डा. जेम्स वाटसन की बात पची नहीं



डा. जेम्स वाटसन, डी.एन.ए. के अणुसूत्र का डबल हेलिक्स मॉडल देने के लिये विख्यात हैं। उन्हें फ्रांसिस क्रिक और मॉरिस विल्किंस के साथ 1962 में फीजियोलॉजी और मेडीसिन का नोबल पुरस्कार भी मिल चुका है। उन्ही डा. जेम्स वाटसन ने हाल ही में यह कहा है कि अश्वेत लोग श्वेत लोगों की अपेक्षा कम बुद्धिमान होते हैं। इससे बड़ा विवाद पैदा हो गया है।

मैं डा. वाटसन को बड़ी श्रद्धा से देखता था। एक नौजवान की तरह किस प्रकार अपने शोध में वे लीनस पाउलिंग से आगे निकलने का यत्न कर रहे थे – उसके बारे में अपने विद्यार्थी जीवन के दौरान मैने उनके लेखन से पढ़ा था। डा. वाटसन की पुस्तक से प्रभावित हो अपने आप को ‘सामान्य से अलग सोच’ रखते हुये उत्कृष्ट साबित करने के स्वप्न मैने देखे थे – जो कुछ सच हुये और बहुत कुछ नहीं भी!

पर अब लग रहा है कि उन्यासी वर्षीय डा. वाटसन सठियाये हुये जैसा व्यवहार कर रहे हैं। जाति, लिंग और अपने साथी वैज्ञानिकों सम्बन्धी विवादास्पद बातें कहने में उन्होने महारत हासिल कर ली है। पर उनके अफ्रीका विषयक वक्तव्य ने तो हद ही कर दी। उन्होने कहा कि “हमारी सामाजिक नीतियां इस आधार पर हैं कि अश्वेत बुद्धि में श्वेतों के बराबर हैं, पर सभी परीक्षण इस धारणा के खिलाफ जाते हैं।” शायद विवादास्पद बन कर डा. वाटसन को अपनी नयी हाल में प्रकाशित किताब बेचनी है।

आश्चर्य नहीं कि डा. वाटसन को सब ओर से आलोचना मिल रही है।

watson

लंदन के साइंस म्यूज़ियम की ओर से आयोजित उस व्याख्यान के कार्यक्रम को भी रद्द कर दिया गया है जिसे डॉक्टर वाटसन संबोधित करने वाले थे.

वाटसन अपनी हाल ही में प्रकाशित किताब के ‘प्रमोशन’ के लिए इन दिनों ब्रिटेन में हैं और तय कार्यक्रम के मुताबिक शुक्रवार को एक व्याख्यान भी देने वाले थे.

— बी.बी.सी., हिन्दी

मैं अश्वेतों की प्रतिभा का बहुत मुरीद हूं, ऐसा नहीं है। पर श्वेतों की चौधराहट सिर्फ इस आधार पर कि इस समय उनकी ओर का विश्व प्रगति पर है – मुझे ठीक नहीं लग रही। क्या बढ़िया हो कि इसी जन्म में मैं इस दम्भ का टूटना देख पाऊं।

बुद्धि पर अनुवांशिक और वातावरणीय (genetic and environmental) प्रभाव के विषय में हम पढ़ते रहे हैं। पर उसे एक जाति या रंग के आधार पर समझने का कुत्सित प्रयास होगा – यह विचार मन में नहीं आया था। डा. वाटसन तो नव नात्सीवाद जैसी बात कर रहे हैं।

आप अगर ‘नेचर’ के इस अंग्रेजी भाषा के ब्लॉग “द ग्रेट बियॉण्ड” की पोस्ट और उसके लिंक देखें तो आपको डबल हेलिक्स के अन्वेंषक प्रति एक अजीब सा क्षोभ होगा। कम से कम मुझे ऐसा हो रहा है।


