शैलेश पाण्डेय – वाराणसी से नागालैण्ड यात्रा विवरण – 6 #ALAKH2011


नागालैण्ड के मोकोकशुंग जिले के उंग्मा गांव में एक दिन दो रात व्यतीत कर शैलेश ने वापसी की यात्रा प्रारम्भ की। वापसी में व्यथित मन। यात्रा के दौरान मुझे प्रश्न पूछने पड़ रहे थे। वापसी में मन भरा होने के कारण शैलेश के शब्द स्वत: निकल रहे थे ह्वाट्सएप्प पर :-

नवम्बर’17; 2014

शैलेश ने कहा - यहीं कहीं छोड़ चला मैं अपना हृदय। मैं यायावर!
शैलेश ने कहा – यहीं कहीं छोड़ चला मैं अपना हृदय। मैं यायावर!

भैया मैं वापस हो लिया हूं। बस से दीमापुर के लिये। वाया मैरानी। मोकोकशुंग से 212 किलोमीटर है यह। किराया 345 रुपये।

इस इलाके की भोजन की आदतें बहुत स्वस्थ हैं। बहुत सी उबली सब्जियां और हरी पत्तियां। वे लोग पानी की कद्र करते हैं और पारम्परिक तरीकों से वाटर हार्वेस्टिंग करते हैं।

इनको समझने के लिये हमें अपने गहरे पैठे पूर्वाग्रहों, हिंसक भावों और भयों को दरकिनार कर देखना होगा। उससे हम इस स्वर्ग तक पंहुच पायेंगे। … हां, स्वर्ग! मैने इसे सबसे साफ, सुन्दर और मैत्रीवत स्थान पाया है अपनी जिन्दगी में।

यह जमीन लीजेण्ड्स की है – जैसे डाक्टर टालीमेरेन, इम्कॉंग्लीबा आओ और महावीरचक्र विजेता इमलीयाकुम आओ।

यहां परिवार और कबीले के सम्बन्ध प्रगाढ़ हैं और लोग उसमें फख्र करते हैं।

हर जिले की अपनी बोली है और सब में भिन्नता है। एक सूत्र के नागामीज़ भाषा।

यह एक प्रकार का नीम्बू है। यहां दिखा मुझे।

गांव में नीबू जैसे फल का झाड़।
गांव में नीबू जैसे फल का झाड़।

हर गांव में एक द्वार होता है।

हर गांव में एक द्वार होता है नागालैण्ड में
हर गांव में एक द्वार होता है नागालैण्ड में

यह देखिये पारम्परिक पानी की टंकी।

पारम्परिक पानी की टंकी।
पारम्परिक पानी की टंकी।

हां। प्रचुर प्रयोग हुआ है इसमें लकड़ी का!   

यह एक फूल है, जिसे मैं पहचान न पाया।

यह फूल। नाम नहीं पता चला।
यह फूल। नाम नहीं पता चला।

स्क्वाश। एक प्रकार की सब्जी।

स्क्वाश। एक सब्जी।
स्क्वाश। एक सब्जी।

यह है एक पारम्परिक घर में फायरप्लेस।

गांव के एक घर में फायर-प्लेस।
गांव के एक घर में फायर-प्लेस।

पर मुझे जंगल की कटाई कहीं न दिखी।

ये हैं मेरे नौजवान मित्र। अतु के भतीजे। उनके साथ मैं।

शैलेश के जवान मित्र। उंग्मा गांव में अतु के भतीजे।
शैलेश के जवान मित्र। उंग्मा गांव में अतु के भतीजे।

… नागालैण्ड छोड़ते समय ये सभी विचार/लोग/दृष्य मेरे मन में थे।

उत्तरार्ध:

भैया, यायावर शब्द सुना था मैने बचपन से। कौतूहल था उनके प्रति। बड़ा हुआ तो वे लोग, जिन्हे यायावर कहा जाता है, के प्रति सम्मान भी देखा। पर यह कभी न समझ पाया कि इस शब्द का प्रयोग जिसके लिये पहली बार हुआ होगा, उसका हृदय कैसा रहा होगा?!

और बाद में अपने लिये भी इस शब्द के प्रयोग को देखा। मन में आया कि अपने को ही यायावर मान कर अपने ही प्रश्नों के उत्तर दें। तब पाया कि यायावर जहां से गुजरता है, स्वयं को कुछ छोड़ कर आगे बढ़ता है। आगे बढ़ने की उत्कण्ठा और जहां पंहुचा है, वहां से लगाव में बंटा उसका हृदय शायद यायावरी को अपना निमित्त मान कर आगे बढ़ जाता है। ऊपर से निस्पृह पर भीतर पीड़ाओं का कोलाहल लिये!

क्या मैं अपने को स्पष्ट कर पा रहा हूं? इस समय मेरा शरीर वाराणसी की यात्रा कर रहा है। … मैं अपने को नागालैण्ड में छोड़ कर आ रहा हूं। मैं वैसा ही होम सिक महसूस कर रहा हूं, जैसा 1994 में घर से नेवी ज्वाइन करने के लिये जाते समय कर रहा था! 


