ताक्लामाकन का रेगिस्तान,अमेजन और पुस्तक


मैने करीब दो दशक पहले रीडर्स डाइजेस्ट में पुस्तक संक्षेप के रूप में ताक्लामाकन रेगिस्तान की पश्चिम से पूर्व का सबसे दुरुह यात्रा वृतान्त पढा था। मुझे यह भी याद नहीं रहा कि यात्री कौन था – कोई अंगरेज, और पुस्तक किसने लिखी थी। पुस्तक फर्स्ट-पर्सन में लिखी गयी थी; सो बहुत सम्भव है कि यात्री ने ही लिखी हो।

यात्रा की दुरुहता और यह जानकारी कि वह एवरेस्ट विजय या अकेले अटलाण्तिक पार करने जैसे बड़े (और भीषण) अभियान  का वर्णन था; पुस्तक मेरे मन में बनी रही। पिछले पांच-सात साल से मैं उसे पुन: पढ़ने का प्रयास करता रहा। पर मेरे घर में रीडर्स डाइजेस्ट का वह अंक मिला नहीं। शायद कबाड़ी के पास चला गया था (यद्यपि रीडर्स डाइजेस्ट कबाड़ी को दिये जाने पर मनाही थी घर में)।

मैने पुस्तक को GoodReads  या गूगल पर छानने का प्रयास किया।

charles-blackmoreयह पुस्तक निकली चार्ल्स ब्लैकमोर की – The Worst Desert on Earth – Crossing Taklamakan. पुस्तक आउट ऑफ प्रिण्ट थी। अमेजन पर तलाशा इसे। वहां यह हार्ड-बाउण्ड में रु 4000.- में थी। इतनी मंहगी किताब कैसे खरीदी जाये।

अचानक अमेजन पर नीचे एक लिंक मिला। यह पुस्तक पुरानी (पर अच्छी दशा में) 305 रुपये पर उपलब्ध थी। जैसा वे लिखते हैं,उसकी एक ही प्रति उपलब्ध थी। अमेजन प्राइम पर उसका डाक-खर्च फी था।

मैने समय नहीं गंवाया (पुरानी) प्रति ऑर्डर करने में।

जब पुस्तक मेरे पास आयी तो ताजा और कोरी किताब थी। सन 1995 का संस्करण। उस समय कीमत थी 16.99 पाउण्ड। किताब सम्भवत: अनबिकी थी। ताजा पन्नों की गन्ध। शायद बाद के किसी संस्करण की कीमत 4000रु के आसपास रही हो। बहरहाल मुझे तो 305 में मिल गयी। किताबी कीड़े के लिये इससे बड़ा सौभाग्य (लक) क्या हो सकता है भला?

13-luckमुझे अश्विन सांघी की पुस्तक 13 Steps to Bloody Good Luck की याद हो आयी। सजग रहना। अवसर पहचानना और उनमें वृद्धि करना ही तरीका है अपना लक बढ़ाने का।

वही किया था मैने। किताब याद रखना। उसको सर्च करना। अमेजन पर फाइन प्रिण्ट पढना और मौके पर ऑर्डर करना – यह सब उसी लक का हिस्सा है।

पर समझ नहीं आता कि अमेजन अपनी पुस्तकों की कीमत कैसे तय करता है। उसकी साइट पर पुस्तकों (और अन्य वस्तुओं की भी) कीमतें बड़ी डायनमिक होती हैं। कभी कभी एक दिन में कई बार बदलती हैं।  कुल मिला कर अमेजनिये बड़ा दमदार कंटिया फंसाते हैं ग्राहक के लिये। ग्राहक फंस कर भी खुश रहता है।

कुल मिला कर ऑनलाइन खरीद का तिलस्म बहुत धीरे धीरे समझ में आ रहा है। पर बड़ा थ्रिलिंग है यह!


