तीन बनी


image

नत्तू पांडे के पास तीन खरगोश हैं – ह्वाईट बनी, ब्लैक बनी और बदमाश बनी। ह्वाईट और बदमाश बनी सफेद रंग के हैं। बदमाश बनी शराराती और कटखना है। उसकी बदमाशी के कारण उसे अलग पिंजरे में रखा जाता है। वह नत्तू पांड़े को दो तीन बार खरोंच चुका है।

ब्लैक बनी मादा है। वह दो बार बच्चे दे चुकी है, पर वे जी नहीं पाए।

नत्तू पांडे अपने खरगोशों से बहुत प्यार करते हैं। ये तीनों खरगोश नत्तू पांड़े के गांव, फुसरो (बोकारो से तीस किलोमीटर दूर) रहते हैं!

Advertisements

नत्तू पांड़े और प्रसन्नता


कचरे की टोकरी से कौतुक करते गोल-मटोल नत्तू पांड़े।

मेरी बिटिया और मेरा नाती विवस्वान (नत्तू पांड़े) यहां हमारे पास एक महीना रहे। वह महीना भर प्रसन्नता का दौर रहा। मेरी पत्नीजी को सामान्य से कहीं अधिक काम करना पड़ता था, पर मुझे कभी यह नहीं लगा कि वह उनको बोझ लग रहा था। मेरी बिटिया ने मेरे लड़के को उसके कमरे से बेदखल कर दिया था (उस कमरे में वह और नत्तू पांड़े जम गये थे!)। पर मेरे लड़के को कोई कष्ट नहीं था। विवस्वान मेरे लैपटॉप, प्रिण्टर, कागज, किताबें और  घर में बने मेरे होम-ऑफिस के कोने से छेड़ छाड़ करता था। पर वह मैं सहर्ष सह ले रहा था।

यह सब हो रहा था प्रसन्नता के साथ।

प्रसन्नता क्या होती है?

अन्य चीजें बराबर हों तो परिवार प्रसन्नता देता है। हां, वास्तव में।

मैने कहीं पढ़ा था कि इस समय जो पीढ़ी अधेड़ हो रही है, जो पर्याप्त आर्थिक स्वतंत्रता हासिल कर चुकी है, जिसने इतना जोड़ लिया है कि वह अपने वृद्धावस्था और स्वास्थ्य के लिये खर्च करने में सक्षम है, वह नहीं चाहती कि अपने नाती-पोतों को पाले जिससे कि उनके बेटा-बहू नौकरी कर सकें। शहरी अपर मिडिल क्लास में यह द्वन्द्व चल रहा है। बहू यह सोचती है कि सास ससुर उसके बच्चों को देखने का पारम्परिक धर्म नहीं निभा रहे। सास ससुर मान रहे हैं कि पूरी जिन्दगी मेहनत करने के बाद अब उनके पास अपना समय आया है जिसे वे अपने हिसाब से खर्च कर सकें – घूमने, फिरने, पुस्तकें पढ़ने या संगीत आदि में। वे एक और जेनरेशन पालने की ड्रज़री नहीं ओढ़ना चाहते।

पारिवारिक समीकरण बदल रहे हैं। पर इस बदलते समीकरण में न तो बहू-बेटा प्रसन्न रहेंगे, न नाती-पोते और न बाबा-दादी। आधुनिकता में प्रसन्नता केजुयेलिटी होगी/रही है।

परिवार टूट रहे हैं। लोग स्वतंत्रता अनुभव कर रहे हैं। भाई, बहन भतीजे, पड़ोसी, दूसरे शहर में काम करता रिश्तेदार या अमरीके में बसा सम्बन्धी अलग थलग होते जा रहे हैं। कई से तो हम कई दशकों से नहीं मिले। फोन आ जाता है तो दस बार “और क्या हालचाल है” पूछने के अलावा गर्मजोशी के शब्द नहीं होते हमारे पास।

हम पैराडाइज़ में अपनी न्यूक्लियर फैमिली के साथ दो-तीन हजार का लंच कर खुश हो लेते हैं। पर उसी दो-तीन हजार में एक्टेण्डेड फैमिली के साथ कम्पनीबाग में छोले-भटूरे खाने की प्रसन्नता खोते जा रहे हैं।

प्रसन्नता के घटकों में परिवार प्रमुख इकाई है। शायद हां। शायद नहीं।

कुछ और सोचा जाये। या आप बतायेंगे?


