श्री बालकृष्णदास “व्यास” से एक और मुलाकात


आज योगेश्वरानन्द आश्रम के बाहर मैं और राजन भाई थे। बालकृष्णदास व्यास जी अपने कक्ष से बाहर निकल आये। शायद आहट से। उनसे बातचीत होने लगी। इधर उधर की बातचीत से प्रारम्भ हुई और मेरी पिछली पोस्ट के माध्यम से बालकृष्णदास व्यास जी के परिचय पर आ गयी। उन्होने अपने विषय में जो कुछ बताया, उसको ले कर कोई बायोग्रफ़र या कोई उपन्यासकार एक दमदार कृति लिख सकता है। पर असल बात यह है कि मैं न लेखक हूं, न बायोग्राफ़र और न उपन्यासकार। मैं एक ब्लॉगर हूं, जो अपने परिवेश से कुछ चिन्दियां चुनता है; साथ में एक दो फोटो सटाता है और प्रस्तुत कर देता है।


मैं योगेश्वरानन्द आश्रम जाता क्यों हूं? एक – वहां गंगा तट है। दो – सवेरे की सैर/साइकलिंग के लिये वह सही दूरी पर है। भगवानपुर-करहर-गड़ौली होते हुये वहां जाने-आने में आठ-नौ किलोमीटर की साइकलिंग होती है। तीन – यह स्वीकर करना शायद कठिन हो; बालकृष्णदास व्यास (आश्रम में रहने वाले एकान्तवासी साधक/कवि) को लेकर एक कौतूहल है।


बालकृष्णदास व्यास जी जो कुछ लिख या रच रहे हैं, उसके परिचय के लिये विस्तृत लेख की जरूरत है। वह लेखन समय मांगता है। इसके अलावा बालकृष्ण जी के महाकाव्य को डिजिटल फार्म में लाने के लिये गहन रूप से कई मैन-डेज़ का इनपुट चाहिये। मैं उनसे इस विषय में कहता हूं तो वे लैपटॉप की अनुपलब्धता की बात करते हैं। उनका कहना है कि वे ऐसे लोगों के सम्पर्क में हैं जो काव्य की-इन कर सकें।

मैं सोचता हूं कि अपना एक लैपटॉप उन्हे उपलब्ध करा दूं। पर उसमें मेरा इतना डाटा, इतना अटाला पड़ा है कि पहले उसे साफ़ करना होगा। … बालकृष्णदास व्यास जी से मिलना मेरी रिटायर्ड जिन्दगी के आराम में खलल न डाल दे! 😆

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आश्रम के बाहर प्रारम्भ हुयी बालकृष्णदास व्यास जी से बातचीत।

बहुत कुछ बताया अपने विषय में बालकृष्णदास व्यास जी ने। उन्होने कहा कि उनकी अवस्था लगभग 35 वर्ष की है। इस 35 वर्ष की अवस्था में क्या जबरदस्त उतार-चढ़ाव हैं उनके जीवन में! उनके माता-पिता बबीना के पास के हैं। बबीना ऑर्डीनेन्स डीपो के द्वारा उनके पिता की लगभग 150बीघा जमीन अधिगृहीत की गयी। उसके मुआवजे से परिवार बहुत सम्पन्न हो गया। उनकी मां के पास 5 किलो सोना था स्त्री-धन के रूप में। पर बुन्देलखण्ड में सम्पन्नता सहेज कर रखना सरल नहीं है। डाका पड़ा और परिवार अति सम्पन्न से अति विपन्न की दशा में आ गया।

जीवन के प्रारम्भ में उन्होने विपन्नता देखी। घोर विपन्नता। फिर परिवार का पालन-प्रबन्धन का समय आया। उसके बाद बालकृष्णदास व्यास जी ने घर छोड़ कर अनेक स्थानों पर, अनेक गुरु-साधुओं के साथ समय व्यतीत किया। हरिद्वार से ले कर अहमदाबाद तक। अहमदाबाद में आशाराम बापू के साथ भी रहे। मैने कहा – क्या इस विषय में अपने ब्लॉग पर लिख दूं? 

