महराजगंज कस्बे के रेस्तराँ में चिन्ना (पद्मजा) पांड़े

आप कहेंगे कि चाऊमीन पर इतना ज्यादा क्या कोई लिखने की बात है? पर आप पांच साल का गांव में रहने वाला बच्चा बनिये और तब सोच कर देखिये! … आपको यह सब पढ़ते समय अपने को शहरी-महानगरी कम्फर्ट जोन से बाहर निकाल कर देखना होगा।


विजय तिवारी जी के श्री विजया रेस्तराँ के बारे में मैं दो ब्लॉग पोस्टें लिख चुका हूं। पोस्ट 1 और पोस्ट 2 पर क्लिक कर वे देख सकते हैं। आजकल मैं अपनी साइकिल भ्रमण में बहुधा वहां जा कर कॉफी के लिये बैठने लगा हूं। गांव में रहते हुये मेरी कॉफी हाउस की चाह को यह रेस्तराँ लगभग 90 प्रतिशत पूरा कर दे रहा है।

दो-तीन बार मेरी पत्नीजी भी मेरे साथ गयी हैं – वह तब जब हम अपने वाहन से बाजार गये थे किसी सौदा-सामान के लिये। पत्नीजी को भी वह रेस्तराँ बहुत पसन्द आया है। चूंकि यह उनका अपने मायके का इलाका है – वे तिवारी जी और उनके कुटुम्ब से परिचित भी हैं। आसपास के बाभन रिश्तेदार भी होते हैं; उस तरह से भी विजय तिवारी जी रिश्ते में आते हैं – फलाने की बिटिया उनके गांव में या उस गांव की इस गांव/घर में आयी है ब्याह कर। मुझे उन सम्बन्धों में ज्यादा रुचि नहीं है। मैं तो यह देखता हूं कि विजय जी कितनी मेहनत-लगन से अपने रेस्तराँ को आकार दे रहे हैं। बतौर ब्लॉगर मेरा ध्येय यह ऑब्जर्व करना है कि यह उपक्रम कैसे विकसित होता है।

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महराजगंज के कस्बाई बाजार पर फुटकर सोच


यह पास का कस्बा – महराजगंज कैसे पनपा? कैसे इसका बाजार इस आकार में आया? यहां रहने वाले पहले के लोग कहां गये? बाजार ने कौन से लोगों को अपनी ओर आकर्षित किया। यातायात के साधन बाजार को किस तरह विकसित करते गये? … ये सवाल मेरे मन में आजकल उठ रहे हैं।

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