डुप्लीकेट सामान बनाने का हुनर



बात शुरू हुई डुप्लीकेट दवाओं से। पश्चिम भारत से पूर्वांचल में आने पर डुप्लीकेट दवाओं का नाम ज्यादा सुना-पढ़ा है मैने। डुप्लीकेट दवाओं से बातचीत अन्य सामानों के डुप्लीकेट बनने पर चली। उसपर संजय कुमार जी ने रोचक विवरण दिया।
संजय कुमार जी का परिचय मैं पहले दे चुका हूं – संजय कुमार, रागदरबारी और रेल के डिब्बे वाली पोस्ट में। उन्होने अपना ब्लॉग तो प्रारम्भ नहीं किया, अपनी व्यस्तता के चलते। पर अनुभवों का जबरदस्त पिटारा है उनके पास और साथ ही रसमय भाषा में सुनाने की क्षमता भी। उसका लाभ मैं इस पोस्ट में ले रहा हूं। 
उन्होने बताया कि लगभग 20 वर्ष पूर्व वे छपरा में बतौर प्रोबेशनर अधिकारी ट्रेनिंग कर रहे थे। खुराफात के लिये समय की कमी नहीं थी। छपरा में स्टॉफ ने बताया कि कोई भी ऐसी नयी चीज नहीं है जो सिवान में न बनती हो। उस समय ट्विन ब्लेड नये चले थे। संजय ने पूछा – क्या ट्विन ब्लेड बनते हैं डुप्लीकेट? खोजबीन के बाद उत्तर मिला – “हां। फलानी फेमस कम्पनी का ट्विन ब्लेड डुप्लीकेट सिवान में बनता है।”

संजय ट्विन ब्लेड बनाने वाले उद्यमी की खोज में सिवान आये। दो 25-30 की उम्र वाले नौजवान उनसे मिलवाये गये। उनके ब्लेड रीसाइकल्ड नहीं थे कि पहली शेव में खुरपी की तरह चलें। नये बने थे और डुप्लीकेट को आसानी से असली की जगह चलाया जा सकता था। नौजवानों ने अपनी “फैक्टरी” भी संजय को दिखाई। केवल ब्लेड ही नहीं, वे डुप्लीकेट टूथ ब्रश और शेविंग क्रीम भी बना रहे थे।
Gyan(081) Gyan(084)
(संजय कुमार जी डुप्लीकेट सामान के विषय में संस्मरण बताते हुये)
“जब आप लोग इतना हुनर रखते हैं, तो अपनी कम्पनी क्यों नहीं खोलते?” – संजय का उन नौजवानों से तर्कसंगत प्रश्न था।

“आप फलानी फेमस ब्राण्ड की बजाय हमारे किसी ऐसे-वैसे ब्राण्ड का ट्विन ब्लेड खरीदेंगे?” – उन नौजवानों ने उत्तर दिया। “सामान सब अच्छा बनाना आता है हमें। पर बिकेगा नहीं। लिहाजा इस तरह चल रहे हैं।”
बिहार जैसा पिछड़ा प्रांत और सिवान जैसा पिछड़ा जिला। कालांतर में सिवान बाहुबलियों और अपराध के लिये प्रसिद्ध हुआ। वहां बीस साल पहले भी नौजवान हुनर रखते थे कुछ भी डुप्लीकेट सामान बनाने का!
इस हुनर का क्या सार्थक उपयोग है? यह कथा केवल सिवान की नहीं है। देश में कई हिस्सों में ऐसा हुनर है। पर सब अवैध और डुप्लीकेट में बरबाद हो रहा है। नैतिकता का ह्रास है सो अलग। 
संजय कुमार जी का धन्यवाद इसलिये कि उन्होने एक फर्स्ट हैण्ड अनुभव (भले ही बीस साल पुराना हो) मुझे बताया जिसे ब्लॉग पर लिखा जा सके।


मैने कहीं पढ़ा कि हिन्दी ब्लॉगरी में कुछ लोग अभी शैशवावस्था में हैं। ब्लॉग का प्रयोग बतौर डायरी कर रहे हैं। मेरे विचार से अगर ब्लॉग में “मैं” का एलिमेण्ट न हो तो ब्लॉग पढ़ने का क्या मजा? आदमी सीधे शुष्क शोध-प्रबन्ध न पढ़े! इसलिये जान बूझ कर संस्मरणात्मक पोस्ट ठेल रहा हूं – यह भी देखने के लिये कि लोग पढ़ते हैं या नहीं!
और मुझे हिन्दी ब्लॉग जगत में शिशु माना जाये – इससे मस्त और क्या हो सकता है!


