पेण्ट माई सिटी प्रॉजेक्ट, प्रयागराज


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प्रयागराज गया था मैं पिछले मंगलवार। ढाई दिन रहा। शिवकुटी का कोटेश्वर महादेव का इलाका बहुत सुन्दर चित्रों वाली दीवालों से उकेरा हुआ था। पहले यह बदरंग पोस्टरों से लदा होता था। बड़ा सुन्दर था यह काम।

(अर्ध) कुम्भ मेला तीन महीने में होगा प्रयागराज में। कई शताब्दियों बाद शहर का नाम पुन: प्रयागराज हुआ है। शिवकुटी में जो भी लोग मिले, सबने कहा कि मैं मेले के समय प्रयाग में ही रहूं। ये चित्र देख कर जोश मुझे भी आ रहा था कि प्रयागराज में अगले कुम्भ मेले के दौरान रहना अच्छा अनुभव होगा। Continue reading “पेण्ट माई सिटी प्रॉजेक्ट, प्रयागराज”

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घुरहू मुसहर से बातचीत


IMG_20180330_072020-02.jpgकरहर में महुआ के पेड़ के नीचे बैठा मिला घुरहू। पास में एक करीब 10 फुट की लग्गी (पेड़ से पत्ते तोड़ने की पतले बांस की चोंच जुड़ी डण्डी) पड़ी थी। साथ में उसकी पत्नी और एक कम्बल। पत्नी पास के किसी नल से अपने बरतनों में पानी भरकर लाई थी। बरतन में था एक अल्यूमिनियम की बटुली, एल लोटा, एक तसली और एक कडछुल। घुरहू के पास चप्पल थी, पत्नी बिना चप्पल के दिख रही थी।

उसने बताया कि कल से कटका स्टेशन पर डेरा डाल रखा है। रहने वाला कपसेटी के पास किसी गांव का है। कपसेटी यहां से करीब 25 किलोमीटर दूर है। वहां गांव में कोई बाबू साहब बड़े जम्मींदार हैं। पचास बीघे के काश्तकार। उन्होने रहने को जगह दी है। भारत सरकार ने मकान भी दिया है बनवा कर। मां बाप वहां रहते हैं। घुरहू की पत्नी ने बताया कि एक आठ-दस साल की बच्ची भी है उनकी। गांव में मा-बाप के पास रख छोड़ी है। पत्तियां बीनने के लिये दर दर घूमने में उस बच्ची को साथ ले कर चलना कठिन काम था।

आजकल महुआ की ताजा पत्तियां नहीं हैं। तोडने में ज्यादा नहीं मिलतीं तो सूखी पत्तियां बीन कर पानी में गीला कर तह लगाते हैं वे मुसहर लोग। शाम तक जितनी इकठ्ठा हो जाती हैं, वह ले कर ट्रेन में बैठ जाते हैं और अगले दिन सवेरे बनारस में बेच कर वापस लौटते हैं। घुरहू ने जब यह बताया तो मझे स्पष्ट हुआ कि रेलवे स्टेशन पर डेरा क्यों जमाते हैं ये मुसहर। रेलवे की बिना टिकट बनारस आने जाने की सुविधा उनके जीवन यापन का महत्वपूर्ण अंग है।

जैसा घुरहू ने बताया – रोज करीब 150-200 रुपया कमा लेते हैं वे दोनो मिल कर।

मैने पूछा – आधार कार्ड है तुम्हारा?

घुरहू ने बताया कि है पर बाबू साहब के यहां रखा है। बैंक अकाउण्ट नहीं है। थोड़ा मायूस सी हंसी हंस कर वह बोला – पैसा है ही कितना कि बैंक अकाउण्ट की जरूरत पड़े!

