द्वारिकापुर का डोम – मयंक चौधरी


पहली बार वहां सरपत की झोंपड़ी देखी गंगा किनारे द्वारिकापुर गांव में। दरवाजे की टटरी बंद थी। मैं उस झोंपड़ी का चित्र लेने लगा तो वह किशोर बाहर निकल आया। नंगे बदन। मात्र एक गमछा लपेटे। उत्तरीय के रूप में मात्र एक माला।

नाम बताया मयंक चौधरी। घाट का डोम। पहले बनारस के घाट से आया जाया करता था रोज। अब यहीं रहने लगा है कुछ महीने से। उसकी दादी यदा कदा आकर उसका इंतजाम देख जाती हैं। दादी यहां रुकती नहीं।

मयंक ने बताया कि वह मुझे जनता है। एक बार मेरे परिवार के लोग भी आए थे तो उसने देखा था।

वह एक माला पहने था – जिसके मनके खोपड़ी के आकार के थे। उसने बताया कि पत्थर से बनाए जाते हैं बीड्स। उसकी माला और उसके बोलने का अंदाज – आवाज में हल्की लटपटाहट – सब उसे हल्का रहस्यमय व्यक्तित्व बना रहे थे। पास खड़े एक सज्जन ने बाद में बताया कि यहां घूमता रहता है वह पर रात में बहुधा कमहरिया के अघोरी आश्रम में चला जाता है।

मसान, खोपड़ी, चिता, अघोरी… अजब योग था सवेरे सवेरे मेरे भ्रमण में!

अपने धंधे के बारे में मयंक ने बताया कि चिता को आग देने के लिए वह 300रू या अधिक लेता है। कभी एक चिता होती है और कभी तीन चार भी। मरने का भी मौसम होता है… गरीब और विपन्न को वह बिना कुछ लिए अग्नि देता है। मुसहर आते हैं तो उनसे कुछ नहीं मांगता वह।

चलते चलते मैंने उससे हाथ मिलाया। कभी किसी घाट के डोम से हाथ मिलाया हो – याद नहीं आता। आपने मिलाया है?

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पण्डित बृजकिशोर मणि त्रिपाठी


कल शाम को मुझे बताया कि दो सज्जन आये हैं, मुझसे और मेरी पत्नीजी से मिलना चाहते हैं। मुझे लगा कि कोई व्यक्ति रविवार की शाम बरबाद करना चाहते हैं – किसी पोस्टिंग/ट्रांसफर छाप अनुरोध से। पर जो व्यक्ति मिले, मानो मेरा सप्ताहांत बन गया!

मिलने वाले में थे पण्डित बृजकिशोर मणि त्रिपाठी और उनके सुपुत्र द्वारकाधीश मणि। यहां बेतिया हाता में रहते हैं। पास के जिले महराजगंज में उनका गांव है जमुई पण्डित। नाम से लगता है ब्राह्मणों का गांव होगा। उनके गांव के पास का रेलवे स्टेशन है सिसवांबाजार।

पण्डित बृजकिशोर मणि त्रिपाठी
पण्डित बृजकिशोर मणि त्रिपाठी

मेरे पत्नीजी के नाना थे श्री देवनाथ धर दुबे। उनकी सबसे बड़ी बहिन का विवाह हुआ था जमुई पण्डित। उनके लड़के हैं पण्डित बृजकिशोर मणि। तीन पीढ़ी पहले का और वह भी परिवार के ब्रांच-ऑफ का रिश्ता। पण्डित बृजकिशोर मणि उस सुषुप्त रिश्ते को जीवंत कर रहे थे हमारे यहां पधार कर। पहले तो मैने उन्हे नमस्कार किया था, पर परिचय मिलने पर हाथ स्वत: उनके चरणों की ओर झुक गये चरण स्पर्श के लिये।

वे वास्तव में अतिथि थे – जिनके आने की निर्धारित तिथि ज्ञात नहीं होती पर जिनका आगमन वास्तव में हर्ष दायक होता है। मैं और मेरी पत्नी, दोनो आनन्दित थे उनके आगमन से।

