हेमेन्द्र सक्सेना जी के संस्मरण – पुराने इलाहाबाद की यादें (भाग 1)

सन 1944 में इलाहाबाद “पूर्व के ऑक्सफोर्ड” के नाम से जाना जाता था। दो किलोमीटर के दायरे में विश्वविद्यालय सीनेट हॉल, म्योर सेण्ट्रल कॉलेज, आनन्द भवन और पब्लिक लाइब्रेरी स्थित थे। कहा जाता था कि अगर एक ढेला यहां फेंका जाये तो किसी न किसी महान हस्ती पर गिरेगा।


हेमेन्द्र सक्सेना जी अब 91 वर्ष के हैं और उनकी सम्प्रेषण की क्षमता और काबलियत किसी भी मेधावी नौजवान से अधिक ही है। वे इलाहाबाद के उस समय के गवाह रहे हैं जब वहां हर गली नुक्कड़ पर महान विभूतियां चलती फिरती दिखाई पड़ती थीं। उन्होने “Remembering Old Allahabad” शृखला में नॉर्दन इण्डिया पत्रिका में लेख लिखे हैं। मेरे मित्र श्री रमेश कुमार जी – जो उनके पारिवारिक मित्र भी हैं, ने 14 पृष्ठों की हेमेन्द्र जी की एक हस्तलिखित पाण्डुलिपि की फोटोकॉपी दी है। मुझे नहीं मालुम कि यह एन.आई.पी. में छप चुकी है या नहीं। गौरी सक्सेना (उनकी पुत्री और मेरी रेलवे की सहकर्मी) ने बताया कि और भी बहुत सा उनका लिखा घर पर मौजूद है पर वे उसे प्रकाशित करने के बारे में बहुत मॉडेस्ट हैं।

गौरी सक्सेना ने अपने पिताजी की सहमति उनके लिखे के अनुवाद को ब्लॉग पर प्रस्तुत करने के लिये दी है। मैं उनका आभारी हूं। यह करीब 5 भागों में प्रस्तुत होगा।

इस परिचयात्मक नोट के अन्त में कहा जा सकता है कि यह हेमेन्द्र सक्सेना जी की अतिथि ब्लॉग पोस्ट है।


हेमेन्द्र सक्सेना जी की हस्तलिखित पांडुलिपि का स्क्रीनशॉट
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देहात महुआ बीनने में लगा है


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जहां देखो वहां महुआ के पेड़ और उनसे टपकते महुआ के फूल। सवेरे सवेरे घूमते समय यही दिखता है।

बच्चे पॉलीथीन की पन्नियां, महिलाये और पुरुष दऊरी या अन्य कोई बर्तन लिये जमीन पर गिरे पीले फूल बीनते दिखते हैं। भीनी भीनी गंध पूरे वातावरण में बसी है।

मेरे तो घर में कमरों में भी, जब हवा तेज होती है तो यह गंध घुस आती है। कुछ फूल बीन लाओ तो उसके आसपास गंध दिन भर रहती है।

आज सवेरे साइकल से घूमने निकले राजन भाई के साथ तो एक जगह, गड़ौली गांव के आसपास, बढ़िया दृष्य था। एक महिला और पुरुष कई रंग बिरंगी धोतियां जमीन पर बिछाये थे एक खेत में। खेत में एक महुआ का पेड़ था। गेंहू की फसल कट चुकी थी। खेत के मैदान में धोतियों पर महुआ टपक रहा था और वे बीन रहे थे उन धोतियों पर से। मैने अपनी साइकल रोक दी। उनका चित्र लेने लगा।

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एक महिला और पुरुष कई रंग बिरंगी धोतियां जमीन पर बिछाये थे एक खेत में। खेत में एक महुआ का पेड़ था। […] खेत के मैदान में धोतियों पर महुआ टपक रहा था […]।
राजन भाई ने पुरुष से पूछा – रात यहीं गुजारते हो?

अऊर का। न देखवारी करी त लोग महुआ के संघे धोतियऊ उठाई लई जांईं (और क्या! रात में देखवारी न करें तो चोर महुआ के साथ साथ ये धोतियां भी उठा ले जायें)।

उस आदमी ने बताया कि नीलगाय का भय नहीं है। खाली खेत में टपकते महुआ से उसको कोई लेना देना नहीं। पर टपकते महुआ के लिये गांव वाले ही नीलगाय हैं जिनसे बचाना पड़ता है रात रात भर जाग कर।

महुआ खरीदने के लिये व्यापारी आते है और महुआ के फूल ले जाते हैं। दस – बीस रुपया किलो। जब जैसा रेट मिल जाये।

DSC_0172-1-01उन लोगों ने जितना महुआ बीना था, बालटी और दऊरी में; वह करीब बीस-पच्चीस किलो रहा होगा। करीब 300-400 रुपये का। एक दिन की इतनी आमदनी दो व्यक्तियों की। ज्यादा नहीं तो कम भी नहीं है। पूरा देहात महुआ बीनने में लगा है। करीब 50 से 100/200 रुपये की आमदनी के लिये।

व्यापारी क्या करता है महुआ के फ़ूल का? राजन भाई बताते हैं कि यह जोड़ों के दर्द के लिये औषधि बनाने में काम आता है। इसके फूल पानी में या दूघ में उबाल कर फूलों को छानने के बाद बचे पानी या दूध का सेवन करने से जोड़ों के दर्द में बड़ा आराम मिलता है। बाकी; महुआ का प्रयोग देसी शराब बनाने में तो होता ही है।

