द्वारिका और परवल का जवा


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परवल के जवा के गठ्ठरों के साथ द्वारिका

पचेवरा के घाट पर प्रतीक्षा करने वालोँ के लिये चबूतरा है। दाह संस्कार करने आये लोग और मोटर बोट पकड़ कर उस पार मिर्जापुर जाने वाले यहाँ इंतजार करते हैँ। मैँ सवेरे वहां तक चक्कर लगाता हूं। कुछ देर सुस्ताने के लिये उस चबूतरे पर बैठता हूं। वहां से गंगा की धारा भी दिखती है और सड़क भी।

अचानक दो आदमी घाट से आते हैं और पास में पड़े हरे डंठल के गठ्ठर उठाने लगते हैँ। ऐसा गठ्ठर मैने पहले कभी नहीँ देखा। उनसे पूछता हूं – क्या है यह?
“परवल। परवल का जवा।” सफेद कमीज पहने एक व्यक्ति बताता है। दोनोँ एक एक गठ्ठर उठा कर चले जाते हैं घाट पर। फिर भी तीन गठ्ठर बचे रहते हैं वहां जमीन पर। मुझे यकीन हो जाता है कि मेरे प्रश्नोँ का उत्तर देने के लिये वे फिर आयेंगे ही; वर्ना मैं उनके पीछे पीछे घाट तक जाता।

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उनकी वापसी में उनसे और जानकारी लेता हूँ। गंगा उस पार वे परवल की खेती करते हैं। यह गठ्ठर वाली वनस्पति परवल के तने हैं। परवल की पौध बनती है इनसे।

कहाँ से ला रहे हैं ये परवल का जवा?

गाजीपुर से।

इतनी दूर से। आसपास नहीँ मिलता क्या?

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पता चला कि वे गाजीपुर के ही रहने वाले हैं वहां उनके परवल के खेत हैं। यहां गंगापार मिर्जापुर में भी परवल की खेती करते हैं। यहां उनकी जमीन नहीं है। पट्टे पर ली है जमीन। छ हजार रुपया बीघा सालाना की लीज। करीब 40 बीघा जमीन है। 7-8 लोग साझे में परवल की खेती करते हैं। गाजीपुर में अपने ही खेत से ले कर आ रहे हैं परवल का जवा। गंगा की रेती में परवल की खेती नहीं होती। उसके आगे मिट्टी के खेत हैं। उनको लीज पर ले कर उनमें पर वल उगाते हैं। पानी बहुत मांगती है परवल की फसल, सो अपने ही पैसे से उन्होने बोरवेल लगाया है। खेती के लिये पर्याप्त पूंजी खर्च की है इन लोगों ने।

वहां गाजीपुर में ही नहीं ली जमीन खेती के लिये?

लाल टीशर्ट वाले व्यक्ति ने बताया – वहां भी अच्छी खेती है। पर परिवार बड़ा हो गया तो कुछ लोगों को बाहर निकलना ही था।  

लोग गाजीपुर/बलिया से आजीविका की तलाश में बम्बई, अहमदाबाद या बंगलोर जाते हैं। इनका आजीविका का मिर्जापुर आने का उद्यमी मॉडल बहुत रोचक लगा मुझे। शायद ये मार्केट के पास खेती कर बेहतर दाम पाते होंगे अपनी फसल का।

लाल टीशर्ट वाला तब तक अंतिम गठ्ठर उठा कर जाने लगा था। मन में प्रश्न बहुत थे पर उनको वहीं विराम दिया मैने।

कौन कहता है कि धुर गाजीपुरी/बलियाटिक लोग आंत्रेपिन्योर नहीं है?! पांच सात मिनट के इस वार्तालाप में पूर्वांचल के प्रति इज्जत बढ़ गयी मेरे मन में।

जाते जाते लाल टीशर्ट वाले से नाम पूछा मैने। बताया – द्वारिका।

आगे पत नहीं कभी मिलना होगा या नहीं द्वारिका से। पर छोटी सी मुलाकात मुझे बहुत कुछ बता गयी। शायद आपको भी, इस माध्यम से! 🙂

