सूर्य मणि तिवारी जी का सूर्या ट्रॉमा सेंटर और अस्पताल – एक अवलोकन

अस्पताल से कमाना तो सूर्य मणि जी का मोटिव हो ही नहीं सकता. पूर्वांचल के इस इलाके में लोगों की वैसी पे करने की केपेसिटी ही नहीं है.


मेरे पिताजी औराई के इस अस्पताल – सूर्या ट्रॉमा सेंटर और अस्पताल – में भर्ती हैं. उन्हे रक्त में संक्रमण था, जो सेप्टिसीमिया निकाला. संक्रमण की घोर वेरायटी. इसके अलावा उनकी बढ़ी उम्र के कारण डिमेंशिया की भी समस्या है. एक ओर का मस्तिष्क, वृद्धावस्था के कारण काफी क्षतिग्रस्त हो गया है.

सूर्य मणि त्रिपाठी (इन सेट में) और औराई में नया बना सूर्या ट्रामा सेंटर तथा अस्पताल

अस्पताल मेरे घर (गांव विक्रमपुर, भदोही जिला) के सबसे नजदीक (दस किलोमीटर दूर) नया खुला है. जब पिताजी को लेकर पंहुचा तो अस्पताल में किसी को जानता नहीं था. पर बिना किसी भटकाव के काउंटर पर संपर्क करते ही कर्मचारी पिताजी को ह्वील चेयर पर उतार कर आपात चेक अप के लिए ले आए और उपचार प्रारंभ हो गया.

पिताजी आई सी यू में

पूर्वांचल में जहां पहचान और सोर्स सिफारिश के बिना कुछ होता ही नहीं, हम सीधे पंहुचे और इलाज का काम शुरू हो गया. मुझे केवल उचित पेमेंट करने पड़े और दवा ला कर देनी पड़ी.

शाम तक मैं थक गया. हमने कुछ राशि एडवान्स जमा की जिससे रात में हमें आकस्मिक दवाओं के लिए न जगाया जाए. लेकिन फार्मेसी के एक कर्मी ने आधी रात जगा ही दिया – यह जानने के लिए कि दवा की दरकार है, वह दे दे तो सवेरे मैं पेमेंट कर दूँगा या नहीं.

रिटायर्मेंट के बाद किसी ने पिछले चार साल रात में फोन कर नहीं जगाया था. एक बार तो निद्रा में अपने को पुराने फ्रेम ऑफ माइंड में रख कर सोचने लगा कि शायद कोई ट्रेन एक्सिडेंट का मामला है. पर फोन की बात से समझ आ गया कि मामला अस्पताल की दुनियाँ का है, रेल की दुनियाँ का नहीं. रेल की दुनियाँ तो चार साल पहले छूट चुकी है. 😆

अगले दिन हर छोटे बड़े बिल का अलग अलग पेमेंट करते, वह भी कैश में, मैं उकता गया. मुझे समझ नहीं आया कि इतना बड़ा अस्पताल कैश की बजाय POS मशीन, UPI या Paytm से पेमेंट क्यों नहीं लेता; जब हर जगह स्टिकर लगे हैं कि “कृपया बिना रसीद के कोई पेमेंट न करें”?

श्री सूर्य मणि तिवारी

एक स्टिकर पर अस्पताल के मुखिया श्री सूर्य मणि तिवारी का फोन नंबर लिखा था. मैंने उन्हें फोन लगाया. पब्लिक को डिस्प्ले किए नंबर के बारे में सोचा कि वह कोई कर्मचारी मैनेज करता होगा. पर फोन तिवारी जी ने स्वयं उठाया और पूरी विनम्रता से बातचीत की.

मेरा पूरा नजरिया बदल गया उस बातचीत के बाद. तिवारी जी ने खेद व्यक्त किया कि अस्पताल नया होने के कारण POS मशीनें अभी नहीं आई हैं. कुछ ही दिन में आ जाएंगी. तब तक के लिए उन्होंने आस पास उपलब्ध एटीएम की जानकारी दी. उन्होने अपने चार्टर्ड एकाउंटेंट साहब, प्रशांत जी को भी मेरे पास भेजा. प्रशांत जी ने सूर्या ट्रामा सेंटर के बैंक खाते का विवरण दिया जिसमें मैं एडवान्स ट्रांसफर कर सकूं.

