर खड़े पिताजी।

मेरे पिताजी (श्री चिन्तामणि पाण्डेय) 81 के हुये 4 जुलाई को। चार जुलाई उनका असली जन्म दिन है भी या नहीं – कहा नहीं जा सकता। मेरी आजी उनके जन्म और उम्र के बारे में कहती थीं – अषाढ़ में भ रहें। (दिन और साल का याद नहीं उन्हें)। अब अषाढ़ई अषाढ़ होई गयेन्। ( अषाढ़ में जन्मे थे। अब अषाढ जाने कितने बीत गये)।

खैर, उनका सार्टीफ़िकेट के अनुसार जन्म दिन है 4 जुलाई 1934। उनके अनुसार उनका जन्म तो 1934 में हुआ था। चार जुलाई शायद दाखिले के समय लिखा दिया गया हो।

पिछले कई वर्षों से वे गिरती याददाश्त के शिकार हैं। याददाश्त के अलावा कई साल पहले उनकी सामान्य सेहत भी तेजी से गिरने लगी थी। एलोपैथिक दवाओं से जब लाभ नहीं हुआ था तो किसी के सुझाने पर रामदेव के आउटलेट पर बैठने वाले आयुर्वेदिक आचार्य जी को दिखाया था। उनकी दवाओं – घृतकुमारी रस और अश्वगन्धा के कैप्स्यूल जिनमें थे – से बहुत लाभ हुआ। उनके हाथों में कम्पन होने लगा था। वह रुक गया। उनकी तेजी से गिरती याददाश्त की गिरावट की दर बहुत कम हो गयी थी। उनका चलना-फिरना भी पहले की अपेक्षा बेहतर हो गया।

अम्मा जी के सतत देखभाल से वे तो ठीक हो गये पर सन् 2013 मे उत्तरार्ध में घर में ही फिसलने के कारण अम्मा जी की कूल्हे की हड्ड़ी टूट गयी। उनके ऑपरेशन के लिये, उनको दी जाने वाली ब्लड-थिनर दवायें सप्ताह भर के लिये रोक दी गयी थीं। वही घातक साबित हुआ। उनका ऑपरेशन तो ठीक से हो गया और वे स्वास्थ लाभ भी कर रही थीं; पर मस्तिष्क में कहीं थक्का जम गया और दो बार उन्हे पक्षाघात हुआ। पहले आघात से उबर रही थीं। पर दूसरा घातक साबित हुआ। पिताजी ने उन्हे मुखाग्नि तो दी, पर उनके फेरे लगा कर शरीर को अग्नि को अर्पित करने और कपाल-क्रिया का कृत्य मैने पूरा किया। मेरे लड़के ने दस दिन के कर्मकाण्ड निबाहे और अन्त में पिण्ड-दान, महाब्राह्मण की बिदाई का कृत्य मैने सम्पन्न किया। परिवार की तीन पीढ़ियों के सामुहिक योग से कर्मकाण्ड सम्पन्न हुये उनके। मुझे याद नहीं कि किसी और घर में इस प्रकार हुआ होगा।

अम्मा जी के जाने के बाद मैं पिताजी को अपने साथ गोरखपुर ले आया। पिताजी के एकाकीपन के झटके और उसमें कैद हो जाने की आशंका हम सब को थी; पर गोरखपुर में एक-डेढ़ बीघे में फैला खुला बंगला, और आउट हाउस के कई चरित्र उन्हे बोलने बतियाने को मिल गये। वे अगर अम्मा के चले जाने के बाद इलाहाबाद में ही रहते तो शायद एकाकीपन और अम्मा की याद से भरा वातावरण उन्हे तोड़ता। गोरखपुर में आउट हाउस के चन्द्रिका और ध्रुव, रोज नमस्ते करने वाली महिला, बगीचे में काम करने वाला माली नारद, सफ़ाई के लिये यदा कदा आने वाला सफ़ाई जमादार, मेरे वाहन के डाइवर… ये सब उनके चौपाल के मित्र बन गये। वे कभी थक जाने पर कमरे में आ कर बिस्तर पर लेटते हैं तो कुछ सुस्ता लेने के बाद फिर उठ कर बाहर निकल लेते हैं। वहां चौपाल जमती है या फिर किसी के न रहने पर वे परिसर में चक्कर लगा कर फूल-पत्तियां-सब्जियां निहारते हैं। काम भर की सब्जियां – नेनुआ, लौकी, भिण्डी तोड कर लाते हैं। चन्द्रिका को कष्ट होता है कि समय से पहले ही तोड़ लेते हैं नेनुआ और लौकी।

