अविनाश सिरपुरकर : एक दण्ड-अधिवक्ता के पीछे का व्यक्तित्व


श्री अविनाश सिरपुरकर (उनके फेसबुक प्रोफाइल का चित्र)
श्री अविनाश सिरपुरकर (उनके फेसबुक प्रोफाइल का चित्र)

समाचारों में मैं क्रिमिनल लॉयर्स के बारे में बहुत पढ़ता-सुनता रहा हूं। पर पहले किसी क्रिमिनल लॉयर से सम्पर्क नहीं हुआ था। अत: एक कौतूहल तो था मन में कि ये व्यक्ति अपराध, छद्म, और मामलों को सदा एक्यूट एंगल से देखते देखते अपने सामान्य व्यक्तित्व, आदर्श और नैतिकता को किस स्तर का बनाये रखते हैं। यह इच्छा मन में थी कि अगर ऐसे किसी व्यक्ति से कभी मिला तो इस बारे में पूछूंगा जरूर।

मुझे अवसर मिल गया जब मैं उस दिन अपने काम से श्री अविनाश सिरपुरकर से उनके इन्दौर के दफ्तर में मिला। उनसे इस विषय में टेनटेटिव प्रश्न किया। पर अविनाश जी ने सम्भवत: इसे मूल विषय से इतर मान कर यही समझा कि मैं उनसे नेटवर्किंग बनाने के लिये इस प्रकार का प्रश्न कर रहा हूं। वह बात वहीं रह गयी।

अविनाश जी से अगले दिन पुन: मुलाकात हुई। रतलाम में। तब उन्होने स्वयम अपने विषय में (लगभग) विस्तार से बताया।

अविनाश मध्य प्रदेश हाई-कोर्ट के वरिष्ठ दण्ड-अधिवक्ता (क्रिमिनल लॉयर) हैं। वरिष्ठ और व्यस्त। “मेरी सात पीढ़ियां अधिवक्ताओं/कोर्ट-कचहरी वालों की हैं।” उनकी मानी जाये तो कानून-कोर्ट-कचहरी-अदालत केन्द्रित है उनका जीवन। “उसके अलावा कुछ नहीं”

मैं असहमति जताता हूं। एक व्यक्ति जो सफलता के सोपान तय कर के (लगभग) शीर्ष पर पंहुचता है, एकांगी नहीं हो सकता। किसी न किसी अन्य प्रकार से समाज के प्रति अपना दायित्व समझता होगा – अगर वह मात्र आत्मकेन्द्रित/स्वार्थपरायणी न हो। और एक इण्ट्रोवर्ट व्यक्ति के भी उत्कृष्टता के एक से अधिक पहलू होते हैं।

स्टीफन आर कोवी की पुस्तक – द एड्थ हैबिट ( THE 8TH HABIT: FROM EFFECTIVENESS TO GREATNESS) पढ़ते समय मुझे यह गहरे से महसूस हुआ था कि सफल व्यक्ति केवल सफलता पर ही ठहरता नहीं है। उसमें समाज और जीवन को प्रतिदान (contribution) करने,  मूल्य (values) देने, और लीगेसी स्थापित करने की अंतर्निहित इच्छा होती है। यह मानव का मूल स्वभाव है।

अविनाश जी का फेसबुक कवर
अविनाश जी का फेसबुक कवर

इस बारे में अविनाश जी काफी झिझकते हुये खुले। मुझ जैसे लगभग अपरिचित से खुलने में होने वाली झिझक स्वाभाविक है। शुरुआत उन्होने अपने घर के पास एक मन्दिर बनाने की बात से की। मैं धार्मिकता का पहलू समझ सकता हूं। उनके फेसबुक प्रोफाइल के कवर पर गजानन महाराज का चित्र है। उन्होने बातचीत में शेगांव (वह स्थान जहां गजानन महाराज प्रकट हुये) की चर्चा भी की।