सूर्य मणि जी के पॉजिटिव एक्शन से मेरी समस्या का निदान हो गया. यह भी स्पष्ट हुआ कि यह अस्पताल खोलने का उनका ध्येय पैसा कमाना नहीं, अपने इलाके में परोपकार करने का है.

मैने तिवारी जी को हृदय से धन्यवाद दिया.

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इसके दो दिन बाद सूर्यमणि जी से फोन पर और आमने सामने एक लंबी परिचयात्मक बात हुई. उन्होने मेरे बारे में पूछा और अपना भी बताया. पता चला कि वे सेल्फ मेड व्यक्ति हैं. वे जब इंटर कॉलेज में थे, तभी उनके पिताजी का निधन हो गया था. पढ़ने मेें अच्छे थे तो पढ़ाई के बाद अध्यापक बन गये पास में जंगीगंज के एक स्कूल में. उन्हें जब यह समझ आया कि 3 भाई और दो बहनों का परिवार स्कूल मास्टरी की सेलरी में नहीं संभाला जा सकता तो घोसियां के अपने एक मित्र के पिताजी से कार्पेट व्यवसाय की बारीकियां समझी. 1971 में वह काम प्रारंभ किया और कालांतर में (1979 में) कार्पेट के बाजार, अमेरिका गए. वहां 1986 में अपने बेटे को ले जा कर पढ़ाया. इंजीनियर और एम बी ए बनाया.

सन 2004 में उनका अमरीका स्थित व्यवसाय 25 मिलियन (डालर) टर्नओवर का बना उनके अथक परिश्रम से.

उनकी वेब साइट surya.com से पता चलता है कि उनका लड़का सत्य उनकी कम्पनी का प्रेसीडेंट है. अब कंपनी टर्नओवर में 2004 की अपेक्षा छ गुना प्रगति कर चुकी है.

मुलाकात में मेरे पिताजी के ट्रीटमेंट के बारे में उन्होंने अपना जेनुईन कन्सर्न दिखाया. उन्होंने और यहां के प्रमुख प्रबंधक डा. रमण सिंह जी ने पिताजी के MRI जांच के बारे में व्यवस्था की.

मेरे जैसे रिटायर्ड व्यक्ति, जिसका विभागीय आभामंडल अब बिला चुका हो, के लिए इस तरह का कन्सर्न अगर सूर्य मणि जी और डा. रमण सिंह जैसे लोग दिखाएं – जिनके लिए मैं दो दिन पहले तक अजनबी था; तो निश्चय ही मेरे कुछ पूर्व संचित पुण्य होंगे. वर्ना कौन पूछता है?!

सूर्य मणि जी का कहना है कि फिलेन्थ्रॉपी के कोण से अगर मैं आनेररी आधार पर अस्पताल के लिए कुछ समय दे सकूं तो अच्छा होगा. मेरी पत्नी जी ने मुझे यह सुन कर कहा – “छुट्टा घूमने की तुम्हारी आदत हो गयी है. इसलिए मना करने की कोशिश करोगे ही. पर ऐसा करना मत. संपर्क बनाना और लोगों से जुड़ना कोई गलत बात नहीं. अंतर्मुखी बने रहे हो, पर वही सदा उचित नहीं होता.”

मुझे अपनी पत्नीजी और सूर्य मणि जी के कहने में सार दिखता है. पर अभी तय नहीं कर पा रहा हूँ कि मैं कर क्या सकता हूँ. अस्पताल की दुनियाँ मेरी आसक्ति की पटरी की नहीं है…

पर पटरी क्या है? गंगा किनारे छुट्टा घूमना और दस पांच पंक्ति लिख कर, एक दो फोटो सटा कर दिन पर दिन गुजरते देखना – वही पटरी है? शायद नहीं. पर सही क्या है?

शायद सूर्य मणि तिवारी जी के प्रस्ताव पर अपने जीवन के जड़त्व में कुछ बहाव लाऊँ. शायद.

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क्यूं बनाया है सूर्य मणि जी ने यह अस्पताल?

