दिलीप चौरसिया का महराजगंज कस्बे का मेडीकल स्टोर

दिलीप मेडिकल स्टोर पर एलोपैथिक, आयुर्वेदिक और पशुओं की दवायें मिलती हैं। … पशुओं की दवायें, गांव देहात में उतनी ही महत्वपूर्ण हैं, जितनी मानव की दवायें।
यह कस्बे का सबसे बड़ा मेडीकल स्टोर है।


दिलीप का मैडीकल स्टोर महराजगंज कस्बे में सम्भवत: सबसे बड़ा स्टोर होगा। उन्होने बताया कि सन 1964 से है यह दुकान। गंज की सबसे पहली मेडिसिन की दुकान। महराजगंज कस्बे में नेशनल हाईवे 19 के नुक्कड़ पर दो तीन दुकान छोड़ कर। काम की लगभग सभी दवायें वहां मिल जाती हैं।

दुकान पर दिलीप को, उनके छोटे भाई को और यदा कदा उनके पिताजी को बैठा देखता हूं।

अपनी मेडिकल दुकान पर दिलीप चौरसिया
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हजरत सज्जब अली की मजार और मुख्तार से मुलाकात

मजार किन्ही हजरत सज्जब अली की है। बताया कि कोई सौ साल पुरानी होगी मजार। कोई सन्त या फकीर नहीं थे सज्जब। नाम के आगे हजरत लगा था तो शायद हज कर आये रहे होंगे।


सवेरे की साइकिल सैर में खड़ंजे वाली सड़क पर लसमड़ा से पूरब मुड़ा। आगे एक घर दिखा किसी मुसलमान का। घर पर हरा झंडा था। उसमें चाँद, तारा, मस्जिद बना था। झंडे पर उर्दू में कुछ लिखा था। एक दो और झण्डियां लगी थीं घर की छत पर। कुछ छोटे बच्चे खेल रहे थे। पास में एक नौजवान और एक मेरी उम्र का व्यक्ति था। उनसे बात करने की पहल की मैंने – यह झंडे पर क्या लिखा है?

नौजवान ने जवाब दिया – रबी… वह खुद भी सुनिश्चित नहीं था। शायद कुराअन की कोई आयत हो। और यह तो स्पष्ट था कि ये दोनो पढ़े लिखे या उर्दू-अरबी के जानकार नहीं थे। मैं समझ गया कि धर्म पर बात करना व्यर्थ है। वह इनके लिये “यह करो या यह न करो” से अलग कुछ नहीं है। हिन्दुओं में भी धर्म के मामले में जो गदहिया गोल के लोग होते हैं, जिनके लिये धर्म केवल अच्छत, रोली, चन्दन, माला, गंगाजल और पण्डिज्जी के बताये कुछ कर्मकाण्ड भर होते हैं, उनसे बढ़ कर कुछ नहीं हैं ये।

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शिवशंकर भेड़िअहा

आधा घंटा व्यतीत करता हूं शाम के भ्रमण में शिवशंकर भेड़िअहा (भेड़ चराने वाला) के समीप. इस दौरान वह बात भी करता है और नजर अपनी भेड़ों पर भी रखता है.


भेड़ चराता है वह. उसके अनुसार उसके पास सत्तर भेड़ें हैं. अगियाबीर के पठार पर दो बीघा जमीन भी है. उसमें से आधी ही खेती के काम की है. खेती करने के लिए उसने एक जोड़ी बैल भी रखा है. बैल बूढ़े हो गए हैं, पर उनको रखे हुए है – “कसाई को देने का मन नहीं होता”.

पूछने पर वह बताता है – भेड़ें गाभिन हों तो छह हजार तक की बिक जाती हैं. कसाई तो तीन हजार में लेता है. दस महीने में तैयार हो जाते हैं पशु बेचने के लिए.

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रामप्रसाद तीर्थयात्री का निमन्त्रण

चार-पांच लोग आपस में राम मन्दिर की बात कर रहे थे। एक महिला ने मुझे सम्बोधित कर कहा – आप तो मन्दिर बणवाओ सा। हम सब आयेंगे कार सेवा करने।


शाम का समय। सूर्यास्त से कुछ पहले। एक बस मेरे गांव के पास रुकी थी। अच्छी टूरिस्ट बस। उसके यात्री नेशनल हाईवे 19 की मुंड़ेर पर बैठे थे। एक बड़े पतीले में गैस स्टोव पर कुछ गर्म हो रहा था। एक व्यक्ति आटा गूंथ रहा था। सब्जियां भी कट रही थीं। शाम का भोजन बनने की तैयारी हो रही थी। बस बनारस से प्रयागराज की ओर जा रही थी।

पूर्णिमा के एक दिन पहले की शाम थी। चांद उग गया था। लगभग गोल। अगले दिन प्रयागराज में माघी पूर्णिमा का शाही स्नान था। सवेरे लोग संगम पर स्नान करेंगे शायद।