नत्तू पांड़े संवाद, जो कविता हो सकता है –

मामा बॉल
धपाक
माथा फूट
हम गिल
एते
चोट्ट
मामा पोंपों सुई
पैले

(मामा ने बॉल फेंकी, जो धपाक से मेरे माथे पर लगी। माथा फूट गया। मैं गिर पड़ा। ऐसे चोट लगी। मामा को उसकी तशरीफ पर सूई लगा दो बतौर पनिशमेण्ट, पहले! )



मेक्सिको और प्रसन्नता –

मेक्सिको की दशा भारत/पूर्वांचल/बिहार से मिलती जुलती है। पर वहां के लोग विश्व के प्रसन्नतम लोगों में हैं। नेशनल जियोग्राफिक की डान बटनर की लिखी पुस्तक का अंश में उद्धृत कर रहा हूं –

कोई मुगालता न रखें, मॉटेरे, मेक्सिको  में और आसपास गम्भीर समस्यायें हैं। बहुत से गांवों में बच्चे कुपोषण और शिक्षा की कमी से पीड़ित हैं। कुशल और प्रतिभावान आदमी और औरतें शराब  और जींस बनाने की फैक्टरी  में काम करने को अभिशप्त हैं। उनकी आकान्क्षायें और स्वप्न धूमिल हो रहे हैं। जो अधिक दुर्भाग्यशाली हैं, वे सोचते हैं कि परिवार छोड़ कर दूर सन्युक्त राज्य अमेरिका चले जायें काम धन्धे की तलाश में। तब भी, सारी बाधाओं – बढ़े हुये भ्रष्टाचार, कम विकास और सवालों के घेरे में आती शासन व्यवस्था – के बावजूद ये मेक्सिको वासी प्रसन्नता की सम्पदा का आशीर्वाद पाये हुये लोग हैं।

और कारण क्या हैं इनकी प्रसन्नता के? डान बटनर इस प्रसन्नता के कारण बताते हैं –

  1. सूर्य की रोशनी की बहुतायत।
  2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता की भावना।
  3. नैसर्गिक हास्य। अपने आप पर, बढ़े टेक्स पर और यहां तक कि मौत पर भी हंस लेने की वृत्ति। 
  4. बस कामचलाऊ पैसा। 
  5. धार्मिकता। 
  6. बहुत अधिक सामाजिकता। 
  7. परिवार को सबसे ज्यादा प्राथमिकता। और
  8. अपने आस पास की अच्छाई पर संतोष 

परोक्ष रूप से, और शायद सीधे सीधे भी, प्रसन्नता के मामले में बहुत कुछ कहे जाने की आवश्यकता/सम्भावना है।

मम, जै, आगा!


नत्तू पांड़े की भाषा में शब्द कम हैं, कारक-विशेषण-सर्वनाम पिद्दी पिद्दी से हैं। क्रियायें तो वैसी हैं जैसे ऊन बुचेड़ ली गयी भेड़ हों।  पर अभिव्यक्ति बहुत है। पूरा शरीर अभिव्यक्ति का माध्यम है।

उन्हे हम गंगा किनारे ले कर गये। घर से पैदल गये नत्तू पांड़े। पहले हनूमान जी के मन्दिर पर रुके। श्रद्धा से घण्टा बजाया और मत्था टेका। टेकने के बाद जय बोली – जय जय मंकी! Continue reading “मम, जै, आगा!”