पीढ़ियों की सोच में अंतर



पिछले शनिवार को मैं लोकभारती प्रकाशन की सिविल लाइंस, इलाहाबाद की दुकान पर गया था। हिन्दी पुस्तकों का बड़ा जखीरा होता है वहां। बकौल मेरी पत्नी "मैं वहां 300 रुपये बर्बाद कर आया"। कुल 5 पुस्तकें लाया, औसत 60 रुपया प्रति पुस्तक। मेरे विचार से सस्ती और अच्छी पेपरबैक थीं। हिन्दी पुस्तकें अपेक्षाकृत सस्ती हैं।

वहां काउण्टर पर लगभग 65 वर्ष के सज्जन थे। दिनेश जी। बातचीत होने लगी। बोले – नये जवान पुस्तक की दुकान पर काम लायक नहीं हैं। डिग्री होती है पर पढ़ना-लिखना चाहते नहीं। पुस्तकों के बारे में जानकारी नहीं रखते। बस यह चाहते हैं कि शुरू में ही 5-7 हजार मिलने लगें। आते बहुत हैं, पर एम्प्लॉयेबल नहीं हैं। मैने भी अदी गोदरेज का कहा सन्दर्भित कर दिया – "जो एम्प्लॉयेबल है वह एम्प्लॉयमेण्ट पा जाता है।" उनसे हाथ मिला कर मैं वापस लौटा। दिनेशजी से बोलचाल का नफा यह हुआ कि डिस्काउण्ट 10-15 रुपये ज्यादा मिल गया।

कल श्री उपेन्द्र कुमार सिन्ह (उनके परिचय के लिये यह पोस्ट देखें) और मैं शाम को कॉफी हाउस गये। कॉफी पीते हुये कॉउण्टर पर दक्षता से काम करते मैनेजर को हम देख रहे थे। चलते समय सिंह साहब ने मैनेजर से बातचीत की। मैनेजर तीस पैंतीस की उम्र का था। नाम बताया बैजू। केरळ का निवासी। हम लोगों ने कॉफी हाउस की सामान्य जानकरी ली। बैजू को श्री सिन्ह ने कहा कि मैं कॉफी हाउस पर लिख चुका हूं। मैने अपना परिचय भी दिया बैजू को – पाण्डेय। बैजू ने समझा कि मैं शायद साम्यवादी हूं। बोले – आप कॉमरेड है! उत्तर में मैने गुनगुना कर ‘न’ इस अन्दाज में कहा कि वह व्यक्ति समझ न पाये कि मैं ‘कॉमरेड’ नहीं हूं। भ्रम बना रहे।

Gyan(072) Gyan(073)
कॉफी हाउस के मैनेजर कामरेड बैजू    कॉफी हाउस में गहमागहमी का माहौल

बैजू ने बताया कि इलाहाबाद का कॉफी हाउस आर्थिक रूप से थोड़ा डगमगाया हुआ है। कुछ रिटायरमेण्ट के करीब बूढ़ों ने काम की क्वालिटी पर ध्यान की बजाय अपने रिटायरमेण्ट का जुगाड़ ज्यादा किया (अभिप्राय अक्षमता और भ्रष्टाचार से था)। मैं कॉमरेड बैजू से भी हाथ मिला कर रवाना हुआ।

फिर सोचा – दिनेश जी नयी पीढ़ी को अक्षम और जल्दी पैसा बनाने को आतुर बता रहे थे। कॉमरेड बैजू पुरानी पीढ़ी को स्वार्थी और भ्रष्ट करार दे रहे थे। दोनो ही असंतुष्ट। बस मैं ही प्रसन्न था कि बैठे बिठाये बिना साम्यवादी प्रतिबद्धता के कॉमरेड बन गया। और दूसरी जगह 10-15 रुपये ज्यादा डिस्कॉउण्ट पा गया।

पीढ़ियों की सोच का अंतर आपने भी अपने अनुभवों में महसूस किया होगा।   


कौन बर्बर नहीं है?



प्रत्येक सभ्यता किसी न किसी मुकाम पर जघन्य बर्बरता के सबूत देती है। प्रत्येक धर्म-जाति-सम्प्रदाय किसी न किसी समय पर वह कर गुजरता है जिसको भविष्य के उसके उत्तराधिकारी याद करते संकोच महसूस करते हैं। इस लिये जब कुछ लोग बर्बरता के लिये किसी अन्य वर्ग को लूलूहाते (उपहास करते) हैं – तो मुझे हंसी आती है।

