कर्जन ब्रिज से गंगा पार, पैदल


कर्जन ब्रिज का पहला स्पान दिख रहा है मोड़ पर।
कर्जन ब्रिज का पहला स्पान दिख रहा है मोड़ पर।

अपनी मां के कूल्हे की हड्डी के टूटने के बाद के उपचार के सम्बन्ध में नित्य फाफामऊ आना-जाना हो रहा है। अठ्ठारह नवम्बर को दोपहर उनका ऑपरेशन हुआ। सफ़ल रहा, बकौल डाक्टर। [1] उन्नीस नवम्बर को सवेरे उनके पास जाने के लिये मैने नये पुल पर वाहन से जाने की बजाय ऐतिहासिक कर्जन ब्रिज से जाने का विकल्प चुना।

कर्जन ब्रिज वाहनों के लिये बन्द है। उसपर केवल साइड से दोपहिया वाहन आ-जा सकते हैं। मुख्य मार्ग पर ब्रिज के दोनो ओर बन्द गेट है और ताला लगा है। लोग उसपर सवेरे सैर के लिये आते जाते हैं।

सवेरे वहां पंहुचने का नियत समय मैने साढ़े छ रखा था, पर लगभग आधा घण्टा देर से पंहुचा। मेरे वाहन चालक मोहन ने मुझे तेलियरगंज की तरफ पुल के मुहाने पर छोड़ दिया और खुद दूसरी ओर मेरी पत्नीजी के साथ मेरी माता जी के पास चला गया अस्पताल। कर्जन ब्रिज के बन्द गेट के पास राजा भैया का एक बड़ा सा पोस्टर स्वागत कर रहा था। पूर्व में महाबीरपुरी की ओर रेलवे लाइन पार एक मन्दिर के पीछे सूर्य चमक रहे थे (यद्यपि मेरे स्मार्टफोन में मौसम कोहरे की घोषणा कर रहा था)। समय था – 7:02 बजे।

पुल पर घूमने वालों की संख्या भी बहुत नहीं थी। आस-पास के लोगों में सवेरे की सैर का बहुत चलन नहीं लगता। ब्रिज के दोनो ओर जिगजैग तरीके से चलते हुये दोनो ओर के चित्र लेने में मुझे असुविधा नहीं थी।

कर्जन ब्रिज का गूगल मैप।
कर्जन ब्रिज का गूगल मैप। नया रोड ब्रिज चन्द्रशेखर आजाद सेतु के नाम से जाना जाता है।

सम्भवत: नया सड़क पुल (चन्द्रशेखर आजाद सेतु) बनने के बाद कर्जन ब्रिज पर सड़क यातायात 1990 के आस पास बन्द हुआ था। उसके बाद रेल का नया पुल बना और रेल यातायात उसपर 26 अक्तूबर 1996 को शिफ्ट किया गया। सन् 1990 से 2006 तक यह पुल सड़क यातायात के लिये बन्द रहा। हिन्दुस्तान टाइम्स का नेट पर उपलब्ध एक पन्ना बताता है कि  जून 2006 में एक समारोह में उत्तरप्रदेश के मन्त्री उज्ज्वलरमण सिंह जी ने इसके जीर्णोद्धार के बाद पुन: इसे सड़क यातायात के लिये खोला एक समारोह में। पर कुछ ही साल सड़क यातायात चला होगा इसपर। मुझे याद है कि कुछ साल पहले मेरी कार इस पुल पर से गुजरी थी। पिछले डेढ़ साल से यह पुल पुन: बन्द दशा में है।

रेल-कम-रोड ब्रिज होने और रोड इसकी दूसरी मंजिल पर होने के कारण यह काफी ऊंचा हो जाता है। इसलिये साइकल पर पैडल मारते लोग इसपर नहीं दिखते। ऊंचाई के कारण कई लोगों को इसपर चलते नीचे गंगा नदी की ओर झांकने से झांईं छूटती होगी।