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मिश्री पाल की भेड़ें


GDFeb164606-01गड़रिया हैं मिश्री पाल। यहीं पास के गांव पटखौली के हैं। करीब डेढ़ सौ भेड़ें हैं उनके पास। परिवार के तीन लोग दिन भर चराते हैं उनको आसपास।

मुझे मिले कटका रेलवे स्टेशन की पटरियों के पास अपने रेवड़ के साथ। भेड़ें अभी ताजा ऊन निकाली लग रही थीं। हर एक बेतरतीब बुचेड़ी हुई। उन्होने बताया कि साल में तीन बार उतरता है उनका ऊन। इस बार करीब चालीस किलो निकला।

मिश्री पाल ने बताया – बहुत कम दाम मिलते हैं ऊन के। खरीदने वाला 8रुपये किलो खरीद ले जाता है।

यह तो बहुत कम दाम हुये। आलू के भाव। – मैने अपना मत व्यक्त किया।

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“हां, बहुत कम है। पर और कोई काम नहीं। दिन भर चराते हैं। देखभाल करनी पड़ती है।” मिश्री पाल ने कहा कि वे भेड़ें बेचने का धन्धा नहीं करते। पर मुझे लगा कि यह गड़रिये का काम अगर भेड़ें बेचने पर आर्धारित नहीं है तो मात्र ऊन के आधार पर किसी भी प्रकार से सस्टेन नहीं किया जा सकता। गड़रिया के काम में पैसा कहां और किस मद में आता है; मैं यह सोचने में लग गया। 

मिश्री पाल के पास बैल भी हैं। बैलों को वे हल चलाने के लिये किराये पर देते हैं। आजकल किसान बैल नहीं रखते। अगर जोत बहुत छोटी है, या जगह ऐसी, जहां ट्रेक्टर नहीं जा सकता, तो वहां हल का प्रयोग करते हैं। वहां मिश्री पाल के बैल काम आते हैं।

देहात में बहुत से लोग; जिनके पास जमीन नहीं है; भेड़, बकरी, सूअर, गाय, भैंस आदि पाल कर उनके दूध, ऊन, मांस आदि से अपना जीवन यापन करते हैं। उनके रहन सहन को देख कर लगता है कि उन्हें गरीब तो जरूर माना जायेगा; पर आर्थिक आधार पर कम जोत वाले किसानों की अपेक्षा बहुत विपन्न हों – वैसा भी नहीं है। मुझे लगा कि कभी पटखौली जा कर मिश्री पाल का जीवन देखना चाहिये।

कितनी ही अच्छी पुस्तके गड़रियों के घुमन्तू जीवन के आधार पर लिखी गयी हैं। कई देशों और महाद्वीपों में यात्रा करते गड़रिये। मिश्री पाल वैसे तो नहीं हैं; पर छोटे मोटे स्तर पर घुमन्तू तो हैं ही।

मैं मिश्री पाल का चित्र ले चलने लगा। सांझ हो गयी थी। मिश्री पाल भी अपने गांव लौट रहे होंगे अपने रेवड़ के साथ। वे और उनके साथी डण्डा फटकारते हुये, हट्ट-हट्ट की ध्वनि निकालते अपनी भेड़ें साधने में लग गये।

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कोलाहलपुर और मुर्दहिया


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कोलाहलपुर में लगभग 400 घर हैं। उसमें से 3 घर सवर्णों के हैं। मुझे बताया गया कि शेष चमार हैं। कुछ खेती में लगे हैं। कुछ बुनकर हैं – कालीन बनाने वाले सेंटर पर जा कर आठ घंटे कालीन बुनते हैं। कुछ मजदूरी करते हैं।
मैंने तुलसीराम की मुर्दहिया के कण तलाशने की सोची। पर लगा कि गाँव वैसा नहीं है।
यह विचार आया कि शायद अब हालात बदले हों। पहले सामाजिक और आर्थिक हालात भयावह रहे हों।

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उस दिन मुझे गंगा किनारे शाम को मिल गए रामधनी। उनकी उम्र मेरे बराबर लगभग साठ साल की है। तुलसीराम भी लगभग इतनी उम्र के होते।
लगा कि कोलाहलपुर को मुर्दहिया का सीक्वेल लिखने के लिये रामधनी एक सही पात्र होंगे। वैसे भी रामधनी स्पष्टवक्ता लगे। अच्छी याददाश्त वाले भी। यह विचार मन में पुख्ता हो रहा है की रामधनी के विस्तृत इंटरव्यू ले कर उसके आधार पर एक श्रंखला लिखी जा सकती है।
रामधनी के दो लड़के हैं, दोनों बुनकर। वे अब मोतियाबिंद के आपरेशन के कारण बुनकर के काम से संन्यास ले चुके हैं। उनके कहे अनुसार उनका घर संपन्न नहीं हो तो विपन्न भी नहीं है।
भविष्य में मुर्दहिया का सीक्वेल लिखने की संभावनाएं बनती हैं – आखिर मुझे भी व्यस्त रहने को कुछ काम चाहिए! कि नहीं?

