मदन मोहन पाण्डेय, उम्र 93 वर्ष


पिछली बार मदन मोहन जी से मिला था एक महीना पहले। आज फिर मिलना हुआ। वे और उनकी पत्नीजी खटिया पर बैठे थे। दोनो ही नब्बे के पार होंगे (या पत्नीजी नब्बे के आस पास होंगी)। वे स्वयम तो 93+ हैं। नब्बे के पार की उम्र और चैतन्य! कुछ कृशकाय हो गये हैं पर कद काठी से फिदेल कास्त्रो से लगते हैं!

मदन मोहान जी कुछ साल पहले तक साइकिल चला लेते थे। उन्होने बताया कि साइकिल का प्रयोग यातायात के लिये किया उन्होने। व्यायाम के लिये नहीं। व्यायाम तो वे मुगदर, नाल आदि से करते थे। लाठी/गोजी चलाने की भी निपुणता थी उनमें। मुसलमानों से सीखी थी यह विद्या। एक बार तो अनेक लोगों को अपने हाथ और लाठी के बल पर पछाडा। उनपर गोली भी चला दी थी एक व्यक्ति ने पर वह मात्र उनके हाथ में लगी। दांई हथेली में वह गोली आज भी शरीर में है। … एक बार वे एक झगड़े के गवाह थे। उनकी गवाही पर पांच लोगों को उम्र कैद की सजा भी हुई।

अपने बचपन को याद करते हुये बताते हैं कि उनके जमाने में महराजगंज में प्राइमरी स्कूल था। एक स्कूल बाबूसराय में था। अब तो हर जगह स्कूल खुल गये हैं। वे केवल दूसरी कक्षा तक पढे। पढने में मन नहीं लगता था। घर से चना ले कर स्कूल के लिये रवाना होते थे। स्कूल जाने की बजाय भुंजवा के यहां चना भुनवाते, बगीचे में बैठ कर चबाते और स्कूल का समय खत्म होने पर घर आ जाते थे। मार भी खाये पर पढ़े नहीं।

कलकत्ता में मदन मोहन जी 15 साल रहे। पहले ट्रक चलाया। अपना ट्रक। असम/गुवाहाटी तक हो आये। कलकत्ता से शाम को चलते थे और सवेरे तक इलाहाबाद/बनारस पंहुचते थे। ट्रक के बाद कलकत्ता में और भी काम किया उन्होने।

साइकिल खूब चलाई है उन्होने। सौ किलोमीटर रोज तक भी चलाई है। गांव से राबर्ट्सगन्ज तक साइकिल से हो आये हैं। तब सड़कें खाली होती थीं। वाहन कम। सड़कों पर पैदल चलने वाले ज्यादा होते थे।

बदलते समय के बारे में उनके समय में एक प्रचलित कहावत सुनाई मदन मोहन जी ने। इन्दारा से पानी निकालने के लिये गगरी का प्रयोग होता था। बाद में बड़ा गगरा (पीतल या ताम्बे का घड़ा) प्रयोग में आने लगा। उसके बाद बाल्टी से भी पानी निकालने का समय आया।

गगरी रही, त पटरी रही (जब तक गगरी थी, तब तक पटरी – आपस में सौहार्द – रही)

गगरा भवा त रगरा भवा (जब गगरा प्रयोग में आया तो आपस में झगड़ा होने लगा। गगरी की बजाय गगरा कुंये की दीवार से ज्यादा टकराता था।)

बाल्टी आइ त पाल्टी आइ (बाल्टी का प्रयोग होने लगा तो राजनीति घुसी गांव में। पार्टियां बनने/दखल देने लगीं)

चलते समय पाण्डेय जी को प्रणाम किया तो उन्होने पुन: आने को कहा। उनके पास जाना और बैठना अच्छा लगता है। सो जाऊंगा जरूर। कामना है कि उनका स्वास्थ्य अच्छा रहे और सरलता से सौ पार करें वे। उनके पास बैठ कर समाज-गांव में हुये बदलाव पर उनका कथन सुनना है। बार बार।


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रमेश कुमार जी के रिटायरमेण्ट अनुभव


श्री रमेश कुमार, मेरे अभिन्न मित्र। जिन्होने अपना चित्र भेजने के लिये पहली बार अपना सेल्फी लिया!
श्री रमेश कुमार, मेरे अभिन्न मित्र। जिन्होने अपना चित्र भेजने के लिये पहली बार अपना सेल्फी लिया!

रमेश कुमार जी मेरे अभिन्न मित्रों में से हैं। हम दोनों ने लगभग एक साथ नौकरी ज्वाइन की थी। दोनो केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण में असिस्टेण्ट डायरेक्टर थे। कुंवारे। दिल्ली के दूर दराज में एक एक कमरा ले कर रहते थे। घर में नूतन स्टोव पर कुछ बना लिया करते थे। दफ़्तर आने के लिये लम्बी डीटीसी की यात्रा करनी पड़ती थी – जो अधिकांशत: खड़े खड़े होती थी।

क्लास वन गजटेड नौकरी लगने पर जो अभिजात्य भाव होता, वह नौकरी लगने के पहले सप्ताह में ही खत्म हो चुका था। याद है कि जब एक मित्र ने बताया था कि वह अपने लिये मकान खोजने निकला तो मकान मालिक ने गजटेड नौकरी की सुन कर कहा था – “नो, यू पेटी गवर्नमेण्ट सरवेण्ट काण्ट अफ़ोर्ड दिस अकॉमोडेशन” ( नहीं, तुम छुद्र सरकारी कर्मचारी इस मकान का किराया भर नहीं पाओगे)।

खैर हम दोनों में कोई बहुत एयर्स नहीं थी सरकारी अफसरी की – न उस समय और न आज।
कालान्तर में मैं रेलवे की यातायात सेवा ज्वाइन कर दिल्ली से चला आया पश्चिम रेलवे में, पर रमेश जी केन्द्रीय विद्युत प्राधिकरण में ही रहे। उसी सेवा में उन्होने कुछ वर्ष पावर ग्रिड कार्पोरेशन की डेप्यूटेशन पर इलाहाबाद में काटे। उस समय मैं भी वहां पदस्थ था उत्तर-मध्य रेलवे में। एक जगह पर होने के कारण पुरानी मैत्री पुन: प्रगाढ़ हो गयी। वह प्रगाढ़ता आज भी बनी है।

रमेश जी रिटायर हुये इसी साल जून के महीने में। मैं सितम्बर में होने जा रहा हूं। वे इलाहाबाद और दिल्ली के बीच रहते हैं। अधिकांशत: इलाहाबाद। मैं इलाहाबाद और वाराणसी के बीच रहूंगा – अधिकांशत: कटका में। ज्यादा दूरी नहीं रहेगी। वैसे भी; मैं इलाहाबाद-वाराणसी के बीच एक मन्थली सीजन टिकट का पास बनवाने की सोच रहा हूं – जिससे इलाहाबाद आना जाना होता रहेगा। उनसे सम्पर्क भी बना रहेगा।

