बहुत आशायें नहीं हैं किसी आमूलचूल परिवर्तन की #गांवकाचिठ्ठा

बहुत कुछ सम्भावनायें नहीं लगतीं कि कोरोना काल में वापस आये हुनरमंद लोगों का प्रयोग कर उत्तर प्रदेश चमक जायेगा। और अगर कोई चमत्कार हुआ तो वह इस प्रांत का सौभाग्य होगा। वैसे; इस प्रांत का सौभाग्य देखने की आशा में छ दशक गुजार दिये हैं मैंने।


मई 26, 2020, विक्रमपुर, भदोही।

गांव में काम धाम बहुत कुछ वैसा ही है, जैसा सामान्य दिनों में होता है। सवेरे मेरे साले साहब ने लकड़हारे बुलाये थे। आंधी में टूटे किसी पेड़ का हिस्सा छांटने के लिये वे आरी और कुल्हाड़ी ले कर आये थे। तीन चार लोग रहे होंगे। जाति के मुसहर। हम से उन्होने पीने का पानी मांगा। पत्नीजी ने पानी के साथ गुड़ भेज दिया। दूर से ही मैंने देखा तो उनके पास अंगोछा या मास्क जैसा कुछ नहीं था। पता नहीं उन्होने कोरोना वायरस या कोविड19 का नाम भी सुना होगा या नहीं। वे निम्नतम स्तर पर आते हैं गांव देहात की अर्थव्यवस्था में भी और जाति-वर्ण व्यवस्था में भी। नाम के आगे जाति सूचक संज्ञा “वनवासी” लगाते हैं। आते भी अनुसूचित जन जाति में हैं। पेड़ों की लकड़ियां, महुआ और छिउल की पत्तियां, खाली पड़े खेतों से अनाज के दाने और चूहों के बिल खोद कर उनमें से अनाज और चूहे निकाल कर भोजन का इंतजाम करते हैं। सभ्यता और असभ्यता की सीमारेखा पर खड़े मुसहर, उन्हें क्या मालूम होगा कोरोना। और मालूम भी होगा तो उनके जीवन में क्या प्रभाव डालती होगी यह जानकारी?

तीन किलोमीटर दूर यह है मुसहरों की बस्ती। पेड़ों के नीचे बना रखी हैं झोंपड़ियां। अत्यल्प सामान असबाब है उनके पास।

अब तो, कोरोना संक्रमण तेजी से फैलने के कारण, मैंने घर से निकल कर इधर उधर घूमने को वर्जित कर लिया है, अपने लिये; वरना पास में तीन किलोमीटर दूर उनकी बस्ती में जा कर देखता कि क्या दशा है उनकी। अर्थव्यवस्था की तंगी का असर उनपर पड़ा है या नहीं। वैसे, अलग थलग जीने वाली वह जनजाति कोरोना संक्रमण से तो अप्रभावित ही होगी। ऐसा मेरा अनुमान है।

भारत में आबादी के ऐसे कई समूह हैं, जिनके पास से कोरोना हो कर गुजर जायेगा और वे जस के तस बने रहेंगे। झारखण्ड और छतीसगढ़ का एक वनवासी हिस्सा और झाबुआ – पंचमहाल के भील भिलाल पटेरिया भी शायद बड़ी सीमा तक बचे रहें कोरोना वायरस से। टीवी, नेट, अखबारों में तो अभी उनके बारे में बहुत सुनाई नहीं पड़ता। अभी तो सामान्य गांवों के बारे में भी उतना नहीं आता, जितना महानगरों के हॉटस्पॉट्स के बारे में आता है। अभी तो मीडिया को इन इलाकों में जाने की फुर्सत ही नहीं मिली होगी। कोरोना की युद्धभूमि ने अभी दूर दराज के कोने-अंतरे वाली जगहों को अपने में नहीं समेटा है।

बाहर निकलना बंद करने के बाद मेरे पास आसपास की जानकारी के साधन हिंदी अखबारों के स्थानीय जिलों (मिर्जापुर, गाजीपुर, जौनपुर, भदोही, सोनभद्र आदि) के पन्ने, शाम की चाय पीने आने वाले राजन भाई, वाहन चालक अशोक और बर्तन झाड़ू करने वाली महिलायें कुसम और नीलम ही हैं। कुछ जानकारी हमारे पड़ोसी साले साहब और उनके परिवार से मिलती है। इतना ही बहुत है जानने के लिये।


