स्वर्ण प्राशन – आयुर्वेदिक वैक्सीनेशन पद्धति और तिवारी दंपति का अभियान

बच्चों के ये डाक्टर दंपति इस स्वर्ण प्राशन की दवा को बहुत कारगर पा रहे थे, इसलिए इसे अभियान के रूप में अपनाने का संकल्प लिया. अन्यथा, कोई एलोपैथिक डाक्टर किसी आयुर्वैदिक चिकित्सा की प्रशंसा करने का पाप तो कभी नहीं करता. 😁



वे दोनों डाक्टर हैं. एक एलोपैथी के – डा. संतोष तिवारी. बच्चों के डाक्टर हैं और सूर्या ट्रॉमा सेंटर में वरिष्ठ कंसल्टेंट हैं. उनकी पत्नी हैं डा. शर्मिला तिवारी. वे आयुर्वेद की डाक्टर हैं – बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पीएचडी. दोनों में प्रोफेशनल तरीके से छत्तीस का आंकड़ा होना चाहिए. मैंने पहले किसी एलोपैथी वाले और आयुर्वेदिक डाक्टर में हार्मोनी नहीं देखी. ताराशंकर बंद्योपाध्याय का उपन्यास “आरोग्य निकेतन” इन दोनों चिकित्सा पद्धतियों के झगड़े की पृष्टभूमि में लिखी गई कालजयी रचना है.

पर इस दम्पति ने यह अलग विधाओं का झगड़ा मिटा दिया है. और उसमें आयुर्वेद विनर है. दोनों पति पत्नी स्वर्ण प्राशन नामक आयुर्वेदिक इम्यूनोलॉजिकल सिस्टम की उपयोगिता पर न केवल सहमत हैं वरन उसके प्रचार प्रसार के लिए अपनी बहुत सी ऊर्जा लगा रहे हैं.

डा. संतोष से मैं सूर्या ट्रॉमा सेंटर (जहां आजकल अपने पिताजी के इलाज के सन्दर्भ में हूँ) में मिला. वे स्वर्ण प्राशन के कॉन्सेप्ट से परिचित थे पर आयुर्वेदिक पद्धति का होने के कारण उस पर ध्यान नहीं दिया था. जब अपनी बिरादरी के डाक्टरों की एक कांफ्रेंस में इसकी एक सज्जन ने चर्चा की तो इस भारतीय विरासत की ओर उनका रुझान बना.

काफी जांच परख के बाद संतुष्ट होकर, संतोष और शर्मिला जी ने वाराणसी में अपने सूर्या चिल्ड्रेन हॉस्पिटल के माध्यम से, इस इम्यूनोलॉजिकल प्रणाली को बतौर अभियान अपनाने का निश्चय किया.

डा. संतोष और शर्मिला तिवारी. उनका वाराणसी स्थित चिल्ड्रन अस्पताल

स्वर्ण प्राशन के बारे में मैंने अपने उज्जैन के आयुर्वेद के पीएचडी मित्र डा. प्रज्ञान त्रिपाठी से भी पता किया. उन्होंने भी सहमति व्यक्त की कि यह प्राचीन पद्धति है. मनुष्य के 16 संस्कारों में इसे स्थान दिया गया है. आयुर्वेद के अनुसार राजा का यह कर्तव्य होता था कि वह राज वैद्य की देख रेख में स्वर्ण भस्म का उत्पादन कराये. राज वैद्य राज्य के 16 वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों को पुष्य नक्षत्र के दिन (27 दिन में एक बार आने वाला दिन) यह भस्म चटाया करते थे. 16 वर्ष की उम्र तक 24 खुराक हर बच्चे को देने का विधान था. इसके दिए जाने पर बच्चे में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती थी और उसकी मेधा शक्ति का विकास होता था.

डा. संतोष और शर्मिला तिवारी ने 2017 में अपने अस्पताल में इस भस्म को बच्चों को देने का कार्यक्रम प्रारंभ किया. 13 जनवरी 2017 के दिन 100 के लगभग बच्चे पंजीकृत थे यह दवा देने के लिए, पर आए 173. उनको स्वर्ण भस्म घी में मिश्रित कर चटाई गई. बच्चों की संख्या बढ़ती गयी और तिवारी दंपति का उत्साहवर्धन भी होता गया इस अभियान में. आज इस दवा के लिए 1600 बच्चे पंजीकृत हैं. ये मुख्यतः उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग और बिहार के बच्चे हैं.