बृजकिशोर मणि जी ने बताया कि नानाजी (श्री देवनाथधर दुबे) उनके गांव आया करते थे। सिसवांबाजार स्टेशन पंहुचा करते थे और उनके आने की चिठ्ठी पहले से मिली रहती थी। चिठ्ठी के अनुसार उनको लाने के लिये गांव से हाथी पहले से भेजा रहता था। जमींदारी थी बृजकिशोर जी के कुटुम्ब की। हाथी घर का ही था। उन्होने बताया कि लगभग पच्चीस साल पहले हाथी मरा। उसके बाद हाथी रखने की परम्परा समाप्त हो गयी। अब परिवार यहां गोरखपुर में बेतियाहाता में रहता है। किसानी के लिये बृजकिशोर जी गांव आते जाते हैं। गांव में धान और गेंहू की खेती होती है। कैश क्रॉप के रूप में पेपर्मिंट (एक प्रकार का पुदीना) की खेती करते हैं। मैने पूछा कि कैश क्रॉप की चोरी नहीं होती? द्वारकाधीश ने बताया कि नहीं। उसे तो गाय-गोरू-बकरी भी नहीं चरते! उसके खेत में ठण्डक रहती है इस लिये अन्य खेतों की तुलना में जहरीले सांप जरूर ज्यादा रहते हैं वहां! 

जमुई पण्डित में राधा-कृष्ण मन्दिर
जमुई पण्डित में राधा-कृष्ण मन्दिर

द्वारकाधीश मणि ने मुझे गांव आने का निमंत्रण दिया। यह भी बताया कि वहां तीन शताब्दी पुराना राधा-कृष्ण का मन्दिर भी है जो उनके परिवार का बनवाया हुआ है। उस मन्दिर का एक चित्र भी उन्होने अपने मोबाइल से दिखाया। 1780 के आसपास बने इस मन्दिर में गुम्बद मुझे नेपाली और मुगलिया स्थापत्य से प्रभावित लगा। कभी जा कर मन्दिर देखने का सुयोग बना तो आनन्द आयेगा!

मैने वाराणसी में अपने ससुराल पक्ष के लोगों से पण्डित बृजकिशोर मणि त्रिपाठी से मुलाकात के बारे में चर्चा की तो सभी को बहुत अच्छा लगा। मैने पाया है कि हम जमाने के साथ कितना भी निस्पृह बनने लगे हों; रक्त में कुछ ऐसा है जो अपनी और पारिवारिक जड़ों से जुड़ाव से आल्हादित होता है; सुकून पाता है।

मुझे लगता है, पण्डित बृजकिशोर मणि त्रिपाठी और उनके लड़के द्वारकाधीश में जड़ों से जुड़े रहने की भावना और भी पुख्ता होगी। तभी उन्होने पहल की।

मेरे पत्नी और मैं, जो उनके आने के समय असहज थे कि न जाने कौन मिलने वाले आये हैं; उनके जाने के समय इमोशंस से भरे थे। पण्डित बृजकिशोर मणि त्रिपाठी जी को चरण स्पर्श कर हम दोनो ने विदा किया। उनके जाने के बाद बहुत देर तक उनकी, और अपने परिवार के बुजुर्गों की चर्चा करते रहे।

भगवान प्रसन्नता के लिये कैसे कैसे योग बनाता है।  पण्डित बृजकिशोर मणि त्रिपाठी हमारी प्रसन्नता के निमित्त!

शराफत अली का चित्र


अपने ठिकाने पर बैठे काम करते शराफत अली।

शराफत अली पर मैने एक पोस्ट लिखी थी – शराफत अली ताला चाभी वर्क्स। उसके बाद मेरे एक सहकर्मी श्री राजेश उनसे यह अनुरोध करने गये थे कि वे मुझसे मिलना स्वीकार कर लें। पर शराफत अली नहीं मिले

मैने (बहुत कम) शराफत अली को उनकी दुकान पर देखा है। पर दफ्तर जाते हुये अपने मोबाइल का कैमरा तैयार रखता हूं, कि शायद शराफत अली को उसमें उतार सकूं। बहुधा तेज चलते वाहन में, या किसी और के बीच में आ जाने से, या कोण न बन पाने से अथवा शराफत अली के उपस्थित न होने से यह सम्भव नहीं हो सका। आज सात महीने से ऊपर हो गये, तब जा कर शराफत अली कैमरे में उतर सके!

जैसा मैने किया – सतत यत्न कर एक चित्र लेने का प्रयास करना, जो मैं कभी भी उतर कर उनसे मिल कर ले सकता था, वह क्यों होता है?