झांईं, आपको मालुम है झांईं क्या होता है? नहीं मालुम तो ऊंची अट्टालिका से नीचे झांक कर देखिये।

इलाहाबाद – फैजाबाद के लगभग 156 किलोमीटर सिंगल लाइन के लिये यह कर्जन ब्रिज 1901 में स्वीकृत हुआ। छ-सात साल में बन कर तैयार हुआ। एक किलोमीटर लम्बे इस ब्रिज में कुल 2181 फ़िट के 15 स्पान हैं। इसके खम्बे कम पानी के स्तर से 100फिट नीचे तक जाते हैं। पुल नदी की आधी चौड़ाई पर है। शेष आधा रास्ता दोनो तरफ़ जमीन के भराव से बना है। इस पर लगभग 9 दशक तक रेलगाड़ी चली। जैसा कि इण्टरनेट पर उपलब्ध जानकारी है; लोगों ने पी.आई.एल. लगाईं इसपर सड़क यातायात पुन चालू करने के लिये। किसी ढंग के प्रान्त का मामला होता या पर्यटन के प्रति जागरूक शहर होता तो इसकी आज जैसी उपेक्षित दशा न होती। और तो और इसपर सवेरे सैर करने वालों की अच्छी खासी भीड़ लगती। उस भीड़ पर आर्धारित कई दुकानें/कारोबार होते। पर यह जो है, सो है।

कर्जन ब्रिज की सड़क समतल और ठीक ठाक लगती है। दोनो ओर की रेलिंग मजबूत दशा में है। यद्यपि उसकी पेण्टिंग नहीं हुई है और ऐसा ही रहा तो कुछ ही सालों में जंग लगने से क्षरण बहुत हो जायेगा।

इलाहाबाद की ओर से इसपर चलने पर इसके और चन्द्रशेखर आजाद सेतु के बीच मुझे मन्दिर, घाट, घाट पर पड़ी ढेर सारी चौकियां और नदी के किनारे किनारे चलती पगडण्डियां दिखी। ऊपर से देखने पर दृष्य मनमोहक लगता है।  दाईं ओर रेल लाइन है। रेल पुल और इस ब्रिज के बीच झाड़ियां हैं। रेल ब्रिज शुरू होने पर सिगनल नजर आता है। उसके परे महाबीर पुरी की बस्ती है; जिसके बारे में मुझे बताया गया कि वह आधी तो रेलवे की जमीन दाब कर अवैध बसी है। टिपिकल यूपोरियन सिण्ड्रॉम!

रेल ब्रिज की तरफ़ मुझे गंगाजी के उथले पानी में मछली पकड़ने के लिये बड़े बड़े पाल डाले दिखे। इससे बहुत कम मेहनत में पकड़ी जाती है मछली। मल्लाहों की इक्का-दुक्का नावे ं भी इधर उधर हलचल कर रही थीं। मल्लाहों की दैनिक गतिविधि में बहुत विविधता है। अनेक प्रकार से वे मछली पकड़ते हैं। नदी के आर पार और धारा के अनुकूल-प्रतिकूल अनेक प्रकार का परिवहन करते हैं। उनके कार्य का प्रकार भी सीजन के अनुसार बदलता रहता है। इन्ही मल्लाहों की साल भर की गतिविधि पर बहुत रोचक दस्तावेज लिखा जा सकता है। उस देखने-लिखने के काम को भी अपनी विश लिस्ट में जोड़ लिया जाये। 🙂