पत्तियां बीनते हुये इलाहाबाद के आसपास तक भी चले जाते हैं ये घुमन्तू मुसहर। घुरहू ने बताया कि पान के लिये महुआ की पत्तियां बीनने के अलावा और जो भी काम मिल जाता है, वह कर लेते हैं। लोग गेंहूं-धान की कटाई के लिये हजार – डेढ हजार रुपये बीघा के हिसाब से ठेका भी लेते हैं। उस काम में कटाई के साथ साथ गट्ठर बनाना शामिल होता है। बकौल घुरहू, वे मेहनत से ही कमाते हैं, पर मेहनत से मिलता बहुत कम है।

अन्य मुसहरों की बजाय घुरहू और उसकी पत्नी ज्यादा जागरूक नजर आये। उनमें अपनी दशा से ऊपर उठने की एक चिनगारी मुझे दिखी। पर में पक्का नहीं कह सकता कि वह चिनगारी वास्तव में थी, या मात्र मेरी सोच में।

चलते चलते मैने उन दोनों को चाय पीने के पैसे दिये और उन्होने प्रसन्न हो कर अपना धन्यवाद व्यक्त किया।IMG_20180330_072259

 

डेढी और लेवल क्रासिंग की जरूरत


डेढ़ी – डेढ़ किलोमीटर लम्बी सड़क जो उत्तर में रेलवे लाइन और दक्षिण में गंगा किनारे के गांव द्वारिकापुर के बीच है और जिसके पूर्व में मिर्जापुर, पश्चिम में भदोही जिले के गांव हैं; के बारे में कल मैने बताना शुरू किया था। मेरा विचार है कि इस सड़क के माध्यम से गांव के जीवन की बहुत सी बातें मैं देख/समझ/बता पाऊंगा। इस सड़क पर रोज सवेरे मैं 8-9 किलोमीटर साइकिल चलाता हूं। डेढ़ी के लगभग तीन चक्कर। घर से सात बजे निकलता हूं – उदर में दो कप चाय डाल कर। बटोही (अपनी साइकिल) को एक बोतल पानी थमाता हूं। जस्ट इन केस प्यास लग जाये!

उत्तर छोर पर डेढ़ी रेलवे लाइन के पहले ठिठक कर खत्म हो जाती है। उसके आगे और दांये, बांये रेलवे की जमीन है। डेढ़ी के भगीरथ – परधान लोग अपनी सीमा में ही डेढ़ी के बहाव को तय कर सकते हैं। रेलवे पर जोर नहीं उनका।

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एक महिला थैले में अपना सामान ले कर मुझसे आगे चल रही थी डेढ़ी पर।

एक महिला थैले में अपना सामान ले कर मुझसे आगे चल रही थी डेढ़ी पर। उसे रेल लाइन के उस पार जाना था। मेरे सामने पटरी पार की उसने।DSCN0412

उसी समय दूसरी ओर से एक ग्रामीण को इस पार आने के लिये अपनी साइकिल पटरी पर कुदाते देखा।

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उसी समय दूसरी ओर से एक ग्रामीण को इस पार आने के लिये अपनी साइकिल पटरी पर कुदाते देखा।

डेढ़ी के सामने कटका रेलवे स्टेशन का शण्टिंग नेक का छोर दिखता है। अगर स्टेशन की लूप लाइन को चीरता लेवल क्रासिंग इस जगह पर शिफ़्ट कर दिया जाये तो स्टेशन सेक्शन के लेवल क्रासिंग को ब्लॉक सेक्शन में किया जा सकता है। रेलवे यातायात के लिये ज्यादा सुरक्षित विकल्प होगा वह। वर्तमान के लेवल क्रासिंग नम्बर 23 से इस जगह के बीच अपनी जमीन पर लगभग 400 मीटर पतली सड़क जरूर बना कर देनी होगी रेलवे को। और डेढ़ी के ग्रेडियेण्ट (समतल से ऊंचाई) को भी अगर टटोला जाये तो शायद नई जगह पर लेवल क्रासिंग की बजाय रोड-अन्डर-ब्रिज (पुलिया) बनाई जा सके शायद। वह रेलवे की लेवल क्रासिंग खत्म करने की पॉलिसी के अनुरूप होगा। अभी रेलवे लाइन का दोहरीकरण का काम चल रहा है। उस दशा में यह और भी ज्यादा सुरक्षित रेल यातायात का निमित्त होगा। गांव और रेल – दोनो के लिये विन-विन सिचयुयेशन।

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रेलवे फाटक की स्थिति और प्रस्ताव

मैं अगर रेल सेवा में होता तो यह करा पाना मेरे लिये बहुत सरल होता। अब मैं सुझाव भर दे सकता हूं। आसपास के चार-पांच प्रधान लोग, लोकल एमएलए/सांसद यह काम करा सकते हैं। शायद मण्डल रेल प्रबन्धक इसपर ध्यान दे सकें। पर इन सब प्रकार के जीवों के लिये फैज़ की वह नज्म है न! “और भी गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा।“ मुहब्बत की जगह रेलवे क्रासिंग और डेढ़ी पढ़ें! 😊