कोई उत्तर नहीं, बस एक खुराफात। शराफत अली के साथ खुराफात! 😆

ऐसी छोटी खुराफातों से जाहिर होता है कि हम फन्ने खाँ नहीं बन सकते। हम छोटी छोटी खुराफातों के लायक ब्लॉगर भर हैं!

शराफत अली मेरा वह परिवेश है, जो चीन्हा है, पर अबूझा है। उपनिषद में अस्तित्व के अनेक स्तरों/तहों/कोषों की चर्चा है। इसी तरह अपने परिवेश के भी अनेक तह हैं। शराफत अली एक महत्वपूर्ण तह में आते हैं। एक पूरा समाज है जो मेहनत, जद्दोजहद और अपने आसपास की हार्मोनी (तारतम्यता) में जीता है। इस समाज का में दृष्टा मात्र हूं। जब इसको बूझ पाऊंगा, तो शायद एक सशक्त ब्लॉगर बन पाऊंगा। या शायद सशक्त लेखक। … पर यह सब हवाई बातें हैं। मेरी विश लिस्ट बहुत लम्बी है और लम्बोतरी होती जा रही है। 😦 😆 

[आप कहेंगे कि फोटो साफ नहीं आयी है। वह शायद मुझे बेहतर मोबाइल खरीदने को प्रेरित करे, बनिस्पत इसके कि मैं टहलते हुये शराफत अली जी के पास जा कर उनका चित्र लूं! 🙂 ]

ब्लॉगिंग और टिप्पणी प्रणाली की स्केलेबिलिटी (बनाम अमर्त्यता)


ब्लॉगिन्ग और कमेण्टोलॉजी की स्केलेबिलिटी - मानसिक हलचल की पोस्ट

यह मेरी इस ब्लॉग पर 997वीं पोस्ट है। हजार के समीप होने पर विचार मन में आता है कि इस ब्लॉग के लिये किस प्रकार के यत्न मैने किये और किस प्रकार का नफा/आनन्द/किक मुझे मिला।

यह ट्रांजियेण्ट फेज भी हो सकता है। इस समय कोहासे कि खिचिर खिचिर में मालगाड़ियां खचर खचर चल रही हैं। सो किसी भी प्रकार का विश्लेषण बहुत ब्वायेण्ट (buoyant) नहीं हो सकता। पर जितनी समझ है, उसके अनुसार बहुत ऑफ-द-मार्क भी नहीं होगा।

ब्लॉगिंग, एक तरह से उपमा दी जाये तो प्रॉस्टीट्यूशन और रोमाण्टिक लव अफेयर के बीच की चीज है (अगर आप इस उपमा को वल्गर मानें तो इसे जर्राह और फीजियोथेरेपी की किताब के बीच की चीज मान सकते हैं)। प्रॉस्टीट्यूशन में एक व्यक्ति जितना समय व्यतीत करता है, उसके अनुपात में उसे मेहनताना मिलता है। अगर वह काम बन्द कर दे तो लाभ मिलना बन्द हो जायेगा। नॉन-स्केलेबल है वह काम। लव अफेयर में आपके प्रयत्न की स्केलेबिलिटी (scalability – सिस्टम का वह गुण जिससे काम के बढ़े स्तर पर भी कार्यकुशलता व्यक्तिगत क्षमता से कहीं अधिक बढ़ती जाती है)  है। एक बार के यत्न का भविष्य में लाभ मिलता रहता है। Continue reading “ब्लॉगिंग और टिप्पणी प्रणाली की स्केलेबिलिटी (बनाम अमर्त्यता)”

देव दीपावली की सुबह और कोहरा


कल कार्तिक पूर्णिमा थी। देव दीपावली का स्नान था घाट पर। सामान्य से अधिक स्नानार्थियों की भीड़। पर कोहरा बहुत घना था। कछार की माटी/रेत पर मोटी परत सा फैला था। घाट की सीढ़ियों से गंगामाई की जल धारा नहीं दीख रही थी। लोग नहाने के लिये आ जा रहे थे, लगभग वैसे ही जैसे एक पंक्ति में चींटियाँ आती जाती हैं – बस आगे वाले पर नजर गड़ाये।