सूर्य मणि जी ने अस्पताल के एक कर्मी, भरत लाल मिश्र जी को मुझे पूरा अस्पताल दिखाने के लिए कहा. विभिन्न प्रकार के परीक्षण कक्ष, CT Scan तक की रेडियोलॉजिकल परीक्षण सुविधा से संपन्न, अत्याधुनिक ऑपरेशन थियेटर, फिजियोथेरेपी का विस्तृत कमरा, अनेक प्रकार के वार्ड, सेमी और पूरे प्राइवेट कमरे, केण्टीन, चार मंजिला विस्तृत रैम्प, एम्बुलेंस… सब कुछ इतना प्रचुर और आधुनिक कि किसी मेट्रो शहर के लिए भी उसे ट्रेंडी मान सकते हैं…. ऐसा अस्पताल विकसित हो रहा है यह. बस यहां के लिए डाक्टरों और प्रोफेशनल स्टाफ की और बड़ी फौज चाहिए. उसके लिए, लगता है सूर्य मणि जी सघन हेड हंटिंग में जुटे हैं.

यह है आने वाले समय का ऑपरेशन थियेटर. औराई एक कस्बा या गांव भर है, जहां यह उपलब्ध होगा सूर्या ट्रॉमा सेंटर में.

इतनी पूंजी और श्रम लगे अस्पताल से कमाना तो मोटिव हो ही नहीं सकता. पूर्वांचल के इस इलाके में लोगों की वैसी पे करने की केपेसिटी ही नहीं है. और बड़े शहरों से कोई मैडिकल टूरिज्म के लिए यहां आने से रहा.

केवल कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉसिबिलिटी का निर्वहन भी ध्येय नहीं हो सकता. उस मुद्दे पर अधिकांश कंपनियों को लिप सर्विस करते और उस मद के खर्चे में डंडी मारते मैंने देखा है.

यहां तो सूर्य मणि जी मानो पूरी साध और तन्मयता से अस्पताल बनाए हैं और विकसित कर रहे हैं….हर आधुनिक सुविधा, सहूलियत से संतृप्त अस्पताल की साकार होती परिकल्पना!

मुझे लगता है अगर कोई मोटिव है तो वह अपने इलाके की सेवा और अपनी सात्विक साख की पुष्टि ही हो सकता है. अन्यथा सारे आउट पेशेंट्स को बिना फीस लिए सुविधा देना जब कि पूरे इलाके में झोला छाप डाक्टर भी 100 रूपया झाड़ लेते हैं फटे हाल मरीज से… कोई (आसपास दिखता व्यापक और लूट खसोट का मैडिकल) व्यवसाय करने की वृत्ति तो कदापि नहीं है.

Man, at some point of time in life, breaks from mundane and starts living for his LEGACY. That’s the most pious moment. That can not come, unless the man has some substantial inner stuff in the core. सूर्य मणि जी के साथ वही हो रहा है.

इसी लिए शायद सूर्य मणि जी के इस यज्ञ में अपना योगदान, अपनी आहुति अर्पण करनी चाहिए.

तुम क्या करोगे, जी डी?


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पेण्ट माई सिटी प्रॉजेक्ट, प्रयागराज


Paint

प्रयागराज गया था मैं पिछले मंगलवार। ढाई दिन रहा। शिवकुटी का कोटेश्वर महादेव का इलाका बहुत सुन्दर चित्रों वाली दीवालों से उकेरा हुआ था। पहले यह बदरंग पोस्टरों से लदा होता था। बड़ा सुन्दर था यह काम।

(अर्ध) कुम्भ मेला तीन महीने में होगा प्रयागराज में। कई शताब्दियों बाद शहर का नाम पुन: प्रयागराज हुआ है। शिवकुटी में जो भी लोग मिले, सबने कहा कि मैं मेले के समय प्रयाग में ही रहूं। ये चित्र देख कर जोश मुझे भी आ रहा था कि प्रयागराज में अगले कुम्भ मेले के दौरान रहना अच्छा अनुभव होगा। Continue reading “पेण्ट माई सिटी प्रॉजेक्ट, प्रयागराज”

घुरहू मुसहर से बातचीत


IMG_20180330_072020-02.jpgकरहर में महुआ के पेड़ के नीचे बैठा मिला घुरहू। पास में एक करीब 10 फुट की लग्गी (पेड़ से पत्ते तोड़ने की पतले बांस की चोंच जुड़ी डण्डी) पड़ी थी। साथ में उसकी पत्नी और एक कम्बल। पत्नी पास के किसी नल से अपने बरतनों में पानी भरकर लाई थी। बरतन में था एक अल्यूमिनियम की बटुली, एल लोटा, एक तसली और एक कडछुल। घुरहू के पास चप्पल थी, पत्नी बिना चप्पल के दिख रही थी।