लेवल क्रासिंग तो एक मुद्दा है। इसी तरह के अनेक मुद्दे हैं जिनपर मैं चर्चा योग्य सोच रखने लगा हूं।  पर उस सब के क्रियान्वयन को ले कर मन में एक गहन उदासीनता है। यह रिटायर्ड जीवन का सच है। व्यक्ति कर्मक्षेत्र में छलांग नहीं लगाना चाहता। कर्मक्षेत्र जो कमिटमेण्ट मांगता है उसमें आशा/निराशा/हर्ष/खिन्नता/थकान सब कुछ है। उसमें रक्तचाप और व्यग्रता की मात्रा में बढ़ना भी निहित है। वह शायद मैं पुन: नहीं चाहता। बहुत हुआ।

हां, पर डेढ़ी यूंही डेड-एण्ड में खत्म नहीं होनी चाहिये। उसकी तार्किक परिणिति नेशनल हाईवे तक पंहुचने की है। और वहां तक पंहुचने के लिये जरूरी है लेवल क्रॉसिंग या रोड-अण्डर-ब्रिज।

देखें, कौन भगीरथ उसे वहां पंहुचाता है।

समय, वर्ग, वर्ण और मैं

गांव में आने पर; उत्तर प्रदेश के सामन्ती अतीत की बदौलत; आसपास जातिगत विभाजन जबरदस्त दिखता है।


समय के साथ साथ समाज भी बदलता गया है मेरे लिये। स्कूली शिक्षा, और उसके बाद विश्वविद्यालयीय शिक्षा में मेरे लिये न कोई वर्ण था, न वर्ग। स्त्री और पुरुष का भी भेद न था – कक्षा में स्त्रियां लगभग थी ही नहीं। मित्रों में हिन्दू, मुसलमान सब थे। पिलानी में गुजराती, मराठी, मदरासी सभी थे। पोस्ट आफिस के डाकिये – महेश जी की हम अपने ताऊजी की तरह इज्जत करते थे। उनके साथ चाय पीते थे। वह शायद सामाजिकता का गोल्डन पीरियड था।

नौकरी, और सरकारी नौकरी में क्लास से बहुत तगड़ा परिचय हुआ। ग्रुप ए, बी, सी, डी में बंट गयी दुनियां। ग्रुप ए में होने के कारण हम अंगरेजों के उत्तराधिकारी थे। शेष सब के लिये डेमी-गॉड सरीखे। शुरु में यही सिखाया गया।

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गांव का पता और ऑनलाइन जरूरतें


amazon-7591ऑनलाइन युग गांव के मेरे पते को उपयुक्त नहीं पाता। शायद इण्डिया, भारत को न पहचानने की जिद सी करता है।

शुरुआत “आधार” से हुई। गांव में शिफ़्ट होने पर मैने अपना पता आधार की साइट पर जा कर बदलने का यत्न किया। अपना पिन कोड भरने पर उसने पते में गांव, पोस्ट, और तहसील लेने के साथ साथ अपनी तरफ़ से कुछ और स्थान चिपका दिये, जिन्हे मैं उस समय जानता ही नहीं था। उनको हटाने पर वह मेरा पता स्वीकार ही नहीं कर रहा था। अत: मेरे अनुसार मेरे आधार(भूत) पते में कुछ अतिरिक्त स्थानों का जिक्र भी है। मसलन, डैइनिया (भूतों के बगीचे) का जिक्र है। जो न भी होता तो काम बखूबी चलता। गूगल मैप ने आधार को शायद बता दिया है कि मेरे पते की पहचान डैइनिया के बगीचे से होती है।

खैर, डाकिया आधार का नया कार्ड उसमें लिखे मेरे पते पर ले आया – अत: वह पता स्वीकार्य मान लिया मैने।