अभी महीना भर पहले आधी रात मे उनकी आवाज आयी। वे मेरी पत्नीजी को बुला रहे थे। हम गहरी नींद से जगे और देखा कि उनके माथे पर चोट लगी है। खून बह रहा है। एकबारगी तो मुझे समझ नहीं आया कि क्या करूं। भाव के अतिरेक में उन्हे मैने बांहों में भर लिया – मानो वे छोटे शिशु हों। हमने उनका घाव धोया, घर में उपलब्ध दवाई लगा कर पट्टी की और उपलब्ध पेनकिलर दिया। उनके बिस्तर को ऐसे किया कि गिरने की सम्भावना न रहे।

उनसे पूछा कि चोट कैसे लगी तो वे कुछ बता न सके। बाद में भी याद नहीं आया।

अगले दिन सवेरे उन्हे हम ड्रेसिंग कराने अस्पताल ले गये। डाक्टर साहब ने बताया कि रात भर में घाव भरा है और ड्रेसिंग-दवाई से ठीक हो जायेगा। अन्यथा अगर रात में लाये होते उन्हें तो कम से कम चार-पांच टांके लगते। डाक्टर साहब ने एहतियादन सीटी-स्कैन और खून की जांच कराने के लिये कहा। वह सामान्य निकला।

बाद में अनुमान लगा कि उन्हें पोश्चरल हाइपो-टेंशन की समस्या हुई। गर्मी के मौसम में पसीने से नमक की कमी हुई शरीर में और रात में  बाथरूम की ओर जाने के लिये वे झटके से उठे होंगे तो कम रक्तचाप के कारण चक्कर आ गया होगा। जमीन पर गिरते हुये कोई कोना टकराया होगा जिससे माथे पर चोट लगी।

कई दिन तक उन्हे कमजोरी की शिकायत रही। अब वे ठीक हैं। तख्ते पर लगा उनका बिस्तर हटा कर उनचन वाली मूंज की खाट पर कर दिया गया है जिससे रात में बिस्तर से उठते समय गिरने की आशंका कम से कम हो जाये।

कटका में बनते घर को देखते पिताजी। साथ में मनीष औरदूर नीली कमीज में धर्मेन्द्र।
कटका में बनते घर को देखते पिताजी। साथ में मनीष औरदूर नीली कमीज में धर्मेन्द्र।

पिछले शुक्रवार को उन्हे हम कटका साथ ले कर गये। मैं रिटायरमेण्ट के बाद वहां सेटल होने के लिये एक छोटा घर बनवा रहा हूं। वह उन्हे दिखाना चाहता था। उसे देख कर वे सन्तुष्ट तो थे, पर उन्होने मुआयाना अपने सिविल इन्जीनियर की निगाह से ही किया। उन्हे हम खेतों में लगाये यूकलिप्टिस के प्लाण्टेशन दिखाने भी ले गये। काफी रुचि ली उनमें भी पिताजी ने।

उनकी वर्तमान की याददाश्त गड्ड-मड्ड हो जाती है। वाणी भी कई बार लटपटा जाती है। पुराना अच्छे से याद है। अपने बचपन की घटनायें और व्यक्ति वे बता ले जाते हैं। पर उन घटनाओं के क्रम में कभी कभी घालमेल हो जाता है।

कुल मिला कर वे ठीक हैं और हमें अपेक्षा है कि अगले दशक और उससे आगे भी उनकी उपस्थिति का आशीर्वाद हमें प्राप्त रहेगा।