बहुत पढ़ा है हिटलर की नात्सी बर्बरता के बारे में। संघ के बन्धु इस्लाम की आदिकालीन बर्बरता के बारे में अनवरत बोल सकते हैं। नरेन्द्र मोदी को दानवीय कहना तो जैसे फैशन नैतिक अनुष्ठान है। उनके चक्कर में सारे गुजराती बर्बर बताये जा रहे हैं। यहूदियों पर किये गये अत्याचार सर्वविदित हैं। ईसाईयत के प्रारम्भ में यहूदी शासकों ने भी अत्याचार किये। कालांतर में ईसाइयत के प्रचार प्रसार में भी पर्याप्त बर्बरता रही। हिन्दू धर्म में अपने में अस्पृष्यता, जाति और सामंतवाद, नारी उत्पीड़न, शैव-वैष्णव झगड़े आदि के अनेक प्रकरणों में बर्बरता के प्रचुर दर्शन होते हैं।

बर्बरता के बारे में बोलने से पहले गिरेबान में झांकने की जरूरत है।

नेताजी सुभाष बोस अंग्रेजों के खिलाफ सन 1942 में जापानियों के साथ मिल गये थे। सामान्य भारतीय के लिये अंग्रेज विलेन, नेताजी हीरो हैं। तो तार्किक रूप से जापानी मित्र नजर आते हैं। जापानी भारत के मेनलैण्ड पर विजयपताका फहराते नहीं आये। अन्यथा हमारी सोच कुछ और होती – जापानियों के प्रति और शायद नेताजी के प्रति भी।

मनोज दास की एक पुस्तक है – मेरा नन्हा भारत। अनुवाद दिवाकर का है और छापा है नेशनल बुक ट्रस्ट ने।  पेपर बैक की कीमत रु. 75.-

इस पुस्तक में प्रारम्भ के कुछ लेख अण्डमान के बारे में हैं। उन्हें पढ़ें तो जापानी गर्हित बर्बरता के दर्शन होते हैं। मैं आपको एक छोटे अंश का दर्शन कराता हूं:

…..दूसरा विश्व युद्ध शुरू हो गया था। जापानियों ने 23 मार्च 1942 को पोर्ट ब्लेयर पर हमला बोल दिया। ….अभागे देशवासियों को दांतपीसते घुसपैठियों के स्वागत के चिन्ह प्रदर्शित करने की जुगत करनी पड़ी। बिन एक भी गोली चलाये बारह घण्टे के अन्दर पूरा अधिकार हो चुका था।… जल्द ही जापानियों को बाजारों में घूमते, जो भी इच्छ हो उसे उठा लेते और किसी भी दुकान से ऐसा करते देखा जाने लगा। …कुछ को तो अपने चेहरे पर शिकन लाने के लिये थप्पड़ भी खाने पड़े।

….जापानी जुल्फिकार के घर में घुसा और उसने दो अण्डे उठा लिये। पीड़ा से दांत पीसते हुये भी नर्म दिखाते हुये जुल्फिकार को घृष्ट होना पड़ा कि "कृपया एक छोड़ दें, क्यों कि हमारे एक बच्चा है जिसे इसकी जरूरत होती है।" लेकिन जापानी अधिकारी ने उसे धमकाने वाले अन्दाज में देखा कि जुल्फिकार उसे रोकने का साहस तो करे। अचानक जुल्फिकार ने अपनी बन्दूक निकाली और गोली चला दी।

…. जुल्फिकार की गोली तो जापानी के सिर को छूती हुई निकल गयी पर वह जल्दी ही हजारों सैनिकों को ले आया। वे राइफलों से हर दिशा में गोली बरसा रहे थे। रास्ते में आने वाले सभी घरों को आग लगा रहे थे। अंतत: उन्होने जुल्फिकार को पकड़ लिया। ….उसे घसीटा गया, क्रूरता से पीटा गया और गोली मार दी गयी।

आगे जो विवरण है वह नात्सी बर्बरता से किसी प्रकार कम नहीं है। बहुत से भारतीयों को सामुहिक यातना देने और जापानियों द्वारा उनकी केल्कुलेटेड हत्या के प्रसंग हैं। नेताजी किनके साथ थे! और उन्हे पता भी चला जापानी बर्बरता का या नहीं? (कृपया नीचे बॉक्स देखें) 

मैं नेताजी को गलत नहीं ठहरा रहा। मैं नेताजी के द्वारा प्रयोग किये गये विकल्प को भी गलत नहीं कह रहा। मैं यह  भी नहीं कह रहा कि ब्रिटिश जापानियों से बेहतर थे। मैं केवल यह कह रहा हूं कि बर्बरता किसी एक व्यक्ति-वर्ग-जाति-सम्प्रदाय-देश का कृत्य नहीं है। घर में देख लें – पति पत्नी से बर्बर हो जाता है।

