डेढी और लेवल क्रासिंग की जरूरत


डेढ़ी – डेढ़ किलोमीटर लम्बी सड़क जो उत्तर में रेलवे लाइन और दक्षिण में गंगा किनारे के गांव द्वारिकापुर के बीच है और जिसके पूर्व में मिर्जापुर, पश्चिम में भदोही जिले के गांव हैं; के बारे में कल मैने बताना शुरू किया था। मेरा विचार है कि इस सड़क के माध्यम से गांव के जीवन की बहुत सी बातें मैं देख/समझ/बता पाऊंगा। इस सड़क पर रोज सवेरे मैं 8-9 किलोमीटर साइकिल चलाता हूं। डेढ़ी के लगभग तीन चक्कर। घर से सात बजे निकलता हूं – उदर में दो कप चाय डाल कर। बटोही (अपनी साइकिल) को एक बोतल पानी थमाता हूं। जस्ट इन केस प्यास लग जाये!

उत्तर छोर पर डेढ़ी रेलवे लाइन के पहले ठिठक कर खत्म हो जाती है। उसके आगे और दांये, बांये रेलवे की जमीन है। डेढ़ी के भगीरथ – परधान लोग अपनी सीमा में ही डेढ़ी के बहाव को तय कर सकते हैं। रेलवे पर जोर नहीं उनका।

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एक महिला थैले में अपना सामान ले कर मुझसे आगे चल रही थी डेढ़ी पर।

एक महिला थैले में अपना सामान ले कर मुझसे आगे चल रही थी डेढ़ी पर। उसे रेल लाइन के उस पार जाना था। मेरे सामने पटरी पार की उसने।DSCN0412

उसी समय दूसरी ओर से एक ग्रामीण को इस पार आने के लिये अपनी साइकिल पटरी पर कुदाते देखा।

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उसी समय दूसरी ओर से एक ग्रामीण को इस पार आने के लिये अपनी साइकिल पटरी पर कुदाते देखा।

डेढ़ी के सामने कटका रेलवे स्टेशन का शण्टिंग नेक का छोर दिखता है। अगर स्टेशन की लूप लाइन को चीरता लेवल क्रासिंग इस जगह पर शिफ़्ट कर दिया जाये तो स्टेशन सेक्शन के लेवल क्रासिंग को ब्लॉक सेक्शन में किया जा सकता है। रेलवे यातायात के लिये ज्यादा सुरक्षित विकल्प होगा वह। वर्तमान के लेवल क्रासिंग नम्बर 23 से इस जगह के बीच अपनी जमीन पर लगभग 400 मीटर पतली सड़क जरूर बना कर देनी होगी रेलवे को। और डेढ़ी के ग्रेडियेण्ट (समतल से ऊंचाई) को भी अगर टटोला जाये तो शायद नई जगह पर लेवल क्रासिंग की बजाय रोड-अन्डर-ब्रिज (पुलिया) बनाई जा सके शायद। वह रेलवे की लेवल क्रासिंग खत्म करने की पॉलिसी के अनुरूप होगा। अभी रेलवे लाइन का दोहरीकरण का काम चल रहा है। उस दशा में यह और भी ज्यादा सुरक्षित रेल यातायात का निमित्त होगा। गांव और रेल – दोनो के लिये विन-विन सिचयुयेशन।

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रेलवे फाटक की स्थिति और प्रस्ताव

मैं अगर रेल सेवा में होता तो यह करा पाना मेरे लिये बहुत सरल होता। अब मैं सुझाव भर दे सकता हूं। आसपास के चार-पांच प्रधान लोग, लोकल एमएलए/सांसद यह काम करा सकते हैं। शायद मण्डल रेल प्रबन्धक इसपर ध्यान दे सकें। पर इन सब प्रकार के जीवों के लिये फैज़ की वह नज्म है न! “और भी गम हैं जमाने में मुहब्बत के सिवा।“ मुहब्बत की जगह रेलवे क्रासिंग और डेढ़ी पढ़ें! 😊

लेवल क्रासिंग तो एक मुद्दा है। इसी तरह के अनेक मुद्दे हैं जिनपर मैं चर्चा योग्य सोच रखने लगा हूं।  पर उस सब के क्रियान्वयन को ले कर मन में एक गहन उदासीनता है। यह रिटायर्ड जीवन का सच है। व्यक्ति कर्मक्षेत्र में छलांग नहीं लगाना चाहता। कर्मक्षेत्र जो कमिटमेण्ट मांगता है उसमें आशा/निराशा/हर्ष/खिन्नता/थकान सब कुछ है। उसमें रक्तचाप और व्यग्रता की मात्रा में बढ़ना भी निहित है। वह शायद मैं पुन: नहीं चाहता। बहुत हुआ।