 

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अंतिम गठ्ठर ले कर गंगा तट पर जाते द्वारिका। अलविदा।
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धईकार बस्ती का दऊरी कारीगर


कुनबीपुर में खीरे का मोलभाव और खरीद कर आगे बढ़े राजन भाई और मैं। आगे धईकार बस्ती थी उसी गांव में। सवेरे सवेरे लोग काम पर लग गये थे। स्त्रियां बरतन मांज रही थीं। बच्चे खेलने में मशगूल हो गये थे। बकरियां और मुर्गियां इधर उधर मुंह मार रही थीं।

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सवेरे का शीतल समय। धईकार बस्ती में सब काम पर लग गये थे। वह दऊरी बना रहा था।

वह बन्दा सवेरे दऊरी बनाने के काम में लग गया था।

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दऊरी बनाने के औजार। नीचे बांका है और दायें हाथ में बांकी।

राजन भाई को देख उसने पैलगी की। मुझे चित्र लेता देख थोड़ा संभल कर बैठ गया। मैने पूछा उसके औजारों के बारे में। गंड़ासा नुमा औजार को उसने बताया – बांका।  उसका प्रयोग वह बांस काटने में करता है। उससे छोटी बांकी। बांकी से महीन काम करता है वह – बांस को छीलना, दऊरी की सींके बनाना आदि। दऊरी बुनने के बाद उसके ऊपर बांस का रिंग नुमा गोला लगाता है। उसी से दऊरी में मजबूती आती है। उसने बिनी दऊरी और गोला दिखाया मुझे।

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दऊरी की बुनावट देखी मैने। बहुत सुघड़ थी। बांस की सींकें जो प्रयोग की गयी थीं, उनमें कहीं कोई एसा कोना नहीं था जिससे उपयोग करने वाले की उंगलियों में फांस लग जाये। दऊरी का आकार भी पूर्णत:अर्ध गोलाकार था। उस आदमी ने दाम बताया डेढ़ सौ रुपये। दिन भर में एक ही बना पाता है – ऐसा उसने बताया। यह भी जाहिर किया कि इस काम में बरक्कत नहीं है – साहेब, बांस भी कितना मंहगा हो गया है। 

आसपास के खेतों में खटीक-किसान यह दऊरी का प्रयोग करते हैं। उसके स्थान पर प्लास्टिक के टब का प्रयोग नहीं होता। अभी भी दऊरी का प्रयोग बेहतर और किफ़ायती दोनो होगा, अन्यथा इन लोगों का कामधाम खत्म हो गया होता।

कामधाम खत्म तो हो ही रहा है। दोना-पत्तल तो लगभग प्रयोग से बाहर ही हो गये हैं। बंसवारी खत्म हो रही हैं तो बांस की बनी वस्तुयें भी कम होती जा रही हैं। मन में आता है कि इन सभी लुप्त होती विधाओं का दस्तावेजीकरण कर लूं मैं। लेखन/चित्र/वीडियो के माध्यम से। PARI – People’s Archive of Rural India ऐसा ही कर रहा है।

राजन भाई को मैं इस बारे में कहता हूं। वे भी समझते हैं इस जरूरत को। यद्यपि इस तरह का कोई काम उन्होने किया नहीं है, पर मेरे साथ घूमते और चित्र आदि सोशल मीडिया पर पोस्ट करते उन्हे यह लगने लगा है कि गांव के इलाके को अंतरराष्ट्रीय नक्शे पर लाने का यह अच्छा तरीका है।

उस कारीगर को बताते हैं – तोर फोटो लेहे हयेन। अब अमेरिका, लन्दन, सगरौं जाये तोर फोटो। तब एक्स्पोर्ट आर्डर मिले (तेरा फोटो ले लिया है। अब विदेशों में जायेगा यह फोटो और उससे मिलेंगे एक्स्पोर्ट के आर्डर)।

