माधव सदाशिव गोलवलकर और वर्गीज़ कुरियन


‘I Too Had a Dream’ by Verghese Kurien

वर्गीज़ कुरियन की पुस्तक – ’आई टू हैड अ ड्रीम’ में एक प्रसंग माधव सदाशिवराव गोलवलकर ’गुरुजी” के बारे में है। ये दोनों उस समिति में थे जो सरकार ने गौ वध निषेध के बारे में सन् १९६७ में बनाई थी। इस समिति ने बारह साल व्यतीत किये। अन्त में मोरारजी देसाई के प्रधानमन्त्रित्व के दौरान यह बिना किसी रिपोर्ट बनाये/पेश किये भंग भी हो गयी।

मैं श्री कुरियन के शब्द उठाता हूं उनकी किताब से –

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पर एक आकस्मिक और विचित्र सी बात हुई हमारी नियमित बैठकों में। गोलवलकर और मैं बड़े गहरे मित्र बन गये। लोगों को यह देख कर घोर आश्चर्य होता था कि जब भी गोलवलकर कमरे में मुझे आते देखते थे, वे तेजी से उठ कर मुझे बाहों में भर लेते थे। …

गोलवलकर छोटे कद के थे। बमुश्किल पांच फीट। पर जब वे गुस्सा हो जाते थे तो उनकी आंखें आग बरसाती थीं। जिस बात ने मुझे बहुत प्रभावित किया वह थी उनका अत्यन्त देशभक्त भारतीय होना। आप यह कह सकते हैं कि वे अपनी ब्राण्ड का राष्ट्रवाद फैला रहे थे और वह  भी गलत तरीके से, पर आप उनकी निष्ठा पर कभी शक नहीं कर सकते थे। एक दिन जब उन्होने पूरे जोश और भावना के साथ बैठक में गौ वध का विरोध किया था, वे मेरे पास आये और बोले – कुरियन, मैं तुम्हें बताऊं कि मैं गौ वध को इतना बड़ा मुद्दा क्यों बना रहा हूं?

मैने कहा, हां आप कृपया बतायें। क्यों कि, अन्यथा आप बहुत बुद्धिमान व्यक्ति हैं। आप ऐसा क्यों कर रहे हैं?

माधव सदाशिवराव गोलवलकर ’गुरुजी’

“मैने गौ वध निषेध पर अपना आवेदन असल में सरकार को परेशानी में डालने के लिये किया था।’ उन्होने मुझे अकेले में बताना शुरू किया। “मैने निश्चय किया कि मैं दस लाख लोगों के हस्ताक्षर एकत्रित कर राष्ट्रपति जी को ज्ञापन दूंगा। इस सन्दर्भ में मैने देश भर में यात्रायें की; यह जानने के लिये कि हस्ताक्षर इकठ्ठे करने का काम कैसे चल रहा है। इस काम में मैं उत्तर प्रदेश के एक गांव में गया। वहां मैने देखा कि एक महिला ने अपने पति को भोजन करा कर काम पर जाने के लिये विदा किया और अपने दो बच्चों को स्कूल के लिये भेज कर तपती दुपहरी में घर घर हस्ताक्षर इकठ्ठा करने चल दी। मुझे जिज्ञासा हुई कि यह महिला इस काम में इतना श्रम क्यों कर रही है? वह बहुत जुनूनी महिला नहीं थी। मैने सोचा तब भान हुआ कि यह वह अपनी गाय के लिये कर रही थी – जो उसकी रोजी-रोटी थी। तब मुझे समझ आया कि गाय में लोगों को संगठित करने की कितनी शक्ति है।”

“देखो, हमारे देश का क्या हाल हो गया है। जो विदेशी है, वह अच्छा है। जो देशी है वह बुरा। कौन अच्छा भारतीय है? वह जो कोट-पतलून पहनता है और हैट लगाता है। कौन बेकार भारतीय है? वह जो धोती पहनता है। वह देश जो अपने होने में गर्व नहीं महसूस करता और दूसरों की नकल करता है, वह कैसे कुछ बन सकता है? तब मुझे लगा कि गाय में देश को एक सूत्र में बांधने की ताकत है। वह भारत की संस्कृति का प्रतीक है। इस लिये कुरियन इस समिति में तुम मेरी गौ वध विरोध की बात का समर्थन करो तो भारत पांच साल में संगठित हो सकता है। … मैं जो कहना चाहता हूं, वह यह है कि गौ वध निषेध की बात कर मैं मूर्ख नहीं हूं, और न ही मैं धर्मोन्मादी हूं। मै  ठण्डे मन से यह कह रहा हूं – मैं गाय का उपयोग अपने लोगों की भारतीयता जगाने में करना चाहता हूं। इस लिये इस काम में मेरी सहायता करो।”