बात वही समाप्त! विवाद क्या बढ़ाया जाए। 

आशाराम या अन्य संतों के साथ जो समय बालकृष्णदास व्यास जी ने गुजारा उसपर विधिवत सामग्री अपने आप में एक रोचक (और महत्वपूर्ण) दस्तावेज होगी। कभी शायद कोई व्यक्ति, या स्वयम वे लिखें। पर जो भी वे बता रहे थे आश्रम के बरगद की छाया में या फिर अपने कक्ष में, वह मोहक था। मेरे साथ गये राजन भाई शायद वापस लौटने की उकताहट दिखा रहे थे, पर मैं उन्हे सुनता जा रहा था।

व्यास जी ने अपने कृतित्व के बारे में बताया। शंकर-पार्वती संवाद से (उसी प्रकार जिस प्रकार रामचरित मानस) गुंथी है यह कथा। उसकी भाषा तुलसी के मानस का बेस तो लेती है, पर उसमें कालान्तर में आये शब्द और प्रयोग निसंकोच हैं। इस बारे में बालकृष्णदास जी की मौलिकता है। ग्रन्थ के कथ्य पर ज्यादा नहीं कहूंगा, सिवाय इसके कि वह रोचक लगता है। मेरे पास वहां बैठने का ज्यादा समय होता तो निश्चय ही और भी सुनना अच्छा लगता। उससे भी ज्यादा समय हो तो उस ग्रन्थ को उलटने/पलटने/पढ़ने और उसपर लिखने का प्रयास करता; बावजूद इसके कि मेरा पठन का बैकलॉग पहले ही बहुत ज्यादा है। कथ्य में वर्तमान सामाजिक/रजनैतिक दशा पर पर्याप्त सोच है और मेधा के प्रत्येक स्तर के व्यक्ति को उसमें कुछ न कुछ मिलेगा जो उसे रुचेगा या प्रेरणा देगा। … आखिर किसी ग्रन्थ की उपयोगिता का यही तो सबसे महत्वपूर्ण पैमाना होता है! नहीं?


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आश्रम में मेटी ले कर आया कुम्हार।

वहां आश्रम में एक कुम्हार एक मेटी (छोटा घड़ा) ले कर आया है बालकृष्णदास जी के लिये। उसी कुम्हार को मैं पचास रुपये देता हूं कि मेरे लिये वह घड़ा ला कर दे।

घड़ा लेने जाने को एक चक्कर वहां अवश्य लगेगा। एक और मुलाकात व्यास जी से होना नियत है ही।

शायद उन्हे घर पर भी बुलायें मेरी पत्नीजी। जितना मैने अपनी पत्नीजी को बताया है, या ब्लॉग पर उन्होने पढ़ा है; उनके मन में भी कौतूहल तो है ही।

अत: भविष्य में भी ब्लॉग पर व्यास जी के संदर्भ में कुछ न कुछ रहेगा!


 

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भूसा और खबर


सवेरे साइकिल-सैर में जाते हुये पाया था कि उस खेत में थ्रेशिंग के बाद गेंहूं वहां से हटाया जा चुका था। भूसा भी एक ट्रेक्टर-ट्रॉली में ट्रॉली की ऊंचाई तक लादा जा चुका था। बाकी बचा अधिकांश भूसा झाल (पुरानी धोती-साड़ी के बोरों) में इकठ्ठा कर दिया गया था। चहल पहल थी वहां। लग रहा था कि कुछ ही देर में ये बोरे भी लद जायेंगे ट्रेक्टर ट्रॉली पर और खेत खाली हो जायेगा।

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सवेरे साइकिल सैर जाते समय देखा। … लग रहा था कि कुछ ही देर में ये बोरे भी लद जायेंगे ट्रेक्टर ट्रॉली पर और खेत खाली हो जायेगा।

वापस लौटने में लगभग पौना घण्टा लगा। मुझे अपेक्षा नहीं थी कि खेत में होंगे वे सब लोग। पर वे वहीं मिले। झाल लद गये थे। उनके ऊपर ट्रॉली पर एक व्यक्ति लेटा था। दो स्त्रियां जमीन पर बिखरा भूसा बटोर रही थीं। शायद वह भी ट्रॉली पर लादा जाने वाला हो। कुछ लोग और भी आस-पास थे। मैं चित्र लेने लगा। राजन भाई ने पूछा – भूसा क्या भाव बेंचोगे? 

