केदारनाथ चौबे का नित्य गंगा स्नान


इस इलाके में कई लोग हैं जो बरसों से, बिला-नागा, गंगा स्नान करते रहे हैं। आज एक सज्जन मिले -श्री केदारनाथ चौबे। पास के गांव चौबेपुर के हैं। वृद्ध, दुबला शरीर, ऊर्जावान। द्वारिकापुर में एक टेकरी पर बनाये अस्थाई मन्दिर में भागवत कथा कहते हैं। कुछ सुनने वाले जुट जाते हैं। कभी कोई मेला – पर्व का दिन हो तो ज्यादा भी जुटते हैं।

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द्वारिकापुर में गंगा किनारे एक टेकरी समतल कर मूर्तियां रखी हैं। वहीं केदारनाथ चौबे भागवत कथा कहते हैं।

आज एक महिला उनका स्थान साफ़ कर लीप रही थी। वही एक मात्र श्रोता होगी शायद आज कथा की।

चौबे जी ने बताया कि तेरह साल हो गये उन्हे नित्य गंगा स्नान करते। भगवान करा रहे हैं और वे कर रहे हैं। अपने गांव से रोज साइकल से आते हैं। पहले साइकल ऊपर रखते थे। एक दिन एक व्यक्ति (उन्होने नाम भी लिया) ने साइकिल उड़ा ली। तब से अपने पास ही रखने लगे हैं।

तेरह साल हो गये इस नित्य कर्म को; आगे उन्होने सन 2020 तक का समय मांगा है भगवान से।

उसके बाद? सन 2020 के बाद?

उसके बाद जहां ले जायें भगवान! उन्होने अपना हाथ ऊपर उठा कर संकेत किया कि शरीर सन बीस तक मांगा है उन्होने। ज्यादा जीना होगा तो भगवान की इच्छा।

मैने उनकी उम्र पूछी। बोले छिहत्तर साल। अर्थात अपने लिये अस्सी साल की अवस्था की कामना की है उन्होने भगवान से।

वे देखने में 76 से कम के लगते है।  “भगवान ने शरीर सन 2020 तक ले लिये नहीं, बीस साल और चलने के लिये बनाया है” मैने अपना मत व्यक्त किया।

केदारनाथ जी बीस साल जीने की बहुत इच्छा वाले नहीं लगे। बोले जो इश्वर चाहेंगे, वही होगा।

अपना कर्म, अपनी चाह, अपना जीवन; सब ईश्वर के अधीन कर केदारनाथ जी कितने सहज भाव से जी रहे हैं! हम वैसे क्यों नहीं हो पाते जी?!

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गंगा किनारे अपने आसन पर बैठे केदारनाथ चौबे जी।

 

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व्यास जी और महाकाव्य सृजन


मार्च’5, 2017:

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पगडण्डी में साइकल चलाते बढ़े जा रहे थे हम। दोनो ओर गेंहूं के खेत थे।

सवेरे की साइकलिंग में हम चले जा रहे थे। राजन भाई और मैं। राजन भाई से मैने कह दिया था कि सड़क-सड़क चलेंगे। पगडण्डी पर साइकल चलाने में शरीर का विशिष्ट भाग चरमरा उठता है। पर राजन जी ने बीच में अचानक पगडण्डी पकड़ ली थी और मैं पीछे चले जा रहा था। मुझे लगने लगा कि आज अच्छा फंस गये हैं। शायद बहुत ज्यादा साइकल चलानी पड़े। पता नहीं, अंगद जैसी दशा न हो जाये! वापसी के लिये अपने ड्राइवर को फोन कर वाहन मंगवाना पड़े घर से।

वैसे पगडण्डी समतल थी। जमीन ठोस। डामर की सड़क अगर उधड़ गयी हो, तो उसमें जितना डिस-कम्फर्ट होता है, उसके मुकाबले कहीं कम था इस रास्ते में। दोनों ओर गेंहूं के शानदार खेत थे। हरे, विशाल गलीचों जैसे। लगता है इस साल फसल बम्पर होगी। जीडीपी ग्रोथ में कृषि का योगदान बढिया रहेगा चौथे क्वार्टर में भी।

अचानक मानव निर्मित खेत खत्म हो गये और गंगा माई की खेती प्रारम्भ हो गयी। गंगा माई के इस ओर के खेत करारी मिट्टी के हैं। ऊबड़-खाबड़। उनमें सरपत लगे हैं। बहुत ऊंचे-ऊंचे नहीं थे सरपत। पर वह स्थान था मानव रहित। पगड़ण्डी भी अपनी ढलान से बताने लगी थी कि आगे नदी है।

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फ्लैक्सी बोर्ड पर यह लिखा था कि यह जगह रात्रि में माताओं, बहनों के ठहरने की नहीं है।