इसके बाद मैने शैलेश से कुछ स्पष्टीकरण मांगे ब्लॉग पर सामग्री प्रस्तुत करने के लिए। अन्यथा, बहुत ज्यादा इण्टरेक्शन नहीं कर पाया। शैलेश का यात्रा का, ऊपर प्रस्तुत, अंतिम कथ्य पाठकों की प्रतिक्रिया के लिये प्रस्तुत है।


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शैलेश पाण्डेय – वाराणसी से नागालैण्ड यात्रा विवरण – 5 #ALAKH2011


Screenshot_2014-11-18-07-01-33शैलेश ने नागालैण्ड की राजधानी कोहिमा में एक पड़ाव किया था। पन्द्रह नवम्बर की सुबह वे रवाना हुये कोहिमा से आगे। साढ़े दस बजे गूगल मैप पर अपनी स्थिति मुझसे साझा की तो वोखा टाउन की जगह थी। मैने दिन में पूछा था – कहां जा रहे हो? उत्तर ह्वाट्सएप्प पर रात नौ बजे मिला था –

उंग्मा गांव पंहुच गया हूं। भैया, यह स्वर्ग है! 

क्या है यहां? लोग क्या हैं? कारीगर? 

लोग किसान हैं। यह अतु (शैलेश के साथ स्वयम् सेवी सन्स्थान में सहकर्मी) का गांव भी है। यह जगह मेरे द्वारा पंहुची गयी सर्वोत्तम जगहों में शीर्ष पर है। 

अच्छा! कल दिन में सूरज की रोशनी में गांव देखना और चित्र भेजना। 

नवम्बर’16; 2014

आज गांव देखा? चित्र? 

शैलेश ने कई चित्र भेजे गांव की सीनरी पर। नीचे एक चित्र है। बाकी आप स्लाइड शो में देख सकते हैं।

उंग्मा गांव।
उंग्मा गांव।

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भैया, इस गांव में सक्रिय रूप से वाटर हार्वेस्टिंग की जाती है। पानी संग्रहण का यह तरीका मानो उनके जीवन – धर्म का अंग हो। सर्दियो‍ मे‍ पानी की किल्लत एक समस्या है। पास मे‍ तिखु नदी है। सम्भवत: मौसमी नदी। 

वाटर हार्वेस्टिंग, उंग्मा गांव में।
वाटर हार्वेस्टिंग, उंग्मा गांव में।

ये हैं सेण्टी लेमजुंग। 86 साल के। उन्हे भारत का विभाजन अच्छी तरह याद है। विभाजन के समय वे आसाम राइफल्स में अमृतसर में पोस्टेड थे। बाद में वह यूनिट समाप्त कर दी गयी।

IMG-20141116-WA0004रोचक है यह सब! 


उंग्मा गांव

उंग्मा गांव। दीमापुर, कोहिमा और मोकोकशुंग गूगल मैप में।
उंग्मा गांव। दीमापुर, कोहिमा और मोकोकशुंग गूगल मैप में।

उंग्मा, आओ नगा जनजातीय लोगों का ऐतिहासिक गांव है। यह मोकोकशुंग जिले के मुख्यालय से 10 किलोमीटर दक्षिण मेँ है। आओ जनजातीय यह गांव उनके प्राचीनतम सेटलमेण्ट्स में से है और आओ लोककथाओं, रीति-रिवाज, परम्पराओं और जीवनशैली देखने के कोण से यह टूरिस्ट महत्व का है।

उंग्मा नागालैण्ड के अधिक विकसित गांवों में से एक है। यहां के लोग आओ त्यौहार जैसे मोआत्सु और त्सुंगरेमॉंग पूरी आन-बान-शान से मनाते हैं।

गांव यिम्पांग (उत्तर) और यिम्लांग (दक्षिण) में बंटा है। बीचोंबीच बैप्टिस्ट चर्च है।

उंग्मा की आबादी 2011 में 9500 थी। यहां 92% लोग साक्षर हैं (मजे की बात है कि स्त्रियां और पुरुष लगभग बराबर – या स्त्रियाँ कुछ अधिक ही साक्षर हैं।) । प्रति 1000 पुरुषों पर 964 महिलायें हैं। यहां पंचायती राज व्यवस्था है और सरपंच अन्य राज्यों की तरह चुन जाता है।

यहां 96% लोग अनुसूचित जन जाति के हैं। सन 1870 के आस पास ईसाई मिशनरियों ने यहां धर्मांतरण किया। मुख्यत: बैप्टिस्ट मिशनरीज। गांव के बीचोबीच बैप्टिस्ट चर्च का बहुत महत्व है यहां के जीवन में।

यहां के अधिकांश लोग या तो खेती करते हैं या खेतों में मजदूरी। मुख्य पसल चावल और सब्जिया‍। खेती के अतिरिक्त उद्यम वाले 9% से कम लोग हैं।

पानी-बिजली की समस्या रहती है उ‍ग्मा मे‍। 

काँग्रेस पार्टी का यह गढ़ है। पूर्व मुख्य मंत्री श्री एस सी जमीर यहीं के हैं।


मुरोंग। नौजवानो की परम्परायें सीखने की जगह।
मुरोंग। नौजवानो की परम्परायें सीखने की जगह।