मुसहरों पर लिखी पोस्टें –

  1. घुरहू मुसहर से बातचीत
  2. बनवासी (मुसहरों) का भोजन रखाव
  3. वह मुस्कराती मुसहर बच्ची  

दिन यूं ही गुजर गया। अखबार देखे। उनमें यही था कि सरकार प्रतिबद्ध है लोगों को रोजगार मुहैय्या कराने के लिये। बाहर से आये लोगों का सर्वेक्षण हो रहा है। उनके हुनर के हिसाब से काम मिलेगा। पर काम है कहां? सिवाय मनरेगा के और कोई काम नजर नहीं आता। आसपास देखता हूं तो नजर आता है कि सरकार की सही योजनायें, जिनमें सबसिडी या अनुदान या रोजगार की कमाई का सीधा पैसा लोगों के खाते में जा रहा है, उसमें भी पंचायत स्तर पर कुछ न कुछ हड़पने का जुगाड़ बना लिया है भद्र जनों ने। लोगों को मिलने वाले मुफ्त अनाज में से भी पांच दस प्रतिशत कटौती कर दिया जा रहा है। बच्चों में कुपोषण न हो, उसके लिये भी अनाज बंटता है। उसमें से भी मुठ्ठी मुठ्ठी निकाल लिया जाता है। पूरी व्यवस्था गिद्धों के हाथ है। या जिसके भी हाथ आती है, वह देर सवेर गिद्ध बन जाता है।

लोकल लीडरशिप भ्रष्ट और आदर्श रहित हैं। नीचे की नौकरशाही में कार्य के प्रति प्रतिबद्धता है ही नहीं। भ्रष्ट तो वह है ही। लोग अपमे बच्चे को नौकरशाही में भेजने के लिये तत्पर ही इस लिये होते हैं कि वह दोनो हाथ उलीच कर कमाये। और पंचायत का सिस्टम ही कमाने के लिये बना है। प्रधान बनने के लिये लोग जो खर्च करते हैं, उसका औचित्य मात्र आगे होने वाली कमाई से ही ठहराया जा सकता है। अत: बहुत कुछ सम्भावनायें नहीं लगतीं कि कोरोना काल में वापस आये हुनरमंद लोगों का प्रयोग कर उत्तर प्रदेश चमक जायेगा। और अगर कोई चमत्कार हुआ तो वह इस प्रांत का सौभाग्य होगा। वैसे; इस प्रांत का सौभाग्य देखने की आशा में छ दशक गुजार दिये हैं मैंने।


सवेरे साइकिल ले कर निकलना होता है भोर की वेला में। आजकल सूर्योदय सवा पांच बजे होता है। मैं घर से पांच बजे, या उससे कुछ पहले ही निकल लेता हूं। उगते सूरज के दर्शन रास्ते में ही होते हैं। सड़क उधड़ गयी है। अब आसानी से बनने की भी सम्भावना नहीं लगती। सड़क मरम्मत का काम मनरेगा का हिस्सा नहीं है। यह अगर कर दिया जाये तो लोगों को मिलने वाले काम की तार्किक सार्थकता हो सके। वर्ना मनरेगा मात्र पैसा बांटने का औजार है। जिसे कांग्रेस ने वोट कबाड़ने के लिये निर्मित किया था और जिसे छ साल बाद भी नयी सरकार परिष्कृत नहीं कर सकी (सिवाय यह कहने के कि अब मजदूरी सीधा खाते में जाती है)।

सड़क उधड़ी है, धूल जमा है, और उसी पर गाय-गोरू बांधे भी जाते हैंं, दुहे भी जाते हैं।

सवेरे सड़कों का उधड़ा होना मेरी साइकिल को पसंद नहीं आता होगा, पर मैं उसके कारण होने वाली असुविधा को सवेरे के व्यायाम का एक अंग मान कर चलता हूं।