खैर, मैने गोलवलकर की इस बात से न तो सहमति जताई और न उस समिति में उनका समर्थन किया। पर मुझे यह पक्का यकीन हो गया कि वे अपने तरीके से लोगों में भारतीयता और भारत के प्रति गर्व जगाना चाह रहे थे। उनके व्यक्तित्व के इस पक्ष ने मुझे बहुत प्रभावित किया। ये वह गोलवलकर थे, जिन्हे मैने जाना। लोगों ने उन्हे महात्मा गांधी की हत्या का षडयंत्र रचने वाला कहा, पर मैं इस में कभी यकीन नहीं कर पाया। मुझे वे हमेशा एक ईमानदार और स्पष्टवक्ता लगे और मुझे यह हमेशा लगता रहा कि अगर वे एक कट्टरवादी हिन्दू धर्मोन्मादी होते तो वे कभी मेरे मित्र नहीं बन सकते थे।

अपनी जिन्दगी के अन्तिम दिनों में, जब वे बीमार थे और पूना में थे, तो उन्होने देश भर से राष्ट्रीय स्वयम् सेवक संघ के राज्य प्रमुखों को पूना बुलाया। वे जानते थे कि वे जाने वाले हैं। जब उनका देहावसान हो गया तब कुछ दिनों बाद मेरे दफ्तर में उनमें से एक सज्जन मुझसे मिलने आये। “श्रीमान् मैं गुजरात का आरएसएस प्रमुख हूं”, उन्होने अपना परिचय देते हुये कहा – “आप जानते होंगे कि गुरुजी अब नहीं रहे। उन्होने हम सब को पूना बुलाया था। जब मैने बताया कि मैं गुजरात से हूं तो उन्होने मुझसे कहा कि “वापस जा कर आणद जाना और मेरी ओर से कुरियन को विशेष रूप से मेरा आशीर्वाद कहना।” मैं आपको गुरुजी का संदेश देने आया हूं।”

मैं पूरी तरह अभिभूत हो गया। उन्हे धन्यवाद दिया और सोच रहा था कि वे सज्जन चले जायेंगे। पर वे रुके और कहने लगे – “सर, आप ईसाई हैं। पर गुजरात में सभी लोगों में से केवल आपको ही अपना आशीर्वाद क्यों भेजा होगा गुरुजी ने?”

मैने उनसे कहा कि आपने यह गुरुजी से क्यों नहीं पूछा? मैं उन्हे कोई उत्तर न दे सका, क्यों कि मेरे पास कोई उत्तर था ही नहीं!


श्री कुरियन की पुस्तक का यह अंश मुझे बाध्य कर गया कि मैं अपनी (जैसी तैसी) हिन्दी में उसका अनुवाद प्रस्तुत करूं। यह अंश गोलवलकर जी के बारे में जो नेगेटिव नजरिया कथित सेकुलर लोग प्रचारित करते हैं, उसकी असलियत दिखलाता है।

उस पुस्तक में अनेक अंश हैं, जिनके बारे में मैंने पुस्तक पढ़ने के दौरान लिखना या अनुवाद करना चाहा। पर वह करने की ऊर्जा नहीं है मुझमें। शायद हिन्दी ब्लॉगिंग का प्रारम्भिक दौर होता और मैं पर्याप्त सक्रिय होता तो एक दो पोस्टें और लिखता। फिलहाल यही अनुंशंसा करूंगा कि आप यह पुस्तक पढें।

मेरा अपना मत है कि साठ-सत्तर के दशक में भारतीय समाज को गाय के मुद्दे पर एक सूत्र में बांधा जा सकता था। अब वह स्थिति नहीं है। अब गाय या गंगा लोगों को उद्वेलित नहीं करते।

