प्रयागराज, लाइव सर्टीफिकेट और बैंक अधिकारी श्रीमती दिव्या गौड़ से मुलाकात


लाइव सर्टीफिकेट हेतु प्रयागराज की यात्रा

रिटायर्ड सरकारी पेंशनर्स के लिये बैंक नवम्बर के महीने में तीर्थ स्थान सा होता है। वहां जा कर अपने जीवित होने का प्रमाण देना अनिवार्य वार्षिक कर्मकाण्ड है। मेरे घर में मेरे पिताजी और मैं – दो व्यक्ति सरकारी पेंशनर हैं। मेरा पेंशन खाता वाराणसी में है और पिताजी का तेलियरगंज, प्रयागराज में। अत: दोनों को इस तीर्थ यात्रा पर जाना होता है। चूंकि मेरे पिताजी इस यात्रा के लिये बहुत सक्षम नहीं हैं; उनको ले जाने का दायित्व भी मेरे ऊपर है।

पिताजी के शतायु होने की मैं कामना रखता हूं – सो उसके आधार पर अगले 15 साल उनके लाइव सर्टीफिकेट अरेंज करने के दायित्व मुझे निर्वहन करने के लिये तैयार रहना है।

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पिताजी और यादें


संझा में बरामदे में बैठे, बतियाते पिताजी।
संझा में बरामदे में बैठे, बतियाते पिताजी।

शाम को घर के बरामदे में कुर्सी डाल हम बैठे थे – पिताजी, पत्नीजी और मैं। बात होने लगी पिताजी के अतीत की।

डिमेंशिया है पिता जी को। हाल ही की चीजें भूल जाते हैं। पुराना याद है। आवाज धीमी हो गयी है। कभी कभी शब्द नहीं तलाश पाते विचार के लिये। जब समझ नहीं आता तो हमें दो-तीन बार पूछना पड़ता है। यह सब फुरसत में ही हो पाता है। शाम को बरामदे में बैठे यह सम्भव है – जब समय की हड़बड़ी नहीं होती।


सन 1934 के जन्मे हैं मेरे पिताजी। गांव शुक्लपुर, तहसील मेजा, जिला इलाहाबाद। सामान्य सा गांव है शुक्लपुर। नाम शुक्लपुर है पर घर पाण्डेय लोगो के हैं। एक आध घर ही होगा शुक्ल लोगों का। गांव से गंगाजी 3 किलोमीटर की दूरी पर हैं। गांव में और आसपास के गांवों में खेत हैं हम लोगों के। कुछ बगीचे हैं – जिनके पेड़ पुराने हो कर खत्म हो रहे हैं। नये लगाये ही नहीं जा रहे। अब अलगौझी के कई दौर होने के कारण हर एक के हिस्से जमीन बहुत कम हो गयी है। घर का बड़ा मिट्टी का मकान था। करीब आधा बीघा जमीन पर। सौ साल से ज्यादा चला। हम लोग उसकी मरम्मत की सोच रहे थे। पर करीब तीन साल पहले उसे ढहा कर नया बनाने की सोची गयी। ढहा तो दिया गया, पर नया बनाने की बात पर एका नहीं हो पा रहा। गांव को लोग दुहना चाहते हैं – उसे सम्पन्न कोई नहीं करना चाहता।

चारदीवारी ले अन्दर एक बड़ा अहाता था, उसमें नीम का पेड़ था। नीम अब नहीं है।
शुक्लपुर का हमारा कुटुम्ब का मकान। अब नहीं है। 

गांव से करीब 8 किलोमीटर दूर है सिरसा। बाजार है। मेरे प्रपितामह के छोटे भाई प. आदित्यप्रसाद पाण्डेय वहां वैद्यकी करते थे। पहले बनिया लोगों के किराये पर लिये मकान में रहते थे। फिर वहीं जमीन खरीद कर मकान बनाया। वह पुराना मकान अब भी है। पर उसी साथ नया भी बना लिया है उनके पुत्र श्री तारकेश्वर नाथ पाण्डेय ने। प. आदित्यप्रसाद आयुर्वेद में आचार्य भी थे और नाड़ी-वैद्य भी। श्री तारकेश्वर जी ने उनका दवाखाना आगे चलाया। वे कुछ अपने पिताजी से सीखे, कुछ होमियोपैथी की डिग्री ले कर हासिल किया। चिकित्सालाय उनका भी अच्छा चलता रहा है।