हां, पर डेढ़ी यूंही डेड-एण्ड में खत्म नहीं होनी चाहिये। उसकी तार्किक परिणिति नेशनल हाईवे तक पंहुचने की है। और वहां तक पंहुचने के लिये जरूरी है लेवल क्रॉसिंग या रोड-अण्डर-ब्रिज।

देखें, कौन भगीरथ उसे वहां पंहुचाता है।

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गांव में बिजली समस्या का निदान – सोलर ऊर्जा की शरण से


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छत पर लगे 250वाट के आठ सोलर पैनल। पहले चार दो साल पहले लगवाये थे। बाकी अब के हैं।

गांव में शिफ़्ट होते ही मैने 2016 के प्रारम्भ में घर में 1 केवीए का सोलर पैनल लगवा लिया था। पर उसको लगाने के समय यह आकलन किया था कि उस सिस्टम से एक किलोवाट पावर आउटपुट बैटरी को मिलेगा और बैटरी लगभग उतना ही मुझे मेरे काम चलाने के लिये देगी। ऐसा हुआ नहीं। बाद में पता चला कि 250वाट के चार पैनल करीब 600वाट की शक्ति बैटरी को देते हैं। बैटरी लगभग 80% स्टोर की हुई ऊर्जा इनवर्टर के माध्यम से घरेलू उपकरणों को देती है। सो, पैनल लगाने के बाद भी हमारी ग्रामीण विद्युत सप्लाई पर निर्भरता बनी रही।

जब लगभग 10-12 घण्टे बिजली की सप्लाई आती थी, तब पैनल और सप्लाई दोनों को मिला कर सतत बिजली उपलब्धता की जरूरत पूरी कर देते थे। पर गांव में जर्जर सप्लाई नेटवर्क के कारण साल में 10-12 मौके आये जब कई दिनों तक बिजली नहीं आती थी।

एक बार तो बिना बिजली के पूरा हफ़्ता गुजर गया था।

कई दिनों बिजली न आने दशा में सोलर पैनल जरूरी पंखे और लाइट लगभग 18-20 घण्टे ही चला पाते थे। फ्रिज चालू करने का तो प्रश्न ही नहीं उठता था। मुझे याद है कि एक बार हमें एण्टी-रेबीज इन्जेक्शन फ़्रीजर में रखने थे और फ़्रिज चालू न होने के कारण आईस बॉक्स का इन्तजाम करना पड़ा था। उसके लिये बर्फ़ का इन्तजाम करना भी एक कठिन काम था। सब्जियां और भोजन अधिक बन जाने और उसके स्टोर न कर पाने को ले कर परिवार में कई बार चिक चिक हुई।

हमारा यह गांव सांसद महोदय ने गोद लिया हुआ है। तथाकथित आदर्श गांव होने के बावजूद भी बिजली की सप्लाई अनियमित है। इसमें बिजली कर्मी भी बहुत कुछ नहीं कर पाते। उनके पास लाइनमैन स्तर के कर्मियों की बहुत किल्लत है और दशकों की रूरल नेटवर्क के प्रति उपेक्षा के कारण हल्के आंधी और बयार से भी सप्लाई अवरोधित हो जाती है। एक बार अवरोधित हुई तो ठीक होने में दिनों लग जाते हैं। प्रान्त में नई सरकार आने के बाद स्थिति कुछ बेहतर हुई, पर अब लगता है कर्मचारी शुरुआती दौर की कर्मठता से उबर चुके हैं। अब वे समझ गये हैं कि नई सरकार में भी कमोबेश उसी “आनन्दमय” दशा में स्थितप्रज्ञ रहा जा सकता है, जिसमें वे पहले जी रहे थे। आखिर कब तक वे कमर कस कर जियें?

अकेले मोदी (या योगी) कितनी तलवार भांजेंगे?! उन्हें कई शॉक ट्रीटमेण्ट करने चाहियें गांव के स्तर पर। बिजली की वायदे अनुसार उपलब्धता एक प्रमुख बिन्दु है।

सभी घटकों पर विचार कर, कुल मिला कर, मुझे बहुत आशा नजर नहीं आई कि अगली गरमी में पर्याप्त बिजली सप्लाई मिलेगी। अंत: मैने घर में एक ऐसा बिजली उपलब्धता का तन्त्र बनाने की सोची जिसमें अनवरत बिजली सप्लाई बाधित होने के दशा में घर के एलईडी के बल्ब, पंखे, वाईफाई, आरओ मशीन, मोबाइल चार्जिंग, लैपटॉप और फ़्रिज सुविधाजनक रूप से चल सकें। केवल गीजर, वाशिंग मशीन और पानी छत की टंकी पर चढ़ाने के लिये बिजली सप्लाई/जेनरेटर की जरूरत हो।

