महराजगंज के कस्बाई बाजार पर फुटकर सोच


यह पास का कस्बा – महराजगंज कैसे पनपा? कैसे इसका बाजार इस आकार में आया? यहां रहने वाले पहले के लोग कहां गये? बाजार ने कौन से लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया। यातायात के साधन बाजार को किस तरह विकसित करते गये? … ये सवाल मेरे मन में आजकल उठ रहे हैं।

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विजय तिवारी का रेस्तरॉं और रूरर्बियन रूपान्तरण


वे (भविष्यदृष्टागण) कहते हैं कि आने वाले समय में आर्टीफ़ीशियल इण्टैलिजेन्स (AI) की बढ़ती दखल से रोजगार कम होंगे। उसको सुनने के बाद मैं वे सभी अवसर तलाशता हूं जहां मेरे आसपास के गांव के परिवेश में रोजगार की सम्भावना बढ़ रही है, और तब भी रहेंगी जब आर्टीफ़ीशियल इण्टेलिजेन्स का शिकंजा और कस जायेगा। ऐसा ही एक अवसर मिला विजय तिवारी के नये खुले रेस्तरॉं में।

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प्रयागराज, लाइव सर्टीफिकेट और बैंक अधिकारी श्रीमती दिव्या गौड़ से मुलाकात


लाइव सर्टीफिकेट हेतु प्रयागराज की यात्रा

रिटायर्ड सरकारी पेंशनर्स के लिये बैंक नवम्बर के महीने में तीर्थ स्थान सा होता है। वहां जा कर अपने जीवित होने का प्रमाण देना अनिवार्य वार्षिक कर्मकाण्ड है। मेरे घर में मेरे पिताजी और मैं – दो व्यक्ति सरकारी पेंशनर हैं। मेरा पेंशन खाता वाराणसी में है और पिताजी का तेलियरगंज, प्रयागराज में। अत: दोनों को इस तीर्थ यात्रा पर जाना होता है। चूंकि मेरे पिताजी इस यात्रा के लिये बहुत सक्षम नहीं हैं; उनको ले जाने का दायित्व भी मेरे ऊपर है।

पिताजी के शतायु होने की मैं कामना रखता हूं – सो उसके आधार पर अगले 15 साल उनके लाइव सर्टीफिकेट अरेंज करने के दायित्व मुझे निर्वहन करने के लिये तैयार रहना है।

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माताप्रसाद – कड़ेप्रसाद और शीतला माता का मंदिर


नवरात्रि पर्व के पहले दिन मैं तुलापुर गांव में शीतला माता के मन्दिर गया था। यह मन्दिर जीर्णोद्धार कर बनाया गया है। मूर्तियों से लगता है कि सैकड़ों या हजार साल का रहा होगा वह मंदिर। खण्डित मूर्तियां भी रखी हैं वहां।

वैसे यह पूरा इलाका शुंग और कुषाण कालीन अवशेषों से भरा पड़ा है। मेरे पुरातत्ववेत्ता मित्र डा. रविशंकर ने बताया कि यहां पास में गंगा के प्रवाह से एक बैकवाटर की झील थी और उसके किनारे 600बीसीई की बस्ती थी।

DSC_1069<[शीतलामाता के पुराने मन्दिर पर के दीवार पर जड़ी मूर्तियां ऐसी हैं]

पर इसी पुराने मन्दिर के पास लगभग तीस साल पहले का बना शीतला माता का एक नया मन्दिर है – महराजगंज-चौरी की दो लेन की सड़क पर। वहां मिले थे कड़े प्रसाद। उनकी मिठाई की दुकान है। बगल की उन्ही की जमीन पर यह मन्दिर बनाया गया है। उन्ही की जमीन पर मन्दिर और चाय-मिठाई की दुकान – यह बिजनेस का बहुत शानदार मॉडल है। बहुत कुछ वैसा ही जैसे महानगरों में गाय और चारा ले कर बैठा व्यक्ति जिससे चारा खरीद कर उसी की गाय को लोग खिलाते हैं। लोगों की श्रद्धा का व्यवसाय।