जंगल की वनस्पतियों पर शोध ग्रंथ


"विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान' पुस्तक में चित्रों की एक प्लेट।
“विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान’ पुस्तक में चित्रों की एक प्लेट।

मैने श्री प्रवीण चन्द्र दुबे से उनके शोध कार्यों पर लिखी उनकी पुस्तकों पर जिज्ञासा जताई थी।

कुछ दिनों बाद मुझे एक अनजान नम्बर से फोन आया। बोटानिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के सेण्ट्रल रीजनल सेण्टर, इलाहाबाद से श्री अर्जुन तिवारी फोन पर थे। उन्होने बताया कि कुछ समय बाद वे अपने विन्ध्य की वनस्पतियों पर अध्ययन वाली पुस्तक मुझे भिजवा देंगे।

लगभग 15 दिन बाद वह पुस्तक मेरे हाथ में थी।

मेरा सोचना था कि यह लगभग 50-100 पेज की कोई पुस्तिका होगी। ऐसी पुस्तिका, जो लोग कम से कम मेहनत में लिखते-छपवाते हैं कि लेखक होने का नाम भर हो जाये और कहने को हो कि वे शोध कर सामग्री पब्लिश कर चुके हैं। ऐसी पुस्तकें लोगों पर रुआब डालने भर का काम करती हैं।

पर यह पुस्तक – विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान – एक पुस्तिका नहीं, ए-4 साइज बड़े आकार के 400 से अधिक पेजों का भारी भरकम शोध ग्रन्थ निकला। छ व्यक्तियों के कई वर्षों की जंगल छानने, पारम्परिक चिकित्सकों के मिलने, नोट्स बनाने और वनस्पतियों का वैज्ञानिक विश्लेषण करने का नतीजा था। यह पुस्तक तो आगे आने वाले चिकित्सकीय शोध के कई अध्यायों को ट्रिगर कर सकती है।


महुआ बड़ा मिठहुआ भाई
लाटा, ड़ोभरी खा बनाई
भुरकुन्ना खुरमा डोभराऊरा
खा रसखीर मौहारी भउरा
येखे फर का तेल निकारी
यामा न घाले कोउ कुल्हारी।
महुआ कितना मीठा पदार्थ है कि इससे लाटा, डोभरी भुरकुन्ना, सुरमा रसखीर, गौहारी आदि तरह तरह के व्यंजनों को बना कर खाया जाता है। इसके फल से तेल भी निकलता है। इस लिये ऐसे उपकारी पेड़ को कोई कुल्हाड़ी न चलाये।

(पुस्तक से)


पुस्तक की एक् प्लेट
पुस्तक की एक् प्लेट

वनवासी वे हैं, जो अपनी समस्त आवश्यकताओं के लिये वन पर निर्भर हैं। निर्भर हैं तो वन के प्रति उनमें माता-पिता जैसा भाव है। वृक्षों के प्रति आदर। उनका रहन-सहन, भोजन, दवा-दारू, देवी-देवता सब का आधार वन है। जंगल का वे आवश्यकता से अधिक दोहन/शोषण नहीं करते।

पुस्तक में यह और वन से सम्बन्धित अनेकानेक जानकारियां; अनेकानेक आयाम स्पष्ट होते हैं। यह सर्राटे से पढ़ी जा सकने लायक पुस्तक नहीं है। सन्दर्भ-ग्रंथ है; जिसपर बार बार लौटा जाये।

यह पुस्तक रीवां सम्भाग के रींवा, सतना, शहडोल, अनूपपुर, सीधी और उमरिया जिलों के वनो के जैवविविधता बहुल 22 क्षेत्रों के दो वर्षों तक सघन भ्रमण, स्थानीय जानकारों और पारम्परिक चिकित्सकों से सम्पर्क से निकली संतृप्त जानकारी का संग्रह है। इसमें दो सौ से अधिक स्थानीय जानकारों, वैद्यों, वन कर्मियों आदि की सूची है जिनके साथ सम्पर्क से इस पुस्तक की सामग्री बनी है। बड़े ही वैज्ञानिक तरह से अध्ययन किया गया है, इस ग्रंथ के लिये।