अगहन का महीना है। इस समय नदी में पानी अधिक नहीं है। दिनों दिन कम भी हो रहा है। पुल के दोनो ओर मुझे ऐसा ही दिखा। बीच में उभरे द्वीप भी नजर आये। फाफामऊ की ओर दायीं ओर अधिक नावें, अधिक घाट, अधिक चौकियां दिखीं। फाफामऊ की ओर कछारी सब्जी की खेती भी दिखी। उनकी रखवाली को मड़ईयां भी थीं। कछारी खेतों में कई जगहों पर गोबर की खाद के ढेर थे बिखेरे हुए। सवेरे तो नहीं देखा, पर दिन में आते जाते दिखा कि फाफामऊ की ओर, महाबीर पुरी के सामने गंगापार लोग ट्रेक्टर से या पैदल भी अर्थियां भी ले जा कर गंगा किनारे दाह संस्कार कर रहे थे। अर्थात इलाहाबाद की ओर रसूलाबाद का श्मशान घाट है और दूसरी ओर यह महाबीर पुरी के अपोजिट वाला दाह स्थल। उसका नाम भी पता करना शेष है।

आधे रास्ते पुल पर चला था कि फाफामऊ की ओर से एक ट्रेन आती हुयी दिखी। दस डिब्बे की पैसेंजर ट्रेन। इस मार्ग पर मुख्य यातायात सवारी गाड़ियों का ही है। महीने में पच्चीस-तीस माल गाड़ियां – औसत एक मालगाड़ी प्रतिदिन गुजरती है इस मार्ग पर।

दो सज्जन फाफामऊ के छोर पर पुल पर दिखे| सिंथेटिक चटाई बिछाकर सूर्योदय निहारते ध्यान लगाने का अभ्यास करते। वे वास्तविक साधक कम विज्ञापनी छटा अधिक दे रहे थे। उनके नाइक-एडीडास छाप जूते किनारे पर थे। एक सज्जन अधिक चकर पकर ताक रहे थे। बीच में उन्होने अपने बालों पर कंघी भी फेरी। ध्यान लगाते हुये भी आने जाने वालों को दिखने वाले अपनी छवि के बारे में जागरूक थे वे।

फाफामऊ छोर पर पुल के शुरू में एक छोटा बन्दर किसी की बिखेरी लाई खाने में व्यस्त था। मेरे फोटो लेने से कुछ सशंकित हुआ। पर सतर्कता बरतते हुये भी लाई खाना जारी रखा। उसके आगे पुल के अन्त की सड़क पर एक दूसरा बड़ा बन्दर भी दिखा। मुझे लगा कि कहीं वह मेरी ओर न झपटे। पर वह रेलिंग से कूदा और तेज कदमों से पुल पार कर दूसरी ओर चला गया। मेरा वाहन कर्जन पुल के बन्द गेट के बाहर मेरी प्रतीक्षा कर रहा था। मैने समय देखा – सवेरे के 7:35 बजे। मुझे आराम से चित्र लेते हुये पुल पार करने में 33 मिनट लगे थे। इस दौरान पुल पर पांच मोटर साइकलें और एक मॉपेड गुजरे थे। लगभग 5 मिनट में एक दुपहिया वाहन। साइकल वाला कोई नहीं था।

कुल मिला कर यातायात नगण्य़ है कर्जन पुल पर। फिर भी (या इस कारण से) इतिहास के साथ आधा घण्टा गुजारना, साथ चलना अच्छा लगा मुझे। उसका कुछ अंश शायद आप को भी लगे।

मैने जो चित्र लिये, उनका एक स्लाइड-शो नीचे लगा रहा हूं, कैप्शन्स के साथ।

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[1] कालान्तर में अम्माजी को न्यूरोलॉजिकल समस्या हो गयी और वे वहीं अस्पताल में आई.सी.यू. में भर्ती हैं 20 नवम्बर से।

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"खाइ भरे के पाई ग हई (खाने भर को मिल गया है)"


चार दिन पहले गंगा उफन रही थीं। बहाव तेज था और बहुत सी जलकुम्भी बह कर आ रही थी। बढ़ती गंगा में आसपास के ताल तलैयों, नहरों नालों की जलकुम्भी बह कर आने लगती है। वैसा ही था। खबरें भी थीं गंगा और उत्तर की अन्य कई नदियों में उफान की।