नदी दिखने लगी। तब एक दो झोपड़ियां दिखीं – उनपर झंडे लगे थे। एक फ्लैक्सी बोर्ड भी टंगा था। उस पर यह लिखा था कि यह जगह रात्रि में माताओं, बहनों के ठहरने की नहीं है। उसमें ऊपर “जय बाबा कीनाराम” लिखा था। जैसा मुझे मालुम है बाबा कीनाराम (सिद्ध) तान्त्रिक थे। अघोरी।

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काली जी की प्रतिमा और खोपड़ियां

टीन के शेड के नीचे काली माँ की काली/भयावह प्रतिमा थी। उनके पास चार मानवी खोपड़ियां रखी थीं। सामने एक थाले में श्मशान की लकड़ियों के दो बोटे सुलग रहे थे।

कोई तान्त्रिक या कोई भी व्यक्ति आसपास नहीं दिखा। मैने झोपड़ियों में ताक झांक की। वहां भी कोई न था। हम दोनो अपनी साइकलें रख गंगा तट की ओर बढ़ लिये।

तट का ढलवां रास्ता साफ़ था। पगडण्डी। सरपत और बबूल की बाड़ लगे बड़े बड़े सब्जियों के खेत थे नदी के किनारे। बस पगडण्डी की जगह छोड़ दी थी खेती करने वालों नें। खेत की रखवाली करने वालों  के लिए  सरपत की मड़ईयां भी थी। एक खेत, जिसमें कोई नहीं था, बड़ी सुन्दर मड़ई थी। मैं उसका चित्र लेने के लिये बाड़ हटा कर चला गया। यह सावधानी रखी कि किसी पौधे या बेल को न कुचल दूं।

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नदी किनारे मड़ई
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कमहरिया के पाठक जी। ऊंचा सुनते थे।

नदी में कुछ लोग नहाने के लिये पंहुचे थे। केवल दो-चार लोग। एक सज्जन वापस आ रहे थे तो उनको मैने नमस्कार किया। उत्तर न मिलने पर फिर से बात करने पर पता लगा कि वे ऊंचा सुनते हैं। उन्होने बताया कि कोई पाठक (ब्राह्मण वर्ण का सरनेम) हैं। पास के गांव कमहरिया के। रोज नहाने आते हैं।

अचानक एक छरहरा, गौर वर्ण, बड़े बाल और दाढ़ी वाला, सफ़ेद कपड़े पहने नौजवान तपस्वी नहाने के ध्येय से वहां पंहुचा। उससे पूछने पर पता चला कि पास के आश्रम में रहते हैं वे सज्जन। आश्रम अघोरी आश्रम के बगल में है। पहले ये तपस्वी केवटाबीर (पास के गंगा तटीय गांव) के जगतानन्द आश्रम में रहते थे। दो-चार दिन पहले यहां चले आये। यह आश्रम खाली पड़ा था। यहीं डेरा जमा लिया है उन्होने।

अकेला, नौजवान तपस्वी। बहुत आकर्षक व्यक्तित्व। काहे जवानी बरबाद (?) कर रहा है इस निर्जन स्थान पर। अघोरी आश्रम के बगल में। अटपटा लगा हमें।

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नदी में स्नान के लिये पंहुचा तपस्वी।

मैने पूछा – क्या करते हैं आप यहां रह कर?

“महाकाव्य की रचना कर रहा हूं। बहुत कुछ लिखा जा चुका है। पहले जगतानन्द धाम में लिख रहा था। एकान्त के लिये यहां चला आया।”

उन्होने बताया – “पांच शती पहले भारत वर्ष की दशा खराब थी। उस समय उत्थान के लिये तुलसी ने रामकथा को ले कर काव्य लिखा – रामचरितमानस। आज भी समाज की वैसी ही दशा हो रही है। क्षरण और पतन की दशा है। इसलिये मैं कृष्ण कथा को आधार बना कर यह काव्य लिख रहा हूं। सात अध्यायों का यह काव्य है।”

अपेक्षा नहीं थी मुझे कि इस जगह पर इस प्रकार का कोई व्यक्ति मिल जायेगा। मैने लेखन देखने की जिज्ञासा व्यक्त की। यह भी कहा कि अगर इस प्रकार का कुछ लिखा जा रहा है तो लोगों को पता तो चलना चाहिये। तपस्वी भी (सम्भवत:) यह चाहते थे कि लोगों को पता चले। उन्होने कहा कि हम लोग आश्रम में इन्तजार करें, दस मिनट में नहा कर वे आते हैं।

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बरगद के तले आश्रम।

आश्रम की ओर जाते समय राजन भाई ने अपनी व्यग्रता जताई – “ये बाबाजी के साथ तो बहुत समय लग जायेगा। मुझे आठ बजे घर पंहुचना है। काम है।”

हमने तय किया कि तपस्वी से मिल कर हम लोग किसी और दिन आने की बात कहेंगे। रुकेंगे नहीं। तपस्वी की प्रतीक्षा में मैने आश्रम का मुआयना किया। साफ़-सुथरा था वह स्थान। एक विशालकाय बरगद से आच्छादित। एक ओर शंकर जी का मन्दिर था। दो-तीन कमरे। बाहर एक कुंआ। छत पर जाने के लिये सीढ़ी। कुल मिला कर रमणीय स्थान था। मैने  सोचा कि तपस्वी के साथ यहां रुका/रहा जा सकता है।

