स्वर्ण प्राशन – आयुर्वेदिक वैक्सीनेशन पद्धति और तिवारी दंपति का अभियान

बच्चों के ये डाक्टर दंपति इस स्वर्ण प्राशन की दवा को बहुत कारगर पा रहे थे, इसलिए इसे अभियान के रूप में अपनाने का संकल्प लिया. अन्यथा, कोई एलोपैथिक डाक्टर किसी आयुर्वैदिक चिकित्सा की प्रशंसा करने का पाप तो कभी नहीं करता. 😁



वे दोनों डाक्टर हैं. एक एलोपैथी के – डा. संतोष तिवारी. बच्चों के डाक्टर हैं और सूर्या ट्रॉमा सेंटर में वरिष्ठ कंसल्टेंट हैं. उनकी पत्नी हैं डा. शर्मिला तिवारी. वे आयुर्वेद की डाक्टर हैं – बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से पीएचडी. दोनों में प्रोफेशनल तरीके से छत्तीस का आंकड़ा होना चाहिए. मैंने पहले किसी एलोपैथी वाले और आयुर्वेदिक डाक्टर में हार्मोनी नहीं देखी. ताराशंकर बंद्योपाध्याय का उपन्यास “आरोग्य निकेतन” इन दोनों चिकित्सा पद्धतियों के झगड़े की पृष्टभूमि में लिखी गई कालजयी रचना है.

पर इस दम्पति ने यह अलग विधाओं का झगड़ा मिटा दिया है. और उसमें आयुर्वेद विनर है. दोनों पति पत्नी स्वर्ण प्राशन नामक आयुर्वेदिक इम्यूनोलॉजिकल सिस्टम की उपयोगिता पर न केवल सहमत हैं वरन उसके प्रचार प्रसार के लिए अपनी बहुत सी ऊर्जा लगा रहे हैं.

डा. संतोष से मैं सूर्या ट्रॉमा सेंटर (जहां आजकल अपने पिताजी के इलाज के सन्दर्भ में हूँ) में मिला. वे स्वर्ण प्राशन के कॉन्सेप्ट से परिचित थे पर आयुर्वेदिक पद्धति का होने के कारण उस पर ध्यान नहीं दिया था. जब अपनी बिरादरी के डाक्टरों की एक कांफ्रेंस में इसकी एक सज्जन ने चर्चा की तो इस भारतीय विरासत की ओर उनका रुझान बना.

काफी जांच परख के बाद संतुष्ट होकर, संतोष और शर्मिला जी ने वाराणसी में अपने सूर्या चिल्ड्रेन हॉस्पिटल के माध्यम से, इस इम्यूनोलॉजिकल प्रणाली को बतौर अभियान अपनाने का निश्चय किया.

डा. संतोष और शर्मिला तिवारी. उनका वाराणसी स्थित चिल्ड्रन अस्पताल

स्वर्ण प्राशन के बारे में मैंने अपने उज्जैन के आयुर्वेद के पीएचडी मित्र डा. प्रज्ञान त्रिपाठी से भी पता किया. उन्होंने भी सहमति व्यक्त की कि यह प्राचीन पद्धति है. मनुष्य के 16 संस्कारों में इसे स्थान दिया गया है. आयुर्वेद के अनुसार राजा का यह कर्तव्य होता था कि वह राज वैद्य की देख रेख में स्वर्ण भस्म का उत्पादन कराये. राज वैद्य राज्य के 16 वर्ष से कम आयु के सभी बच्चों को पुष्य नक्षत्र के दिन (27 दिन में एक बार आने वाला दिन) यह भस्म चटाया करते थे. 16 वर्ष की उम्र तक 24 खुराक हर बच्चे को देने का विधान था. इसके दिए जाने पर बच्चे में रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती थी और उसकी मेधा शक्ति का विकास होता था.

डा. संतोष और शर्मिला तिवारी ने 2017 में अपने अस्पताल में इस भस्म को बच्चों को देने का कार्यक्रम प्रारंभ किया. 13 जनवरी 2017 के दिन 100 के लगभग बच्चे पंजीकृत थे यह दवा देने के लिए, पर आए 173. उनको स्वर्ण भस्म घी में मिश्रित कर चटाई गई. बच्चों की संख्या बढ़ती गयी और तिवारी दंपति का उत्साहवर्धन भी होता गया इस अभियान में. आज इस दवा के लिए 1600 बच्चे पंजीकृत हैं. ये मुख्यतः उत्तर प्रदेश के पूर्वी भाग और बिहार के बच्चे हैं.