यहां के लोग चाय बहुत पीते हैं। लाल चाय। बिना चीनी के। भोजन में स्टिकी-राइस (चिपचिपा चावल?) एक विशेषता है। यह चावल; नागा मिर्च की चटनी और नागा फलियों के साथ खाया जाता है। चावल मुख्य खाद्य है। मांस की जरूरत पोर्क और चिकन से पूरी होती है। सूअर ये लोग छुट्टा नहीं छोड़ते। घर में बचे खुचे को उन्हे खाने को देते हैं।

यहां नशाबन्दी है, पर शराब अवैध रूप से मिलती है।

लोग पान-सुपारी-बीड़ी का सेवन करते हैं। पान को तामुल कहते हैं। गुड़ का प्रयोग होता है। वोखा का गुड़ प्रसिद्ध है।

यह मुरोंग है। या अर्र्जु। पुरानी पढ़ाई की जगह। यहां नौजवान लोग परम्पराओं के बारे में सीखते हैं।

अगले दिन 17 नवम्बर को शैलेश की वापस यात्रा प्रारम्भ हुयी उंग्मा गांव से। लौटते समय मन में मन में थे कई संवेग। यायावर ऊपर से संयत रहता है, पर मन को कई इमोशंस मथते रहते हैं। भाग – 6 में प्रस्तुत होगा वह सब। सम्भवत: वह अंतिम पोस्ट हो इस कड़ी की। सम्भवत: इस लिये किसी भी यायावर का कोई भरोसा नहीं होता। अनप्रेडिक्टेबल! 😆

शैलेश पाण्डेय – वाराणसी से नागालैण्ड यात्रा विवरण – 4 #ALAKH2011


पिछली पोस्ट में शैलेश ने दीमापुर से कोहिमा की यात्रा प्रारम्भ की थी। बस में। उसके बाद :-

नवम्बर’13; 2014

इस समय मैं पूरी तरह पूर्वोत्तर के मोहपाश में हूं।

पिफेमा गांव।
पिफेमा गांव।

यह पिफेमा गांव है।

"मैने नाश्ते के लिये जंगली सेब चुना है।"
“मैने नाश्ते के लिये जंगली सेब चुना है।”

दीमापुर से कोहिमा जाती बस इस समय यहां सवेरे के नाश्ते के लिये रुकी है। सवेरे दस बजे। मैने जंगली सेब का नाश्ता चुना है। नाश्ते में अन्य आईटम भी हैं। रसोई में तैयार किये आईटम भी। पर अपने वजन का ख्याल रखते हुये मैने यही चुना है।

दोपहर बारह बजे तक कोहिमा पंहुच गया हूं। दोपहर की धूप में कोहिमा बहुत सुन्दर लग रहा है।

नवम्बर’14; 2014

कोहिमा की सुबह के कुछ चित्र – IMG-20141114-WA0000

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 और यह – IMG-20141114-WA0004यहां के लोग सरल हैं। मैने जिन लोगों से सम्पर्क किया, वे उससे संतुष्ट थे जो उनके पास है और उसके लिये वे ईश्वर के शुक्रगुजार भी हैं।

अगर ऐसा है तो वे अमूमन प्रसन्न लोग होने चाहियें?  

हां, वे हैं। और शायद यह कारण है कि उम्रदराज होने के चिन्ह उनपर नहीं दिखाई देते।

क्या वे नहीं चाहते कि वे बाहर निकलें और पैसा कमायें? 

जिनसे मैं मिला, उनको देख कर तो लगता नहीं कि वे ऐसा चाहते हैं।

उन्हे यह तो पता होगा कि बाहर निकलने पर क्या सम्भावनायें हैं। चिकित्सा की, नौकरियों की, अध्ययन की। उन्हे यह भी मालुम होगा कि बाहर निकलने में क्या विषमतायें होंगी – अज्ञात कठिन जीवन आदि? 

व्यापक जानकारी तो नहीं है। पर कुछ सीमा तक है जरूर।

वे नागामीज़ बोलते हैं। नागमिया। आसान है उसे जानना। मैं धीरे बोली जाने वाली अन्ग्रेजी और नागमिया के कुछ शब्दों का प्रयोग कर काम चलाता हूं। नागामीज़ मैने बातचीत में सीखी है।

बढ़िया। कुछ लोगों के चित्र लेना। उनके बारे में जानकारी भी – नाम, परिचय और कुछ जानकारी – बाहरी दुनियां के लिये।

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जापुतो अंगामी की पुत्री नेब्युन्युओ के साथ शैलेश पाण्डेय

यह देखिये; ये ऐया (दीदी) हैं। श्रीमती जापुतो अंगामी की पुत्री।

और ये बच्चे हैं। अनाथ। जिन्हें वे पालती हैं।IMG-20141115-WA0002

अपनी सम्प्रेषण की कला की परीक्षा लेने का सबसे अच्छा तरीका है बच्चों से बातचीत करना। उनकी मुस्कान और उनका एक्टिव भाग लेना बातचीत में यह बताता है कि आपको बातचीत करने में सफलता मिल रही है।