हम घाट पर जाने की बजाय घूमने के लिये तिरछा मुड़े कछार में तो हमारा कपड़ों की मरम्मत करने वाला दर्जी मिला। सवेरे सवेरे वह कछार में निपटान और दातुन करने जाता है। उसने हमें हिदायत दी कि ज्यादा दूर तक न जाइयेगा। शायद कल कछार में मारपीट हुई थी – घाट पर पुलीस वाले भी दीख रहे थे। या यह भी हो सकता है कि कोहरे की अधिकता के कारण उसने कहा हो।

खैर, बहुत ज्यादा नहीं घूमे हम कछार में। कोहरे के कारण रोज के सवेरे की सैर वाले भी नहीं दिख रहे थे। वापसी में कोहरा कुछ कम हुआ और सामान्य से लगभग बीस मिनट देर से दिखे सूर्यदेव। आसमान में थोड़ा और ऊपर पंहुच गये थे, पर चटक लाल नहीं हो पाये थे। अपनी किरणों से कोहरे को खोदने का प्रयास कर रहे थे, पर कोहरा जो था, सो अजगर की तरह हिलने का नाम नहीं ले रहा था।

वापसी में घाट पर मेले की दुकाने जम गयी थीं। सिन्दूर, रोली की शंकु के आकार की ढ़ेरियां, नारियल, बिल्वपत्र, फूल, लाचीदाना-प्रसाद, प्लास्टिक के खिलौने-पिपिहरी इत्यादि की दुकानें। पण्डाजी का संकल्प-दान उद्योग तेजी पर था। लोग संकल्प में चावल और नयी आलू दे रहे थे।



शिवकुटी घाट पर संकल्प कराते पण्डाजी।
काश हम भी पण्डा होते तो घर में भोजन सब्जी की फिक्र नहीं करनी पड़ती। संकल्प मंत्र पढ़ते और उसमें फिलर के रूप में फलाना मास ढिकाना दिन, ठिकाना गोत्र भर कर दक्षिणा खींचते! तब सवेरे उठते ही मालगाड़ियों की पोजीशन जानने और दफ्तर जाने की हबड़ तबड़ तो न होती! … अगले जनम में जो बनने की विश लिस्ट है, उसमें किसी इम्पॉर्टेण्ट घाट का पण्डा बनना भी जोड़ लेता हूं।

सीढ़ियों पर एक संपेरा भी बैठा था। हमे देख नाग को हुंडेरा (कोंचा) उसने। नाग ने फन ऊपर किया। दान की मांग जब उसने की, तब मुझे कहना पड़ा – पर्स नहीं लाया हूं बन्धु। वह संपेरा दरियादिल था। बोला – कोई बात नहीं, आप फिर भी तस्वीर खींच लीजिये।

उसे यह नहीं मालुम कि तस्वीर तो उसके बोलने के पहले ही ले चुका था मैं।

कोटेश्वर महादेव पर एक सज्जन ज्ञान बांट रहे थे – अरे नहान की क्या जरूरत? मन चंगा तो कठौती में गंगा! हम तो घर पर ही पूजा पाठ कर लेते हैं।  … उनकी शकल से नहीं लगता था कि पूजा पाठ करते होंगे। पर सवेरे सवेरे मन्दिर में आने का कष्ट क्यों किया उन्होने? समझ नहीं आया!

दुनियां में सब कुछ समझने के लिये थोड़े ही होता है! कुछ तो ऐसा होता है, जिसे देखा-सुना जाये जिससे कि बाद में ब्लॉग पर उंड़ेला जा सके! 😆

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जर्जर खण्डहर


लोग हैं जो इस पोस्ट के शीर्षक में ही दो शब्दों के प्रयोग में फिजूलखर्ची तलाश लेंगे। पर वह जर्जर है यानी वह मरा नहीं है। मूर्त रूप में भी अंशत: जिन्दा है और मन में तो वह मेरा बचपन समेटे है। बचपन कैसे मर सकता है?[1]

पर यह ख्याली पुलाव है कि वह जिन्दा है। एक मकान जिन्दा तब होता है जब उसमें लोग रहते हों। वहां रहता कोई नहीं। बचपन की याद है जब इस मकान में 100-150 लोग रहते थे!