इसके बाद उन्होने जिस बात की चर्चा की, वह प्रसन्न कर देने वाली थी। अपने किसी मित्र ‘व्यास जी’ के कहे अनुसार वे सन 2003 से प्रतिवर्ष इंजीनियरिंग/डाक्टरी के कुछ विद्यार्थियों की शिक्षा का खर्च वहन करते हैं। उसमें विद्यार्थी के साथ तय यही होता है कि पढ़ाई के बाद समर्थवान हो कर वह भी इसी प्रकार दूसरों की पढ़ाई में सहयोग करेगा।

“क्या वे बाद में ऐसा करते हैं?”

“जी हां।”

मुझे अच्छा लगा यह जानकर कि इस तरह अविनाश जी विद्यादान की चेन कायम कर रहे हैं।

आगे स्वत: बताया उन्होने – “वकालत में सफलता के कारण मुझे पैसे की समस्या नहीं है। मेरा विचार है कि पचपन की अवस्था तक वकालत करूंगा। उसके बाद आदिवासियों के बीच काम करने का मन है।”

“अच्छा! क्या तय कर लिया है कि कहां और किस प्रकार कार्य करेंगे?”

अविनाश जी ने झाबुआ क्षेत्र की बात की। रतलाम रेल मण्डल में लम्बे अर्से तक कर्य करते हुये मुझे झाबुआ के आदिवासियों की विपन्नता के बारे में अनुभूति है। अनेक आदिवासी लोगों के चेहरे मेरी स्मृति में हैं। वनवासी कल्याण की जरूरतों के बारे में बहुत लोगों से सुना है। अत: यह जान कर बहुत अच्छा लगा।

मैने अविनाश जी से अपनी भी कही – आने वाले समय में गांव और गंगा नदी के सामीप्य में रहने की बात। उन्होने कहा – अच्छा है। आपके पास गंगा हैं और मेरे समीप हैं नर्मदा!

बातचीत के प्रारम्भ में मैं एक क्रिमिनल लॉयर के समक्ष था। एक ऐसा व्यक्ति जो सामने वाले को अपने तर्क, सूचना और वाकपटुता से हतप्रभ और निष्प्रभावी करने में दक्ष होता है। जिस क्रिमिनल लॉयर का यह ‘आवरण’ जितना कठोर और इम्प्रेगनेबल होता है, वह (मेरे अनुमान से) अपने पेशे में उतना कुशल होता है। पर बातचीत समाप्त कर हाथ मिलाते हुये मैं उस आवरण के पीछे के एक संवेदनशील और समाज के प्रति जिम्मेदार व्यक्ति से परिचय पा चुका था। एक सज्जन और एक उत्कृष्ट व्यक्ति से परिचय पाना किसे अच्छा नहीं लगता?

मैं वास्तव में प्रसन्न था। भविष्य में अगर अविनाश जी से सम्पर्क बना रहा तो उनके झाबुआ अदिवासियों के कल्याण कार्यों के बारे में जानने की इच्छा रहेगी!


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होशंगाबाद – भोपाल से नर्मदामाई की ओर दौड़


मैं रेलवे के मुख्य परिचालन प्रबन्धकों के सम्मेलन में भाग लेने के लिये 7-8 मई’2014 को भोपाल में था। होटल लेक व्यू अशोक में थी यह कॉंफ्रेंस। वहीं रहने का भी इंतजाम था और बैठक का भी। सात तारीख को तो लम्बी चली बैठक। आठ को वह दोपहर तीन बजे समाप्त हो गयी और शाम का समय अधिकारियों को भोपाल देखने के लिये मिल गया।

होशंगाबाद में नर्मदा घाट
होशंगाबाद में नर्मदा घाट
घाट पर मेरे सहकर्मी - बांये से - मिश्र, संजीव गुप्ता और मनीश।
घाट पर मेरे सहकर्मी – बांये से – मिश्र, संजीव गुप्ता और मनीश।