“बेचने के लिये नहीं है। घर के इस्तेमाल के लिये हैं।” – ट्रॉली पर लेटा व्यक्ति बोला।

मेरे चित्र लेने पर उसने कहा – फोटो काहे ले रहे हैं?

बस अच्छा लग रहा है यह सब। इस लिये ले रहा हूं।

“हम सोचे न्यूज वाले होंगे आप।”

न्यूज वाला तो नहीं हूं, पर न्यूज के नाम पर आपके पास कुछ है?

वह लेटी मुद्रा से बैठी मुद्रा में आ गया, जिससे कि उसका चित्र बेहतर आ सके। बोला, न्यूज तो यही है कि गेंहू बम्पर हुआ है। बड़ी अच्छी फसल।

अच्छा, कितनी हुई होगी एक बीघा में?

आप समझो कि अमूमन 8 क्विण्टल गेहूं होता था एक बीघा में। इस बार 12-13 क्विण्टल हुआ है। और दाने भी बढ़िया हैं। 

मुझे लगा कि सही में उसने न्यूज दिया है मुझे। यद्यपि मुझे उसका न्यूज़ वालों के प्रति “भक्ति-भाव” जमा नहीं। अभी गांव-देहात में अखबार और टीवी की लार्जर-देन-लाइफ़ इज्जत बरकरार है। इन लोगों को नहीं मालुम कि तथाकथित चौथे खम्भे का इण्टरनेट और सोशल मीडिया ने बधियाकरण कर दिया है। अलाने-फलाने अखबार के स्क्राइब से एक खुर्राट ब्लॉगर कहीं ज्यादा दमदार है। पत्रकार ब्लॉगर बन रहे हैं। फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से अपनी साख बचाये रखने की जद्दोजहद में लगे हैं। अखबार वाले अपनी बिक्री की चिन्ता में मरे-घुले जा रहे हैं। ये चौथे खम्भे वाले अपने रसूख के बल पर जो भ्रष्टाचार कर पा रहे थे, वह तेजी से अतीत होता जा रहा है। …. पर इस भूसा की ट्रॉली पर अधलेटे जमींदार को पता ही नहीं यह सब।

क्या करूं? मीडिया और चौथे खम्भे की दशा-दुर्दशा पर उससे चर्चा करूं? मुझे लगा कि वह बेकार होगा। अगले 5-7 साल में यह जवान समझ जायेगा कि इस देश में ओपीनियन मोल्ड करने की ताकत अखबार और टीवी में नहीं रहेगी। ये दोनो माध्यम रोज यही तलाशेंगे कि कौन हैशटैग, कौन वीडियो, कौन ट्वीट वाइरल हो रहा है सोशल मीडिया पर। ये सब सोशल मीडिया पर रियेक्ट भर करेंगे। सोशल मीडिया को ड्राइव करना इनके बूते से बाहर हो जायेगा, और जा रहा भी है।

खैर, मैं जानता हूं कि गांव में अभी यह सब कहना अटपटा होगा। बहुत कुछ वैसा ही अटपटा कि कोई गांव प्रधान, थानेदार, तहसीलदार और जिला मजिस्ट्रेट को प्रजातंत्र और प्रशासन का सबसे छोटा मोहरा बताये।

समय बदलेगा।

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समय बदलेगा!