जापुतो अंगामी को ’मदर’ कहा जाता है। वे कोहिमा राजकीय अस्पताल में नर्स थीं। एक बार एक महिला की बच्चा जनते समय मृत्यु हो गयी और उसका दुखी मर्द डर कर भाग गया। जापुतो ने बच्चे को पालने का बीड़ा उठाया। और उससे शुरुआत हुई एक महिला द्वारा चलाये जा रहे अनाथाश्रम की। अनाथ बच्चे – जिनमें बहुत से नागालैण्ड के विद्रोह का शिकार थे। सन 2009 की यह रिपोर्ट बताती है कि उस समय वहां लगभग 80 बच्चे थे, जिसमें से 29 विद्रोह से प्रभावित बच्चे थे।

जापुतो का देहावसान 2011 में 87 वर्ष की अवस्था में हुआ। 

जापुतो की पुत्री नेब्युन्युओ उनके कामकाज में हाथ बटाती थीं, अब वे यह काम देखती हैं। 


शैलेश ने इसके बाद राजधानी कोहिमा से आगे नागालैण्ड के एक गांव की यात्रा की। उसका विवरण भाग – 5 में।

शैलेश पाण्डेय – वाराणसी से नागालैण्ड यात्रा विवरण – 3 #ALAKH2011


राजबारी, दीमापुर के प्रस्तरखण्ड
राजबारी, दीमापुर के प्रस्तरखण्ड

पिछली पोस्ट में शैलेश दीमापुर पंहुचे थे 11 नवम्बर की रात में कामरूप एक्स्प्रेस से। उसके बाद दीमापुर में एक दिन व्यतीत किया और अगले दिन 13 नवम्बर को वहां से कोहिमा के लिये प्रस्थान किया। उसका भेजा विवरण :-

नवम्बर 12, दीमापुर में।

सवेरा जल्दी हो जाता है दीमापुर में। पूर्वोत्तर में जल्दी ही होता है। दुकानें आठ बजे पूरी तरह खुल चुकी हैं।

दीमापुर महत्वपूर्ण स्टेशन है रेलवे का। पर मेरी समझ नहीं आता कि काहे इतना चलताऊ स्टेशन बनाया गया है इसको सुविधाओं के हिसाब से। और कल तो कामरूप एक्स्प्रेस में गुवाहाटी के बाद पानी ही नहीं था। यह तो पक्का है कि पूर्वोत्तर को वह भाव नहीं मिल रहा जो मिलना चाहिये।

नागालैण्ड के डिप्युटी कमिश्नर का दफ़्तर दीमापुर में।
नागालैण्ड के डिप्युटी कमिश्नर का दफ़्तर दीमापुर में।

मैं दस बजे तक नागालैण्ड के डिप्युटी कमिश्नर के दफ़्तर पंहुच गया हूं। नागालैण्ड की यात्रा के लिये इनरलाइन परमिट लेना होता है।

इनरलाइन परमिट के लिये  जारी कूपन।
इनरलाइन परमिट के लिये जारी कूपन।

इसी दफ़्तर से मिलता है वह। आपको फार्म भर कर अपने स्थायी निवास का प्रमाणपत्र नत्थी करना होता है। उसके बाद एस.डी.ओ. सिविल के पास व्यक्तिगत रूप से पेश होना होता है। पेशी बाद आपको फाम आई.एल.पी.शाखा में जमा करा होता है। वहां वे आपका वेब कैमरा से चित्र लेते हैं और वे आपको फार्म जमा करने का कूपन देते हैं। कूपन के साथ परमिट लेने को 12 बजे बाद आना पड़ता है।

यह बहुत प्रिय नहीं है – पूर्वोत्तर को कमोबेश नियंत्रण में रखा जा रहा है – सड़क, रेल, नेटवर्क के द्वारा। बहुत खराब दशा है नेटवर्क की। मेरे पास एयरटेल और सेल-वन के सिम हैं। खराब दशा दोनो की।

कल मैं कोहिमा के लिये निकलूंगा।

अकेले?

हां भईया। यहां की उपेक्षा और मेरी अपनी दशा का मुझको भान – कि मैं कुछ विशेष नहीं कर सकता; मुझे मायूस करते है। यह देख कर क्रोध भी आता है कि इस क्षेत्र का कई व्यापारिक समुदायों ने सतत दोहन किया है।

ओह, कोई तो तरीका होगा कि इस दशा में भी प्रसन्न रहा जाये। … अपनी अपेक्षाओं को कम करके रखने से शायद यह हो सके।

काश यह इतना आसान होता! काश मैं अपने देखने-परखने में गलत होता!

मैने ये प्रस्तरखण्ड देखे – राजबारी, दीमापुर में। किस लिये होंगे? 