गांव के मनई से बात करना खूब आता है राजन भाई को। आखिर यहीं रहे, पले, बढ़े हैं वे। उनके साथ घूमने का आनन्द भी है और जानकारीयां पाने का लाभ भी।

हनक-ए-योगी


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द्वारिकापुर का गंगा तट। बालू उत्खनन का यह दृष्य हुआ करता था। मेला-ठेला के भीड़ भरे समय में भी बालू का उस पार से लाना और ट्रेक्टर-ट्रॉली में लदान अबाध चलता था पिछली सरकार के समय में।

द्वारिकापुर गंगा किनारे गांव है। जब मैने  रिटायरमेण्ट के बाद यहां भदोही जिले के विक्रमपुर गांव में बसने का इरादा किया था, तो उसका एक आकर्षण गंगा किनारे का द्वारिकापुर भी था। यह मेरे प्रस्तावित घर से तीन किलोमीटर दूर था और इस गांव के करार पर बसा होने के बावजूद गंगा तट पर आसानी से आया जाया जा सकता था। पास में अगियाबीर का टीला है जिसमें पुरातत्व विभाग वाले खुदाई करते हैं। कुल मिला कर सवेरे भ्रमण करने के लिये अच्छा रोमांच हो सकता था यह स्थान।

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पहले का बालू ट्रांशिपमेंट का कार्य गंगा किनारे।

पर वैसा हुआ नहीं। विक्रमपुर में बसने के बाद जब -जब मैं द्वारिकापुर गया; अवैधावैध गंगा बालू उत्खनन करने वालों को सक्रिय पाया। लगभग ८-१० बड़ी डीजल मोटर-बोट हमेशा वहां सक्रिय पायीं। गंगा उस पार मिर्जापुर जिले में गंगा के कछार से बालू खन कर वे इस पार लाती थीं। और वह बालू नावों से ट्रैक्टर ट्रॉलियों में ट्रान्स-शिप हो कर निर्माण काम के लिये ले जाया जाता था। इस पूरे धन्धे का ९०-९५ प्रतिशत अवैध हुआ करता रहा होगा। खनन माफ़िया, पुलीस और प्रदेश प्रशासन के कई महकमे इसमें मौज करते थे – गंगा नदी का चीर हरण करते कौरव!

शुरू के कुछ महीनों में वहां गया, पर हर बार वही दृष्य मिलने के कारण मैने जाना छोड़ दिया।

आज सवेरे यूं ही चला गया वहां राजन भाई के साथ। हम दोनो साइकल पर निकले। सवेरे भ्रमण के हिसाब से कुछ देर हो गयी थी। अत: ज्यादा दूर कमहरिया न जा कर हम द्वारिकापुर पंहुच गये। सवेरे साढ़े सात बज चुके थे। खनन वालों के काम करने का समय हो चुका था, या यूं कहें कि बालू लदी नावों का एक फेरा लग चुका होना चाहिये था अब तक।

पर द्वारिकापुर के गंगा तट पर आश्चर्यजनक रूप से सन्नाटा दिखा। नावें किनारे बंधी थी। हर नाव पर करीब ६-८ श्रमिक हुआ करते थे, लेकिन कोई नहीं था आज।

कुछ समय लगा माजरा समझने में। यह आदित्यनाथ योगी के मुख्यमन्त्री बनने की हनक थी जिसने गंगा का चीर हरण रुकवा दिया था। माफिया दुबक गया था। पुलीस और सरकारी इन्स्पेक्टर-राज कुनमुना कर सीधा हो गया था। मोटरचलित नावें किनारे पर खड़ी जरूर थीं – यह भांपती कि योगी-प्रशासन अन्तत: कितनी सख्ती करेगा? ऊपरी कमाई पर पल्ल्ववित सरकारी महकमा कब तक बिना हफ़्ता-रिश्वत के रह पायेगा?