पिताजी के साथ मेरा बेटा, पद्मजा और मैं।
पिताजी के साथ मेरा बेटा, पद्मजा और मैं।


कछार में कल्लू की खेती की प्लानिंग


कछार में कल्लू।
कछार में कल्लू।

आज रविवार को कछार में गंगा किनारे घूम रहा था। एक छोटा लड़का पास आ कर बोला – अंकल जी, वो बुला रहे हैं। देखा तो कल्लू था। रेत में थाला खोद रहा था। दूर से ही बोला – खेती शुरू कर दी है। थोड़ी देर से ही है, पर पूरी मेहनत से है।

कल्लू शो-ऑफ करना चाहता है कि वह गरीब है, वह अपनी कम्यूनिटी में लीडर है, वह बेहतर प्लानिंग से खेती करता है और मुझे तवज्जो देता है। यह सब सही है। शायद गरीबी वाला कोण सही न हो। मेहनत करता है वह और उसका परिवार। और शायद अच्छी कमाई हो जाती है उसको इस तरह के उद्यम से। अपने समाज में अच्छी स्टैण्डिंग है उसकी और उसके परिवार की।

उसने बताया कि इस बार देर हो गयी। मकान बनवा रहा था। दूर गंगा किनारे सफ़ेद रंग का मकान भी दिखाया उसने। “अब बन चुका है! उद्घाटन होना है 8-10 दिन में। आप आयेंगे न? गरीब के घर भी आ जाइये।”

मैने उसे कहा कि अगर सप्ताहान्त में करेगा समारोह तो अवश्य आऊंगा। अन्यथा दफ़्तर के कमिटमेण्ट के कारण आना कठिन है।

दूर था वह - कल्लू।
दूर था वह – कल्लू।

अपनी खेती के बारे में उसने बताया – उस ओर गेंहूं और चना बोया है। और इस ओर सब्जियां। कुछ बो दी हैं। कुछ तो पौधे अंकुरित हो गये हैं। बाकी बोये जा रहे हैं। लौकी के अंकुरित पौधे दिखाये उसने। सभी बोने हैं – लौकी, नेनुआ, कद्दू, मूली, पालक, टमाटर, करेला…

एक छोटा बच्चा खोदने लगा थाला।
एक छोटा बच्चा खोदने लगा थाला।

करीब तीन बीघा में गेंहू-चना बोया है और 4 बीघा में सब्जियां। घाट की पगडण्डी के दूसरी ओर भी हर साल बोता था वह सब्जियां, पर इस साल पार्षद मुरारी यादव ने कह दिया कि उस तरफ़ वह खेती करेगा। मैने छोड़ दिया। कौन लड़ाई करे। लेकिन देखिये, उसने कोई खेती नहीं की है। मैने देखा कि उस ओर कुछ भैंसे घूम रही थीं और लड़के क्रिकेट खेल रहे थे। मुरारी खेती नहीं कर रहा है। यह मात्र सप्पा-बसप्पा का स्थानीय टिर्र-पिर्र है। ये भैसें कभी सब्जी या गेहूं के खेत में हिल गयीं तो स्थानीय राजनैतिक झगड़े की भी सम्भावना बन जायेगी शायद। 🙂

कल्लू ने मुझे दूर नदी के उस पार भी दिखाया कि वहां भी कर रहा है वह खेती। नदी के बीच उग आये टापू पर भी। अगर मैं अनुमान लगाऊं तो कुल 20-25 बीघा में कल्लू का परिवार खेती कर रहा है कछार में।

उसके साथ दो बच्चे थे। उन्हे दिखा कर बोला कि ये खेलते रहते थे यहां। मैं उन्हे 20 रुपया रोज देता हूं। साथ में खुराकी। घूमने वाली बकरियां भगाते हैं। थोड़ी बहुत खेती भी करते हैं। किसी बड़े को रखूं तो गोरू भगाने को धीरे धीरे जायेगा। ये फ़ुर्ती से जाते हैं। पता नहीं बच्चे खुश हैं या अपने को शोषित मानते हैं। मुझे लगे तो वे प्रसन्न। लल्लू के साथ सवेरे आठ बजे से शाम छ बजे तक रहते हैं वे खेत पर।

