जोगी बाबा – सिद्धिनाथ मन्दिर का साधू और अनाथ गौवंश को पालनेवाला

पिछले दो साल से इस इलाके में साइकिल से घूम रहा हूं मैं, पर राजकुमारनाथ (जोगी बाबा) जैसा विलक्षण व्यक्ति नहीं पाया मैने।


नाम है राजकुमारनाथ योगी। लोग जोगी बाबा कहते हैं। कुछ वैसा ही जैसे मुख्य मन्त्री जी हैं आदित्यनाथ योगी।

आदित्यनाथ की तरह राजकुमार नाथ भी नाथपन्थी साधू है। सारंगी बजा कर भिक्षा मांगने वाला।

आदित्यनाथ की तरह यह साधू भी लगभग 45-46 साल का है।

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खुले में शौच


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गांव की सड़क। इसके किनारे खुले शौचलाय का काम देते हैं बरसात के मौसम में। 

सन 1987 में मैने अपने बाबा का दाह संस्कार किया था। गांव में लगभग दो सप्ताह रहा उनके क्रिया-कर्म सम्पादित करने के लिये। दस दिन तक अछूत था मैं। अपना भोजन नहीं बनाता था। घर में एक बुआ जी बना देती थीं और भोजन की पत्तल मेरी तरफ़ सरका देती थीं। अगर रोटी अतिरिक्त देनी होती थी तो पत्तल में रखने की बजाय ऊपर से टपका देती थी। मुझे खराब नहीं लगा था वह सब। कर्मकाण्ड निभाने का कौतूहल था। सर्दियों का मौसम था। सभी प्रयोग अच्छे लग रहे थे।

एक तख्ते पर पुआल बिछा कर मेरा बिस्तर बनाया गया था। आनन्द आता था उसपर सोना। आसपास और भी लोग रहते थे। पर काफी समय अकेले सोचने में व्यतीत होता था। विशेषकर रात में। भोर में ही मैं शौच के लिये तालाब के समीप जाता था। घर से लगभग एक किलोमीटर दूर। खुले में शौच का वह मेरा अन्तिम अनुभव था। मेरे पास लोटा नहीं होता था। एक दो बार मिट्टी की घरिया में पानी ले कर गया। पर वह असुविधाजनक था। फिर गड़ही/तालाब के पानी का प्रयोग करने लगा। मिट्टी से ही हाथ रगड़ कर धोता। यह सब कर्म सुबह की पहली किरण दिखने के पहले ही पूरा कर लेता था। मुझे यह याद नहीं आता कि मेरे पास कोई टार्च थी। अंजोरिया पाख था। चांद की रोशनी में काम चल जा रहा था।

खुले में शौच का वह अनुभव कुल मिला कर खराब नहीं था मेरे लिये। इसके पहले बचपन की स्मृतियों में केवल वह अच्छी तरह याद है, जब मटर के खेत में नेकर की डोरी बहुत यत्न करने पर भी नहीं खुली थी और किसी तरह सरका कर नेकर उतारा था। निपटान के बाद टिश्यू पेपर का काम किसी ढेले या खेत में सुविधाजनक रूप से मिलने वाली पत्तियों से लिया जाना तो रुटीन था। उसके बाद नेकर आधा पहने गड़ही तक जा कर धोना भी सामान्य प्रक्रिया थी। जब तक लोटा ले कर खेत में जाने की उम्र आती, मैं शहरी बन चुका था।

अब, रिटायरमेंट के बाद गांव की लगभग 95% आबादी को खुले में शौच करते पाता हूं। तीन दशक बाद भी गांव शौच के मामले में बदले नहीं। उल्टे, आबादी बढ़ने के कारण बदतर हो गये हैं।

बरसात के मौसम में लोग खेत में नहीं जा पाते तो सड़क के किनारे और रेल लाइन के आसपास की जगह विष्ठा से भर देते हैं। सड़क पर चलना या साइकल चलाना बहुत अप्रिय अनुभव हो जाता है।