महुआ लोक कविताओं में बहुत सशक्त रोमांटिक तत्व है। यह इतने बैठे ठाले लोगों को रोजगार भी दे रहा है – यह शायद कम लोग जानते होंगे।

अब जान जाईये! 😆

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महुआरी, सड़क किनारे। राह चलते लिया चित्र।

एक भाग्यशाली (?!) नौजवान से मुलाकात


अमित पाण्डेय। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव। मुझे रथयात्रा, वाराणसी में सोनू उपाध्याय के दफ़्तर में मिले।
अमित पाण्डेय। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव। मुझे रथयात्रा, वाराणसी में सोनू उपाध्याय के दफ़्तर में मिले।

(यह मैने बतौर फेसबुक नोट पोस्ट किया हुआ है। ब्लॉग पर इसका परिवर्धित रूप रख रहा हूं। दस्तावेज के लिये।)

वाराणसी में मैं सोनू (प्रमेन्द्र) उपाध्याय के रथयात्रा स्थित मेडिकल स्टाक-दफ़्तर में बैठा था। सोनू मेरे बड़े साले साहब (देवेन्द्र नाथ दुबे जी) के दामाद हैं। अत्यन्त विनम्र और सहायता को तत्पर सज्जन। वे मेरे लिये एक आवश्यक औषधि मंगवा रहे थे थोक विक्रेता के यहां से। उनका जो कर्मचारी औषधि लेने गया था, वह जाम में फंस गया था। उसके आने में देरी हो रही थी। सोनू आवाभगत में हमें (मेरी पत्नीजी और मुझको) एक-एक कुल्हड़ (उम्दा) चाय पिला चुके थे। हम आपस में इधर उधर की बातचीत भी निपटा चुके थे। अब विशुद्ध इन्तजार करना था औषधि लाने वाले व्यक्ति का।

वहीं बैठे थे दो सज्जन – नौजवान। वे आपस में मैडीकल कम्पनियां ज्वाइन करने/छोड़ने और विभिन्न दवाओं के स्टाक आदि के बारे में बात कर रहे थे – आपस में और सोनू से भी।

समय गुजारने की गर्ज से ही मैने उनमें से एक, जो एक गमछे के साथ खेल भी रहा था, से पूछा – कम्पनियां ज्वाइन करने और छोड़ने की बातें कर रहे हैं आप। इसमें अनिश्चितता नहीं रहती? तनाव नहीं होता?

उसने बताया – है क्यों नहीं। तनाव भी रहता है। पर यह नौकरी – मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव की – महीने में बीस हजार दे रही है। सो ठीक लगता है।

प्रमेन्द्र (सोनू) उपाध्याय। यह चित्र तब का है, जब वे मेरे गांव स्थित घर में मिलने आये थे।
प्रमेन्द्र (सोनू) उपाध्याय। यह चित्र तब का है, जब वे मेरे गांव स्थित घर में मिलने आये थे।

सोनू ने कहा कि ये नौजवान करीब दो लाख महीने का टर्नओवर कर रहे हैं। मेडिकल रिप्रजेण्टेटिव के अलावा किसी न किसी कम्पनी की फ्रेंचाइज़ी हासिल कर लेते हैं। जितना काम, जितनी मेहनत, उतनी कमाई।

उस नौजवान से पूछा – कितना समय हुआ यह करते? इसके पहले क्या करते थे?

नौजवान ने नाम बताया अमित। अमित पाण्डेय। करीब डेढ साल से यह काम कर रहे हैं। फार्मेसी की पढ़ाई नहीं की। बी.ए. किया है। उसके बाद इसी काम में लग गये।

हंसमुख नौजवान। तनाव को काम का अनिवार्य अंग मान कर चल रहा है। अपने काम में सजग। जीवन में बड़ी जल्दी नेटवर्किंग का महत्व समझ गया है। … व्यक्ति सजग हो, उसका व्यक्तित्व हंसमुख हो, वह मिलनसारता का महत्व जानता हो और अपनी दशा से कुढ़ता न हो; तो वह भाग्यशाली होगा। अपॉर्च्युनिटीज उसके पास सामान्य से अधिक आयेंगी और (अपनी मानसिकता के अनुकूल) वह अवसर पहचानेगा और तरक्की करेगा। पता नहीं, अमित यह जानता है या नहीं, पर अगर नहीं भी जानता, तो अपनी प्रवृत्ति के अनुसार, अनजाने ही सफ़लता की गोल्डमाइन पर हाथ तो रख ही लिया है उसने।

अमित का प्रोफाइल चित्र - ह्वाट्सएप्प पर।
अमित का प्रोफाइल चित्र – ह्वाट्सएप्प पर।

मैने अमित का एक चित्र लेना चाहा तो अमित ने सही पोज बनाया – गमछा अलग रख कर। मैने कहा – ऐसे नहीं वैसे बैठो जैसे गमछा लपेट कर बैठे थे।

अमित ने गमछा पुन: लपेट कर मुझे ओबलाइज़ किया। सोनू ने उससे कहा – लो, अब तुम सोशल मीडिया पर आ जाओगे।

सोनू जी का सहकर्मी मेरी दवाई ले कर आ चुका था। दवाई का डिब्बा ले कर लौटते समय अमित के बारे में मैं और सोच रहा था। दशकों पहले किसी बिजनेस पत्रिका में आदि गोदरेज का पढ़ा एक इण्टरव्यू याद आ रहा था, जिसमें उन्होने कहा था – इस देश में ऐसा कोई भी व्यक्ति बेरोजगार नहीं है, जो रोजगार पाने का हुनर रखता है। (No one is unemployed who is employable)

अमित को देख वह धारणा पुष्ट हो रही थी। अमित आज रोजगार पाने का हुनर रखता है। कल शायद रोजगार देने का भी हुनर हासिल कर ले!