आज कड़े प्रसाद और उनके बड़े भाई माता प्रसाद मिले दुकान पर। माता प्रसाद ने ही अधिकांश बात की। कड़े प्रसाद मात्र संपुट दे रहे थे।

DSC_1083[शीतलामाता का माताप्रसाद-कड़ेप्रसाद की जमीन पर बना नया मन्दिर]

माता प्रसाद ने बताया कि मन्दिर यद्यपि उनकी जमीन पर बना है, पर बनाने में आस पास के लोगों का भी पर्याप्त सहयोग मिला है। हर साल वे गुरुपूर्णिमा पर भण्डारा भी करते हैं। उसमें भी बहुत से लोगों का सहयोग होता है। कड़े प्रसाद ने जोड़ा – भण्डारे में करीब 8-9 क्विण्टल बुन्दिया बनती है। दस हजार लोग खाते होंगे भण्डारे में।

माताप्रसाद की अम्माजी (बकौल उनके) 108 साल की हैं। सत्तर के दशक में जब मन्दिर बना था तो उसमें आग्रह अम्माजी का ही था। शीतला माता ने उन्हें ही सपने में आदेश दिया था मन्दिर बनाने के लिये। वे शीतलामाता की बड़ी भक्त हैं। (बकौल माताप्रसाद) उनके सिर पर माता आती भी थीं और तब अम्माजी ट्रान्स में चली जाया करती थीं। अब तो वे बहुत वृद्ध हो गयी हैं। चला फिरा भी नहीं जाता। अब मन्दिर की पूजा का सारा भार माताप्रसाद के तीसरे भाई जिलाजीत के जिम्मे है।DSC_1142[माताप्रसाद (दांयें) और कड़ेप्रसाद। अपनी दुकान के बाहर]

परिवार का मुख्य उद्यम यह मिठाई/चाय की दुकान है। दुकान माताप्रसाद देखते हैं। कड़े प्रसाद को दुकान पर बैठना नहीं रुचता। वे मिठाई और नमकीन बनाते हैं और गाड़ी से घूम घूम कर बेचते हैं।

दुकान से एक किलो नमकीन मैने खरीदा भी। सस्ता है। 120रु किलो। कड़े प्रसाद ने बताया कि रोफ़ाइण्ड तेल में बना है (पामोलीन में नहीं)। कड़े प्रसाद हमारे गांव में भी आते हैं मिठाई नमकीन बेचते। “लोटन गुरू (गांव के प्रसिद्ध ओझा) के यहां भी आता हूं मैं।”

नवरात्रि व्रत के कारण मैने तो नहीं खाया नमकीन पर घर पर लोगों ने चखकर बताया कि स्वाद अच्छा है।

परिवार के दो लडके अंकलेश्वर (गुजरात) में मिठाई की दुकान खोले हैं। कड़े प्रसाद से मिठाई बनाना सीखा है उन्होने। लोग गुजरात में मेहनत मजदूरी के लिये जाते हैं, पर माताप्रसाद-कड़ेप्रसाद के बच्चे गुजरात गये हैं बिजनेस करने।

बिल्कुल देसी दिखने वाले भाई हैं। देसी परिवेश। पर उनके बिजनेस सेंस पर तो किसी मैनेजमेण्ट संस्थान में भाषण दिया जा सकता है। मैं तो प्रभावित हो गया उनसे। जहां इस पूर्वांचल में हर व्यक्ति सरकारी नौकरी तलाश रहा है, वहां इस विश्वकर्मा परिवार का मिठाई-नमकीन व्यवसाय बहुत आकर्षक लगा।


द्वारिका और परवल का जवा


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परवल के जवा के गठ्ठरों के साथ द्वारिका

पचेवरा के घाट पर प्रतीक्षा करने वालोँ के लिये चबूतरा है। दाह संस्कार करने आये लोग और मोटर बोट पकड़ कर उस पार मिर्जापुर जाने वाले यहाँ इंतजार करते हैँ। मैँ सवेरे वहां तक चक्कर लगाता हूं। कुछ देर सुस्ताने के लिये उस चबूतरे पर बैठता हूं। वहां से गंगा की धारा भी दिखती है और सड़क भी।