मैने उसके रिनोवेशन का प्लान लोगों के समक्ष रखा पर कोई उसमें रुचि नहीं रखता। कुछ सूख गया है उसमें। एक बीमार वृद्ध की तरह वह कोमा में है, जिसके जीवित उठ बैठने की सम्भावना नहीं है।

वह खण्डहर है। प्रेत या प्रेतात्माओं को आमंत्रित करता ढांचा!  लोग चाहते हैं कि वह जमींदोज कर एक नये सिरे से घर बने।

सब लोग शहराती बन गये। गांव से निकले ऐसे कि वापस आना बन्द कर दिये। जिनकी पीढ़ी उससे जुड़ी थी, वे भी नहीं आते। नये बच्चे तो जानते ही न होंगे इस मकान के बारे में। पर सबके मन में जगह जमीन से लगाव है। यह लगाव कितना खर्च करा सकने की क्षमता रखता है – कहा नहीं जा सकता।

आगे आने वाले दिनों महीनों में यह जांचा जायेगा कि लोग क्या चाहते हैं। शायद मिलेंगे और तय करेंगे लोग जर्जर खण्डहर के बारे में!

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[1] कुछ महीने पहले मैं अपने गांव गया था – शुक्लपुर, तहसील मेजा, जिला इलाहाबाद। गांव बहुत कुछ बदला था, कुछ पहले सा था और कुछ ऐसा था जो क्षरित दशा में था। उसमें से था हमारा घर भी। सब लोग शहराती हो गये। गांव कोई जाता नहीं। जमीन आधिया पर दी गयी है। उससे कुछ अनाज मिल जाता है। बिना रासायनिक खाद की उपज होती है, अच्छी लगती है। पर वह वाणिज्यिक माप तौल में नगण्य़ सी आमदनी है। … अप्रासंगिक सा हो गया है गांव। सिवाय पुरानी यादें, और उन्हे रिवाइव करने की एक ललक; इसके अतिरिक्त कुछ नहीं है वहां पर। मुझे बताते हैं कि आजकल की ग्रामपंचायत की राजनीति कुछ ऐसी हो गयी है कि गांव में रहने के लिये अलग तरह की मनोवृत्ति चाहिये।

मैं रीवर्स माइग्रेशन के स्वप्न देखने-जीने वाला व्यक्ति हूं। पर कुल मिला कर कुछ खाका बन नहीं पा रहा भविष्य में गांव से लगाव के प्रकार और गांव के घर में निवास को ले कर! 😦

एक अच्छे रेलवे डाक्टर के साथ


डाक्टर से वास्ता पड़ता है बीमार होने पर। उस समय आप (पढ़ें मरीज) केवल डाक्टर की दक्षता नहीं तलाशते। उनकी उपलब्धता, उनकी आपके प्रति सहानुभूति, प्रतिबद्धता, स्पष्टवादिता और उनका कॉमन सेंस – इन सब का समग्र तलाशते हैं।

पिछले दिनों हमें रेलवे ऑफीसर्स की फेडरेशन में कुछ डाक्टरों को सुनने का अवसर मिला। वे हमारे एक साथी विभागाध्यक्ष के असामयिक निधन पर उनकी बीमारी और उपचार के विषय में बता रहे थे। जैसा लाज़मी था, बात रेलवे के चिकित्सा सिस्टम की गुणवत्ता और उपयोगिता पर घूम गई।

कुछ अधिकारी यह कहते पाये गये कि अपने हिसाब से चिकित्सा कराते हैं – रेलवे प्रणाली के इतर। पर कुछ यह भी कह रहे थे कि उन्हे रेलवे की चिकित्सा व्यवस्था पर इतना विश्वास है कि वे रेलवे की चिकित्सा के अलावा कहीं और गये ही नहीं। यानी मुण्डे मुण्डे मतिर्भिन्ना! पर एक बात जरूर दिखी – जैसा किसी भी सर्विस से होता है – व्यापक असंतोष और आलोचना; वह रेलवे चिकित्सा व्यवस्था के बारे में इस ग्रूप ‘ए’ के अधिकारियों की बैठक में नहीं दिखी।

ऐसा नहीं है कि रेलवे अधिकारी अपनी बैठक में घोर आलोचना नहीं करते। कई मुद्दों पर विषय या व्यवस्था तो तार तार करने की सीमा तक आलोचना मैने देखी है। अत: यह मान कर चला जा सकता है कि बहुत से अधिकारी रेलवे चिकित्सा व्यवस्था को ठीक ठाक मान कर चलते हैं।