दस मिनट में ही आ गये तपस्वी। एक गमछा पहने। मैने कहा – हमें जल्दी है। आप अपने लेखन के एक दो पन्ने दिखा दें। विस्तार से बाद में आकर चर्चा करेंगे।

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अपनी पाण्डुलिपि लिये कमरे से निकलते तपस्वी। 

उन्होने सहज उत्साह से अपना लेखन दिखाया। एक मोटा, गत्ते पर लाल कपड़े की जिल्द वाला अच्छा रजिस्टर। मैने एक दो पन्नों के चित्र लिये। वे उत्साह से पाण्डुपि का एक अन्य रजिस्टर भी ले आये जिसमें ग्रन्थ का प्रारम्भ था। सरसरी निगाह से मैने पढ़ा – चौपाईयां और दोहे तुलसीबाबा की भाषा जैसे गठे हुये लगे। अच्छा प्रवाह था उनमें।

तपस्वी की लगन और धुन ने बहुत प्रभावित किया मुझे। आज भ्रमण का अनुभव विलक्षण था। शुरुआत में जैस लग रहा था, उससे बिल्कुल उलट।

मैने तपस्वीजी का मोबाइल नम्बर लिया। नाम पूछा तो बताया कि “व्यास जी” कहते हैं। आश्रम से बाहर निकलने पर दो ग्रामीण मिले। उन्होने बताया कि यह आश्रम योगेश्वरानन्द जी का था। उन्हे देह त्याग किये छ साल हो गये। उसके बाद दो-तीन बाबा लोग आये पर टिके नहीं। अब ये आये हैं। बड़े अच्छे हैं बाबा जी।

कुछ अजीब लगा कि बाबा लोग यहां टिके क्यों नहीं। पास के अघोरियों के आश्रम के कारण तो नहीं? मैं शंका लिये हुये राजन भाई के साथ वापस लौट चला।

करीब 14 किलोमीटर, मुख्यत: पगडण्डी के रास्ते साइकल चलाई आज सबेरे। और ऐसा अनुभव रहा कि कभी भूलूंगा नहीं।

व्यास जी से मिलने और उनका ग्रन्थ ध्यान से देखने फिर जाऊंगा वहां। शायद गिनती के कुछ लोगों को ज्ञात है कि एक तपस्वी एक कोने में बैठा महाकाव्य लिख रहा है।

गंगाजी का तट अपने आप में जाने कितनी विलक्षणता से भरा है।

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पाण्डुलिपि का एक पन्ना। इसमें चौपाई/दोहे के साथ भावार्थ भी है। 

उमादास


GDFeb164437गुरु द्वारा दिया नाम उमादास। गृहस्थ नाम ॐ प्रकाश शुक्ल। बांसगांव, देवरिया के रहने वाले। कृशकाय शरीर। पर्याप्त स्फूर्ति। साधू।

उमादास नाम गुरु का दिया है। गुरु का नाम भी बताया उन्होने। बनारस के हैं गुरूजी।

चाय की चट्टी पर अचानक दिखे। चट्टी वाले अरुण से मैने उनके बारे में पूछा – कौन हैं?

“होंगे कोई बाबा। आते जाते रहते हैं।” अरुण ने उनके बारे में अनभिज्ञता जताई।  अपने पिताजी के समय से चट्टी पर इस तरह के बाबा लोगों का सत्कार करते रहे हैं अरुण और अन्य भाई लोग। बिना पूछे कि कौन कहां के हैं। मैं अरुण से भी प्रभावित होता हूं और बाबाजी से भी। सरल से जीव लगते हैं बाबा जी। पास के हैण्डपम्प से पानी ले कर खड़े बाबा से बतियाने लगता हूं।

अपना मुकाम पहले गोरखपुर बताते हैं। ज्यादा पूछने पर देवरिया और उसके आगे तिखारने पर बांसगांव। बाईस जनवरी को चले हैं। मईहर तक जा कर लौटेंगे। कुल 125 दिन की यात्रा का अनुमान है। पैदल ही चलते हैं उमादास। रोज लगभग 5 कोस। जहां जगह मिली वहां विश्राम कर लेते हैं और जहां जो भोजन मिला, वही कर लेते हैं। पास में एक कपड़े में रोल किया कम्बल-चद्दर है। एक झोले में अन्य सामान। एक कमण्डल भी है – जो शायद साधू होने का प्रतीक है। अन्यथा उनके पास एक ग्लास भी दिखा, जिसमें पानी पी रहे थे वे।

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उम्र नहीं पूछी; पर मेरी उम्र के तो होंगे ही। शायद ज्यादा भी। स्वस्थ होने के कारण मुझसे जवान लगते थे।

अपनी अवस्था का अनुमान देते हुये बताते हैं उमादास – “शरीर का क्या भरोसा? अपना पता और तीन चार लोगों का मोबाइल नम्बर अपने झोले में रखा हूं।”

झोले से निकाल कर गीता की प्रति और उसमें लिखे मोबाइल नम्बर/पता आदि दिखाया उन्होने। बोला कि गीता और रामायण साथ में ले कर चलते हैं।

अपना खाना भी बना लेते हैं?