[कुरियन गौ वध निषेध के पक्षधर नहीं थे। वे यह मानते थे कि अक्षम गायों को हटाना जरूरी है, जिससे (पहले से ही कम) संसाधनों का उपयोग स्वस्थ और उत्पादक पशुओं के लिये हो सके; जो डेयरी उद्योग की सफलता के लिये अनिवार्य है। हां, वे उत्पादक गायों के वध निषेध के पक्ष में स्टेण्ड लेने को तैयार थे।]

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ज़कात कैल्क्युलेटर


मेरे सहकर्मी श्री मंसूर अहमद आजकल रोज़ा रख रहे हैँ। इस रमज़ान के महीने में उपवास का प्रावधान है इस्लाम में – उपवास यानी रोज़ा। सुबह से शाम तक भोजन, जल/पेय और मैथुन से किनारा करने का व्रत।

श्री मंसूर अहमद मेरे डिप्युटी चीफ ऑपरेशंस मैनेजर हैं जो माल यातायात का परिचालन देखते हैं। अगर मैं ब्लॉग/ट्विटर/फेसबुक पर अपनी उपस्थिति बना सकता हूं, तो उसका कारण है कि ट्रेन परिचालन का बड़ा हिस्सा वे संभाल लेते हैं।

श्री मंसूर अहमद, उप मुख्य परिचालन प्रबन्धक, उत्तर-मध्य रेलवे, इलाहाबाद।

कल श्री मंसूर ने सवेरे की मण्डलों से की जाने वाली कॉंफ्रेंस के बाद यह बताया कि इस्लाम में ज़कात का नियम है।

ज़कात अर्थात जरूरतमन्दों को दान देने का इस्लाम का तीसरा महत्वपूर्ण खम्भा [1]। इसमें आत्मशुद्धि और आत्म-उन्नति दोनो निहित हैं। जैसे एक पौधे को अगर छांटा जाये तो वह स्वस्थ रहता है और जल्दी वृद्धि करता है, उसी प्रकार ज़कात (दान) दे कर व्यक्ति अपनी आत्मिक उन्नति करता है।

ज़कात में नियम है कि व्यक्ति अपनी सम्पदा (आय नहीं, सम्पदा) का 2.5% जरूरतमन्द लोगों को देता है। यह गणना करने के लिये रमज़ान का एक दिन वह नियत कर लेता है – मसलन रमज़ान का पहला या दसवां या बीसवां दिन। उस दिन के आधार पर ज़कात के लिये नियत राशि की गणना करने के लिये वैसे ही स्प्रेड-शीड वाला कैल्क्युलेटर उपलब्ध है, जैसा आयकर की गणना करने के लिये इनकम-टेक्स विभाग उपलब्ध कराता है! मसलन आप निम्न लिंक को क्लिक कर यह केल्क्युलेटर डाउनलोड कर देख सकते हैं। वहां ज़कात में गणना के लिये आने वाले मुद्दे आपको स्पष्ट हो जायेंगे। लिंक है –

 ज़कात कैल्क्युलेटर की नेट पर उपलब्ध स्प्रेड-शीट

मैने आपकी सुविधा के लिये यह पन्ना नीचे प्रस्तुत भी कर दिया है। आप देख सकते हैं कि इसमें व्यक्ति के पास उपलब्ध सोना, चान्दी, जवाहरात, नकद, बैंक बैलेंस, शेयर, व्यवसायिक जमीन आदि के मद हैं। इसमें रिहायश के लिये मकान (या अव्यवसायिक जमीन) नहीं आता।

श्री मंसूर ने मुझे बताया कि व्यक्ति, जिसके पास साढ़े सात तोला सोना या 52 तोला चान्दी के बराबर या अधिक हैसियत है, उसे ज़कात देना चाहिये। लोग सामान्यत: अपने आकलन के अनुसार मोटे तौर पर ज़कात की रकम का आकलन कर दान देते हैं; पर यह सही सही भी आंका जा सकता है केल्क्युलेटर से।

ज़कात देने के बाद उसका दिखावा/आडम्बर की सख्त मनाही है – नेकी कर दरिया में डाल जैसी बात है। यह धारणा भी मुझे पसन्द आयी। [आपके पास अन्य प्रश्न हों तो मैं श्री मंसूर अहमद से पूछ कर जवाब देने का यत्न करूंगा।]

आप ज़कात कैल्क्युलेटर का पन्ना नीचे स्क्रॉल करें!