शुरू में अभियान के प्रचार प्रसार के लिए इन्होंने विज्ञापन का भी सहारा लिया. कालांतर में दवा की उपयोगिता लोगों को स्वयं समझ में आने लगी.

डा. संतोष तिवारी ने मुझे बताया कि यह दवा धूतपापेश्वर नामक आयुर्वेदिक कम्पनी बनाती है. वेब सर्च में पता चलता है कि यह ऑनलाइन भी उपलब्ध है. पर इस दवा को बच्चे को देने का भी एक विधान है. यह घी में मिश्रित कर चटाई जाती है पुष्य नक्षत्र के दिन.

तिवारी दंपति स्वर्ण भस्म धूतपापेश्वर से लेते हैं और ब्राह्मीघृत नागार्जुन औषधालय से. पुष्य नक्षत्र के दिन जितने बच्चे आने वाले हों, उनके अनुपात में इन दोनों दवाओं का मिश्रण कर टाइट्रेशन किया जाता है. उससे प्राप्त औषधि 1 से 4 मिलीलीटर मात्रा में प्रत्येक बच्चे को चटाई जाती है.

आप डा. शर्मिला तिवारी के एक वीडियो 👇 को देखने का कष्ट करें.



यह अभियान कितना कारगर है?

डा. संतोष ने बताया कि बहुत कारगर पाया है उन्होंने इसको अपने प्रयोगों में. जौनपुर की एक महिला जो अपने सभी बच्चों को इस इम्यूनाईजेशन के लिए लायी थी ने 6 खुराक के बाद बताया कि उसके बच्चे जो महीने में 26 दिन बीमार रहते थे अब दवा के लिए बीमार दशा में नहीं, पिकनिक मनाने आते हैं. कई बच्चों की इनहेलर की दरकार खत्म हो गई. इस दवा के द्वारा इम्यून हुए 1 हजार बच्चों में केवल 5 ही डेंगू ज्वर से पीड़ित हुए और उनमें से किसी को भी अस्पताल नहीं भर्ती करना पड़ा. स्वॉइन फ्लू के कोई मामले नहीं आए इस दवा से इम्यून किए बच्चों में.

और असल फायदा तो तराई के इलाके में हुआ. गोरखपुर और उसके आसपास, जहां एनसेफलाइटिस के कारण बहुत से बच्चों की अकाल मृत्यु हुई थी, के स्वर्ण प्राशन दवा से इम्यून हुए बच्चों में एनसेफलाइटिस का एक भी मामला नहीं पाया गया.

इम्यूनिटी के लाभों के अलावा बच्चे की मेधा, एकाग्रता, जिज्ञासा और ग्रहण की बेहतर क्षमता की बातें उनके अभिभावकों ने बताई हैं. डिस्लेक्सिया ग्रस्त बच्चों का रिस्पॉन्स भी बेहतर हुआ है.

तिवारी दंपति का सूर्या चिल्ड्रन अस्पताल. गुब्बारे और छोटा भीम चिकित्सा का अंग हैं. 😊 चित्र नेट से कॉपी किया गया

डा. संतोष के चेहरे पर अपने इस जुनूनी अभियान की सफ़लता को लेकर आत्म संतोष था. उनके चेहरे की चमक ही बता रही थी कि बच्चों के ये डाक्टर इस दवा को बच्चों के लिए कितना कारगर पा रहे थे.

अन्यथा, कोई एलोपैथिक डाक्टर किसी आयुर्वैदिक चिकित्सा की प्रशंसा करने का पाप तो कभी नहीं करता. 😁


डा. प्रज्ञान ने मुझे बताया कि मध्यप्रदेश में स्वर्ण प्राशन संस्कार का टीकाकरण व्यापक हो रहा है.

डा. संतोष भी कहते हैं कि योगी सरकार भी रुचि ले रही है. उत्तर प्रदेश में भी इसे सरकारी स्वास्थ कार्यक्रम में शमिल करने की संभावनाएं हैं….

वैसे भी, यह विधा भाजपा के राजनैतिक दर्शन और सामजिक सोच के साथ पटरी खाती है.

भविष्य में इस विधा पर ज्यादा सुनने को मिलेगा, यह संभावना है.