कल्लू और दोनो बच्चे।
कल्लू और दोनो बच्चे।

रुकता तो कल्लू और बतियाता। मैने वापस लौटते हुये उससे हाथ मिलाया।

ब्लॉग के पढ़ने वाले रहे तो आगे भी पोस्टें होंगी कल्लू पर।

और क्लिक के आंकड़े तो बताते हैं कि पढ़ने वाले हैं पहले की तरह। सिर्फ टिप्पणी आदान-प्रदान सरक गया है फ़ेसबुक पर।

अम्कुरित हो गयी है लौकी।
अंकुरित हो गयी है लौकी।

कर्जन ब्रिज से गंगा पार, पैदल


कर्जन ब्रिज का पहला स्पान दिख रहा है मोड़ पर।
कर्जन ब्रिज का पहला स्पान दिख रहा है मोड़ पर।

अपनी मां के कूल्हे की हड्डी के टूटने के बाद के उपचार के सम्बन्ध में नित्य फाफामऊ आना-जाना हो रहा है। अठ्ठारह नवम्बर को दोपहर उनका ऑपरेशन हुआ। सफ़ल रहा, बकौल डाक्टर। [1] उन्नीस नवम्बर को सवेरे उनके पास जाने के लिये मैने नये पुल पर वाहन से जाने की बजाय ऐतिहासिक कर्जन ब्रिज से जाने का विकल्प चुना।

कर्जन ब्रिज वाहनों के लिये बन्द है। उसपर केवल साइड से दोपहिया वाहन आ-जा सकते हैं। मुख्य मार्ग पर ब्रिज के दोनो ओर बन्द गेट है और ताला लगा है। लोग उसपर सवेरे सैर के लिये आते जाते हैं।

सवेरे वहां पंहुचने का नियत समय मैने साढ़े छ रखा था, पर लगभग आधा घण्टा देर से पंहुचा। मेरे वाहन चालक मोहन ने मुझे तेलियरगंज की तरफ पुल के मुहाने पर छोड़ दिया और खुद दूसरी ओर मेरी पत्नीजी के साथ मेरी माता जी के पास चला गया अस्पताल। कर्जन ब्रिज के बन्द गेट के पास राजा भैया का एक बड़ा सा पोस्टर स्वागत कर रहा था। पूर्व में महाबीरपुरी की ओर रेलवे लाइन पार एक मन्दिर के पीछे सूर्य चमक रहे थे (यद्यपि मेरे स्मार्टफोन में मौसम कोहरे की घोषणा कर रहा था)। समय था – 7:02 बजे।

पुल पर घूमने वालों की संख्या भी बहुत नहीं थी। आस-पास के लोगों में सवेरे की सैर का बहुत चलन नहीं लगता। ब्रिज के दोनो ओर जिगजैग तरीके से चलते हुये दोनो ओर के चित्र लेने में मुझे असुविधा नहीं थी।

कर्जन ब्रिज का गूगल मैप।
कर्जन ब्रिज का गूगल मैप। नया रोड ब्रिज चन्द्रशेखर आजाद सेतु के नाम से जाना जाता है।

सम्भवत: नया सड़क पुल (चन्द्रशेखर आजाद सेतु) बनने के बाद कर्जन ब्रिज पर सड़क यातायात 1990 के आस पास बन्द हुआ था। उसके बाद रेल का नया पुल बना और रेल यातायात उसपर 26 अक्तूबर 1996 को शिफ्ट किया गया। सन् 1990 से 2006 तक यह पुल सड़क यातायात के लिये बन्द रहा। हिन्दुस्तान टाइम्स का नेट पर उपलब्ध एक पन्ना बताता है कि  जून 2006 में एक समारोह में उत्तरप्रदेश के मन्त्री उज्ज्वलरमण सिंह जी ने इसके जीर्णोद्धार के बाद पुन: इसे सड़क यातायात के लिये खोला एक समारोह में। पर कुछ ही साल सड़क यातायात चला होगा इसपर। मुझे याद है कि कुछ साल पहले मेरी कार इस पुल पर से गुजरी थी। पिछले डेढ़ साल से यह पुल पुन: बन्द दशा में है।