[1] इस्लाम के पांच महत्वपूर्ण स्तम्भ – 

  1. श्रद्धा और खुदा के एक होने और पैगम्बर मुहम्मद के उनके अन्तिम पैगम्बर होने में विश्वास।
  2. नित्य नमाज़ की प्रणाली।
  3. गरीब और जरूरतमन्द लोगों को ज़कात या दान देने का नियम तथा उनके प्रति सहानुभूति।
  4. उपवास के माध्यम से आत्मशुद्धि।
  5. जो शरीर से सक्षम हैं, का मक्का की तीर्थ यात्रा।

[उक्त शब्द/अनुवाद मेरा है, अत: सम्भव है कि कहीं कहीं इस्लाम के मूल आशय के साथ पूरा मेल न खाता हो।]


नत्तू पांड़े और प्रसन्नता


कचरे की टोकरी से कौतुक करते गोल-मटोल नत्तू पांड़े।

मेरी बिटिया और मेरा नाती विवस्वान (नत्तू पांड़े) यहां हमारे पास एक महीना रहे। वह महीना भर प्रसन्नता का दौर रहा। मेरी पत्नीजी को सामान्य से कहीं अधिक काम करना पड़ता था, पर मुझे कभी यह नहीं लगा कि वह उनको बोझ लग रहा था। मेरी बिटिया ने मेरे लड़के को उसके कमरे से बेदखल कर दिया था (उस कमरे में वह और नत्तू पांड़े जम गये थे!)। पर मेरे लड़के को कोई कष्ट नहीं था। विवस्वान मेरे लैपटॉप, प्रिण्टर, कागज, किताबें और  घर में बने मेरे होम-ऑफिस के कोने से छेड़ छाड़ करता था। पर वह मैं सहर्ष सह ले रहा था।

यह सब हो रहा था प्रसन्नता के साथ।

प्रसन्नता क्या होती है?

अन्य चीजें बराबर हों तो परिवार प्रसन्नता देता है। हां, वास्तव में।

मैने कहीं पढ़ा था कि इस समय जो पीढ़ी अधेड़ हो रही है, जो पर्याप्त आर्थिक स्वतंत्रता हासिल कर चुकी है, जिसने इतना जोड़ लिया है कि वह अपने वृद्धावस्था और स्वास्थ्य के लिये खर्च करने में सक्षम है, वह नहीं चाहती कि अपने नाती-पोतों को पाले जिससे कि उनके बेटा-बहू नौकरी कर सकें। शहरी अपर मिडिल क्लास में यह द्वन्द्व चल रहा है। बहू यह सोचती है कि सास ससुर उसके बच्चों को देखने का पारम्परिक धर्म नहीं निभा रहे। सास ससुर मान रहे हैं कि पूरी जिन्दगी मेहनत करने के बाद अब उनके पास अपना समय आया है जिसे वे अपने हिसाब से खर्च कर सकें – घूमने, फिरने, पुस्तकें पढ़ने या संगीत आदि में। वे एक और जेनरेशन पालने की ड्रज़री नहीं ओढ़ना चाहते।

पारिवारिक समीकरण बदल रहे हैं। पर इस बदलते समीकरण में न तो बहू-बेटा प्रसन्न रहेंगे, न नाती-पोते और न बाबा-दादी। आधुनिकता में प्रसन्नता केजुयेलिटी होगी/रही है।

परिवार टूट रहे हैं। लोग स्वतंत्रता अनुभव कर रहे हैं। भाई, बहन भतीजे, पड़ोसी, दूसरे शहर में काम करता रिश्तेदार या अमरीके में बसा सम्बन्धी अलग थलग होते जा रहे हैं। कई से तो हम कई दशकों से नहीं मिले। फोन आ जाता है तो दस बार “और क्या हालचाल है” पूछने के अलावा गर्मजोशी के शब्द नहीं होते हमारे पास।

हम पैराडाइज़ में अपनी न्यूक्लियर फैमिली के साथ दो-तीन हजार का लंच कर खुश हो लेते हैं। पर उसी दो-तीन हजार में एक्टेण्डेड फैमिली के साथ कम्पनीबाग में छोले-भटूरे खाने की प्रसन्नता खोते जा रहे हैं।

प्रसन्नता के घटकों में परिवार प्रमुख इकाई है। शायद हां। शायद नहीं।

कुछ और सोचा जाये। या आप बतायेंगे?