पश्चिम मध्य रेलवे के मेरे काउण्टर पार्ट श्री अनुराग ने गुना के ट्रैफिक इंस्पेक्टर श्री संजीव गुप्त को साथ लगाया था, लॉजिस्टिक्स की मेरी आवश्यकताओं पर ध्यान देने के लिये। और उन्होने एक अच्छे कम्पेनियन का रोल अदा किया। गुप्ता कानपुर के रहने वाले हैं; पर लम्बे अर्से से रेल सेवा में भोपाल रहे हैं। आजकल गुना में पदस्थ हैं। उन्होने बड़े मौके की जगह – मुख्य सड़क पर बरकतउल्लाह विश्वविद्यालाय के समीप घर बनाया है – दो बेड रूम का। उनकी की एक बिटिया पुणे में है और बेटा दसवीं का छात्र है यहीं भोपाल में हबीबगंज में घर पर रहता है। सेण्ट्रल स्कूल में पढ़ता है। संजीव गुना से यहां आते जाते हैं और जुगाड़ में हैं कि भोपाल में, किसी भी पद पर ट्रांसफर हो जाये। “गलती कर दी सर! यहीँ भोपाल में पोस्टेड था। फिर विजिलेंस में डेप्यूटेशन पर चला गया। वापस आने पर गुना में ही जगह मिली…”

संजीव मुझे पसन्द आये। असर्टिव, विनम्र, कहे को कार्यरूप देने में तत्पर और अपने इनीशियेटिव को बरकरार रखे हुये। रेलवे में कम ही हैं ऐसे लोग। और बहुत इज्जत है इन तरह के लोगों की।

संजीव से मैने पूछा कि यहां से नर्मदा तट कैसे चला जा सकता है? उन्होने सुझाव दिया कि होशंगाबाद में नर्मदा का घाट अच्छा है। भोपाल से डेढ़ घण्टे का रास्ता होना चाहिये सड़क मार्ग से। और मैने शाम चार बजे होटल से चेक-आउट कर सीधे होशंगाबाद जाने की सोची। डेढ़ घण्टा जाने, डेढ़ आने और आधा घण्टा होशंगाबाद के नर्मदाघाट पर पर व्यतीत करने का मन बनाया। इस हिसाब से शाम साढ़े सात-आठ तक वापस भोपाल/हबीबगंज आ जाना बनता था। वापसी में गोरखपुर जाने के लिये राप्तीसागर एक्सप्रेस देर रात में थी। सो दौड़ लगा आने की चिंता नहीं थी।

होशंगाबाद से भोपाल में नर्मदा का जल जाती पाइपलाइन।
होशंगाबाद से भोपाल में नर्मदा का जल जाती पाइपलाइन।

हम लोग समय से रवाना हुये। संजीव, मेरे साथ आये मेरे दो सहकर्मी – रेलवे ट्रेनों की समय सारिणी बनाने वाले श्री ए.के. मिश्र और योजनाओं की मॉनीटरिंग करने वाले श्री मनीश, और मैं। भोपाल की सड़कें चौड़ी और साफ सुथरी थीं। उत्तरप्रदेश के शहर झेंप जायें उन सड़कों को देख कर। रास्ते में चौराहों पर मूर्तियां अन्य शहरों की तरह थीं – छत्रपति शिवाजी और महाराणाप्रताप मध्यप्रदेश के इलाकाई न होते हुये भी प्रॉमिनेण्टली लगे थे। भारत में इन दो देशभक्ति के प्रतीकों को सर्वव्यापक मान्यता मिल गयी है। वही अन्य देशभक्तों – मसलन मंगलपाण्डे या बिरसामुण्डा के साथ नहीं है। सामंती भावनायें; राजे रजवाड़ों के प्रति अतिरिक्त आकर्षण इसमें रोल प्ले करता है। अन्यथा इतिहास में शिवा-प्रताप के टक्कर के अनेक गौरवशाली चरित्र मिल जायेंगे…