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जोगी बाबा – सिद्धिनाथ मन्दिर का साधू और अनाथ गौवंश को पालनेवाला

पिछले दो साल से इस इलाके में साइकिल से घूम रहा हूं मैं, पर राजकुमारनाथ (जोगी बाबा) जैसा विलक्षण व्यक्ति नहीं पाया मैने।


नाम है राजकुमारनाथ योगी। लोग जोगी बाबा कहते हैं। कुछ वैसा ही जैसे मुख्य मन्त्री जी हैं आदित्यनाथ योगी।

आदित्यनाथ की तरह राजकुमार नाथ भी नाथपन्थी साधू है। सारंगी बजा कर भिक्षा मांगने वाला।

आदित्यनाथ की तरह यह साधू भी लगभग 45-46 साल का है।

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उमादास


GDFeb164437गुरु द्वारा दिया नाम उमादास। गृहस्थ नाम ॐ प्रकाश शुक्ल। बांसगांव, देवरिया के रहने वाले। कृशकाय शरीर। पर्याप्त स्फूर्ति। साधू।

उमादास नाम गुरु का दिया है। गुरु का नाम भी बताया उन्होने। बनारस के हैं गुरूजी।

चाय की चट्टी पर अचानक दिखे। चट्टी वाले अरुण से मैने उनके बारे में पूछा – कौन हैं?

“होंगे कोई बाबा। आते जाते रहते हैं।” अरुण ने उनके बारे में अनभिज्ञता जताई।  अपने पिताजी के समय से चट्टी पर इस तरह के बाबा लोगों का सत्कार करते रहे हैं अरुण और अन्य भाई लोग। बिना पूछे कि कौन कहां के हैं। मैं अरुण से भी प्रभावित होता हूं और बाबाजी से भी। सरल से जीव लगते हैं बाबा जी। पास के हैण्डपम्प से पानी ले कर खड़े बाबा से बतियाने लगता हूं।

अपना मुकाम पहले गोरखपुर बताते हैं। ज्यादा पूछने पर देवरिया और उसके आगे तिखारने पर बांसगांव। बाईस जनवरी को चले हैं। मईहर तक जा कर लौटेंगे। कुल 125 दिन की यात्रा का अनुमान है। पैदल ही चलते हैं उमादास। रोज लगभग 5 कोस। जहां जगह मिली वहां विश्राम कर लेते हैं और जहां जो भोजन मिला, वही कर लेते हैं। पास में एक कपड़े में रोल किया कम्बल-चद्दर है। एक झोले में अन्य सामान। एक कमण्डल भी है – जो शायद साधू होने का प्रतीक है। अन्यथा उनके पास एक ग्लास भी दिखा, जिसमें पानी पी रहे थे वे।

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उम्र नहीं पूछी; पर मेरी उम्र के तो होंगे ही। शायद ज्यादा भी। स्वस्थ होने के कारण मुझसे जवान लगते थे।

अपनी अवस्था का अनुमान देते हुये बताते हैं उमादास – “शरीर का क्या भरोसा? अपना पता और तीन चार लोगों का मोबाइल नम्बर अपने झोले में रखा हूं।”

झोले से निकाल कर गीता की प्रति और उसमें लिखे मोबाइल नम्बर/पता आदि दिखाया उन्होने। बोला कि गीता और रामायण साथ में ले कर चलते हैं।

अपना खाना भी बना लेते हैं?

“नहीं, जो मिला वही कर लेता हूं। कभी अगर कुछ न मिला तो दो टिक्कड़् सेंक लेता हूं।”

पहले भी कभी यात्रा की है?

“पन्द्रह साल पहले चित्रकूट तक गया था इसी तरह। अकेले। एक बार मैरवा गया था। पैदल ही। अकेले। नेपाल नहीं गया। पहाड़ नहीं चढा हूं।”

अपनी दशा या देश-काल से कोई शिकायत नहीं लगी उमादास को। प्रसन्नमन ही दिखे। उन्हे मैने चलते समय एक जून के भोजन के पैसे दिये। बडी सहजता से स्वीकार किये उन्होने।

वापसी में अपने साथ चलते राजन भाई से मैने कहा – एक उमानाथ हैं। अगली जून के भोजन की फिक्र नहीं और मैं हूं; जो अगले साल भर के लिये अन्न संग्रह की जुगत में हूं। एक वाहन, एक वाहन ड्राइवर काइन्तजाम कर रहा हूं। मैं असन्तुष्ट हूं। उमानाथ संतुष्ट हैं और प्रसन्न भी।