नत्तू पांड़े संवाद, जो कविता हो सकता है –

मामा बॉल
धपाक
माथा फूट
हम गिल
एते
चोट्ट
मामा पोंपों सुई
पैले

(मामा ने बॉल फेंकी, जो धपाक से मेरे माथे पर लगी। माथा फूट गया। मैं गिर पड़ा। ऐसे चोट लगी। मामा को उसकी तशरीफ पर सूई लगा दो बतौर पनिशमेण्ट, पहले! )



मेक्सिको और प्रसन्नता –

मेक्सिको की दशा भारत/पूर्वांचल/बिहार से मिलती जुलती है। पर वहां के लोग विश्व के प्रसन्नतम लोगों में हैं। नेशनल जियोग्राफिक की डान बटनर की लिखी पुस्तक का अंश में उद्धृत कर रहा हूं –

कोई मुगालता न रखें, मॉटेरे, मेक्सिको  में और आसपास गम्भीर समस्यायें हैं। बहुत से गांवों में बच्चे कुपोषण और शिक्षा की कमी से पीड़ित हैं। कुशल और प्रतिभावान आदमी और औरतें शराब  और जींस बनाने की फैक्टरी  में काम करने को अभिशप्त हैं। उनकी आकान्क्षायें और स्वप्न धूमिल हो रहे हैं। जो अधिक दुर्भाग्यशाली हैं, वे सोचते हैं कि परिवार छोड़ कर दूर सन्युक्त राज्य अमेरिका चले जायें काम धन्धे की तलाश में। तब भी, सारी बाधाओं – बढ़े हुये भ्रष्टाचार, कम विकास और सवालों के घेरे में आती शासन व्यवस्था – के बावजूद ये मेक्सिको वासी प्रसन्नता की सम्पदा का आशीर्वाद पाये हुये लोग हैं।

और कारण क्या हैं इनकी प्रसन्नता के? डान बटनर इस प्रसन्नता के कारण बताते हैं –

  1. सूर्य की रोशनी की बहुतायत।
  2. व्यक्तिगत स्वतंत्रता की भावना।
  3. नैसर्गिक हास्य। अपने आप पर, बढ़े टेक्स पर और यहां तक कि मौत पर भी हंस लेने की वृत्ति। 
  4. बस कामचलाऊ पैसा। 
  5. धार्मिकता। 
  6. बहुत अधिक सामाजिकता। 
  7. परिवार को सबसे ज्यादा प्राथमिकता। और
  8. अपने आस पास की अच्छाई पर संतोष 

परोक्ष रूप से, और शायद सीधे सीधे भी, प्रसन्नता के मामले में बहुत कुछ कहे जाने की आवश्यकता/सम्भावना है।

सुन्दरकाण्ड पाठ


हनूमान जी के मन्दिर में हर मंगलवार को छात्र जुटते हैं और सुन्दरकाण्ड का पाठ करते हैं। शाम छ-सात बजे के बीच यह आयोजन होता है। लगभग एक दर्जन विद्यार्थी होते हैं। एक डेढ़ घण्टे में, पूरी लय में सुमधुर स्वर में यह पाठ होता है। बहुत समय से चलता आया है।

पाठ करने वाले विद्यार्थी सामान्यत: यहां शिवकुटी में कमरा किराये पर ले कर या तो विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले होते हैं, या किसी कोचिंग संस्थान में आई.ए.एस. पी.सी.एस. की तैयारी करने वाले होते हैं। उनमें से अधिकांश विपन्नता या तनाव में रहने वाले होंगे।