शुरू में अभियान के प्रचार प्रसार के लिए इन्होंने विज्ञापन का भी सहारा लिया. कालांतर में दवा की उपयोगिता लोगों को स्वयं समझ में आने लगी.

डा. संतोष तिवारी ने मुझे बताया कि यह दवा धूतपापेश्वर नामक आयुर्वेदिक कम्पनी बनाती है. वेब सर्च में पता चलता है कि यह ऑनलाइन भी उपलब्ध है. पर इस दवा को बच्चे को देने का भी एक विधान है. यह घी में मिश्रित कर चटाई जाती है पुष्य नक्षत्र के दिन.

तिवारी दंपति स्वर्ण भस्म धूतपापेश्वर से लेते हैं और ब्राह्मीघृत नागार्जुन औषधालय से. पुष्य नक्षत्र के दिन जितने बच्चे आने वाले हों, उनके अनुपात में इन दोनों दवाओं का मिश्रण कर टाइट्रेशन किया जाता है. उससे प्राप्त औषधि 1 से 4 मिलीलीटर मात्रा में प्रत्येक बच्चे को चटाई जाती है.

आप डा. शर्मिला तिवारी के एक वीडियो 👇 को देखने का कष्ट करें.



यह अभियान कितना कारगर है?

डा. संतोष ने बताया कि बहुत कारगर पाया है उन्होंने इसको अपने प्रयोगों में. जौनपुर की एक महिला जो अपने सभी बच्चों को इस इम्यूनाईजेशन के लिए लायी थी ने 6 खुराक के बाद बताया कि उसके बच्चे जो महीने में 26 दिन बीमार रहते थे अब दवा के लिए बीमार दशा में नहीं, पिकनिक मनाने आते हैं. कई बच्चों की इनहेलर की दरकार खत्म हो गई. इस दवा के द्वारा इम्यून हुए 1 हजार बच्चों में केवल 5 ही डेंगू ज्वर से पीड़ित हुए और उनमें से किसी को भी अस्पताल नहीं भर्ती करना पड़ा. स्वॉइन फ्लू के कोई मामले नहीं आए इस दवा से इम्यून किए बच्चों में.

और असल फायदा तो तराई के इलाके में हुआ. गोरखपुर और उसके आसपास, जहां एनसेफलाइटिस के कारण बहुत से बच्चों की अकाल मृत्यु हुई थी, के स्वर्ण प्राशन दवा से इम्यून हुए बच्चों में एनसेफलाइटिस का एक भी मामला नहीं पाया गया.

इम्यूनिटी के लाभों के अलावा बच्चे की मेधा, एकाग्रता, जिज्ञासा और ग्रहण की बेहतर क्षमता की बातें उनके अभिभावकों ने बताई हैं. डिस्लेक्सिया ग्रस्त बच्चों का रिस्पॉन्स भी बेहतर हुआ है.

तिवारी दंपति का सूर्या चिल्ड्रन अस्पताल. गुब्बारे और छोटा भीम चिकित्सा का अंग हैं. 😊 चित्र नेट से कॉपी किया गया

डा. संतोष के चेहरे पर अपने इस जुनूनी अभियान की सफ़लता को लेकर आत्म संतोष था. उनके चेहरे की चमक ही बता रही थी कि बच्चों के ये डाक्टर इस दवा को बच्चों के लिए कितना कारगर पा रहे थे.

अन्यथा, कोई एलोपैथिक डाक्टर किसी आयुर्वैदिक चिकित्सा की प्रशंसा करने का पाप तो कभी नहीं करता. 😁


डा. प्रज्ञान ने मुझे बताया कि मध्यप्रदेश में स्वर्ण प्राशन संस्कार का टीकाकरण व्यापक हो रहा है.

डा. संतोष भी कहते हैं कि योगी सरकार भी रुचि ले रही है. उत्तर प्रदेश में भी इसे सरकारी स्वास्थ कार्यक्रम में शमिल करने की संभावनाएं हैं….

वैसे भी, यह विधा भाजपा के राजनैतिक दर्शन और सामजिक सोच के साथ पटरी खाती है.

भविष्य में इस विधा पर ज्यादा सुनने को मिलेगा, यह संभावना है.