अचानक दो आदमी घाट से आते हैं और पास में पड़े हरे डंठल के गठ्ठर उठाने लगते हैँ। ऐसा गठ्ठर मैने पहले कभी नहीँ देखा। उनसे पूछता हूं – क्या है यह?
“परवल। परवल का जवा।” सफेद कमीज पहने एक व्यक्ति बताता है। दोनोँ एक एक गठ्ठर उठा कर चले जाते हैं घाट पर। फिर भी तीन गठ्ठर बचे रहते हैं वहां जमीन पर। मुझे यकीन हो जाता है कि मेरे प्रश्नोँ का उत्तर देने के लिये वे फिर आयेंगे ही; वर्ना मैं उनके पीछे पीछे घाट तक जाता।

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उनकी वापसी में उनसे और जानकारी लेता हूँ। गंगा उस पार वे परवल की खेती करते हैं। यह गठ्ठर वाली वनस्पति परवल के तने हैं। परवल की पौध बनती है इनसे।

कहाँ से ला रहे हैं ये परवल का जवा?

गाजीपुर से।

इतनी दूर से। आसपास नहीँ मिलता क्या?

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पता चला कि वे गाजीपुर के ही रहने वाले हैं वहां उनके परवल के खेत हैं। यहां गंगापार मिर्जापुर में भी परवल की खेती करते हैं। यहां उनकी जमीन नहीं है। पट्टे पर ली है जमीन। छ हजार रुपया बीघा सालाना की लीज। करीब 40 बीघा जमीन है। 7-8 लोग साझे में परवल की खेती करते हैं। गाजीपुर में अपने ही खेत से ले कर आ रहे हैं परवल का जवा। गंगा की रेती में परवल की खेती नहीं होती। उसके आगे मिट्टी के खेत हैं। उनको लीज पर ले कर उनमें पर वल उगाते हैं। पानी बहुत मांगती है परवल की फसल, सो अपने ही पैसे से उन्होने बोरवेल लगाया है। खेती के लिये पर्याप्त पूंजी खर्च की है इन लोगों ने।

वहां गाजीपुर में ही नहीं ली जमीन खेती के लिये?

लाल टीशर्ट वाले व्यक्ति ने बताया – वहां भी अच्छी खेती है। पर परिवार बड़ा हो गया तो कुछ लोगों को बाहर निकलना ही था।  

लोग गाजीपुर/बलिया से आजीविका की तलाश में बम्बई, अहमदाबाद या बंगलोर जाते हैं। इनका आजीविका का मिर्जापुर आने का उद्यमी मॉडल बहुत रोचक लगा मुझे। शायद ये मार्केट के पास खेती कर बेहतर दाम पाते होंगे अपनी फसल का।

लाल टीशर्ट वाला तब तक अंतिम गठ्ठर उठा कर जाने लगा था। मन में प्रश्न बहुत थे पर उनको वहीं विराम दिया मैने।

कौन कहता है कि धुर गाजीपुरी/बलियाटिक लोग आंत्रेपिन्योर नहीं है?! पांच सात मिनट के इस वार्तालाप में पूर्वांचल के प्रति इज्जत बढ़ गयी मेरे मन में।

जाते जाते लाल टीशर्ट वाले से नाम पूछा मैने। बताया – द्वारिका।

आगे पत नहीं कभी मिलना होगा या नहीं द्वारिका से। पर छोटी सी मुलाकात मुझे बहुत कुछ बता गयी। शायद आपको भी, इस माध्यम से! 🙂

 

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अंतिम गठ्ठर ले कर गंगा तट पर जाते द्वारिका। अलविदा।

धईकार बस्ती का दऊरी कारीगर


कुनबीपुर में खीरे का मोलभाव और खरीद कर आगे बढ़े राजन भाई और मैं। आगे धईकार बस्ती थी उसी गांव में। सवेरे सवेरे लोग काम पर लग गये थे। स्त्रियां बरतन मांज रही थीं। बच्चे खेलने में मशगूल हो गये थे। बकरियां और मुर्गियां इधर उधर मुंह मार रही थीं।

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सवेरे का शीतल समय। धईकार बस्ती में सब काम पर लग गये थे। वह दऊरी बना रहा था।