लगभग एक सवा घण्टे साइकिल चलाने के बाद घर लौटने पर अखबार पढ़ना, मोबाइल, लैपटॉप, टैब पर नयी ठेली सामग्री देखना, अपने ब्लॉग के पाठकों के आंकड़े निहारना – यही सब काम दिन भर रहता है। टेलीविजन पर जो पुराने सीरियल की भरमार आयी थे, वह अब थम चुकी है। खबरी चैनल व्यर्थ चिंंचियाते रहते हैं। उन्हें देखने सुनने का मन नहीं करता। कुछ वीडियो सब्स्क्रिप्शन अच्छी सामग्री देते हैं। उन्हें देखना होता है, अगर इण्टरनेटदेव की कृपा रही। वह कृपा कम ही रहती है।

अगर साइकिल चलाने को न मिले तो गांव में क्वालिटी समय व्यतीत करना कठिन होता है। वह दो तीन दिन में स्पष्ट हो गया है। अपने कार्य और सोच में बदलाव करना होगा।

कुछ करो जीडी!


स्वैक्षिक लॉकडाउन या अपने पर ओढ़ा एकांतवास #गांवकाचिठ्ठा

पछुआ हवा है। लू बह रही है। वे भविष्यवक्ता जो कह रहे थे कि तापक्रम बढ़ते ही कोरोनावायरस अपने आप खतम हो जायेगा, अपनी खीस निपोर रहे हैं। ज्योतिषी लोग अपने अपने गोलपोस्ट बदल रहे हैं।


मई 25, 2020, विक्रमपुर, भदोही।

मेरी प्रवृत्ति के विपरीत है यह।

चलते चलते अचानक रुक जाना और सड़क के किनारे चाक चलाते कुम्हार का चित्र लेना, या अचानक साइकिल का हैण्डल पतली सी पगडण्डी से गंगा किनारे जाने की ओर मोड़ देना, कभी साइकिल सड़क पर खड़ी कर पतली सी मेड़ पर अपने को बैलेन्स करते चलना और दूर किसी धोख का विभिन्न कोणों से चित्र लेना – ये सब मेरे वे कृत्य हैं, जो मुझे मेरी नजर में “अपने को विशिष्ट” बनाते हैं। किसी भी दुकान पर आवश्यक/अनावश्यक चीज की तहकीकात करना और मन होने पर खरीद लेना, उसी औरों से अलग होने की अनुभूति को पुष्ट करना ही है। कभी कभी लगता है कि मैं शहर के अपने कम्फर्ट-जोन को तिलांजलि दे कर गांव में इसलिये हूं कि उस वैशिष्ट्य को निरंतर भोगना चाहता हूं। मैं अगर धनी होता, सम्पन्न होता तो उस वैशिष्ट्य की प्राप्ति के अलग औजार होते। अब जो हैं, सो हैं।

मेरी प्रवृत्ति के विपरीत है दिन में तेईस घण्टे स्वैक्षिक लॉकडाउन या एकांतवास में रहना। ऐसा नहीं है, कि मुझे भीड़ में होना प्रिय है। एकांतवास मैं चाहता हूं। पर वह जनअरण्य से दूर, अलग घूमने, देखने और सोचने का एकांतवास है। जब मैं कोविड19 संक्रमण के कारण, 23 घण्टे घर के चारदीवारी में बंद रहने का निर्णय करता हूं, तो उसमें (बावजूद इसके कि स्वयम को अंतर्मुखी घोषित करता हूं)  बहुत कुछ त्यागने का भाव है।

आज सवेरे 5 से 6 के काल की बहुत प्रतीक्षा थी। कल शाम को ही साइकिल की हवा चेक कर ली थी, कि कहीं सवेरे ऐन मौके पर हवा भरने के पम्प को खोजना-चलाना न पड़े। अपनी दाढ़ी का भी शाम को ही मुआयना कर लिया था कि कहीं सवेरे इतनी बढ़ी हुई न हो कि बाहर निकलने के पहले दाढ़ी बनाने की जरूरत महसूस हो, और वह बनाने में दस मिनट लग जायें।

भोर का समय, निपटान के लिये खेत जाने का समय।
औरतें निपटान के लिये जाती, या निपटान कर आती हुईं।