पलाश, सागौन और मध्यप्रदेश के आदिवासी


पवीण चन्द्र दुबे, चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट, उज्जैन सर्किल।
पवीण चन्द्र दुबे, चीफ कंजर्वेटर ऑफ फॉरेस्ट, उज्जैन सर्किल।

मैं प्रवीणचन्द्र दुबे जी से हाइब्रिड यूकलिप्टस और हाइब्रिड सागौन के प्लाण्टेशन के बारे में चर्चा करना चाहता था। प्रवीण जी मेरे सम्बन्धी हैं। उज्जैन सर्किल के मुख्य वन अधिकारी ( Chief Conservator of Forests) हैं। उससे भी अधिक; विद्वान और अत्यन्त सज्जन व्यक्ति हैं। उनकी विद्वता और सज्जनता मुझे सम्बन्धी होने से कहीं ज्यादा आकृष्ट करती है। अन्यथा कई सम्बन्धी हैं, जिन्हे दूर से ही पैलगी/नमस्कार से काम चलाना सुखद लगता है।

हम श्री रवीन्द्र पाण्डेय (मेरे समधी)  के पौत्र के यज्ञोपवीत संस्कार समारोह मे मिले। बालक संस्कार सम्पन्न होने के बाद सभी बड़े लोगों से भिक्षा लेने के लिये हमारे सामने से गुजर रहा था। पलाश की टहनी ले कर। पलाश की टहनी देख प्रवीण जी को आपसी चर्चा का विषय मिल गया, जिसमें मेरी भी पर्याप्त रुचि थी।

पलाश की हरी पत्तियों की टहनी लिये यज्ञोपवीत के उपरांत भिक्षा के लिये आता बालक।
पलाश की हरी पत्तियों की टहनी लिये यज्ञोपवीत के उपरांत भिक्षा के लिये आता बालक।

 

उन्होने कहा – जानते हैं, पलाश की पत्तियां जानवर नहीं चरता। और जंगल में यह निर्बाध बढ़ता है। अत्यंत पवित्र वृक्ष है यह। ग्रामीण और आदिवासी इसकी पत्तियां पत्तल बनाने के काम लाते हैं। इसकी जड़ में उत्तम प्रकार का फाइबर होता है और उससे मजबूत रस्सियां बनाई जाती हैं। स्त्रियां इसके गोंद से कमर कस/लड्डू बनाती हैं जो प्रसूतावस्था में बहुत लाभदायक है। इसका बीज पेट के कीड़े मारता है।

प्रवीण जी आगे बताने लगे और मैने अपने नोट्स लेने के लिये जेब में रखी नोटबुक खोल ली। पलाश के फूल मधुमेह में लाभदायक हैं। इसकी राख में जो क्षार होता है, वह भी औषधीय गुण रखता है। वह खून को पतला करता है। इसका फूल मां दुर्गा की पूजा में समिधा के काम आता है।

मध्यप्रदेश के आदिवासी एक प्रकार की रोटी – पानिया – बनाते हैं। वे पलाश के पत्तल बिछा कर उसपर रोटी बेलते हैं। फिर उसके ऊपर भी एक पलाश के पत्तों की पत्तल रख कर, दोनो परतों को सिल देते हैं। इस रोटी को उपलों की आग पर सेंक कर रोटी का प्रयोग करते हैं। पलाश और गोबर के धुयें से पानिया का स्वाद अनूठा हो जाता है।

पास बैठे एक सज्जन ने हामी भरी कि रोटी वास्तव में बहुत स्वादिष्ट होती है। वे उज्जैन जा चुके थे और आतिथ्य में प्रवीण जी ने उन्हे पानिया खिलायी थी।

प्रवीण जी ने मुझे भी उज्जैन आने का निमन्त्रण दिया। वहां मुझे भी वे पानिया खिलायेंगे।

प्रवीण जी विद्वान व्यक्ति हैं। उन्होने मध्यप्रदेश की वानिकी, वहां के आदिवासियों की पारम्परिक चिकित्सा और आदिवासियों के वन से जुड़ाव पर तीन पुस्तकें लिखी हैं। मैने उनसे इन पुस्तकों की मांग की। उन्होने वायदा किया कि वे इन पुस्तकों की सॉफ्ट कॉपी मुझे देंगे। निकट भविष्य में मैं उज्जैन जा कर उनसे और भी चर्चा करने का प्रयास करूंगा।

प्रवीण जी से मैं सागौन के प्लाण्टेशन पर चर्चा करने गया था। उन्होने उसके बारे में तो मुझे जानकारी दी; पर यह भी बताया “जानते हैं, गोण्ड आदिवासी सागौन के वृक्षों को कभी काटते नहीं हैं। इसके वन में होने के महत्व को वे जानते हैं। इसी कारण वन में सागौन निर्बाध बढ़ता है। वे केवल अपने परिवार में मृतक की याद में सागौन की लकड़ी की एक तख्ती बना कर निश्चित स्थान पर स्थापित करते हैं। तख्ती का आकार उस व्यक्ति की सामाजिक प्रतिष्ठा के अनुरूप होता है। तख्ती पर विभिन्न चिन्ह बने होते है। बहुत कुछ भित्ति-चित्रों की तरह। जंगली जीवन उनमें उकेरा मिलता है। हर तख्ती में सूर्य और चन्द्रमा अनिवार्य रूप से होते हैं।”