इस पुस्तक पर छ लेखकों के नाम हैं। सर्वश्री प्रवीण चन्द्र दुबे, के के खन्ना, आरएलएस सिकरवार, आरएन सक्सेना, बीएल पाण्डेय और अर्जुन प्रसाद तिवारी। इनमें से मैं श्री प्रवीण चन्द्र दुबे से मिला हूं। और अर्जुन तिवारी से फोन पर चर्चा हुई है। अन्य सज्जनों से भी मुलाकात की इच्छा है।

इस ब्लॉग पोस्ट में पुस्तक की सामग्री परिचय के बारे में अगर मैं कहना शुरू करूं तो उसे 500-1000 शब्दों में समेट नहीं सकता। अत: उसका प्रयास नहीं करूंगा। प्रवीण जी और अर्जुन ने मुझे यह भरोसा दिया है कि इस पुस्तक की सॉफ्ट कॉपी उपलब्ध करा देंगे। तब, जब भी समय मिला, मैं इसके अंशों से आप पाठकगणों को जानकारी देता रहूंगा।

फिलहाल तो मैं इतना ही कह सकता हूं कि अत्यंत प्रभावित हूं इस अध्ययन-सन्दर्भ-ग्रंथ से।


अर्जुन प्रसाद तिवारी। चित्र फेसबुक से।
अर्जुन प्रसाद तिवारी। चित्र फेसबुक से।

मैने अर्जुन तिवारी से फोन पर बातचीत की। वे बोटानिकल सर्वे ऑफ इण्डिया के इलाहाबाद केन्द्र में शोध कार्य कर रहे हैं। [ प्रवीण चन्द्र दुबे जी ने मुझे फोन पर कहा था – बड़ा ही अच्छा लड़का है। इसके लिये कोई अच्छी लड़की हो तो बताइयेगा! 😆 ]

अर्जुन से मैने पूछा कि जितना पारम्परिक ज्ञान उन्होने अनेक जनजातीय लोगों/वैद्यों/जानकारों से एकत्र किया है, उसमें से कितना, बकौल उनके, आयुर्वेद ने अपने में समाहित किया है?

अर्जुन का विचार था कि अभी बहुत कुछ वैज्ञानिक/आयुर्वेदीय अध्ययन बाकी है। लगभग 40 प्रतिशत ज्ञान किसी न किसी तरह से आयुर्वेदीय औषधियों-पद्धतियों में है। एलोपैथिक दवाओं में भी बहुत सी का मूल ये जड़ी-बूटियां ही हैं। पर बहुत से वनस्पतीय-पारम्परिक ज्ञान का वैलीडेशन होना शेष है। उस दिशा में बहुत प्रयास नहीं हुये हैं। पर अब आयुष मंत्रालय की स्थापना हुई है तो आशा की किरण नजर आती है।

उदाहरण के लिये अर्जुन ने बताया कि जनजातीय लोग भस्म-कन्द नामक जड़ी का प्रयोग केंसर के लिये करते आये हैं। उज्जैन में एक बीएमएस डाक्टर से उन्हे प्रवीण जी ने मिलवाया था। उन डाक्टर साहब ने  बताया था कि भस्म-कन्द का सफल प्रयोग उन्होने कई केंसर रोगियों पर किया था।

पर जन जातीय लोग भस्म-कन्द का सूरन के विकल्प के रूप में अपने भोजन में प्रयोग करते आये हैं। व्यापक दोहन हो चुका है इस वनस्पति का और यह एंडेंजर्ड प्रजाति में आ गयी है। इसको बनाये रखने के प्रयास की आवश्यकता है।

अर्जुन ने एलोपैथी और आयुर्वैदिक दवाओं में वनस्पति के प्रयोग पर अपने विचार व्यक्त किये। एलोपैथी में वनस्पति का संश्लेषित रूप प्रयोग होता है। आयुर्वेदिक औषधि में वनस्पति अपनी मूल दशा में रहती है। भारत में आयुर्वेदिक दवाओं की मूल समस्या उनमें कठोर क्वालिटी कण्ट्रोल का न होना है। उनकी फार्मास्युटिकल कम्पनियां जड़ी-बूटियों की गुणवत्ता से समझौता करती हैं। (उदाहरण के लिये अशोकारिष्ट में वे अशोक के उस प्रकार का प्रयोग कर रही हैं, जिसमें औषधीय गुण नगण्य़ हैं।) कई बार पुरानी जड़ी-बूटियों का प्रयोग कर लिया जाता है। वे कुशल प्लाण्ट टेक्सोनॉमिस्ट अपनी दवाओं के उत्पादन में नहीं रखतीं।

'विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान' पुस्तक का एक पेज-अंश
‘विन्ध्य की वनस्पतियों का पारम्परिक ज्ञान’ पुस्तक का एक पेज-अंश

अर्जुन तिवारी से बातचीत कर मुझे लगा कि वनस्पतियों के पारम्परिक ज्ञान का अध्ययन और उसका आयुर्वेद/एलोपैथ के साथ सही संश्लेषण समय की मांग भी है और वर्तमान सरकार की सोच के अनुसार एक महत्वपूर्ण घटक भी – जनता के स्वास्थ्य के लिये।

अर्जुन निकट भविष्य में वैज्ञानिक पद के लिये चयन में जायेंगे। उन्हे शुभकामनायें!


मुर्दहिया


बहुत पहले – बचपन की याद है। गांव सुकुलपुर। एक ओर किनारे पर चमरौटी और पसियान। तीन=चार साल का मैं और वहां से गुजरते हुये अपने से एक बड़े की उंगली थामे। मन में कौतूहल पर बड़े मुझे लगभग घसीटते हुये तेज कदमों से वहां से ले आये। कुछ इस अन्दाज में कि अगर वहां रुका तो कोई जबरी मुंह में मछरी या मांस डाल देगा।

भय का तिलस्म से गहरा नाता है। चमरौटी/पसियान के तिलस्म में वही सब बनाया गया था मेरे बचपन में। वह तिलस्म अभी भी पूरा टूटा नहीं है। अन्यथा गंगाजी के कछार में घूमते हुये मन में कई बार आया था कि चिल्ला गांव जा कर पासी-केवट-मल्लाह की जिन्दगी देखी जाये। कल्लू ने एक बार निमंत्रण भी दिया था अपने घर आने का। पर वह हो नहीं पाया।

शिवकुटी के गंगा-कछार में कई ब्राह्मणिक वर्जनायें तोड़ी हैं मैने। पर चमरौटी/पसियान में घूम कर वहां के वातावरण को अनुभव करने की बात अभी नहीं हो पायी। खैर, अभी जिन्दगी आगे है। … बाज की असली उड़ान बाकी है। वह सब भी होगा समय के साथ।

इन्ही वर्जनाओं का प्रभाव हो शायद कि दलित-बौद्ध-मार्क्सवादी-जे.एन.यू. छाप साहित्य या दर्शन मुझे दूसरे एक्स्ट्रीम की स्नॉबरी लगते रहे। कभी उनमें पैठने का प्रयास नहीं किया।

अत: उस दिन जब नितिश ओझा ने  आग्रह किया कि मैं डा. तुलसीराम की पुस्तक मुर्दहिया पढ़ूं, तो बिना किसी ललक के वह पुस्तक अमेजन.इन पर ऑर्डर की। जब कल वह किताब मिली तो आशंका सही निकली – डा. तुलसी राम “दलित-बौद्ध-मार्क्सवादी-जे.एन.यू. छाप साहित्य” वाले ही निकले।IMG_20150217_091238

मैने नितिश को सन्देश दिया –

तुलसीराम जी की पुस्तक मिल गयी मुझे – मुर्दहिया। दलित, बौद्ध और मार्क्सवादी – तीनों प्रकार का साहित्य मेरे प्रिय विषय नहीं हैंँ। पर आपने कहा है तो पढ़ कर देखता हूं। 🙂

उनका उत्तर मिला –

ओहह !!… सर कभी टेस्ट बदल कर देखिये …. कम से कम मूक दर्शक की भांति ही ….. तो भी न पसंद आए तो मुझे दान कर दीजिएगा ब्राह्मण होने की वजह से मुझे आपसे स्वीकार करने मे संकोच नहीं होगा या फिर अमेज़न पर 30 दिन की रिटर्न पॉलिसी भी है..