पांच बजे निकलना था, पर मैं चार पचास पर ही निकल लिया। अन्धेरा छंटा नहीं था, पर इतना भी नहीं था कि सड़क न दिखे। इक्का दुक्का लोग थे। आसपास के खेतों में धब्बे की तरह लोग दिखे निपटान करते। फसल नहीं थी, खेत खाली हैं, तो निपटान करते लोग दिखते हैं। स्त्रियाँ भी थीं। स्पष्ट है कि हर घर में शौचालय बन गये हैं, सरकारी खर्चे पर; पर लोग उनका प्रयोग उतना नहीं कर रहे, जितना होना चाहिये। उनके प्रयोग के लिये पर्याप्त पानी की आवश्यकता है। उनको साफ रखने के लिये कुछ न कुछ खर्चा जरूरी है। पर जब पानी हैण्डपम्प या ट्यूब वेल से 20-25 मीटर ढोया जाता है, तो शौचालय साफ करने के लिये पानी श्रम लगा कर ढोना जरूरी नहीं लगता। लिहाजा, शौचालय मॉन्यूमेण्ट हैं और लोग-लुगाई खेत या सड़क/रेल की पटरी की शरण में जाते हैं।

गांवकाचिठ्ठा में यह सब लिखना इसे एक सटायर का सा रूप देता है। सटायर लिखना ध्येय नहीं अत: विषय परिवर्तन करता हूं।

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संक्रमण के बढ़ते मामले और व्यक्तिगत लॉकडाउन की जरूरत #गांवकाचिठ्ठा

संक्रमण ग्रस्त होना या न होना – एक पतली सी लाइन से विभक्त होता है। उसमें एक ओर बचाव है, रोचकता है, प्रयोग हैं और सोचने, पढ़ने, लिखने की सम्भावनायें हैं; दूसरी ओर संक्रमण है, रोग है, अस्पताल है, अकेलापन है, परित्यक्त होने का दारुण दुख है और (शायद) मृत्यु भी है।


ट्विटर पर अतिशयोक्ति जी ने पूर्वांचल के कोविड19 मामले द्विगुणित होने के दिनों की गणना के ग्राफ प्रस्तुत किये हैं। इसके अनुसार पूर्वांचल (प्रयाग, भदोही, मिर्जापुर, जौनपुर, वाराणसी, प्रतापगढ़, सोनभद्र और आजमगढ़) में कोरोना संक्रमण के मामले लगभग 5-7 दिन में दुगने हो रहे हैं।

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लौटे प्रवसियों की प्राथमिकता कोरोना से बचाव नहीं, रोजगार है #गांवकाचिठ्ठा

यह जो बड़ी संख्या में आबादी आ कर गांव में टिकी है, वह यह नहीं पता कर रही कि यहां अस्पताल कितने हैं; कितने बिस्तर उनमें कोविड19 के लिये हैं; … वे यह जानना चाहते हैं कि रोजगार कब, कहां और कैसे मिलेगा।


मई 23, 2020, विक्रमपुर, भदोही

अखबार में कहीं पढ़ा कि आरएसएस ने कोई आंतरिक सर्वे कराया है जिसमें प्रवासी पलायन कर वापस आये साठ फीसदी मजदूर कहते हैं कि मौका लगने पर वे वापस लौटेंगे, अपने काम पर। मैंने जिससे भी बात की है – वापस लौटने वाले से, वह कोविड समस्या से बड़ी समस्या अपने रोजगार की मानता है। पर, फिलहाल, वापस जाने के लिये अभी लोग दुविधा में हैं।

हरिशंकर से मिला था तो उनका कहना था कि सूरत से आते समय उनके मन में यह पक्की धारणा थी कि वापस नहीं जाना है; यद्यपि उनका 10 हजार का घरेलू सामान वहां रखा हुआ है। ठाकुर साहब, जिनके कमरे में हरिशंकर किराये पर रहते थे, उन्होने अगले दो-चार महीने किराया न लेने की बात कही है। इस दौरान वैसे भी कोई और किरायेदार मिलता भी नहीं।

हरिशंकर, सूरत से वापस लौटे हैं
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यह सतर्क रह कर सामान्य जीवन जीने का समय है #गांवकाचिठ्ठा

कोरोना को लेकर बहुत सी भ्रांतियां डाक्टरों ने, मीडिया ने और राजनेताओं/सेलीब्रिटीज ने फैलाई हैं। वे भ्रांतियां जितनी शहरों में हैं, उतनी गांवों में भी हैं।