उस रोज रमेश जी से बात हो रही थी। अपने रिटायरमेंण्ट के बाद के लगभग ढाई महीने से वे काफ़ी प्रसन्न नजर आ रहे थे। मैने उनसे कहा कि ऐसे नहीं बन्धु, जरा अपना अनुभव ह्वाट्सएप्प पर लिख कर दे दो। उसे मैं भविष्य के लिये ब्लॉग पर टांग दूं और हां, एक चित्र – सेल्फी भी जरूर नत्थी कर देना।

इस तरह के काम में रमेश कुमार मुझसे उलट काफी सुस्त हैं। खैर, मैत्री का लिहाज रखते हुये एक दो मनुहार के बाद उनका लिखा मुझे मिल गया और थोड़ी और मनुहार के बाद सेल्फी भी।

अपनी कहता रहूं तो रमेश जी के साथ जो जीवन गुजारा है – उसपर एक अच्छी खासी पुस्तक बन सकती है। सुख और दुख – दोनों में बहुत अन्तरंग रहे हैं वे। पर यहां उनका ह्वाट्सएप्प पर लिखा प्रस्तुत कर दे रहा हूं।अन्ग्ररेजी से हिदी अनुवाद के साथ।

रमेश लिखते हैं –

आज आपसे बात कर बहुत प्रसन्नता हुई। मेरे ख्याल से आप 30 सितम्बर की काफ़ी उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहे होंगे। पिछले दो महीने से अधिक से मैं अपनी रिटायर्ड जिन्दगी पूरी तरह एन्ज्वॉय कर रहा हूं। मैं किसी अनुशासित दिनचर्या पर नहीं चल रहा (सिवाय नित्य सवेरे की सैर और यदा-कदा शाम की सैर के)। मैं पढ़ता हूं – करीब तीन-चार समाचारपत्र और जो हाथ लग जा रहा है (इस समय एक से अधिक पुस्तकें पढ़ रहा हूं) तथा बागवानी करता हूं। मुझे पक्का यकीन है कि आपके पास ढेरों अपठित पुस्तकें होंगी। अब समय आ रहा है कि उनके साथ न्याय किया जाये। और आपको तो लिखने में रुचि है – आपके पास तो अवसर ही अवसर हैं अब।

मैं संगीत सुनता हूं और अब सीखने का भी प्रयास करने लगा हूं। मैं किसी न किसी प्रकार से समाज सेवा भी करना चाहता हूं – यद्यपि उसके बारे में विचार पक्के नहीं किये हैं।

मेरा डाईबिटीज़ कण्ट्रोल में है। मेरी HbA1C रीडिंग 7.3 से घट कर 6.5 हो गयी है। मुझे पक्के तौर पर नहीं पता कि यह चमत्कार कैसे हुआ, पर निश्चय ही रिलेक्स जिन्दगी, समय की किसी डेडलाइन को मीट करने की अनिवार्यता न होना, आफिस का तनाव घर पर न लाने की बात ने सहायता की है। कुल मिला कर मुझे जो करने का मन है, वह कर रहा हूं। मेरे ख्याल से हर आदमी यही चाहता है।

अगर पैसा कमाने की कोई बाध्यता नहीं है ( सरकार सामान्य और सन्तुष्ट जीवन जीने के लिये पर्याप्त दे देती है) और अगर स्वास्थ्य के कोई बड़े मुद्दे नहीं हैं तो अनेकानेक सम्भावनायें है जीवन को आनन्द से व्यतीत करने की, रिटायरमेण्ट के बाद। आप अपनी सुनें और तय करें।

मुझे बहुत उत्सुकता है आपके नये ’आशियाने’ को देखने की कटका में। ज्यादा आनन्द के लिये हंस-योग का प्रयास करें।

सस्नेह,
रमेश कुमार।


रमेश कुमार जी ने हंस-योग का नाम लिया अन्त में। इसके विषय में उनसे पूछना रह गया। सम्भवत: वे स्वामी परमहंस योगानन्द या उनसे सम्बद्ध किसी योग (क्रिया योग?) की बात कर रहे हैं। शायद उनका आशय यह है कि मैं किसी योग-प्राणायाम आदि की ओर अपना झुकाव बनाऊं।

देखता हूं, आगे क्या होता है। अभी तो मन सूर्योदय को गंगा की बहती धारा में झिलमिलाते देखने को ही ललचा रहा है! बस!


 

पिताजी और यादें


संझा में बरामदे में बैठे, बतियाते पिताजी।
संझा में बरामदे में बैठे, बतियाते पिताजी।

शाम को घर के बरामदे में कुर्सी डाल हम बैठे थे – पिताजी, पत्नीजी और मैं। बात होने लगी पिताजी के अतीत की।

डिमेंशिया है पिता जी को। हाल ही की चीजें भूल जाते हैं। पुराना याद है। आवाज धीमी हो गयी है। कभी कभी शब्द नहीं तलाश पाते विचार के लिये। जब समझ नहीं आता तो हमें दो-तीन बार पूछना पड़ता है। यह सब फुरसत में ही हो पाता है। शाम को बरामदे में बैठे यह सम्भव है – जब समय की हड़बड़ी नहीं होती।


सन 1934 के जन्मे हैं मेरे पिताजी। गांव शुक्लपुर, तहसील मेजा, जिला इलाहाबाद। सामान्य सा गांव है शुक्लपुर। नाम शुक्लपुर है पर घर पाण्डेय लोगो के हैं। एक आध घर ही होगा शुक्ल लोगों का। गांव से गंगाजी 3 किलोमीटर की दूरी पर हैं। गांव में और आसपास के गांवों में खेत हैं हम लोगों के। कुछ बगीचे हैं – जिनके पेड़ पुराने हो कर खत्म हो रहे हैं। नये लगाये ही नहीं जा रहे। अब अलगौझी के कई दौर होने के कारण हर एक के हिस्से जमीन बहुत कम हो गयी है। घर का बड़ा मिट्टी का मकान था। करीब आधा बीघा जमीन पर। सौ साल से ज्यादा चला। हम लोग उसकी मरम्मत की सोच रहे थे। पर करीब तीन साल पहले उसे ढहा कर नया बनाने की सोची गयी। ढहा तो दिया गया, पर नया बनाने की बात पर एका नहीं हो पा रहा। गांव को लोग दुहना चाहते हैं – उसे सम्पन्न कोई नहीं करना चाहता।

चारदीवारी ले अन्दर एक बड़ा अहाता था, उसमें नीम का पेड़ था। नीम अब नहीं है।
शुक्लपुर का हमारा कुटुम्ब का मकान। अब नहीं है। 

गांव से करीब 8 किलोमीटर दूर है सिरसा। बाजार है। मेरे प्रपितामह के छोटे भाई प. आदित्यप्रसाद पाण्डेय वहां वैद्यकी करते थे। पहले बनिया लोगों के किराये पर लिये मकान में रहते थे। फिर वहीं जमीन खरीद कर मकान बनाया। वह पुराना मकान अब भी है। पर उसी साथ नया भी बना लिया है उनके पुत्र श्री तारकेश्वर नाथ पाण्डेय ने। प. आदित्यप्रसाद आयुर्वेद में आचार्य भी थे और नाड़ी-वैद्य भी। श्री तारकेश्वर जी ने उनका दवाखाना आगे चलाया। वे कुछ अपने पिताजी से सीखे, कुछ होमियोपैथी की डिग्री ले कर हासिल किया। चिकित्सालाय उनका भी अच्छा चलता रहा है।