यहां पिताजी की यादें मूलत: इन्ही स्थानों और परिवेश की हैं।


पिताजी ने बताया कि गांव का मकान लगभग तब का था जब मालिक (मेरे बब्बा प. महादेवप्रसाद पाण्डेय जन्मे होंगे या कुछ छोटी उम्र के रहे होंगे। मेरे बब्बा का जन्म 1900 में हुआ था। वह मकान मेरे पर-बाबा प. हरिभूषण पाण्डेय ने बनवाया था। अलगौझी के बाद। सिरसा में वैद्य जी ने किराये पर मकान ले वैद्यकी करते हुये वहां बनिया लोगों से जमीन खरीद कर घर बनाया। पैंतीस सौ रुपये में खरीदी थी वह जमीन। बाद में घर के पीछे की जमीन भी किसी मुसलमान से खरीदी और घर का क्षेत्रफल बढ़ाया।

इण्टर की पढ़ाई मेरे पिताजी ने वैद्य जी के पास रहते हुये सिरसा में की।  सिरसा की यादें बताते हुये उन्होने कहा कि वह आजादी के समय का दौर था। गान्धी-नेहरू-विजयलक्ष्मी पण्डित आदि लोग वहां आते रहते थे। महामना मदन मोहन मालवीय जी भी आते थे। मालवीय जी और गान्धीजी में बनती नहीं थी। उन्होने एक फोटो देखी है जिसमें गान्धीजी मालवीय जी का हाथ पकड़ कर मंच पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। नहीं तो दोनो एक साथ कम ही होते थे।

उन्हे याद है कि गान्धीजी सिरसा में करीब तीन-चार बार आये थे। नेहरू-विजयलक्ष्मी-कैलाशनाथ काटजू आदि तो आते रहते थे। शास्त्रीजी तो बहुत ही आया-जाया करते थे।

“एक बार नेहरू जी और विजयलक्ष्मी पण्डित शुक्लपुर  आये। उस जमाने में कोई गाड़ी नहीं होती थी। एक पुरानी कार का इंजतजाम हुआ था उन्हे लाने के लिये। भरत सुकुल का लड़का नन्दकिशोर कलकत्ता में कुछ गाड़ी चलाना सीखा था। उसी को जिम्मा दिया गया चलाने को। पर उससे पुरानी कार हड़हड़ाई बहुत, चली नहीं।” 🙂 

“विजय लक्ष्मी पण्डित से मिलने सुकुलपुर में गांव की कई औरतें आयीं। त्रिभुअन की माई विजयलक्ष्मी का पैर छूने लगी तो उम्र के लिहाज से विजयलक्ष्मी जी ने ही उनका पैर छू लिया। त्रिभुअन की माई कहने लगी – ल बहिनी हम त तोहार गोड़ छुअई आइ रहे, तू हमरई छुई लिहू (लो बहिन, मैं तो तुम्हारा पैर छूने आई थी, तुमने तो मेरा ही छू लिया)।”

“उस समय आजादी, देश, राजनीति के बारे में गांव में जागरूकता थी। लोग पढ़े-लिखे कम थे, पर इन सब पर चर्चा करते थे। औरतें जो परदा में रहती थीं, भी बाहर गांव में जुलूस में निकला करती थीं। लोगों में स्वार्थ कम था; जागरूकता अधिक थी।”

“सिरसा में हम गंगा नहाने जाते थे – लगभग रोज। घर में कोई तैराक नहीं था। वैद्य जी भर कुछ तैरना जानते थे। नदी पार करने के लिये पॉण्टून वाला पुल नहीं हुआ करता था (वह तो आज से पच्चीस साल पहले बनने लगा)। लोग या तो डोंगी से पार जाते थे सैदाबाद की ओर या झूंसी वाले पुल से आवागमन होता था।”

“वैद्य जी विद्वान थे। पैसे का लोभ नहीं था उन्हे। बहुतों की निशुल्क चिकित्सा करते थे। पैदल जाते थे मरीज देखने। दूर जाना होता था तो लोग इलाज करवाने पालकी में ले जाते थे। सिरसा में न्योता (भोज) का बहुत चलन था। वैद्यजी न्यौता पर नहीं जाते थे। हम लोगों को जाने को कहते थे। जब कोई नहीं जाता था तो भोजन घर पर ही भेज देते थे लोग।”

खास बात यह थी कि वैद्यजी और मालिक (मेरे पिताजी के पिताजी) कभी झूठ नहीं बोलते थे।

“वैद्य जी का पहले कम्पाउण्डर था शीतला। वह कुशल हो गया था। दवा भी करना जान गया था। उसे बाद में कपारी (?) हो गयी थी। उसी से मर गया। उसके बाद गंगा कम्पाउण्डर बना। जात का नाऊ था। वह भी बहुत दक्ष हो गया था।”

पिताजी टुकड़ों में बताते हैं – जैसे याद आता है। प्रश्न करने पर सोच कर उत्तर देते हैं। मैने पाया कि प्रश्न करना और उनके कहे को नोट करना उन्हे अच्छा लगता है। सोचता हूं कि भविष्य में इस तरह बैठने-सुनने का अवसर अधिक मिलता रहेगा।

पिताजी की पुरानी याद पर एक पोस्ट – एक कस्बे में १५ अगस्त सन १९४७