हेमेन्द्र सक्सेना जी के संस्मरण – पुराने इलाहाबाद की यादें (भाग 1)

सन 1944 में इलाहाबाद “पूर्व के ऑक्सफोर्ड” के नाम से जाना जाता था। दो किलोमीटर के दायरे में विश्वविद्यालय सीनेट हॉल, म्योर सेण्ट्रल कॉलेज, आनन्द भवन और पब्लिक लाइब्रेरी स्थित थे। कहा जाता था कि अगर एक ढेला यहां फेंका जाये तो किसी न किसी महान हस्ती पर गिरेगा।


हेमेन्द्र सक्सेना जी अब 91 वर्ष के हैं और उनकी सम्प्रेषण की क्षमता और काबलियत किसी भी मेधावी नौजवान से अधिक ही है। वे इलाहाबाद के उस समय के गवाह रहे हैं जब वहां हर गली नुक्कड़ पर महान विभूतियां चलती फिरती दिखाई पड़ती थीं। उन्होने “Remembering Old Allahabad” शृखला में नॉर्दन इण्डिया पत्रिका में लेख लिखे हैं। मेरे मित्र श्री रमेश कुमार जी – जो उनके पारिवारिक मित्र भी हैं, ने 14 पृष्ठों की हेमेन्द्र जी की एक हस्तलिखित पाण्डुलिपि की फोटोकॉपी दी है। मुझे नहीं मालुम कि यह एन.आई.पी. में छप चुकी है या नहीं। गौरी सक्सेना (उनकी पुत्री और मेरी रेलवे की सहकर्मी) ने बताया कि और भी बहुत सा उनका लिखा घर पर मौजूद है पर वे उसे प्रकाशित करने के बारे में बहुत मॉडेस्ट हैं।

गौरी सक्सेना ने अपने पिताजी की सहमति उनके लिखे के अनुवाद को ब्लॉग पर प्रस्तुत करने के लिये दी है। मैं उनका आभारी हूं। यह करीब 5 भागों में प्रस्तुत होगा।

इस परिचयात्मक नोट के अन्त में कहा जा सकता है कि यह हेमेन्द्र सक्सेना जी की अतिथि ब्लॉग पोस्ट है।


हेमेन्द्र सक्सेना जी की हस्तलिखित पांडुलिपि का स्क्रीनशॉट
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हेमेन्द्र सक्सेना, रिटायर्ड अंग्रेजी प्रोफेसर, उम्र 91, फेसबुक पर सक्रिय माइक्रोब्लॉगर : मुलाकात

हेमेन्द्र जी ने अपने संस्मरण टुकड़ा टुकड़ा लिखे हैं. उनके लगभग 14 पन्ने के हस्त लिखित दस्तावेज की फोटो कॉपी मेरे पास भी है. कभी बैठ कर उसका हिन्दी अनुवाद कर ब्लॉग पर प्रस्तुत करूंगा.


वे इलाहाबाद (प्रयागराज) विश्विद्यालय के अंग्रेजी के प्रोफेसर रह चुके हैं. फेसबुक में उनकी प्रोफाइल पर उनका जन्मदिन दर्ज है – 29 मार्च 1928. मैं गौरवान्वित होता हूँ कि वे मेरे फेसबुक मित्र हैं. पिछले दिनों में उनसे मिलने गया था मैं.

हेमेन्द्र सक्सेना जी, रमेश कुमार और गौरी सक्सेना. हेमेन्द्र जी के बैठक कक्ष में

हेमेन्द्र सक्सेना जी 91 वर्ष के होने के बावजूद भी शारीरिक और मानसिक रूप से बहुत चुस्त दुरुस्त हैं. उनके घर हम लगभग दो घंटे रहे और बातचीत का सिलसिला हमने नहीं, उन्होने ही तय किया. पूरे दौरान वे ही वक्ता थे. हम श्रोता और वह भी मंत्र मुग्ध श्रोता.

