हताशा के पांच महीने बाद



समय सबसे बड़ी दवा है. साथ के चित्र में जो बुजुर्ग दिख रहे हैं वे पिछ्ली मई में हैजे से मरणासन्न थे. अस्पताल में इलाज हुआ तो पता चला कि समय पर चिकित्सा न होने से किडनियों ने काम करना बंद कर दिया है. इन्टेंसिव केयर में हफ़्ते भर और तीन महीने गहन चिकित्सा से किडनियां सामान्य हो पाईं.

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बहन मायावती की रैली



एक मार्च को लखनऊ में बहन मायावती की रैली थी. पहले वे सवर्णो को मनुवादी कहती थीं. उनके खिलाफ बोलती थीं. सामान्य लगती थीं. पर जब से उनकी पार्टी ने ब्राह्मणों को टैग किया है, तब से मामला क्यूरियस हो गया है. यूपोरियन राजनीति में क्या गुल खिलेगा; उसका कयास लगाना मजेदार हो गया है.

सो, उनकी रैली कितनी धमाकेदार रहती है – यह जानने की उत्कंठा मन में थी. मायूसी तब हुई जब उस दिन अखबारों के नेट संस्करण ने रैली को खास भाव नही दिया. अगले दिन अमर उजाला (जो मेरे घर आता है) ने रैली को पेज तीन पर कवर किया. वह भी ब्लैक-ह्वाइट चित्र के साथ.

इस रैली के लिये रेल से भी लोग ले जाये गये थे. दर्जन से भी ज्यादा स्पेशल रेलगाडियां (पूरा किराया देकर) लखनऊ गई थीं. बसों का इन्तजाम तो बेतहाशा था. यह सब पेज तीन पर कवरेज के लिये? इतना कवरेज तो बेमौसम सूखी प्रेस-रिलीज पर भी मिल जाता है. शहर के किसी कोने में तथाकथित एनकाउन्टर को भी पेज तीन पर कलर फोटो के साथ जगह मिलती है.

सब कुछ गड़बड़ सा हो रहा है. इन्फ्लेशन बढ़ रहा है. सीमेण्ट वाले दाम कम करने की हिदायत के बावजूद दाम बढ़ा देते हैं. पंजाब व उत्तराखण्ड में बिना जोर लगाये विपक्ष जीत जाता है. बिहार के कार्यकाल के बिल्कुल उलट, लालू जी रेल में २०,००० करोड़ रुपये का मुनाफा दिखाते हैं. सेन्सेक्स गिरे जा रहा है…
लोग कयास लगा रहे हैं कि मुलायम गये और मायावती आईं. लोगों का कयास रैली के ल्यूकवार्म कवरेज से गड़बड़ाता नजर आता है.

यूपोरियन इलेक्शन को लेकर कई सवाल हैं. क्या मायावती “क्रिटिकल मास” जुटा पायेंगी? क्या उनके बन्दे – विशेषकर सवर्ण – चुनाव बाद जीतकर भी साथ रहेंगे? क्या भाजपा या कॉग्रेस डार्क हॉर्स साबित होंगे? गेंगेस्टर-ब्रिगेड चुनाव आयोग को ठेंगे पर रख सकेगी? क्या बाजार का चमत्कार/बेरोजगारी/”बाबालोगों” की चमकती इमेज फर्क डाल सकेंगे? और कितना?

मुझे लगता है कि चिठेरा समुदाय इन मसलों पर अपनी व्यक्तिगत/सामुहिक राय जरूर रखता होगा. एक बहस बहन मायावती पर चलेगी जरूर! बहनजी (व लालूजी) ऐसे लीडर हैं, जिनके प्रति आप उदासीन भाव तो रख ही नहीं सकते.


चिठेरी (हिन्दी ब्लॉगरी) और विवादास्पद होने का पचड़ा.



ब्लॉगिन्ग की दुनिया की ताकत मुझे तब पता चली थी, जब हजरत मुहम्मद पर कार्टून बनाने के कारण मौत का फतवा दिया जा चुका था. मै वह कार्टून देखना चाहता था. प्रिन्ट और टीवी तो ऐसे पचडे़ में पड़ते नहीं. इन्टर्नेट पर मसाला मिला. भरपूर मिला. ज्यादातर ब्लॉगरों के माध्यम से मिला. ब्लॉगरों के प्रति मेरी इज्जत बढ़ गई.

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नेकी, दरिया और भरतलाल पर श्री माधव पण्डित



भरतलाल शर्मा का केस आपने देखा. हम सब में भरतलाल है. हम सभी अपनी माली हैसियत दिखाना चाहते हैं. हम सब में सामाजिक स्वीकृती और प्रशंसा की चाह है. हम सब समाज के हरामीपन (जो मुफ़्त में आपका दोहन करना चहता है) से परेशान भी हैं.

जब कभी द्वन्द्व में फसें, तब बड़े मनीषियों की शरण लेनी चहिये.

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हरिश्चंद्र – आम जिन्दगी का हीरो



आपकी आँखें पारखी हों तो आम जिन्दगी में हीरो नजर आ जाते हैं. च्यवनप्राश और नवरतन तेल बेचने वाले बौने लगते है. अदना सा मिस्त्री आपको बहुत सिखा सकता है. गीता का कर्म योग वास्तव के मंच पर घटित होता दीखता है.

आपकी आँखों मे परख हो, बस!

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भरतलाल की सगाई



भरतलाल शर्मा मेरा सरकारी भृत्य है. उसकी अस्थाई नौकरी लगते ही गांव-देस में उसकी इज्जत बढ गई. पांच हजार की पगार की स्लिप उसने गर्व से सबको दिखाई. सब परिजन-दुर्जन कर्जा मांगने में जुट गये. उसके भाई जो उससे बेगार कराते थे और उसकी सारी मजदूरी हड़प जाते थे, अब उससे हक से/बेहक से पैसा मांगने लगे. बिना मां-बाप का भरतलाल इतना अटेंशन पाकर कुप्पा होगया. लिहाजा बचत का बड़ा हिस्सा धर्मादे में जाने लगा. जो कर्जा उसने दिया उसे कोई चुकाने का नाम ही नही लेता.

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शेयर मार्केट धड़ाम



उधर चिदंबरम जी बजट भाषण की तैयारी कर रहे थे, इधर शेयर मार्केट दुबला हुआ जा रहा था. मुन्ना का कहना सही है – भैया, बहुत से दिन सांड़ों के होते हैं; कभी कभी तो भालुओं की भी चांदी कटनी चाहिये. मुन्ना धुर आशावादी है. मैं शेयर मार्केट के बारे में बात कर आशावाद का टानिक उससे लेता हूं. मेरा शेयर मार्केट में ज्यादा स्टेक नहीं है, सो थोडा बहुत तात्कालिक घाटा आशावाद के टानिक के लिये अच्छा है. मुन्ना से बात कर मैं अपने स्टॉक की नैसर्गिक मजबूती के बारे में आश्वस्त हो कर ’मस्त’ हो जाता हूं. बजट की चीर फाड़ की जहमत नहीं उठाता. Continue reading “शेयर मार्केट धड़ाम”