रेल-कम-रोड ब्रिज होने और रोड इसकी दूसरी मंजिल पर होने के कारण यह काफी ऊंचा हो जाता है। इसलिये साइकल पर पैडल मारते लोग इसपर नहीं दिखते। ऊंचाई के कारण कई लोगों को इसपर चलते नीचे गंगा नदी की ओर झांकने से झांईं छूटती होगी।

झांईं, आपको मालुम है झांईं क्या होता है? नहीं मालुम तो ऊंची अट्टालिका से नीचे झांक कर देखिये।

इलाहाबाद – फैजाबाद के लगभग 156 किलोमीटर सिंगल लाइन के लिये यह कर्जन ब्रिज 1901 में स्वीकृत हुआ। छ-सात साल में बन कर तैयार हुआ। एक किलोमीटर लम्बे इस ब्रिज में कुल 2181 फ़िट के 15 स्पान हैं। इसके खम्बे कम पानी के स्तर से 100फिट नीचे तक जाते हैं। पुल नदी की आधी चौड़ाई पर है। शेष आधा रास्ता दोनो तरफ़ जमीन के भराव से बना है। इस पर लगभग 9 दशक तक रेलगाड़ी चली। जैसा कि इण्टरनेट पर उपलब्ध जानकारी है; लोगों ने पी.आई.एल. लगाईं इसपर सड़क यातायात पुन चालू करने के लिये। किसी ढंग के प्रान्त का मामला होता या पर्यटन के प्रति जागरूक शहर होता तो इसकी आज जैसी उपेक्षित दशा न होती। और तो और इसपर सवेरे सैर करने वालों की अच्छी खासी भीड़ लगती। उस भीड़ पर आर्धारित कई दुकानें/कारोबार होते। पर यह जो है, सो है।

कर्जन ब्रिज की सड़क समतल और ठीक ठाक लगती है। दोनो ओर की रेलिंग मजबूत दशा में है। यद्यपि उसकी पेण्टिंग नहीं हुई है और ऐसा ही रहा तो कुछ ही सालों में जंग लगने से क्षरण बहुत हो जायेगा।

इलाहाबाद की ओर से इसपर चलने पर इसके और चन्द्रशेखर आजाद सेतु के बीच मुझे मन्दिर, घाट, घाट पर पड़ी ढेर सारी चौकियां और नदी के किनारे किनारे चलती पगडण्डियां दिखी। ऊपर से देखने पर दृष्य मनमोहक लगता है।  दाईं ओर रेल लाइन है। रेल पुल और इस ब्रिज के बीच झाड़ियां हैं। रेल ब्रिज शुरू होने पर सिगनल नजर आता है। उसके परे महाबीर पुरी की बस्ती है; जिसके बारे में मुझे बताया गया कि वह आधी तो रेलवे की जमीन दाब कर अवैध बसी है। टिपिकल यूपोरियन सिण्ड्रॉम!

रेल ब्रिज की तरफ़ मुझे गंगाजी के उथले पानी में मछली पकड़ने के लिये बड़े बड़े पाल डाले दिखे। इससे बहुत कम मेहनत में पकड़ी जाती है मछली। मल्लाहों की इक्का-दुक्का नावे ं भी इधर उधर हलचल कर रही थीं। मल्लाहों की दैनिक गतिविधि में बहुत विविधता है। अनेक प्रकार से वे मछली पकड़ते हैं। नदी के आर पार और धारा के अनुकूल-प्रतिकूल अनेक प्रकार का परिवहन करते हैं। उनके कार्य का प्रकार भी सीजन के अनुसार बदलता रहता है। इन्ही मल्लाहों की साल भर की गतिविधि पर बहुत रोचक दस्तावेज लिखा जा सकता है। उस देखने-लिखने के काम को भी अपनी विश लिस्ट में जोड़ लिया जाये। 🙂