ऑन लाइन खरीद करने पर अलग प्रकार से झंझट आया। कुछ कोरियर कम्पनियां पैकेट बनारस भेज देती थीं, कुछ मिर्जापुर और कुछ इलाहाबाद। अलग अलग स्थानों से कुरियर मुझे फोन कर पूछते थे कि मैं कहां रहता हूं। एक दो को तो मैने कहा कि पैकेट कटका रेलवे स्टेशन पर दे जायें और मैं स्टेशन मास्टर साहब से बाद में उनके पास जा कर ले आऊंगा। इसपर वे राजी नहीं थे। फलत: औसत 4-5 फोन कॉण्टेक्ट के बाद ही वे मेरे घर तक आ पाये। दो-तीन पैकेट तो आ ही न सके। थक कर अमेजन या स्नैपडील ने ऑर्डर केंसिल कर दिया और पैसा रिफ़ण्ड किया। इस में हफ़्तों-महीनों का समय लगा। उस दौरान मुझे धुकधुकी लगती रही कि कहीं पैसे डूब तो नहीं गये (गांव के पते पर कैश-ऑन-डिलिवरी का विकल्प नहीं है)। पैसे फंसे रहे, सो अलग।

हां, स्पीडपोस्ट से भेजा सभी सामान समय से और बिना विश्व-भ्रमण किये मुझे मिलता रहा है। सबसे ज्यादा दुर्गति तो “गति” नामक कोरियर कम्पनी से हुई।

अभी एक ऑनलाइन पुस्तक बेचक ने पैकेट न मिलने के तकाजे पर ई-मेल भेजा है –

Dear Sir, We regret the inconvenience caused. Your copy was sent by DTDC courier and they returned it due to no service. We will be sending it back by speed post.

DTDC जरूर कोई शहराती कुरियर कम्पनी होगी। उन्हे गांव की पगडण्डियों का अन्दाज नहीं है शायद।


आप कह सकते हैं कि अपने पते को लेकर, या ऑनलाइन खरीद को ले कर मैं इतना फसी क्यूं हूं। पास के रमेश तेली या बलवन्त सेठ की दुकान से सामान खरीद कर संतुष्ट क्यों नहीं हो जाता। क्यों इण्टरनेट कनेक्शन और उनकी वेब साइटों के चक्कर में रहता हूं। क्यों अंगरेजी के आधा दर्जन अखबार पढ़ना चाहता हूं। क्यों गांव में आने वाले अमर उजाला या जागरण के प्रिण्ट एडीशन से काम चला लेता।

मैं शायद स्प्लिट पर्सनालिटी हूं। बिना एयर कण्डीशनर के रहने के प्रयोग तो करना चाहता हूं। पर किण्डल पर दन्न से खरीद कर डाउनलोड हुई ताजा पुस्तक मुझे बहुत लुभाती है। वह मेरे लिये लग्जरी नहीं, आवश्यकता बन गयी है।


ICICI Bank Form Address Change

मेरा खाता आई.सी.आई.सी.आई. बैंक में है। साहब लोगों का बैंक। उसके रिलेशनशिप मैनेजर तो बड़े अच्छे हैं। सहायता करने के लिये मेरे घर तक आये कई बार। जी हां; बनारस से 45 किमी दूर गांव में। पर उनके बैंक की साइट पर अपना पता सही करने में जो मशक्कत अभी तक कर रहा हूं, वह मैं ही जानता हूं। पता भरने के लिये उसकी साइट मकान/फ्लैट नम्बर, माला और बिल्डिण्ग नम्बर/नाम और गली नम्बर, मुहल्ला, शहर आदि मांगती है। वह सब गांव में होता ही नहीं। उत्तर प्रदेश के भदोही जैसे भुच्च जिले को तो अपने ऑप्शन में दिखाती ही नहीं वह साइट। “लालता पण्डित की बखरी के पूरब का मकान” जैसा इनपुट वह लेती ही नहीं।

ले दे कर जो पता बैंक की साइट पर आ सका है, उसे मैने अपने डाकिये – रमापति – को ध्यान से नोट करा दिया है कि इस तरह के ऊट-पटांग लिखे पते वाली कोई भी चिठ्ठी हो, मुझे दे जाये। इस सब के लिये रमापति से बड़े आत्मीय संबन्ध बनाने पड़े मुझे। उनके बारे मे जितनी जानकारी ली मैने कि उसके आधार पर एक-दो बड़े आकार की ब्लॉग पोस्टें लिखी जा सकती हैं। यह भी सुनिश्चित हो गया कि इस इलाके के डाकिया, रिटायर होने तक, रमापति ही रहेंगे।