अन्य बड़े खर्चों पर वरीयता देकर हमने दो हफ्ते पहले 250 वाट के चार सोलर पैनल, सोलर पावर चेंजओवर यूनिट और दो बैटरियों का एक सेट और लगवा लिया। इसके लगवाने में दो साल पहले की बजाय कम खर्च हुआ। पैनल की कीमत करीब 25-30% घट गयी है।

इस प्रकार मेरे पास 1-1 किलोवाट के दो सिस्टम हो गये – एक दिन की जरूरतों के लिये और दूसरा रात के लिये। इस सिस्टम की हॉट लाइन चेकिंग भी हो गयी। कल लगभग 30-32 घण्टे तक बिजली की सप्लाई नहीं थी। उस दौरान सभी पंखे और अन्य उपकरण सुचारु रूप से चल गये सोलर सिस्टम पर।

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पहले (दायें) और अब के (बांये) बैटरी/इनवर्टर/पी.सी.यू. सेट। नये सिस्टम में 1कि.वाट के सोलर पैनल और जोड़ने की गुंजाईश है। 

अब लगता है इस साल गर्मी और बरसात के महीनों में बिजली सप्लाई को ले कर हाय हाय नहीं रहेगी। हां, गांव वाले अपने मोबाईल चार्ज करवाने आते रहेंगे। (वैसे गांव में इतनी सोलर लाइट बंट गई हैं कि उसमें जुगाड लगा कर लोग अपने मोबाइल चार्ज करने में दक्ष होते जा रहे हैं।)

देर सबेर सौर ऊर्जा ही शरण देगी गांव देहात को।


 

अगियाबीर के रघुनाथ पांड़े जी


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रघुनाथ पांड़े जी और उनकी नातिन। नब्बे से ज्यादा की उम्र है पर दांत-आंख-शरीर सब चैतन्य है पांड़े जी का।

रघुनाथ पांड़े जी नब्बे से ऊपर के हैं। पर सभी इन्द्रियां, सभी फ़ेकल्टीज़ चाक चौबन्द। थोड़ा ऊंचा सुनते हैं पर फ़िर भी उनसे सम्प्रेषण में तकलीफ़ नहीं है। ऐसा प्रतीत नहीं होता कि उन्हे अतीत या वर्तमान की मेमोरी में कोई लटपटाहट हो। जैसा उनका स्वास्थ है उन्हे सरलता से सौ पार करना चाहिये।सरल जीवन। अपनी जवानी में व्यायाम और वजन उठाने का शौक रहा है उन्हे। बताते हैं कि गांव में अहिरों की बारात आती थी तो मनोविनोद के लिये वेट लिफ़्टिंग का कार्यक्रम होता था। वे ही बुलाये जाते थे गांव का प्रतिनिधित्व करने को। तीन मन (40 सेर वाला मन) वजन उठा लेते थे वे। अपने जमाने में साइकिल भी खूब चलाये हैं। शौकिया नहीं – काम से। एक बार बनारस भी गये हैं साइकिल से।

उनका गांव है अगियाबीर। उनके घर से अगियाबीर का टीला सामने दीखता है। वह टीला जहां खुदाई में 3300 साल पुरानी सभ्यता पाई गयी है। मध्य गंगा घाटी सभ्यता का एक महत्वपूर्ण शहर रहा है अगियाबीर। वे प्राचीन इतिहास-प्रागैतिहास की बात करते हैं, अगियाबीर के। “यह जो टीले के पास से रास्ता है, यही हुआ करता था प्राचीन काल में। तब, जब जीटी रोड नहीं था। गंगा किनारे किनारे रास्ता गया था। नार-खोह को डांकता।”

खड़ी बोली में नहीं, भोजपुरी/अवधी में बात करते हैं रघुनाथ जी। उनकी वाणी इतनी स्पष्ट है कि मुझे समझने में कोई दिक्कत नहीं हुई।

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गुन्नीलाल पांण्डेय

उनके लड़के – गुन्नीलाल पांड़े ने अपने घर आमन्त्रित किया था मुझे और राजन भाई को। राजन भाई उनके स्कूल के सहपाठी रहे हैं। बड़े ही आत्मीय और मेहमाननवाजी करने वाले हैं गुन्नी पांड़े। वहीं गुन्नीलाल जी के पुत्र संजय भी मिले। गुन्नीलाल पास के मिडिल स्कूल के अध्यापक पद से रिटायर हुये और संजय डेहरी में नवोदय विद्यालय में पढ़ाते हैं। आर्थिक रूप से (ग्रामीण परिवेश में) ठोस है यह परिवार। रघुनाथ-गुन्नी-संजय और संजय का पुत्र/पुत्री। चार पीढ़ियां रह रही हैं वहां। गांव के एक आदर्श घर की अगर कल्पना आप करें तो वह रघुनाथ पांड़े जी के घर सरीखा होगा।