अपना अपना भाग्य। अपनी अपनी दशा।

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पिताजी और आजकल


पिछले अप्रेल महीने में मेरी पोती  पद्मजा को गोद ले कर खड़े पिताजी।
पिछले अप्रेल महीने में मेरी पोती पद्मजा को गोद ले कर खड़े पिताजी।

मेरे पिताजी (श्री चिन्तामणि पाण्डेय) 81 के हुये 4 जुलाई को। चार जुलाई उनका असली जन्म दिन है भी या नहीं – कहा नहीं जा सकता। मेरी आजी उनके जन्म और उम्र के बारे में कहती थीं – अषाढ़ में भ रहें। (दिन और साल का याद नहीं उन्हें)। अब अषाढ़ई अषाढ़ होई गयेन्। ( अषाढ़ में जन्मे थे। अब अषाढ जाने कितने बीत गये)।

खैर, उनका सार्टीफ़िकेट के अनुसार जन्म दिन है 4 जुलाई 1934। उनके अनुसार उनका जन्म तो 1934 में हुआ था। चार जुलाई शायद दाखिले के समय लिखा दिया गया हो।

पिछले कई वर्षों से वे गिरती याददाश्त के शिकार हैं। याददाश्त के अलावा कई साल पहले उनकी सामान्य सेहत भी तेजी से गिरने लगी थी। एलोपैथिक दवाओं से जब लाभ नहीं हुआ था तो किसी के सुझाने पर रामदेव के आउटलेट पर बैठने वाले आयुर्वेदिक आचार्य जी को दिखाया था। उनकी दवाओं – घृतकुमारी रस और अश्वगन्धा के कैप्स्यूल जिनमें थे – से बहुत लाभ हुआ। उनके हाथों में कम्पन होने लगा था। वह रुक गया। उनकी तेजी से गिरती याददाश्त की गिरावट की दर बहुत कम हो गयी थी। उनका चलना-फिरना भी पहले की अपेक्षा बेहतर हो गया।

अम्मा जी के सतत देखभाल से वे तो ठीक हो गये पर सन् 2013 मे उत्तरार्ध में घर में ही फिसलने के कारण अम्मा जी की कूल्हे की हड्ड़ी टूट गयी। उनके ऑपरेशन के लिये, उनको दी जाने वाली ब्लड-थिनर दवायें सप्ताह भर के लिये रोक दी गयी थीं। वही घातक साबित हुआ। उनका ऑपरेशन तो ठीक से हो गया और वे स्वास्थ लाभ भी कर रही थीं; पर मस्तिष्क में कहीं थक्का जम गया और दो बार उन्हे पक्षाघात हुआ। पहले आघात से उबर रही थीं। पर दूसरा घातक साबित हुआ। पिताजी ने उन्हे मुखाग्नि तो दी, पर उनके फेरे लगा कर शरीर को अग्नि को अर्पित करने और कपाल-क्रिया का कृत्य मैने पूरा किया। मेरे लड़के ने दस दिन के कर्मकाण्ड निबाहे और अन्त में पिण्ड-दान, महाब्राह्मण की बिदाई का कृत्य मैने सम्पन्न किया। परिवार की तीन पीढ़ियों के सामुहिक योग से कर्मकाण्ड सम्पन्न हुये उनके। मुझे याद नहीं कि किसी और घर में इस प्रकार हुआ होगा।

अम्मा जी के जाने के बाद मैं पिताजी को अपने साथ गोरखपुर ले आया। पिताजी के एकाकीपन के झटके और उसमें कैद हो जाने की आशंका हम सब को थी; पर गोरखपुर में एक-डेढ़ बीघे में फैला खुला बंगला, और आउट हाउस के कई चरित्र उन्हे बोलने बतियाने को मिल गये। वे अगर अम्मा के चले जाने के बाद इलाहाबाद में ही रहते तो शायद एकाकीपन और अम्मा की याद से भरा वातावरण उन्हे तोड़ता। गोरखपुर में आउट हाउस के चन्द्रिका और ध्रुव, रोज नमस्ते करने वाली महिला, बगीचे में काम करने वाला माली नारद, सफ़ाई के लिये यदा कदा आने वाला सफ़ाई जमादार, मेरे वाहन के डाइवर… ये सब उनके चौपाल के मित्र बन गये। वे कभी थक जाने पर कमरे में आ कर बिस्तर पर लेटते हैं तो कुछ सुस्ता लेने के बाद फिर उठ कर बाहर निकल लेते हैं। वहां चौपाल जमती है या फिर किसी के न रहने पर वे परिसर में चक्कर लगा कर फूल-पत्तियां-सब्जियां निहारते हैं। काम भर की सब्जियां – नेनुआ, लौकी, भिण्डी तोड कर लाते हैं। चन्द्रिका को कष्ट होता है कि समय से पहले ही तोड़ लेते हैं नेनुआ और लौकी।