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(युद्ध) उन्माद के तीन दिन

युद्ध हमारे व्यक्तित्व में अच्छा से अच्छा और बुरा से बुरा पट्ट से निकाल कर दिखा देता है। वह जितना इस बार दिखा – सोशल मीडिया और टीवी पर उन्मादित सुधीजनों की प्रतिक्रियाओं के द्वारा – उतना पहले कभी नहीं दिखा था।


छब्बीस फ़रवरी की सुबह, जब देर से उठा और उठते ही सामान्य तरीके से मोबाइल पर खबर की सुर्खियां देखीं तो स्पष्ट हो गया कि पुलवामा का काउण्टर सेना ने कर दिया है। यह स्पष्ट हो गया कि अगले कुछ दिन इसी सर्जिकल 2 की चर्चा में गुजरने वाले हैं। और गुजरे भी।

पर जिस मन्थन, जिस चर्निंग, जिस उच्च रक्तचाप को भारत (और पाकिस्तान भी) के लोगों में पाया वह अकल्पनीय था। एक दिन तो प्रतिपक्ष सन्न खींचे था। उसे लग रहा होगा कि उसके नीचे से जमीन दरक गयी है। भगत गण (और मैं भी) गदगद थे। यह गदगदायमान की दशा अगले दिन तब तक बनी रही जब तक कि मिग के मलबे नहीं दिखाये जाने लगे। वह भी खैर कुछ खास नहीं था। जब से मिग आये हैं – और मेरी किशोरावस्था के दिनों से उनकी चर्चा होती रही है – तब से निरन्तर उनका युद्ध के अलावा भी गिरना सुनता-देखता रहा हूं। सनाका खाने का अवसर तब आया जब मिग के पायलेट को पाक अधिकृत जमीन पर नाले में पड़े और लोगों की मार खाते देखा।

युद्ध गजब की चीज है। हमारे व्यक्तित्व में अच्छा से अच्छा और बुरा से बुरा पट्ट से निकाल कर दिखा देता है। वह जितना इस बार दिखा – सोशल मीडिया, टीवी के उन्मादित एन्करों और चर्चा में शामिल सुधीजनों की प्रतिक्रियाओं के द्वारा – उतना पहले कभी नहीं दिखा था।

सन्न पड़े विपक्षी दलों को मानो संजीवनी मिल गयी। उसके बाद सरकार के खिलाफ़ जो जहर उगला गया, उस जहर को तीखा बनाने के लिये पाकिस्तान की जम कर तरफ़दारी की गयी और प्रतिपक्ष जिस तरह से मोदी की आलोचना में लग गया – आलोचना में कुछ सही था और अधिकांश अण्ट शण्ट था – वह सब अकल्पनीय था।

इस प्रतिपक्ष की प्रतिक्रिया से निरपेक्ष कुछ फेन्स-सिटर्स भी आयंबांयशांय बक्कने लगे। पर जो ज्यादा हुआ, वह यह था कि सरकार और सर्जिकल स्ट्राइक के पक्ष के लोग उनसे भिड़ने के लिये जिस जूतमपैजार की भाषा पर उतरे, वह भी मानवीय प्रतिक्रियाओं का निम्नतर नमूना दिखा।

युद्ध गजब की चीज है। हमारे व्यक्तित्व में अच्छा से अच्छा और बुरा से बुरा पट्ट से निकाल कर दिखा देता है। वह जितना इस बार दिखा – सोशल मीडिया, टीवी के उन्मादित एन्करों और चर्चा में शामिल सुधीजनों की प्रतिक्रियाओं के द्वारा – उतना पहले कभी नहीं दिखा था।

अपने बचपन में आल इडिया रेडियो पर “रेडियो झूठिस्तान” की पैरोड़ी का सुनना याद हो आया सन 1965 की लड़ाई के समय का। देश एकजुट था और पैरोडी का स्तर इतना (गिरा हुआ) नहीं था। इस बार तो पराकाष्ठा थी…