मैं गुन्नीलाल जी से पूछता हूं – यह सड़क जो अगियाबीर-कमहरिया-केवटाबीर आदि गांवों को जोड़ती है, पहले भी थी? उन्होने बताया कि पहले तो मात्र पगड़ण्डी भर थी। बैलगाड़ी भी नहीं आ-जा सकती थी। पैदल या साइकल से आया जाया जा सकता था। लोग अपनी लड़कियों की शादी यहां करने में झिझकते थे। पर सन 1986 की चकबन्दी के बाद सड़क के लिये जमीन निकली। सड़क बनने पर बहुत अन्तर आया लोगों के जीवन स्तर में। अभी भी हाट-बाजार के लिये 4-5 किलोमीटर जाना पड़ता है पर अब उतना जाना आना अखरता नहीं। रघुनाथ पांड़े कहते हैं कि मिर्जापुर और भदोही जिले की रस्साकस्सी में अगियाबीर और द्वारिकापुर के बीच नाले पर पुल नहीं बन पाया है। देर सबेर बन जायेगा तो सहूलियत और बढ़ जायेगी। गुन्नीलाल जी इस इलाके की लचर नेतागिरी का भी हाथ मानते हैं विकास न होने में। “फूलन देवी जैसे को सांसद बनायेंगे तो क्या होगा?”

गुन्नीलाल जी के यहां चाय बहुत बढ़िया बनती है। तीन-चार बार गया हूं उनके यहां और हर बार एक विशिष्ट स्वाद मिला है। उनकी पतोहू या पत्नी – जो बनाती हों, अच्छा बनाती हैं। गांव के माहौल में अमूमन चाय टरकाऊ मिलती है। ऐसा गुन्नीलाल जी के यहां नहीं है। उनके घर में पेड़-पौधों, घर की बनावट, साफ़-सफ़ाई और समग्र व्यवस्था में एक सुरुचि दीखती है। वैसा सामान्यत: गंवई घरों में दिखता नहीं।

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रघुनाथ पाण्डेय जी के घर का फ्रंटेज। बिना सपोर्ट के इतना बढ़िया छज्जा गांव में मैने देखा नहीं। 

पहले बार जब मिला तो हमारे बीच औपचारिकता थी। मैं रेलवे का (रिटायर्ड) अफसर था। दूसरी बार उनके पिताजी से और परिचय हुआ। उनको पैलगी भी करने लगा मैं। गुन्नीलाल जी के साथ आत्मीयता से गले भी मिला। अब लगता है राजन भाई के साथ न होने पर भी उनके घर जाने पर अटपटा नहीं लगेगा।

भूसा और खबर


सवेरे साइकिल-सैर में जाते हुये पाया था कि उस खेत में थ्रेशिंग के बाद गेंहूं वहां से हटाया जा चुका था। भूसा भी एक ट्रेक्टर-ट्रॉली में ट्रॉली की ऊंचाई तक लादा जा चुका था। बाकी बचा अधिकांश भूसा झाल (पुरानी धोती-साड़ी के बोरों) में इकठ्ठा कर दिया गया था। चहल पहल थी वहां। लग रहा था कि कुछ ही देर में ये बोरे भी लद जायेंगे ट्रेक्टर ट्रॉली पर और खेत खाली हो जायेगा।

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सवेरे साइकिल सैर जाते समय देखा। … लग रहा था कि कुछ ही देर में ये बोरे भी लद जायेंगे ट्रेक्टर ट्रॉली पर और खेत खाली हो जायेगा।

वापस लौटने में लगभग पौना घण्टा लगा। मुझे अपेक्षा नहीं थी कि खेत में होंगे वे सब लोग। पर वे वहीं मिले। झाल लद गये थे। उनके ऊपर ट्रॉली पर एक व्यक्ति लेटा था। दो स्त्रियां जमीन पर बिखरा भूसा बटोर रही थीं। शायद वह भी ट्रॉली पर लादा जाने वाला हो। कुछ लोग और भी आस-पास थे। मैं चित्र लेने लगा। राजन भाई ने पूछा – भूसा क्या भाव बेंचोगे? 

“बेचने के लिये नहीं है। घर के इस्तेमाल के लिये हैं।” – ट्रॉली पर लेटा व्यक्ति बोला।

मेरे चित्र लेने पर उसने कहा – फोटो काहे ले रहे हैं?

बस अच्छा लग रहा है यह सब। इस लिये ले रहा हूं।

“हम सोचे न्यूज वाले होंगे आप।”

न्यूज वाला तो नहीं हूं, पर न्यूज के नाम पर आपके पास कुछ है?