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द्वारिकापुर में गंगा किनारे। आज वह मोटर-बोट और वह उसका डॉक-प्लेटफ़ार्म शान्त थे। कोई मनुष्य नहीं, कोई ट्रेक्टर नहीं। बालू उत्खनन ठप। सही समय की प्रतीक्षा में।

जैसा मैने अपने आसपास एक डेढ़ साल में देखा है – सरकार ही नहीं, जनता का एक बड़ा हिस्सा इस लूट का परजीवी हो चुका है। किसी लम्बे समय तक चलने वाले परिवर्तन की मुझे बहुत आशा नहीं। पर मोदी-योगी जैसे डिस्रप्टिव राजनीति करने वालों से कुछ आशा बनती है जो व्यक्तिगत रूप से भ्रष्ट नहीं हैं और सिस्टम को सुधारने के लिये एक सीमा तक शॉक-ट्रीटमेण्ट दे सकते हैं। वे सरकारी अमले और माफ़िया को एक (बड़ी) सीमा तक जुतियाने की क्षमता रखते हैं। उन्ही से आशा है।

और उसी योगी के मुख्य मन्त्री बनने की हनक मुझे गंगा किनारे द्वारिकापुर में नजर आई।

हनक-ए-योगी! भगवान करे बरकरार रहे यह हनक!  

मानिक सेठ और कस्बे में कैशलेस


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माणिक सेठ, महराजगंज, जिला भदोही के दुकानदार 

मानिक सेठ की महराजगंज, जिला भदोही में किराने की दुकान है। नोटबन्दी के बाद उनकी पहली दुकान थी, जहां मैने कैशलेस ट्रांजेक्शन का विकल्प पाया। पच्चीस नवम्बर की शाम थी। नोटबन्दी की हाय हाय का पीक समय। वे पेटीएम के जरीये पेमेण्ट लेने को तैयार थे। मैने अपने मोबाइल से पेमेण्ट करना चाहा पर इण्टरनेट का सिगनल नहीं मिला। मानिक ने कहा कि वे वाई-फाई ऑन कर सकते हैं। खैर, रिलायंस जियो मौके पर जिन्दा हो गया और मैने महराजगंज कस्बे में पहला वेलेट के माध्यम से कैश लेस पेमेण्ट किया। इसके पहले ऑन लाइन खरीद, मोबाइल रीचार्ज या टेलीफोन का बिल पेमेण्ट मैं ऑनलाइन किया करता था। वह नोटबन्दी के पहले भी होता था। पर फुटकर खरीद में पहला गंवई प्रयोग था।

इस लिये मैं मानिक सेठ को भूल नहीं पाया।

एक बार और उनकी दुकान पर गया। मानिक वहां नहीं थे। उनके बड़े भाई थे। उन्होने बताया कि छोटा भाई ही पेटीएम-वेटियम जानता है। वही अपने मोबाइल से करता है। बाहर गया हुआ है, इसलिये कैशलेस पेमेण्ट नहीं हो पायेगा।

आज, लगभग एक महीने के बाद सवेरे अपने साइकल-भ्रमण के समय बाजार पंहुच गया। दुकाने नहीं खुली थीं। मुझे टॉर्च के लिये बैटरी लेनी थी। देखा; माणिक दुकान का ताला खोल रहे थे। मैने इन्तजार किया। सवेरे मैं अपना मोबाइल लिये हुये नहीं था, अत: पेमेण्ट तो कैश से किया पर माणिक से पूछा – कैशलेस ट्रांजेक्शन कैसे चल रहे हैं?

“ज्यादा नहीं। लोग ढर्रा बदलना नहीं चाहते। मैं खुद इण्टरनेट, फेसबुक, ऑनलाइन खरीद और वेलेट का प्रयोग करता हूं। पर आसपास लोग नहीं करते। करीब डेढ-दो हजार रुपये महीने का ट्रांजेक्शन हो जाता है; वेलेट और ऑनलाइन खरीद को ले कर।”  