प्रवीण जी के पास वानकी जीवन का अनुभव भी है और वन के प्राणियों के प्रति सहृदय दृष्टिकोण भी। सरल और सौम्य स्वभाव के प्रवीण चन्द्र दुबे न केवल अपने विषय में जानकारी रखते हैं, वरन वन प्रति उनके विचारों में गहराई भी है, अनूठापन भी। कम ही लोग इस प्रकार के मिलते हैं।

मैं प्रवीण जी से उत्तरोत्तर अधिकाधिक प्रगाढ़ सम्पर्क और सम्बन्ध बनाने का प्रयास करूंगा।

एक शाम, न्यूरोलॉजिस्ट के साथ


डा. प्रकाश खेतान, न्यूरोसर्जन।
डा. प्रकाश खेतान, न्यूरोसर्जन।

तय हुआ था कि मैं न्यूरोसर्जन से छ बजे मिलूंगा और उन्हे ले कर अपने घर जाऊंगा अपनी अम्मा जी को दिखवाने। सवा छ बज रहे थे। मैं 15 मिनट से बाहर बैठा प्रतीक्षा कर रहा था कि डा. प्रकाश खेतान अपना कार्य खत्म कर उपलब्ध होंगे मेरे साथ चलने को। पर वहां बहुत से मरीजों की भीड़ लगी थी अपना नम्बर का इन्तजार करते हुये। बहुत से के हाथ में एम.आर.आई./सीटी स्कैन की रिपोर्ट थी। उनके हाथ में डाक्टर साहब की पर्चियां भी थीं – अर्थात कई पुराने मरीज से जो फिर से चेक-अप के लिये आये थे। मुझे लगा कि डाक्टर साहब जल्दी चल सकने की स्थिति में नहीं होंगे। मैने अपनी पॉकेट नोटबुक से एक पन्ना फाड़ कर अपना नाम लिखा और उनके पास भिजवाया। उसका परिणाम यह हुआ कि डाक्टर साहब ने अपने चेम्बर में बुला कर पास की कुर्सी पर बिठा लिया। मरीज एक एक कर उनके पास आते गये। सब को निपटाने में करीब सवा घण्टा लगा।

सवा घण्टे भर मैने न्यूरो सर्जन को अपने आउट-पेशेण्ट निपटाते देखा। यह भी अपने आप में एक अनुभव था, जो पहले कभी मुझे नहीं मिला।

एक मरीज के साथ तीन-चार लोग थे और सभी उत्तर देने को आतुर। सभी ग्रामीण लगते थे। बाहर से आये। डाक्टर साहब ने सीटी- स्कैन में दिखा कर कहा कि यह छोटी गांठ है दिमाग में। जो हो रहा है, उसी के कारण है। जो दवा वो लिख रहे हैं, वह सवा दो-ढ़ाई साल तक बिना नागा लेनी पड़ेगी। एक भी दिन छूटनी नहीं चाहिये। — पीठ की बीमारी जो वह बता रहे हैं, उसका इस गांठ से कोई लेना देना नहीं है। सिर की बीमारी 95% पूरी तरह ठीक हो जायेगी। अपना वजन कण्ट्रोल में रखें। आग, नदी तालाब, कुंये से दूर रहें। खाने में कुछ भी खायें पर हाथ धो कर। साइकल न चलायें। दवाई शुरू करें और दस दिन बाद दिखायें। — इसी प्रकार की नसीहत अधिकांश मरीजों को मिली।

एक महिला ने बताया खोपड़ी में झांय झांय होती है। कान में किर्र किर्र की आवाज आती है। हाथ पूरी तरह नहीं उठता। नींद ठीक से नहीं आती। डाक्टर साहब ने पूछा कि पेट साफ़ रहता है तो महिला के साथ आये आदमी ने कहा नहीं। डाक्टर साहब ने नियमानुसार दवाई लेने और भोजन के लिये कहा। हाथ की एक्सरसाइज के लिये कहा – चारा मशीन चलाने को कहा। यह भी कहा कि एक्सरसाइज और दवा से हाथ 70-80% ठीक हो जायेगा।

एक लड़के से इण्टरेक्शन – “कै क्लास पढ़े हो? — साइकल, गाड़ी, नदी, तालाब से दूर। कोई और सवाल हो तो पूछो। कोई भी सवाल”।


न्यूरोसर्जन के साथ बैठे मैने तरह तरह के मरीज देखे। स्ट्रोक के मरीज। मिरगी/एपिलेप्सी के मरीज। संक्रमण के मरीज। दुर्घटना के मरीज। शरीर में आवश्यक तत्वों की कमी के मरीज। भूलने की बीमारी वाले थे – यद्यपि उम्र के साथ होने वाली डिमेंशिया/एल्झाइमर के वृद्ध मरीज नहीं देखे वहां। लगभग हर मरीज न्यूरो-परीक्षण की रिपोर्ट ले कर आया था। समय के साथ लोगों में न्यूरो समस्याओं के प्रति जागरूकता बढ़ी है। अन्यथा पहले न्यूरोफीजीशियन के बड़े कम्पीटीटर ओझाई करने वाले/प्रेतबाधा दूर करने वाले हुआ करते थे। सीटी/एम.आर.आई. की सुविधायें अब मेट्रो के अलावा छोटे शहरों में भी उपलब्ध होने से न्यूरोफीजीशियन बेहतर लैस हैं समस्याओं को समझने और निदान करने में। 