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सूर्य मणि तिवारी जी का सूर्या ट्रॉमा सेंटर और अस्पताल – एक अवलोकन

अस्पताल से कमाना तो सूर्य मणि जी का मोटिव हो ही नहीं सकता. पूर्वांचल के इस इलाके में लोगों की वैसी पे करने की केपेसिटी ही नहीं है.


मेरे पिताजी औराई के इस अस्पताल – सूर्या ट्रॉमा सेंटर और अस्पताल – में भर्ती हैं. उन्हे रक्त में संक्रमण था, जो सेप्टिसीमिया निकाला. संक्रमण की घोर वेरायटी. इसके अलावा उनकी बढ़ी उम्र के कारण डिमेंशिया की भी समस्या है. एक ओर का मस्तिष्क, वृद्धावस्था के कारण काफी क्षतिग्रस्त हो गया है.

सूर्य मणि त्रिपाठी (इन सेट में) और औराई में नया बना सूर्या ट्रामा सेंटर तथा अस्पताल

अस्पताल मेरे घर (गांव विक्रमपुर, भदोही जिला) के सबसे नजदीक (दस किलोमीटर दूर) नया खुला है. जब पिताजी को लेकर पंहुचा तो अस्पताल में किसी को जानता नहीं था. पर बिना किसी भटकाव के काउंटर पर संपर्क करते ही कर्मचारी पिताजी को ह्वील चेयर पर उतार कर आपात चेक अप के लिए ले आए और उपचार प्रारंभ हो गया.

पिताजी आई सी यू में

पूर्वांचल में जहां पहचान और सोर्स सिफारिश के बिना कुछ होता ही नहीं, हम सीधे पंहुचे और इलाज का काम शुरू हो गया. मुझे केवल उचित पेमेंट करने पड़े और दवा ला कर देनी पड़ी.

शाम तक मैं थक गया. हमने कुछ राशि एडवान्स जमा की जिससे रात में हमें आकस्मिक दवाओं के लिए न जगाया जाए. लेकिन फार्मेसी के एक कर्मी ने आधी रात जगा ही दिया – यह जानने के लिए कि दवा की दरकार है, वह दे दे तो सवेरे मैं पेमेंट कर दूँगा या नहीं.

रिटायर्मेंट के बाद किसी ने पिछले चार साल रात में फोन कर नहीं जगाया था. एक बार तो निद्रा में अपने को पुराने फ्रेम ऑफ माइंड में रख कर सोचने लगा कि शायद कोई ट्रेन एक्सिडेंट का मामला है. पर फोन की बात से समझ आ गया कि मामला अस्पताल की दुनियाँ का है, रेल की दुनियाँ का नहीं. रेल की दुनियाँ तो चार साल पहले छूट चुकी है. 😆

अगले दिन हर छोटे बड़े बिल का अलग अलग पेमेंट करते, वह भी कैश में, मैं उकता गया. मुझे समझ नहीं आया कि इतना बड़ा अस्पताल कैश की बजाय POS मशीन, UPI या Paytm से पेमेंट क्यों नहीं लेता; जब हर जगह स्टिकर लगे हैं कि “कृपया बिना रसीद के कोई पेमेंट न करें”?

श्री सूर्य मणि तिवारी

एक स्टिकर पर अस्पताल के मुखिया श्री सूर्य मणि तिवारी का फोन नंबर लिखा था. मैंने उन्हें फोन लगाया. पब्लिक को डिस्प्ले किए नंबर के बारे में सोचा कि वह कोई कर्मचारी मैनेज करता होगा. पर फोन तिवारी जी ने स्वयं उठाया और पूरी विनम्रता से बातचीत की.

मेरा पूरा नजरिया बदल गया उस बातचीत के बाद. तिवारी जी ने खेद व्यक्त किया कि अस्पताल नया होने के कारण POS मशीनें अभी नहीं आई हैं. कुछ ही दिन में आ जाएंगी. तब तक के लिए उन्होंने आस पास उपलब्ध एटीएम की जानकारी दी. उन्होने अपने चार्टर्ड एकाउंटेंट साहब, प्रशांत जी को भी मेरे पास भेजा. प्रशांत जी ने सूर्या ट्रामा सेंटर के बैंक खाते का विवरण दिया जिसमें मैं एडवान्स ट्रांसफर कर सकूं.

सूर्य मणि जी के पॉजिटिव एक्शन से मेरी समस्या का निदान हो गया. यह भी स्पष्ट हुआ कि यह अस्पताल खोलने का उनका ध्येय पैसा कमाना नहीं, अपने इलाके में परोपकार करने का है.