उसने बताया कि कल से कटका स्टेशन पर डेरा डाल रखा है। रहने वाला कपसेटी के पास किसी गांव का है। कपसेटी यहां से करीब 25 किलोमीटर दूर है। वहां गांव में कोई बाबू साहब बड़े जम्मींदार हैं। पचास बीघे के काश्तकार। उन्होने रहने को जगह दी है। भारत सरकार ने मकान भी दिया है बनवा कर। मां बाप वहां रहते हैं। घुरहू की पत्नी ने बताया कि एक आठ-दस साल की बच्ची भी है उनकी। गांव में मा-बाप के पास रख छोड़ी है। पत्तियां बीनने के लिये दर दर घूमने में उस बच्ची को साथ ले कर चलना कठिन काम था।

आजकल महुआ की ताजा पत्तियां नहीं हैं। तोडने में ज्यादा नहीं मिलतीं तो सूखी पत्तियां बीन कर पानी में गीला कर तह लगाते हैं वे मुसहर लोग। शाम तक जितनी इकठ्ठा हो जाती हैं, वह ले कर ट्रेन में बैठ जाते हैं और अगले दिन सवेरे बनारस में बेच कर वापस लौटते हैं। घुरहू ने जब यह बताया तो मझे स्पष्ट हुआ कि रेलवे स्टेशन पर डेरा क्यों जमाते हैं ये मुसहर। रेलवे की बिना टिकट बनारस आने जाने की सुविधा उनके जीवन यापन का महत्वपूर्ण अंग है।

जैसा घुरहू ने बताया – रोज करीब 150-200 रुपया कमा लेते हैं वे दोनो मिल कर।

मैने पूछा – आधार कार्ड है तुम्हारा?

घुरहू ने बताया कि है पर बाबू साहब के यहां रखा है। बैंक अकाउण्ट नहीं है। थोड़ा मायूस सी हंसी हंस कर वह बोला – पैसा है ही कितना कि बैंक अकाउण्ट की जरूरत पड़े!

पत्तियां बीनते हुये इलाहाबाद के आसपास तक भी चले जाते हैं ये घुमन्तू मुसहर। घुरहू ने बताया कि पान के लिये महुआ की पत्तियां बीनने के अलावा और जो भी काम मिल जाता है, वह कर लेते हैं। लोग गेंहूं-धान की कटाई के लिये हजार – डेढ हजार रुपये बीघा के हिसाब से ठेका भी लेते हैं। उस काम में कटाई के साथ साथ गट्ठर बनाना शामिल होता है। बकौल घुरहू, वे मेहनत से ही कमाते हैं, पर मेहनत से मिलता बहुत कम है।

अन्य मुसहरों की बजाय घुरहू और उसकी पत्नी ज्यादा जागरूक नजर आये। उनमें अपनी दशा से ऊपर उठने की एक चिनगारी मुझे दिखी। पर में पक्का नहीं कह सकता कि वह चिनगारी वास्तव में थी, या मात्र मेरी सोच में।

चलते चलते मैने उन दोनों को चाय पीने के पैसे दिये और उन्होने प्रसन्न हो कर अपना धन्यवाद व्यक्त किया।IMG_20180330_072259

 

डेढी और लेवल क्रासिंग की जरूरत


डेढ़ी – डेढ़ किलोमीटर लम्बी सड़क जो उत्तर में रेलवे लाइन और दक्षिण में गंगा किनारे के गांव द्वारिकापुर के बीच है और जिसके पूर्व में मिर्जापुर, पश्चिम में भदोही जिले के गांव हैं; के बारे में कल मैने बताना शुरू किया था। मेरा विचार है कि इस सड़क के माध्यम से गांव के जीवन की बहुत सी बातें मैं देख/समझ/बता पाऊंगा। इस सड़क पर रोज सवेरे मैं 8-9 किलोमीटर साइकिल चलाता हूं। डेढ़ी के लगभग तीन चक्कर। घर से सात बजे निकलता हूं – उदर में दो कप चाय डाल कर। बटोही (अपनी साइकिल) को एक बोतल पानी थमाता हूं। जस्ट इन केस प्यास लग जाये!