गंगा किनारे गांव है कोलाहलपुर। पूरा गांव चमार जाति के लोगों का है। अम्बेडकर ग्राम घोषित कर उसमें सरकार ने हर घर में एक शौचालय बना दिया है। पर शायद ही कोई व्यक्ति उन शौचालयों का बतौर शैचालय प्रयोग करता हो। महिलायें भी शौच के लिये गंगा किनारे जाती हैं।

यहां पास के गांव – भगवानपुर में एक बाभन जवान ने मुझे बताया कि सूरत में फैक्टरी में काम करता था वह। गांव वापस चला आया – “उहां, हगई बरे भी संडास के बहरे लाइन लगाये पड़त रहा। इहां जब मन आवइ, चलि द लोटा लई क खेते (वहां शौच के लिये भी शौचालय के बाहर लाइन लगानी पड़ती थी। यहां जब मन आये चल दो लोटा ले कर खेत में।” मुझे अजीब लगा कि हगने की फ्रीडम के लिये भी रिवर्स-माइग्रेशन होता है; शहर से गांव में।

दो दिन पहले एक एन.जी.ओ. पास के प्राइमरी स्कूल में लोगों को बुला कर भाषण दे रहा था खुले में शौच के खिलाफ़। उसने खुले में शौच को स्त्रियों की इज्जत-आबरू से जोड़ा। उस पर औरतों में कसमसाहट शुरू हुई। फिर विरोध। और लोग उठ कर जाने लगे। जाने वाले आदमी नहीं, औरतें ही थीं। बड़ा ही जटिल है ग्रामीणों को किसी बात को, किसी विचार को समझाना। और थोड़ा बहुत समझ भी आये तो अपेक्षा यही रहती है कि सरकार शौचालय बना कर दे। जहां बना कर दिये भी हैं – कोलाहलपुर में – वहां उसकी साफ़सफ़ाई खुद नहीं करना चाहते लोग। फलत: गंगा (जिसे मां कहते हैं लोग) का किनारा शौच से पाटने को बुरा नहीं समझते वे।

खुले में शौच और स्वच्छता पर लोगों की आदतें बदलना आसान काम नहीं।

मछली पकड़ना और फोटोग्राफ़ी



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कोलाहलपुर में केवट नहीं हैं। उनके पास नावें नहीं हैं। धन्धा भी मछली पकड़ने का नहीं है उनका। अधिकांश मजदूरी करते हैं, खेतिहर हैं या बुनकर। सवेरे गंगा किनारे वे शौच, दातुन और स्नान के लिये आते हैं। नहाने के बाद कुछ धर्मपारायण हनुमान जी या शिवजी के मन्दिर जाते हैं तो पास ही में करार पर हैं।


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वहां घाट पर चित्र खींचने के लिये बस कुछ ही प्रकार के दृष्य होते हैं। विविधता के लिये मैं करार पर उखमज से लिपटे पेड़ों और झाड़ियों के चक्कर लगाता हूं। उखमज (पतंगे) बहुत ही ज्यादा हैं गंगा किनारे। उनको पकड़ने के लिये मकड़ियां जाला लगाती हैं। जालों में फंसे उखमज और उनके मृत शरीर अनेकानेक आकृतियां बनाते हैं। सवेरे की रोशनी में उनके पास घूमने का एक अलग तिलस्म है।


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मैं आज उनके आगे बढ़ गया। गंगा किनारे एक नाव थी। उसपर तीन आकृतियां नजर आ रही थीं। पहले लगा कि वे बालू का अवैध उत्खनन करने वाले होंगे। पर जब लगा कि उस प्रकार के लोग नहीं हैं नाव पर तो मैं नजदीक चला गया।

तीन जवान मछेरे थे उनपर। जाल समेट रहे थे। उन्होने बताया कि करीब एक घण्टा हो गया उन्हे पर कोई मछली हाथ नहीं लगी। सो अब वे जगह बदल रहे हैं। नाव किनारे एक खूंटे से बांध रखी थी उन्होने। खोल कर आगे बढ़ने लगे। उनके जितने चित्र खींच सकता था, उतने मैने खींचे। कुछ ज्यादा ही खींचे।