सुन्दरकाण्ड का पाठ उनके लिये बहुत सम्बल देने वाला होगा। न होता तो साल दर साल यह परम्परा न चल रही होती। यहाँ से जाने वाले बहुत समय तक इस अनुष्ठान को याद करते होंगे और उनमें से जो सफल हो जाते होंगे, वे अपनी सफलता को हनूमान जी/ सुन्दरकाण्ड के नियमित पाठ को जरूर एट्रीब्यूट करते होंगे।

शाम पौने सात बजे हनुमान मन्दिर में सुन्दरकाण्ड का पाठ करते छात्रगण।

बीच में, एक बार मन्दिर में छोटी मोटी चोरी हो गयी थी। पुजारी ने मन्दिर पर ताला लगना शुरू कर दिया और यह पाठ लगभग तीन चार महीने बन्द रहा। कालांतर में पुजारी जी की मति हनूमान जी ने सुधारी होगी। और परम्परा पुन: प्रारम्भ हुई।

इस प्रकार की परम्परायें धर्म का अंग होती हैं, साथ ही साथ सामाजिकता और संस्कृति की भी संवाहक होती हैं। अगर आप एक सामाजिक/धार्मिक रूप से जीवंत पड़ोस में रहते हैं, तो आपके आस पास भी इसी तरह की नियमित गतिविधि, जिसमें बिना खास खर्च के लोग जुटते होंगे और परस्पर आदान-प्रदान करते होंगे, जरूर होती होंगी।

वे परम्परायें पोटेंशियल ब्लॉग मेटीरियल हैं, रिपोर्ट करने को!

गुप्त ऊर्जा के स्रोत


जब मैं मानव में गुप्त ऊर्जा का उदाहरण सोचता हूं, तो मुझे आदिशंकर की याद आती है। वे आये इस धरा पर। जर्जर हिन्दुत्व को पुन: स्थापित किया। पूरे भारतवर्ष पर अपनी छाप छोड़ी और बहुत जल्दी अपना काम कर चले भी गये।

क्या गुण होते हैं जो एक व्यक्ति को आदिशंकर बना देते हैं और हम जैसे व्यक्ति एक के बाद दूसरी सेल्फ हेल्प किताबों में सूत्र छानता रहते हैं! जब कुछ समझ नहीं आता तो मैं पुनर्जन्म के सिद्धांत में अपनी आस्था जताता हूं। आखिर शंकर पूर्व जन्म की मेधा और पुण्य के कारण ही प्रारम्भ से ही इतने विलक्षण रहे होंगे। अगर मैं जन्म जन्मांतर में अपना आत्मिक विकास करता गया तो अंतत आदिशंकर सा बन जाऊंगा – जो स्वयम को भी मोक्ष दिला पायेगा और समाज को भी एक नये स्तर पर ले जा पायेगा।

पर वह जन्म आने तक लम्बी तैयारी करनी होगी! अपने हिसाब से सत्व का अर्जन करने के लिये या तो गुरु का निर्देश चाहिये, या पुस्तकों से ज्ञानार्जन। गुउ गुरु के अभाव में बहुत सी पुस्तकें पढ़ी हैँ मैने और आने वाले समय में कई अन्य पढ़ूंगा भी।

श्री देबीप्रसाद पोद्दार की लिखित और प्रकाशित पुस्तक

एक वैसी पुस्तक है श्री देबीप्रसाद पोद्दार जी की – यू आर द पॉवर हाउस। मैं श्री पोद्दार से ट्विटर पर मिला और उनकी पुस्तक के बारे में भी वहीं पता चला।

पोद्दार जी इस प्रिमाइस (premise) से प्रारम्भ करते हैं कि हम अपनी क्षमताओं का दस प्रतिशत से अधिक प्रयोग नहीं करते। बहुत समय से सुनता आया हूं यह और यह मुझे सही भी प्रतीत होता है। अगर आप अप्रतिम लोगों का जीवन देखें तो पता चलेगा कि मानव की क्षमताओं की सम्भावनायें अनंत हैं। पर हम कैसे बाकी की नब्बे प्रतिशत क्षमता को जागृत करें?!

पोद्दार जी कहते हैं कि अगर वे – अर्थात गांधी, मार्टिन लूथर किंग, आइंस्टीन, न्यूटन आदि वह कर सकते हैं तो हम भी कर सकते हैं। जीवन ईश्वर की बहुत बड़ी नियामत है और उसे व्यर्थ नहीं करना है!