मैने तिवारी जी को हृदय से धन्यवाद दिया.

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इसके दो दिन बाद सूर्यमणि जी से फोन पर और आमने सामने एक लंबी परिचयात्मक बात हुई. उन्होने मेरे बारे में पूछा और अपना भी बताया. पता चला कि वे सेल्फ मेड व्यक्ति हैं. वे जब इंटर कॉलेज में थे, तभी उनके पिताजी का निधन हो गया था. पढ़ने मेें अच्छे थे तो पढ़ाई के बाद अध्यापक बन गये पास में जंगीगंज के एक स्कूल में. उन्हें जब यह समझ आया कि 3 भाई और दो बहनों का परिवार स्कूल मास्टरी की सेलरी में नहीं संभाला जा सकता तो घोसियां के अपने एक मित्र के पिताजी से कार्पेट व्यवसाय की बारीकियां समझी. 1971 में वह काम प्रारंभ किया और कालांतर में (1979 में) कार्पेट के बाजार, अमेरिका गए. वहां 1986 में अपने बेटे को ले जा कर पढ़ाया. इंजीनियर और एम बी ए बनाया.

सन 2004 में उनका अमरीका स्थित व्यवसाय 25 मिलियन (डालर) टर्नओवर का बना उनके अथक परिश्रम से.

उनकी वेब साइट surya.com से पता चलता है कि उनका लड़का सत्य उनकी कम्पनी का प्रेसीडेंट है. अब कंपनी टर्नओवर में 2004 की अपेक्षा छ गुना प्रगति कर चुकी है.

मुलाकात में मेरे पिताजी के ट्रीटमेंट के बारे में उन्होंने अपना जेनुईन कन्सर्न दिखाया. उन्होंने और यहां के प्रमुख प्रबंधक डा. रमण सिंह जी ने पिताजी के MRI जांच के बारे में व्यवस्था की.

मेरे जैसे रिटायर्ड व्यक्ति, जिसका विभागीय आभामंडल अब बिला चुका हो, के लिए इस तरह का कन्सर्न अगर सूर्य मणि जी और डा. रमण सिंह जैसे लोग दिखाएं – जिनके लिए मैं दो दिन पहले तक अजनबी था; तो निश्चय ही मेरे कुछ पूर्व संचित पुण्य होंगे. वर्ना कौन पूछता है?!

सूर्य मणि जी का कहना है कि फिलेन्थ्रॉपी के कोण से अगर मैं आनेररी आधार पर अस्पताल के लिए कुछ समय दे सकूं तो अच्छा होगा. मेरी पत्नी जी ने मुझे यह सुन कर कहा – “छुट्टा घूमने की तुम्हारी आदत हो गयी है. इसलिए मना करने की कोशिश करोगे ही. पर ऐसा करना मत. संपर्क बनाना और लोगों से जुड़ना कोई गलत बात नहीं. अंतर्मुखी बने रहे हो, पर वही सदा उचित नहीं होता.”

मुझे अपनी पत्नीजी और सूर्य मणि जी के कहने में सार दिखता है. पर अभी तय नहीं कर पा रहा हूँ कि मैं कर क्या सकता हूँ. अस्पताल की दुनियाँ मेरी आसक्ति की पटरी की नहीं है…

पर पटरी क्या है? गंगा किनारे छुट्टा घूमना और दस पांच पंक्ति लिख कर, एक दो फोटो सटा कर दिन पर दिन गुजरते देखना – वही पटरी है? शायद नहीं. पर सही क्या है?

शायद सूर्य मणि तिवारी जी के प्रस्ताव पर अपने जीवन के जड़त्व में कुछ बहाव लाऊँ. शायद.

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क्यूं बनाया है सूर्य मणि जी ने यह अस्पताल?

सूर्य मणि जी ने अस्पताल के एक कर्मी, भरत लाल मिश्र जी को मुझे पूरा अस्पताल दिखाने के लिए कहा. विभिन्न प्रकार के परीक्षण कक्ष, MRI तक की परीक्षण सुविधा से संपन्न, अत्याधुनिक ऑपरेशन थियेटर, फिजियोथेरेपी का विस्तृत कमरा, अनेक प्रकार के वार्ड, सेमी और पूरे प्राइवेट कमरे, केण्टीन, चार मंजिला विस्तृत रैम्प, एम्बुलेंस… सब कुछ इतना प्रचुर और आधुनिक कि किसी मेट्रो शहर के लिए भी उसे ट्रेंडी मान सकते हैं…. ऐसा अस्पताल विकसित हो रहा है यह. बस यहां के लिए डाक्टरों और प्रोफेशनल स्टाफ की और बड़ी फौज चाहिए. उसके लिए, लगता है सूर्य मणि जी सघन हेड हंटिंग में जुटे हैं.