वह लेटी मुद्रा से बैठी मुद्रा में आ गया, जिससे कि उसका चित्र बेहतर आ सके। बोला, न्यूज तो यही है कि गेंहू बम्पर हुआ है। बड़ी अच्छी फसल।

अच्छा, कितनी हुई होगी एक बीघा में?

आप समझो कि अमूमन 8 क्विण्टल गेहूं होता था एक बीघा में। इस बार 12-13 क्विण्टल हुआ है। और दाने भी बढ़िया हैं। 

मुझे लगा कि सही में उसने न्यूज दिया है मुझे। यद्यपि मुझे उसका न्यूज़ वालों के प्रति “भक्ति-भाव” जमा नहीं। अभी गांव-देहात में अखबार और टीवी की लार्जर-देन-लाइफ़ इज्जत बरकरार है। इन लोगों को नहीं मालुम कि तथाकथित चौथे खम्भे का इण्टरनेट और सोशल मीडिया ने बधियाकरण कर दिया है। अलाने-फलाने अखबार के स्क्राइब से एक खुर्राट ब्लॉगर कहीं ज्यादा दमदार है। पत्रकार ब्लॉगर बन रहे हैं। फेसबुक और ट्विटर के माध्यम से अपनी साख बचाये रखने की जद्दोजहद में लगे हैं। अखबार वाले अपनी बिक्री की चिन्ता में मरे-घुले जा रहे हैं। ये चौथे खम्भे वाले अपने रसूख के बल पर जो भ्रष्टाचार कर पा रहे थे, वह तेजी से अतीत होता जा रहा है। …. पर इस भूसा की ट्रॉली पर अधलेटे जमींदार को पता ही नहीं यह सब।

क्या करूं? मीडिया और चौथे खम्भे की दशा-दुर्दशा पर उससे चर्चा करूं? मुझे लगा कि वह बेकार होगा। अगले 5-7 साल में यह जवान समझ जायेगा कि इस देश में ओपीनियन मोल्ड करने की ताकत अखबार और टीवी में नहीं रहेगी। ये दोनो माध्यम रोज यही तलाशेंगे कि कौन हैशटैग, कौन वीडियो, कौन ट्वीट वाइरल हो रहा है सोशल मीडिया पर। ये सब सोशल मीडिया पर रियेक्ट भर करेंगे। सोशल मीडिया को ड्राइव करना इनके बूते से बाहर हो जायेगा, और जा रहा भी है।

खैर, मैं जानता हूं कि गांव में अभी यह सब कहना अटपटा होगा। बहुत कुछ वैसा ही अटपटा कि कोई गांव प्रधान, थानेदार, तहसीलदार और जिला मजिस्ट्रेट को प्रजातंत्र और प्रशासन का सबसे छोटा मोहरा बताये।

समय बदलेगा।

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समय बदलेगा!

व्यास जी और महाकाव्य सृजन


मार्च’5, 2017:

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पगडण्डी में साइकल चलाते बढ़े जा रहे थे हम। दोनो ओर गेंहूं के खेत थे।

सवेरे की साइकलिंग में हम चले जा रहे थे। राजन भाई और मैं। राजन भाई से मैने कह दिया था कि सड़क-सड़क चलेंगे। पगडण्डी पर साइकल चलाने में शरीर का विशिष्ट भाग चरमरा उठता है। पर राजन जी ने बीच में अचानक पगडण्डी पकड़ ली थी और मैं पीछे चले जा रहा था। मुझे लगने लगा कि आज अच्छा फंस गये हैं। शायद बहुत ज्यादा साइकल चलानी पड़े। पता नहीं, अंगद जैसी दशा न हो जाये! वापसी के लिये अपने ड्राइवर को फोन कर वाहन मंगवाना पड़े घर से।

वैसे पगडण्डी समतल थी। जमीन ठोस। डामर की सड़क अगर उधड़ गयी हो, तो उसमें जितना डिस-कम्फर्ट होता है, उसके मुकाबले कहीं कम था इस रास्ते में। दोनों ओर गेंहूं के शानदार खेत थे। हरे, विशाल गलीचों जैसे। लगता है इस साल फसल बम्पर होगी। जीडीपी ग्रोथ में कृषि का योगदान बढिया रहेगा चौथे क्वार्टर में भी।

अचानक मानव निर्मित खेत खत्म हो गये और गंगा माई की खेती प्रारम्भ हो गयी। गंगा माई के इस ओर के खेत करारी मिट्टी के हैं। ऊबड़-खाबड़। उनमें सरपत लगे हैं। बहुत ऊंचे-ऊंचे नहीं थे सरपत। पर वह स्थान था मानव रहित। पगड़ण्डी भी अपनी ढलान से बताने लगी थी कि आगे नदी है।

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फ्लैक्सी बोर्ड पर यह लिखा था कि यह जगह रात्रि में माताओं, बहनों के ठहरने की नहीं है।