बरसी का भोज और तिरानबे के पांड़े जी से मुलाकात


मैं बरसी  का कार्यक्रम अटेण्ड करने गया था। अनुराग पाण्डेय बुलाने आये थे। अनुराग से मैं पहले नहीं मिला था। उनके ताऊ जी का देहावसान हुआ था साल भर पहले। आज बरसी  थी। भोज का निमन्त्रण था।

मैं सामान्यत: असामाजिक व्यक्ति हूं। मेरी पत्नीजी (गांव में बसने के बाद) काफी समय से कह रही हैं कि अपना नजरिया बदलूं मैं। आज भी लगी रहीं कि अनुराग के यहां चला जाऊं। शाम होते होते दो तीन बार कहा। संयोग से अशोक (मेरा वाहन चालक) भी आ गया था। अत: मेरे पास कोई बहाना नहीं बचा, न जाने का।

अच्छा किया जो वहां गया। वे पाण्डेय लोग मूलत: इस गांव के नहीं हैं। पिछली शती के प्रारम्भ में वे नवासे में (विवाह में बेटी-दामाद को गांव में बसाने का उपक्रम) यहां आये। आये हुये एक परिवार से अब तीन-चार घर हो गये हैं। अधिकतर लोग कलकत्ता,बंगलोर, बम्बई, दिल्ली आदि जगह पर रहते हैं। संतोष पांडेय (जिनके पिताजी की बरसी थी) भी बाहर ही रहते हैं। बरसी के लिये गांव आये थे। दिलीप मिले। वे मुझसे पहले वाराणसी में मिल चुके हैं, जब मैं वाराणसी रेल मण्डल में अपर मण्डल रेल प्रबन्धक था। दैनिक जागरण में कार्य करते हैं। गांव से ही आते जाते हैं। अपने घर में निर्माण कार्य करा रहे हैं। वे इस बात से प्रसन्न हैं कि पास में वारणसी-हंड़िया हाईवे छ लेन का होने जा रहा है। रेल लाइन का भी दोहरीकरण और विद्युतीकरण हो रहा है। सन 2019 तक यह सब हो जायेगा। तब यातायात के इतने साधन हो जायेंगे कि बनारस शहर की बसावट यहां जगह खोजने लगेगी।

अभी भी दिलीप को अपनी मोटर साइकलसे बनारस रोज आना-जाना खलता नहीं। “जो भी यातायात की रुकावट है, मोहन सराय और बनारस कैण्ट के बीच ही है; गांव से मोहन सराय तो आधा घण्टा भर लगता है।”

रमाशंकर पाण्डेय जी मिले। वे कलकत्ता में प्लाई का व्यवसाय करते हैं। साल में दो-तीन बार गांव आते जाते हैं। यहां अपने रहने की पुख्ता व्यवस्था बना रखी है। एक कमरे में किचनेट भी है। गैस चूल्हा, बर्तन और भोजन सामग्री; सब। वे बहुत प्रसन्न थे मेरे विषय में – “गांव में एक और पांड़े बढ़े!” कलकत्ता में रहते हुये मेरा फ़ेसबुक पर लिखा बहुत चाव से पढ़ते हैं।

वैसे इस गांव से सम्बद्ध लगभग 50-60 लोग, जो अलग अलग स्थानों पर हैं; मेरे लेखन से जुड़ाव पाते हैं। इस माध्यम से गांव से उनकी कनेक्टिविटी बनी रहती है।

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श्री मदन मोहन पांडेय, उम्र 93 साल।

खैर, असल प्रसन्नता मुझे तिरानबे साल के मदन मोहन पाण्डेय जी से मिल कर हुई। वे अभी भी अच्छी सेहत में हैं। बिना चश्मे के पढ़ लेते हैं। उनकी आवाज में कोई शिथिलता नहीं। अलबत्ता; अब चलने में कुछ दिक्कत होने लगी है। ज्यादा चलने पर कमर दोहरी होने लगती है।

अपनी जवानी में वे मुगदर भांजते थे। नाल उठाते थे। एक कोने में पड़ी नाल भी देखी मैने। उस पर उनका नाम भी खुदा है। मैने उनका चरण स्पर्श किया और कहा कि उनके पास आया करूंगा। गांव का पुराना इतिहास उनसे बेहतर कौन बता सकेगा?