किनारे एक धतूरे का पौधा बारिश में नवजीवन पा लहलहा रहा था। कई फूल लगे थे। वह जलधारा के इतना करीब था कि मुझे लगा वह व्यर्थ लहलहा रहा है – यह नहीं जानता कि दो दिनों में गंगा उसे जलमग्न कर लेंगी।

पर मैं कितना गलत था। गंगा में उफान रुक गया। जिस दशा में उस दिन देखा था, आज लगभग उसी दशा में; या उससे कुछ कम फैलाव लिये थीँ। वह धतूरा अपनी जगह पर उसी अन्दाज में लहलहा रहा था।

धतूरे का फूल - सांझ के धुंधलके में
धतूरे का फूल – सांझ के धुंधलके में

दूर लगभग एक रेखा की तरह गंगा के बीच एक टापू बचा था। अगर बढ़ी होतीं तो वह जलमग्न हो गया होता। किनारे से लगभग 250-300 मीटर दूर थी वह टापू की रेखा। संझा का समय था। धुन्धलका हो रहा था। उस रेखा पर एक व्यक्ति कन्धे पर एक सफेद बोरी लिये चल रहा था। जहां वह टापू खत्म हुआ तो वह जल में भी उसी अन्दाज में चलता रहा। काफी दूर आगे चलने के बाद वह किनारे आने के लिये नब्बे अंश के कोण पर मुड़ा। अभी उसके कमर तक पानी था। थोड़ी ही देर में उसके सीने और गरदन तक पानी आ गया। वह उसी आत्मविश्वास से और तेज चाल से चल रहा था। चल वह रहा था, पर डर मुझे लग रहा था कि कहीं बैलेंस न बिगड़े और वह डूब जाये।

कन्धे पर सफेद बोरी लिये वह तट के पास आ गया।
कन्धे पर सफेद बोरी लिये वह तट के पास आ गया।

पर वह दक्ष था गंगा की गहराई की जानकारी के बारे में। थोड़ी ही देर में किनारे आ गया। बोरी जमीन पर रखी तो कई अन्य शाम की कछार सैर वाले उसके पास हो आये। एक ने पूछा – कितनी पाये?

मछेरा था वह। बदन से पानी झटकते हुये वह बोला – खाइ भरे के पाई ग हई (खाने भर को मिल गयी हैं)। फिर बोरी में से एक छोटी बोरी निकाल कर दिखाई। उसके आकार से लग रहा था कि तीन किलो तक तो रही होगी। उत्सुक ग्राहकों में से एक ने पूछा – कौन सी है?

मछली के खरीददारों को पोटली दिखाता मछेरा
मछली के खरीददारों को पोटली दिखाता मछेरा

उसने उत्तर नहीं दिया। बोरी कछार की रेत में रख कर गंगाजी में फिर हिल गया वह – और स्नान करने लगा। ग्राहकों में से एक दो हटे पर कुछ खड़े रहे। मुझे मछली खरीदने में दिलचस्पी नहीं थी, सो अन्धेरा होते देख चल दिया घर जाने के लिये।

बोरी किनारे रख, वह फिर गंगा में हिल गया, नहाने के लिये।
बोरी किनारे रख, वह फिर गंगा में हिल गया, नहाने के लिये।

उस मछेरे को मैं पहचानता हूं। डेढ़ महीना पहले अपनी पत्नी-बच्चों के साथ उसे टापू पर सब्जियां उगाने के लिये जाते देखता रहा हूं। एक बार अपनी छोटी बच्ची को टापू से किनारे छोड़ कर वापस जाते देखा थ मैने। बच्ची रोने लगी थी तो जेब से दो रुपये निकाल कर उसे बिस्कुट खाने के लिये भी दिये थे। सब्जियाँ उगाने का काम गंगाजी के घटने बढ़ने से फेल हो गया था। आज उसे मछली पकड़ कर लाते देखा। कुल मिला कर उसकी जिन्दगी गंगा पर ही आर्धारित है। गंगा पालित है वह। गंगा जी का बेटा।

फिर कभी दिखा तो उससे पूछूंगा कि गंगा नदी को किस भाव से देखता है?