नदी दिखने लगी। तब एक दो झोपड़ियां दिखीं – उनपर झंडे लगे थे। एक फ्लैक्सी बोर्ड भी टंगा था। उस पर यह लिखा था कि यह जगह रात्रि में माताओं, बहनों के ठहरने की नहीं है। उसमें ऊपर “जय बाबा कीनाराम” लिखा था। जैसा मुझे मालुम है बाबा कीनाराम (सिद्ध) तान्त्रिक थे। अघोरी।

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काली जी की प्रतिमा और खोपड़ियां

टीन के शेड के नीचे काली माँ की काली/भयावह प्रतिमा थी। उनके पास चार मानवी खोपड़ियां रखी थीं। सामने एक थाले में श्मशान की लकड़ियों के दो बोटे सुलग रहे थे।

कोई तान्त्रिक या कोई भी व्यक्ति आसपास नहीं दिखा। मैने झोपड़ियों में ताक झांक की। वहां भी कोई न था। हम दोनो अपनी साइकलें रख गंगा तट की ओर बढ़ लिये।

तट का ढलवां रास्ता साफ़ था। पगडण्डी। सरपत और बबूल की बाड़ लगे बड़े बड़े सब्जियों के खेत थे नदी के किनारे। बस पगडण्डी की जगह छोड़ दी थी खेती करने वालों नें। खेत की रखवाली करने वालों  के लिए  सरपत की मड़ईयां भी थी। एक खेत, जिसमें कोई नहीं था, बड़ी सुन्दर मड़ई थी। मैं उसका चित्र लेने के लिये बाड़ हटा कर चला गया। यह सावधानी रखी कि किसी पौधे या बेल को न कुचल दूं।

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नदी किनारे मड़ई
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कमहरिया के पाठक जी। ऊंचा सुनते थे।

नदी में कुछ लोग नहाने के लिये पंहुचे थे। केवल दो-चार लोग। एक सज्जन वापस आ रहे थे तो उनको मैने नमस्कार किया। उत्तर न मिलने पर फिर से बात करने पर पता लगा कि वे ऊंचा सुनते हैं। उन्होने बताया कि कोई पाठक (ब्राह्मण वर्ण का सरनेम) हैं। पास के गांव कमहरिया के। रोज नहाने आते हैं।

अचानक एक छरहरा, गौर वर्ण, बड़े बाल और दाढ़ी वाला, सफ़ेद कपड़े पहने नौजवान तपस्वी नहाने के ध्येय से वहां पंहुचा। उससे पूछने पर पता चला कि पास के आश्रम में रहते हैं वे सज्जन। आश्रम अघोरी आश्रम के बगल में है। पहले ये तपस्वी केवटाबीर (पास के गंगा तटीय गांव) के जगतानन्द आश्रम में रहते थे। दो-चार दिन पहले यहां चले आये। यह आश्रम खाली पड़ा था। यहीं डेरा जमा लिया है उन्होने।

अकेला, नौजवान तपस्वी। बहुत आकर्षक व्यक्तित्व। काहे जवानी बरबाद (?) कर रहा है इस निर्जन स्थान पर। अघोरी आश्रम के बगल में। अटपटा लगा हमें।

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नदी में स्नान के लिये पंहुचा तपस्वी।

मैने पूछा – क्या करते हैं आप यहां रह कर?

“महाकाव्य की रचना कर रहा हूं। बहुत कुछ लिखा जा चुका है। पहले जगतानन्द धाम में लिख रहा था। एकान्त के लिये यहां चला आया।”

उन्होने बताया – “पांच शती पहले भारत वर्ष की दशा खराब थी। उस समय उत्थान के लिये तुलसी ने रामकथा को ले कर काव्य लिखा – रामचरितमानस। आज भी समाज की वैसी ही दशा हो रही है। क्षरण और पतन की दशा है। इसलिये मैं कृष्ण कथा को आधार बना कर यह काव्य लिख रहा हूं। सात अध्यायों का यह काव्य है।”

अपेक्षा नहीं थी मुझे कि इस जगह पर इस प्रकार का कोई व्यक्ति मिल जायेगा। मैने लेखन देखने की जिज्ञासा व्यक्त की। यह भी कहा कि अगर इस प्रकार का कुछ लिखा जा रहा है तो लोगों को पता तो चलना चाहिये। तपस्वी भी (सम्भवत:) यह चाहते थे कि लोगों को पता चले। उन्होने कहा कि हम लोग आश्रम में इन्तजार करें, दस मिनट में नहा कर वे आते हैं।

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बरगद के तले आश्रम।

आश्रम की ओर जाते समय राजन भाई ने अपनी व्यग्रता जताई – “ये बाबाजी के साथ तो बहुत समय लग जायेगा। मुझे आठ बजे घर पंहुचना है। काम है।”