यहां पिताजी की यादें मूलत: इन्ही स्थानों और परिवेश की हैं।


पिताजी ने बताया कि गांव का मकान लगभग तब का था जब मालिक (मेरे बब्बा प. महादेवप्रसाद पाण्डेय जन्मे होंगे या कुछ छोटी उम्र के रहे होंगे। मेरे बब्बा का जन्म 1900 में हुआ था। वह मकान मेरे पर-बाबा प. हरिभूषण पाण्डेय ने बनवाया था। अलगौझी के बाद। सिरसा में वैद्य जी ने किराये पर मकान ले वैद्यकी करते हुये वहां बनिया लोगों से जमीन खरीद कर घर बनाया। पैंतीस सौ रुपये में खरीदी थी वह जमीन। बाद में घर के पीछे की जमीन भी किसी मुसलमान से खरीदी और घर का क्षेत्रफल बढ़ाया।

इण्टर की पढ़ाई मेरे पिताजी ने वैद्य जी के पास रहते हुये सिरसा में की।  सिरसा की यादें बताते हुये उन्होने कहा कि वह आजादी के समय का दौर था। गान्धी-नेहरू-विजयलक्ष्मी पण्डित आदि लोग वहां आते रहते थे। महामना मदन मोहन मालवीय जी भी आते थे। मालवीय जी और गान्धीजी में बनती नहीं थी। उन्होने एक फोटो देखी है जिसमें गान्धीजी मालवीय जी का हाथ पकड़ कर मंच पर ले जाने की कोशिश कर रहे हैं। नहीं तो दोनो एक साथ कम ही होते थे।

उन्हे याद है कि गान्धीजी सिरसा में करीब तीन-चार बार आये थे। नेहरू-विजयलक्ष्मी-कैलाशनाथ काटजू आदि तो आते रहते थे। शास्त्रीजी तो बहुत ही आया-जाया करते थे।

“एक बार नेहरू जी और विजयलक्ष्मी पण्डित शुक्लपुर  आये। उस जमाने में कोई गाड़ी नहीं होती थी। एक पुरानी कार का इंजतजाम हुआ था उन्हे लाने के लिये। भरत सुकुल का लड़का नन्दकिशोर कलकत्ता में कुछ गाड़ी चलाना सीखा था। उसी को जिम्मा दिया गया चलाने को। पर उससे पुरानी कार हड़हड़ाई बहुत, चली नहीं।” 🙂 

“विजय लक्ष्मी पण्डित से मिलने सुकुलपुर में गांव की कई औरतें आयीं। त्रिभुअन की माई विजयलक्ष्मी का पैर छूने लगी तो उम्र के लिहाज से विजयलक्ष्मी जी ने ही उनका पैर छू लिया। त्रिभुअन की माई कहने लगी – ल बहिनी हम त तोहार गोड़ छुअई आइ रहे, तू हमरई छुई लिहू (लो बहिन, मैं तो तुम्हारा पैर छूने आई थी, तुमने तो मेरा ही छू लिया)।”

“उस समय आजादी, देश, राजनीति के बारे में गांव में जागरूकता थी। लोग पढ़े-लिखे कम थे, पर इन सब पर चर्चा करते थे। औरतें जो परदा में रहती थीं, भी बाहर गांव में जुलूस में निकला करती थीं। लोगों में स्वार्थ कम था; जागरूकता अधिक थी।”

“सिरसा में हम गंगा नहाने जाते थे – लगभग रोज। घर में कोई तैराक नहीं था। वैद्य जी भर कुछ तैरना जानते थे। नदी पार करने के लिये पॉण्टून वाला पुल नहीं हुआ करता था (वह तो आज से पच्चीस साल पहले बनने लगा)। लोग या तो डोंगी से पार जाते थे सैदाबाद की ओर या झूंसी वाले पुल से आवागमन होता था।”

“वैद्य जी विद्वान थे। पैसे का लोभ नहीं था उन्हे। बहुतों की निशुल्क चिकित्सा करते थे। पैदल जाते थे मरीज देखने। दूर जाना होता था तो लोग इलाज करवाने पालकी में ले जाते थे। सिरसा में न्योता (भोज) का बहुत चलन था। वैद्यजी न्यौता पर नहीं जाते थे। हम लोगों को जाने को कहते थे। जब कोई नहीं जाता था तो भोजन घर पर ही भेज देते थे लोग।”

खास बात यह थी कि वैद्यजी और मालिक (मेरे पिताजी के पिताजी) कभी झूठ नहीं बोलते थे।

“वैद्य जी का पहले कम्पाउण्डर था शीतला। वह कुशल हो गया था। दवा भी करना जान गया था। उसे बाद में कपारी (?) हो गयी थी। उसी से मर गया। उसके बाद गंगा कम्पाउण्डर बना। जात का नाऊ था। वह भी बहुत दक्ष हो गया था।”

पिताजी टुकड़ों में बताते हैं – जैसे याद आता है। प्रश्न करने पर सोच कर उत्तर देते हैं। मैने पाया कि प्रश्न करना और उनके कहे को नोट करना उन्हे अच्छा लगता है। सोचता हूं कि भविष्य में इस तरह बैठने-सुनने का अवसर अधिक मिलता रहेगा।

पिताजी की पुरानी याद पर एक पोस्ट – एक कस्बे में १५ अगस्त सन १९४७ 


DEMU – डेमू गाड़ी का उद्घाटन समारोह


सादात में डेमू उद्घाटन के दौरान भीड़ को सम्बोधित करते श्री मनोज सिन्हा।
सादात में डेमू उद्घाटन के दौरान भीड़ को सम्बोधित करते श्री मनोज सिन्हा।

अपनी रेल सेवा के दौरान मैने कई ट्रेनों के शुभारम्भ के समारोह देखे हैं। बहुतों में बहुत सक्रिय भूमिका रही है। इन्दौर से देश के विभिन्न भागों में जाने वाली लगभग आधा दर्जन ट्रेनों का शुभारम्भ, अलग-अलग रेल मन्त्रियों द्वारा होते देखा है। माधव राव सिंधिया, नीतिश कुमार, ममता बैनर्जी, लालू प्रसाद यादव के समारोहों की यादें हैं। ये तब के अवसर हैं जब मैं रेल मण्डल स्तर का अधिकारी हुआ करता था। उसके बाद जोनल रेलवे के मुख्यालय – पूर्वोत्तर और उत्तर मध्य रेलवे के मुख्यालयों में आने पर (मेरे कार्य की प्रकृति बदलने के कारण) – ट्रेनों के उद्घाटन समारोहों में जाने का सिलसिला लगभग समाप्त हो गया था।