अभी महीना भर पहले आधी रात मे उनकी आवाज आयी। वे मेरी पत्नीजी को बुला रहे थे। हम गहरी नींद से जगे और देखा कि उनके माथे पर चोट लगी है। खून बह रहा है। एकबारगी तो मुझे समझ नहीं आया कि क्या करूं। भाव के अतिरेक में उन्हे मैने बांहों में भर लिया – मानो वे छोटे शिशु हों। हमने उनका घाव धोया, घर में उपलब्ध दवाई लगा कर पट्टी की और उपलब्ध पेनकिलर दिया। उनके बिस्तर को ऐसे किया कि गिरने की सम्भावना न रहे।

उनसे पूछा कि चोट कैसे लगी तो वे कुछ बता न सके। बाद में भी याद नहीं आया।

अगले दिन सवेरे उन्हे हम ड्रेसिंग कराने अस्पताल ले गये। डाक्टर साहब ने बताया कि रात भर में घाव भरा है और ड्रेसिंग-दवाई से ठीक हो जायेगा। अन्यथा अगर रात में लाये होते उन्हें तो कम से कम चार-पांच टांके लगते। डाक्टर साहब ने एहतियादन सीटी-स्कैन और खून की जांच कराने के लिये कहा। वह सामान्य निकला।

बाद में अनुमान लगा कि उन्हें पोश्चरल हाइपो-टेंशन की समस्या हुई। गर्मी के मौसम में पसीने से नमक की कमी हुई शरीर में और रात में  बाथरूम की ओर जाने के लिये वे झटके से उठे होंगे तो कम रक्तचाप के कारण चक्कर आ गया होगा। जमीन पर गिरते हुये कोई कोना टकराया होगा जिससे माथे पर चोट लगी।

कई दिन तक उन्हे कमजोरी की शिकायत रही। अब वे ठीक हैं। तख्ते पर लगा उनका बिस्तर हटा कर उनचन वाली मूंज की खाट पर कर दिया गया है जिससे रात में बिस्तर से उठते समय गिरने की आशंका कम से कम हो जाये।

कटका में बनते घर को देखते पिताजी। साथ में मनीष औरदूर नीली कमीज में धर्मेन्द्र।
कटका में बनते घर को देखते पिताजी। साथ में मनीष औरदूर नीली कमीज में धर्मेन्द्र।

पिछले शुक्रवार को उन्हे हम कटका साथ ले कर गये। मैं रिटायरमेण्ट के बाद वहां सेटल होने के लिये एक छोटा घर बनवा रहा हूं। वह उन्हे दिखाना चाहता था। उसे देख कर वे सन्तुष्ट तो थे, पर उन्होने मुआयाना अपने सिविल इन्जीनियर की निगाह से ही किया। उन्हे हम खेतों में लगाये यूकलिप्टिस के प्लाण्टेशन दिखाने भी ले गये। काफी रुचि ली उनमें भी पिताजी ने।

उनकी वर्तमान की याददाश्त गड्ड-मड्ड हो जाती है। वाणी भी कई बार लटपटा जाती है। पुराना अच्छे से याद है। अपने बचपन की घटनायें और व्यक्ति वे बता ले जाते हैं। पर उन घटनाओं के क्रम में कभी कभी घालमेल हो जाता है।

कुल मिला कर वे ठीक हैं और हमें अपेक्षा है कि अगले दशक और उससे आगे भी उनकी उपस्थिति का आशीर्वाद हमें प्राप्त रहेगा।

पिताजी के साथ मेरा बेटा, पद्मजा और मैं।
पिताजी के साथ मेरा बेटा, पद्मजा और मैं।


DEMU – डेमू गाड़ी का उद्घाटन समारोह


सादात में डेमू उद्घाटन के दौरान भीड़ को सम्बोधित करते श्री मनोज सिन्हा।
सादात में डेमू उद्घाटन के दौरान भीड़ को सम्बोधित करते श्री मनोज सिन्हा।