भाव से देखना – मेरी पत्नीजी कहेंगी इस तरह से भाव से देखना-फेंखना टाइप सवाल तुम ही कर सकते हो। लोग भाव-फाव नहीं रखते, गंगा को बस गंगा की तरह लेते हैं वे, बस।

हो सकता है, एसा हो। पर ऐसे लोगों को कभी कभी मैने इतनी आश्चर्यजनक बातें करते भी देखा है मैने कि मुझे यकीन है दार्शनिकता अर्बन एलीट के बाप की जागीर नहीं है। कत्तई नहीं!

राधेश्याम पटेल; ऊंटवाला


कछार में ऊंट
कछार में ऊंट

दूर ऊंट जा रहा था। साथ में था ऊंटवाला। मैने पण्डाजी से पूछा – यह किस लिये जा रहा है ऊंट? इस समय तो कछार में लादने के लिये कुछ है नहीं। सब्जियां तो खत्म हो चली हैं।

“वह एक कुनबी का ऊंट है। घास छीलने जा रहा होगा वह। एक दो घण्टा घास इकठ्ठा करेगा। फिर ऊंट पर लाद कर ले जायेगा। उसकी बीवी भी है साथ में। दोनो छीलेंगे। रोज ऐसा करते हैं। ऊंट को खाने के लिये तो चाहिये…” पण्डाजी ने बताया।

अच्छा, तो जरा उसे देख आऊं। ऊंटवाला रमबगिया के पास रुक गया था। उसकी पत्नी घास का निरीक्षण करने लगी थी और वह ऊंट को बांधने की जगह तलाश रहा था।

मैने उसके पास पंहुच कर वार्तालाप खोला – क्या लादने जा रहे हैं ऊंट पर?

लादेंगे क्या? खेती खतम! काम खतम!

तब?

घास छील कर ले जायेंगे। यह ऊंट है। और भैंसे हैं, गाय हैं; उनके लिये चाहिये।

कितने गोरू हैं?

चार भैसें हैं दो गायें। परसाल दो भैसें, एक गाय और सात रोज की एक बछिया कोई खोल ले गया था। बड़ा नुक्सान हुआ। समझो कि एक लाख से ज्यादा का नुक्सान। उसने स्वत: बताया।

अच्छा, इस ऊंट को क्या नाम से बुलाते हो?

राधेश्याम पटेल और उनका ऊंट
राधेश्याम पटेल और उनका ऊंट

ऊंट का क्या नाम?! बस ऊंट है। सात साल पहले बच्चा था, तब खरीदा था मेले में। बहुत भोला भाला है। सो भोला कहता हूं।

अब काम क्या मिलेगा ऊंट को?

अब क्या काम?! ऐसे ही रहेगा। कछार में जब खेती फिर शुरू होगी, तब काम मिलेगा। समझो तो कुआर-कातिक से।

चलिये, जरा ऊंट की आपके साथ फोटो खींच लूं?

आऊ रे! तोर फ़ोटो खेंचाये। ऊटवाले ने ऊंट की नकेल खींच कर अपने पास किया। फिर दोनो नें एक दो पोज दिये।

मैने चलते चलते ऊंटवाले का नाम पूंछा। बताया – राधेश्याम पटेल।

राधेश्याम पटेल ऊंटवाला। 

[बोधिसत्व ने कहा कि शब्द होना चाहिये उंटहारा। शब्दकोष न ऊंटवाला दिखाता है, न उंटहारा। वह ऊंटवान दर्शित करता है।]

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आउ, आउ; जल्दी आउ!