“नहीं, जो मिला वही कर लेता हूं। कभी अगर कुछ न मिला तो दो टिक्कड़् सेंक लेता हूं।”

पहले भी कभी यात्रा की है?

“पन्द्रह साल पहले चित्रकूट तक गया था इसी तरह। अकेले। एक बार मैरवा गया था। पैदल ही। अकेले। नेपाल नहीं गया। पहाड़ नहीं चढा हूं।”

अपनी दशा या देश-काल से कोई शिकायत नहीं लगी उमादास को। प्रसन्नमन ही दिखे। उन्हे मैने चलते समय एक जून के भोजन के पैसे दिये। बडी सहजता से स्वीकार किये उन्होने।

वापसी में अपने साथ चलते राजन भाई से मैने कहा – एक उमानाथ हैं। अगली जून के भोजन की फिक्र नहीं और मैं हूं; जो अगले साल भर के लिये अन्न संग्रह की जुगत में हूं। एक वाहन, एक वाहन ड्राइवर काइन्तजाम कर रहा हूं। मैं असन्तुष्ट हूं। उमानाथ संतुष्ट हैं और प्रसन्न भी।

अपना अपना भाग्य। अपनी अपनी दशा।

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गड़ही, बेलपत्ता और बाबा विश्वनाथ


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विक्रमपुर में कटका स्टेशन के पास गंदे पानी की गड़ही में कुछ बच्चे जमा थे। मुझे लगा मछली मार रहे होंगे। पास जा कर देखा तो पानी में भीगे गठ्ठर नजारआये। यह जमा नहीं कि इतनी जरा सी गड़ही में गठ्ठर भर मछली निकल आये।
बच्चों से पूछा – गठरी में क्या है?
एक ने जवाब दिया – बेलपत्र। बनारस ले जायेंगे।
आगे पता चला कि बच्चे गाँव के ही हैं। उनके परिवार के मर्द – भाई और पिता दक्षिण में गंगापार के मिर्जापुर के जंगलों से तोड कर लाते हैं यह बेलपत्र। लगभग रोजाना। सवेरे वे बच्चे गड़ही के पानी में गीला कर रहे हैं गठ्ठर। उसके बाद उनकी माँ यह ले कर बनारस जाएगी। गदौलिया में बाबा विश्वनाथ मंदिर के पास बेलपत्ता की सट्टी लगती है। वहां बेच कर वो वापस लौटती है। बनारस बस से जाती है या ट्रेन से। दोनों साधन हैं विक्रमपुर में।
शानदार माडल है यह पारिवारिक मेहनत और बिजनेस का।
यह माडल कई परिवार काम में लाते हैं व्यवसाय के लिए।
तब तक उन बच्चों की माँ भी आ गयी। मेरे पूछने पर गठ्ठर उठाते समय उसने बताया कि 2-3सौ मिल जाते हैं इस में। मुझे लगा कि इससे कुछ ज्यादा ही मिलते होंगे।

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चलते चलते मैंने बच्चों को गठ्ठर के पास खड़ा कर एक चित्र लिया।
वापस आते समय गड़ही के पानी के बारे में सोच रहा था कि बाबा विश्वनाथ इस गड़ही के पानी से भीगा एक बेलपत्ता भी चबा लें तो हैजा हो जाए उन्हें! शर्तिया!
जय बाबा विश्वनाथ!!! जय भोलेनाथ।

अविनाश सिरपुरकर : एक दण्ड-अधिवक्ता के पीछे का व्यक्तित्व


श्री अविनाश सिरपुरकर (उनके फेसबुक प्रोफाइल का चित्र)
श्री अविनाश सिरपुरकर (उनके फेसबुक प्रोफाइल का चित्र)

समाचारों में मैं क्रिमिनल लॉयर्स के बारे में बहुत पढ़ता-सुनता रहा हूं। पर पहले किसी क्रिमिनल लॉयर से सम्पर्क नहीं हुआ था। अत: एक कौतूहल तो था मन में कि ये व्यक्ति अपराध, छद्म, और मामलों को सदा एक्यूट एंगल से देखते देखते अपने सामान्य व्यक्तित्व, आदर्श और नैतिकता को किस स्तर का बनाये रखते हैं। यह इच्छा मन में थी कि अगर ऐसे किसी व्यक्ति से कभी मिला तो इस बारे में पूछूंगा जरूर।