भिड़ने के चक्कर में मैने अपने कई जान पहचान के लोगों को गालियों और अपशब्दों के उस प्रयोग पर उतरते देखा, जो उनके व्यक्तित्व से कदापि मेल नहीं खाता था। प्रतिपक्ष के और कई साम्यवादी/सेक्युलर, दक्षिणपन्थ के “युद्ध-उन्माद जगाने वाली मनस्थिति” का काउण्टर करने के लिये देश से गद्दारी की सीमा तक बोलते नजर आये। उनकी प्रतिक्रिया के सामने पाकिस्तान के अखबार (विशेषत: द डॉन) तो हिन्दुस्तानी से लगने लगे। उनसे भिड़ने के लिये मेरे कई दक्षिण पन्थी और “भगत” मित्र भी मादर-बहन वाले अस्त्रों का यूं प्रयोग करने लगे, मानो वे असुरों से लड़ने के वृहस्पति-विश्वामित्र के बनाये अस्त्र हों।

टेलीवीजन वाले तो कटनहे कुकुर सा रियेक्शन दे रहे थे। उनका बोलने का लहजा – आम सी बात को बोलने का लहजा भी – इतना शब्दों पर जोर दे कर होता है, इतना चीखता चिल्लाता होता है कि लगता है इनमें से सभी हाइपर टेंशन के मरीज होंगे। कल तो दिन भर अपनी टीआरपी के चक्कर में मिग के पाइलेट को वैसा दर्जा दे दिया मानो वह महाभारत का पाण्डव पक्ष का महारथी हो – अकेले ही दोचार अक्षौहिणी सेना को मार देने में सक्षम। अभिनन्दन की वीरता में हम भी अभिभूत थे। पर टीवी ने इस अभिभूत होने को इतना भुनाया कि रात में जब पाइलट का पाकिस्तानियों का उसके मुंह में डाले शब्दों का हाई-ली एडिटेड वीडियो देखने को मिला तो अचानक उस अभिभूताइटिस में कन्वल्शन होने लगे। मेरे एक मित्र ने तो सेना भर्ती में चयन की प्रक्रिया की कमियों की चर्चा भी प्रारम्भ कर दी ट्विटर पर।

कई अच्छे अच्छे लेखक – जो मरने के बाद भी कई पीढ़ियों- सदियों तक अपने लेखन/पुस्तकों के लिये जाने जायेंगे -जिस घटिया स्तर की ट्वीट करते दिखे, उसको देख उनकी विद्वता पर गहरा शक होने लगा।

पर शायद यह सब हम लोग अपनी सामान्य अवस्था में नहीं युद्धोन्माद की दशा में बोल रहे थे। वैसे जैसे एनेस्थीसिया में पड़ा मरीज आंय बांय करता है। मुझे पक्का यकीन है कि ये सब अपनी कुछ ट्वीट्स पर भविष्य में पछतायेंगे जरूर।

कुल मिला कर जो होता दिखा, वह अप्रिय था, और हम सब के शारीरिक-मानसिक स्वास्थ्य के लिये हानिकारक था। सेना पता नहीं कितने दिन का युद्ध लड़ सकती है; पर सोशल मीडिया और सामान्य मीडिया में भिड़े लोग तो बड़ी जल्दी बीमार हो डाक्टरों के परामर्श के लिये बाध्य हो जायेंगे; ऐसा मुझे लगा।

हजरत सज्जब अली की मजार और मुख्तार से मुलाकात

मजार किन्ही हजरत सज्जब अली की है। बताया कि कोई सौ साल पुरानी होगी मजार। कोई सन्त या फकीर नहीं थे सज्जब। नाम के आगे हजरत लगा था तो शायद हज कर आये रहे होंगे।


सवेरे की साइकिल सैर में खड़ंजे वाली सड़क पर लसमड़ा से पूरब मुड़ा। आगे एक घर दिखा किसी मुसलमान का। घर पर हरा झंडा था। उसमें चाँद, तारा, मस्जिद बना था। झंडे पर उर्दू में कुछ लिखा था। एक दो और झण्डियां लगी थीं घर की छत पर। कुछ छोटे बच्चे खेल रहे थे। पास में एक नौजवान और एक मेरी उम्र का व्यक्ति था। उनसे बात करने की पहल की मैंने – यह झंडे पर क्या लिखा है?