फिर भी न्यूरोचिकित्सकों की उपलब्धता आवश्यकता से कहीं कम है! 😦

अगले जन्म की मेरी विश-लिस्ट में न्यूरोलॉजिस्ट होना भी जुड़ गया है अब! 😆


अधिकांश मरीज ग्रामीण थे तो उन्हे उन्ही के परिवेश से को-रिलेट करती भाषा में बीमारी बताना और उन्ही के परिवेश की बातों से जोड़ती दवा-परहेज की बात करना; यह मैने दांत, त्वचा, जनरल फीजीशियन आदि को करते देखा था। पर एक कुशल न्यूरोसर्जन को भी सम्प्रेषण की बेहतर क्वालिटी के लिये उसी प्रकार से बोलना होता होगा; यह जानना मेरे लिये नया अनुभव था। और गंवई/सामान्य जन से पूर्ण संप्रेषणीयता के लिये मैं डाक्टर खेतान को पूरे नम्बर दूंगा। मरीज को उसके स्तर पर उतर कर समझाना, उसके सभी प्रश्नों को धैर्य से समझना, जवाब देना और उसके परिवेश से इलाज को जोड़ना – यह मुझे बहुत इम्प्रेस कर गया।

डाक्टर साहब ने एक ही बार “सिण्ड्रॉम” जैसे तकनीकी शब्द का प्रयोग किया। अन्यथा, अन्य सब मरीजों की बोलचाल की भाषा में ही समझाया था।

मरीजों के कई चेहरे मुझे याद हैं। ग्रामीण किशोर, मोटी, हिज़ाब पहने मुस्लिम लड़की और उसकी मां, शहरी परिवार जो अपनी स्कूल जाती लड़की को दिखाने आया था और जिसकी मां बार बार यह पूछे जा रही थी कि वह प्लेन में यात्रा कर सकती है या नहीं, नशे की आदत छोड़ता वह नौजवान — यह डाक्टर का चेम्बर था, पब्लिक प्लेस नहीं, अन्यथा मैं उनके चित्र ले लेता। आदतन।

अन्त में मैने डाक्टर साहब से कहा कि उनका एक चित्र ले लूं? और फिर एक नहीं, दो बार मोबाइल का कैमरा क्लिक कर दिया। 😀

डा. प्रकाश खेतान, न्यूरोसर्जन। दूसरा चित्र।
डा. प्रकाश खेतान, न्यूरोसर्जन। दूसरा चित्र।

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उसके बाद डाक्टर साहब के साथ उनके घर गया और वहां से अपने घर। अम्माजी को जब डाक्टर खेतान ने देख कर दवा का प्रिस्क्रिप्शन लिख दिया तो मानो दिन का मेरा मिशन पूरा हुआ। मेरे सहकर्मी श्री साहू डाक्टर साहब को उनके क्लीनिक छोड़ कर आये, जहां वे साढ़े नौ बजे के बाद दो ऑपरेशन करने वाले थे। इसके पहले कल वे इग्यारह घण्टा तक चले एक ऑपरेशन को कर चुके थे।

(मुझे यह अहसास हो गया कि डाक्टर खेतान मुझसे कहीं अधिक व्यस्त और कहीं अधिक दक्ष व्यक्ति हैं अपने कार्य में।)

डाक्टर खेतान के साथ तीन घण्टा व्यतीत करने के बाद मेरा मन बन रहा है कि किसी न्यूरोसर्जन की बायोग्राफी/ऑटोबायोग्राफी पढ़ी जाये। goodreads.com पर वह सर्च भी करने लगा हूं मैं!

डा. प्रकाश खेतान, न्यूरोसर्जन


मेरी अम्माजी अस्पताल में हैं। उनकी कूल्हे की हड्डी टूटने के कारण उनका ऑपरेशन हुआ है। चुंकि वे दशकों से खून पतला करने के लिये नियमित दवाई लेती रही हैं; ऑपरेशन के पहले उनकी यह दवा रोक कर उनके रक्त का प्रोथ्रोम्बाइन टाइम ऑपरेशन के लिये वांछित स्तर पर लाया गया। इसके लिये दवा लगभग एक सप्ताह रुकीं। फलस्वरूप, या ऑपरेशन के कारण हुये तनाव के कारण, अम्मा को न्यूरोलॉजिकल समस्या हो गयी और यह आवश्यक हो गया कि किसी न्यूरोसर्जन-न्यूरोफीजिशियन की सलाह ली जाये।

डा. प्रकाश खेतान। चित्र उनके ब्लॉग से लिया गया।
डा. प्रकाश खेतान। चित्र उनके ब्लॉग से लिया गया।

मेरे सहकर्मी प्रदीप ओझा और उनकी पत्नी श्रीमती लता ओझा इस मौके पर काम आये। प्रदीप इस समय भोपाल में पदस्थ हैं, पर हैं इलाहाबाद के। उनके पारिवारिक मित्र हैं इलाहाबाद के प्रसिद्ध न्यूरोसर्जन डा. प्रकाश खेतान। प्रदीप के अनुरोध पर वे बहुत सरलता से मेरी अम्मा जी को देखने को तैयार हो गये। मुझे लगा कि मैं ऑपरेशन के कारण आई.सी.यू. के बिस्तर पर भर्ती अम्माजी को कैसे ले कर उनके पास जा सकूंगा, पर डा. खेतान ने कहा कि वे स्वयम् फाफामऊ के उस अस्पताल में आ कर देख लेंगे, जहां वे भर्ती हैं।