वह बन्दा सवेरे दऊरी बनाने के काम में लग गया था।

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दऊरी बनाने के औजार। नीचे बांका है और दायें हाथ में बांकी।

राजन भाई को देख उसने पैलगी की। मुझे चित्र लेता देख थोड़ा संभल कर बैठ गया। मैने पूछा उसके औजारों के बारे में। गंड़ासा नुमा औजार को उसने बताया – बांका।  उसका प्रयोग वह बांस काटने में करता है। उससे छोटी बांकी। बांकी से महीन काम करता है वह – बांस को छीलना, दऊरी की सींके बनाना आदि। दऊरी बुनने के बाद उसके ऊपर बांस का रिंग नुमा गोला लगाता है। उसी से दऊरी में मजबूती आती है। उसने बिनी दऊरी और गोला दिखाया मुझे।

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दऊरी की बुनावट देखी मैने। बहुत सुघड़ थी। बांस की सींकें जो प्रयोग की गयी थीं, उनमें कहीं कोई एसा कोना नहीं था जिससे उपयोग करने वाले की उंगलियों में फांस लग जाये। दऊरी का आकार भी पूर्णत:अर्ध गोलाकार था। उस आदमी ने दाम बताया डेढ़ सौ रुपये। दिन भर में एक ही बना पाता है – ऐसा उसने बताया। यह भी जाहिर किया कि इस काम में बरक्कत नहीं है – साहेब, बांस भी कितना मंहगा हो गया है। 

आसपास के खेतों में खटीक-किसान यह दऊरी का प्रयोग करते हैं। उसके स्थान पर प्लास्टिक के टब का प्रयोग नहीं होता। अभी भी दऊरी का प्रयोग बेहतर और किफ़ायती दोनो होगा, अन्यथा इन लोगों का कामधाम खत्म हो गया होता।

कामधाम खत्म तो हो ही रहा है। दोना-पत्तल तो लगभग प्रयोग से बाहर ही हो गये हैं। बंसवारी खत्म हो रही हैं तो बांस की बनी वस्तुयें भी कम होती जा रही हैं। मन में आता है कि इन सभी लुप्त होती विधाओं का दस्तावेजीकरण कर लूं मैं। लेखन/चित्र/वीडियो के माध्यम से। PARI – People’s Archive of Rural India ऐसा ही कर रहा है।

राजन भाई को मैं इस बारे में कहता हूं। वे भी समझते हैं इस जरूरत को। यद्यपि इस तरह का कोई काम उन्होने किया नहीं है, पर मेरे साथ घूमते और चित्र आदि सोशल मीडिया पर पोस्ट करते उन्हे यह लगने लगा है कि गांव के इलाके को अंतरराष्ट्रीय नक्शे पर लाने का यह अच्छा तरीका है।

उस कारीगर को बताते हैं – तोर फोटो लेहे हयेन। अब अमेरिका, लन्दन, सगरौं जाये तोर फोटो। तब एक्स्पोर्ट आर्डर मिले (तेरा फोटो ले लिया है। अब विदेशों में जायेगा यह फोटो और उससे मिलेंगे एक्स्पोर्ट के आर्डर)।

गांव के मनई से बात करना खूब आता है राजन भाई को। आखिर यहीं रहे, पले, बढ़े हैं वे। उनके साथ घूमने का आनन्द भी है और जानकारीयां पाने का लाभ भी।

हनक-ए-योगी


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द्वारिकापुर का गंगा तट। बालू उत्खनन का यह दृष्य हुआ करता था। मेला-ठेला के भीड़ भरे समय में भी बालू का उस पार से लाना और ट्रेक्टर-ट्रॉली में लदान अबाध चलता था पिछली सरकार के समय में।

द्वारिकापुर गंगा किनारे गांव है। जब मैने  रिटायरमेण्ट के बाद यहां भदोही जिले के विक्रमपुर गांव में बसने का इरादा किया था, तो उसका एक आकर्षण गंगा किनारे का द्वारिकापुर भी था। यह मेरे प्रस्तावित घर से तीन किलोमीटर दूर था और इस गांव के करार पर बसा होने के बावजूद गंगा तट पर आसानी से आया जाया जा सकता था। पास में अगियाबीर का टीला है जिसमें पुरातत्व विभाग वाले खुदाई करते हैं। कुल मिला कर सवेरे भ्रमण करने के लिये अच्छा रोमांच हो सकता था यह स्थान।

