अमृतस्य गंगा

आस्था और वास्तविकता के जबरदस्त विरोधाभासों की नदी हैं गंगा. आस्था ही है कि इस रास्ते दस दिनों से पीपल के पेड़ पर घण्ट में जल भर रहा हूँ मैं!



गंगा जीवन दायिनी हैं. गंगा का पानी अमृत है. लेकिन (और यह बहुत बड़ा लेकिन है) गंगा का पानी अब पीते हुए सकुचाते हैं लोग. मैंने खुद भी इस जगह (शिव कुटी में) मुंह भर कर गंगाजल से कुल्ला नहीं किया दशकों से. पीने की बात दूर रही.

गंगा एक दशक पहले आईसीयू में थीं. अब भी शायद हैं वहीं पर. बावजूद इसके कि नमामि गंगे अभियान बहुत सुनने में आता है.

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रामप्रसाद तीर्थयात्री का निमन्त्रण

चार-पांच लोग आपस में राम मन्दिर की बात कर रहे थे। एक महिला ने मुझे सम्बोधित कर कहा – आप तो मन्दिर बणवाओ सा। हम सब आयेंगे कार सेवा करने।


शाम का समय। सूर्यास्त से कुछ पहले। एक बस मेरे गांव के पास रुकी थी। अच्छी टूरिस्ट बस। उसके यात्री नेशनल हाईवे 19 की मुंड़ेर पर बैठे थे। एक बड़े पतीले में गैस स्टोव पर कुछ गर्म हो रहा था। एक व्यक्ति आटा गूंथ रहा था। सब्जियां भी कट रही थीं। शाम का भोजन बनने की तैयारी हो रही थी। बस बनारस से प्रयागराज की ओर जा रही थी।

पूर्णिमा के एक दिन पहले की शाम थी। चांद उग गया था। लगभग गोल। अगले दिन प्रयागराज में माघी पूर्णिमा का शाही स्नान था। सवेरे लोग संगम पर स्नान करेंगे शायद।

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जोगी बाबा – सिद्धिनाथ मन्दिर का साधू और अनाथ गौवंश को पालनेवाला

पिछले दो साल से इस इलाके में साइकिल से घूम रहा हूं मैं, पर राजकुमारनाथ (जोगी बाबा) जैसा विलक्षण व्यक्ति नहीं पाया मैने।


नाम है राजकुमारनाथ योगी। लोग जोगी बाबा कहते हैं। कुछ वैसा ही जैसे मुख्य मन्त्री जी हैं आदित्यनाथ योगी।

आदित्यनाथ की तरह राजकुमार नाथ भी नाथपन्थी साधू है। सारंगी बजा कर भिक्षा मांगने वाला।

आदित्यनाथ की तरह यह साधू भी लगभग 45-46 साल का है।

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दोपहर में द्वरिकापुर में गंगा किनारे


सवेरे निकलता हूं घूमने। गंगा तट पर जाना होता है तो उसी समय। अब सर्दी बढ़ गयी थी। सवेरे की बजाय सोचा दिन निकलने पर निकला जाये। बटोही (साइकिल) ने भी हामी भरी। राजन भाई भी साथ निकले पर वे अगियाबीर के टीले पर निकल गये; वहां प्राचीन सभ्यता के गहने-सेमीप्रेशस स्टोन्स के अनगढ़ टुकड़ों को बीनने। मैं अकेला गया गंगा तट पर।

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नीरव तो नहीं था वातावरण। गंगा का बहाव मन्थर था। जल कम हो रहा था। बीच में एक टापू उभर आया था और उसपर ढेरों प्रवासी पक्षी बैठे थे। शायद धूप सेंक रहे थे। मोटर बोट्स से उसपार से बालू ढोती नावें थीं। मेरे देखते देखते तीन नावें किनारे लगीं। उनपर सामान्य से कम बालू थी। हर नाव पर चार पांच कर्मी थे। वे नावों को किनारे लगा कर बेलचे से रेल तट पर फैंक रहे थे। कुछ तसले से भर भर कर तट पर ढो रहे थे। बालू का यह दृष्य देख मुझे हमेशा लगता है कि यह खनन अवैध है। इस बार भी लगा। पर मैं निश्चित नहीं था। हो सकता है कि यह सरकारी अनुमति के बाद हो रहा हो। पर मन में कोई न कोई भाव है जो गंगा के परिदृष्य से इस तरह की छेड़छाड़ को सही नहीं मानता – भले ही वह कानूनन सही हो। निर्माण कार्य में बालू का प्रयोग होता है। उत्तर प्रदेश सरकार की अवैध खनन पर कड़ाई के कारण बालू का रेट दुगना तिगुना हो गया है। असल में निर्माण कार्य में बालू का विकल्प आना चाहिये। नदियों का रेप कर निर्माण करना कोई अच्छी बात नहीं।