अत: मैं पहले पैरा में लिखी लाइनें पुन: दोहरा दूं - 

इस लिये जब कुछ लोग बर्बरता के लिये किसी अन्य वर्ग को लूलूहाते (उपहास करते) हैं – तो मुझे हंसी आती है।

नेताजी को अण्डमान में देशवासियों से कैसे मिलाया गया:
दिसम्बर 29’1943:
विमान से नेताजी सुभाषचन्द्र बोस निकले और उन लोगों के बीच से गुजरे जिन्हे दो पंक्तियों में खड़े रहने का आदेश दिया गया था। "मानो वे गार्ड ऑफ ऑनर का निरीक्षण कर रहे हों"। जापानी अधिकारी उनके आगे और पीछे मार्च कर रहे थे और कभी कभी बगल में भी रहते थे। उनके पास भारतीयों से बातचीत का कोई अवसर नहीं था। उन्होने जरूर असहज महसूस किया होगा लेकिन वह उनके लिये सवाल उठाने या प्रोटोकॉल का उल्लंघन करने का अवसर शायद नहीं था।
                           —— मनोज दास, पुस्तक में एक लेख में।

भर्तृहरि, उज्जैन, रहस्यमय फल और समृद्धि-प्रबन्धन



देखिये, हमें पूरा यकीन है कि हमें हिन्दी में कोई जगह अपने लिये कार्व-आउट (carve-out) नहीं करनी है। बतौर ब्लॉगर या चिठेरा ही रहना है – चिठ्ठाकार के रूप में ब्लॉगरी की स्नातकी भी नहीं करनी है। इसलिये अण्ट को शण्ट के साथ जोड़ कर पोस्ट बनाने में हमारे सामने कोई वर्जना नहीं है।

सो अब जुड़ेंगे भर्तृहरी समृद्धि-प्रबन्धन के साथ। जरा अटेंशनियायें।

भर्तृहरि को सन्यासी मिला। (उज्जैन में दो दशक भर आते जाते हमें ही सैंकड़ों सन्यासी मिले थे तो भतृहरी को तो मिला ही होगा!)

उज्जैन का स्मरण होते ही कृष्ण, सान्दीपनि, सुदामा, सान्दीपनि आश्रम में खड़े नन्दी वाला शिवाला, भर्तृहरि की गुफा, भगवान कालभैरव पर तांत्रिकों का अड्डा, मंगलनाथ, सिद्धपीठ, पिंगलेश्वर, पंचक्रोशी यात्रा, दत्त का अखाड़ा, सिन्हस्थ और महाकाल का मन्दिर आदि सबकी याद हो आती है। — सब का प्रचण्ड विरह है मुझमें। सबका नाम ले ले रहा हूं – अन्यथा कथा आगे बढ़ा ही नहीं पाऊंगा।

हां, वह सन्यासी महायोगी था। राजा भर्तृहरि को एक फल दिया उसने अकेले में। फल के बारे में बता दिया कि राजा सुपात्र हैं, अच्छे प्रजापालक हैं, वे उसका सेवन करें। वह फल अभिमंत्रित है उस योगी की साधना से। उसके सेवन से राजा चिरयुवा रहेंगे, दीर्घायु होंगे।

Apple भर्तृहरि ने फल ले लिया पर उनकी आसक्ति अपनी छोटी रानी में थी। वह फल उन इंस्ट्रक्शंस के साथ उन्होने छोटी रानी को दे दिया। छोटी रानी को एक युवक प्रिय था। फल युवक के हाथ आ गया। युवक को एक वैश्या प्रिय थी। फल वहां पंहुचा। वैश्या को लगा कि वह तो पतिता है; फल के लिये सुपात्र तो राजा भर्तृहरी हैं जो दीर्घायु हों तो सर्वकाल्याण हो। उस वैश्या ने फल वेश बदल कर राजा को दिया।

भर्तृहरि फल देख आश्चर्य में पड़ गये। फल की ट्रेवल-चेन उनके गुप्तचरों ने स्पष्ट की। वह सुन कर राजा को वैराज्ञ हो गया। राजपाट अपने छोटे भाई विक्रम को दे दिया और स्वयम नाथ सम्प्रदाय के गुरु गोरक्षनाथ का शिष्यत्व ले लिया।224_Coconut