यह है आने वाले समय का ऑपरेशन थियेटर. औराई एक कस्बा या गांव भर है, जहां यह उपलब्ध होगा सूर्या ट्रॉमा सेंटर में.

इतनी पूंजी और श्रम लगे अस्पताल से कमाना तो मोटिव हो ही नहीं सकता. पूर्वांचल के इस इलाके में लोगों की वैसी पे करने की केपेसिटी ही नहीं है. और बड़े शहरों से कोई मैडिकल टूरिज्म के लिए यहां आने से रहा.

केवल कॉर्पोरेट सोशल रिस्पॉसिबिलिटी का निर्वहन भी ध्येय नहीं हो सकता. उस मुद्दे पर अधिकांश कंपनियों को लिप सर्विस करते और उस मद के खर्चे में डंडी मारते मैंने देखा है.

यहां तो सूर्य मणि जी मानो पूरी साध और तन्मयता से अस्पताल बनाए हैं और विकसित कर रहे हैं….हर आधुनिक सुविधा, सहूलियत से संतृप्त अस्पताल की साकार होती परिकल्पना!

मुझे लगता है अगर कोई मोटिव है तो वह अपने इलाके की सेवा और अपनी सात्विक साख की पुष्टि ही हो सकता है. अन्यथा सारे आउट पेशेंट्स को बिना फीस लिए सुविधा देना जब कि पूरे इलाके में झोला छाप डाक्टर भी 100 रूपया झाड़ लेते हैं फटे हाल मरीज से… कोई (आसपास दिखता व्यापक और लूट खसोट का मैडिकल) व्यवसाय करने की वृत्ति तो कदापि नहीं है.

Man, at some point of time in life, breaks from mundane and starts living for his LEGACY. That’s the most pious moment. That can not come, unless the man has some substantial inner stuff in the core. सूर्य मणि जी के साथ वही हो रहा है.

इसी लिए शायद सूर्य मणि जी के इस यज्ञ में अपना योगदान, अपनी आहुति अर्पण करनी चाहिए.

तुम क्या करोगे, जी डी?


दिलीप चौरसिया का महराजगंज कस्बे का मेडीकल स्टोर

दिलीप मेडिकल स्टोर पर एलोपैथिक, आयुर्वेदिक और पशुओं की दवायें मिलती हैं। … पशुओं की दवायें, गांव देहात में उतनी ही महत्वपूर्ण हैं, जितनी मानव की दवायें।
यह कस्बे का सबसे बड़ा मेडीकल स्टोर है।


दिलीप का मैडीकल स्टोर महराजगंज कस्बे में सम्भवत: सबसे बड़ा स्टोर होगा। उन्होने बताया कि सन 1964 से है यह दुकान। गंज की सबसे पहली मेडिसिन की दुकान। महराजगंज कस्बे में नेशनल हाईवे 19 के नुक्कड़ पर दो तीन दुकान छोड़ कर। काम की लगभग सभी दवायें वहां मिल जाती हैं।

दुकान पर दिलीप को, उनके छोटे भाई को और यदा कदा उनके पिताजी को बैठा देखता हूं।

अपनी मेडिकल दुकान पर दिलीप चौरसिया
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रामप्रसाद तीर्थयात्री का निमन्त्रण

चार-पांच लोग आपस में राम मन्दिर की बात कर रहे थे। एक महिला ने मुझे सम्बोधित कर कहा – आप तो मन्दिर बणवाओ सा। हम सब आयेंगे कार सेवा करने।


शाम का समय। सूर्यास्त से कुछ पहले। एक बस मेरे गांव के पास रुकी थी। अच्छी टूरिस्ट बस। उसके यात्री नेशनल हाईवे 19 की मुंड़ेर पर बैठे थे। एक बड़े पतीले में गैस स्टोव पर कुछ गर्म हो रहा था। एक व्यक्ति आटा गूंथ रहा था। सब्जियां भी कट रही थीं। शाम का भोजन बनने की तैयारी हो रही थी। बस बनारस से प्रयागराज की ओर जा रही थी।