मुझे अवसर मिल गया जब मैं उस दिन अपने काम से श्री अविनाश सिरपुरकर से उनके इन्दौर के दफ्तर में मिला। उनसे इस विषय में टेनटेटिव प्रश्न किया। पर अविनाश जी ने सम्भवत: इसे मूल विषय से इतर मान कर यही समझा कि मैं उनसे नेटवर्किंग बनाने के लिये इस प्रकार का प्रश्न कर रहा हूं। वह बात वहीं रह गयी।

अविनाश जी से अगले दिन पुन: मुलाकात हुई। रतलाम में। तब उन्होने स्वयम अपने विषय में (लगभग) विस्तार से बताया।

अविनाश मध्य प्रदेश हाई-कोर्ट के वरिष्ठ दण्ड-अधिवक्ता (क्रिमिनल लॉयर) हैं। वरिष्ठ और व्यस्त। “मेरी सात पीढ़ियां अधिवक्ताओं/कोर्ट-कचहरी वालों की हैं।” उनकी मानी जाये तो कानून-कोर्ट-कचहरी-अदालत केन्द्रित है उनका जीवन। “उसके अलावा कुछ नहीं”

मैं असहमति जताता हूं। एक व्यक्ति जो सफलता के सोपान तय कर के (लगभग) शीर्ष पर पंहुचता है, एकांगी नहीं हो सकता। किसी न किसी अन्य प्रकार से समाज के प्रति अपना दायित्व समझता होगा – अगर वह मात्र आत्मकेन्द्रित/स्वार्थपरायणी न हो। और एक इण्ट्रोवर्ट व्यक्ति के भी उत्कृष्टता के एक से अधिक पहलू होते हैं।

स्टीफन आर कोवी की पुस्तक – द एड्थ हैबिट ( THE 8TH HABIT: FROM EFFECTIVENESS TO GREATNESS) पढ़ते समय मुझे यह गहरे से महसूस हुआ था कि सफल व्यक्ति केवल सफलता पर ही ठहरता नहीं है। उसमें समाज और जीवन को प्रतिदान (contribution) करने,  मूल्य (values) देने, और लीगेसी स्थापित करने की अंतर्निहित इच्छा होती है। यह मानव का मूल स्वभाव है।

अविनाश जी का फेसबुक कवर
अविनाश जी का फेसबुक कवर

इस बारे में अविनाश जी काफी झिझकते हुये खुले। मुझ जैसे लगभग अपरिचित से खुलने में होने वाली झिझक स्वाभाविक है। शुरुआत उन्होने अपने घर के पास एक मन्दिर बनाने की बात से की। मैं धार्मिकता का पहलू समझ सकता हूं। उनके फेसबुक प्रोफाइल के कवर पर गजानन महाराज का चित्र है। उन्होने बातचीत में शेगांव (वह स्थान जहां गजानन महाराज प्रकट हुये) की चर्चा भी की।

इसके बाद उन्होने जिस बात की चर्चा की, वह प्रसन्न कर देने वाली थी। अपने किसी मित्र ‘व्यास जी’ के कहे अनुसार वे सन 2003 से प्रतिवर्ष इंजीनियरिंग/डाक्टरी के कुछ विद्यार्थियों की शिक्षा का खर्च वहन करते हैं। उसमें विद्यार्थी के साथ तय यही होता है कि पढ़ाई के बाद समर्थवान हो कर वह भी इसी प्रकार दूसरों की पढ़ाई में सहयोग करेगा।

“क्या वे बाद में ऐसा करते हैं?”

“जी हां।”

मुझे अच्छा लगा यह जानकर कि इस तरह अविनाश जी विद्यादान की चेन कायम कर रहे हैं।

आगे स्वत: बताया उन्होने – “वकालत में सफलता के कारण मुझे पैसे की समस्या नहीं है। मेरा विचार है कि पचपन की अवस्था तक वकालत करूंगा। उसके बाद आदिवासियों के बीच काम करने का मन है।”

“अच्छा! क्या तय कर लिया है कि कहां और किस प्रकार कार्य करेंगे?”

अविनाश जी ने झाबुआ क्षेत्र की बात की। रतलाम रेल मण्डल में लम्बे अर्से तक कर्य करते हुये मुझे झाबुआ के आदिवासियों की विपन्नता के बारे में अनुभूति है। अनेक आदिवासी लोगों के चेहरे मेरी स्मृति में हैं। वनवासी कल्याण की जरूरतों के बारे में बहुत लोगों से सुना है। अत: यह जान कर बहुत अच्छा लगा।

मैने अविनाश जी से अपनी भी कही – आने वाले समय में गांव और गंगा नदी के सामीप्य में रहने की बात। उन्होने कहा – अच्छा है। आपके पास गंगा हैं और मेरे समीप हैं नर्मदा!