डा. खेतान का जब मुझे फोन मिला, तो मानो नैराश्य के गहन अन्धकार से मैं उबर गया।

डा. प्रकाश खेतान के नाम से मैने इण्टरनेट पर सर्च किया तो बहुत रोचक जानकारी मिली। एक आठ घण्टे की दुरुह न्यूरोसर्जरी कर 296 hydatid cyst (हाईडेटिड सिस्ट – ब्रेन में पेरासिटिक थक्के) निकालने के लिये गिनीज बुक ऑफ वर्ल्ड रिकार्ड में उनका नाम दर्ज है। यह है गिनीज रिकार्ड का पन्ना

डा. खेतान के इस ऑपरेशन की विस्तृत जानकारी यहां उपलब्ध है।

कल शाम साढ़े चार बजे डा. खेतान अस्पताल पंहुचे। उनकी विजिट से अस्पताल के डाक्टर और कर्मी गौरवान्वित महसूस कर रहे थे; ऐसा मुझे लगा। मेरी अम्माजी को उन्होने बहुत ध्यान से देखा। एक दक्ष डाक्टर की तरह उन्होने उनके परीक्षण किये। हाथ पैर का मूवमेण्ट करा कर देखा। आंखों और चेहरे का गहन परीक्षण किया। उस दौरान उपलब्ध डाक्टर और मैं उन्हें आवश्यक इनपुट्स देते रहे।

अस्पताल में मेरी अम्माजी। चित्र आई.सी.यू. में ले जाने के पहले का है।
अस्पताल में मेरी अम्माजी। चित्र आई.सी.यू. में ले जाने के पहले का है।

परीक्षण के बाद उन्होने उनके ऑपरेशन और अन्य टेस्ट की जानकारी ली। मैने अम्माजी की जो मैडीकल हिस्ट्री ज्ञात थी, वह तरतीबवार लिख रखी थी। उसे और पुराने परीक्षणों के बारे में उन्हे बताया। इस दौरान वे बड़ी दक्षता से डाक्टर का पन्ना लिखते जा रहे थे। दवायें, परीक्षण की जरूरत और उपलब्ध आई.सी.यू. के डाक्टर महोदय को हिदायत वे देते गये। उसके बाद मुझे मामले के बारे में उन्होने बिना तकनीकी जार्गन के समझाया।

अपने लड़के की ब्रेन इंजरी के सन्दर्भ में अनेक न्यूरोडाक्टरों और न्यूरोसाइकॉलॉजिस्टों से मेरा सामना हो चुका है। मैं यह कहूंगा कि डा खेतान के साथ यह अनुभव बहुत री-एश्यूरिंग लगा। वे पन्द्रह किलोमीटर से अपने से आये, बहुत सरलता से इण्टरेक्ट किया और आधे-पौने घण्टे का गहन समय दिया मेरी अम्माजी के लिये। … मैं उनकी सज्जनता/सरलता/दक्षता का मुरीद हो गया।

डा. खेतान को विदा करते समय मैने उनसे हाथ मिलाते हुये कहा कि मैं पहली बार किसी गिनीज़ वर्ल्ड रिकार्ड होल्डर से मिला हूं।  बहुत सरलता-सहजता से उन्होने मेरा यह कॉम्प्लीमेण्ट स्वीकार किया!

आप किसी विश्व रिकॉर्ड होल्डर से मिले हैं?

डेण्टिस्ट से एक अप्वॉइण्टमेण्ट


Ghost-train-to-the-Easter-001मैं पॉल थरू की दूसरी यात्रा पुस्तक – द घोस्ट ट्रेन टू द ईस्टर्न स्टार पढ़ रहा था। पॉल थरू अंकारा में अपने दांत की एक लूज फिलिंग के इलाज के लिये डेण्टिस्ट के पास गये थे। सामान्यत: डेण्टिस्ट के पास जाने की बात किसी ट्रेवलॉग में बहुत बारीकी से नहीं लिखी जायेगी। पर पॉल थरू एक अद्वितीय ट्रेवलॉग लेखक हैं। उन्होने डाक्टर इसिल इव्सिमिक के साथ इलाज के समय का भी अच्छा वर्णन किया है। डाक्टर इव्सिमिक अपना काम करते समय अपने मरीज के साथ अनवरत हल्की आवाज में कमेण्ट्री देते बात भी करती जाती थीं। और एक अच्छे ट्रेवलॉग लेखक के रूप में थरू वह सब बाद में पुस्तक में री-प्रोड्यूज भी करते गये।

***

मुझे भी डेण्टिस्ट के पास जाना था। मुझे अपने सामने के दांतों में कहीं कहीं कालापन और क्षरण महसूस हो रहा था पिछले साल भर से। जब तक उसके कारण कोई दर्द नहीं था, मैने वह अनदेखा कर दिया – थोड़ा टूथब्रश ज्यादा चला लेता था, यह मान कर कि उससे कालापन मिट जायेगा और दांत चमक जायेंगे। पर अब लगभग 15-20 दिन से लगने लगा कि ठण्डे-गरम के सम्पर्क में आने पर दांत में दर्द होने लगा है तो मैने समझ लिया कि दांतों के डाक्टर के पास गये बिना चारा नहीं है।