तब भी अच्छा है। लोगों को सिखाइये। लोगों के बारे में फ़ेसबुक पर बताइये। 

उसमें झंझट है। लोग सीखना नहीं चाहते। और यहां की बात फ़ेसबुक में लिखना रिस्की है। मैं अपने बारे में फेसबुक पर लिखता नहीं। कोई जानकारी नहीं देना चाहता। क्या पता क्या लफ़ड़ा हो जाये। बाहर हो आया हूं। वहां की कोई यार-दोस्त इधर-उधर की फोटो डाल दे या कुछ लिख ही दे तो बैठे बिठाये मुसीबत हो जाये। 

मैने माणिक को अपना फेसबुक पर लिखा दिखाया। जिसमें अपने परिवेश के बारे में (और अपने बारे में भी) जैसा है, वैसा लिखा है। और यह भी बताया कि मुझे तो कोई कभी झमेला नहीं हुआ। मैने सुझाव दिया कि माणिक अपने परिवेश – बाजार, दुकान और लोगों की सोच के बारे में पोस्ट करें।

माणिक ने हां-हां तो की; पर जैसा मुझे लगा कि जवान आदमी बहुत कन्वीन्स्ड नहीं है। आखिर मैं अपनी और उसकी तुलना तो नही कर सकता। जवान आदमी की अपनी उमंगे हैं, अपने भय।

पर माणिक मुझे ऊसर गंवई जीवन में नये प्रकार के जीव मिले। शायद भविष्य में भी उनसे सम्पर्क रहे।

श्यामबिहारी चाय की दुकान पर


श्यामबिहारी काँधे पर फरसा लिए चाय की चट्टी पर आये। अरुण से एक प्लेट छोला माँगा और सीमेंट की बेंच पर बैठ खाने लगे। खाने के बाद एक चाय के लिए कहा। “जल्दी द, नाहीं अकाज होये”। जल्दी दो, देर हो रही है। 

श्यामबिहारी का परिचय पूछा मैंने। मेरे घर के पास उनकी गुमटी है। दो लडके हैं। बंबई में मिस्त्री के काम का ठेका लेते हैं। पहले श्यामबिहारी ही रहते थे बंबई। मिस्त्री का काम दिहाड़ी पर करते थे। बाईस साल किये। फिर उम्र ज्यादा हो गयी तो बच्चे चले गए उनकी जगह। 
महानगर को माइग्रेशन का यही मॉडल है गाँव का। बहुत कम हैं जो गए और वहीँ के हो गए। अधिकाँश जाते आते रहते हैं। परिवार यहीँ रहता है। बुढापे में गाँव लौटना होता है। महानगर को जवान लोग चाहियें। श्रम करने वाले। 
श्याम बिहारी की उम्र साठ की हो गयी। खेत में धान की रोपाई कर रहे हैं। तीन दिन से लिपटे हैं रोपाई में। 

कितने बजे उठते हो?

“रात बारह बजे। रात में नींद नहीं आती। इधर उधर घूमता हूँ। नींद बीच बीच में सो कर पूरी हो जाती है”।

श्यामबिहारी को कोइ समस्या नहीं नींद के पैटर्न से। मुझे नहीं लगता कि अनिद्रा या इन्सोम्निया नाम से कोई परिचय होगा उसका।

चाय पीते ही वे निकल लेते हैं खेत की तरफ फावड़ा ले कर। 

साठ की उम्र। कोई रिटायरमेंट नहीं। काम करते कम से कम एक दशक और निकालना होगा श्यामबिहारी को। उसके बाद भी सुकून वाला बुढापा होगा या नहीं, पता नहीं। 

एक भाग्यशाली (?!) नौजवान से मुलाकात


अमित पाण्डेय। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव। मुझे रथयात्रा, वाराणसी में सोनू उपाध्याय के दफ़्तर में मिले।
अमित पाण्डेय। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव। मुझे रथयात्रा, वाराणसी में सोनू उपाध्याय के दफ़्तर में मिले।

(यह मैने बतौर फेसबुक नोट पोस्ट किया हुआ है। ब्लॉग पर इसका परिवर्धित रूप रख रहा हूं। दस्तावेज के लिये।)