होशंगाबाद जाते रास्ते मेँ मुझे जब भी कोई पुलिया या ओवरब्रिज पार करना होता था, दायीं ओर मोटी पाइपलाइन दिखती थी। संजीव ने बताया कि इसके माध्यम से नर्मदा का जल होशंगाबाद से आ रहा है भोपाल – राजधानी की पानी की जरूरतें पूरा करने को। भोपाल में पहले बड़ा ताल से जल मिलता था। लगभग छ महीना हुआ इस पाइप लाइन को कमीशण्ड हुये। … मुझे याद आया कि कहीं पढ़ा था देवास में नर्मदा का जल पंहुचने के बारे में। जल-प्रबन्धन बहुत महत्वपूर्ण है प्रगति/विकास में। उत्तरप्रदेश तो अपनी चिरकुटई/रंगदारी प्रबन्धन से नहीं उबर पा रहा है। लोग अबकी कह रहे हैं कि अच्छे दिन आने वाले हैं। देखते हैं, क्या होता है।

होशंगाबाद के नाम से मुझे विज्ञान शिक्षण के होशंगाबाद प्रयोग की याद हो आयी। मैने उसका जिक्र किया पर अन्य कोई भी व्यक्ति इस प्रयोग से परिचित नहीं था। संजीव गुप्ता ने बड़े टेनटेटिव अन्दाज में तुक्का लगाया – वहां एक सेण्ट्रल स्कूल है… मुझे लगता है होशंगाबाद की जनता भी एकलव्य प्रयोग से अपरिचित होगी आज के समय मेँ!

होशंगाबाद का सड़क पुल। नीचे करार में होता बालू खनन
होशंगाबाद का सड़क पुल। नीचे करार में होता बालू खनन

साढ़े पांच बजे – जब हमें होशंगाबाद नियराना था; बाईस किलोमीटर दूर थे वहां से। निश्चय ही दूरी और समय के आकलन में गलती हुई थी। उसके बाद समय अनुपात से और अधिक लगा। सीहोर जिले की तहसील बुधनी से गुजरते हुये सड़क बहुत खराब थी। धूल से पाला पड़ा। जगह जगह जेसीबी मशीनें काम कर रही थीं सड़क बनाने के लिये और उनके कारण भी व्यवधान हुआ। जन हमने होशंगाबाद के पास रेलवे फाटक और उसके बाद नर्मदा पर सड़क पुल पार किया तो शाम के सवा छ बज रहे थे। साढ़े छ बजे हम घाट पर पंहुच गये अन्यथा धुन्धलके में घाट के चित्र न ले पाते।

नर्मदा के सड़क पुल से गुजरते देखा – पहले किनारे पर करार पड़ा। इस ओर मन्दिर और इमारतें थीं। दूसरी ओर कछार था। बालू का खनन करते ढेरों ट्रक-ट्रेलर दिखे। गंगा जी की तरह यहां लोगों ने सब्जियां नहीं उगा रखी थीं। शायद खनन (माफिया) का वर्चस्व था यहां। खेती करने वाले कर ही न सकते थे। कछार में जल के समीप एक चिता भी जलते दिखी। वैसा ही दृष्य जैसा मुझे फाफामऊ की ओर गंगा किनारे दिखता था इलाहाबाद में।

होशंगाबाद घाट पर नर्मदा।
होशंगाबाद घाट पर नर्मदा।

नर्मदा का होशंगाबाद में घाट दर्शनीय था और अपेक्षाकृत साफ-सुथरा भी। नदी में प्रवाहित करने के लिये दीप-फूल के दोने और प्रसाद सामग्री की दुकानें थीं। अधिकांशत: मेक-शिफ्ट दुकानें। ऐसे एक दुकान का चित्र मैने लिया। दुकानदारिन एक सुन्दर नवयुवती थी। चित्र लेने के बाद अहसास हुआ कि वह युवती या आसपास के लोग टोक सकते थे। युवती ने कौतूहल भरी दृष्टि डाली अवश्य पर कहा कुछ नहीं। नहीं कहा तो चित्र मेरे कैमरे में हो गया।

दुकान वाली नवयुवती
दुकान वाली नवयुवती
आरती या दीक्षा (?)
आरती या दीक्षा (?)