नवम्बर’13; 2014

दीमापुर से कोहिमा, बस से रवानगी।
दीमापुर से कोहिमा, बस से रवानगी।

सवेरे नौ बजे शैलेश ने अपनी बस से रवानगी का चित्र भेजा। दीमापुर से कोहिमा के लिये।

कोहिमा 74 किलोमीटर दूर है दीमापुर से। जाने के तीन विकल्प हैं: बस – 100रुपये; शेयर्ड टेक्सी – 220रुपये; पूरी टेक्सी 880रुपये। दीमापुर से निकलते ही लगता है जैसे स्वर्ग में आ गये।

कल तो मायूस /अवसादग्रस्त हो रहे थे। आशा है वह अवसाद दूर हो गया।

अवसाद का निमित्त तो शेष है; पर उसके लिये कुछ करने की मेरी सोच के कारण मेरी स्पिरिट्स में उछाल है! 🙂

शेष भाग – 4 में।

शैलेश पाण्डेय – वाराणसी से नागालैण्ड यात्रा विवरण – 2 #ALAKH2011


पिछली पोस्ट में था कि पूर्वोत्तर के विषय में जानकारी बढ़ाने और उसे सोशल मीडिया पर साझा करने के ध्येय से शैलेश पाण्डेय ने नागालैण्ड की यात्रा प्रारम्भ की। अकेले। वाराणसी से। मुगलसराय से ट्रेन पकड़ वे कलकत्ता पंहुचे और वहां से कामरूप एक्स्प्रेस से दीमापुर के लिये रवाना हुये – 10 नवम्बर की शाम को। आगे – 10 नवम्बर की शाम।

कामरूप एक्स्प्रेस के प्लेटफार्म पर लगने की प्रतीक्षा में हावड़ा स्टेशन पर।
कामरूप एक्स्प्रेस के प्लेटफार्म पर लगने की प्रतीक्षा में हावड़ा स्टेशन पर।

मै कामरूप एक्स्प्रेस के प्लेटफ़ार्म पर लगने की प्रतीक्षा कर रहा हू। सभी कर रहे है। आगे अठ्ठाईस घण्टे की यात्रा है। टिकट लिया है स्लीपर क्लास का। इस लिये कि कल दिन भर असम देखने की सहूलियत रहे खिड़की से।

बढ़िया। मौसम अच्छा है। स्लीपर क्लास की यात्रा किफायती भी है और सुविधाजनक भी। कामरूप का क्षेत्र तो योगिनियों के मिथकों से भरा पड़ा है। अगर यात्रा में कोई दिखे तो बताना! J

तीन साल पहले मैने एक ब्लॉग पोस्ट लिखी थी कि लोगों के मन में बहुत भ्रान्तियां हैं असम/पूर्वोत्तर के बारे में। उस गलत ईमेज को बदलने की जरूरत है।

आपने चिन्ता व्यक्त की, और मैने इसपर कार्य प्रारम्भ भी कर दिया है!

पास के सहयात्री ने साड़ी खरीदी 100 रुपये में!
पास के सहयात्री ने साड़ी खरीदी 100 रुपये में!

यह प्लेटफार्म पर ट्रेन आ गयी है जो मुझे गन्तव्य की ओर ले जायेगी। वह गन्तव्य, जिसके बारे में मुझे अन्दाज भर है। ट्रेन समय से खुलती है – 17:35 पर। और ट्रेन में तरह तरह का सामान बेचने वाले आ घुसे हैं। पजामे का नाड़ा, सेफ्टी-पिन, साड़ी, टॉर्च और जाने क्या क्या! पास वालों ने 100 रुपये में साड़ी खरीदी है।

वाह! 100 रुपये में साड़ी?! थोक में तो 50-60 की पड़ेगी। इतने सस्ते कपड़े से तो पूरे भारत की गरीबी को ढंका जा सकता है!

हां!

उसके बाद शैलेश का सन्देश 11 नवम्बर को साढ़े आठ बजे ही मिला। सम्भवत: यात्रा की थकान से रात में जल्दी और गहरी नींद आयी हो। मोबाइल की बैटरी भी डिस्चार्ज हो गयी थी। स्लीपर क्लास के कोच में लगे चार्जर से चार्ज करने के बाद सन्देश दिया था अगले दिन।

जाने क्या का मिल रहा था कामरूप एक्स्प्रेस के कोच में।
जाने क्या क्या बेचने वाले आ रहे थे कामरूप एक्स्प्रेस के कोच में।

इस पावर बैंक की मदद से मैं यह सन्देश दे पा रहा हूं। भारतीय रेलवे को धन्यवाद।

स्लीपर कोच में बैटरी चार्जिंग सुविधा।
स्लीपर कोच में बैटरी चार्जिंग सुविधा।

बहुत लोग इसका प्रयोग कर रहे होंगे? और यह स्लीपर क्लास में भी है?!

हां, कई लगे हैं। लोग खूब इस्तेमाल करते हैं। तभी एक खराब भी हो गया है।

मुझे याद आता है कि हमारे बिजली विभाग वाले इसको न लगाने के लिये तर्क दे रहे थे कि लोग इसका दुरुपयोग करते हैं। इससे पानी भी गरम करते हैं। और ज्यादा करेण्ट खींचने से कोच में आग लगने का भी खतरा होता है।

वाह! वाटर हीटर चलाना! भारतवासी मस्त लोग हैं!