एक मरीज काअपने चेम्बर में दांतों का इलाज करती डाक्टर हाण्डू
एक मरीज का अपने चेम्बर में दांतों का इलाज करती डाक्टर हाण्डू

मुझे बताया गया कि रेलवे अस्पताल, इलाहाबाद में डाक्टर मंजुलता हाण्डू डेण्टिस्ट हैं। और एक अत्यंत कुशल डेण्टिस्ट हैं। मैने जब अपने सहकर्मी श्री राजेश पाण्डेय को उनके पास अप्वाइण्टमेण्ट लेने के लिये भेजा तो बड़ी सहजता से मिल भी गया। न मिलता तो शायद मैं विशेष यत्न न करता और टालता रहता दांत की समस्या। पर अब, वृहस्पतिवार को अपना दफ्तर का सवेरे का काम खत्म कर डाक्टर हाण्डू के पास मैं चला ही गया।

अस्पताल में घुसते ही उनका चेम्बर है। दो केबिन का चेम्बर। एक में एक अन्य डाक्टर मरीरों को बतौर ऑउटपेशेण्ट निपटा रहे थे। एक व्यक्ति ने उठ कर मुझे अपनी कुर्सी दे दी बैठने को। जैसे बस में अपंगों और महिलाओं को सीट दे देने का शिष्टाचार है; रेलवे में अफसर को अपनी सीट खाली कर देने का शिष्टाचार है। मुझे वह लाभ मिला। पर जल्दी ही मुझे दूसरे चेम्बर, जहां डेण्टिस्ट के काम करने के लिये बड़ी रिक्लाइनिंग सीट-कम-बिस्तर लगे थे, में बैठने के लिये जगह मिल गयी। उस चेम्बर में उपकरण नये थे। बिस्तर पर अभी नया पॉलीथीन कवर भी नहीं उतरा था। कुल मिला कर काफ़ी आधुनिक डेण्टल क्लीनिक का एम्बियेन्स दे रहा था वह चेम्बर। डाक्टर हाण्डू एक रिक्लाइनिंग सीट पर लेटे एक मरीज के दांतों की मरम्मत करने में व्यस्त थीं। उनके मुंह पर डाक्टरी मास्क लगा था। वे यदा कदा मरीज को या अपने सहायक को निर्देश में कुछ कह रही थीं। मुझे कुछ मायूसी हुई कि पॉल थरू के पुस्तक की डाक्टर इसिल इव्सिमिक की तरह रनिंग कमेण्ट्री नहीं दे रही थीं। 😦

जल्दी ही मेरा नम्बर आ गया। मुझे उस चेम्बर में उपलब्ध दूसरी सीट पर रिक्लाइन करने को कहा गया। डाक्टर हाण्डू ने मेरे दांतों का मुआयना किया और मेरी समस्या पूछी।

कुछ महीनों से आगे के नीचे और ऊपर के दांतों में ठण्डा या गरम के कॉण्टेक्ट में आने पर तेज अहसास होता है। अदरवाइज़ दर्द नहीं होता।

डाक्टर ने दांतो को ठक ठक ठोंकते हुये पूछा – दर्द होता है?

नहीं, केवल ठण्डा-गर्म से तकलीफ है।  

दांतों में कीड़ा लग गया है।

दांत के कीड़े की परिकल्पना
दांत के कीड़े की परिकल्पना

मुझे मन ही मन यह लगा कि कोई कीड़ा है जो दांतों में घुसा खाये जा रहा है दांतों को। मैने मेण्टल नोट किया कि बाद में इस कीड़े को इण्टरनेट पर तलाश करूंगा। बाद में तलाश करने पर पता चला कि ऐसा कोई कीड़ा नहीं है। चीनी या अन्य खाद्य पदार्थों से पैदा होने वाले अम्ल में पनपने वाले बेक्टीरिया दांतों का कैविटी या केरीज (cavity, caries) के रूप में क्षरण करते हैं। उसे ही सामान्य भाषा में कीड़ा लगना कहा जाता है। दांत या चमड़ी के डाक्टरों को मैने जन सामान्य को समझाने के लिये मैडिकल जार्गन रहित भाषा का प्रयोग करते पाया है – जैसे डाक्टर हाण्डू ने कीड़ा का प्रयोग किया या जैसे बहुत पहले एक चर्म रोग विशेषज्ञ मुझे डर्मेटाइटिस के सुधार के बारे में कहते थे कि “चार आना भर” सुधार हो गया है।


दांतों में समस्या भारतीय लोगों में पान-तम्बाकू खाने के कारण अधिक होती है। लोगों में मीठा खाने की प्रवृत्ति कम है। पर मेरे साथ पान खाने का कोण नहीं है। अलबत्ता मीठा बाभन नहीं खायेगा तो कौन खायेगा! 🙂
मुझे बताया गया कि दवाओं के लम्बे समय तक सेवन से भी हड्डियों (जिनमें दांत भी शामिल हैं) में क्षरण होता है। वह भी एक कारण हो सकता है मेरे साथ।