भावी प्रधानमंत्री का इलाहाबाद दौरा


नत्तू विवस्वान पाण्डेय इलाहाबाद आ रहे हैं। बहुत अनाउंस्ड दौरा नहीं है। उनके नाना बीमार हैं, शायद इस लिये आ रहे हैं। पर प्रधानमंत्री हैं, भावी ही सही, तो असमंजस की दशा है।

नत्तू विवस्वान पाण्डेय अपनी दादी और बाबा के साथ।

वे चम्बल एक्सप्रेस से आयेंगे धनबाद से। साथ में उनकी सेकरेट्री (उनकी मम्मी) और एक बॉडीगार्ड होंगे, बस। ऐसे में क्या किया जाये – रेलवे और रेलवे स्टेशन को खबर की जाये या नहीं? चम्बल के टाइम तक तो साफ सफाई भी नहीं होती प्लेटफॉर्म की। नत्तू जी ने औचक निरीक्षण कर लिया और भड़क गये, तब? फिर मीडिया को खबर करनी है क्या? इस विजिट पर वे उनसे मिलना चाहेंगे? यह सब उनकी सेकरेट्री से पता नहीं किया गया है। महत्वपूर्ण है यह – विभाग आवण्टन में रेलवे उन्ही के पास जो है। मुझे फिक्र नहीं कि सिविल प्रशासन क्या करेगा; मुझे सिर्फ रेलवे की फिक्र है।

मैं नत्तू पांड़े जी से फोन पर इण्टरव्यू लेता हूं।

माह – नत्तू जी आपके पास भारत में बढ़ते स्वास्थ्य खर्चे को ले कर क्या सोच है। आप अपने नाना को ही लें। पिछले एक माह की बीमारी में रेलवे उनपर एक-दो लाख खर्च कर चुकी होगी। यह खर्चा उन्हे अपनी जेब से करना होता तो…

नत्तू जी प्रश्न लपक लेते हैं। उनके आदेश पर उनकी सेकरेट्री उनके बस्ते से एक छोटी सी पिचकारी निकालती हैं।

नत्तू – छुई।

सेकरेट्री बताती हैं कि नत्तू जी के सेमी-मौन का दिन है। एक दो शब्द बोलते हैं। बस। उनका आशय है कि सब को इस पिचकारी से सुई लगा देंगे। घर में और आस पास में – यहां तक कि अपने डाक्टर संजय अंकल को भी लगा चुके हैं। छुई के बाद व्यक्ति को स्वस्थ होना ही है!

माह – आपका क्या ख्याल है; इतने दशकों बाद भी भारत में निरक्षरता है। जो साक्षर हैं, उनमें से भी कई सिर्फ आंकड़ों में हैं।

नत्तू – भींग-भींग।

उनकी सेकरेट्री फिर समझाती हैं। नत्तू जी पुस्तक आत्मसात करने के लिये उसे वैसे धोते हैं, जैसे कपड़े धोये जाये हैं – भींग भींग कर। उसके बाद  साफ धुली पुस्तक दिमाग में दन्न से डाउनलोड हो जाती है। शिक्षण  और ज्ञानार्जन का सबसे सरल  और प्रभावी तरीका है यह।

तबियत ठीक न होने के कारण मैं लम्बा इण्टरव्यू नहीं ले पाता।

ऊपर जो लिखा वह तो हास्य है। पर एक दो मूल बातें तो हैं ही। जब मैं 2035-40 में नत्तू के इस रोल की सोचता हूं तो इतना स्पष्ट होता है – उसको, चूंकि उसके अपने बाबा श्री रवीन्द्र पाण्डेय के गिरिडीह सांसद वाली राजनीति की तकनीकें नहीं चलेंगी लम्बे समय तक; राजनीति को नये आयाम दे कर गढ़ना होगा। सत्ता बड़ी तेजी से मुद्रा, गहना, खेती, जमीन, उद्योग, मकान से होती हुई इलेक्ट्रानिक बीप में घुसती जा रही है। यह बीप चाहे बैंकों के मनी ट्रांसफर की हो या ट्विटर के सोशल मीडिया की। उसे यह खेल समझना होगा बारीकी से। उसके नाना भी अपने सिद्धांत-फिद्धांत के ख्याली सिक्के जेब में खनखनाते रहे। बिना काम के – बेकार। इसकी अनुपयोगिता और धूर्तता/चालबाजी की निरर्थकता – दोनो समझने होंगे उसे अपनी बाल्यावस्था में।

खैर, बाकी तो गोविन्द जानें कैसे गढ़ेंगे उसे!