हाल ही में पूर्वोत्तर रेलवे के मुख्य परिचालन प्रबन्धक बनने पर यह उद्घाटन समारोहों में जाने का सिलसिला पुन: कुछ प्रारम्भ हुआ। रेल राज्य मन्त्री श्री मनोज सिन्हा ने मण्डुआडीह (वाराणसी) से दो ट्रेनों को हरी झण्डी दिखाई। उन समारोहों में मैं उपस्थित था।

अब, तीस जून को एक ट्रेन के उद्घाटन समारोह में जाने का अवसर मिला। यह अलग प्रकार की रेलगाड़ी थी और अलग प्रकार के जगह पर उसका उद्घाटन हो रहा था।

मऊ से बरास्ते वाराणसी, इलाहाबाद सिटी को जाने वाली एक डीजल-इलेक्ट्रिक-मल्टीपल-यूनिट (DEMU) सवारी गाड़ी – जो सभी स्टेशनों पर रुकती है – के शुभारम्भ का कार्यक्रम था यह। माननीय  रेल राज्य मन्त्री श्री मनोज सिन्हा उसका उद्घाटन करने जा रहे थे। उद्घाटन किसी प्रमुख नगर – इस मामले में मऊ, इलाहाबाद या वाराणसी – में न हो कर एक छोटे स्टेशन सादात में होने जा रहा था। एक प्रकार से यह सही भी था – छोटे स्टेशनों की जरूरतों को पूरा करने वाली ट्रेन का उद्घाटन भी एक छोटे स्टेशन पर हो।

सादात स्टेशन पर बनारस से सड़क मार्ग से हम घूम-घाम कर पंहुचे। पहले आशापुर-पांड़ेपुर के आस पास ट्रैफिक जाम में फंसे रहे पौना घण्टा। एक बस और एक टैंकर वाले आमने सामने भिड़े हुये थे। कोई अपनी जगह से टस से मस नहीं हो रहा था। अंतत:, समय से थक हार कर दोनो शायद थोड़ा थोड़ा पीछे हटे और हमें निकलने का मौका मिल गया। अन्यथा लगने लगा था कि उद्घाटन कार्यक्रम में चूक जी जायेंगे हम। सड़क आगे अच्छी मिली। सैदपुर के आसपास हम गंगा नदी के पास से गुजरे। वहां का दृष्य देख कर लगा कि लौटानी में कुछ समय गंगा किनारे व्यतीत करना उचित रहेगा। वही बाद में किया भी।

मुख्य सड़क से सादात स्टेशन को पंहुचने का रास्ता टेढ़ा-मेढ़ा था। टेढ़ा-मेढ़ा और कहीं कहीं संकरा भी। लोग हमें कौतूहल से देख भी रहे थे। कहीं कहीं झोंपड़ियां और गुमटियां थीं तो बीच में इक्का-दुक्का पक्के मकान (जिन्हे शहर के स्तर से भी आलीशान कहा जा सकता है) भी थे। मुझे लगने लगा था कि यह पक्का सामंती इलाका है – जहां गरीबी और पिछड़ेपन के बीच सम्पन्नता के द्वीप हैं। मुझे यह भी बताया गया कि इस इलाके में कई कॉलेज हैं और वहां के छात्र बहुत उत्पाती हुआ करते थे। पहले जब यहां लाइन क्लियर लेने के लिये टोकन की व्यवस्था थी तो ट्रेने ज्यादा देर तक रोकने के लिये वे रेलवे स्टाफ से टोकन छीन कर फैंक दिया करते थे। अब भी यहां चेन खींचने की घटनायें आम से अधिक हैं।


अगले दिन मुझे मेरे साले जी – शैलेन्द्र दुबे ने बताया कि यह इलाका समाजवादी पार्टी का गढ़ हुआ करता था। श्री मनोज सिन्हा ने वह इस बार संसदीय चुनाव में जीत हासिल कर वह गढ़ ध्वस्त कर दिया। सादात के इलाके से श्री सिन्हा को व्यापक समर्थन मिला। इस भाग में लगभग क्लीन स्वीप मिली उन्हे।


अंतत: हम समय से रेलवे स्टेशन पंहुच ही गये। डेमू ट्रेन सजी, संवरी अपने इनॉग्युरल रन के लिये प्लेटफार्म पर तैयार खड़ी थी। सादात स्टेशन पर प्लेटफार्म के ऊंचा करने का काम चल रहा है। उसके कारण व्यवधान था। व्यवधान पिछले दिनों हुई बारिश के कारण भी था। पर उसके बावजूद बहुत से स्थानीय उस ट्रेन को देखने के लिये वहां उपस्थित थे। कुछ तो नाच भी रहे थे।

उद्घाटन के लिये सजी डेमू सवारी गाड़ी। सादात स्टेशन पर।
उद्घाटन के लिये सजी डेमू सवारी गाड़ी। सादात स्टेशन पर।

स्टेशन के सामने पण्डाल बना था। पूरे पण्डाल स्थल पर कारपेट बिछा था। बिछाना वैसे भी जरूरी हो गया था – बारिश के कारण अगर कारपेट न होता तो चलना कठिन होता। पण्डाल, शामियाना और मंच की गुणवत्ता सादात जैसे छोटे स्टेशन की तुलना में काफी अच्छी कही जायेगी।

मंत्री महोदय समय पर आये। उन्हे देख कर भीड़ में जो रिस्पॉंस दिखा, वह एक नेता के क्षेत्र में औपचारिक दौरे जैसा नहीं था। लगभग हर व्यक्ति उन्हे ऐसे देख रहा था या उन्हे ऐसे सम्बोधित कर रहा था मानो श्री सिन्हा उसी के खासमखास हों। वे हर व्यक्ति से उसका ज्ञापन स्वयम ले रहे थे। वह जो कह रहा था उसे सुन भी रहे थे और उसके कहे पर आश्वासन और प्रतिक्रिया भी दे रहे थे। … मुझे दशकों पहले माधव राव सिन्धिया जी के कार्यक्रम की याद हो आयी। वहां तीस-चालीस कदम की दूरी रखी जा रही थी भीड़ की उनसे और एक दो व्यक्ति लोगों से ज्ञापन ले कर तह लगाने के बाद एक बोरी में इकठ्ठा कर रहे थे। शायद सिन्धिया जी श्रीमंत थे जिनके लिये लोगों से सम्बन्ध राजा-प्रजा वाले थे; और, उसके उलट सिन्हा जी जमीन से जुड़ी राजनीति कर रहे थे।

समारोह के दौरान जनता से बोलते-बतियाते श्री मनोज सिन्हा।
समारोह के दौरान जनता से बोलते-बतियाते श्री मनोज सिन्हा।