दांतों में दर्द न होने के कारण डाक्टर ने सफाई कर दांत की फिलिंग का निर्णय किया। उन्होने मुझे बाद में बताया कि अगर फिर भी ठण्डा-गर्म की सेन्सिटीविटी (आम भाषा में “पानी लगना”) होती है तो वे आर.सी.टी. (root canal treatment) करेंगी। दांतों की सफ़ाई और फिलिंग की प्रक्रिया में मुझे कई बार थूकना पड़ा। पानी या दवाओं की फुहार, खुरचने की क्रिया, फिलिंग की तकनीक – सभी मेरे मुंह पर अजमायी जा रही थीं और मेरे मन में यह था कि अगर इस सब की एक फिल्म बनती जो मैं बाद में देख पाता तो वह मुझे काफ़ी इनसाइट देती डेण्टिस्ट्री के बारे में। अन्यथा मैं तो लेटा लेटा यदा कदा दीवार पर टंगी उस सफ़ेद स्वस्थ दांत वाली सुन्दर लड़की का फोटो ही देख पा रहा था, या फिर डाक्टर के उस असिस्टेण्ट को; जिसके सिर के पृष्ठ भाग में उसको सवर्ण घोषित करती उसकी छोटी चोटी थी, जो छोटे खिचड़ी रंगत के बालों का अधेड़ था, जो काम दक्षता से कर रहा था पर शक्ल सूरत से देहाती लग रहा था – मेरी तरह!

अपने इण्ट्रोवर्ट नेचर के विपरीत मैं वहां अधिकधिक सम्प्रेषण की अपेक्षा कर रहा था – जो मिला नहीं। यह मेरी डाक्टर के साथ पहली सिटिंग थी। इसमें मेरे नीचे के दांत की फिलिंग हुई। शनीवार को दूसरी सिटिंग है, जिसमें ऊपर के दांत की फिलिंग होनी है। शायद उस दिन मैं डाक्टर हाण्डू से कुछ प्रश्न कर पाऊं।

दूसरी सिटिंग

शनिवार को नियत समय पर पंहुच गया। इन्तजार करते समय मेरे बगल में मैले कुचैले कपड़े पहने, चारखाने का स्कार्फ़ जैसा गमछा सिर पर बांधे एक वृद्ध बैठा था। हाथ में एक पतली सी बांस की लकड़ी थी जो ठीक से न संभालने के कारण यदाकदा गिर जाती थी। हाथ में अपने कागज लिये, लम्बी प्रतीक्षा के लिये तैयार बैठा था वह।

दीवार पर दांतों को दिखाते हुये विज्ञापनी महिला का चित्र था – किसी Glizer कम्पनी का। देखने वाले को निहारती हंसती महिला अपने स्वस्थ दांत दिखा रही थी। पर देखने वाला मेरे जैसा इनफ़ीरियॉरिटी कॉम्प्लेक्स वाला हो तो उसे लग सकता है कि अपने अच्छे दांतों से वह चिढ़ा रही है। वहां बैठे मैं बहुत जल्दी उकताने लगा।

डाक्टर हाण्डू एक महिला के दांतों की डेण्टिस्ट्री में व्यस्त थीं। ॒अपने महीन स्वर में यदा कदा अपने सहायक या उस महिला को निर्देशात्मक कुछ कहती थीं। आज सहायक कोई दूसरा व्यक्ति था – परसों वाले से ज्यादा स्मार्ट।

मुझे ज्यादा इन्तजार नहीं करना पड़ा और सिटिंग में भी ज्यादा समय नहीं लगा। मैने बताया कि पिछली सिटिंग के बाद नीचे के दांतों में मुझे पानी लगने की समस्या नहीं हुयी। एक आध बार लगा कि हल्का सेनसेशन है, पर वह शायद ऊपर वाले दांतों का सेनसेशन नीचे वाले दांतों का होने का समझने की मेरी गलती भी हो सकती है। डाक्टर को शायद मेरा यह तर्क सही न लगा। पर उन्होने बिना समय गंवाये मेरे ऊपर के दो दांतों की सफ़ाई-घिसाई और फिलिंग का काम लगभग बीस मिनट में पूरा कर लिया।

डाक्टर मंजुलता हाण्डू
डाक्टर मंजुलता हाण्डू

डाक्टर हाण्डू ने काम पूरा कर अपना मास्क उतारा तो पहली बार मैने उनका चेहरा देखा। उनकी अनुमति मांगी कि उनका एक फोटो अपने ब्लॉग के लिये ले लूं? और जैसा एक घुटा हुआ ब्लॉगर करता है – इससे पहले कि सामने वाला व्यक्ति अपनी सहमति या विरोध दर्ज करे, मैं उनका चित्र ले चुका था। उन्हे मैने बताया कि इस सिटिंग्स के बारे में मैं एक पोस्ट लिखूंगा और उन्होने कहा कि भविष्य में कभी भी आवश्यकता हो तो मैं उनके डेण्टल क्लीनिक पर आ सकता हूं।

मेरे मन में पहले यह धारणा थी कि डेण्टल डाक्टर के पास जाने का मतलब ही होता है लगभग 80% सम्भावना कि दांत उखाडा जायेगा और कुछ दिन तक भीषण दर्द रहेगा या फिर चेतावनी मिल जायेगी कि आपके सही तरीके से दांतों की देखभाल न करने से उनकी की आयु लगभग समाप्त है… पर वैसा नहीं हुआ। डाक्टर की दांतों की दक्ष फ़िलिंग के बाद अब काफी समय तक मुझे परेशान नहीं होना होगा। उनके कहे अनुसार सॉफ्ट ब्रश और हल्के से मंजन की शुरुआत मुझे करनी है।

बाकी, दांतों की फिलिंग लगभग कितना चलेगी, यह डाक्टर हाण्डू से पूछना भूल गया…