हमने तय किया कि तपस्वी से मिल कर हम लोग किसी और दिन आने की बात कहेंगे। रुकेंगे नहीं। तपस्वी की प्रतीक्षा में मैने आश्रम का मुआयना किया। साफ़-सुथरा था वह स्थान। एक विशालकाय बरगद से आच्छादित। एक ओर शंकर जी का मन्दिर था। दो-तीन कमरे। बाहर एक कुंआ। छत पर जाने के लिये सीढ़ी। कुल मिला कर रमणीय स्थान था। मैने  सोचा कि तपस्वी के साथ यहां रुका/रहा जा सकता है।

दस मिनट में ही आ गये तपस्वी। एक गमछा पहने। मैने कहा – हमें जल्दी है। आप अपने लेखन के एक दो पन्ने दिखा दें। विस्तार से बाद में आकर चर्चा करेंगे।

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अपनी पाण्डुलिपि लिये कमरे से निकलते तपस्वी। 

उन्होने सहज उत्साह से अपना लेखन दिखाया। एक मोटा, गत्ते पर लाल कपड़े की जिल्द वाला अच्छा रजिस्टर। मैने एक दो पन्नों के चित्र लिये। वे उत्साह से पाण्डुपि का एक अन्य रजिस्टर भी ले आये जिसमें ग्रन्थ का प्रारम्भ था। सरसरी निगाह से मैने पढ़ा – चौपाईयां और दोहे तुलसीबाबा की भाषा जैसे गठे हुये लगे। अच्छा प्रवाह था उनमें।

तपस्वी की लगन और धुन ने बहुत प्रभावित किया मुझे। आज भ्रमण का अनुभव विलक्षण था। शुरुआत में जैस लग रहा था, उससे बिल्कुल उलट।

मैने तपस्वीजी का मोबाइल नम्बर लिया। नाम पूछा तो बताया कि “व्यास जी” कहते हैं। आश्रम से बाहर निकलने पर दो ग्रामीण मिले। उन्होने बताया कि यह आश्रम योगेश्वरानन्द जी का था। उन्हे देह त्याग किये छ साल हो गये। उसके बाद दो-तीन बाबा लोग आये पर टिके नहीं। अब ये आये हैं। बड़े अच्छे हैं बाबा जी।

कुछ अजीब लगा कि बाबा लोग यहां टिके क्यों नहीं। पास के अघोरियों के आश्रम के कारण तो नहीं? मैं शंका लिये हुये राजन भाई के साथ वापस लौट चला।

करीब 14 किलोमीटर, मुख्यत: पगडण्डी के रास्ते साइकल चलाई आज सबेरे। और ऐसा अनुभव रहा कि कभी भूलूंगा नहीं।

व्यास जी से मिलने और उनका ग्रन्थ ध्यान से देखने फिर जाऊंगा वहां। शायद गिनती के कुछ लोगों को ज्ञात है कि एक तपस्वी एक कोने में बैठा महाकाव्य लिख रहा है।

गंगाजी का तट अपने आप में जाने कितनी विलक्षणता से भरा है।

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पाण्डुलिपि का एक पन्ना। इसमें चौपाई/दोहे के साथ भावार्थ भी है। 

मानिक सेठ और कस्बे में कैशलेस


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माणिक सेठ, महराजगंज, जिला भदोही के दुकानदार 

मानिक सेठ की महराजगंज, जिला भदोही में किराने की दुकान है। नोटबन्दी के बाद उनकी पहली दुकान थी, जहां मैने कैशलेस ट्रांजेक्शन का विकल्प पाया। पच्चीस नवम्बर की शाम थी। नोटबन्दी की हाय हाय का पीक समय। वे पेटीएम के जरीये पेमेण्ट लेने को तैयार थे। मैने अपने मोबाइल से पेमेण्ट करना चाहा पर इण्टरनेट का सिगनल नहीं मिला। मानिक ने कहा कि वे वाई-फाई ऑन कर सकते हैं। खैर, रिलायंस जियो मौके पर जिन्दा हो गया और मैने महराजगंज कस्बे में पहला वेलेट के माध्यम से कैश लेस पेमेण्ट किया। इसके पहले ऑन लाइन खरीद, मोबाइल रीचार्ज या टेलीफोन का बिल पेमेण्ट मैं ऑनलाइन किया करता था। वह नोटबन्दी के पहले भी होता था। पर फुटकर खरीद में पहला गंवई प्रयोग था।

इस लिये मैं मानिक सेठ को भूल नहीं पाया।

एक बार और उनकी दुकान पर गया। मानिक वहां नहीं थे। उनके बड़े भाई थे। उन्होने बताया कि छोटा भाई ही पेटीएम-वेटियम जानता है। वही अपने मोबाइल से करता है। बाहर गया हुआ है, इसलिये कैशलेस पेमेण्ट नहीं हो पायेगा।