पर मैं चाहूँगा की आप पढे … एक नायाब कृति विशेषकर आत्मकथा लिखने का अनूठा ढंग …. पूरब के देसी छौंक के साथ …

मैं मुर्दहिया पढ़ना शुरू कर चुका था। अपने  ‘दलित-बौद्ध-मार्क्सवादी’ विरोधी पूर्वाग्रह को परे रख कर। और उस पुस्तक में वह सब मिल रहा है जो मेरे बचपन से अब तक चले आ रहे कौतूहल का शमन करता है। वह सब; जिसके बारे में बहुत टेनटेटिव तरीके से मेरी जानकारी है। या, जानकारी है भी तो उसके प्रति संवेदनशील नजरिया वैसा नहीं है।

दलित साहित्य की स्नॉबरी युक्त पुस्तकों के एक दो पन्ने पढ़ कर छोड़ चुका हूं कई बार। पर यह मुर्दहिया तो भिन्न प्रकृति की है। भिन्न और बांध कर रखने वाली।

और मुर्दहिया मैं पढ़े चला जा रहा हूं। भूमिका में लेखक ने इसके खण्ड-दो की बात भी कही है – जिसमें गांव से आगे कलकत्ता-बनारस-दिल्ली-इंगलैण्ड-रूस की जीवन यात्रा भी है। लेखक तो इस महीने नहीं रहे। पता नहीं वह खण्ड-दो लिख पाये या नहीं। पर मुझे तो यह आजमगढ़ के उनके गांव का मुर्दहिया का खण्ड-एक बहुत ही रोचक लग रहा है।

नितिश के शब्दों में कहूं तो मुर्दहिया एक नायाब कृति है!     

कउड़ा


कउड़ा
कउड़ा

आज तीसरा दिन था, घाम नहीं निकला। शुक्रवार को पूरे दिन कोहरा छाया रहा। शीत। शनीचर के दिन कोहरा तो नहीं था, पर हवा चल रही थी और पल पल में दिशा बदल रही थी। स्नान मुल्तवी कर दिया एक दिन और फ़ेसबुक पर लिखा – और भी गम हैं जमाने में नहाने के सिवा।

आज रविवार को पिछले दो दिन से बेहतर था। फिर भी धूप नहीं निकली और घर के अन्दर पिताजी की चारपायी के बगल में सिगड़ी जलती रही। मौसम की अनप्रेडिक्टेबिलिटी देख कर पिताजी पहले ही कह चुके हैं – भगवान पगलाई ग हयेन् (भगवान पगला गये हैं)।

शिवचन्द – हमारा घरेलू भृत्य – पिताजी की चारपाई के बगल में रखी सिगड़ी में कोयला डालने का काम मुस्तैदी से करता है। कितना कोयला बचा है – इसका भी हिसाब उसके पास है। इस सर्दी में करीब बीस सेर लकड़ी का कोयला लग चुका है कमरा गरम रखने में।

पिताजी की चारपाई के बगल में रखी सिगड़ी
पिताजी की चारपाई के बगल में रखी सिगड़ी

आज शिव चन्द ने बताया – पिछवां कउड़ा बारे हई। (पीछे अलाव जलाया है)। बंगले की एक बीघा जमीन में कई पेड़ हैं और कई सूखे हुये भी। आम-अमरूद-सेमल की गिरी डालियां और ठूंठ पीछे आउट हाउस वाले ले जा कर जला रहे हैं सर्दी से बचाव के लिये। वह लकड़ी घर के अन्दर अलाव के रूप में नहीं जलाई जा सकती। उससे धुआं बहुत होता है। पर खुले में अलाव जला कर उसे तापा जा सकता है।

मैने जा कर देखा। हवा और गलन कम होने के कारण घर के पिछवाड़े बाहर बैठा जा सकता था। कुर्सियां निकलवा कर मैं भी वहां बैठा। मेरे बाद मेरी पत्नीजी भी आयीं और उसके बाद पिता जी भी। धुआं हवा के साथ साथ अपनी दिशा बदल रहा था और कुर्सी बार बार खिसकानी पड़ रही थी मुझे। लकड़ियां अच्छी जल रही थीं और उनकी आंज जब बढ़ जाती थी तब अलाब से पीछे भी खींचनी पड़ती थी कुर्सी। लकड़ियों के आग में चटकने की आवाज के अलावा गर्मी से उनके पास हवा भांति भांति की आवाज निकालती थी। कउड़ा की राख छोटे छोटे टुकड़ों में मेरे कपड़ों और हाथ में ली गयी किताब पर गिरती थी।