अपनी रेल सेवा के दौरान मैने कई ट्रेनों के शुभारम्भ के समारोह देखे हैं। बहुतों में बहुत सक्रिय भूमिका रही है। इन्दौर से देश के विभिन्न भागों में जाने वाली लगभग आधा दर्जन ट्रेनों का शुभारम्भ, अलग-अलग रेल मन्त्रियों द्वारा होते देखा है। माधव राव सिंधिया, नीतिश कुमार, ममता बैनर्जी, लालू प्रसाद यादव के समारोहों की यादें हैं। ये तब के अवसर हैं जब मैं रेल मण्डल स्तर का अधिकारी हुआ करता था। उसके बाद जोनल रेलवे के मुख्यालय – पूर्वोत्तर और उत्तर मध्य रेलवे के मुख्यालयों में आने पर (मेरे कार्य की प्रकृति बदलने के कारण) – ट्रेनों के उद्घाटन समारोहों में जाने का सिलसिला लगभग समाप्त हो गया था।

हाल ही में पूर्वोत्तर रेलवे के मुख्य परिचालन प्रबन्धक बनने पर यह उद्घाटन समारोहों में जाने का सिलसिला पुन: कुछ प्रारम्भ हुआ। रेल राज्य मन्त्री श्री मनोज सिन्हा ने मण्डुआडीह (वाराणसी) से दो ट्रेनों को हरी झण्डी दिखाई। उन समारोहों में मैं उपस्थित था।

अब, तीस जून को एक ट्रेन के उद्घाटन समारोह में जाने का अवसर मिला। यह अलग प्रकार की रेलगाड़ी थी और अलग प्रकार के जगह पर उसका उद्घाटन हो रहा था।

मऊ से बरास्ते वाराणसी, इलाहाबाद सिटी को जाने वाली एक डीजल-इलेक्ट्रिक-मल्टीपल-यूनिट (DEMU) सवारी गाड़ी – जो सभी स्टेशनों पर रुकती है – के शुभारम्भ का कार्यक्रम था यह। माननीय  रेल राज्य मन्त्री श्री मनोज सिन्हा उसका उद्घाटन करने जा रहे थे। उद्घाटन किसी प्रमुख नगर – इस मामले में मऊ, इलाहाबाद या वाराणसी – में न हो कर एक छोटे स्टेशन सादात में होने जा रहा था। एक प्रकार से यह सही भी था – छोटे स्टेशनों की जरूरतों को पूरा करने वाली ट्रेन का उद्घाटन भी एक छोटे स्टेशन पर हो।

सादात स्टेशन पर बनारस से सड़क मार्ग से हम घूम-घाम कर पंहुचे। पहले आशापुर-पांड़ेपुर के आस पास ट्रैफिक जाम में फंसे रहे पौना घण्टा। एक बस और एक टैंकर वाले आमने सामने भिड़े हुये थे। कोई अपनी जगह से टस से मस नहीं हो रहा था। अंतत:, समय से थक हार कर दोनो शायद थोड़ा थोड़ा पीछे हटे और हमें निकलने का मौका मिल गया। अन्यथा लगने लगा था कि उद्घाटन कार्यक्रम में चूक जी जायेंगे हम। सड़क आगे अच्छी मिली। सैदपुर के आसपास हम गंगा नदी के पास से गुजरे। वहां का दृष्य देख कर लगा कि लौटानी में कुछ समय गंगा किनारे व्यतीत करना उचित रहेगा। वही बाद में किया भी।

मुख्य सड़क से सादात स्टेशन को पंहुचने का रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा था। टेढ़ा-मेढ़ा और कहीं कहीं संकरा भी। लोग हमें कौतूहल से देख भी रहे थे। कहीं कहीं झोंपड़ियां और गुमटियां थीं तो बीच में इक्का-दुक्का पक्के मकान (जिन्हे शहर के स्तर से भी आलीशान कहा जा सकता है) भी थे। मुझे लगने लगा था कि यह पक्का सामंती इलाका है – जहां गरीबी और पिछड़ेपन के बीच सम्पन्नता के द्वीप हैं। मुझे यह भी बताया गया कि इस इलाके में कई कॉलेज हैं और वहां के छात्र बहुत उत्पाती हुआ करते थे। पहले जब यहां लाइन क्लियर लेने के लिये टोकन की व्यवस्था थी तो ट्रेने ज्यादा देर तक रोकने के लिये वे रेलवे स्टाफ से टोकन छीन कर फैंक दिया करते थे। अब भी यहां चेन खींचने की घटनायें आम से अधिक हैं।