अगहन का महीना है। इस समय नदी में पानी अधिक नहीं है। दिनों दिन कम भी हो रहा है। पुल के दोनो ओर मुझे ऐसा ही दिखा। बीच में उभरे द्वीप भी नजर आये। फाफामऊ की ओर दायीं ओर अधिक नावें, अधिक घाट, अधिक चौकियां दिखीं। फाफामऊ की ओर कछारी सब्जी की खेती भी दिखी। उनकी रखवाली को मड़ईयां भी थीं। कछारी खेतों में कई जगहों पर गोबर की खाद के ढेर थे बिखेरे हुए। सवेरे तो नहीं देखा, पर दिन में आते जाते दिखा कि फाफामऊ की ओर, महाबीर पुरी के सामने गंगापार लोग ट्रेक्टर से या पैदल भी अर्थियां भी ले जा कर गंगा किनारे दाह संस्कार कर रहे थे। अर्थात इलाहाबाद की ओर रसूलाबाद का श्मशान घाट है और दूसरी ओर यह महाबीर पुरी के अपोजिट वाला दाह स्थल। उसका नाम भी पता करना शेष है।

आधे रास्ते पुल पर चला था कि फाफामऊ की ओर से एक ट्रेन आती हुयी दिखी। दस डिब्बे की पैसेंजर ट्रेन। इस मार्ग पर मुख्य यातायात सवारी गाड़ियों का ही है। महीने में पच्चीस-तीस माल गाड़ियां – औसत एक मालगाड़ी प्रतिदिन गुजरती है इस मार्ग पर।

दो सज्जन फाफामऊ के छोर पर पुल पर दिखे| सिंथेटिक चटाई बिछाकर सूर्योदय निहारते ध्यान लगाने का अभ्यास करते। वे वास्तविक साधक कम विज्ञापनी छटा अधिक दे रहे थे। उनके नाइक-एडीडास छाप जूते किनारे पर थे। एक सज्जन अधिक चकर पकर ताक रहे थे। बीच में उन्होने अपने बालों पर कंघी भी फेरी। ध्यान लगाते हुये भी आने जाने वालों को दिखने वाले अपनी छवि के बारे में जागरूक थे वे।

फाफामऊ छोर पर पुल के शुरू में एक छोटा बन्दर किसी की बिखेरी लाई खाने में व्यस्त था। मेरे फोटो लेने से कुछ सशंकित हुआ। पर सतर्कता बरतते हुये भी लाई खाना जारी रखा। उसके आगे पुल के अन्त की सड़क पर एक दूसरा बड़ा बन्दर भी दिखा। मुझे लगा कि कहीं वह मेरी ओर न झपटे। पर वह रेलिंग से कूदा और तेज कदमों से पुल पार कर दूसरी ओर चला गया। मेरा वाहन कर्जन पुल के बन्द गेट के बाहर मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। मैने समय देखा – सवेरे के 7:35 बजे। मुझे आराम से चित्र लेते हुये पुल पार करने में 33 मिनट लगे थे। इस दौरान पुल पर पांच मोटर साइकलें और एक मॉपेड गुजरे थे। लगभग 5 मिनट में एक दुपहिया वाहन। साइकल वाला कोई नहीं था।

कुल मिला कर यातायात नगण्य़ है कर्जन पुल पर। फिर भी (या इस कारण से) इतिहास के साथ आधा घण्टा गुजारना, साथ चलना अच्छा लगा मुझे। उसका कुछ अंश शायद आप को भी लगे।

मैने जो चित्र लिये, उनका एक स्लाइड-शो नीचे लगा रहा हूं, कैप्शन्स के साथ।

——————–

[1] कालान्तर में अम्माजी को न्यूरोलॉजिकल समस्या हो गयी और वे वहीं अस्पताल में आई.सी.यू. में भर्ती हैं 20 नवम्बर से।

——————-

This slideshow requires JavaScript.