चलते समय उन्होने पुरानी बात बताई – “गांव में उस समय मोटा अनाज ही होता था। जवा, बैर्रा। कोई मेहमान आता था तो सब खुश होते थे कि गेंहू खाने को मिलेगा। … भोज आदि में हर घर में एक एक धरा (4 सेर) अनाज पिसता था जांत पर। उसको जुटा कर भोज की पूड़ी बनती थी”। 

मदन मोहन जी को चरण स्पर्श कर लौटा तो मन में यह संकल्प था कि कागज कलम ले कर उन्के पास गांव के अतीत के नोट्स अवश्य लूंगा। क्या पता, वह नोट्स ही मुझे जानदार रचनाकार बना दें। न भी बनायें, तो भी, ब्लॉगरधर्मिता का तो निर्वहन होगा! 

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नाल, जो मदन मोहन जी उठाते थे। हाथ सिर के ऊपर ले जा कर बताया कि इसे उठा कर ऊपर तक ले जाते थे वे। इस पर उनका नाम भी खुदा है।

मानिक सेठ और कस्बे में कैशलेस


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माणिक सेठ, महराजगंज, जिला भदोही के दुकानदार 

मानिक सेठ की महराजगंज, जिला भदोही में किराने की दुकान है। नोटबन्दी के बाद उनकी पहली दुकान थी, जहां मैने कैशलेस ट्रांजेक्शन का विकल्प पाया। पच्चीस नवम्बर की शाम थी। नोटबन्दी की हाय हाय का पीक समय। वे पेटीएम के जरीये पेमेण्ट लेने को तैयार थे। मैने अपने मोबाइल से पेमेण्ट करना चाहा पर इण्टरनेट का सिगनल नहीं मिला। मानिक ने कहा कि वे वाई-फाई ऑन कर सकते हैं। खैर, रिलायंस जियो मौके पर जिन्दा हो गया और मैने महराजगंज कस्बे में पहला वेलेट के माध्यम से कैश लेस पेमेण्ट किया। इसके पहले ऑन लाइन खरीद, मोबाइल रीचार्ज या टेलीफोन का बिल पेमेण्ट मैं ऑनलाइन किया करता था। वह नोटबन्दी के पहले भी होता था। पर फुटकर खरीद में पहला गंवई प्रयोग था।

इस लिये मैं मानिक सेठ को भूल नहीं पाया।

एक बार और उनकी दुकान पर गया। मानिक वहां नहीं थे। उनके बड़े भाई थे। उन्होने बताया कि छोटा भाई ही पेटीएम-वेटियम जानता है। वही अपने मोबाइल से करता है। बाहर गया हुआ है, इसलिये कैशलेस पेमेण्ट नहीं हो पायेगा।

आज, लगभग एक महीने के बाद सवेरे अपने साइकल-भ्रमण के समय बाजार पंहुच गया। दुकाने नहीं खुली थीं। मुझे टॉर्च के लिये बैटरी लेनी थी। देखा; माणिक दुकान का ताला खोल रहे थे। मैने इन्तजार किया। सवेरे मैं अपना मोबाइल लिये हुये नहीं था, अत: पेमेण्ट तो कैश से किया पर माणिक से पूछा – कैशलेस ट्रांजेक्शन कैसे चल रहे हैं?

“ज्यादा नहीं। लोग ढर्रा बदलना नहीं चाहते। मैं खुद इण्टरनेट, फेसबुक, ऑनलाइन खरीद और वेलेट का प्रयोग करता हूं। पर आसपास लोग नहीं करते। करीब डेढ-दो हजार रुपये महीने का ट्रांजेक्शन हो जाता है; वेलेट और ऑनलाइन खरीद को ले कर।”  

तब भी अच्छा है। लोगों को सिखाइये। लोगों के बारे में फ़ेसबुक पर बताइये। 

उसमें झंझट है। लोग सीखना नहीं चाहते। और यहां की बात फ़ेसबुक में लिखना रिस्की है। मैं अपने बारे में फेसबुक पर लिखता नहीं। कोई जानकारी नहीं देना चाहता। क्या पता क्या लफ़ड़ा हो जाये। बाहर हो आया हूं। वहां की कोई यार-दोस्त इधर-उधर की फोटो डाल दे या कुछ लिख ही दे तो बैठे बिठाये मुसीबत हो जाये। 