इसी तरह की एक अन्य दुकान में एक छोटी लड़की बैठी थी। उसने कहा – काहे ले रहे हैं चित्र, अखबार में तो नहीं देंगे न? मैने उसका नाम पूछा। उसने पुन: कहा – अखबार में मत दे दीजियेगा। फिर बड़ी मुश्किल से नाम बताया – आरती। वह फोटो खिंचाने को लजाते हुये आतुर भी रही और कहती भी जा रही कि अखबार में न दीजियेगा। जब कुछ और सहज हुई तो बोली – मेरा नाम आरती नहीं, दीक्षा है। आरती तो मैने वैसे ही बता दिया!

पता नहीं, उसका नाम क्या था। आरती या दीक्षा। पर उसका डिसीविंग का अन्दाज पसन्द आया मुझे। वैसे भी नाम में क्या रखा है। और यह कह कर कि अखबार में नहीं दूंगा; या अखबार वाला नहीं हूं मैं; मैने अश्वत्थामा हत: (नरो वा कुंजरो वा) वाला सत्य ही बोला था।

मैने भी वैसा ही छद्म किया जैसा आरती/दीक्षा ने! 😆

फिरकीवाला
फिरकीवाला

घाट पर एक फिरकी बेचने वाला था। जमीन पर डेरा जमाये क्वासी-साधू नुमा तीन-चार लोग बतकही कर रहे थे। मन्दिर के पुजारी मेरे कैमरे को देखे जा रहे थे। घाट पर लोग नहा रहे थे। एक तरफ सीढ़ियों को छूते नर्मदा जल में फूल-माला-पूजा सामग्री तैरते दिखे। नर्मदा की भी ऐसी-तैसियत करने वाले लोग हैं। गंगा की तरह। बस थोड़े कम हैं। नर्मदा और गंगा – दोनो की साड़ी पुरानी और मैली हो गयी है।

जय नर्मदा माई!
जय नर्मदा माई!

बस; नर्मदा की साड़ी अभी जर्जर नहीं हुई। उसके छींट के रंग कुछ बदरंग हुये हैं पर अभी भी पहचाने जा सकते हैं। गंगाजी की धोती पुरानी और जर्जर हो गयी है। उसमें लगे पैबन्द भी फट गये हैं। गंगामाई बमुश्किल अपनी इज्जत ढ़ंक-तोप कर चल पा रही हैं। मंथर गति से। आंसू बहाती। अपनी गरिमा अपनी जर्जर पोटली में लिये।

और निर्लज्ज भक्त नारा लगाते हैं – जै गंगा माई। 😦

घाट पर डेरा जमाये भगत!
घाट पर डेरा जमाये भगत!

मैने झुक कर नर्मदामाई का जल अंजुरी में लिया और सिर पर छिड़का। समय और तैयारी होती तो जल ऐसा था कि मैं स्नान भी कर सकता था वहां। माई को नमन कर वहां से वापस चला। शाम के सात बजने वाले थे। रेलवे स्टेशन से सूचना मिल गयी थी कि बिलासपुर से आने वाली गोंडवाना एक्स्प्रेस इटारसी निकल चुकी है। ट्रेन से हबीबगंज/भोपाल घण्टे भर में पंहुचा जा सकता था। सड़क से इसका दुगना समय लगता। हम रेलवे स्टेशन की ओर बढ़ लिये।

नर्मदा माई के दर्शन की साध पूरी हुई।??????????