वह सामान्यत: अपने सब्जी के खेत में काम करता दीखता है गंगाजी के किनारे। मेहनती है। उसी को सबसे पहले काम में लगते देखता हूं।

दशमी के दिन वह खेत में काम करने के बजाय पानी में हिल कर खड़ा था। पैण्ट उतार कर, मात्र नेकर और कमीज पहने। नदी की धारा में कुछ नारियल, पॉलीथीन की पन्नियों में पूजा सामग्री और फूल बह कर जा रहे थे। उसने उनके आने की दिशा में अपने आप को पोजीशन कर रखा था।

लोग नवरात्रि के पश्चात पूजा में रखे नारियल और पूजा सामग्री दशमी के दिन सवेरे विसर्जित करते हैं गंगाजी में। वह वही विसर्जित नारियल पकड़ने के लिये उद्यम कर रहा था।

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एक नारियल उसने लपक कर पकड़ा। फिर उसे हिला-बजा कर देखा। नारियल की क्वालिटी से संतुष्ट लगा वह। कुछ देर बाद बहते पॉलीथीन के पैकेट को पकड़ा उसने। पन्नी खोल कर नारियल देखा। ठीक नहीं लगा वह। सो पन्नी में रख कर ही वापस नदी में उछाल दिया उसने।

नारियल विषयक पुरानी पोस्टें –

हीरालाल की नारियल साधना

पकल्ले बे, नरियर

मै करीब सौ कदम दूर खड़ा था उससे – गंगा तट पर। जोर से चिल्ला कर पूछा  – हाथ लगा नारियल?

हां, कह कर उसने हाथ ऊपर उठा कर नारियल दिखाया मुझे। फिर वह आती नदी की धारा में ध्यान केन्द्रित करने लगा। कुछ दूर दो नारियल बहते आ रहे थे। उसको अपनी बेताबी के मुकाबले बहाव धीमा लगा नदी का।

जैसे हाथ हिला हिला कर किसी को बुलाया जाता है; वैसा ही वह धारा की दिशा में हाथ हिला कर कहने लगा – आउ, आउ; जल्दी आउ! (आओ, आओ, जल्दी आओ!)

सवेरे का आनन्ददायक समय, गंगा की धारा और नारियल का मुफ्त में हाथ लगने वाला खजाना – सब मिल कर उस तीस पैंतीस साल के आदमी में बचपना उभार रहे थे। मैं भी बहती धारा की चाल निहारता सोच रहा था कि जरा जल्दी ही पंहुचें नारियल उस व्यक्ति तक!

आउ, आउ; जल्दी आउ! (आओ, आओ, जल्दी आओ!)

जल्दी आओ नारियल!

माई, बुड़ि जाब!


सूरज की पानी में परछाई से गुजर रहा है बच्चा!
सूरज की पानी में परछाई से गुजर रहा है बच्चा!

सात आठ लोगों का समूह था। अपना सामान लिये गंगा में उभर आये टापू पर सब्जियाँ उगाने के काम के लिये निकला था घर से। एक रास्ता पानी में तय कर लिया था उन्होने जिसे पानी में हिल कर पैदल चलते हुये पार किया जा सकता था। यह सुनिश्चित करने के लिये कि एक ही रास्ते पर चलें; एक ही सीध में एक के पीछे एक चल रहे थे वे। सब की रफ्तार में अंतर होने के कारण एक से दूसरे के बीच दूरी अलग अलग थी।

सब से आगे एक आदमी था। उसके पीछे दो औरतें। उसके बाद एक बच्चा। बच्चा इतना छोटा नहीं था कि पार न कर सकता गंगा के प्रवाह को। पर था वह बच्चा ही। डर रहा था। उसकी मां उससे आगे थी और शायद मन में आश्वस्त थी कि वह पार कर लेगा; अन्यथा उसके आगे वह काफी दूर न निकल जाती। इतना धीरे चलती कि वह ज्यादा दूर न रहे।

बच्चा डरने के कारण बहुत बोल रहा था, और इतने ऊंचे स्वर में कि मुझे दूर होने पर भी सुनाई पड़ रहा था। मां भी उसी तरह ऊंची आवाज में जवाब दे रही थी।

माई, पानी बढ़त बा! (माँ, पानी बढ़ रहा है!)