पूर्णिमा के एक दिन पहले की शाम थी। चांद उग गया था। लगभग गोल। अगले दिन प्रयागराज में माघी पूर्णिमा का शाही स्नान था। सवेरे लोग संगम पर स्नान करेंगे शायद।

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श्रीराम बिंद की मटर

हमने उन्हें चाय पिलाई। साथ में दो बिस्कुट। वह व्यक्ति जो हमारे लिये सवेरे सवेरे मटर ले कर आ रहा है, उसको चाय पिलाना तो बनता ही है।


वह पास के गांव में रहता है अपनी “बुढ़िया” के साथ। दो लड़के हैं, दोनो बनारस में खाते-कमाते हैं। एक ऑटो चलाता है और दूसरा मिस्त्री का काम करता है किसी भवन निर्माण की फर्म में। उसके पास दो बिस्सा खेत है और गाय। गाय आजकल ठीक ठाक दूध दे रही है। मुझे दूध सप्लाई करने की पेशकश की थी, पर हमें जरूरत न होने पर वह अपने लड़कों और उनके परिवार के लिये बनारस ले कर जायेगा। “इही बहाने उन्हनेऊं दूध इस्तेमाल कई लेंईं (इसी बहाने उन्हें भी मिल जाये दूध)।

दो बिस्सा जमीन में मटर बोई थी। चार दिन पहले वह लाया था बेचने। 14रुपये किलो दी थी। बहुत अच्छी और मीठी मटर। लम्बी छीमी और हर छीमी में 6-9 दाने। स्वाद लाजवाब था – इस मौसम की सबसे बेहतरीन मटर थी वह। दो बिस्वा (1 बिस्वा बराबर 125 वर्ग मीटर) खेत में बहुत ज्यादा तो होती नहीं। आज दूसरी बार तोड़ी तो आसपड़ोस वाले ही ले गये। किसी तरह से 3 किलो बचा कर लाया हमारे लिये।

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ठेले पर मेरठ की नानखटाई

इस ठेले का किट मैने अपने कस्बे महराजगंज में देखा और बनारस में भी।


ठेले पर एक भट्टी जैसा उपकरण जिसमें नानखटाई बनती है। उसपर रिकार्ड की आवाज लाउड स्पीकर पर बजती रहती है। विज्ञापन वाली महिला और पुरुष का संवाद। औरत कहती है कि उसे मेरठ वाली नानखटाई खानी है। कुछ इस अन्दाज में कि उसका बालम मेरठ जा कर लाये उसके लिये नानखटाई।

मैं नहीं जानता था कि मेरठ की नानखटाई मशहूर है। इसी रिकार्डेड जिंगल से पता चला। आदमी की आवाज आती है कि अभी लाता हूं। यानी केवल ठेले तक जाना है नानखटाई लाने के लिये। अपने शहर, अपने कस्बे में ही उपलब्ध है।

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गोधना का शिव मंदिर – सारनाथ

देखने में 10-11वीं सदी का छोटा और अत्यन्त सुन्दर मन्दिर नजर आता है। आक्रान्ताओं के भंजन का शिकार।


यह, गोधना गांव, जिला मिर्जापुर, उत्तरप्रदेश में आर्कियॉलॉजिकल सर्वे का प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेण्ट है। देखने में 10-11वीं सदी का मंदिर नजर आता है। कभी किसी आक्रांता (?) ने इसकी सभी मूर्तियां खण्डित कर दीं। आधुनिक काल में इसका पुनर्स्थापन हुअ। कगूरा नया बना है – तो माना जा सकता है कि कगूरा तोड़ दिया गया था। मंदिर की बाहरी दीवारों पर जो नक्काशी है, वह बहुत सीमा तक बरकरार है – उसमें मूर्तियां लगभग नहीं उकेरी गयी थीं। सो आक्रांताओं ने उसको तोड़ने में अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं की।

मंदिर के समक्ष नंदी की खण्डित प्रतिमा।

छोटा और बहुत सुंदर मंदिर है यह। इसका ढांचा कायम है – यही गनीमत। अब एएसआई के सौजन्य से परिसर का सौंदर्येकरण कर दिया गया है। साफ सफाई उपयुक्त है और पण्डा लोगों का अतिक्रमण नहीं है।

यह सारनाथ मंदिर कहाता है – पर यह शिव मंदिर है; बौद्ध तीर्थस्थल सारनाथ नहीं। यह मिर्जापुर जिले में है। वाराणसी में नहीं।

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