उत्तर छोर पर डेढ़ी रेलवे लाइन के पहले ठिठक कर खत्म हो जाती है। उसके आगे और दांये, बांये रेलवे की जमीन है। डेढ़ी के भगीरथ – परधान लोग अपनी सीमा में ही डेढ़ी के बहाव को तय कर सकते हैं। रेलवे पर जोर नहीं उनका।

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एक महिला थैले में अपना सामान ले कर मुझसे आगे चल रही थी डेढ़ी पर।

एक महिला थैले में अपना सामान ले कर मुझसे आगे चल रही थी डेढ़ी पर। उसे रेल लाइन के उस पार जाना था। मेरे सामने पटरी पार की उसने।DSCN0412

उसी समय दूसरी ओर से एक ग्रामीण को इस पार आने के लिये अपनी साइकिल पटरी पर कुदाते देखा।

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उसी समय दूसरी ओर से एक ग्रामीण को इस पार आने के लिये अपनी साइकिल पटरी पर कुदाते देखा।

डेढ़ी के सामने कटका रेलवे स्टेशन का शण्टिंग नेक का छोर दिखता है। अगर स्टेशन की लूप लाइन को चीरता लेवल क्रासिंग इस जगह पर शिफ़्ट कर दिया जाये तो स्टेशन सेक्शन के लेवल क्रासिंग को ब्लॉक सेक्शन में किया जा सकता है। रेलवे यातायात के लिये ज्यादा सुरक्षित विकल्प होगा वह। वर्तमान के लेवल क्रासिंग नम्बर 23 से इस जगह के बीच अपनी जमीन पर लगभग 400 मीटर पतली सड़क जरूर बना कर देनी होगी रेलवे को। और डेढ़ी के ग्रेडियेण्ट (समतल से ऊंचाई) को भी अगर टटोला जाये तो शायद नई जगह पर लेवल क्रासिंग की बजाय रोड-अन्डर-ब्रिज (पुलिया) बनाई जा सके शायद। वह रेलवे की लेवल क्रासिंग खत्म करने की पॉलिसी के अनुरूप होगा। अभी रेलवे लाइन का दोहरीकरण का काम चल रहा है। उस दशा में यह और भी ज्यादा सुरक्षित रेल यातायात का निमित्त होगा। गांव और रेल – दोनो के लिये विन-विन सिचयुयेशन।

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रेलवे फाटक की स्थिति और प्रस्ताव

मैं अगर रेल सेवा में होता तो यह करा पाना मेरे लिये बहुत सरल होता। अब मैं सुझाव भर दे सकता हूं। आसपास के चार-पांच प्रधान लोग, लोकल एमएलए/सांसद यह काम करा सकते हैं। शायद मण्डल रेल प्रबन्धक इसपर ध्यान दे सकें। पर इन सब प्रकार के जीवों के लिये फैज़ की वह नज्म है न! “और भी गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा।“ मुहब्बत की जगह रेलवे क्रासिंग और डेढ़ी पढ़ें! 😊

लेवल क्रासिंग तो एक मुद्दा है। इसी तरह के अनेक मुद्दे हैं जिनपर मैं चर्चा योग्य सोच रखने लगा हूं।  पर उस सब के क्रियान्वयन को ले कर मन में एक गहन उदासीनता है। यह रिटायर्ड जीवन का सच है। व्यक्ति कर्मक्षेत्र में छलांग नहीं लगाना चाहता। कर्मक्षेत्र जो कमिटमेण्ट मांगता है उसमें आशा/निराशा/हर्ष/खिन्नता/थकान सब कुछ है। उसमें रक्तचाप और व्यग्रता की मात्रा में बढ़ना भी निहित है। वह शायद मैं पुन: नहीं चाहता। बहुत हुआ।

हां, पर डेढ़ी यूंही डेड-एण्ड में खत्म नहीं होनी चाहिये। उसकी तार्किक परिणिति नेशनल हाईवे तक पंहुचने की है। और वहां तक पंहुचने के लिये जरूरी है लेवल क्रॉसिंग या रोड-अण्डर-ब्रिज।

देखें, कौन भगीरथ उसे वहां पंहुचाता है।

समय, वर्ग, वर्ण और मैं

गांव में आने पर; उत्तर प्रदेश के सामन्ती अतीत की बदौलत; आसपास जातिगत विभाजन जबरदस्त दिखता है।