कउड़ा का अनुभव बचपन का है। गांव में सूखी लकड़ी और पत्तियों का प्रयोग कर जलाया जाने वाला अलाव और उसके इर्दगिर्द जमा लोगों की बत कही। आज कउड़ा था पर बतकही नहीं। मेरे हाथ में किताब थी – जिसमें लेखक ग्वाटेमाला और अल सल्वाड़ोर की रेल यात्रा का विवरण दे रहा था। ग्वाटेमाला का सत्तर के दशक का दृष्य। भूकम्प पीड़ित निहायत उदास, विपन्न, गरीब और अपने आप में अजनबी देश। जिसमें लोग बाहरी से तो क्या, अपने लोगों को भी निहायत शक की नजर से देखते थे। गन्दगी थी और मक्खियां। एक औरत ट्रेन में एक ही कप में पूरे कम्पार्टमेण्ट भर को कॉफी पिला रही थी और लोगों को कोई आपत्ति न थी। मुझे एक बारगी लगा कि लेखक नाहक उस जगह रेलगाड़ी से सफ़र कर रहा था। पर असल में ट्रेवलॉग का मतलब टूरिस्ट की तरह यात्रा कर उसका विवरण लिखना नहीं होता। अगर वह ग्वाटेमाला में इस तरह यात्रा नहीं करता, नहीं लिखता तो मुझे या मुझ जैसे पाठक को भूकम्पों से पीड़ित उस देश की विपन्न दशा का क्या अन्दाज होता।

कउड़ा, रामबचन (बायें) और शिवचन्द
कउड़ा, रामबचन (बायें) और शिवचन्द

मैं सोचने लगा कि मैं भी धीमे चलने वाली पैसेन्जर ट्रेनों में पूर्वान्चल की यात्रा कर जनता की नब्ज देखूं – गोरखपुर से नरकटिया, समस्तीपुर, रक्सौल, मुजफ़्फ़रपुर, सोनपुर, छपरा, सिवान, पडरौना… फिर मुझे लगा कि न मेरे पास पॉल थरू जैसे लेखनी है न उस तरह यात्रा करने की सन्कल्प शक्ति। रेलवे की नौकरी के दौरान बिना लम्बी छुट्टी लिये उसतरह की यात्रा वैसे भी सम्भव नहीं।

लेखक यात्रा करता सान् सल्वाड़ोर पंहुंच कर वहां एक (हिंसक) फुटबाल मैच का विवरण दे रहा था। कउड़ा धीमा हो गया था। राम बचन – मेरे आउट हाउस में रहने वाला जवान जो रेलवे मैकेनिकल वर्कशॉप में काम करता है और रविवार होने के कारण घर पर था – और लकड़ियां ला कर कउडा तेज करने लगा। आग और धुआं बढ़ गये। पुस्तक का भी एक अध्याय पूरा होने को आया। मैं वह अध्याय पूरा कर घर के अन्दर चला आया। संझा के समय जब लेखक आगे निकारागुआ की यात्रा में निकलेगा और यहां घर में अगर शीत न गिरने लगा तो एक बार फिर कउड़ा के पास बैठने की सोचूंगा। अन्यथा कल तो सोमवार है। फिर सप्ताह भर छुट्टी न मिलेगी कउड़ा के पास बैठने को।DSC_0059

 

पटेल, नेहरू, कांग्रेस और कुरियन की किताब


'I Too Had a Dream' by Verghese  Kurien
‘I Too Had a Dream’ by Verghese Kurien

सरदारपटेल और नेहरू जी (कांग्रेस) को ले कर एक बात आजकल चली है। पटेल को कांग्रेस ने किस प्रकार से याद किया, इस बारे में श्री वर्गीस कुरियन की किताब I Too Had a Dream में एक प्रसंग है। मैं उसे जस का तस प्रस्तुत करता हूं (बिना वैल्यू जजमेण्ट के)। अनुवाद के शब्द मेरे हैं। आप पढ़ें –


“एक अन्य व्यक्ति जो मेरी आणद की जिन्दगी में आयी और जिन्होने मुझे और मेरे परिवार को बहुत प्रभावित किया, वे मणिबेन पटेल थीं, सरदार वल्लभ भाई पटेल की पुत्री। मणिबेन आणद और को-आपरेटिव में नियमित रूप से आया करती थीं। वे कभी भी औपचारिक रूप से खेड़ा कोआपरेटिव का हिस्सा नहीं थीं और कभी भी उन्होने कोई पद नहीं संभाला। वे केवल सरदार पटेल की पुत्री के रूप में सम्पर्क में रहती थीं, और वे यह जानती थीं कि उनके पिता खेड़ा जिला के किसानों के भले और प्रगति के लिये कितना सरोकार रखते थे। आणद में उनका हमेशा स्वागत था – न केवल सरदार पटेल की पुत्री के रूप में वरन् उनके अपने मानवीय गुणों के कारण भी। यद्यपि वे काफ़ी अच्छी कद-काठी की महिला थीं और बाहर से रुक्ष लगती थीं, मैने पाया कि वे बहुत सौम्य स्वभाव की थीं और हम बहुत अच्छे मित्र बन गये।