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पास के बरैनी घाट के हैं वे मल्लाह। नाव पर जो सामान नजर आ रहा था, उसके हिसाब से बहुत तैयारी के साथ थे वे मछली पकड़ने को।


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एक अन्य व्यक्ति साइकल से आया था। हाथ में मछली पकड़ने के लिये बन्सी/डण्डी। एक जार में कुछ मछलियां और पकड़ी मछलियां रखने के लिये एक पॉलीप्रॉपिलीन का बोरा था। बताया कि कटका के पास के किसी गांव से है वह।

कांटा फंसा कर वह बैठा मछली मारने को। मैं भी पास में बैठना चाहता था कैमरा ले कर। पकड़ी मछली का चित्र लेने की प्रतीक्षा में। करार पर दूब गीली थी ओस से। मैने बैठने को उससे बोरा मांगा। काफी उहापोह दिखाया उसने पर अन्तत दिया नहीं। मैने गीली दूब पर बैठ कर इन्तजार करने का निर्णय किया।

लगभग 10 मिनट बैठा रहा मैं। मछली उसके कांटे में अटकी पर शायद उतना नहीं कि वह खींच सके। मेरा धैर्य उसके धैर्य से काफी कमजोर प्रमाणित हुआ। उकता कर मैं उठ आया।

फोटो खींचने का लालच मुझ बिना लहसुन-प्याज का शाकाहारी भोजन करने वाले को मछली पकड़ने की प्रतीक्षा करा रहा था। कुछ अजीब सी बात है।

खैर, आगे भी कोई मछेरा मिलेगा। आगे भी मछली पकड़े जाने की प्रतीक्षा करूंगा। तब शायद वह पर्याप्त परिचित होगा और बैठने के लिये मुझे अपना बोरा भी दे दे।

आगे की ब्लॉग पोस्टों की प्रतीक्षा कीजिये बन्धुवर।
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कोलाहलपुर और मुर्दहिया


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कोलाहलपुर में लगभग 400 घर हैं। उसमें से 3 घर सवर्णों के हैं। मुझे बताया गया कि शेष चमार हैं। कुछ खेती में लगे हैं। कुछ बुनकर हैं – कालीन बनाने वाले सेंटर पर जा कर आठ घंटे कालीन बुनते हैं। कुछ मजदूरी करते हैं।
मैंने तुलसीराम की मुर्दहिया के कण तलाशने की सोची। पर लगा कि गाँव वैसा नहीं है।
यह विचार आया कि शायद अब हालात बदले हों। पहले सामाजिक और आर्थिक हालात भयावह रहे हों।

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उस दिन मुझे गंगा किनारे शाम को मिल गए रामधनी। उनकी उम्र मेरे बराबर लगभग साठ साल की है। तुलसीराम भी लगभग इतनी उम्र के होते।
लगा कि कोलाहलपुर को मुर्दहिया का सीक्वेल लिखने के लिये रामधनी एक सही पात्र होंगे। वैसे भी रामधनी स्पष्टवक्ता लगे। अच्छी याददाश्त वाले भी। यह विचार मन में पुख्ता हो रहा है की रामधनी के विस्तृत इंटरव्यू ले कर उसके आधार पर एक श्रंखला लिखी जा सकती है।
रामधनी के दो लड़के हैं, दोनों बुनकर। वे अब मोतियाबिंद के आपरेशन के कारण बुनकर के काम से संन्यास ले चुके हैं। उनके कहे अनुसार उनका घर संपन्न नहीं हो तो विपन्न भी नहीं है।
भविष्य में मुर्दहिया का सीक्वेल लिखने की संभावनाएं बनती हैं – आखिर मुझे भी व्यस्त रहने को कुछ काम चाहिए! कि नहीं?