दामोदर तीरे विवस्वान।



झारखण्ड की नदी है दामोदर। सूर्य उसके पूर्वी छोर पर उगते रहे होंगे आदि काल से। उसी नदी के किनारे है एक बनता हुआ मन्दिर परिसर। वर्तमान समय में सूर्य का मुण्डन संस्कार हुआ वहां!

सूर्य यानी विवस्वान। विवस्वान यानी नत्तू पांड़े। पिछले महीने दो साल के हुये थे तो तय पाया गया था कि महीने भर बाद उनका मुण्डन करा कर उनकी चोटी निकाल दी जाये। पेट का बाल एक बार उतर ही जाना चाहिये।

बुद्धिमान बहुत हैं नत्तू पांड़े। रैबिट के बच्चे को मालुम है क्या बोलते हैं? आपको नहीं मालुम न! नत्तू को मालुम है बनी कहते हैं। जब बालक इतना बुद्धिमान हो जाये तो उसका मुण्डन करा ही देना चाहिये!

पर कोई भी संस्कार अब मात्र संस्कार भर नहीं रह गया है। आयोजन हो गया है। और माई-बाबू के लिये तो ईवेण्ट मैनेजमेण्ट में एक अभ्यासयोग। नत्तू के मम्मी-पापा ने ईवेण्ट मैनेजमेण्ट में मुण्डन के माध्यम से मानो पी.एच.डी. कर ली! वाणी (मम्मी) ने जगह जगह घूम कर शॉपिंग की। विवेक (पिता) ने सारे लॉजिस्टिक इंतजाम किये। चूंकि अतिथि गण बोकारो आने वाले थे, सो उनके रहने, भोजन और अन्य सुविधाओं का इंतजाम किया नत्तू के बड़े पापा और बड़ी मां ने।

नत्तू की दादी पूरे कार्यक्रम की अधिष्ठात्री थीं और उनके बाबा, बिकॉज ऑफ बीइंग मेम्बर ऑफ पार्लियामेण्ट, पूरे कार्यक्रम के मुखिया कम चीफ गेस्ट ज्यादा लग रहे थे। समय पर आये। कार्यक्रम की समयावधि गिनी और उसके बाद मुण्डन स्थल के पर्यटन स्थल के रूप में विकास की योजनाओं की घोषणायें कर निकल लिये। सांसद जी की घोषणायें – एवरीवन वॉज़ फीलिंग ह्वाट यू कॉल – गदगद! मैं तो बहुत प्रभावित हूं कि वे सभी से सम्प्रेषण कैसे कर पाते हैं, उस व्यक्ति के स्तर और उसकी अपेक्षाओं के अनुरूप। बिना अपनी बौद्धिक या सामाजिक स्तर की सुपीरियारिटी ठेले!

उनके कार्यकलाप को सूक्ष्मता से देखने के बाद अगले जनम में जो कुछ बनना है, उस लम्बी लिस्ट में एक मद और जुड़ गया – सांसद बनना है!

DSC03396
मुण्डन का स्थल – दामोदर हैं नेपथ्य में

श्री रवीन्द्र पाण्डेय स्थान के विकास पर कहते हुये

GDP0751खैर, अपनी बात की जाये! दमोदर के तीर पर रमणीय वातावरण था। स्थान किसी “बनासो देवी” के मन्दिर परिसर के रूप में विकसित किया जा रहा था। एक पीपल का पेड़ था नदी किनारे। बहुत वृद्ध नहीं था। उसके चबूतरे पर हम लोग उतर कर बैठे। मन्दिर की धर्मशाला के दो तीन कमरे बन चुके थे। उन कमरों से दरी-चादर निकाल कर हम लोगों के लिये बिछाई गयी थी। मन्दिर बन रहा था। दीवारें खड़ी हो गयी थीं और कगूरे के लिये बल्लियां ऊर्ध्व-समांतर जमाई जा चुकी थीं।

मुण्डन समारोह दो-ढ़ाई घण्टे चला। विवस्वान की आजी के कहे अनुसार सब विधि विधान से पूजा-पाठ संकल्प हुआ। बाकी लोग कुनमुनाये कि लम्बा खिंच रहा है! पूजा के बाद नाऊ ने जब कैंची चलानी चाही विवस्वान के बालों पर तो वह इतना रोया-चिल्लाया, मानो कोई उसके गले पर प्रहार कर रहा हो। गाना-बजाना-टॉफी-कम्पट से उसे फुसलाया गया। अंतत: जब उसका रोना नहीं रुका तो पण्डित रवीन्द्र पांड़े, उसके बब्बा ने नाऊ को डपटा, कि जितना कट गया है उतना काफी है, बस!