मैं मन्त्री महोदय के पीछे बैठा था और उनका जनता के साथ इण्टरेक्शन बड़ी बारीकी से देख रहा था। अपने ब्यूरोक्रेटिक जीवन में दो दर्जन से अधिक सांसदों और मांत्रियों को बारीकी से देखा है मैने। अपने समधी (गिरिडीह के लोक सभा सदस्य, श्री रवीन्द्र पाण्डेय) के साथ भी समय व्यतीत करने का पर्याप्त अनुभव है। मैने इन अधिकांश नेताओं को अच्छी ग्रास्पिंग पावर का पाया था। उनका जनता और भीड़ को देख ‘हरियरा जाना’ भी मैने ऑब्जर्व किया है। पर जनता का उनको देख कर इस प्रकार प्रसन्न होना – जैसा यहां समारोह में देख रहा था – कम ही (या शायद नहीं ही) देखा है मैने।

इस लिये, समारोह के बाद जब मंत्री महोदय के साथ कुछ क्षण गुजारने का समय मिला; तब मैने यह कहा भी – “बहुत आत्मीय भीड़ थी। बहुत भारी संख्या में और बहुत आत्मीय।”

इस प्रकार के छोटे स्टेशन पर उद्घाटन समारोह का आयोजन करना रेलवे प्रशासन के लिये झंझटिया काम हो सकता है। शायद कुछ लोग कुड़बुड़ा भी रहे हों और इसे सामान्य प्रक्रिया के विपरीत बता रहे हों। पर अगर लोगों का सही रिस्पॉंस ही एक घटक हो समारोह का; तो यह सादात में (छोटे स्टेशन पर) समारोह को मैं सम्भवत: सब से अच्छा समारोह मानूंगा अपने करीयर में।

इस इलाके को डेमू सेवा देना और उसका उद्घाटन सादात जैसे स्टेशन से करना अगर श्री मनोज सिन्हा की स्थानीय टीम के सोच के बल पर हुआ है, तो मानना पड़ेगा कि उनके पास एक कुशल राजनीतिक-प्रबन्धन की टीम है। और अगर यह उनका अपना तय किया था, तो उनके राजनीतिक प्रबन्धन को मास्टर-स्ट्रोक लगाने वाला ही कहा जायेगा।

ग्रामीण जनता का दिल जीतने के लिये डेमू बेहतर है लम्बी दूरी की गाड़ी से। छोटा कदम बेहतर है अंतर महानगरीय छलांगों की अपेक्षा!


कउड़ा


कउड़ा
कउड़ा

आज तीसरा दिन था, घाम नहीं निकला। शुक्रवार को पूरे दिन कोहरा छाया रहा। शीत। शनीचर के दिन कोहरा तो नहीं था, पर हवा चल रही थी और पल पल में दिशा बदल रही थी। स्नान मुल्तवी कर दिया एक दिन और फ़ेसबुक पर लिखा – और भी गम हैं जमाने में नहाने के सिवा।

आज रविवार को पिछले दो दिन से बेहतर था। फिर भी धूप नहीं निकली और घर के अन्दर पिताजी की चारपायी के बगल में सिगड़ी जलती रही। मौसम की अनप्रेडिक्टेबिलिटी देख कर पिताजी पहले ही कह चुके हैं – भगवान पगलाई ग हयेन् (भगवान पगला गये हैं)।

शिवचन्द – हमारा घरेलू भृत्य – पिताजी की चारपाई के बगल में रखी सिगड़ी में कोयला डालने का काम मुस्तैदी से करता है। कितना कोयला बचा है – इसका भी हिसाब उसके पास है। इस सर्दी में करीब बीस सेर लकड़ी का कोयला लग चुका है कमरा गरम रखने में।

पिताजी की चारपाई के बगल में रखी सिगड़ी
पिताजी की चारपाई के बगल में रखी सिगड़ी

आज शिव चन्द ने बताया – पिछवां कउड़ा बारे हई। (पीछे अलाव जलाया है)। बंगले की एक बीघा जमीन में कई पेड़ हैं और कई सूखे हुये भी। आम-अमरूद-सेमल की गिरी डालियां और ठूंठ पीछे आउट हाउस वाले ले जा कर जला रहे हैं सर्दी से बचाव के लिये। वह लकड़ी घर के अन्दर अलाव के रूप में नहीं जलाई जा सकती। उससे धुआं बहुत होता है। पर खुले में अलाव जला कर उसे तापा जा सकता है।

मैने जा कर देखा। हवा और गलन कम होने के कारण घर के पिछवाड़े बाहर बैठा जा सकता था। कुर्सियां निकलवा कर मैं भी वहां बैठा। मेरे बाद मेरी पत्नीजी भी आयीं और उसके बाद पिता जी भी। धुआं हवा के साथ साथ अपनी दिशा बदल रहा था और कुर्सी बार बार खिसकानी पड़ रही थी मुझे। लकड़ियां अच्छी जल रही थीं और उनकी आंज जब बढ़ जाती थी तब अलाब से पीछे भी खींचनी पड़ती थी कुर्सी। लकड़ियों के आग में चटकने की आवाज के अलावा गर्मी से उनके पास हवा भांति भांति की आवाज निकालती थी। कउड़ा की राख छोटे छोटे टुकड़ों में मेरे कपड़ों और हाथ में ली गयी किताब पर गिरती थी।

कउड़ा का अनुभव बचपन का है। गांव में सूखी लकड़ी और पत्तियों का प्रयोग कर जलाया जाने वाला अलाव और उसके इर्दगिर्द जमा लोगों की बत कही। आज कउड़ा था पर बतकही नहीं। मेरे हाथ में किताब थी – जिसमें लेखक ग्वाटेमाला और अल सल्वाड़ोर की रेल यात्रा का विवरण दे रहा था। ग्वाटेमाला का सत्तर के दशक का दृष्य। भूकम्प पीड़ित निहायत उदास, विपन्न, गरीब और अपने आप में अजनबी देश। जिसमें लोग बाहरी से तो क्या, अपने लोगों को भी निहायत शक की नजर से देखते थे। गन्दगी थी और मक्खियां। एक औरत ट्रेन में एक ही कप में पूरे कम्पार्टमेण्ट भर को कॉफी पिला रही थी और लोगों को कोई आपत्ति न थी। मुझे एक बारगी लगा कि लेखक नाहक उस जगह रेलगाड़ी से सफ़र कर रहा था। पर असल में ट्रेवलॉग का मतलब टूरिस्ट की तरह यात्रा कर उसका विवरण लिखना नहीं होता। अगर वह ग्वाटेमाला में इस तरह यात्रा नहीं करता, नहीं लिखता तो मुझे या मुझ जैसे पाठक को भूकम्पों से पीड़ित उस देश की विपन्न दशा का क्या अन्दाज होता।

कउड़ा, रामबचन (बायें) और शिवचन्द
कउड़ा, रामबचन (बायें) और शिवचन्द

मैं सोचने लगा कि मैं भी धीमे चलने वाली पैसेन्जर ट्रेनों में पूर्वान्चल की यात्रा कर जनता की नब्ज देखूं – गोरखपुर से नरकटिया, समस्तीपुर, रक्सौल, मुजफ़्फ़रपुर, सोनपुर, छपरा, सिवान, पडरौना… फिर मुझे लगा कि न मेरे पास पॉल थरू जैसे लेखनी है न उस तरह यात्रा करने की सन्कल्प शक्ति। रेलवे की नौकरी के दौरान बिना लम्बी छुट्टी लिये उसतरह की यात्रा वैसे भी सम्भव नहीं।