अपनी पुस्तक में पोद्दार जी ऋणात्मक और धनात्मक ऊर्जा के कई स्रोतों की बात करते हैं। और जो बात मेरी समझ में आती है, वह है ऋणात्मक घटकों का उन्मूलन और धनात्मक घटकों का संग्रह। बेंजामिन फ्रेंकलिन अपनी ऑटोबायोग्राफी में बताते हैं कि इसी तरह का तरीका प्रयोग किया था उन्होने आत्मविकास का।

श्री देबीप्रसाद पोद्दार, उनके ब्लॉग से लिया चित्र।

आप अगर श्रीदेबीप्रसाद पोद्दार जी की पुस्तक/सोच से परिचय पाना चाहें तो उनकी वेब साइट http://www.urthepowerhouse.com/ पर जा सकते हैं। आप उनके ब्लॉग http://www.dppoddar.com/default.aspx सब्स्क्राइब कर सकते हैं। वहां आप को एक अढ़सठ साल के अधेड़/वृद्ध पर ऊर्जावान व्यक्ति से मुलाकात होगी और आपको महसूस होगा कि अगर ये सज्जन खुद ऐसी ऊर्जा रखते हैं तो उनके कहे में तथ्य जरूर होगा।

श्री पोद्दार सन 41 में जन्मे। कलकत्ता में टेक्समेको के कर्मचारी के रूप में नौकरी प्रारम्भ की। अपनी कर्मठता और प्रतिभा के बल पर बिरला और थापर समूह के वरिष्ठ एग्जीक्यूटिव रहे। कालांतर में उन्होने अपनी स्टॉक ब्रोकिंग फर्म – डीपी पोद्दार एण्ड को. बनाई। सन 1997 में उन्होने दिल का दौरा भी झेला और उसके बाद सन 2004 में बिजनेस से रिटायर हो कर अपनी यह पुस्तक लिखी जिसकी चर्चा इस पोस्ट में कर रहा हूं मैं। आप उनके बारे में विस्तार से इस पन्ने पर पा सकते हैं।

श्री पोद्दार अपनी पुस्तक में जो कहते हैं, वह अपील करता है, और बहुत पहचाना हुआ लगता है। भारतीय मूल्यों और संस्कृति के करीब। अत: ब्लॉग पर प्रस्तुत करने के लिये उनकी पुस्तक में सही सामग्री है।

[ब्लॉग पर वह सामग्री जिससे पाठक कुछ परिचय रखता हो और वह सामग्री उसे बौद्धिकता से आतंकित न करे, सही सामग्री होती है!]

यद्यपि मेरा ब्लॉग आत्म-विकास विषयक नहीं है, पर मैं कोशिश कर सकता हूं कि उनकी पुस्तक में उठाये गये विषयों पर उनके कहे से प्रारम्भ कर अपनी सोच से विस्तार दूं। मैं यदा कदा उनकी पुस्तक में वर्णित एक ऋणात्मक या धनात्मक घटक को ले कर पोस्टें प्रस्तुत करने की सोच रहा हूं। इसमें मेरा अपना स्वार्थ मेरे अपने आत्म-विकास के लिये अपने विचारों को कोहेसिव (cohesive) बनाने का है।

और मुझे लगता है, मैं काम की पोस्टें लिखने में सफल रहूंगा। ऑफ्टर ऑल मैं कुछ तो माद्दा रखता हूं – पोद्दार जी की अपेक्षाओं का अंश मात्र ही सही!

नया कुकुर : री-विजिट



गोलू, जब वह हमारे घर पालतू पिल्ले के रूप में आया था।

फरवरी 2009 में एक पोस्ट थी, नया कुकुर । भरतलाल एक पिल्ले को गांव से लाया था और पुराने गोलू की कमी भरने को पाल लिया था हमने। उसका भी नाम हमने रखा गोलू – गोलू पांड़े। उसके बाद वह बहुत हिला मिला नहीं घर के वातावरण में। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी की कबीर उसने आत्मसात कर ली थी। एक दिन घर से निकल भागा, सन्यासी हो गया। पांड़े सरनेम तज दिया उसने।