कछु न होये, सोझे चला चलु। (कुछ नहीं होगा, सीधे चला चल)। 

पनिया ढेर लागत बा। (पानी ज्यादा लग रहा है।) 

न मरबे। (मरेगा नहीं तू।) 

अरे नाहीं! माई डर लागत बा। बुडि जाब। (अरे नहीं माँ, डर लग रहा है। डूब जाऊंगा।) 

न मरबे! चला आऊ! (नहीं मरेगा; चला आ।) 

आगे का आदमी और स्त्री टापू पर पंहुच चुके थे। लड़का एक जगह ठिठका हुआ था। मां को यकीन था कि वह चला आयेगा। टापू पर पंहुच कर उसने पीछे मुड़ कर लड़के की ओर देखा भी नहीं। धीरे धीरे लड़का गंगा नदी पार कर टापू पर पंहुच गया। उनकी गोल के अन्य भी एक एक कर टापू पर पंहुच गये।

नेपथ्य में सूर्योदय हो रहा था। हो चुका था। लड़के को सूरज की झिलमिलाती परछाईं पार कर आगे बढ़ते और टापू पर पंहुचते मैने देखा। … अगले सीजन तक यह लड़का दक्ष हो जायेगा और शेखी बघारेगा अपने से छोटों पर। गंगा पार होना उसने सीख लिया। ऐसे ही जिन्दगी की हर समस्या पार होना सीख जायेगा।

माई डर लागत बा। बुडि जाब। (माँ, डर लग रहा है। डूब जाऊंगा।) 

न मरबे! चला आऊ! (नहीं मरेगा; चला आ।) 

नदी पार करते लोग।
नदी पार करते लोग।

खरपतवार का सौन्दर्य


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आज सवेरे गंगा किनारे बादल थे। मनोरम दृष्य। हवा मंद बह रही थी। नावें किनारे लगी थी। मांझी नैया गंगा किनारे।

पर आज को छोड़ कर पिछले एक महीने से गंगाजी के कछार में सवेरे मौसम खुला रहता था। कोहरे का नामोनिशान नहीं। क्षितिज पर न बादल और न धुंध।

सूर्योदय आजकल साफ और चटक दिखता है। सवेरे की रोशनी में वनस्पति, पक्षी और लोग तम्बई चमक से सुन्दर लगते हैं। जैसे जैसे सूरज आसमान में ऊपर उठाते हैं, तम्बई रंग सोने के रंग में बदलने लगता है। यह सारा खेल आधा पौना घंटे का होता है।

_conv_March191_0इस समय सभी वनस्पति- चाहे वह कछार की बोई सब्जियाँ हों, या रेत में बेतरतीब उग आये खतपतवार, सभी अत्यन्त सुंदर प्रतीत होते हैं।

पहले मैं सब्जियों के चित्र लेने में रूचि लेता था। सब्जियाँ, मडई, क्यारी सींचते कर्मी, पानी और खाद देने के उपक्रम आदि को ध्यान से देखता था। उनपर अनेक पोस्टें हैं ब्लॉग पर।

मेरे पास उपयुक्त कैमरा नहीं था, खरपतवार का सौन्दर्य चित्र में लेने के लिए। केवल सात मेगापिक्सल का कैमरा था। अब16 मेगापिक्सल वाला हो जाने से चित्र लगता है कुछ बेहतर आते हैं। अत: खरपतवार के चित्र लेने का प्रयास करने लगा हूँ।

इसमे से कुछ चित्र ओस की बूंदों को झलकाते पौधों के भी हैं। पौधों की पत्तियों पर लगे मकड़ी के जालों पर जमा ओस की बूंदों का अपना अलग प्रकार का सौन्दर्य है!

आप चित्र देखें। मोबाइल से चित्र अपलोड करने में झंझट रहा। जो अन्तत: “लैपटॉप शरणम् गच्छ” से ठीक हुआ!
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