समय के साथ साथ समाज भी बदलता गया है मेरे लिये। स्कूली शिक्षा, और उसके बाद विश्वविद्यालयीय शिक्षा में मेरे लिये न कोई वर्ण था, न वर्ग। स्त्री और पुरुष का भी भेद न था – कक्षा में स्त्रियां लगभग थी ही नहीं। मित्रों में हिन्दू, मुसलमान सब थे। पिलानी में गुजराती, मराठी, मदरासी सभी थे। पोस्ट आफिस के डाकिये – महेश जी की हम अपने ताऊजी की तरह इज्जत करते थे। उनके साथ चाय पीते थे। वह शायद सामाजिकता का गोल्डन पीरियड था।

नौकरी, और सरकारी नौकरी में क्लास से बहुत तगड़ा परिचय हुआ। ग्रुप ए, बी, सी, डी में बंट गयी दुनियां। ग्रुप ए में होने के कारण हम अंगरेजों के उत्तराधिकारी थे। शेष सब के लिये डेमी-गॉड सरीखे। शुरु में यही सिखाया गया।

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गांव का पता और ऑनलाइन जरूरतें


amazon-7591ऑनलाइन युग गांव के मेरे पते को उपयुक्त नहीं पाता। शायद इण्डिया, भारत को न पहचानने की जिद सी करता है।

शुरुआत “आधार” से हुई। गांव में शिफ़्ट होने पर मैने अपना पता आधार की साइट पर जा कर बदलने का यत्न किया। अपना पिन कोड भरने पर उसने पते में गांव, पोस्ट, और तहसील लेने के साथ साथ अपनी तरफ़ से कुछ और स्थान चिपका दिये, जिन्हे मैं उस समय जानता ही नहीं था। उनको हटाने पर वह मेरा पता स्वीकार ही नहीं कर रहा था। अत: मेरे अनुसार मेरे आधार(भूत) पते में कुछ अतिरिक्त स्थानों का जिक्र भी है। मसलन, डैइनिया (भूतों के बगीचे) का जिक्र है। जो न भी होता तो काम बखूबी चलता। गूगल मैप ने आधार को शायद बता दिया है कि मेरे पते की पहचान डैइनिया के बगीचे से होती है।

खैर, डाकिया आधार का नया कार्ड उसमें लिखे मेरे पते पर ले आया – अत: वह पता स्वीकार्य मान लिया मैने।

ऑन लाइन खरीद करने पर अलग प्रकार से झंझट आया। कुछ कोरियर कम्पनियां पैकेट बनारस भेज देती थीं, कुछ मिर्जापुर और कुछ इलाहाबाद। अलग अलग स्थानों से कुरियर मुझे फोन कर पूछते थे कि मैं कहां रहता हूं। एक दो को तो मैने कहा कि पैकेट कटका रेलवे स्टेशन पर दे जायें और मैं स्टेशन मास्टर साहब से बाद में उनके पास जा कर ले आऊंगा। इसपर वे राजी नहीं थे। फलत: औसत 4-5 फोन कॉण्टेक्ट के बाद ही वे मेरे घर तक आ पाये। दो-तीन पैकेट तो आ ही न सके। थक कर अमेजन या स्नैपडील ने ऑर्डर केंसिल कर दिया और पैसा रिफ़ण्ड किया। इस में हफ़्तों-महीनों का समय लगा। उस दौरान मुझे धुकधुकी लगती रही कि कहीं पैसे डूब तो नहीं गये (गांव के पते पर कैश-ऑन-डिलिवरी का विकल्प नहीं है)। पैसे फंसे रहे, सो अलग।

हां, स्पीडपोस्ट से भेजा सभी सामान समय से और बिना विश्व-भ्रमण किये मुझे मिलता रहा है। सबसे ज्यादा दुर्गति तो “गति” नामक कोरियर कम्पनी से हुई।

अभी एक ऑनलाइन पुस्तक बेचक ने पैकेट न मिलने के तकाजे पर ई-मेल भेजा है –

Dear Sir, We regret the inconvenience caused. Your copy was sent by DTDC courier and they returned it due to no service. We will be sending it back by speed post.