एक वेण्डर् कोच में स्विश-चाकू भी बेच रहा है। उसने 250रुपये कीमत बताई और मेरे पास के एक यात्री ने मोलभाव कर 50 में खरीदा। मैं तो न खरीदूं। चीन का बना है। मैं तो ओरीजनल बालीसॉन्ग ही खरीदूंगा।

शैलेश ने गूगल मैप पर अपनी स्थिति भेजी। न्यू अलीपुरद्वार से निकलने पर।

कैसा देहात है खिड़की के बाहर? कैसे लोग हैं? ट्रेन में असमिया बोल रहे हैं या बांगला? प्लेटफार्मों पर क्या मिल रहा है?

गुवाहाटी प्लेटफ़ार्म।
गुवाहाटी प्लेटफ़ार्म।

चावल के समतल खेत हैं और चाय के बागान भी। लोग असमिया बोलते हैं। वे अखेमिया कहते हैं। ककड़ी-खीरा, अन्नानास, झालमुड़ी, मिठाई, उबले अण्डे आदि मिल रहे हैं प्लेटफार्म पर। स्टेशन बेहतर साफ़ सुथरे हैं – तुलनात्मक रूप में।

गुवाहाटी गन्दा है। पटरियों के किनारे झुग्गी-झोपड़िया हैं। स्टेशन का प्लेटफ़ार्म साफ है।

मैं दीमापुर पंहुच गया हूं। रात के सवा दस बजे।

दीमापुर पंहुचने के बाद का विवरण भाग – 3 में। 

शैलेश पाण्डेय – वाराणसी से नागालैण्ड यात्रा विवरण – 1 #ALAKH2011


शैलेश का यात्रा के लिये सामान।
शैलेश का यात्रा के लिये सामान।

शैलेश के विषय में मैने इस ब्लॉग पर कई पोस्टों में लिखा है। उनकी उत्तराखण्ड त्रासदी के बाद राहत कार्यों सम्बन्धित यात्राओं का विवरण है और कालान्तर में उनकी गन्गोत्री यात्रा के बारे में मैने लिखा। सभी यात्राओं के लिये मूलत: उन्होने यात्रा के दौरान लगभग निरन्तर मुझे ह्वाट्सएप्प के माध्यम से अपडेट्स डिये। हम दोनो ही समय के साथ ह्वाट्सएप्प से सम्प्रेषण में कुशल हो गये हैं। अत: बीच में फोन के माध्यम से सम्पर्क करने की बहुत आवश्यकता महसूस नहीं हुई। यात्राओं के बारे में व्यापक जानकारी सतत भेजे गये सम्प्रेषणों के माध्यम से हो जाती रही। लगभग 8-9 दिन पहले शैलेश ने बताया कि अब पुन: घर से यात्रा पर निकलने का उनका मन बन रहा है। कहां? यह उन्हे भी स्पष्ट नहीं है। यायावर के पास पहले यह यात्रा की छटपटाहट होती है, फिर यात्रा का खाका बनता है! 🙂 उसके बाद एक दिन उनसे सम्प्रेषण हुआ। (मैं आगे सम्प्रेषण में उनके कहे को सामान्य और अपने कहे को इटैलिक्स में रख रहा हूं, जिससे संवाद में कौन क्या कह रहा है; स्पष्ट रहे।) उस दिन और उसके बाद हुई यात्रा का लेखलाप यूं चला:

नवम्बर’8;2014

“भैया एक चीज आपसे शेयर कर रहा हूं। मैं एक यात्रा प्रारम्भ कर रहा हूं और उसको नाम दूंगा – #ALAKH2011 – अखण्ड भारत – नागालैण्ड। एक ध्येय है कि पूर्वोत्तर के बारे में सोशल मीडिया पर जागरूकता बढ़ाई जाये। लोग वहां के अनजाने नायकों के बारे में भी जानें; सामान्य छुट-पुट जानकारी के अलावा। #ALAKH2011 ट्विटर पर काफी समय से चलता हैशटैग है और उसमें यह यात्रा और वैल्यू जोड़ेगी। अगर आप जुड़ते हैं तो यह बहुत सशक्त टीम-ट्रेवलॉग होगा।

जरूर जरूर!! मैं एक प्रेत-यात्रा-लेखक बनूंगा।  मेरी यात्रा ह्वाट्सएप्प के माध्यम से।  तुम अपने वास्तविक पैरों पर करोगे यात्रा और मेरे ब्लॉग पर उसकी नियमित जानकारी होगी!