जैसे अधिकारी या कर्मचारी अलग अलग स्तर की गुणवत्ता के हैं, उसी तरह डाक्टर भी अलग अलग स्तर की गुणवत्ता के हैं। कई ऐसे हैं, जिनके पास कोई जाना नहीं चाहता। कई इतने दक्ष है कि उनके बराबर कोई शहर या प्रांत में नहीं होगा। यह दूसरे प्रकार के डाक्टर निश्चय ही बहुत व्यस्त रहते हैं।

डा. विनीत अग्रवाल, रेलवे अधिकारियों की बैठक में।

ऐसे एक दक्ष डाक्टर हैं डा. विनीत अग्रवाल। चूंकि मैं पिछले डेढ़ साल से कई बार बीमार हो चुका हूं, मेरा उनके सम्पर्क में बहुधा आना हुआ है। और जब भी मैं उनके चेम्बर में सोफे पर बैठा अपनी बारी की प्रतीक्षा करते हुये उनका कार्य देखता हूं; मुझे अपने कार्य करने से उसकी तुलना करने का मन होता है।

ट्रेन परिचालन में समस्यायें इंतजार नहीं करतीं कई बार एक नहीं अनेक अनेक कोणों से आपके पास उपस्थित होती हैं। एक समस्या आप निपटा नहीं पाते, दूसरी सामने होती है। आपको बहुत तेजी से निर्णय लेने होते हैं और कभी एक्यूट एमरजेंसी हो गई – जैसे कोई दुर्घटना, तब अनेक निर्णय एक साथ लेने होते हैं। इस तरह की दशाओं से मैं एक दो बार नहीं, लगभग रोज गुजरता हूं।

डाक्टर विनीत अग्रवाल के कार्य को देख कर मुझे यह लगता है कि मेरा और उनका कार्य अलग अलग है, पर समस्या (या उनके मामले में अलग अलग प्रकार के मरीज) को निपटने में जो गुण चाहियें, वे लगभग एक से हैं। … और जैसे (यदाकदा) मैं अपनी दक्षता पर आत्म-मुग्ध होता हूं; डाक्टर अग्रवाल की मरीजों को टेकल करने की दक्षता देख कर उसी प्रकार मुग्ध होता हूं

एक बार जब वे मेरा रक्तचाप जांच रहे थे,  उनके चेम्बर में एक मरीज को उसका सम्बन्धी लगभग घसीटते हुये ले कर दाखिल हुआ। वह मरीज अपने सीने पर हाथ रखे था और उसके चेहरे पर गहन पीड़ा स्पष्ट दीख रही थी। यह आकस्मिक आपात दशा थी। जितनी फुर्ती से डाक्टर विनीत ने उन सज्जन का ईसीजी किया, उनके लिये ह्वील चेयर का इंतजाम किया, आई.सी.यू. को साउण्ड किया और ईसीजी रिपोर्ट पढ़ कर मरीज को आई.सी.यू. भेजा वह मैं भूल नहीं पाता। कोई दूसरा होता तो जरूर हड़बड़ी में समय बर्बाद करता और देरी करता। पर डाक्टर अग्रवाल उस मरीज को देखने के बाद बिना विचलन के मेरा मामला देखने लगे। इस मामले में मैने इक्वानिमिटी (equanimity) का एक प्रत्यक्ष उदाहरण देखा।


मुझे यह नहीं मालुम कि रेलवे डा. विनीत जैसे अच्छे डाक्टरों को अपनी मैडीकल सेवा में भविष्य में रख पायेगी या नहीं। पर यह आशंका जरूर लगती है कि अच्छे डाक्टर (अच्छे अधिकारियों/मैनेजरों की तरह) सरकारी/रेलवे सेवाओं से विमुख होते जायेंगे। इस आशंका के चलते लगता है कि पोस्ट रिटायरमेण्ट चिकित्सा सम्बन्धी जरूरतों के लिये मुझे अपने और अपने परिवार के लिये रेलवे बैक-अप के साथ साथ एक ठीक ठाक मेडीक्लेम पॉलिसी जरूर ले लेनी चाहिये।

और मेडीक्लेम के बारे में सोचने वाला मैं अकेला रेल अधिकारी नहीं हूं!