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खैर, बालू ढोने और उतारने का काम बड़े शान्त भाव से चल रहा था। मैं पीपल की जड़ को बेंच की तरह प्रयोग कर उसपर बैठा यह सब देख भी बड़े शान्त भाव से रहा था। अचानक एक गड़रिया करीब 50-60 भेड़ों के साथ गंगा तट पर उतरा। भेड़ों को उनकी भाषा में हर्र, हुट्ट, हेर्र,क्चक्च जैसे शब्द बोल कर स्टीयर कर रहा था। उसका सारा ध्यान और सम्प्रेषण सबसे आगे चलती भेड़ पर केन्द्रित था। उसके पास कोई कंकर या लकड़ी फेंक पर उसकी दिशा बदलता था। आगे वाली भेड़ को देख बाकी सभी “भेड़चाल” से निर्दिष्ट दिशा में चलने वाली थीं। … भेड़ों में कोई प्रयोगधर्मी या लीक से हट कर “जोनाथन लिविंगस्टन सीगल” की तरह की भेड़ मैने आज तक नहीं देखी। कभी किसी गड़रिये से पूछूंगा कि कोई मनमौजी स्वभाव की सामान्य से अलग प्रवृत्ति की भेड़ उनके पास है या थी!

गड़रिये को पानी पिलाने के लिये ज्यादा निर्देश नहीं देने पड़े भेड़ों को। शायद चरने के बीच में एक राउण्ड पानी पीना उनका नित्य का रुटीन होगा।

इक्का दुक्का लोग नहा कर लौट रहे थे। गंगा किनारे वह चबूतरा, जिसपर चौबेपुर की रिटायर्ड ब्राह्मण भाग्वत कथा कहते हैं और जहां कुछ भगवानजी के केलेण्डर और मिट्टी-पत्थर की भग्न, पुरानी मूर्तियां रखी हैं, पर रुक कर हाथ जोड़ आगे बढ़ जा रहे थे लोग। इतने में एक आदमी आ कर उस चबूतरे पर लेट गया। उसका पैर गंगा की ओर था और वह मनमौजी पन में अपनी दांयी टांग पर बायीं रखे हिला रहा था। पीपल की छाया से छन कर दोपहर की थोड़ी धूप उसपर पड़ रही होगी। धूप छांव का सही मिश्रण था उसके ऊपर। और पूरे वातावरण को वह एंज्वाय करता प्रतीत होता था।

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काफी समय हो गया था। घर पर लंच का समय। लौटने में भी मुझे 40 मिनट लगने थे। मैं उठ कर चला। एक बार दांये से बायें गंगा तट को निहारा। यह सब जाने कितनी बार कर चुका हूं और (लगता है) बाकी जिन्दगी यही करता रहूंगा।


पेण्ट माई सिटी प्रॉजेक्ट, प्रयागराज


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प्रयागराज गया था मैं पिछले मंगलवार। ढाई दिन रहा। शिवकुटी का कोटेश्वर महादेव का इलाका बहुत सुन्दर चित्रों वाली दीवालों से उकेरा हुआ था। पहले यह बदरंग पोस्टरों से लदा होता था। बड़ा सुन्दर था यह काम।

(अर्ध) कुम्भ मेला तीन महीने में होगा प्रयागराज में। कई शताब्दियों बाद शहर का नाम पुन: प्रयागराज हुआ है। शिवकुटी में जो भी लोग मिले, सबने कहा कि मैं मेले के समय प्रयाग में ही रहूं। ये चित्र देख कर जोश मुझे भी आ रहा था कि प्रयागराज में अगले कुम्भ मेले के दौरान रहना अच्छा अनुभव होगा। Continue reading “पेण्ट माई सिटी प्रॉजेक्ट, प्रयागराज”