नौजवान ने जवाब दिया – रबी… वह खुद भी सुनिश्चित नहीं था। शायद कुराअन की कोई आयत हो। और यह तो स्पष्ट था कि ये दोनो पढ़े लिखे या उर्दू-अरबी के जानकार नहीं थे। मैं समझ गया कि धर्म पर बात करना व्यर्थ है। वह इनके लिये “यह करो या यह न करो” से अलग कुछ नहीं है। हिन्दुओं में भी धर्म के मामले में जो गदहिया गोल के लोग होते हैं, जिनके लिये धर्म केवल अच्छत, रोली, चन्दन, माला, गंगाजल और पण्डिज्जी के बताये कुछ कर्मकाण्ड भर होते हैं, उनसे बढ़ कर कुछ नहीं हैं ये।

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शिवशंकर भेड़िअहा

आधा घंटा व्यतीत करता हूं शाम के भ्रमण में शिवशंकर भेड़िअहा (भेड़ चराने वाला) के समीप. इस दौरान वह बात भी करता है और नजर अपनी भेड़ों पर भी रखता है.


भेड़ चराता है वह. उसके अनुसार उसके पास सत्तर भेड़ें हैं. अगियाबीर के पठार पर दो बीघा जमीन भी है. उसमें से आधी ही खेती के काम की है. खेती करने के लिए उसने एक जोड़ी बैल भी रखा है. बैल बूढ़े हो गए हैं, पर उनको रखे हुए है – “कसाई को देने का मन नहीं होता”.

पूछने पर वह बताता है – भेड़ें गाभिन हों तो छह हजार तक की बिक जाती हैं. कसाई तो तीन हजार में लेता है. दस महीने में तैयार हो जाते हैं पशु बेचने के लिए.

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रामप्रसाद तीर्थयात्री का निमन्त्रण

चार-पांच लोग आपस में राम मन्दिर की बात कर रहे थे। एक महिला ने मुझे सम्बोधित कर कहा – आप तो मन्दिर बणवाओ सा। हम सब आयेंगे कार सेवा करने।


शाम का समय। सूर्यास्त से कुछ पहले। एक बस मेरे गांव के पास रुकी थी। अच्छी टूरिस्ट बस। उसके यात्री नेशनल हाईवे 19 की मुंड़ेर पर बैठे थे। एक बड़े पतीले में गैस स्टोव पर कुछ गर्म हो रहा था। एक व्यक्ति आटा गूंथ रहा था। सब्जियां भी कट रही थीं। शाम का भोजन बनने की तैयारी हो रही थी। बस बनारस से प्रयागराज की ओर जा रही थी।

पूर्णिमा के एक दिन पहले की शाम थी। चांद उग गया था। लगभग गोल। अगले दिन प्रयागराज में माघी पूर्णिमा का शाही स्नान था। सवेरे लोग संगम पर स्नान करेंगे शायद।

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मधुमक्खी का गड़रिया – शम्भू कुमार

जैसे गड़रिये, गाड्डुलिये लोहार, बतख का रेवड़ ले कर चलने वाले हैं। वैसे ही ये मधुमक्खी का रेवड़ ले कर घूमते फिरते हैं। हजारों हैं इस रोजगार में।


हफ्ता भर हो गया गांव में डेरा जमाये। उमेश दूबे के खेत में उन्होने करीब डेढ़ सौ मधुमक्खी के बक्से बिछा रखे हैं। लगभग दो हफ्ते भर और रहेंगे यहां। फिर उनकी मधुमक्खी पालक कम्पनी का मालिक जहां के लिये कहेगा, वहां के लिये रवाना हो जायेंगे।

खाली पड़े खेत में बिछाये मधुमक्खी के बक्से

वे तीन लोग हैं। कम्पनी के कर्मचारी। उनमें से एक – शम्भू कुमार से बातचीत हुई। शम्भू बीस-पच्चीस साल का नौजवान होगा। बिहार के मुजफ्फरपुर का है। कम्पनी भी वहीं की है। उसने बताया कि मुजफ्फरपुर लीची के लिये तो प्रसिद्ध है ही, मधुमक्खी पालन के लिये भी हो गया है। हजारों लोग वहां इस काम में लगे हैं। सामान्यत: वे पांच-छ के समूह में चलते हैं। यहां अभी तीन लोग हैं।

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