गाँव में वैसी दशा नहीं है कि व्यक्ति एक फ्लैट में कैद हो कर रह जाये। मुझे तो सामान्य दिनों की तरह 10-12 किलोमीटर साइकिल चलाने को मिल ही जाता है। बहुत ज्यादा बहिर्मुखी नहीं हूं, तो आपस में आदान प्रदान की जो भी थोड़ी बहुत जरूरते हैं, आसानी से पूरी हो ही जाती हैं। पर घर के बाकी सदस्य शायद वह नहीं कर पा रहे। अपनी पुत्रवधू से बहुत ज्यादा बातचीत नहीं है इस विषय में, पर पत्नीजी को तो देखता हूं, गतिविधियों में परिवर्तन और अवरोध के कारण समस्या हो रही है। कुछ दिन पहले उनका रक्तचाप और धड़कन ज्यादा थी। उनसे रक्तचाप की दवा नियमित लेने को कहा। आज भी लगता है हाइपर टेंशन का उनका प्रबंधन उपयुक्त नहीं है। आज उन्हें डाक्टर को दिखाने की आवश्यकता महसूस हुई। उनकी उम्र 2019 में साठ साल की हो गयी है। रक्तचाप और मधुमेह का उनका प्रबंधन इस समय, जब कोरोना संक्रमण काल में उन्हें किसी भी अन्य व्याधि से मुक्त होना जरूरी है, पूरी तरह दुरुस्त होना चाहिये। इसलिये उन्हें डाक्टर के पास अस्पताल ले कर गया।

सूर्या ट्रॉमा सेण्टर एण्ड हॉस्पीटल की ओपीडी

अस्पताल में सामान्य से कहीं कम मरीज थे। दरबान ने हमारे हाथ सेनिटाइज किये और एक अस्पताल कर्मी ने हमारा थर्मल स्केनिंग किया। डाक्टर साहब पूरी सोशल डिस्टेंसिंग के साथ मेरी पत्नीजी से मिले। दस दिन की दवायें लिखी हैं और उसके बाद आवश्यकतानुसार टेस्ट कराये जायेंगे। एक कस्बाई अस्पताल (सूर्या ट्रॉमा सेण्टर एंड हॉस्पीटल, औराई) में भी इस प्रकार का प्रोटोकॉल – मुझे प्रभावी लगा। कोरोना विषाणु अपनी इतनी इज्जत देख कर वाकई प्रसन्न होगा। या कष्ट में होगा? पता नहीं। अस्पताल का वातावरण उसके प्रसार को रोकने में पूरी तरह प्रतिबद्ध नजर आया।   

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पूर्वांचल में कोरोना प्रसार का प्रारम्भ है यह। #गांवकाचिठ्ठा

न केवल इन जिलों के मामले नित्य बढ़ रहे हैं; वरन अगले दिन बढ़ने की दर पिछले दिन बढ़ने की दर से ज्यादा है। अर्थात, मामले बढ़ने की दर भी बढ़ रही है। यह अलार्म है – स्पष्ट और तेज आवाज का अलार्म।


मई 20, 2020, गांव विक्रमपुर, भदोही।

लोग भारत के कोरोना प्रसार के आंकड़े प्रस्तुत करते हैं। प्रांत के भी आंकड़े देते हैं। महानगरों के आंकड़े भी परोसे जाते हैं। पर उत्तरप्रदेश एक समांग इकाई नहीं है। प्रांत के पूर्वी भाग की प्रकृति और अर्थव्यवस्था अन्य हिस्सों से अलग है। इसलिये, यहां कोरोना संक्रमण का प्रसार भी (सम्भवत: ‌) अलग प्रकार से होगा। मैंने इस धारणा के आधार पर भदोही के आसपास के वे जिले लिये, जिनमें संक्रमण के मामले अपेक्षाकृत अधिक संख्या में हैं। प्रयाग, मिर्जापुर, वाराणसी, जौनपुर, गाजीपुर और भदोही को चुना। नित्य इनके कुल कोरोना आंकड़े नोट करना प्रारम्भ किया। पिछले तीन दिन के इन जिलों के आंकड़े बताते हैं कि न केवल इन जिलों के मामले नित्य बढ़ रहे हैं; वरन अगले दिन बढ़ने की दर पिछले दिन बढ़ने की दर से ज्यादा है। अर्थात, मामले बढ़ने की दर भी बढ़ रही है। यह अलार्म है – स्पष्ट और तेज आवाज का अलार्म।

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