अगले दिन मुझे मेरे साले जी – शैलेन्द्र दुबे ने बताया कि यह इलाका समाजवादी पार्टी का गढ़ हुआ करता था। श्री मनोज सिन्हा ने वह इस बार संसदीय चुनाव में जीत हासिल कर वह गढ़ ध्वस्त कर दिया। सादात के इलाके से श्री सिन्हा को व्यापक समर्थन मिला। इस भाग में लगभग क्लीन स्वीप मिली उन्हे।


अंतत: हम समय से रेलवे स्टेशन पंहुच ही गये। डेमू ट्रेन सजी, संवरी अपने इनॉग्युरल रन के लिये प्लेटफार्म पर तैयार खड़ी थी। सादात स्टेशन पर प्लेटफार्म के ऊंचा करने का काम चल रहा है। उसके कारण व्यवधान था। व्यवधान पिछले दिनों हुई बारिश के कारण भी था। पर उसके बावजूद बहुत से स्थानीय उस ट्रेन को देखने के लिये वहां उपस्थित थे। कुछ तो नाच भी रहे थे।

उद्घाटन के लिये सजी डेमू सवारी गाड़ी। सादात स्टेशन पर।
उद्घाटन के लिये सजी डेमू सवारी गाड़ी। सादात स्टेशन पर।

स्टेशन के सामने पण्डाल बना था। पूरे पण्डाल स्थल पर कारपेट बिछा था। बिछाना वैसे भी जरूरी हो गया था – बारिश के कारण अगर कारपेट न होता तो चलना कठिन होता। पण्डाल, शामियाना और मंच की गुणवत्ता सादात जैसे छोटे स्टेशन की तुलना में काफी अच्छी कही जायेगी।

मंत्री महोदय समय पर आये। उन्हे देख कर भीड़ में जो रिस्पॉंस दिखा, वह एक नेता के क्षेत्र में औपचारिक दौरे जैसा नहीं था। लगभग हर व्यक्ति उन्हे ऐसे देख रहा था या उन्हे ऐसे सम्बोधित कर रहा था मानो श्री सिन्हा उसी के खासमखास हों। वे हर व्यक्ति से उसका ज्ञापन स्वयम ले रहे थे। वह जो कह रहा था उसे सुन भी रहे थे और उसके कहे पर आश्वासन और प्रतिक्रिया भी दे रहे थे। … मुझे दशकों पहले माधव राव सिन्धिया जी के कार्यक्रम की याद हो आयी। वहां तीस-चालीस कदम की दूरी रखी जा रही थी भीड़ की उनसे और एक दो व्यक्ति लोगों से ज्ञापन ले कर तह लगाने के बाद एक बोरी में इकठ्ठा कर रहे थे। शायद सिन्धिया जी श्रीमंत थे जिनके लिये लोगों से सम्बन्ध राजा-प्रजा वाले थे; और, उसके उलट सिन्हा जी जमीन से जुड़ी राजनीति कर रहे थे।

समारोह के दौरान जनता से बोलते-बतियाते श्री मनोज सिन्हा।
समारोह के दौरान जनता से बोलते-बतियाते श्री मनोज सिन्हा।

मैं मन्त्री महोदय के पीछे बैठा था और उनका जनता के साथ इण्टरेक्शन बड़ी बारीकी से देख रहा था। अपने ब्यूरोक्रेटिक जीवन में दो दर्जन से अधिक सांसदों और मांत्रियों को बारीकी से देखा है मैने। अपने समधी (गिरिडीह के लोक सभा सदस्य, श्री रवीन्द्र पाण्डेय) के साथ भी समय व्यतीत करने का पर्याप्त अनुभव है। मैने इन अधिकांश नेताओं को अच्छी ग्रास्पिंग पावर का पाया था। उनका जनता और भीड़ को देख ‘हरियरा जाना’ भी मैने ऑब्जर्व किया है। पर जनता का उनको देख कर इस प्रकार प्रसन्न होना – जैसा यहां समारोह में देख रहा था – कम ही (या शायद नहीं ही) देखा है मैने।

इस लिये, समारोह के बाद जब मंत्री महोदय के साथ कुछ क्षण गुजारने का समय मिला; तब मैने यह कहा भी – “बहुत आत्मीय भीड़ थी। बहुत भारी संख्या में और बहुत आत्मीय।”