मैने शैलेश को वायदा तो जरूर कर दिया उस दिन (8 नवम्बर को); पर उसके बाद मैं अपने सरकारी काम में बहुत व्यस्त हो गया। शैलेश से ह्वाट्सएप्प पर जानकारी का आदान-प्रदान तो हुआ; पर मेरा ब्लॉग लेखन नहीं। अगले दिन शाम साढ़े चार बजे शैलेश ने मुझे मुगल सराय स्टेशन से जानकारी दी कि स्टेशन पर आ गये हैं वे और टटोल रहे हैं कि कौन सी ट्रेन मिलेगी आसनसोल-हावडा की ओर जाने वाली। साथ में सामान तो कम रखा है पर यह “साम्यवादी झोला” जोड़ लिया है। उसमें नोटबुक और पठन सामग्री सहूलियत से रखी जा सकती है।

शैलेश ने आनन्दविहार-हावड़ा एक्स्प्रेस से यात्रा की मुगलसराय से आसनसोल तक। रास्ते में शिकायत कि बहुत धीमी चल रही है ट्रेन। पर मैने जब ट्रेन की जानकारी नेट पर छानी तो पता चला कि मुगलसराय में वह साढ़े छ घण्टा देरी से आयी थी और आसनसोल तक उसने 45 मिनट मेक-अप कर लिये थे। जल्दी पंहुचने के लिये आसनसोल में एक्स्प्रेस गाड़ी छोड़ कर उपनगरीय लोकल पकड़ी; इस आशा के साथ कि वह ’जल्दी पंहुचेगी’।

कंटिये से टांगा लोकल यात्री का बैग - झूलबे ना!
कंटिये से टांगा लोकल यात्री का बैग – झूलबे ना!

“भैया यह एक नित्य यात्री ने अपना बैग टांगा है लोकल गाड़ी में। घर से ही वह टांगने के लिये हुक ले कर आया है। वह ऊपर की सीट पर आगे की ओर टांग रहा था तो नीचे बैठे ने ऑब्जेक्ट किया – पीछे कर टांगो। पीछे टांगने से ’झूलबे ना’।” निश्चय ही प्रतिवाद करना लोकल में यात्रा करने में ज्यादा अनुभवी था! … लोकल में भीड़ बहुत है। पर लोग इत्मीनान से हैं। शान्ति से और किसी प्रकार की हड़बड़ी के बिना। मनुष्यता है। जवान लड़कों को स्त्रियों और वृद्धों के लिये सीट खाली करते देखा मैने।

बांगला भद्रलोक। 

हां। 🙂

बनारस से हावड़ा पंहुचने के मेरे कुल 655 रुपये खर्च हुये। इसमें 400 रुपये तो रिजर्व कोच में सीट पाने के लिये वैध खर्च था।

बहुत ही मितव्ययी यात्रा है! 

बस में।
बस में।

अब मैं बस में हूं। टिकट का किराया 6 रुपये। मैं बण्डेल उतरा। वहां से हावड़ा का किराया 10 रुपया है।

सस्ता, निश्चय ही सस्ता। 

शाम 17:25 पर निकलूंगा कामरूप एक्स्प्रेस से दीमापुर के लिये। अठ्ठाईस घण्टे की यात्रा।

कल दिन भर तुम असम की सीनरी देखोगे! मुझे बताया गया है कि  वहां का देहात बहुत सुन्दर है! 

आगे का यात्रा विवरण भाग – 2 में…

शैलेश पाण्डेय, गंगोत्री और साधू


ऋषिकेश में शैलेश पाण्डेय
ऋषिकेश में शैलेश पाण्डेय

शैलेश पाण्डेय ने पिछले वर्ष उत्तराखण्ड में प्राकृतिक आपदा के बाद गुप्तकाशी के आगे रेलगांव-फाटा के पास मन्दाकिनी नदी पर रोप-वे बनाया था। लगभग सप्ताह भर वहां रहे थे और ग्रामीणों की बहुत सहायता की थी। उस घटना को एक साल हो रहा है।

अभी कुछ दिन पहले शैलेश ने बताया था कि उनका इरादा घर से एक दो दिन में निकल पड़ने का है और अभी तय नहीं है कि कहां जाना है।

यात्रा प्रारम्भ। अमेठी के पास बस में।
यात्रा प्रारम्भ। अमेठी के पास बस में।

दस तारीख को ह्वाट्सएप्प पर उनके द्वारा अमेठी के पास एक बस का चित्र मिला; जिससे पता लगा कि यात्रा दो-तीन दिन पहले प्रारम्भ हो गयी थी।

उनके अगले पड़ाव – सीतापुर का पता चला। फिर ऋषिकेश। वहां से रास्ते में पड़े  नरेन्द्रनगर, टिहरी गढ़वाल में चम्बा और फिर उत्तरकाशी।  उत्तरकाशी से आगे की यात्रा – रास्ते में स्थान लाट सेरा, हरसिल और अन्त में गंगोत्री। कुल यात्रा 1500किलोमीटर से अधिक की है। गूगल मैप मे‍ यात्रा का रूट यह रहा – shailesh journey यात्रा की विषमतायें और विशेषतायें तो शैलेश ही बता सकते हैं, मुझसे तो कुछ ही ह्वाट्सएप्प के माध्यम से आदान-प्रदान द्वारा ज्ञात हुआ।