यह तो कथा हुई। अब आया जाय समृद्धि पर। भर्तृहरि के फल की तरह अर्थ (धन) भी अभिमंत्रित फल है। उसे लोग सम्भाल नहीं पाते। अपने मोह-लोभ-कुटैव-अक्षमता के कारण आगे सरकाते रहते हैं। मजे की बात है वे जानते नहीं कि सरका रहे हैं! बोनस मिलते ही बड़ा टीवी खरीदना – यह सरकाना ही है।

अंतत: वह जाता सुपात्र के पास ही है। जैसे अवंतिका के राज्य के सुपात्र विक्रमादित्य ही थे – जिन्हे वह मिला।1 आज आप विश्व की सारी सम्पदा बराबर बांट दें – कुछ समय बाद वह पात्रता के आधार पर फिर उसी प्रकार से हो जायेगी। धन वहीं जाता है जहां उसके सुपात्र हों। जहां वे उसमें वृद्धि करें। धन का ईश्वरीय कोष असीमित है। उस कोष को धरती पर जो बढ़ा सके वह सुपात्र है। धन गरीबों को चूसने से नहीं बढ़ता। धन समग्र रूप से बढ़ाने से बढ़ता है।


1. यह पता नहीं चलता कि उस फल का भर्तृहरि ने अंतत: क्या किया। राज्य जरूर विक्रमादित्य को सौप दिया था। यह सब आपको मिथकीय लगता होगा। पर क्षिप्रा के पुल पर से जब भी गुजरती थी मेरी ट्रेन; भर्तृहरि, विक्रमादित्य, चन्द्रगुप्त, कालिदास और वाराहमिहिर मुझे उसकी क्षीण जलधारा में झिलमिलाते लगते थे। अब वे दिन नहीं रहे – यह कसकता है।


मेरी पत्नी कह रही हैं – “यह पोस्ट शुरू तो लाफ्टर शो के अन्दाज में हुई पर बाद में आस्था चैनल हो गयी। इसे लोग कतई पढ़ने वाले नहीं!”

कल की पोस्टें जो शायद आपने न देखी हों –


ई-पण्डित को धन्यवाद – विण्डोज़ लाइव राइटर के लिये



विण्डोज़ लाइव राइटर ब्लॉगिंग के लिये बेहतरीन औजार है। आप इसे यहां से डाउनलोड कर सकते हैं। मुझे इसका पता ई-पण्डित (श्रीश – मेरे प्रिय ब्लॉगर) की पोस्ट से चला था। यह पोस्ट श्रीश ने 2 जनवरी को छापी थी पर मुझे बहुत बाद में पता चली। इस औजार का प्रयोग करते मुझे एक महीना हो गया है।

लाइव राइटर डाउनलोड कर इंस्टाल करने के बाद मैने पीछे मुड़ कर नहीं देखा। मेरी लगभग सभी पोस्टें विण्डोज़ लाइव राइटर पर लिखी जाती हैं और वे मेरे ब्लॉग पर कैसे लगेंगी – यह जानने के लिये उनका प्रिव्यू भी देख लेता हूं।

यह प्रोग्राम अब बीटा 3 स्टेज में है। मैने लेटेस्ट स्टेज़ इंस्टाल कर लिया है। बहुत अच्छा है। जो लोग इण्टरनेट प्रयोग में डाउनलोड किये गये मेगाबाइट्स को लेकर चिंतित रहते हैं पर अपनी पोस्ट की उत्कृष्टता के प्रति भी सजग होते हैं, उनके लिये तो यह और भी महत्वपूर्ण है।

संजय बेंगानी के सुझाव पर:
निश्चय ही विण्डोज़ लाइव राइटर के डेवलपर बन्धु – वे जो भी, जहाँ भी हों, अतिशय धन्यवाद के पात्र हैं। यह सम्पूर्ण मानवता की सेवा है।

एक पंथ दो काज – मैं श्रीश को धन्यवाद भी दे रहा हूं और विण्डोज़ लाइव राइटर की सिफारिश भी कर रहा हूं। इस लाइव राइटर के वेब-लेआउट (जिसमें आप पोस्ट रचते हैं) की खिड़की ऐसी लगती है:

aaaa

और लाइव राइटर में प्रिव्यू ऐसा दीखता है:

preview

ऑफ लाइन लिखने, प्रिव्यू देखने और सरलता से अपने ब्लॉग पर पब्लिश करने के लिये नायाब सहायता है यह। ट्राई कर देखिये (अगर पहले से ही प्रयोग नहीं कर रहे हैं, तो)!