बातचीत के प्रारम्भ में मैं एक क्रिमिनल लॉयर के समक्ष था। एक ऐसा व्यक्ति जो सामने वाले को अपने तर्क, सूचना और वाकपटुता से हतप्रभ और निष्प्रभावी करने में दक्ष होता है। जिस क्रिमिनल लॉयर का यह ‘आवरण’ जितना कठोर और इम्प्रेगनेबल होता है, वह (मेरे अनुमान से) अपने पेशे में उतना कुशल होता है। पर बातचीत समाप्त कर हाथ मिलाते हुये मैं उस आवरण के पीछे के एक संवेदनशील और समाज के प्रति जिम्मेदार व्यक्ति से परिचय पा चुका था। एक सज्जन और एक उत्कृष्ट व्यक्ति से परिचय पाना किसे अच्छा नहीं लगता?

मैं वास्तव में प्रसन्न था। भविष्य में अगर अविनाश जी से सम्पर्क बना रहा तो उनके झाबुआ अदिवासियों के कल्याण कार्यों के बारे में जानने की इच्छा रहेगी!


कैथी और कांवरिये


कैथी के गंगा तट पर कांवरिये
कैथी के गंगा तट पर कांवरिये

पिछले शनिवार वाराणसी से औंडिहार जाते हुये सब ओर कांवरिये दिख रहे थे। बनारस आते हुये – उनके कांधे पर डण्डी और उससे लटकी छोटी छोटी प्लास्टिक की लुटिया/कमण्डल में गंगा जल। डण्डी अपनी अपनी श्रद्धा अनुसार सजाई हुयी – फूलों और आम की टेरियों से सजाने का युग अब समाप्त हो गया है। उनके स्थान पर प्लास्टिक की झालर, प्लास्टिक के ही फूल और बन्दनवार थे। धर्म और श्रद्धा का प्लास्टिक और प्रदूषण से वैर अभी नहीं हुआ है। कोई शंकराचार्य अभी नहीं जन्मे जो प्लास्टिक को धर्म विरोधी घोषित करते हों। विश्व हिन्दू परिषद भी ऐसा नहीं कहती, शायद।

उनके वस्त्र यद्यपि गेरुआ थे। पर अपेक्षानुसार मॉडर्न भी। टी-शर्ट और घुट्टन्ना गेरुआ रंग में। अधिकांश नंगे पैर थे। एक दशक बाद शायद रीबॉक गेरुआ रंग के स्पोर्ट्स शू निकाल दे तो वे फैशन में आ जायें। अभी तो लग रहा था कि अधिकांश के पैर में छाले पड़े हुये थे और उनकी चाल थकान या छालों के कारण धीमी हो चली थी। गनीमत थी कि बारिश के कारण सड़क गीली थी। तप नहीं रही थी।

मार्कण्डेय महादेव के बाद परिदृष्य बदल गया। उसके बाद ट्रक या ट्रेक्टर टॉली में झुण्ड के झुण्ड कांवरिये आने लगे – वे कैथी के तट पर गंगाजी से जल उठा कर चलने के लिये जा रहे थे।

जाती बार तो हम औंडिहार चले गये – रेलवे के काम से। पर वापस लौटते हुये वाहन को गंगा तट पर मोड़ लिया कैथी में। मुख्य सड़क से उतर कर करीब दो किलोमीटर दूर है कैथी का गंगा तट। वहां जाते कई वाहन – ट्रक, ट्रेक्टर-ट्रॉली और टेम्पो/ऑटो भरे हुये थे कांवरियों से। वापसी में पैदल आते हुये कांवरिये दिख रहे थे।

कैथी में जल लेने, रंगबिरंगे ऑटो में आये कांवरिये।
कैथी में जल लेने, रंगबिरंगे ऑटो में आये कांवरिये।

गंगा तट पर पंहुचते पंहुचते बारिश होने लगी। चिरैया उड़ान बारिश – कभी होती तो कभी रुक जाती। तट पर एक मेक-शिफ्ट दुकान के आगे मैं रुक गया बारिश से बचने को। उसमें कांवरियों के काम की सभी सामग्री बिक रही थी। कपड़े, रामनामी थैले (उनपर शंकर जी के चित्र, बोल-बम का नारा आदि छपे थे), प्लास्टिक की लुटिया/कमण्डल, डण्डी, प्लास्टिक के जरीकेन (2-3 लीटर क्षमता वाले) आदि थे।

एक कांवरिये ने फरमाइश की – प्लास्टिक की लुटिया की बजाय मिट्टी की नहीं है?

दुकान में बिकती कांवरियों की सामग्री
दुकान में बिकती कांवरियों की सामग्री

दुकानदार ने तड़ से जवाब दिया – “नहीं, मिट्टी वाली प्रशासन ने बैन कर दी है।”

लगा कि प्रशासन वह ढ़ाल है जिसे वैध-अवैध सब काम के लिये अड़ाया जा सकता है। … वैसे प्रशासन अगर प्लास्टिक की लुटिया/जरीकेन बैन कर दे तो पर्यावरण का बड़ा फायदा हो।