लेखक यात्रा करता सान् सल्वाड़ोर पंहुंच कर वहां एक (हिंसक) फुटबाल मैच का विवरण दे रहा था। कउड़ा धीमा हो गया था। राम बचन – मेरे आउट हाउस में रहने वाला जवान जो रेलवे मैकेनिकल वर्कशॉप में काम करता है और रविवार होने के कारण घर पर था – और लकड़ियां ला कर कउडा तेज करने लगा। आग और धुआं बढ़ गये। पुस्तक का भी एक अध्याय पूरा होने को आया। मैं वह अध्याय पूरा कर घर के अन्दर चला आया। संझा के समय जब लेखक आगे निकारागुआ की यात्रा में निकलेगा और यहां घर में अगर शीत न गिरने लगा तो एक बार फिर कउड़ा के पास बैठने की सोचूंगा। अन्यथा कल तो सोमवार है। फिर सप्ताह भर छुट्टी न मिलेगी कउड़ा के पास बैठने को।DSC_0059

 

पण्डित छन्नू लाल मिश्र


उद्घाटन के लिये सजी मण्डुआडीह-जबलपुर एक्स्प्रेस
उद्घाटन के लिये सजी मण्डुआडीह-जबलपुर एक्स्प्रेस

शुक्रवार को आदेश हुआ कि मंडुआडीह (वाराणसी) से नयी चलने वाली 15117/15118 मंडुआडीह-जबलपुर एक्स्प्रेस के उद्घाटन के अवसर पर पूर्वोत्तर रेलवे के चार विभागाध्यक्षों को उपस्थित रहना है। चार थे – निर्माण संगठन के मुख्य प्रशासनिक अधिकारी श्री ओंकार सिंह, प्रमुख-मुख्य अभियन्ता श्री एच के अग्रवाल, मुख्य वाणिज्य प्रबन्धक श्री अशोक लाठे और मैं। कोहरे और सर्दी का मौसम – उसमें बनारस तक चक्कर लगाना मुझे तो नहीं रुचा; और अधिकारियों को भी शायद ही रुचा हो। कोहरे के मौसम में नयी गाड़ी इण्ट्रोड्यूज़ करना मानो मलमास में शादी करना है। पर सरकार ये सब नहीं मानती। दूसरे कोहरा तो सिर्फ तराई पूर्वोत्तर में ही फैला है। विन्ध्याचल के उसपार तो मौसम साफ़ है। सतना के आगे तो यह गाड़ी कोहरे को चीर कर आगे बढ़ जायेगी।

रेल की नौकरी में वर्षा और कोहरे का समय मेरे लिये भयंकर दुस्वप्न रहा है। नजरिया बदलेगा – जब रेल यातायात की जिम्मेदारियों का सलीब कांधे से हट जायेगा। हटने में ज्यादा समय नहीं है!

खैर, हम, श्री लाठे, मैं और हमारे साथ दो अन्य अधिकारी चौरीचौरा एक्स्प्रेस से रवाना हुये गोरखपुर से। रात साढ़े दस बजे चलती है ट्रेन गोरखपुर से। उस दिन उसकी जोड़ी की ट्रेन लेट आई थी, तो कुछ लेट ही रवाना हुई। रास्ते में कोहरे में लेट होती गयी। लगभग तीन घण्टे लेट पंहुची शनिवार की सुबह वाराणसी। समारोह साढ़े इग्यारह बजे नियत था, इसलिये कोई हबड़ धबड़ नहीं थी। मेरे साथ चल रहे श्री लाठे कैरिज में सूर्यनमस्कार और अनेक प्रकार के बाबारामदेवियाटिक प्राणायाम कर रहे थे – इत्मीनान से। बाद में उन्होने इन आसन-प्राणायाम के लाभ भी बताये मुझे।

ट्रेन उद्घाटन के लिये सजाया मंच।
ट्रेन उद्घाटन के लिये सजाया मंच।

इत्मीनान से हम लोग तैयार हुये और लगभग 11 बजे पंहुच गये मंडुआडीह स्टेशन। स्टेशन के इलाहाबाद छोर पर मंच बना था। ट्रेन फूलों के बन्दनवार से सजी प्लेटफार्म पर लगी हुई थी। चार्ट डिब्बों पर पेस्ट थे और सरसरी निगाह डालने पर लगता था कि आधे से ज्यादा सीटें भरी हुई थीं अडवान्स रिजर्वेशन से। कुछ लोग इसे साप्ताहिक की बजाय रोजाना की गाड़ी बनाने की बात कहते दिखे प्लेटफार्म पर। पूर्वांचल बहुत बड़ा डिमाण्डक है सवारी रेल गाड़ियों का। यद्यपि कुछ समय से टिकट बिक्री में अपेक्षाकृत वृद्धि नहीं हो रही; पर उससे न तो जनता की नयी गाड़ियों की मांग करने में कमी आ रही है न नेताओं द्वारा उस प्रवृत्ति को हवा देने में। यात्रियों की संख्या के आधार पर कई गाड़ियां खत्म कर देनी चाहियें और कई रूट जहां वैकल्पिक व्यवस्था के रूप में बेहतर सड़क मार्ग के विकल्प है‍, सेवाओं को तर्कसंगत बनाया जाना चाहिये। जीरो-बेस टाइम-टेबलिंग। पर उसके लिये चाहिये दृढ़ संकल्प। आने वाले समय में वह हो – शायद न भी हो।


पण्डित छन्नू लाल मिश्र, अकेले मंच पर।
पण्डित छन्नू लाल मिश्र, अकेले मंच पर।

समारोह स्थल पर सबसे पहले आये मुख्य अतिथि – पद्मभूषण पण्डित छन्नू लाल मिश्र। पण्डित जी वाराणसी सीट से नामांकन भरते समय श्री नरेन्द्र मोदी के प्रस्तावकों में से एक थे। निश्चय ही उनकी उपस्थिति से श्री मोदी के नामान्कन को गरिमा मिली होगी। आज नयी ट्रेन को भी वही गर्व मिलने जा रहा था। सबसे पहले आये तो उन्हे मंच पर बिठा दिया गया – आदर के साथ। लेकिन मंच पर वे अकेले थे और एक ऐसी विभूति को अकेले बैठे देख अजीब सा लगा। कोई छोटा नेता या अफसर भी यूं अकेले बैठा नहीं दीखता सार्वजनिक स्थल पर। कुछ ही देर बाद वाराणसी के महापौर रामगोपाल मौर्य भी आये और मंच पर एक से दो हुये। उसके बाद हम विभागाध्यक्षों को भी मंच पर बैठने का आदेश पूर्ण आग्रह हुआ। मैं पण्डित छन्नू लाल मिश्र जी के पीछे बैठा।

पण्डित छन्नू लाल मिश्र के पीछे बैठा था मैं। वहीं से आगे बैठे उनका चित्र।
पण्डित छन्नू लाल मिश्र के पीछे बैठा था मैं। वहीं से आगे बैठे उनका चित्र।