इस प्रकार के छोटे स्टेशन पर उद्घाटन समारोह का आयोजन करना रेलवे प्रशासन के लिये झंझटिया काम हो सकता है। शायद कुछ लोग कुड़बुड़ा भी रहे हों और इसे सामान्य प्रक्रिया के विपरीत बता रहे हों। पर अगर लोगों का सही रिस्पॉंस ही एक घटक हो समारोह का; तो यह सादात में (छोटे स्टेशन पर) समारोह को मैं सम्भवत: सब से अच्छा समारोह मानूंगा अपने करीयर में।

इस इलाके को डेमू सेवा देना और उसका उद्घाटन सादात जैसे स्टेशन से करना अगर श्री मनोज सिन्हा की स्थानीय टीम के सोच के बल पर हुआ है, तो मानना पड़ेगा कि उनके पास एक कुशल राजनीतिक-प्रबन्धन की टीम है। और अगर यह उनका अपना तय किया था, तो उनके राजनीतिक प्रबन्धन को मास्टर-स्ट्रोक लगाने वाला ही कहा जायेगा।

ग्रामीण जनता का दिल जीतने के लिये डेमू बेहतर है लम्बी दूरी की गाड़ी से। छोटा कदम बेहतर है अंतर महानगरीय छलांगों की अपेक्षा!


गोल्फार के सफाई वाले


गोल्फार में कार्यरत सफाईवाले।
गोल्फार में कार्यरत सफाईवाले।

शनीवार का सवेरा। दस बज गया था पर धूप नहीं निकली थी। रात में कोहरा नहीं था, पर धुन्ध बनी हुई थी। यकीन इस लिये भी था कि स्मार्टफोन का एप्प भी मिस्ट बता रहा था। कोई काम न हो और मन में उलझन हो, तो सैर पर निकल जाने से बेहतर कुछ नहीं। मैने वही किया। सिर पर कुलही, एक स्वेटर और उसपर जाकिट पहन अपने को सर्दी के खिलाफ सुरक्षित करते हुये निकला। पड़ोसी का नौकर अपने कुकुर को नित्यकर्म करवाने निकला था। उसका फोटो लेने का मन नहीं हुआ, अन्यथा कुकुर – नहीं कुतिया – ने पोज अच्छा बनाया था। गोल्फार में महाप्रबन्धक के घर के पास आधा दर्जन सफाई कर्मी मिले। सर्दी के बावजूद अपने काम में लगे थे। शाल के बड़े बड़े पत्ते रात में चली हवा में गिरे थे। उनका काम उन्हे झाड़ू से बीनना, ढेरी बना कर उनमें आग लगाना था।गोल्फार में पेड़ इतने ज्यादा हैं और उनसे पत्ते इतने ज्यादा झरते हैं कि उन पत्तों को इकठ्ठा कर बढ़िया कम्पोस्ट खाद बन सकती है जो शायद पूरे गोरखपुर के रेल परिसर की बागवानी की खाद की  जरूरतें पूरी कर दे। पर वह नहीं होता। पत्ते जलाये ही जाते हैं और खाद – जितनी भी लगती हो – खरीदनी पड़ती होगी।


गोल्फार

गोल्फार यानि गोल्फ ग्राउण्ड के पास 18-20 रिहायशी मकानों का हरा भरा स्थान। यह नाम मैने गंगा के ’कछार’ के तर्ज पर रखा है।


सफाई वालों की खाद बनाने की मल्टी-टास्किंग नहीं है। मैने कार्यरत सफ़ाई वालों के चित्र लिये। एक जगह एक सफ़ाई वाले ने टहनियां इकठ्ठी कर रखी थीं और पत्तियों को जला कर ताप रहा था। लकड़ियां शायद घर जाते समय उठा कर ले जाये ईन्धन के लिये। एक महिला भी जाती दिखी। उसके हाथ में भी झाड़ू थी। शायद वह भी सफ़ाई कर्मी हो।

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गोल्फार हरा भरा, सुन्दर और स्वर्ग सा लगता है। उसके सौन्दर्य को कायम रखने वाले ये सफाई कर्मी हैं। पता नहीं, स्वर्ग में भी सफाई कर्मी होते हैं या नहीं। होते भी होंगे तो वे भी देवता होते होंगे। (वैसे शीतला माता सफाई की देवी हैं। वे गधे पर सवार हैं। उनके चार हाथों में झाडू, जल पात्र, अनार के बीज और तलवार हैं। स्वच्छता की देवी होने के कारंण वे रोगों का नाश करती हैं।)