मैने माणिक को अपना फेसबुक पर लिखा दिखाया। जिसमें अपने परिवेश के बारे में (और अपने बारे में भी) जैसा है, वैसा लिखा है। और यह भी बताया कि मुझे तो कोई कभी झमेला नहीं हुआ। मैने सुझाव दिया कि माणिक अपने परिवेश – बाजार, दुकान और लोगों की सोच के बारे में पोस्ट करें।

माणिक ने हां-हां तो की; पर जैसा मुझे लगा कि जवान आदमी बहुत कन्वीन्स्ड नहीं है। आखिर मैं अपनी और उसकी तुलना तो नही कर सकता। जवान आदमी की अपनी उमंगे हैं, अपने भय।

पर माणिक मुझे ऊसर गंवई जीवन में नये प्रकार के जीव मिले। शायद भविष्य में भी उनसे सम्पर्क रहे।

एक भाग्यशाली (?!) नौजवान से मुलाकात


अमित पाण्डेय। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव। मुझे रथयात्रा, वाराणसी में सोनू उपाध्याय के दफ़्तर में मिले।
अमित पाण्डेय। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव। मुझे रथयात्रा, वाराणसी में सोनू उपाध्याय के दफ़्तर में मिले।

(यह मैने बतौर फेसबुक नोट पोस्ट किया हुआ है। ब्लॉग पर इसका परिवर्धित रूप रख रहा हूं। दस्तावेज के लिये।)

वाराणसी में मैं सोनू (प्रमेन्द्र) उपाध्याय के रथयात्रा स्थित मेडिकल स्टाक-दफ़्तर में बैठा था। सोनू मेरे बड़े साले साहब (देवेन्द्र नाथ दुबे जी) के दामाद हैं। अत्यन्त विनम्र और सहायता को तत्पर सज्जन। वे मेरे लिये एक आवश्यक औषधि मंगवा रहे थे थोक विक्रेता के यहां से। उनका जो कर्मचारी औषधि लेने गया था, वह जाम में फंस गया था। उसके आने में देरी हो रही थी। सोनू आवाभगत में हमें (मेरी पत्नीजी और मुझको) एक-एक कुल्हड़ (उम्दा) चाय पिला चुके थे। हम आपस में इधर उधर की बातचीत भी निपटा चुके थे। अब विशुद्ध इन्तजार करना था औषधि लाने वाले व्यक्ति का।

वहीं बैठे थे दो सज्जन – नौजवान। वे आपस में मैडीकल कम्पनियां ज्वाइन करने/छोड़ने और विभिन्न दवाओं के स्टाक आदि के बारे में बात कर रहे थे – आपस में और सोनू से भी।

समय गुजारने की गर्ज से ही मैने उनमें से एक, जो एक गमछे के साथ खेल भी रहा था, से पूछा – कम्पनियां ज्वाइन करने और छोड़ने की बातें कर रहे हैं आप। इसमें अनिश्चितता नहीं रहती? तनाव नहीं होता?

उसने बताया – है क्यों नहीं। तनाव भी रहता है। पर यह नौकरी – मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव की – महीने में बीस हजार दे रही है। सो ठीक लगता है।

प्रमेन्द्र (सोनू) उपाध्याय। यह चित्र तब का है, जब वे मेरे गांव स्थित घर में मिलने आये थे।
प्रमेन्द्र (सोनू) उपाध्याय। यह चित्र तब का है, जब वे मेरे गांव स्थित घर में मिलने आये थे।

सोनू ने कहा कि ये नौजवान करीब दो लाख महीने का टर्नओवर कर रहे हैं। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव के अलावा किसी न किसी कम्पनी की फ्रेंचाइज़ी हासिल कर लेते हैं। जितना काम, जितनी मेहनत, उतनी कमाई।

उस नौजवान से पूछा – कितना समय हुआ यह करते? इसके पहले क्या करते थे?