मंत्री महोदय की इंडिगो की फ्लाइट दिल्ली से देर से रवाना हुयी और उनके समारोह स्थल पर आने में देरी हुई। और समारोह नियत समय से एक घण्टा बाद प्रारम्भ हो पाया।

मंच पर बोलते पण्डित मिश्र।
मंच पर बोलते पण्डित मिश्र।

समारोह बहुत सधी चाल से चला। पण्डित छन्नू लाल मिश्र ने अपने सम्बोधन में रेल विषयक कविता का पाठ किया – कविता जैसी भी थी, पण्डित जी की आवाज तो मन को अन्दर से झंकृत कर देने वाली थी। लगभग उसी समय मेरे मित्र श्री गिरीश सिंह ने ह्वाट्सएप्प पर सन्देश दिया – भईया, हो सके तो पण्डित मिश्र से मिलकर उन्हे हमारा प्रणाम बोलियेगा। गिरीश से पूछना रह गया कि क्या वे उनसे व्यक्तिगत परिचय रखते हैं, पर मैने यह सोच लिया कि समारोह के बाद पण्डित जी से मिलूंगा जरूर।

ट्रेन के प्रस्थान पर शंखनाद करते ये सज्जन।
ट्रेन के प्रस्थान पर शंखनाद करते ये सज्जन।

ट्रेन को पण्डित मिश्र जी ने झण्डी दिखाई। अन्य उपस्थित होगों ने भी दिखाई। इस काम के लिये कई हरी झण्डियाँ उपलब्ध थीं। ट्रेन रवाना होते समय इंजन की हॉर्न की आवाज थी और मंच से एक गेरुआ वस्त्र धारी सज्जन शंखनाद कर रहे थे – क्या बुलन्द आवाज थी शंख की और कितनी देर अनवरत वे बजाते रहे सज्जन। बहुत मजबूत फेफड़े के आदमी होंगे वे। समारोह के बाद वे दिखे नहीं, अन्यथा उनसे उनके बारे में जानने का यत्न करता। वैसे, शंख बजवैय्या काशी में न होंगे तो कहां होंगे!

भाषण देते रेल राज्य मंत्री श्री मनोज सिन्हा।
भाषण देते रेल राज्य मंत्री श्री मनोज सिन्हा।

समारोह के समय गेट पर रोके गये कुछ डीजल कारखाना के कर्मचारी रेलवे के प्राइवेटाइजेशन की आशंका के कारण विरोध में नारे लगा रहे थे। मंत्री महोदय ने अपने भाषण में यह स्पष्ट किया कि रेल के निजीकरण की कोई योजना नहीं है। पर रेलवे को बहुत व्यापक निवेश की आवश्यकता है। यातायात की जरूरतें सात गुना बढ़ी हैं और रेल नेटवर्क दो गुना ही हुआ है। इस लिये, जो विरोध कर रहे हैं, उन्हे कड़ाई से निपटा जायेगा। मंत्री जी ने समारोह के बाद पत्रकारों-प्रतिनिधियों के प्रश्नों के उत्तर भी दिये।


समारोह के बाद मंच से उतर कर मैने पण्डित छन्नू लाल मिश्र जी को चरण छू कर प्रणाम किया और यह कहा भी कि मेरे मित्रवर ने मुझे इसके लिये आदेश दिया है। पण्डित जी मुझसे प्रसन्न लगे। उन्होने आशीर्वाद के लिये अपने जेब से इत्र की एक शीशी निकाल कर मेरे दांये हाथ पर इत्र मला। यह भी कहा कि काफी समय तक – दिन भर से ज्यादा उसकी सुगन्ध रहेगी। उन्होने महामृत्युंजय मंत्र का भी उच्चार किया मुझे आशीर्वाद देते हुये। मुझे इत्र लगाते देख कई और लोगों ने अपने हाथ बढ़ा दिये इत्र लगवाने को। बहुत ही सरल हृदय थे पण्डित जी। उन्होने किसी को भी निराश नहीं किया।

पण्डित छन्नू लाल मिश्र और मैं। उनके बांये हाथ में इत्र की शीशी भी जै जिससे उन्होने इत्र मेरे हाथ पर लगाया।
पण्डित छन्नू लाल मिश्र और मैं। उनके बांये हाथ में इत्र की शीशी भी जै जिससे उन्होने इत्र मेरे हाथ पर लगाया।

मेरे सहकर्मी श्री प्रवीण पाण्डेय ने पण्डित मिश्र के साथ मेरा चित्र भी लिया उस अवसर का। अपने आई-फोन से तुरंत ई-मेल भी कर दिया मुझे।

एक विभूति को प्रणाम करने और आशीर्वाद पाने के वे क्षण मेरे लिये सदैव स्मृति में रहेंगे। पता नहीं, आगे कभी पण्डित जी से मुलाकात होगी या नहीं – मैं न तो गायन विधा में दखल रखता हूं और न मुझे गीत-संगीत की समझ है। पर सरल, महान लोगों की महानता मुझे झंकृत करती है। उसी का परिणाम था कि मैं पण्डित जी से मिल पाया। वही भावना भविष्य में उनसे या उन जैसे लोगों से मिलवायेगी।


मुझे याद आता है आज से लगभग दो दशक पहले का समय। मैं रतलाम में अधिकारी था और उज्जैन से इलाहाबाद की यात्रा कर रहा था अपने घर आने के लिये। फर्स्ट क्लास के 4-बर्थर खण्ड में मैं और मेरा परिवार था और पास के कूपे में कवि श्री शिवम्ंगल सिंह ‘सुमन’ चल रहे थे। उनका भी श्रद्धावश जा कर मैने चरण स्पर्श किया था और मेरे बच्चों ने भी उनके पैर छुये थे। उन्होने भी हम से प्रसन्न हो कर मेरी बिटिया की कॉपी में कविता की दो पंक्तियां लिख कर दी थीं! … वे भी बहुत सरल हृदय व्यक्ति थे।

यूं ही, अचानक जीवन में मिल जाती हैं पण्डित छन्नू लाल मिश्र और श्री शिवमंगल सिंह ‘सुमन’ जी जैसी विभूतियां और जीवन धन्य हो जाता है।

मैने गिरीश सिंह को फोन कर घटना के बारे में बताया। गिरीश ने बाद में ह्वाट्सएप्प में सन्देश दिया – जय हो! आनन्द आ गया आज तो। ज्ञान भैया ने कमाल कर दिया!