मुण्डन के पहले नत्तू पांड़े
DSC03378
मुण्डन के दौरान नत्तू पांड़े

कुल मिला कर जैसे भेड़ का ऊन बुचेड़ा जाता है, नत्तू का मुण्डन उसी तरह सम्पन्न हुआ। बाल उतर गये। बुआ लोगों ने अपने आंचल में रोपे। पण्डित और नाऊ-ठाकुर दच्छिना पाये। जय श्री राम।

कुछ दूर खड़े गरीब बच्चे यह संस्कार देख रहे थे। मेरे मन में उन्हे दक्षिणा देने का विचार आया। शुरू किया तो दो-तीन थे। पर पैसा देने लगा तो कुकुरकुत्ते की तरह कई अवतरित हो गये। बच्चे ही नहीं, किशोर भी आ मिले उनमें!

रात में विवेक-वाणी ने रात्रि भोज दिया। उसमें बच्चों के मनोरंजन के लिये मदारी बुलाया गया था। सबसे बढ़िया मुझे वही लगा। उसके प्रहसन में बन्दर (मिथुन) दारू-गांजा पी कर जमीन पर लोटता है, पर अंतत: बन्दरिया (श्रीदेवी) उससे शादी कर ही लेती है।

दारू-गांजा सेवन करने के बाद भी श्रीदेवी मिलती है। जय हो मदारीदेव!

आसनसोल और धनबाद मण्डल के दो वरिष्ठ रेल अधिकारी सांसद महोदय के दामाद हैं – मनोज दुबे और विनम्र मिश्र। मेरा ब्लॉग यदाकदा ब्राउज़ कर लेते हैं। उनका कहना था कि एक पोस्ट अब नत्तू पांड़े के मुण्डन पर आयेगी और एक मदारी पर। जब कोई इतना प्रेडिक्टेबल लिखने लगे तो उसके पाठक कम होने लगेंगे जरूर। लिहाजा मैं मदारी पर अलग से पोस्ट गोल कर दे रहा हूं! 🙂


दामोदर नदी को बंगाल का दुख कहा जाता था। यहां फुसरो के पास दामोदर की जलरशि और दामोदर के पाट को देख कर अहसास ही नहीं होता था कि दामोदर बर्दवान, हुगली, हावड़ा और मेदिनीपुर को डुबोती रही होंगी पिछली सदी के पूर्वार्ध में। मैने तो दामोदर घाटी को कोयला और ऊर्जा के लिये ही जाना है। सिमटती गयी हैं दामोदर। अब तो लगता है दामोदर की बाढ़ से बचने के लिये किसी तटबन्ध की जरूरत नहीं, मानव की विकास करने की ललक ने पर्याप्त गला दबा लिया है दामोदर का!

16 जून की रात स्काइप पर विवस्वान पाण्डेय

नत्तू पांड़े स्काइप पर



स्काइप पर नत्तू पांड़े का स्नैप-शॉट उनके पिताजी के साथ

नत्तू पांड़े अब हफ्ते में दो दिन स्काइप के माध्यम से मिलते हैं। उनके पापा (विवेक पाण्डेय) रात में लौटते हैं कामकाज से निपट कर। तब वे पन्द्रह-बीस मिनट के लिये नत्तू को ऑनलाइन कराते हैं। शुरू में वीडियो – बातचीत नत्तू पांड़े को अटपटी लगती थी; पर अब माहिर हो चले हैं नत्तू इस विधा के!

आज होली के दिन उनको रंग लगाया था वहां फुसरो (बोकारो) की बालमण्डली ने। तब तो वे ऑनलाइन नहीं हुये पर शाम के समय साफ सुथरे बन कर अपने दांत, कान, नाक, चोटी आदि फरमाइश पर दिखाने लगे।

Continue reading “नत्तू पांड़े स्काइप पर”