वाराणसी में मैं सोनू (प्रमेन्द्र) उपाध्याय के रथयात्रा स्थित मेडिकल स्टाक-दफ़्तर में बैठा था। सोनू मेरे बड़े साले साहब (देवेन्द्र नाथ दुबे जी) के दामाद हैं। अत्यन्त विनम्र और सहायता को तत्पर सज्जन। वे मेरे लिये एक आवश्यक औषधि मंगवा रहे थे थोक विक्रेता के यहां से। उनका जो कर्मचारी औषधि लेने गया था, वह जाम में फंस गया था। उसके आने में देरी हो रही थी। सोनू आवाभगत में हमें (मेरी पत्नीजी और मुझको) एक-एक कुल्हड़ (उम्दा) चाय पिला चुके थे। हम आपस में इधर उधर की बातचीत भी निपटा चुके थे। अब विशुद्ध इन्तजार करना था औषधि लाने वाले व्यक्ति का।

वहीं बैठे थे दो सज्जन – नौजवान। वे आपस में मैडीकल कम्पनियां ज्वाइन करने/छोड़ने और विभिन्न दवाओं के स्टाक आदि के बारे में बात कर रहे थे – आपस में और सोनू से भी।

समय गुजारने की गर्ज से ही मैने उनमें से एक, जो एक गमछे के साथ खेल भी रहा था, से पूछा – कम्पनियां ज्वाइन करने और छोड़ने की बातें कर रहे हैं आप। इसमें अनिश्चितता नहीं रहती? तनाव नहीं होता?

उसने बताया – है क्यों नहीं। तनाव भी रहता है। पर यह नौकरी – मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव की – महीने में बीस हजार दे रही है। सो ठीक लगता है।

प्रमेन्द्र (सोनू) उपाध्याय। यह चित्र तब का है, जब वे मेरे गांव स्थित घर में मिलने आये थे।
प्रमेन्द्र (सोनू) उपाध्याय। यह चित्र तब का है, जब वे मेरे गांव स्थित घर में मिलने आये थे।

सोनू ने कहा कि ये नौजवान करीब दो लाख महीने का टर्नओवर कर रहे हैं। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव के अलावा किसी न किसी कम्पनी की फ्रेंचाइज़ी हासिल कर लेते हैं। जितना काम, जितनी मेहनत, उतनी कमाई।

उस नौजवान से पूछा – कितना समय हुआ यह करते? इसके पहले क्या करते थे?

नौजवान ने नाम बताया अमित। अमित पाण्डेय। करीब डेढ साल से यह काम कर रहे हैं। फार्मेसी की पढ़ाई नहीं की। बी.ए. किया है। उसके बाद इसी काम में लग गये।

हंसमुख नौजवान। तनाव को काम का अनिवार्य अंग मान कर चल रहा है। अपने काम में सजग। जीवन में बड़ी जल्दी नेटवर्किंग का महत्व समझ गया है। … व्यक्ति सजग हो, उसका व्यक्तित्व हंसमुख हो, वह मिलनसारता का महत्व जानता हो और अपनी दशा से कुढ़ता न हो; तो वह भाग्यशाली होगा। अपॉर्च्युनिटीज उसके पास सामान्य से अधिक आयेंगी और (अपनी मानसिकता के अनुकूल) वह अवसर पहचानेगा और तरक्की करेगा। पता नहीं, अमित यह जानता है या नहीं, पर अगर नहीं भी जानता, तो अपनी प्रवृत्ति के अनुसार, अनजाने ही सफ़लता की गोल्डमाइन पर हाथ तो रख ही लिया है उसने।

अमित का प्रोफाइल चित्र - ह्वाट्सएप्प पर।
अमित का प्रोफाइल चित्र – ह्वाट्सएप्प पर।

मैने अमित का एक चित्र लेना चाहा तो अमित ने सही पोज बनाया – गमछा अलग रख कर। मैने कहा – ऐसे नहीं वैसे बैठो जैसे गमछा लपेट कर बैठे थे।

अमित ने गमछा पुन: लपेट कर मुझे ओबलाइज़ किया। सोनू ने उससे कहा – लो, अब तुम सोशल मीडिया पर आ जाओगे।