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श्रीराम बिंद की मटर

हमने उन्हें चाय पिलाई। साथ में दो बिस्कुट। वह व्यक्ति जो हमारे लिये सवेरे सवेरे मटर ले कर आ रहा है, उसको चाय पिलाना तो बनता ही है।


वह पास के गांव में रहता है अपनी “बुढ़िया” के साथ। दो लड़के हैं, दोनो बनारस में खाते-कमाते हैं। एक ऑटो चलाता है और दूसरा मिस्त्री का काम करता है किसी भवन निर्माण की फर्म में। उसके पास दो बिस्सा खेत है और गाय। गाय आजकल ठीक ठाक दूध दे रही है। मुझे दूध सप्लाई करने की पेशकश की थी, पर हमें जरूरत न होने पर वह अपने लड़कों और उनके परिवार के लिये बनारस ले कर जायेगा। “इही बहाने उन्हनेऊं दूध इस्तेमाल कई लेंईं (इसी बहाने उन्हें भी मिल जाये दूध)।

दो बिस्सा जमीन में मटर बोई थी। चार दिन पहले वह लाया था बेचने। 14रुपये किलो दी थी। बहुत अच्छी और मीठी मटर। लम्बी छीमी और हर छीमी में 6-9 दाने। स्वाद लाजवाब था – इस मौसम की सबसे बेहतरीन मटर थी वह। दो बिस्वा (1 बिस्वा बराबर 125 वर्ग मीटर) खेत में बहुत ज्यादा तो होती नहीं। आज दूसरी बार तोड़ी तो आसपड़ोस वाले ही ले गये। किसी तरह से 3 किलो बचा कर लाया हमारे लिये।

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गोधना का शिव मंदिर – सारनाथ

देखने में 10-11वीं सदी का छोटा और अत्यन्त सुन्दर मन्दिर नजर आता है। आक्रान्ताओं के भंजन का शिकार।


यह, गोधना गांव, जिला मिर्जापुर, उत्तरप्रदेश में आर्कियॉलॉजिकल सर्वे का प्रोटेक्टेड मॉन्यूमेण्ट है। देखने में 10-11वीं सदी का मंदिर नजर आता है। कभी किसी आक्रांता (?) ने इसकी सभी मूर्तियां खण्डित कर दीं। आधुनिक काल में इसका पुनर्स्थापन हुअ। कगूरा नया बना है – तो माना जा सकता है कि कगूरा तोड़ दिया गया था। मंदिर की बाहरी दीवारों पर जो नक्काशी है, वह बहुत सीमा तक बरकरार है – उसमें मूर्तियां लगभग नहीं उकेरी गयी थीं। सो आक्रांताओं ने उसको तोड़ने में अपनी ऊर्जा नष्ट नहीं की।

मंदिर के समक्ष नंदी की खण्डित प्रतिमा।

छोटा और बहुत सुंदर मंदिर है यह। इसका ढांचा कायम है – यही गनीमत। अब एएसआई के सौजन्य से परिसर का सौंदर्येकरण कर दिया गया है। साफ सफाई उपयुक्त है और पण्डा लोगों का अतिक्रमण नहीं है।

यह सारनाथ मंदिर कहाता है – पर यह शिव मंदिर है; बौद्ध तीर्थस्थल सारनाथ नहीं। यह मिर्जापुर जिले में है। वाराणसी में नहीं।

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रेस्तराँ किसको आमन्त्रित करता है?!

नया खुला रेस्तरॉं है श्री विजया फैमिली ढाबा और रेस्तरॉं। … फैमिली के साथ सुकून से बैठ कर जलपान करने के स्थान यहां नहीं हैं। उस जरूरत को पूरा करना चाहते हैं तिवारी पिता-पुत्र।


कस्बे के बाजार मेँ एक रेस्तराँ खुलना कुछ उतना ही बड़ा है जैसे बम्बई, लंदन या पेरिस में कोई नया म्यूजियम या थियेटर खुलना। तिवारी जी को उसका विज्ञापन करना चाहिये। शायद सोच भी रहे हों। मैं तो आस-पास की रिपोर्ट देने वाले एक ब्लॉगर की नजर से ही देखता हूं। मैं चाहूंगा कि यह रेस्तराँ सफल हो। मुझे एक परमानेण्ट कॉफी पीने का अड्डा मिल सके! 😆


नितिन तिवारी ने अपने रेस्तराँ के कुछ चित्र ह्वाट्सेप्प पर भेजे हैं। दो सज्जन पैदल चल रहे हैं कलकत्ता (हावड़ा) से और जायेंगे राजस्थान। शायद सीकर में खाटू श्याम जी के स्थान पर। रास्ते में नितिन के रेस्तरॉं में विश्राम करते हैं। जगह का चयन करने और उनकी सुविधाओं का ध्यान देने के लिये कुछ लोग पहले से आ कर व्यवस्था देखते हैं। चलते समय एक एसयूवी वाहन उनके पीछे चलता है।

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