मिलने आने वाले शहरी लोगों के लिये मैने अपना फोन नम्बर देने के साथ साथ ह्वाट्स-एप्प पर एक नक्शे सहित रास्ते का विस्तृत विवरण भेजना प्रारम्भ किया। पर कई बार लोग फिर भी फड़फड़ी खाते जब मेरे घर पंहुचे तो पता चला कि ह्वाट्सएप्प खोल कर उन्होने मेरा संदेश पढ़ा ही न था।

खैर; साल भर से ऊपर हो गया। यहां रहते बहुत से लोग जानने लगे हैं। एक दो कुरियर वाले भी पहचान गये हैं। डाकिया जी तो घरेलू से हो गये हैं। गांव के पते को ऑनलाइन जगत हिकारत से भले देखता हो, मेरा काम चल जा रहा है।

आशा है, भविष्य में बेहतर ही होगा, उत्तरोत्तर। गंवई बनने की जिद जो है मेरी। अपनी शर्तों पर रहता रिटायर्ड आदमी। … काश कभी यह हो कि मेरे नाम और जिले के नाम/पिनकोड भर से चिठ्ठी/पैकेट मुझे मिलने लगें। इलाके में उतना फ़ेमस बनने का ख्वाब पालना कोई बुरा ख्वाब नहीं है!

यद्यपि, यह पक्का है कि शहर और गांव की कशमकश में गांव आगे और तेजी से हारने वाले हैं। यह हारना केवल डाक पते की पहचान से कहीं ज्यादा गहरा होगा। बिना किसी संशय के। अगर गांव को जीतना है (या प्रासंगिक रहना है) तो खुद को री-इन्वेण्ट करना होगा। शहर की अनेक्सी की तरह नहीं चल पायेंगे गांव।

मिश्री पाल की भेड़ें


GDFeb164606-01गड़रिया हैं मिश्री पाल। यहीं पास के गांव पटखौली के हैं। करीब डेढ़ सौ भेड़ें हैं उनके पास। परिवार के तीन लोग दिन भर चराते हैं उनको आसपास।

मुझे मिले कटका रेलवे स्टेशन की पटरियों के पास अपने रेवड़ के साथ। भेड़ें अभी ताजा ऊन निकाली लग रही थीं। हर एक बेतरतीब बुचेड़ी हुई। उन्होने बताया कि साल में तीन बार उतरता है उनका ऊन। इस बार करीब चालीस किलो निकला।

मिश्री पाल ने बताया – बहुत कम दाम मिलते हैं ऊन के। खरीदने वाला 8रुपये किलो खरीद ले जाता है।

यह तो बहुत कम दाम हुये। आलू के भाव। – मैने अपना मत व्यक्त किया।

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“हां, बहुत कम है। पर और कोई काम नहीं। दिन भर चराते हैं। देखभाल करनी पड़ती है।” मिश्री पाल ने कहा कि वे भेड़ें बेचने का धन्धा नहीं करते। पर मुझे लगा कि यह गड़रिये का काम अगर भेड़ें बेचने पर आर्धारित नहीं है तो मात्र ऊन के आधार पर किसी भी प्रकार से सस्टेन नहीं किया जा सकता। गड़रिया के काम में पैसा कहां और किस मद में आता है; मैं यह सोचने में लग गया। 

मिश्री पाल के पास बैल भी हैं। बैलों को वे हल चलाने के लिये किराये पर देते हैं। आजकल किसान बैल नहीं रखते। अगर जोत बहुत छोटी है, या जगह ऐसी, जहां ट्रेक्टर नहीं जा सकता, तो वहां हल का प्रयोग करते हैं। वहां मिश्री पाल के बैल काम आते हैं।

देहात में बहुत से लोग; जिनके पास जमीन नहीं है; भेड़, बकरी, सूअर, गाय, भैंस आदि पाल कर उनके दूध, ऊन, मांस आदि से अपना जीवन यापन करते हैं। उनके रहन सहन को देख कर लगता है कि उन्हें गरीब तो जरूर माना जायेगा; पर आर्थिक आधार पर कम जोत वाले किसानों की अपेक्षा बहुत विपन्न हों – वैसा भी नहीं है। मुझे लगा कि कभी पटखौली जा कर मिश्री पाल का जीवन देखना चाहिये।