कमाल तो गिरीश के आग्रह ने किया था। अन्यथा मैं शायद पण्डित मिश्र जी से मिलने का विचार भी न करता।

कृष्ण कुमार अटल


पूर्वोत्तर रेलवे की अपनी अंतिम विभागीय बैठक को चेयर करते श्री कृष्ण कुमार अटल।
पूर्वोत्तर रेलवे की अपनी अंतिम विभागीय बैठक को चेयर करते श्री कृष्ण कुमार अटल।

उनतीस अगस्त। शाम चार बजे। श्री कृष्ण कुमार अटल, महाप्रबन्धक, पूर्वोत्तर रेलवे की रिटायरमेण्ट के पहले अपने विभागाध्यक्षों के साथ अंतिम बैठक। एक प्रकार से वाइण्डिंग-अप।

मैं उस बैठक में विभागाध्यक्ष होने के नाते उपस्थित था। चूंकि उस बैठक में हमें श्री अटल से जाते जाते उनकी 37 वर्ष की रेल सेवा पर उनके विचार और रेलवे के भविष्य पर उनकी सोच सुननी थी; मैं अस्वस्थता के बावजूद दफ्तर गया और सुनिश्चित समय पर बैठक में मौजूद रहा।

श्री अटल के विभिन्न विषयों पर विचार यूं रहे (यह मेरे सुने के अनुसार है। अस्वस्थ होने के कारण मैं पूरी तन्मयता से नहीं सुन/नोट कर पाया, अत: ब्लॉगिंग में जो चूक हो, वह मेरी है) –

पूर्वोत्तर रेलवे पर:

कंजरवेटिव रेलवे (यथा पश्चिम रेलवे) की बजाय यहां किसी नये विचार को लागू कराना कहीं आसान रहा। बढ़ोतरी के लिये रेलवे में नयेपन के प्रति एक्सेप्टेबिलिटी होना बहुत जरूरी है और उस आधार पर पूर्वोत्तर रेलवे में बहुत सम्भावनायें हैं।

काम करने के तरीके पर: 

अपने से दो स्टेप आगे के पद पर बैठे लोगों को कभी खौफ से नहीं देखा। उनके कहे को काफी तर्क संगत तरीके से विश्लेषित किया और उनसे सहमत न होने पर अपने विचार पूरी शिद्दत से सामने रखे। अपने आप को रेलवे सम्बन्धी ज्ञान से जितना अपडेट हो सकता था, करने की हमेशा कोशिश की। “ज्ञान का कोई विकल्प है ही नहीं”। लोग सरकार में और रेलवे में भी अपने कम्फर्ट जोन में जीने के आदी हो जाते हैं। किसी ने कहा है कि जो सरकारी नौकरी में तीन साल काम कर ले, वह बेकार हो जाता है। मैं कहूंगा कि रेलवे में जो दस साल काम कर ले, वह बेकार हो जाता है। उसका अपवाद बनने के लिये अपने ज्ञान को सतत परिमार्जित करते रहना चाहिये।

लेडी मेकबेथ को याद किया – प्रबन्धन खून का दरिया है। आगे जाना भी कठिन है और पीछे लौटना भी! 🙂

रेलवे के विभागीय बंटवारे पर: 

जूनियर एडमिनिस्ट्रेटिव ग्रेड तक विभागीय प्रबन्धन बहुत जरूरी है। अंतर-विभागीय प्रतिस्पर्धा के बहुत लाभ हैं। पर रेलवे बोर्ड के स्तर पर यह कहा जा सकता है कि रेल तभी प्रगति कर सकती है जब चेयरमैन रेलवे बोर्ड एक बिनोवेलेण्ट डिक्टेटर हो – विभिन्न विभागों के सदस्यों की खींचातानी के परे। रेलवे की समस्या विभागीय आधार पर कम्पार्टमेण्टलाइजेशन है।

अधिकारी जब जनरल मैनेजमेण्ट की पोस्ट पर आयें तो उन्हे अपने विभागीय आधार को पूरी तरह दरकिनार कर देना चाहिये। अधिकारियों को अपनी पोस्ट में आत्म-विकास करना चाहिये और पोस्ट की जिम्मेदारियों के अतिरिक्त आउट-ग्रो करना चाहिये। अन्य सभी विभागों की जरूरतों को समझते हुये।

रेलवे बोर्ड पर:

रेलवे बोर्ड बहुत बड़ा संस्थान बन गया है। वहां बहुत से लोगों के पास बहुत कम काम है और बहुत कम हैं जो काम के बोझ से बहुत लदे हैं। जो बोर्ड में एक बार पोस्टिंग ले लेता है वो येन-केन-प्रकरेण वहीं बने रहना चाहता है। अत: बहुत से अच्छे अधिकारी वहां बरबाद हो रहे हैं और रेलवे को उनकी तकनीकी और प्रबन्धन क्षमता का पूरा लाभ नहीं मिल रहा।

अपने सबसे चलेंजिंग असाइनमेंण्ट पर: 

सबसे चैलेंजिंग असाइनमेण्ट रहा ईडी.एमई. (ट्रेक्शन) का।


श्री अटल ने बहुत बेबाकी से बहुत कहा। उनसे यह भी अनुरोध किया गया कि अपने अनुभवों के आधार पर वे पुस्तक लिखें। पर उन्होने कहा कि वे ऐसा नहीं करेंगे। उन्होने पूरी निष्ठा से रेलवे की सेवा की है। रेलवे का नमक खाया है। उसकी कमजोरियों और व्यक्तियों की विवादास्पद निजता को जग जाहिर कर उस नमक के साथ विश्वासघात नहीं करेंगे। (यद्यपि मेरा सोचना है कि इसमें विश्वासघात जैसा कुछ भी नहीं। वे बहुत बढ़िया कह रहे थे और उनले लिखे मेमॉयर्स बहुमूल्य होंगे। अगर उनमें एक साथ पुस्तक लिखने का धैर्य/पेशेंस न हो तो उन्हे ब्लॉग बना कर वह लिखना चाहिये।)

यातायात विभाग द्वारा दिये जा रहे फेयरवेल में श्री अटल।
यातायात विभाग द्वारा दिये जा रहे फेयरवेल में श्री अटल।

लगभग एक-सवा घण्टे की बैठक के बाद हम लोग सभा कक्ष के बाहर निकले। महाप्रबन्धक कार्यालय के पोर्टिको में श्री अटल की कार पर फूल सजाये जा रहे थे। भाव भीनी विदाई!

श्री अटल के साथ मैने तीन दशक पहले रतलाम में कार्य किया था। वे वहां सीनियर डिविजनल मैकेनिकल इंजीनियर थे और मैं डिविजनल ऑपरेशंस सुपरिण्टेण्डेण्ट। अब इस समय वे पूर्वोत्तर रेलवे के महाप्रबन्धक हैं और मैं मुख्य ऑपरेशंस मैनेजर।

श्री अटल एक कुशल गोल्फर भी हैं। गोरखपुर रेलवे गोल्फ क्लब ने आज उनके सम्मान में गोल्फिंग-आउट मैच और समारोह रखा।
श्री अटल एक कुशल गोल्फर भी हैं। गोरखपुर रेलवे गोल्फ क्लब ने आज उनके सम्मान में गोल्फिंग-आउट मैच और समारोह रखा।

विगत कल उनका दफ्तर में अंतिम कार्य दिवस था। आगामी कल शाम वे गोरखपुर से विदा लेंगे अपना कार्यकाल और रेल सेवा के सैंतीस वर्ष सकुशल पूरा कर।

शुभकामनायें!