कांवरिये स्नान कर रहे थे और गंगाजल भर कर रवाना हो रहे थे। कुछ स्त्रियां भी थीं। मुझे बताया गया कि वे जल ले कर आस पास अपने गांवों के शिवालय पर चढ़ाती हैं। पुरुषों की तरह बाबा विश्वनाथ के मन्दिर तक नहीं जातीं काशी की ओर। कुछ कांवरिये स्नान के बाद अपना फोटो खिंचा रहे थे। वापस रवाना होते समय कुछ चंचलमन दिखे बोल-बम का नारा लगाते; पर कुछ ऐसे थे, जो श्रद्धा में सिर झुकाये धीमे धीमे भगवान का नाम बुदबुदा रहे थे। कुल मिला कर धार्मिक श्रद्धा गहरे में दिखी – कहीं सामुहिक, कहीं व्यक्तिगत। वह श्रद्धा मुझे भी छू ले रही थी। मुझे भी और मेरे कैमरे को भी।

सम्पत की नाव
सम्पत की नाव

एक मल्लाह अपनी सुन्दर सी नाव किनारे पर ले आया और आग्रह करने लगा कि मैं नाव पर घूम आऊं – किनारे किनारे कैथी से गोमती संगम तक। प्रति व्यक्ति 30 रुपया किराया। 10 आदमियों के बैठने की जगह। गंगाजी बढ़ी हुई थीं – सो हम लोगोंने मना कर दिया।

सम्पत के साथ मैं। नेपथ्य में उसकी नाव।
सम्पत के साथ मैं। नेपथ्य में उसकी नाव।

मैने उसके साथ उसकी नाव के आगे खड़े हो कर चित्र खिंचाया। प्रवीण पाण्डेय जी ने खींचा और मुझे मोबाइल से ही ट्रांसफर कर दिया। मल्लाह, नाम सम्पत, ने कहा कि उसे कुछ तो दे दूं मैं। सो फोटो खिंचाई के दस रुपये दे दिये मैने। हमारे सह कर्मी ने उससे चुहुल की कि अब तक तो वह मछली पकड़ता था, अब कैसे पर्यटन कराने लगा। सम्पत ने कसम खाते हुये कहा कि वह सावन में कत्तई मछली नहीं पकड़ता। पर उसके चेहरे पर जो मुस्कान थी, वह बता रही थी कि वह सच नहीं कह रहा।

यह मछलियों का प्रजनन समय है। मल्लाह इस समय मछली पकड़ना बन्द कर देते हैं। पर यह नियम पालन करने वाले कम से कमतर होते जा रहे हैं। गंगा माई की ऐसी तैसी करने मे यह भी एक घटक है। आदमी अपनी हाही (लालच) के लिये गंगाजी के साथ कितनी निर्दयता कर रहा है – कितना गिना, गिनाया जाये। और अकेले सम्पत पर काहे उंगली उठाई जाये। 😦

सांझ हो चली थी। हम लोग लौट चले कैथी से।

कैथी की सांझ
कैथी की सांझ

शैलेश पाण्डेय, गंगोत्री और साधू


ऋषिकेश में शैलेश पाण्डेय
ऋषिकेश में शैलेश पाण्डेय

शैलेश पाण्डेय ने पिछले वर्ष उत्तराखण्ड में प्राकृतिक आपदा के बाद गुप्तकाशी के आगे रेलगांव-फाटा के पास मन्दाकिनी नदी पर रोप-वे बनाया था। लगभग सप्ताह भर वहां रहे थे और ग्रामीणों की बहुत सहायता की थी। उस घटना को एक साल हो रहा है।

अभी कुछ दिन पहले शैलेश ने बताया था कि उनका इरादा घर से एक दो दिन में निकल पड़ने का है और अभी तय नहीं है कि कहां जाना है।

यात्रा प्रारम्भ। अमेठी के पास बस में।
यात्रा प्रारम्भ। अमेठी के पास बस में।

दस तारीख को ह्वाट्सएप्प पर उनके द्वारा अमेठी के पास एक बस का चित्र मिला; जिससे पता लगा कि यात्रा दो-तीन दिन पहले प्रारम्भ हो गयी थी।

उनके अगले पड़ाव – सीतापुर का पता चला। फिर ऋषिकेश। वहां से रास्ते में पड़े  नरेन्द्रनगर, टिहरी गढ़वाल में चम्बा और फिर उत्तरकाशी।  उत्तरकाशी से आगे की यात्रा – रास्ते में स्थान लाट सेरा, हरसिल और अन्त में गंगोत्री। कुल यात्रा 1500किलोमीटर से अधिक की है। गूगल मैप मे‍ यात्रा का रूट यह रहा – shailesh journey यात्रा की विषमतायें और विशेषतायें तो शैलेश ही बता सकते हैं, मुझसे तो कुछ ही ह्वाट्सएप्प के माध्यम से आदान-प्रदान द्वारा ज्ञात हुआ।

ऋषिकेश
ऋषिकेश

शैलेश ने ह्वाट्सएप्प पर लिखा था कि “बहुत अच्छा लग रहा है। तीन दिन हो गये हैं और किसी भी बात ने न मुझे उद्विग्न किया है न मुझे क्रोध आया है। आनन्द की अनुभूति..। उन लोगों के बीच अच्छा लग रहा है जो जिन्दगी जीने के लिये हर क्षण जद्दोजहद करते हैं।”