कितनी ही अच्छी पुस्तके गड़रियों के घुमन्तू जीवन के आधार पर लिखी गयी हैं। कई देशों और महाद्वीपों में यात्रा करते गड़रिये। मिश्री पाल वैसे तो नहीं हैं; पर छोटे मोटे स्तर पर घुमन्तू तो हैं ही।

मैं मिश्री पाल का चित्र ले चलने लगा। सांझ हो गयी थी। मिश्री पाल भी अपने गांव लौट रहे होंगे अपने रेवड़ के साथ। वे और उनके साथी डण्डा फटकारते हुये, हट्ट-हट्ट की ध्वनि निकालते अपनी भेड़ें साधने में लग गये।

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सब्जी भाजी का बगीचा


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उस घर के बाहर बांस की खपच्चियों वाली बाड़ के बगीचे को साइकल से आते जाते रोज देखता था। आज वहां पैदल गया। वहां पंहुचने के लिए पगडंडी पर लगभग 100 मीटर चलना था। उसके बाद मिले शिवमूर्ति। शिवमूर्ति पड़ोसी हैं पर उनके पास भी अच्छा सब्जी भाजी का बगीचा है।

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शकरकंद,  बैगन, मिर्च,  आलू, धनिया, लहसुन आदि अनेक सब्जियों की क्यारियां।

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बांस की खपच्चियों की बाड़ राजेन्द्र प्रसाद जी ने लगाई थी। नीलगाय के आतंक से निपटने के लिए। उन्होंने बताया कि ये खपच्चियां भी कई बार नहीं रोक पातीं नीलगायों को। वे घुस आती हैं। पिछली बार आम्रपाली आम की फुनगी चर गयी थीं। बैगन के फल खा लिए थे। अच्छे और बड़े फल ही खाती हैं वे – राजेन्द्र प्रसाद ने बताया।
हमें देख वहां अच्छी खासी भीड़ जमा हो गयी थी। सभी नीलगाय को अपने जीवन का प्रतिद्वंद्वी मान रहे थे। कभी भी आ जाती हैं वे। ऊंचा उछल कर आ जाती हैं। बाड़ में नीचे से झुक कर भी प्रवेश कर जाती हैं। दुलत्ती बहुत तेज झाड़ती हैं। सांवले नर नीलगाय टी बहुत ही खूंखार हैं।
बच्चे भी नीलगायों के बारे में बात करते आवेश से भर जाते लगे।
राजेन्द्र प्रसाद ने बताया कि वे कलकत्ता में जल निगम में काम करते हैं। नौकरी में कुछ अड़चन आ गयी है, सो पिछले पांच छ साल से गाँव में ही हैं। कई आम और नींबू के गाछ वे कलकत्ता से ही ले कर आये हैं। उनके सहकर्मी यहाँ आते रहते हैं बंगाल से। यहाँ आ कर बनारस और प्रयाग घूम कर जाते हैं। उनके बगीचे से नींबू आदि ले जाते हैं।
राजेन्द्र प्रसाद ने हमें दो बड़े प्रकार के नींबू के फल दिए। उनमे से एक अण्डाकार था। राजेन्द्र ने बताया कि उसे गंधराज कहते हैं। हल्का खट्टा होता है वह। बड़ी अच्छी सुगंध थी फल में। शायद इसी कारण से उसका नाम है गंधराज।

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राजेन्द्र के पास दो बिस्सा जमीन में बगिया है और उसके अलावा उनके पास दो गायें हैं। लगभग यही हम भी रखना चाहते हैं गाँव में। मैंने राजेन्द्र से कहा कि उनसे बगीचे और गाय पालने के बारे में सलाह लेने आते रहेंगे।
वे लोग मेरे पहले के काम के बारे में पूछते थे। मैंने बताया कि मैं ट्रेन हांकता था। ज्यादा समझ नहीं पाये वे मेरे काम के बारे में। रेलवे में उनका इंटरेक्शन फिटर खलासी या स्टेशन स्टाफ से हुआ है। उससे मेरे काम का अनुमान लगाना सम्भव नहीं अनुमान कराना भी शायद व्यर्थ है। हल्का सा भी अनुमान होने पर अपेक्षा होने लगती है कि मैं कोई नौकरी दिलवा दूंगा। वह मेरे बस में नहीं!
मैं उन लोगों से विदा मांग कर आया। भविष्य में उनसे मिलता रहूँगा।

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