रेस्तराँ किसको आमन्त्रित करता है?!

नया खुला रेस्तरॉं है श्री विजया फैमिली ढाबा और रेस्तरॉं। … फैमिली के साथ सुकून से बैठ कर जलपान करने के स्थान यहां नहीं हैं। उस जरूरत को पूरा करना चाहते हैं तिवारी पिता-पुत्र।


कस्बे के बाजार मेँ एक रेस्तराँ खुलना कुछ उतना ही बड़ा है जैसे बम्बई, लंदन या पेरिस में कोई नया म्यूजियम या थियेटर खुलना। तिवारी जी को उसका विज्ञापन करना चाहिये। शायद सोच भी रहे हों। मैं तो आस-पास की रिपोर्ट देने वाले एक ब्लॉगर की नजर से ही देखता हूं। मैं चाहूंगा कि यह रेस्तराँ सफल हो। मुझे एक परमानेण्ट कॉफी पीने का अड्डा मिल सके! 😆


नितिन तिवारी ने अपने रेस्तराँ के कुछ चित्र ह्वाट्सेप्प पर भेजे हैं। दो सज्जन पैदल चल रहे हैं कलकत्ता (हावड़ा) से और जायेंगे राजस्थान। शायद सीकर में खाटू श्याम जी के स्थान पर। रास्ते में नितिन के रेस्तरॉं में विश्राम करते हैं। जगह का चयन करने और उनकी सुविधाओं का ध्यान देने के लिये कुछ लोग पहले से आ कर व्यवस्था देखते हैं। चलते समय एक एसयूवी वाहन उनके पीछे चलता है।

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एक जंग सी छिड़ी है व्यवस्था और अराजकता के बीच

एक जंग सी छिड़ी है व्यवस्था और अराजकता के बीच
लोग न केवल स्टिकर निकाल ले रहे हैं, उन बोरियों को उठा कर सड़क के डिवाइडर पर वाहन कुदाने के लिये रैम्प जैसा बनाने में भी प्रयोग कर रहे हैं। … भयंकर अराजक-जुगाड़ देश है यह!


टोंटी चोरी मात्र फलाने नेताजी का ही (दुर्)गुण नहीं है। यहां पूर्वांचल में देखता हूं कि सार्वजनिक सम्पत्ति से बलात्कार स्वीकृत मानवीय व्यवहार है। बड़ा खराब लगता है यह। जिसे कहते हैं, वह सिद्धान्तत: हामी भरता है कि ऐसा करना गलत है; पर वही मौका पाते ही कहीं भी पान की पीक पिच्च से थूंकते कोई रिमोर्स फील नहीं करता।

शिट!

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