नौजवान ने नाम बताया अमित। अमित पाण्डेय। करीब डेढ साल से यह काम कर रहे हैं। फार्मेसी की पढ़ाई नहीं की। बी.ए. किया है। उसके बाद इसी काम में लग गये।

हंसमुख नौजवान। तनाव को काम का अनिवार्य अंग मान कर चल रहा है। अपने काम में सजग। जीवन में बड़ी जल्दी नेटवर्किंग का महत्व समझ गया है। … व्यक्ति सजग हो, उसका व्यक्तित्व हंसमुख हो, वह मिलनसारता का महत्व जानता हो और अपनी दशा से कुढ़ता न हो; तो वह भाग्यशाली होगा। अपॉर्च्युनिटीज उसके पास सामान्य से अधिक आयेंगी और (अपनी मानसिकता के अनुकूल) वह अवसर पहचानेगा और तरक्की करेगा। पता नहीं, अमित यह जानता है या नहीं, पर अगर नहीं भी जानता, तो अपनी प्रवृत्ति के अनुसार, अनजाने ही सफ़लता की गोल्डमाइन पर हाथ तो रख ही लिया है उसने।

अमित का प्रोफाइल चित्र - ह्वाट्सएप्प पर।
अमित का प्रोफाइल चित्र – ह्वाट्सएप्प पर।

मैने अमित का एक चित्र लेना चाहा तो अमित ने सही पोज बनाया – गमछा अलग रख कर। मैने कहा – ऐसे नहीं वैसे बैठो जैसे गमछा लपेट कर बैठे थे।

अमित ने गमछा पुन: लपेट कर मुझे ओबलाइज़ किया। सोनू ने उससे कहा – लो, अब तुम सोशल मीडिया पर आ जाओगे।

सोनू जी का सहकर्मी मेरी दवाई ले कर आ चुका था। दवाई का डिब्बा ले कर लौटते समय अमित के बारे में मैं और सोच रहा था। दशकों पहले किसी बिजनेस पत्रिका में आदि गोदरेज का पढ़ा एक इण्टरव्यू याद आ रहा था, जिसमें उन्होने कहा था – इस देश में ऐसा कोई भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं है, जो रोजगार पाने का हुनर रखता है। (No one is unemployed who is employable)

अमित को देख वह धारणा पुष्ट हो रही थी। अमित आज रोजगार पाने का हुनर रखता है। कल शायद रोजगार देने का भी हुनर हासिल कर ले!

मछली पकड़ना और फोटोग्राफ़ी



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कोलाहलपुर में केवट नहीं हैं। उनके पास नावें नहीं हैं। धन्धा भी मछली पकड़ने का नहीं है उनका। अधिकांश मजदूरी करते हैं, खेतिहर हैं या बुनकर। सवेरे गंगा किनारे वे शौच, दातुन और स्नान के लिये आते हैं। नहाने के बाद कुछ धर्मपारायण हनुमान जी या शिवजी के मन्दिर जाते हैं तो पास ही में करार पर हैं।


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वहां घाट पर चित्र खींचने के लिये बस कुछ ही प्रकार के दृष्य होते हैं। विविधता के लिये मैं करार पर उखमज से लिपटे पेड़ों और झाड़ियों के चक्कर लगाता हूं। उखमज (पतंगे) बहुत ही ज्यादा हैं गंगा किनारे। उनको पकड़ने के लिये मकड़ियां जाला लगाती हैं। जालों में फंसे उखमज और उनके मृत शरीर अनेकानेक आकृतियां बनाते हैं। सवेरे की रोशनी में उनके पास घूमने का एक अलग तिलस्म है।


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मैं आज उनके आगे बढ़ गया। गंगा किनारे एक नाव थी। उसपर तीन आकृतियां नजर आ रही थीं। पहले लगा कि वे बालू का अवैध उत्खनन करने वाले होंगे। पर जब लगा कि उस प्रकार के लोग नहीं हैं नाव पर तो मैं नजदीक चला गया।