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पहले का बालू ट्रांशिपमेंट का कार्य गंगा किनारे।

पर वैसा हुआ नहीं। विक्रमपुर में बसने के बाद जब -जब मैं द्वारिकापुर गया; अवैधावैध गंगा बालू उत्खनन करने वालों को सक्रिय पाया। लगभग ८-१० बड़ी डीजल मोटर-बोट हमेशा वहां सक्रिय पायीं। गंगा उस पार मिर्जापुर जिले में गंगा के कछार से बालू खन कर वे इस पार लाती थीं। और वह बालू नावों से ट्रैक्टर ट्रॉलियों में ट्रान्स-शिप हो कर निर्माण काम के लिये ले जाया जाता था। इस पूरे धन्धे का ९०-९५ प्रतिशत अवैध हुआ करता रहा होगा। खनन माफ़िया, पुलीस और प्रदेश प्रशासन के कई महकमे इसमें मौज करते थे – गंगा नदी का चीर हरण करते कौरव!

शुरू के कुछ महीनों में वहां गया, पर हर बार वही दृष्य मिलने के कारण मैने जाना छोड़ दिया।

आज सवेरे यूं ही चला गया वहां राजन भाई के साथ। हम दोनो साइकल पर निकले। सवेरे भ्रमण के हिसाब से कुछ देर हो गयी थी। अत: ज्यादा दूर कमहरिया न जा कर हम द्वारिकापुर पंहुच गये। सवेरे साढ़े सात बज चुके थे। खनन वालों के काम करने का समय हो चुका था, या यूं कहें कि बालू लदी नावों का एक फेरा लग चुका होना चाहिये था अब तक।

पर द्वारिकापुर के गंगा तट पर आश्चर्यजनक रूप से सन्नाटा दिखा। नावें किनारे बंधी थी। हर नाव पर करीब ६-८ श्रमिक हुआ करते थे, लेकिन कोई नहीं था आज।

कुछ समय लगा माजरा समझने में। यह आदित्यनाथ योगी के मुख्यमन्त्री बनने की हनक थी जिसने गंगा का चीर हरण रुकवा दिया था। माफिया दुबक गया था। पुलीस और सरकारी इन्स्पेक्टर-राज कुनमुना कर सीधा हो गया था। मोटरचलित नावें किनारे पर खड़ी जरूर थीं – यह भांपती कि योगी-प्रशासन अन्तत: कितनी सख्ती करेगा? ऊपरी कमाई पर पल्ल्ववित सरकारी महकमा कब तक बिना हफ़्ता-रिश्वत के रह पायेगा?

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द्वारिकापुर में गंगा किनारे। आज वह मोटर-बोट और वह उसका डॉक-प्लेटफ़ार्म शान्त थे। कोई मनुष्य नहीं, कोई ट्रेक्टर नहीं। बालू उत्खनन ठप। सही समय की प्रतीक्षा में।

जैसा मैने अपने आसपास एक डेढ़ साल में देखा है – सरकार ही नहीं, जनता का एक बड़ा हिस्सा इस लूट का परजीवी हो चुका है। किसी लम्बे समय तक चलने वाले परिवर्तन की मुझे बहुत आशा नहीं। पर मोदी-योगी जैसे डिस्रप्टिव राजनीति करने वालों से कुछ आशा बनती है जो व्यक्तिगत रूप से भ्रष्ट नहीं हैं और सिस्टम को सुधारने के लिये एक सीमा तक शॉक-ट्रीटमेण्ट दे सकते हैं। वे सरकारी अमले और माफ़िया को एक (बड़ी) सीमा तक जुतियाने की क्षमता रखते हैं। उन्ही से आशा है।

और उसी योगी के मुख्य मन्त्री बनने की हनक मुझे गंगा किनारे द्वारिकापुर में नजर आई।

हनक-ए-योगी! भगवान करे बरकरार रहे यह हनक!