मणिबेन नितान्त ईमानदार और समर्पित महिला थीं। उन्होने अपना पूरा जीवन अपने पिता को समर्पित कर दिया था। उन्होने बताया कि सरदार पटेल की मृत्यु के बाद वे उनका एक बैग और एक किताब ले कर दिल्ली गयीं जवाहरलाल नेहरू से मिलने। उन्होने वे नेहरू के हवाले किये; यह कहते हुये कि उनके पिता ने मरते समय कहा था कि ये सामान वे नेहरू को ही दें और किसी को नहीं।  बैग में 35 लाख रुपये थे जो कांग्रेस पार्टी के थे और किताब उसका खाता थी। नेहरू ने वह ले कर उनका धन्यवाद किया। मणिबेन ने इन्तजार किया कि नेहरू कुछ और बोलेंगे पर जब वे नहीं बोले तो वे उठीं और चली आयीं।

मणिबेन (बीच में) और कुरियन दम्पति
मणिबेन (बीच में) और कुरियन दम्पति

मैने मणिबेन से पूछा कि वे नेहरू द्वारा क्या अपेक्षा करती थीं कि वे कहते। “मैने सोचा कि वे पूछेंगे कि मैं आगे अपना काम कैसे चलाऊंगी? या कम से कम यह कि वे मेरी क्या सहायता कर सकते हैं? पर यह उन्होने कभी नहीं पूछा।” – मणिबेन ने बताया।

मणिबेन के पास अपना कोई पैसा नहीं था। सरदार पटेल की मृत्यु के बाद बिड़ला परिवार ने उन्हे कुछ समय बिड़ला हाउस में रहने का अनुरोध किया। पर यह उन्हे मन माफ़िक नहीं लगा तो वे अपने भतीजे के पास रहने के लिये अहमदाबाद चली आयीं। उनके पास कोई अपनी कार नहीं थी, सो वे बसों या थर्ड क्लास में ट्रेनों में यात्रा करती थीं। बाद में त्रिभुवन दास पटेल (खेडा कोआपरेटिव के संस्थापक) ने उनकी मदद की संसद का सदस्य चुने जाने में। उससे उन्हें प्रथम श्रेणी में चलने का पास मिल गया पर एक सच्चे गांधीवादी की तरह वे सदा तीसरे दर्जे में ही यात्रा करती रहीं। वे आजन्म खादी की साड़ी पहनती रहीं, जिसका सूत वे स्वयं कातती थीं और वे जहां भी जाती थीं, उनके साथ चरखा रहता था।

सरदार पटेल ने जो त्याग किये देश के लिये; उन्हे देखते हुये यह कहते दुख होता है कि देश ने उनकी बेटी के लिये कुछ नहीं किया। अपने बाद के वर्षों में, जब उनकी आंखें बहुत कमजोर हो गयी थीं; वे अहमदाबाद की सड़कों पर बिना किसी सहारे के चलती थीं। बहुधा वे लड़खड़ा कर गिर जाती थीं, और वहीं पड़ी रहती थीं, जब तक कोई गुजरता व्यक्ति उनकी सहायता कर उठाता नहीं था। जब वे मर रही थीं तो गुजरात के मुख्य मन्त्री चिमनभाई पटेल उनके पास आये एक फोटोग्राफर के साथ और फोटोग्राफ़र को निर्देश दिया कि उनके साथ एक फोटो खींची जाये। वह फ़ोटो अगले दिन अखबारों में छपी। थोड़े से प्रयास से वे मणिबेन के अन्तिम वर्ष बेहतर बना सकते थे।”


मैने वर्गीस कुरियन की यह किताब साल भर पहले पढ़ी थी। कल जब सरदार पटेल की लीगेसी पर क्लेम करने लगे उनके पुराने समय के साथियों के उत्तराधिकारी; तो मुझे याद हो आया यह प्रसंग। मैने वर्गीस कुरियन के शब्दों को रख दिया है। बाकी आप समझें।

(चित्र कुरियन की पुस्तक से लिये हैं)