आप ये लिंक की गयी पुरानी पोस्टें इत्मीनान से पढ़ियेगा। हिन्दी ब्लॉगिंग के कुछ उत्कृष्ट कमेण्ट उनपर हैं। पर यहां मैं अपनी पुरानी पोस्टें ठेलने के अधन्य-कर्म में नहीं लगा हूं। मैं एक नयी पोस्ट लिख रहा हूं। वह जो पहले वालों से ज्यादा महत्वपूर्ण है।

गोलू लगभग साल भर (या उससे कुछ कम) रहा हमरे घर। उसके बाद यदा कदा घर पर चला आता था। दूध देने पर पी लेता था और अगर उसमें डबल रोटी डाल दी तो नहीं छूता था। हमें आशंका थी कि घर से निकल जाने पर वह अगर गली में सामंजस्य न बिठा पाया तो ज्यादा दिन चलेगा नहीं। पर यह देख संतोष होता था कि वह स्वस्थ था। एक बार कुछ बीमार सा था, तो घर में आ कर पड़ा रहा। पर ठीक होने पर पुन: भाग गया।

गोलू हमारे पास चला आया और मेरी पत्नीजी के पैरों में लोटने लगा।

आज निषादघाट पर मैने देखा कि एक कुत्ता गंगाजी में वैसे है, मानो कोई व्यक्ति मात्र मुंह बाहर किये सूर्य की प्रार्थना कर रहा हो। मैं उसका चित्र लेने के लिये आगे बढ़ा तो वह पानी से बाहर निकल कतरा कर भागने लगा। कुछ दूर जा कर वह रुका और मुझे देखने लगा। पहचान उसे भी आई और मुझे भी – अरे यह तो गोलू है!

हल्का सा बुलाने पर वह हमारे पास चला आया। मेरी पत्नीजी के आसपास घूम पर अपने आगे के पंजे ऊपर कर उनको छूने का यत्न करने लगा। फिर उनके पास रेत में समर्पण भाव से लेट गया। काफी स्वस्थ दीख रहा था। हमने बातचीत की उससे। वह भी स्नेह की भाषा में कूंय कूंय करने लगा।

हम लोगों के साथ साथ गोलू वापस लौटा गंगा तट से हमारे घर की ओर।

हमारे साथ साथ ही गोलू वापस आया। शिवकुटी मन्दिर के आसपास उसका मुहल्ला नहीं होने के कारण बहुत से कुत्ते उसके ऊपर आक्रमण करने लगे। बमुश्किल हम उसे बचा पाये। वैसे मुझे नहीं लगता कि उसका अपना कोई मुहल्ला है जिसमें उसके अपने गोल के कुत्ते हों। अन्यथा सवेरे पौने छ बजे गंगा के पानी में अकेले उसका बैठे पाया जाना समझ नहीं आता – बस्ती से एक मील दूर!

हमारे घर पंहुचने के पहले वह हमारे दरवाजे पर पंहुच गया था। दूध पी कर चला गया।

बन्धन वह नहीं चाहता। हमारे घर को स्वेच्छा से त्याग चुका है सवा साल पहले। उसका अपना कोई गोल भी नहीं। फिर भी हम से आत्मीयता रखता है। पहचानता और स्नेह करता है। उसकी दशा भी करुणामय नहीं है। स्वस्थ है वह।

कौन आत्मा है वह?!


निरक्षरता का मूल क्या है?



रामपुर (छद्म नाम) के सैंतालीस प्रतिशत लोग काम के हिसाब से अनपढ़ हैं। प्रौढ़ शिक्षा एवम बेसिक कर्मठता योजना अधिकारी की एक रिपोर्ट में रामपुर के बारे में चौंकाने वाली रिपोर्ट बनाई है। इसके अनुसार लगभग आधे नागरिक अखबार नहीं पढ़ सकते, नौकरी आदि के फार्म नहीं भर सकते अथवा दवा की बोतलों पर लिखे निर्देश नहीं समझ सकते।

इस अध्ययन में अधिकारी महोदय ने बताया है कि लगभग 20,000 काम के हिसाब से अनपढ़ प्रौढ़ लोगों में किये सर्वेक्षण के अनुसार आधे से ज्यादा के पास हाई स्कूल पास होने का प्रमाण पत्र है …

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