शैलेश 11 जून को ऋषिकेश पंहुच गये। उत्तरप्रदेश की तरह वहां भी बिजली नहीं थी। पहाड़ के पीछे से निकलता चांद पूरे अंधेरे से झांकता दिख रहा था।

रात में भोजन का  जो चित्र भेजा शैलेश ने, उससे मेरा भी मन हो उठा कि कितना अच्छा होता अगर मैं भी वहां होता… अगले दिन भी सवेरे ऋषिकेश का चित्र था। सवेरे नाश्ते में पराठा-छोले थे। शैलेश ने लिखा – “आड़ू और आलूबुखारा खूब मिल रहा है।”  साथ में कथन भी कि हरसिल के लिये निकल रहे हैं वे लोग – यानी वे और हर्ष। हरसिल यानी गंगोत्री की ओर।

ऋषिकेश में रात का भोजन करते हर्ष।
ऋषिकेश में रात का भोजन करते हर्ष।

ऋषिकेश से बरास्ते उत्तरकाशी; गंगोत्री के रास्ते के कई चित्र भेजे शैलेश ने। यह भी लिखा कि टिहरी के कई वनों में आग लगी हुयी है। अभी आग है और आने वाली वर्षा में भूस्खलन होगा। पता नहीं आग और भू-स्खलन में कोई रिश्ता है या नहीं…

दूर, टिहरी के जंगल में लगी आग।
दूर, टिहरी के जंगल में लगी आग।

उसके बाद उत्तरकाशी पड़ा, फिर मनेरी डैम, आगे लाटसेरा और फिर गंगोत्री। होटल में डबल रूम मिल गया 300 रुपये में! शैलेश ने बताया कि उनका कुल खर्च गंगोत्री पंहुचने का 500-600 हुआ होगा। …

उत्तरकाशी
उत्तरकाशी

यायावरी के लिये बहुत पैसे की जरूरत नहीं है। और आपके पास मोबाइल का कैमरा और नोट्स लेने के लिये एक स्क्रिबलिंग नोटबुक हो तो कोई खरीद कर सूटकेस में बोझ भरने की भी जरूरत नहीं भविष्य के लिये यादें संजोने को।

मैने शैलेश को लिखा कि काश मेरा स्वास्थ्य ठीक होता इस प्रकार की यात्रा के लिये। शैलेश ने कहा कि स्वास्थ्य को बहुत लाभ मिलेगा, अगर आप यहां आयें!

गंगोत्री में होटल।
गंगोत्री में होटल।

 

अगले दिन शैलेश ने अपना और हर्ष का धोतियां लपेटे उस स्थान का चित्र भेजा, जहां राजा भगीरथ ने (गंगावतरण के लिये) तपस्या की थी। महान तपस्वी। काश गंगा-शुद्धिकरण वाले गालबजाऊ लोग उनमें अपना आदर्श तलाशते। वे लोग इस प्रकार यायावरी कर वहां जायें तो शायद गंगाजी को पुनर्जीवित करने की भावना से ओतप्रोत हो सकें।

हर्ष (बांये) और शैलेश - वहां जहां भगीरथ ने गंगावतरण के लिये तपस्या की थी।
हर्ष (बांये) और शैलेश – वहां जहां भगीरथ ने गंगावतरण के लिये तपस्या की थी।

“भैया, यहां से वापस आने की तनिक भी इच्छा नहीं हो रही।” शैलेश ने संदेश में लिखा। “मन में ऐसे प्रश्न उठ रहे हैं, जिन्हे लोग आध्यात्म कहेंगे और उन प्रश्नों के उत्तर भी शायद यहीं मिलेंगे।”

अगले दिन (आज 15 जून को) शैलेश ने बताया कि वे एक नागा साधू से मिले, जंगल में एक गुफा में। वहां सामान्यत: कोई जाता नहीं। निश्छल और बच्चे से व्यक्ति। उन्हे मालुम था कि आज मोदी भूटान जा रहे हैं। गुफा दुर्गम्य अवश्य थी, पर मोबाइल नेटवर्क वहां भी था। बैटरी कैसे चार्ज करते होंगे, यह मैने नहीं पूछा। शैलेश से मिलने पर यह जिज्ञासा रखूंगा। साधू बाबा ने शैलेश और हर्ष को चाय भी पिलाई।

दुर्गम जंगल में साधू की गुफा में शैलेश!
दुर्गम जंगल में साधू की गुफा में शैलेश!

मैं वाराणसी वापस पंहुचने पर शैलेश से इन सज्जन के बारे में विस्तार से पूछूंगा जो ऐसे दुर्गम स्थान पर रहते हैं… आगे शायद जो शैलेश बतायें, वह एक पोस्ट का रूप ले। पता नहीं। आजकल ब्लॉग कम ही लिखा, देखा जा रहा है…