विजय बहादुर बिन्द और दिघवट का टीला


विजय बहादुर बिन्द की झोंपड़ी है दिघवट के टीले पर। वह टीला, जिसको सरसरी निगाह से देखने पर भी 2500 साल पहले की सभ्यता के दर्शन हो जाते हैं – पुरानी बिखरी ईटों और मृद्भाण्ड के टुकड़ों के माध्यम से। वह झोंपड़ी तो टीले की ग्राम सभा की जमीन पर है। झोंपड़ी तो यूं ही बना ली है। पास में उनकी चार बिस्से जमीन पर सब्जियां उगाई गयी हैं। उसके आगे करीब डेढ़ बीघा जमीन है – जिसमें दो फसलें लेते हैं विजय बहादुर। जमीन निचली है। फिर भी दो फसलें ले पाते हैं वे।

बकौल मेरे पुरातत्वविद मित्र रविशंकर जी के, वहां  हजारों साल पहले बहुत बड़ी झील हुआ करती थी जब गंगा का विस्तार ज्यादा हुआ करता था और उनके किनारे बहुत सा पानी झीलों के रूप में रुका करता था। यह झील नाले के माध्यम से गंगा नदी से जुड़ी थी। टीले पर रहने वाले पूर्वज झील पर निर्भर थे और नाव के माध्यम से गंगा नदी से जुड़े थे।

विजय बहादुर टीले की प्राचीनता से परिचित हैं पर वे भी (अन्य भदोहियों की तरह) प्राचीनता को भरों से जोड़ते हैं। भर एक जनजातीय समूह था जो इस इलाके में प्रभुत्व रखता था। विकीपेडिया में यह अंश देखें –

४०० साल पूर्व भदोही परगना में भरों का राज्य था, जिसके ड़ीह, कोट, खंडहर आज भी मौजूद हैं। भदोही नगर के अहमदगंज, कजियाता, पचभैया, जमुन्द मुहल्लों के मध्यम में स्थित बाड़ा, कोट मोहल्ले में ही भरों की राजधानी थी। भर जाति का राज्य इस क्षेत्र सहित आजमगढ़, बलिया, गाजीपुर, इलाहाबाद एवं जौनपुर आदि में भी था। गंगा तट पर बसे भदोही राज्य क्षेत्र में सबसे बड़ा राज्य क्षेत्र था। सुरियांवां, गोपीगंज, जंगीगंज, खमरिया, औराई, महाराजगंज, कपसेठी, चौरी, जंघई, बरौट आदि क्षेत्र भदोही राज्य में था। गंगा तट का यह भाग जंगलों की तरह था।

विकीपेडिया भरों को 400 साल पहले से जोड़ रहा है। यह पन्ना तथ्यात्मक रूप से सम्पादन मांगता है। सम्भवत: भर थोड़े समय के लिये इस इलाके पर कब्जा जमाये थे – सम्भवत: हजार साल पहले। पर वे प्राचीनता का प्रतीक तो नहीं ही हैं। हर एक भदोहिया एक गलत जानकारी रखता है अपने इतिहास के बारे में।

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विजय बहादुर नें बताया कि कोट (टीले) पर बहुत सम्पदा है। पर वह किसी को नहीं मिलेगी।

मैने पूछा – क्यों?

“वह (प्रेतात्मा) जो मांगती है, वह आदमी के बस में नहीं है दे पाना।”

राजन भाई ने एक्स्प्लीसिट प्रश्न किया – क्या मांगती है? बलि?”

“साधारण बलि नहीं, बहुत अलग तरह की जो आदमी दे नहीं सकता।”

जैसे?

“जैसे तीन टांग की गाय, एक टांग का मुरगा और अपना जेठ लड़का”

विजय बहादुर की यह (बलि और खजाने की) बात मुझे बहुत दकियानूसी लगी। पर यही सब प्रचलित होगा गांव देहात में। इन ग्रामीणों को न तो सही इतिहास की जानकारी है, न ही वे (21वीं सदी में भी) तन्त्र,मन्त्र, बलि आदि की अवधारणाओं से ऊपर उठ पाये हैं। मैं यही आशा करूंगा कि विजय बहादुर या उन जैसे लोग कभी दिग्भ्रमित हो, खजाने की खोज में न लग जायें टीले पर।

मैने बात पलट दी। पूछा टीले पर घणरोज (नीलगाय) हैं?

“कम आते हैं आजकल। पर आने पर फसल बरबाद जरूर करते हैं। उनसे बचाने के लिये ही मड़ई बना कर रहना पड़ता है। उनके अलावा मोर थे, पर अब यहां से चले गये हैं। सांप बहुत हैं। शायद मोर न रहने से बड़ गये हैं।”

चलते समय राजन भाई को कुछ करेले दिये विजय बहादुर ने। मैने चलते चलते कहा – मिलते आता रहूंगा आपसे।