आज, लगभग एक महीने के बाद सवेरे अपने साइकल-भ्रमण के समय बाजार पंहुच गया। दुकाने नहीं खुली थीं। मुझे टॉर्च के लिये बैटरी लेनी थी। देखा; माणिक दुकान का ताला खोल रहे थे। मैने इन्तजार किया। सवेरे मैं अपना मोबाइल लिये हुये नहीं था, अत: पेमेण्ट तो कैश से किया पर माणिक से पूछा – कैशलेस ट्रांजेक्शन कैसे चल रहे हैं?

“ज्यादा नहीं। लोग ढर्रा बदलना नहीं चाहते। मैं खुद इण्टरनेट, फेसबुक, ऑनलाइन खरीद और वेलेट का प्रयोग करता हूं। पर आसपास लोग नहीं करते। करीब डेढ-दो हजार रुपये महीने का ट्रांजेक्शन हो जाता है; वेलेट और ऑनलाइन खरीद को ले कर।”  

तब भी अच्छा है। लोगों को सिखाइये। लोगों के बारे में फ़ेसबुक पर बताइये। 

उसमें झंझट है। लोग सीखना नहीं चाहते। और यहां की बात फ़ेसबुक में लिखना रिस्की है। मैं अपने बारे में फेसबुक पर लिखता नहीं। कोई जानकारी नहीं देना चाहता। क्या पता क्या लफ़ड़ा हो जाये। बाहर हो आया हूं। वहां की कोई यार-दोस्त इधर-उधर की फोटो डाल दे या कुछ लिख ही दे तो बैठे बिठाये मुसीबत हो जाये। 

मैने माणिक को अपना फेसबुक पर लिखा दिखाया। जिसमें अपने परिवेश के बारे में (और अपने बारे में भी) जैसा है, वैसा लिखा है। और यह भी बताया कि मुझे तो कोई कभी झमेला नहीं हुआ। मैने सुझाव दिया कि माणिक अपने परिवेश – बाजार, दुकान और लोगों की सोच के बारे में पोस्ट करें।

माणिक ने हां-हां तो की; पर जैसा मुझे लगा कि जवान आदमी बहुत कन्वीन्स्ड नहीं है। आखिर मैं अपनी और उसकी तुलना तो नही कर सकता। जवान आदमी की अपनी उमंगे हैं, अपने भय।

पर माणिक मुझे ऊसर गंवई जीवन में नये प्रकार के जीव मिले। शायद भविष्य में भी उनसे सम्पर्क रहे।

श्यामबिहारी चाय की दुकान पर


श्यामबिहारी काँधे पर फरसा लिए चाय की चट्टी पर आये। अरुण से एक प्लेट छोला माँगा और सीमेंट की बेंच पर बैठ खाने लगे। खाने के बाद एक चाय के लिए कहा। “जल्दी द, नाहीं अकाज होये”। जल्दी दो, देर हो रही है। 

श्यामबिहारी का परिचय पूछा मैंने। मेरे घर के पास उनकी गुमटी है। दो लडके हैं। बंबई में मिस्त्री के काम का ठेका लेते हैं। पहले श्यामबिहारी ही रहते थे बंबई। मिस्त्री का काम दिहाड़ी पर करते थे। बाईस साल किये। फिर उम्र ज्यादा हो गयी तो बच्चे चले गए उनकी जगह। 
महानगर को माइग्रेशन का यही मॉडल है गाँव का। बहुत कम हैं जो गए और वहीँ के हो गए। अधिकाँश जाते आते रहते हैं। परिवार यहीँ रहता है। बुढापे में गाँव लौटना होता है। महानगर को जवान लोग चाहियें। श्रम करने वाले। 
श्याम बिहारी की उम्र साठ की हो गयी। खेत में धान की रोपाई कर रहे हैं। तीन दिन से लिपटे हैं रोपाई में। 

कितने बजे उठते हो?

“रात बारह बजे। रात में नींद नहीं आती। इधर उधर घूमता हूँ। नींद बीच बीच में सो कर पूरी हो जाती है”।

श्यामबिहारी को कोइ समस्या नहीं नींद के पैटर्न से। मुझे नहीं लगता कि अनिद्रा या इन्सोम्निया नाम से कोई परिचय होगा उसका।

चाय पीते ही वे निकल लेते हैं खेत की तरफ फावड़ा ले कर। 

साठ की उम्र। कोई रिटायरमेंट नहीं। काम करते कम से कम एक दशक और निकालना होगा श्यामबिहारी को। उसके बाद भी सुकून वाला बुढापा होगा या नहीं, पता नहीं।