ऋषिकेश
ऋषिकेश

शैलेश ने ह्वाट्सएप्प पर लिखा था कि “बहुत अच्छा लग रहा है। तीन दिन हो गये हैं और किसी भी बात ने न मुझे उद्विग्न किया है न मुझे क्रोध आया है। आनन्द की अनुभूति..। उन लोगों के बीच अच्छा लग रहा है जो जिन्दगी जीने के लिये हर क्षण जद्दोजहद करते हैं।”

शैलेश 11 जून को ऋषिकेश पंहुच गये। उत्तरप्रदेश की तरह वहां भी बिजली नहीं थी। पहाड़ के पीछे से निकलता चांद पूरे अंधेरे से झांकता दिख रहा था।

रात में भोजन का  जो चित्र भेजा शैलेश ने, उससे मेरा भी मन हो उठा कि कितना अच्छा होता अगर मैं भी वहां होता… अगले दिन भी सवेरे ऋषिकेश का चित्र था। सवेरे नाश्ते में पराठा-छोले थे। शैलेश ने लिखा – “आड़ू और आलूबुखारा खूब मिल रहा है।”  साथ में कथन भी कि हरसिल के लिये निकल रहे हैं वे लोग – यानी वे और हर्ष। हरसिल यानी गंगोत्री की ओर।

ऋषिकेश में रात का भोजन करते हर्ष।
ऋषिकेश में रात का भोजन करते हर्ष।

ऋषिकेश से बरास्ते उत्तरकाशी; गंगोत्री के रास्ते के कई चित्र भेजे शैलेश ने। यह भी लिखा कि टिहरी के कई वनों में आग लगी हुयी है। अभी आग है और आने वाली वर्षा में भूस्खलन होगा। पता नहीं आग और भू-स्खलन में कोई रिश्ता है या नहीं…

दूर, टिहरी के जंगल में लगी आग।
दूर, टिहरी के जंगल में लगी आग।

उसके बाद उत्तरकाशी पड़ा, फिर मनेरी डैम, आगे लाटसेरा और फिर गंगोत्री। होटल में डबल रूम मिल गया 300 रुपये में! शैलेश ने बताया कि उनका कुल खर्च गंगोत्री पंहुचने का 500-600 हुआ होगा। …

उत्तरकाशी
उत्तरकाशी

यायावरी के लिये बहुत पैसे की जरूरत नहीं है। और आपके पास मोबाइल का कैमरा और नोट्स लेने के लिये एक स्क्रिबलिंग नोटबुक हो तो कोई खरीद कर सूटकेस में बोझ भरने की भी जरूरत नहीं भविष्य के लिये यादें संजोने को।

मैने शैलेश को लिखा कि काश मेरा स्वास्थ्य ठीक होता इस प्रकार की यात्रा के लिये। शैलेश ने कहा कि स्वास्थ्य को बहुत लाभ मिलेगा, अगर आप यहां आयें!

गंगोत्री में होटल।
गंगोत्री में होटल।

 

अगले दिन शैलेश ने अपना और हर्ष का धोतियां लपेटे उस स्थान का चित्र भेजा, जहां राजा भगीरथ ने (गंगावतरण के लिये) तपस्या की थी। महान तपस्वी। काश गंगा-शुद्धिकरण वाले गालबजाऊ लोग उनमें अपना आदर्श तलाशते। वे लोग इस प्रकार यायावरी कर वहां जायें तो शायद गंगाजी को पुनर्जीवित करने की भावना से ओतप्रोत हो सकें।

हर्ष (बांये) और शैलेश - वहां जहां भगीरथ ने गंगावतरण के लिये तपस्या की थी।
हर्ष (बांये) और शैलेश – वहां जहां भगीरथ ने गंगावतरण के लिये तपस्या की थी।

“भैया, यहां से वापस आने की तनिक भी इच्छा नहीं हो रही।” शैलेश ने संदेश में लिखा। “मन में ऐसे प्रश्न उठ रहे हैं, जिन्हे लोग आध्यात्म कहेंगे और उन प्रश्नों के उत्तर भी शायद यहीं मिलेंगे।”

अगले दिन (आज 15 जून को) शैलेश ने बताया कि वे एक नागा साधू से मिले, जंगल में एक गुफा में। वहां सामान्यत: कोई जाता नहीं। निश्छल और बच्चे से व्यक्ति। उन्हे मालुम था कि आज मोदी भूटान जा रहे हैं। गुफा दुर्गम्य अवश्य थी, पर मोबाइल नेटवर्क वहां भी था। बैटरी कैसे चार्ज करते होंगे, यह मैने नहीं पूछा। शैलेश से मिलने पर यह जिज्ञासा रखूंगा। साधू बाबा ने शैलेश और हर्ष को चाय भी पिलाई।

दुर्गम जंगल में साधू की गुफा में शैलेश!
दुर्गम जंगल में साधू की गुफा में शैलेश!

मैं वाराणसी वापस पंहुचने पर शैलेश से इन सज्जन के बारे में विस्तार से पूछूंगा जो ऐसे दुर्गम स्थान पर रहते हैं… आगे शायद जो शैलेश बतायें, वह एक पोस्ट का रूप ले। पता नहीं। आजकल ब्लॉग कम ही लिखा, देखा जा रहा है…