सोनू जी का सहकर्मी मेरी दवाई ले कर आ चुका था। दवाई का डिब्बा ले कर लौटते समय अमित के बारे में मैं और सोच रहा था। दशकों पहले किसी बिजनेस पत्रिका में आदि गोदरेज का पढ़ा एक इण्टरव्यू याद आ रहा था, जिसमें उन्होने कहा था – इस देश में ऐसा कोई भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं है, जो रोजगार पाने का हुनर रखता है। (No one is unemployed who is employable)

अमित को देख वह धारणा पुष्ट हो रही थी। अमित आज रोजगार पाने का हुनर रखता है। कल शायद रोजगार देने का भी हुनर हासिल कर ले!

मिश्री पाल की भेड़ें


GDFeb164606-01गड़रिया हैं मिश्री पाल। यहीं पास के गांव पटखौली के हैं। करीब डेढ़ सौ भेड़ें हैं उनके पास। परिवार के तीन लोग दिन भर चराते हैं उनको आसपास।

मुझे मिले कटका रेलवे स्टेशन की पटरियों के पास अपने रेवड़ के साथ। भेड़ें अभी ताजा ऊन निकाली लग रही थीं। हर एक बेतरतीब बुचेड़ी हुई। उन्होने बताया कि साल में तीन बार उतरता है उनका ऊन। इस बार करीब चालीस किलो निकला।

मिश्री पाल ने बताया – बहुत कम दाम मिलते हैं ऊन के। खरीदने वाला 8रुपये किलो खरीद ले जाता है।

यह तो बहुत कम दाम हुये। आलू के भाव। – मैने अपना मत व्यक्त किया।

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“हां, बहुत कम है। पर और कोई काम नहीं। दिन भर चराते हैं। देखभाल करनी पड़ती है।” मिश्री पाल ने कहा कि वे भेड़ें बेचने का धन्धा नहीं करते। पर मुझे लगा कि यह गड़रिये का काम अगर भेड़ें बेचने पर आर्धारित नहीं है तो मात्र ऊन के आधार पर किसी भी प्रकार से सस्टेन नहीं किया जा सकता। गड़रिया के काम में पैसा कहां और किस मद में आता है; मैं यह सोचने में लग गया। 

मिश्री पाल के पास बैल भी हैं। बैलों को वे हल चलाने के लिये किराये पर देते हैं। आजकल किसान बैल नहीं रखते। अगर जोत बहुत छोटी है, या जगह ऐसी, जहां ट्रेक्टर नहीं जा सकता, तो वहां हल का प्रयोग करते हैं। वहां मिश्री पाल के बैल काम आते हैं।

देहात में बहुत से लोग; जिनके पास जमीन नहीं है; भेड़, बकरी, सूअर, गाय, भैंस आदि पाल कर उनके दूध, ऊन, मांस आदि से अपना जीवन यापन करते हैं। उनके रहन सहन को देख कर लगता है कि उन्हें गरीब तो जरूर माना जायेगा; पर आर्थिक आधार पर कम जोत वाले किसानों की अपेक्षा बहुत विपन्न हों – वैसा भी नहीं है। मुझे लगा कि कभी पटखौली जा कर मिश्री पाल का जीवन देखना चाहिये।

कितनी ही अच्छी पुस्तके गड़रियों के घुमन्तू जीवन के आधार पर लिखी गयी हैं। कई देशों और महाद्वीपों में यात्रा करते गड़रिये। मिश्री पाल वैसे तो नहीं हैं; पर छोटे मोटे स्तर पर घुमन्तू तो हैं ही।

मैं मिश्री पाल का चित्र ले चलने लगा। सांझ हो गयी थी। मिश्री पाल भी अपने गांव लौट रहे होंगे अपने रेवड़ के साथ। वे और उनके साथी डण्डा फटकारते हुये, हट्ट-हट्ट की ध्वनि निकालते अपनी भेड़ें साधने में लग गये।

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