तीन जवान मछेरे थे उनपर। जाल समेट रहे थे। उन्होने बताया कि करीब एक घण्टा हो गया उन्हे पर कोई मछली हाथ नहीं लगी। सो अब वे जगह बदल रहे हैं। नाव किनारे एक खूंटे से बांध रखी थी उन्होने। खोल कर आगे बढ़ने लगे। उनके जितने चित्र खींच सकता था, उतने मैने खींचे। कुछ ज्यादा ही खींचे।


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पास के बरैनी घाट के हैं वे मल्लाह। नाव पर जो सामान नजर आ रहा था, उसके हिसाब से बहुत तैयारी के साथ थे वे मछली पकड़ने को।


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एक अन्य व्यक्ति साइकल से आया था। हाथ में मछली पकड़ने के लिये बन्सी/डण्डी। एक जार में कुछ मछलियां और पकड़ी मछलियां रखने के लिये एक पॉलीप्रॉपिलीन का बोरा था। बताया कि कटका के पास के किसी गांव से है वह।

कांटा फंसा कर वह बैठा मछली मारने को। मैं भी पास में बैठना चाहता था कैमरा ले कर। पकड़ी मछली का चित्र लेने की प्रतीक्षा में। करार पर दूब गीली थी ओस से। मैने बैठने को उससे बोरा मांगा। काफी उहापोह दिखाया उसने पर अन्तत दिया नहीं। मैने गीली दूब पर बैठ कर इन्तजार करने का निर्णय किया।

लगभग 10 मिनट बैठा रहा मैं। मछली उसके कांटे में अटकी पर शायद उतना नहीं कि वह खींच सके। मेरा धैर्य उसके धैर्य से काफी कमजोर प्रमाणित हुआ। उकता कर मैं उठ आया।

फोटो खींचने का लालच मुझ बिना लहसुन-प्याज का शाकाहारी भोजन करने वाले को मछली पकड़ने की प्रतीक्षा करा रहा था। कुछ अजीब सी बात है।

खैर, आगे भी कोई मछेरा मिलेगा। आगे भी मछली पकड़े जाने की प्रतीक्षा करूंगा। तब शायद वह पर्याप्त परिचित होगा और बैठने के लिये मुझे अपना बोरा भी दे दे।

आगे की ब्लॉग पोस्टों की प्रतीक्षा कीजिये बन्धुवर।
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कोलाहलपुर और मुर्दहिया


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कोलाहलपुर में लगभग 400 घर हैं। उसमें से 3 घर सवर्णों के हैं। मुझे बताया गया कि शेष चमार हैं। कुछ खेती में लगे हैं। कुछ बुनकर हैं – कालीन बनाने वाले सेंटर पर जा कर आठ घंटे कालीन बुनते हैं। कुछ मजदूरी करते हैं।
मैंने तुलसीराम की मुर्दहिया के कण तलाशने की सोची। पर लगा कि गाँव वैसा नहीं है।
यह विचार आया कि शायद अब हालात बदले हों। पहले सामाजिक और आर्थिक हालात भयावह रहे हों।

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उस दिन मुझे गंगा किनारे शाम को मिल गए रामधनी। उनकी उम्र मेरे बराबर लगभग साठ साल की है। तुलसीराम भी लगभग इतनी उम्र के होते।
लगा कि कोलाहलपुर को मुर्दहिया का सीक्वेल लिखने के लिये रामधनी एक सही पात्र होंगे। वैसे भी रामधनी स्पष्टवक्ता लगे। अच्छी याददाश्त वाले भी। यह विचार मन में पुख्ता हो रहा है की रामधनी के विस्तृत इंटरव्यू ले कर उसके आधार पर एक श्रंखला लिखी जा सकती है।
रामधनी के दो लड़के हैं, दोनों बुनकर। वे अब मोतियाबिंद के आपरेशन के कारण बुनकर के काम से संन्यास ले चुके हैं। उनके कहे अनुसार उनका घर संपन्न नहीं हो तो विपन्न भी नहीं है।
भविष्य में मुर्दहिया का सीक्वेल लिखने की संभावनाएं बनती हैं – आखिर मुझे भी व्यस्त रहने को कुछ काम चाहिए! कि नहीं?