DTDC जरूर कोई शहराती कुरियर कम्पनी होगी। उन्हे गांव की पगडण्डियों का अन्दाज नहीं है शायद।


आप कह सकते हैं कि अपने पते को लेकर, या ऑनलाइन खरीद को ले कर मैं इतना फसी क्यूं हूं। पास के रमेश तेली या बलवन्त सेठ की दुकान से सामान खरीद कर संतुष्ट क्यों नहीं हो जाता। क्यों इण्टरनेट कनेक्शन और उनकी वेब साइटों के चक्कर में रहता हूं। क्यों अंगरेजी के आधा दर्जन अखबार पढ़ना चाहता हूं। क्यों गांव में आने वाले अमर उजाला या जागरण के प्रिण्ट एडीशन से काम चला लेता।

मैं शायद स्प्लिट पर्सनालिटी हूं। बिना एयर कण्डीशनर के रहने के प्रयोग तो करना चाहता हूं। पर किण्डल पर दन्न से खरीद कर डाउनलोड हुई ताजा पुस्तक मुझे बहुत लुभाती है। वह मेरे लिये लग्जरी नहीं, आवश्यकता बन गयी है।


ICICI Bank Form Address Change

मेरा खाता आई.सी.आई.सी.आई. बैंक में है। साहब लोगों का बैंक। उसके रिलेशनशिप मैनेजर तो बड़े अच्छे हैं। सहायता करने के लिये मेरे घर तक आये कई बार। जी हां; बनारस से 45 किमी दूर गांव में। पर उनके बैंक की साइट पर अपना पता सही करने में जो मशक्कत अभी तक कर रहा हूं, वह मैं ही जानता हूं। पता भरने के लिये उसकी साइट मकान/फ्लैट नम्बर, माला और बिल्डिण्ग नम्बर/नाम और गली नम्बर, मुहल्ला, शहर आदि मांगती है। वह सब गांव में होता ही नहीं। उत्तर प्रदेश के भदोही जैसे भुच्च जिले को तो अपने ऑप्शन में दिखाती ही नहीं वह साइट। “लालता पण्डित की बखरी के पूरब का मकान” जैसा इनपुट वह लेती ही नहीं।

ले दे कर जो पता बैंक की साइट पर आ सका है, उसे मैने अपने डाकिये – रमापति – को ध्यान से नोट करा दिया है कि इस तरह के ऊट-पटांग लिखे पते वाली कोई भी चिठ्ठी हो, मुझे दे जाये। इस सब के लिये रमापति से बड़े आत्मीय संबन्ध बनाने पड़े मुझे। उनके बारे मे जितनी जानकारी ली मैने कि उसके आधार पर एक-दो बड़े आकार की ब्लॉग पोस्टें लिखी जा सकती हैं। यह भी सुनिश्चित हो गया कि इस इलाके के डाकिया, रिटायर होने तक, रमापति ही रहेंगे।

मिलने आने वाले शहरी लोगों के लिये मैने अपना फोन नम्बर देने के साथ साथ ह्वाट्स-एप्प पर एक नक्शे सहित रास्ते का विस्तृत विवरण भेजना प्रारम्भ किया। पर कई बार लोग फिर भी फड़फड़ी खाते जब मेरे घर पंहुचे तो पता चला कि ह्वाट्सएप्प खोल कर उन्होने मेरा संदेश पढ़ा ही न था।

खैर; साल भर से ऊपर हो गया। यहां रहते बहुत से लोग जानने लगे हैं। एक दो कुरियर वाले भी पहचान गये हैं। डाकिया जी तो घरेलू से हो गये हैं। गांव के पते को ऑनलाइन जगत हिकारत से भले देखता हो, मेरा काम चल जा रहा है।

आशा है, भविष्य में बेहतर ही होगा, उत्तरोत्तर। गंवई बनने की जिद जो है मेरी। अपनी शर्तों पर रहता रिटायर्ड आदमी। … काश कभी यह हो कि मेरे नाम और जिले के नाम/पिनकोड भर से चिठ्ठी/पैकेट मुझे मिलने लगें। इलाके में उतना फ़ेमस बनने का ख्वाब पालना कोई बुरा ख्वाब नहीं है!

यद्यपि, यह पक्का है कि शहर और गांव की कशमकश में गांव आगे और तेजी से हारने वाले हैं। यह हारना केवल डाक पते की पहचान से कहीं ज्यादा गहरा होगा। बिना किसी संशय के। अगर गांव को जीतना है (या प्रासंगिक रहना है) तो खुद को री-इन्वेण्ट करना होगा। शहर की अनेक्सी की तरह नहीं चल पायेंगे गांव।